Rangbhumi in Hindi Novel Episodes by Munshi Premchand books and stories PDF | रंगभूमि - संपूर्ण

रंगभूमि - संपूर्ण

रंगभूमि

प्रेमचंद


© COPYRIGHTS

This book is copyrighted content of the concerned author as well as Matrubharti.

Matrubharti has exclusive digital publishing rights of this book.

Any illegal copies in physical or digital format are strictly prohibited.

Matrubharti can challenge such illegal distribution / copies / usage in court.


अध्याय 1

शहर अमीरों के रहने और क्रय—विक्रय का स्थान है। उसके बाहर की भूमि उनके मनोरंजन और विनोद की जगह है। उसके मध्य भाग में उनके लड़कों की पाठशालाएँ और उनके मुकदमेबाजी के अखाड़े होते हैंए जहाँ न्याय के बहाने गरीबों का गला घोंटा जाता है। शहर के आस—पास गरीबों की बस्तियाँ होती हैं। बनारस में पाँड़ेपुर ऐसी ही बस्ती है। वहाँ न शहरी दीपकों की ज्योति पहुँचती हैए न शहरी छिड़काव के छींटेए न शहरी जल—खेतों का प्रवाह। सड़क के किनारे छोटे—छोटे बनियों और हलवाइयों की दूकानें हैंए और उनके पीछे कई इक्केवालेए गाड़ीवानए ग्वाले और मजदूर रहते हैं। दो—चार घर बिगड़े सफेदपोशों के भी हैंए जिन्हें उनकी हीनावस्था ने शहर से निर्वासित कर दिया है। इन्हीं में एक गरीब और अंधा चमार रहता हैए जिसे लोग सूरदास कहते हैं। भारतवर्ष में अंधे आदमियों के लिए न नाम की जरूरत होती हैए न काम की। सूरदास उनका बना—बनाया नाम हैए और भीख माँगना बना—बनाया काम है। उनके गुण और स्वभाव भी जगत्—प्रसिध्द हैं—गाने—बजाने में विशेष रुचिए हृदय में विशेष अनुरागए अध्यात्म और भक्ति में विशेष प्रेमए उनके स्वाभाविक लक्षण हैं। बाह्य द्रष्टि बंद और अंतर्द्रष्टि खुली हुई।

सूरदास एक बहुत ही क्षीणकायए दुर्बल और सरल व्यक्ति था। उसे दैव ने कदाचित्‌ भीख माँगने ही के लिए बनाया था। वह नित्यप्रति लाठी टेकता हुआ पक्की सड़क पर आ बैठता और राहगीरों की जान की खैर मनाता। श्दाता! भगवान्‌ तुम्हारा कल्यान करें—श् यही उसकी टेक थीए और इसी को वह बार—बार दुहराता था। कदाचित्‌ वह इसे लोगों की दया—प्रेरणा का मंत्र समझता था। पैदल चलनेवालों को वह अपनी जगह पर बैठे—बैठे दुआएँ देता था। लेकिन जब कोई इक्का आ निकलताए तो वह उसके पीछे दौड़ने लगताए और बग्घियों के साथ तो उसके पैरों में पर लग जाते थे। किंतु हवा—गाड़ियों को वह अपनी शुभेच्छाओं से परे समझता था। अनुभव ने उसे शिक्षा दी थी कि हवागाड़ियाँ किसी की बातें नहीं सुनतीं। प्रातरूकाल से संध्या तक उसका समय शुभ कामनाओं ही में कटता था। यहाँ तक कि माघ—पूस की बदली और वायु तथा जेठ—वैशाख की लू—लपट में भी उसे नागा न होता था।

कार्तिक का महीना था। वायु में सुखद शीतलता आ गई थी। संध्या हो चुकी थी। सूरदास अपनी जगह पर मूर्तिवत्‌ बैठा हुआ किसी इक्के या बग्घी के आशाप्रद शब्द पर कान लगाए था। सड़क के दोनों ओर पेड़ लगे हुए थे। गाड़ीवानों ने उनके नीचे गाड़ियाँ ढ़ील दीं। उनके पछाईं बैल टाट के टुकड़ों पर खली और भूसा खाने लगे। गाड़ीवानों ने भी उपले जला दिए। कोई चादर पर आटा गूंधाता थाए कोई गोल—गोल बाटीयाँ बनाकर उपलों पर सेंकता था। किसी को बरतनों की जरूरत न थी। सालन के लिए घुइएँ का भुरता काफी था। और इस दरिद्रता पर भी उन्हें कुछ चिंता नहीं थीए बैठे बाटीयाँ सेंकते और गाते थे। बैलों के गले में बँधी हुई घंटीयाँ मजीरों का काम दे रही थीं। गनेस गाड़ीवान ने सूरदास से पूछा—क्यों भगतए ब्याह करोगेघ्

सूरदास ने गर्दन हिलाकर कहा—कहीं है डौलघ्

गनेस—हाँए है क्यों नहीं। एक गाँव में एक सुरिया हैए तुम्हारी ही जात—बिरादरी की हैए कहो तो बातचीत पक्की करूँघ् तुम्हारी बरात में दो दिन मजे से बाटीयाँ लगें।

सूरदास—कोई जगह बतातेए जहाँ धान मिलेए और इस भिखमंगी से पीछा छूटे। अभी अपने ही पेट की चिंता हैए तब एक अंधी की और चिंता हो जाएगी। ऐसी बेड़ी पैर में नहीं डालता। बेड़ी ही हैए तो सोने की तो हो।

गनेस—लाख रुपये की मेहरिया न पा जाओगे। रात को तुम्हारे पैर दबाएगीए सिर में तेल डालेगीए तो एक बार फिर जवान हो जाओगे। ये हड्डियाँ न दिखाई देंगी।

सूरदास—तो रोटीयों का सहारा भी जाता रहेगा। ये हड्डियाँ देखकर ही तो लोगों को दया आ जाती है। मोटे आदमियों को भीख कौन देता हैघ् उलटे और ताने मिलते हैं।

गनेस—अजी नहींए वह तुम्हारी सेवा भी करेगी और तुम्हें भोजन भी देगी। बेचन साह के यहाँ तेलहन झाड़ेगी तो चार आने रोज पाएगी।

सूरदास—तब तो और भी दुर्गति होगी। घरवाली की कमाई खाकर किसी को मुँह दिखाने लायक भी न रहूँगा।

सहसा एक फिटन आती हुई सुनाई दी। सूरदास लाठी टेककर उठ खड़ा हुआ। यही उसकी कमाई का समय था। इसी समय शहर के रईस और महाजन हवा खाने आते थे। फिटन ज्यों ही सामने आईए सूरदास उसके पीछे श्दाता! भगवान्‌ तुम्हारा कल्यान करेंश् कहता हुआ दौड़ा।

फिटन में सामने की गद्दी पर मि. जॉन सेवक और उनकी पत्नी मिसेज जॉन सेवक बैठी हुई थीं। दूसरी गद्दी पर उनका जवान लड़का प्रभु सेवक और छोटी बहन सोफिया सेवक थी। जॉन सेवक दुहरे बदन के गोरे—चिट्टे आदमी थे। बुढ़़ापे में भी चेहरा लाल था। सिर और दाढ़़ी के बाल खिचड़ी हो गए थे। पहनावा ऍंगरेजी थाए जो उन पर खूब खिलता था। मुख आकृति से गरूर और आत्मविश्वास झलकता था। मिसेज सेवक को काल—गति ने अधिक सताया था। चेहरे पर झुर्रियाँ पड़ गई थींए और उससे हृदय की संकीर्णता टपकती थीए जिसे सुनहरी ऐनक भी न छिपा सकती थी। प्रभु सेवक की मसें भीग रही थींए छरहरा डीलए इकहरा बदनए निस्तेज मुखए अॉंखों पर ऐनकए चेहरे पर गम्भीरता और विचार का गाढ़़ा रंग नजर आता था। अॉंखों से करुणा की ज्योति—सी निकली पड़ती थी। वह प्रकृति—सौंदर्य का आनंद उठाता हुआ जान पड़ता था। मिस सोफिया बड़ी—बड़ी रसीली अॉंखोंवालीए लज्जाशील युवती थी। देह अति कोमलए मानो पंचभूतों की जगह पुष्पों से उसकी सृष्टि हुई हो। रूप अति सौम्यए मानो लज्जा और विनय मूर्तिमान हो गए हों। सिर से पाँव तक चेतना ही चेतना थीए जड़ का कहीं आभास तक न था।

सूरदास फिटन के पीछे दौड़ता चला आता था। इतनी दूर तक और इतने वेग से कोई मँजा हुआ खिलाड़ी भी न दौड़ सकता था। मिसेज सेवक ने नाक सिकोड़कर कहा—इस दुष्ट की चीख ने तो कान के परदे फाड़ डाले। क्या यह दौड़ता ही चला जाएगाघ्

मि. जॉन सेवक बोले—इस देश के सिर से यह बला न—जाने कब टलेगीघ् जिस देश में भीख माँगना लज्जा की बात न होए यहाँ तक कि सर्वश्रेष्ठ जातियाँ भी जिसे अपनी जीवन—वृत्ति बना लेंए जहाँ महात्माओं का एकमात्र यही आधार होए उसके उध्दार में अभी शताब्दियों की देर है।

प्रभु सेवक—यहाँ यह प्रथा प्राचीन काल से चली आती है। वैदिक काल में राजाओं के लड़के भी गुरुकुलों में विद्या—लाभ करते समय भीख माँगकर अपना और अपने गुरु का पालन करते थे। ज्ञानियों और ऋषियों के लिए भी यह कोई अपमान की बात न थीए किंतु वे लोग माया—मोह से मुक्त रहकर ज्ञान—प्राप्ति के लिए दया का आश्रय लेते थे। उस प्रथा का अब अनुचित व्यवहार किया जा रहा है। मैंने यहाँ तक सुना है कि कितने ही ब्राह्मणए जो जमींदार हैंए घर से खाली हाथ मुकदमे लड़ने चलते हैंए दिन—भर कन्या के विवाह के बहाने या किसी सम्बंधी की मृत्यु का हीला करके भीख माँगते हैंए शाम को नाज बेचकर पैसे खड़े कर लेते हैंए पैसे जल्द रुपये बन जाते हैंए और अंत में कचहरी के कर्मचारियों और वकीलों की जेब में चले जाते हैं।

मिसेज सेवक—साईसए इस अंधे से कह दोए भाग जाएए पैसे नहीं हैं।

सोफिया—नहीं मामाए पैसे हों तो दे दीजिए। बेचारा आधो मील से दौड़ा आ रहा हैए निराश हो जाएगा। उसकी आत्मा को कितना दुरूख होगा।

माँ—तो उससे किसने दौड़ने को कहा थाघ् उसके पैरों में दर्द होता होगा।

सोफिया—नहींए अच्छी मामाए कुछ दे दीजिएए बेचारा कितना हाँफ रहा है। प्रभु सेवक ने जेब से केस निकालाय किंतु ताँबे या निकिल का कोई टुकड़ा न निकलाए और चाँदी का कोई सिक्का देने में माँ के नाराज होने का भय था। बहन से बोले—सोफीए खेद हैए पैसे नहीं निकले। साईसए अंधे से कह दोए धीरे—धीरे गोदाम तक चला आएय वहाँ शायद पैसे मिल जाएँ।

किंतु सूरदास को इतना संतोष कहाँघ् जानता थाए गोदाम पर कोई भी मेरे लिए खड़ा न रहेगाय कहीं गाड़ी आगे बढ़़ गईए तो इतनी मेहनत बेकार हो जाएगी। गाड़ी का पीछा न छोड़ाए पूरे एक मील तक दौड़ता चला गया। यहाँ तक कि गोदाम आ गया और फिटन रुकी। सब लोग उतर पड़े। सूरदास भी एक किनारे खड़ा हो गयाए जैसे वृक्षों के बीच में ठूँठ खड़ा हो। हाँफते—हाँफते बेदम हो रहा था।

मि. जॉन सेवक ने यहाँ चमड़े की आढ़़त खोल रखी थी। ताहिर अली नाम का एक व्यक्ति उसका गुमाश्ता था बरामदे में बैठा हुआ था। साहब को देखते ही उसने उठकर सलाम किया।

जॉन सेवक ने पूछा—कहिए खाँ साहबए चमड़े की आमदनी कैसी हैघ्

ताहिर—हुजूरए अभी जैसी होनी चाहिएए वैसी तो नहीं हैय मगर उम्मीद है कि आगे अच्छी होगी।

जॉन सेवक—कुछ दौड़—धूप कीजिएए एक जगह बैठे रहने से काम न चलेगा। आस—पास के देहातों में चक्कर लगाया कीजिए। मेरा इरादा है कि म्युनिसिपैलिटी के चेयरमैन साहब से मिलकर यहाँ एक शराब और ताड़ी की दूकान खुलवा दूँ। तब आस—पास के चमार यहाँ रोज आएँगेए और आपको उनसे मेल—जोल करने का मौका मिलेगा। आजकल इन छोटी—छोटी चालों के बगैर काम नहीं चलता। मुझी को देखिएए ऐसा शायद ही कोई दिन जाता होगाए जिस दिन शहर के दो—चार धानी—मानी पुरुषों से मेरी मुलाकात न होती हो। दस हजार की भी एक पालिसी मिल गईए तो कई दिनों की दौड़धूप ठिकाने लग जाती है।

ताहिर—हुजूरए मुझे खुद फिक्र है। क्या जानता नहीं हूँ कि मालिक को चार पैसे का नफा न होगाए तो वह यह काम करेगा ही क्योंघ् मगर हुजूर ने मेरी जो तनख्वाह मुकर्रर की हैए उसमें गुजारा नहीं होता। बीस रुपये का तो गल्ला भी काफी नहीं होताए और सब जरूरतें अलग। अभी आपसे कुछ कहने की हिम्म्त तो नहीं पड़तीय मगर आपसे न कहूँए तो किससे कहूँघ्

जॉन सेवक—कुछ दिन काम कीजिएए तरक्की होगी न। कहाँ है आपका हिसाब—किताब लाइएए देखूँ।

यह कहते हुए जॉन सेवक बरामदे में एक टूटे हुए मोढ़़े पर बैठ गए। मिसेज सेवक कुर्सी पर बैठीं। ताहिर अली ने हिसाब की बही सामने लाकर रख दी। साहब उसकी जाँच करने लगे। दो—चार पन्ने उलट—पलटकर देखने के बाद नाक सिकोड़कर बोले—अभी आपको हिसाब—किताब लिखने का सलीका नहीं हैए उस पर आप कहते हैंए तरक्की कर दीजिए। हिसाब बिलकुल आईना होना चाहिएय यहाँ तो कुछ पता नहीं चलता कि आपने कितना माल खरीदाए और कितना माल रवाना किया। खरीदार को प्रति खाता एक आना दस्तूरी मिलती हैए वह कहीं दर्ज ही नहीं है!

ताहिर—क्या उसे भी दर्ज कर दूँघ्

जॉन सेवक—क्योंए वह मेरी आमदनी नहीं हैघ्

ताहिर—मैंने तो समझा कि वह मेरा हक है।

जॉन सेवक—हरगिज नहींए मैं आप पर गबन का मामला चला सकता हूँ। (त्योरियाँ बदलकर) मुलाजिमों का हक है! खूब! आपका हक तनख्वाहए इसके सिवा आपको कोई हक नहीं है।

ताहिर—हुजूरए अब आइंदा ऐसी गलती न होगी।

जॉन सेवक—अब तक आपने इस मद में जो रकम वसूल की हैए वह आमदनी में दिखाइए। हिसाब—किताब के मामले में मैं जरा भी रिआयत नहीं करता।

ताहिर—हुजूरए बहुत छोटी रकम होगी।

जॉन सेवक—कुछ मुजायका नहींए एक ही पाई सहीय वह सब आपको भरनी पड़ेगी। अभी वह रकम छोटी हैए कुछ दिनों में उसकी तादाद सैकड़ों तक पहुँच जाएगी। उस रकम से मैं यहाँ एक संडे—स्कूल खोलना चाहता हूँ। समझ गएघ् मेम साहब की यह बड़ी अभिलाषा है। अच्छा चलिएए वह जमीन कहाँ है जिसका आपने जिक्र किया थाघ्

गोदाम के पीछे की ओर एक विस्तृत मैदान था। यहाँ आस—पास के जानवर चरने आया करते थे। जॉन सेवक यह जमीन लेकर यहाँ सिगरेट बनाने का एक कारखाना खोलना चाहते थे। प्रभु सेवक को इसी व्यवसाय की शिक्षा प्राप्त करने के लिए अमेरिका भेजा था। जॉन सेवक के साथ प्रभु सेवक और उनकी माता भी जमीन देखने चलीं। पिता और पुत्रा ने मिलकर जमीन का विस्तार नापा। कहाँ कारखाना होगाए कहाँ गोदामए कहाँ दफ्तरए कहाँ मैनेजर का बँगलाए कहाँ श्रमजीवियों के कमरेए कहाँ कोयला रखने की जगह और कहाँ से पानी आएगाए इन विषयों पर दोनों आदमियों में देर तक बातें होती रहीं। अंत में मिस्टर सेवक ने ताहिर अली से पूछा—यह किसकी जमीन हैघ्

ताहिर—हुजूरए यह तो ठीक नहीं मालूमए अभी चलकर यहाँ किसी से पूछ लूँगाए शायद नायकराम पंडा की हो।

साहब—आप उससे यह जमीन कितने में दिला सकते हैंघ्

ताहिर—मुझे तो इसमें भी शक है कि वह इसे बेचेगा भी।

जॉन सेवक—अजीए बेचेगा उसका बापए उसकी क्या हस्ती हैघ् रुपये के सत्तारह आने दीजिएए और आसमान के तारे मँगवा लीजिए। आप उसे मेरे पास भेज दीजिएए मैं उससे बातें कर लूँगा।

प्रभु सेवक—मुझे तो भय है कि यहाँ कच्चा माल मिलने में कठिनाई होगी। इधार लोग तम्बाकू की खेती कम करते हैं।

जॉन सेवक—कच्चा माल पैदा करना तुम्हारा काम होगा। किसान को ऊख या जौ—गेहूँ से कोई प्रेम नहीं होता। वह जिस जिन्स के पैदा करने में अपना लाभ देखेगा वही पैदा करेगा। इसकी कोई चिंता नहीं है। खाँ साहबए आप उस पण्डे को मेरे पास कल जरूर भेज दीजिएगा।

ताहिर—बहुत खूबए उसे कहूँगा।

जान सेवक—कहूँगा नहींए उसे भेज दीजिएगा। अगर आपसे इतना भी न हो सकाए तो मैं समझूँगाए आपको सौदा पटाने का जरा भी ज्ञान नहीं।

मिसेज सेवक—(ऍंगरेजी में) तुम्हें इस जगह पर कोई अनुभवी आदमी रखना चाहिए था।

जान सेवक—(ऍंगरेजी में) नहींए मैं अनुभवी आदमियों से डरता हूँ। वे अपने अनुभव से अपना फायदा सोचते हैंए तुम्हें फायदा नहीं पहुँचाते। मैं ऐसे आदमियों से कोसों दूर रहता हूँ।

ये बातें करते हुए तीनों आदमी फिटन के पास गए। पीछे—पीछे ताहिर अली भी थे। यहाँ सोफिया खड़ी सूरदास से बातें कर रही थी। प्रभु सेवक को देखते ही बोली—श्प्रभुए यह अंधा तो कोई ज्ञानी पुरुष जान पड़ता हैए पूरा फिलासफर है।श्

मिसेज सेवक—तू जहाँ जाती हैए वहीं तुझे कोई—न—कोई ज्ञानी आदमी मिल जाता है। क्यों रे अंधेए तू भीख क्यों माँगता हैघ् कोई काम क्यों नहीं करताघ्

सोफिया—(ऍंगरेजी में) मामाए यह अंधा निरा गँवार नहीं है।

सूरदास को सोफिया से सम्मान पाने के बाद ये अपमानपूर्ण शब्द बहुत बुरे मालूम हुए। अपना आदर करनेवाले के सामने अपना अपमान कई गुना असह्य हो जाता है। सिर उठाकर बोला—भगवान्‌ ने जन्म दिया हैए भगवान्‌ की चाकरी करता हूँ। किसी दूसरे की ताबेदारी नहीं हो सकती।

मिसेज सेवक—तेरे भगवान्‌ ने तुझे अंधा क्यों बना दियाघ् इसलिए कि तू भीख माँगता फिरेघ् तेरा भगवान्‌ बड़ा अन्यायी है।

सोफिया—(ऍंगरेजी में) मामाए आप इसका अनादर क्यों कर रही हैं कि मुझे शर्म आती है।

सूरदास—भगवान्‌ अन्यायी नहीं हैए मेरे पूर्व—जन्म की कमाई ही ऐसी थी। जैसे कर्म किए हैंए वैसे फल भोग रहा हूँ। यह सब भगवान्‌ की लीला है। वह बड़ा खिलाड़ी है। घरौंदे बनाता—बिगाड़ता रहता है। उसे किसी से बैर नहीं। वह क्यों किसी पर अन्याय करने लगाघ्

सोफिया—मैं अगर अंधी होतीए तो खुदा को कभी माफ न करती।

सूरदास—मिस साहबए अपने पाप सबको आप भोगने पड़ते हैंए भगवान का इसमें कोई दोष नहीं।

सोफिया—मामाए यह रहस्य मेरी समझ में नहीं आता। अगर प्रभु ईसू ने अपने रुधिर से हमारे पापों का प्रायश्चित्त कर दियाए तो फिर ईसाई समान दशा में क्यों नहीं हैंघ् अन्य मतावलम्बियों की भाँति हमारी जाति में अमीर—गरीबए अच्छे—बुरेए लँगड़े—लूलेए सभी तरह के लोग मौजूद हैं। इसका क्या कारण हैघ्

मिसेज सेवक ने अभी कोई उत्तर न दिया था कि सूरदास बोल उठा—मिस साहबए अपने पापों का प्रायश्चित्त हमें आप करना पड़ता है। अगर आज मालूम हो जाए कि किसी ने हमारे पापों का भार अपने सिर ले लियाए तो संसार में अंधेर मच जाए।

मिसेज सेवक—सोफीए बड़े अफसोस की बात है कि इतनी मोटी—सी बात तेरी समझ में नहीं आतीए हालाँकि रेवरेंड पिम ने स्वयं कई बार तेरी शंका का समाधान किया है।

प्रभु सेवक—(सूरदास से) तुम्हारे विचार में हम लोगों को वैरागी हो जाना चाहिए। क्योंघ्

सूरदास—हाँ जब तक हम वैरागी न होंगेए दुरूख से नहीं बच सकते।

जॉन सेवक—शरीर में भभूत मलकर भीख माँगना स्वयं सबसे बड़ा दुरूख हैय यह हमें दुरूखों से क्योंकर मुक्त कर सकता हैघ्

सूरदास—साहबए वैरागी होने के लिए भभूत लगाने और भीख माँगने की जरूरत नहीं। हमारे महात्माओं ने तो भभूत लगाने ओर जटा बढ़़ाने को पाखंड बताया है। वैराग तो मन से होता है। संसार में रहेए पर संसार का होकर न रहे। इसी को वैराग कहते हैं।

मिसेज सेवक—हिंदुओं ने ये बातें यूनान के जवपबे से सीखी हैंय किंतु यह नहीं समझते कि इनका व्यवहार में लाना कितना कठिन है। यह हो ही नहीं सकता कि आदमी पर दुरूख—सुख का असर न पड़े। इसी अंधे को अगर इस वक्त पैसे न मिलेंए तो दिल में हजारों गालियाँ देगा।

जॉन सेवक—हाँए इसे कुछ मत दोए देखोए क्या कहता है। अगर जरा भी भुन—भुनायाए तो हंटर से बातें करूँगा। सारा वैराग भूल जाएगा। माँगता है भीख धोले—धोले के लिए मीलों कुत्तों की तरह दौड़ता हैए उस पर दावा यह है कि वैरागी हूँ। (कोचवान से) गाड़ी फेरोए क्लब होते हुए बँगले चलो।

सोफिया—मामाए कुछ तो जरूर दे दोए बेचारा आशा लगाकर इतनी दूर दौड़ा आया था।

प्रभु सेवक—ओहोए मुझे तो पैसे भुनाने की याद ही न रही।

जॉन सेवक—हरगिज नहींए कुछ मत दोए मैं इसे वैराग का सबक देना चाहता हूँ।

गाड़ी चली। सूरदास निराशा की मूर्ति बना हुआ अंधी अॉंखों से गाड़ी की तरफ ताकता रहाए मानो उसे अब भी विश्वास न होता था कि कोई इतना निर्दयी हो सकता है। वह उपचेतना की दशा में कई कदम गाड़ी के पीछे—पीछे चला। सहसा सोफिया ने कहा—सूरदासए खेद हैए मेरे पास इस समय पैसे नहीं हैं। फिर कभी आऊँगीए तो तुम्हें इतना निराश न होना पड़ेगा।

अंधे सूक्ष्मदर्शी होते हैं। सूरदास स्थिति को भलीभाँति समझ गया। हृदय को क्लेश तो हुआए पर बेपरवाही से बोला—मिस साहबए इसकी क्या चिंताघ् भगवान्‌ तुम्हारा कल्याण करें। तुम्हारी दया चाहिएए मेरे लिए यही बहुत है।

सोफिया ने माँ से कहा—मामाए देखा आपनेए इसका मन जरा भी मैला नहीं हुआ।

प्रभु सेवक—हाँए दुरूखी तो नहीं मालूम होता।

जॉन सेवक—उसके दिल से पूछो।

मिसेज सेवक—गालियाँ दे रहा होगा।

गाड़ी अभी धीरे—धीरे चल रही थी। इतने में ताहिर अली ने पुकारा—हुजूरए यह जमीन पंडा की नहींए सूरदास की है। यह कह रहे हैं।

साहब ने गाड़ी रुकवा दीए लज्जित नेत्रों से मिसेज सेवक को देखाए गाड़ी से उतरकर सूरदास के पास आएए और नम्र भाव से बोले—क्यों सूरदासए यह जमीन तुम्हारी हैघ्

सूरदास—हाँ हुजूरए मेरी ही है। बाप—दादों की इतनी ही तो निशानी बच रही है।

जॉन सेवक—तब तो मेरा काम बन गया। मैं चिंता में था कि न—जाने कौन इसका मालिक है। उससे सौदा पटेगा भी या नहीं। जब तुम्हारी हैए तो फिर कोई चिंता नहीं। तुम—जैसे त्यागी और सज्जन आदमी से ज्यादा झंझट न करना पड़ेगा। जब तुम्हारे पास इतनी जमीन हैए तो तुमने यह भेष क्यों बना रखा हैघ्

सूरदास—क्या करूँ हुजूरए भगवान्‌ की जो इच्छा हैए वह कर रहा हूँ।

जॉन सेवक—तो अब तुम्हारी विपत्ति कट जाएगी। बसए यह जमीन मुझे दे दो। उपकार का उपकारए और लाभ का लाभ। मैं तुम्हें मुँह—माँगा दाम दूँगा।

सूरदास—सरकारए पुरुखों की यही निशानी हैए बेचकर उन्हें कौन मुँह दिखाऊँगाघ्

जॉन सेवक—यहीं सड़क पर एक कुअॉं बनवा दूँगा। तुम्हारे पुरुखों का नाम चलता रहेगा।

सूरदास—साहबए इस जमीन से मुहल्लेवालों का बड़ा उपकार होता है। कहीं एक अंगुल—भर चरी नहीं है। आस—पास के सब ढ़ोर यहीं चरने आते हैं। बेच दूँगाए तो ढ़ोरों के लिए कोई ठिकाना न रह जाएगा।

जॉन सेवक—कितने रुपये साल चराई के पाते होघ्

सूरदास—कुछ नहींए मुझे भगवान्‌ खाने—भर को यों ही दे देते हैंए तो किसी से चराई क्यों लूँघ् किसी का और कुछ उपकार नहीं कर सकताए तो इतना ही सही।

जॉन सेवक—(आश्चर्य से) तुमने इतनी जमीन यों ही चराई के लिए छोड़ रखी हैघ् सोफिया सत्य कहती थी कि तुम त्याग की मूर्ति हो। मैंने बड़ों—बड़ों में इतना त्याग नहीं देखा। तुम धान्य हो! लेकिन जब पशुओं पर इतनी दया करते होए तो मनुष्यों को कैसे निराश करोगेघ् मैं यह जमीन लिए बिना तुम्हारा गला न छोडूगा

सूरदास—सरकारए यह जमीन मेरी है जरूरए लेकिन जब तक मुहल्लेवालों से पूछ न लूँए कुछ कह नहीं सकता। आप इसे लेकर क्या करेंगेघ्

जॉन सेवक—यहाँ एक कारखाना खोलूँगाए जिससे देश और जाति की उन्नति होगीए गरीबों का उपकार होगाए हजारों आदमियों की रोटीयाँ चलेंगी। इसका यश भी तुम्हीं को होगा।

सूरदास—हुजूरए मुहल्लेवालों से पूछे बिना मैं कुछ नहीं कह सकता।

जॉन सेवक—अच्छी बात हैए पूछ लो। मैं फिर तुमसे मिलूँगा। इतना समझ रखो कि मेरे साथ सौदा करने में तुम्हें घाटा न होगा। तुम जिस तरह खुश होगेए उसी तरह खुश करूँगा। यह लो (जेब से पाँच रुपये निकालकर)ए मैंने तुम्हें मामूली भिखारी समझ लिया थाए उस अपमान को क्षमा करो।

सूरदास—हुजूरए मैं रुपये लेकर क्या करूँगाघ् धर्म के नाते दो—चार पैसे दे दीजिएए तो आपका कल्याण मनाऊँगा। और किसी नाते से मैं रुपये न लूँगा।

जॉन सेवक—तुम्हें दो—चार पैसे क्या दूँघ् इसे ले लोए धार्मार्थ ही समझो।

सूरदास—नहीं साहबए धर्म में आपका स्वार्थ मिल गया हैए अब यह धर्म नहीं रहा।

जॉन सेवक ने बहुत आग्रह कियाए किंतु सूरदास ने रुपये नहीं लिए। तब वह हारकर गाड़ी पर जा बैठे।

मिसेज सेवक ने पूछा—क्या बातें हुईंघ्

जॉन सेवक—है तो भिखारीए पर बड़ा घमंडी है। पाँच रुपये देता थाए न लिए।

मिसेज सेवक—है कुछ आशाघ्

जॉन सेवक—जितना आसान समझता थाए उतना आसान नहीं है। गाड़ी तेज हो गई।

'''

अध्याय 2

सूरदास लाठी टेकता हुआ धीरे—धीरे घर चला। रास्ते में चलते—चलते सोचने लगा—यह है बड़े आदमियों की स्वार्थपरता! पहले कैसे हेकड़ी दिखाते थेए मुझे कुत्तो से भी नीचा समझाय लेकिन ज्यों ही मालूम हुआ कि जमीन मेरी हैए कैसी लल्लो—चप्पो करने लगे। इन्हें मैं अपनी जमीन दिए देता हूँ। पाँच रुपये दिखाते थेए मानो मैंने रुपये देखे ही नहीं। पाँच तो क्याए पाँच सौ भी देंए तो भी जमीन न दूँगा। मुहल्लेवालों को कौन मुँह दिखाऊँगा। इनके कारखाने के लिए बेचारी गउएँ मारी—मारी फिरें! ईसाइयों को तनिक भी दया—धर्म का विचार नहीं होता। बसए सबको ईसाई ही बनाते फिरते हैं। कुछ नहीं देना थाए तो पहले ही दुत्कार देते। मील—भर दौड़ाकर कह दियाए चल हट। इन सबों में मालूम होता हैए उसी लड़की का स्वभाव अच्छा है। उसी में दया—धर्म है। बुढ़़िया तो पूरी करकसा हैए सीधो मुँह बात ही नहीं करती। इतना घमंड! जैसे यही विक्टोरिया हैं। राम—रामए थक गया। अभी तक दम फूल रहा है। ऐसा आज तक कभी न हुआ था कि इतना दौड़ाकर किसी ने कोरा जवाब दे दिया हो। भगवान्‌ की यही इच्छा होगी। मनए इतने दुरूखी न हो। माँगना तुम्हारा काम हैए देना दूसरों का काम है। अपना धान हैए कोई नहीं देताए तो तुम्हें बुरा क्यों लगता हैघ् लोगों से कह दूँ कि साहब जमीन माँगते थेघ् नहीं सब घबरा जाएँगे। मैंने जवाब तो दे दियाए अब दूसरों से कहने का परोजन ही क्याघ्

यह सोचता हुआ वह अपने द्वार पर आया। बहुत ही सामान्य झोंपड़ी थी। द्वार पर एक नीम का वृक्ष था। किवाड़ों की जगह बाँस की टहनियों की एक टट्टी लगी हुई थी। टट्टी हटाई। कमर से पैसों की छोटी—सी पोटली निकालीए जो आज दिन—भर की कमाई थी। तब झोपड़ी की छान टटोलकर एक थैली निकालीए जो उसके जीवन का सर्वस्व थी। उसमें पैसों की पोटली बहुत धीरे से रखी कि किसी के कानों में भनक भी न पड़े। फिर थैली को छान में छिपाकर वह पड़ोस के एक घर से आग माँग लाया। पेड़ों के नीचे कुछ सूखी टहनियाँ जमाकर रखी थींए उनसे चूल्हा जलाया। झोंपड़ी में हलका—सा अस्थिर प्रकाश हुआ। कैसी विडम्बना थीघ् कितना नैराश्य—पूर्ण दारिद्रय था! न खाटए न बिस्तरय न बरतनए न भाँड़े। एक कोने में एक मिट्टी का घड़ा थाए जिसकी आयु का कुछ अनुमान उस पर जमी हुई काई से हो सकता था। चूल्हे के पास हाँडी थी। एक पुरानाए चलनी की भाँति छिद्रों से भरा हुआ तवाए एक छोटी—सी कठौती और एक लोटा। बसए यही उस घर की सारी संपत्ति थी। मानव—लालसाओं का कितना संक्षिप्त स्वरूप! सूरदास ने आज जितना नाज पाया थाए वह ज्यों—का—त्यों हाँडी में डाल दिया। कुछ जौ थेए कुछ गेहूँए कुछ मटरए कुछ चनेए थोड़ी—सी जुआर और मुट्ठीभर चावल। ऊपर से थोड़ा—सा नमक डाल दिया। किसकी रसना ने ऐसी खिचड़ी का मजा चखा हैघ् उसमें संतोष की मिठास थीए जिससे मीठी संसार में कोई वस्तु नहीं। हाँडी को चूल्हे पर चढ़़ाकर वह घर से निकलाए द्वार पर टट्टी लगाई और सड़क पर जाकर एक बनिए की दूकान से थोड़ा—सा आटा और एक पैसे का गुड़ लाया। आटे को कठौती में गूँधा और तब आधा घंटे तक चूल्हे के सामने खिचड़ी का मधुर आलाप सुनता रहा। उस धुंधले प्रकाश में उसका दुर्बल शरीर और उसका जीर्ण वस्त्र मनुष्य के जीवन—प्रेम का उपहास कर रहा था।

हाँडी में कई बार उबाल आएए कई बार आग बुझी। बार—बार चूल्हा फँकते—फूँकते सूरदास की आंखों से पानी बहने लगता था। अॉंखें चाहे देख न सकेंए पर रो सकती हैं। यहाँ तक कि वह श्षड़रस युक्त अवलेह तैयार हुआ। उसने उसे उतारकर नीचे रखा। तब तवा चढ़़ाया और हाथों से रोटीयाँ बनाकर सेंकने लगा। कितना ठीक अंदाज था। रोटीयाँ सब समान थीं—न छोटीए न बड़ीय न सेवड़ीए न जली हुई। तवे से उतार—उतारकर रोटीयों को चूल्हे में खिलाता थाए और जमीन पर रखता जाता था। जब रोटीयाँ बन गईं तो उसने द्वार पर खड़े होकर जोर से पुकारा—श्मिट्ठूए आओ बेटाए खाना तैयार है।श् किंतु जब मिट्ठू न आयाए तो उसने फिर द्वार पर टट्टी लगाईए और नायकराम के बरामदे में जाकर श्मिट्ठू—मिट्ठूश् पुकारने लगा। मिट्ठू वहीं पड़ा सो रहा थाए आवाज सुनकर चौंका। बारह—तेरह वर्ष का सुंदर हँसमुख बालक था। भरा हुआ शरीरए सुडौल हाथ—पाँव। यह सूरदास के भाई का लड़का था। माँ—बाप दोनों प्लेग में मर चुके थे। तीन साल से उसके पालन—पोषण का भार सूरदास ही पर था। वह इस बालक को प्राणों से भी प्यारा समझता था। आप चाहे फाके करेए पर मिट्ठू को तीन बार अवश्य खिलाता था। आप मटर चबाकर रह जाता थाए पर उसे शकर और रोटीए कभी घी और नमक के साथ रोटीयाँ खिलाता था। अगर कोई भिक्षा में मिठाई या गुड़ दे देताए तो उसे बड़े यत्न से अंगोछे के कोने में बाँध लेता और मिट्ठू को ही देता था। सबसे कहताए यह कमाई बुढ़़ापे के लिए कर रहा हूँ। अभी तो हाथ—पैर चलते हैंए माँग—खाता हूँय जब उठ—बैठ न सकूँगाए तो लोटा—भर पानी कौन देगाघ् मिट्ठू को सोते पाकर गोद में उठा लियाए और झोंपड़ी के द्वार पर उतारा। तब द्वार खोलाए लड़के का मुँह धुलवायाए और उसके सामने गुड़ और रोटीयाँ रख दीं। मिट्ठू ने रोटीयाँ देखींए तो ठुनककर बोला—मैं रोटी और गुड़ न खाऊँगा। यह कहकर उठ खड़ा हुआ।

सूरदास—बेटाए बहुत अच्छा गुड़ हैए खाओ तो। देखोए कैसी नरम—नरम रोटीयाँ हैं। गेहूँ की हैं।

मिट्ठू—मैं न खाऊँगा।

सूरदास—तो क्या खाओगे बेटाघ् इतनी रात गए और क्या मिलेगाघ्

मिट्ठू—मैं तो दूध—रोटी खाऊँगा।

सूरदास—बेटाए इस जून खा लो। सबेरे मैं दूध ला दूँगा।

मिट्ठू रोने लगा। सूरदास उसे बहलाकर हार गयाए तो अपने भाग्य को रोता हुआ उठाए लकड़ी सँभाली और टटोलता हुआ बजरंगी अहीर के घर आयाए जो उसके झोंपड़े के पास ही था। बजरंगी खाट पर बैठा नारियल पी रहा था। उसकी स्त्री जमुनी खाना पकाती थी। अॉंगन में तीन भैंसें और चार—पाँच गायें चरनी पर बँधी हुई चारा खा रही थीं। बजरंगी ने कहा—कैसे चले सूरेघ् आज बग्घी पर कौन लोग बैठे तुमसे बातें कर रहे थेघ्

सूरदास—वही गोदाम के साहब थे।

बजरंगी—तुम तो बहुत दूर तक गाड़ी के पीछे दौड़ेए कुछ हाथ लगाघ्

सूरदास—पत्थर हाथ लगा। ईसाइयों में भी कहीं दया—धर्म होता है। मेरी वही जमीन लेने को कहते थे।

बजरंगी—गोदाम के पीछेवाली नघ्

सूरदास—हाँ वहींए बहुत लालच देते रहेए पर मैंने हामी नहीं भरी।

सूरदास ने सोचा थाए अभी किसी से यह बात न कहूँगाए पर इस समय दूध लेने के लिए खुशामद जरूरी थी। अपना त्याग दिखाकर सुर्खरू बनना चाहता था।

बजरंगी—तुम हामी भरतेए तो यहाँ कौन उसे छोड़े देता था। तीन—चार गाँवों के बीच में वही तो जमीन है। वह निकल जाएगीए तो हमारी गायें और भैंसें कहाँ जाएँगीघ्

जमुनी—मैं तो इन्हीं के द्वार पर सबको बाँध आती।

सूरदास—मेरी जान निकल जाएए तब तो बेचूँ ही नहींए हजार—पाँच सौ की क्या गिनती। भौजीए एक घूँट दूध हो तो दे दो। मिठुआ खाने बैठा है। रोटी और गुड़ छूता ही नहींए बसए दूध—दूध की रट लगाए हुए है। जो चीज घर में नहीं होतीए उसी के लिए जिद करता है। दूध न पाएगा तो बिना खाए ही सो रहेगा।

बजरंगी—ले जाओए दूध का कौन अकाल है। अभी दुहा है। घीसू की माँए एक कुल्हिया दूध दे दे सूरे को।

जमुनी—जरा बैठ जाओ सूरेए हाथ खाली होए तो दूँ।

बजरंगी—वहाँ मिठुआ खाने बैठा हैए तैं कहती हैए हाथ खाली हो तो दूँ। तुझसे न उठा जाएए तो मैं आऊँ।

जमुनी जानती थी कि यह बुध्दू दास उठेंगेए तो पाव के बदले आधा सेर दे डालेंगे। चटपट रसोई से निकल आई। एक कुल्हिया में आधा पानी लियाए ऊपर से दूध डालकर सूरदास के पास आई और विषाक्त हितैषिता से बोली—यह लोए लौंडे की जीभ तुमने ऐसी बिगाड़ दी है कि बिना दूध के कौर नहीं उठाता। बाप जीता थाए तो भर—पेट चने भी न मिलते थेए अब दूध के बिना खाने ही नहीं उठता।

सूरदास—क्या करूँ भाभीए रोने लगता हैए तो तरस आता है।

जमुनी—अभी इस तरह पाल—पोस रहे हो कि एक दिन काम आएगाए मगर देख लेनाए जो चुल्लू—भर पानी को भी पूछे। मेरी बात गाँठ बाँध लो। पराया लड़का कभी अपना नहीं होता। हाथ—पाँव हुएए और तुम्हें दुत्कारकर अलग हो जाएगा। तुम अपने लिए साँप पाल रहे हो।

सूरदास—जो कुछ मेरा धरम हैए किए देता हूँ। आदमी होगाए तो कहाँ तक जस न मानेगा। हाँए अपनी तकदीर ही खोटी हुईए तो कोई क्या करेगा। अपने ही लड़के क्या बड़े होकर मुँह नहीं फेर लेतेघ्

जमुनी—क्यों नहीं कह देतेए मेरी भैंसें चरा लाया करे। जवान तो हुआए क्या जन्मभर नन्हा ही बना रहेगाघ् घीसू ही का जोड़ी—पारी तो है। मेरी बात गाँठ बाँध लो। अभी से किसी काम में न लगायाए तो खिलाड़ी हो जाएगा। फिर किसी काम में उसका जी न लगेगा। सारी उमर तुम्हारे ही सिर फुलौरियाँ खाता रहेगा।

सूरदास ने इसका कुछ जवाब न दिया। दूध की कुल्हिया लीए और लाठी से टटोलता हुआ घर चला। मिट्ठू जमीन पर सो रहा था। उसे फिर उठायाए और दूध में रोटीयाँ भिगोकर उसे अपने हाथ से खिलाने लगा। मिट्ठू नींद से गिरा पड़ता थाए पर कौर सामने आते ही उसका मुँह आप—ही—आप खुल जाता। जब वह सारी रोटीयाँ खा चुका हैए तो सूरदास ने उसे चटाई पर लिटा दियाए और हाँडी से अपनी पँचमेल खिचड़ी निकालकर खाई। पेट न भराए तो हाँड़ी धोकर पी गया। तब फिर मिट्ठू को गोद में उठाकर बाहर आयाए द्वार पर टट्टी लगाई और मंदिर की ओर चला।

यह मंदिर ठाकुरजी का थाए बस्ती के दूसरे सिरे पर। ऊँची कुरसी थी। मंदिर के चारों तरफ तीन—चार गज का चौड़ा चबूतरा था। यही मुहल्ले की चौपाल थी। सारे दिन दस—पाँच आदमी यहाँ लेटे या बैठे रहते थे। एक पक्का कुअॉं भी थाए जिस पर जगधार नाम का एक खोमचेवाला बैठा करता था। तेल की मिठाइयाँए मूँगफलीए रामदाने के लड्डू आदि रखता था। राहगीर आतेए उससे मिठाइयाँ लेतेए पानी निकालकर पीते और अपनी राह चले जाते। मंदिर के पुजारी का नाम दयागिरि थाए जो इसी मंदिर के समीप एक कुटीया में रहते थे। सगुण ईश्वर के उपासक थेए भजन—कीर्तन को मुक्ति का मार्ग समझते थे और निर्वाण को ढ़ोंग कहते थे। शहर के पुराने रईस कुँअर भरतसिंह के यहाँ मासिक वृत्ति बँधी हुई थी। इसी से ठाकुरजी का भोग लगता था। बस्ती से भी कुछ—न—कुछ मिल ही जाता था। निरूस्पृह आदमी थाए लोभ छू भी नहीं गया थाए संतोष और धीरज का पुतला था। सारे दिन भगवत्—भजन में मग्न रहता था। मंदिर में एक छोटी—सी संगत थी। आठ—नौ बजे रात कोए दिन भर के काम—धांधो से निवृत्ता होकरए कुछ भक्तजन जमा हो जाते थेए और घंटे—दो घंटे भजन गाकर चले जाते थे। ठाकुरदीन ढ़ोलक बजाने में निपुण थाए बजरंगी करताल बजाता थाए जगधार को तँबूरे में कमाल थाए नायकराम और दयागिरि सारंगी बजाते थे। मँजीरेवालों की संख्या घटती—बढ़़ती रहती थी। जो और कुछ न कर सकताए वह मँजीरा ही बजाता था। सूरदास इस संगत का प्राण था। वह ढ़ोलए मँजीरेए करतालए सारंगीए तँबूरा सभी में समान रूप से अभ्यस्त थाए और गाने में तो आस—पास के कई मुहल्लों में उसका जवाब न था। ठुमरी—गजल से उसे रुचि न थी। कबीरए मीराए दादूए कमालए पलटू आदि संतों के भजन गाता था। उस समय उसका नेत्राहीन मुख अति आनंद से प्रफुल्लित हो जाता था। गाते—गाते मस्त हो जाताए तन—बदन की सुधि न रहती। सारी चिंताएँए सारे क्लेश भक्ति —सागर में विलीन हो जाते थे।

सूरदास मिट्ठू को लिए पहुँचाए तो संगत बैठ चुकी थी। सभासद आ गए थेए केवल सभापति की कमी थी। उसे देखते ही नायकराम ने कहा—तुमने बड़ी देर कर दीए आधा घंटे से तुम्हारी राह देख रहे हैं। यह लौंडा बेतरह तुम्हारे गले पड़ा है। क्यों नहीं इसे हमारे ही घर से कुछ माँगकर खिला दिया करते।

दयागिरि—यहाँ चला आया करेए तो ठाकुरजी के प्रसाद ही से पेट भर जाए।

सूरदास—तुम्हीं लोगों का दिया खाता है या और किसी काघ् मैं तो बनाने—भर को हूँ।

जगधार—लड़कों को इतना सिर चढ़़ाना अच्छा नहीं। गोद में लादे फिरते होए जैसे नन्हा—सा बालक हो। मेरा विद्याधार इससे दो साल छोटा है। मैं उसे कभी गोद में लेकर नहीं फिरता।

सूरदास—बिना माँ—बाप के लड़के हठी हो जाते हैं। हाँए क्या होगाघ्

दयागिरि—पहले रामायण की एक चौपाई हो जाए।

लोगों ने अपने—अपने साज सँभाले। सुर मिला और आधा घंटे तक रामायण हुई।

नायकराम—वाह सूरदास वाह! अब तुम्हारे ही दम का जलूसा है।

बजरंगी—मेरी तो कोई दोनों अॉंखें ले लेए और यह हुनर मुझे दे देए तो मैं खुशी से बदल लूँ।

जगधार—अभी भैरों नहीं आयाए उसके बिना रंग नहीं जमता।

बजरंगी—ताड़ी बेचता होगा। पैसे का लोभ बुरा होता है। घर में एक मेहरिया है और एक बुढ़़िया माँ। मुआ रात—दिन हाय—हाय पड़ी रहती है। काम करने को तो दिन है हीए भला रात को तो भगवान्‌ का भजन हो जाए।

जगधार—सूरे का दम उखड़ जाता हैए उसका दम नहीं उखड़ता।

बजरंगी—तुम अपना खोंचा बेचोए तुम्हें क्या मालूमए दम किसे कहते हैं। सूरदास जितना दम बाँधते हैंए उतना दूसरा बाँधोए तो कलेजा फट जाए। हँसी—खेल नहीं है।

जगधार—अच्छा भैयाए सूरदास के बराबर दुनिया में कोई दम नहीं बाँध सकता। अब खुश हुए।

सूरदास—भैयाए इसमें झगड़ा काहे काघ् मैं कब कहता हूँ कि मुझे गाना आता है। तुम लोगों का हुक्म पाकरए जैसा भला—बुरा बनता हैए सुना देता हूँ।

इतने में भैरों भी आकर बैठ गया। बजरंगी ने व्यंग करके कहा—क्या अब कोई ताड़ी पीनेवाला नहीं थाघ् इतनी जल्दी क्यों दूकान बढ़़ा दीघ्

ठाकुरदीन—मालूम नहींए हाथ—पैर भी धोए हैं या वहाँ से सीधो ठाकुरजी के मंदिर में चले आए। अब सफाई तो कहीं रह ही नहीं गई।

भैरों—क्या मेरी देह में ताड़ी पुती हुई हैघ्

ठाकुरदीन—भगवान्‌ के दरबार में इस तरह न आना चाहिए। जात चाहे ऊँची हो या नीचीय पर सफाई चाहिए जरूर।

भैरों—तुम यहाँ नित्य नहाकर आते होघ्

ठाकुरदीन—पान बेचना कोई नीच काम नहीं है।

भैरों—जैसे पानए वैसे ताड़ी। पान बेचना कोई ऊँचा काम नहीं है।

ठाकुरदीन—पान भगवान्‌ के भोग के साथ रखा जाता है। बड़े—बड़े जनेऊधारीए मेरे हाथ का पान खाते हैं। तुम्हारे हाथ का तो कोई पानी नहीं पीता।

नायकराम—ठाकुरदीनए यह बात तो तुमने बड़ी खरी कही। सच तो हैए पासी से कोई घड़ा तक नहीं छुआता।

भैरों—हमारी दूकान पर एक दिन आकर बैठ जाओए तो दिखा दूँए कैसे—कैसे धार्मात्मा और तिलकधारी आते हैं। जोगी—जती लोगों को भी किसी ने पान खाते देखा हैघ् ताड़ीए गाँजाए चरस पीते चाहे जब देख लो। एक—से—एक महात्मा आकर खुशामद करते हैं।

नायकराम—ठाकुरदीनए अब इसका जवाब दो। भैरों पढ़़ा—लिखा होताए तो वकीलों के कान काटता।

भैरों—मैं तो बात सच्ची कहता हूँए जैसे ताड़ी वैसे पानए बल्कि परात की ताड़ी को तो लोग दवा की तरह पीते हैं।

जगधार—यारोए दो—एक भजन होने दो। मान क्यों नहीं जाते ठाकुरदीनघ् तुम्हें हारेए भैरों जीताए चलो छुट्टी हुई।

नायकराम—वाहए हार क्यों मान लें। सासतरार्थ है कि दिल्लगी। हाँए ठाकुरदीन कोई जवाब सोच निकालो।

ठाकुरदीन—मेरी दूकान पर खड़े हो जाओए जी खुश हो जाता है। केवड़े और गुलाब की सुगंधा उड़ती है। इसकी दूकान पर कोई खड़ा हो जाएए तो बदबू के मारे नाक फटने लगती है। खड़ा नहीं रहा जाता। परनाले में भी इतनी दुगर्ंधा नहीं होती।

बजरंगी—मुझे जो घंटे—भर के लिए राज मिल जाताए तो सबसे पहले शहर—भर की ताड़ी की दूकानों में आग लगवा देता।

नायकराम—अब बताओ भैरोंए इसका जवाब दो। दुगर्ंधा तो सचमुच उड़ती हैए है कोई जवाबघ्

भैरों—जवाब एक नहींए सैकड़ों हैं। पान सड़ जाता हैए तो कोई मिट्टी के मोल भी नहीं पूछता। यहाँ ताड़ी जितनी ही सड़ती हैए उतना ही उसका मोल बढ़़ता है। सिरका बन जाता हैए तो रुपये बोतल बिकता हैए और बड़े—बड़े जनेऊधारी लोग खाते हैं।

नायकराम—क्या बात कही है कि जी खुश हो गया। मेरा अख्तियार होताए तो इसी घड़ी तुमको वकालत की सनद दे देता। ठाकुरदीनए अब हार मान जाओए भैरों से पेश न पा सकोगे।

जगधार—भैरोंए तुम चुप क्यों नहीं हो जातेघ् पंडाजी को तो जानते होए दूसरों को लड़ाकर तमाशा देखना इनका काम है। इतना कह देने में कौन—सी मरजादा घटी जाती है कि बाबाए तुम जीते और मैं हारा।

भैरों—क्यों इतना कह दूँघ् बात करने में किसी से कम हूँ क्याघ्

जगधार—तो ठाकुरदीनए तुम्हीं चुप हो जाओ।

ठाकुरदीन—हाँ जीए चुप न हो जाऊँगाए तो क्या करूँगा। यहाँ आए थे कि कुछ भजन—कीर्तन होगाए सो व्यर्थ का झगड़ा करने लगे। पंडाजी को क्याए इन्हें तो बेहाथ—पैर हिलाए अमिर्तियाँ और लड्डू खाने को मिलते हैंए इन्हें इसी तरह की दिल्लगी सूझती है। यहाँ तो पहर रात से उठकर फिर चक्की में जुतना है।

जगधार—मेरी तो अबकी भगवान्‌ से भेंट होगीए तो कहूँगाए किसी पंडे के घर जन्म देना।

नायकराम—भैयाए मुझ पर हाथ न उठाओए दुबला—पतला आदमी हूँ। मैं तो चाहता हूँए जलपान के लिए तुम्हारे ही खोंचे से मिठाइयाँ लिया करूँए मगर उस पर इतनी मक्खियाँ उड़ती हैंए ऊपर इतना मैल जमा रहता है कि खाने को जी नहीं चाहता।

जगधार—(चिढ़़कर) तुम्हारे न लेने से मेरी मिठाइयाँ सड़ तो नहीं जातीं कि भूखों मरता हूँघ् दिन—भर में रुपया—बीस आने पैसे बना ही लेता हूँ। जिसे सेंत—मेत में रसगुल्ले मिल जाएँए वह मेरी मिठाइयाँ क्यों लेगाघ्

ठाकुरदीन—पंडाजी की आमदनी का कोई ठिकाना नहीं हैए जितना रोज मिल जाएए थोड़ा ही हैय ऊपर से भोजन घाते में। कोई अॉंख का अंधाए गाँठ का पूरा फँस गयाए तो हाथी—घोड़े जगह—जमीनए सब दे दिया। ऐसा भागवान और कौन होगाघ्

दयागिरि—कहीं नहीं ठाकुरदीनए अपनी मेहनत की कमाई सबसे अच्छी। पंडों को यात्रियों के पीछे दौड़ते नहीं देखा है।

नायकराम—बाबाए अगर कोई कमाई पसीने की हैए तो वह हमारी कमाई है। हमारी कमाई का हाल बजरंगी से पूछो।

बजरंगी—औरों की कमाई पसीने की होती होगीए तुम्हारी कमाई तो खून की है। और लोग पसीना बहाते हैंए तुम खून बहाते हो। एक—एक जजमान के पीछे लोहू की नदी बह जाती है। जो लोग खोंचा सामने रखकर दिन—भर मक्खी मारा करते हैंए वे क्या जानेंए तुम्हारी कमाई कैसी होती हैघ् एक दिन मोरचा थामना पड़ेए तो भागने को जगह न मिले।

जगधार—चलो भीए आए हो मुँहदेखी कहनेए सेर—भर दूध ढ़ाई सेर बनाते होए उस पर भगवान्‌ के भगत हो।

बजरंगी—अगर कोई माई का लाल मेरे दूध में एक बूँद पानी निकाल देए तो उसकी टाँग की राह निकल जाऊँ। यहाँ दूध में पानी मिलाना गऊ—हत्या समझते हैं। तुम्हारी तरह नहीं कि तेल की मिठाई को घी की कहकर बेचेंए और भोले—भाले बच्चों को ठगें।

जगधार—अच्छा भाईए तुम जीतेए मैं हारा। तुम सच्चेए तुम्हारा दूध सच्चा। बसए हम खराबए हमारी मिठाइयाँ खराब। चलो छुट्टी हुई।

बजरंगी—मेरे मिजाज को तुम नहीं जानतेए चेता देता हूँ। सच कहकर कोई सौ जूते मार लेए लेकिन झूठी बात सुनकर मेरे बदन में आग लग जाती है।

भैरों—बजरंगीए बहुत बढ़़कर बातें न करोए अपने मुँह मियाँ—मिट्ठू बनने से कुछ नहीं होता है। बसए मुँह न खुलवाओए मैंने भी तुम्हारे यहाँ का दूध पिया है। उससे तो मेरी ताड़ी ही अच्छी है।

ठाकुरदीन—भाईए मुँह से जो चाहे ईमानदार बन लेय पर अब दूध सपना हो गया। सारा दूध जल जाता हैए मलाई का नाम नहीं। दूध जब मिलता थाए तब मिलता थाए एक अॉंच में अंगुल—भर मोटी मलाई पड़ जाती थी।

दयागिरि—बच्चाए अभी अच्छा—बुरा कुछ मिल तो जाता है। वे दिन आ रहे हैं कि दूध अॉंखों में अॉंजने को भी न मिलेगा।

भैरों—हाल तो यह है कि घरवाली सेर के तीन सेर बनाती हैए उस पर दावा यह कि हम सच्चा माल बेचते हैं। सच्चा माल बेचोए तो दिवाला निकल जाए। यह ठाट एक दिन न चले।

बजरंगी—पसीने की कमाई खानेवालों का दिवाला नहीं निकलताय दिवाला उनका निकलता हैए जो दूसरों की कमाई खा—खाकर मोटे पड़ते हैं। भाग को सराहो कि शहर में होय किसी गाँव में होतेए तो मुँह में मक्खियाँ आतीं—जातीं। मैं तो उन सबोंकों को पापी समझता हूँए जो औने—पौने करकेए इधार का सौदा उधार बेचकर अपना पेट पालते हैं। सच्ची कमाई उन्हीं की हैए जो छाती फाड़कर धरती से धान निकालते हैं।

बजरंगी ने बात तो कहीए लेकिन लज्जित हुआ। इस लपेट में वहाँ के सभी आदमी आ जाते थे। वह भैरोंए जगधार और ठाकुरदीन को लक्ष्य करना चाहता थाए पर सूरदासए नायकरामए दयागिरिए सभी पापियों की श्रेणी में आ गए।

नायकराम—तब तो भैयाए तुम हमें भी ले बीते। एक पापी तो मैं ही हूँ कि सारे दिन मटरगस्ती करता हूँए और वह भोजन करता हूँ कि बड़ों—बड़ों को मयस्सर न हो।

ठाकुरदीन—दूसरा पापी मैं हूँ कि शौक की चीज बेचकर रोटीयाँ कमाता हूँ। संसार में तमाोली न रहेंए तो किसका नुकसान होगाघ्

जगधार—तीसरा पापी मैं हूँ कि दिन—भर औन—पौन करता रहता हूँ। सेव और खुम खाने को न मिलेंए तो कोई मर न जाएगा।

भैरों—तुमसे बड़ा पापी मैं हूँ कि सबको नसा खिलाकर अपना पेट पालता हूँ। सच पूछोए तो इससे बुरा कोई काम नहीं। आठों पहर नशेबाजों का साथए उन्हीं की बातें सुननाए उन्हीं के बीच रहना। यह भी कोई जिंदगी है!

दयागिरि—क्यों बजरंगीए साधु—संत तो सबसे बड़े पापी होंगे कि वे कुछ नहीं करतेघ्

बजरंगी—नहीं बाबाए भगवान्‌ के भजन से बढ़़कर और कौन उद्यम होगाघ् राम—नाम की खेती सब कामों से बढ़़कर है।

नायकराम—तो यहाँ अकेले बजरंगी पुन्यात्मा हैए और सब—के—सब पापी हैंघ्

बजरंगी—सच पूछोए तो सबसे बड़ा पापी मैं हूँ कि गउओं का पेट काटकरए उनके बछड़ों को भूखा मारकर अपना पेट पालता हूँ।

सूरदास—भाईए खेती सबसे उत्ताम हैए बान उससे मध्दिम हैय बसए इतना ही फरक है। बान को पाप क्यों कहते हैंए और क्यों पापी बनते होघ् हाँ सेवा निरघिन हैए और चाहो तो उसे पाप कहो। अब तक तो तुम्हारे ऊपर भगवान्‌ की दया हैए अपना—अपना काम करते होय मगर ऐसे बुरे दिन आ रहे हैंए जब तुम्हें सेवा और टहल करके पेट पालना पड़ेगाए जब तुम अपने नौकर नहींए पराए के नौकर हो जाओगेए तब तुममें नीतिधरम का निशान भी न रहेगा।

सूरदास ने ये बातें बड़े गंभीर भाव से कहींए जैसे कोई ऋषि भविष्यवाणी कर रहा हो। सब सन्नाटे में आ गए। ठाकुरदीन ने चिंतित होकर पूछा—क्यों सूरेए कोई विपत आने वाली है क्याघ् मुझे तो तुम्हारी बातें सुनकर डर लग रहा है। कोई नई मुसीबत तो नहीं आ रही हैघ्

सूरदास—हाँए लच्छन तो दिखाई देते हैंए चमड़े के गोदामवाला साहब यहाँ एक तमाकू का कारखाना खोलने जा रहा है। मेरी जमीन माँग रहा है। कारखाने का खुलना ही हमारे ऊपर विपत का आना है।

ठाकुरदीन—तो जब जानते ही होए तो क्यों अपनी जमीन देते होघ्

सूरदास—मेरे देने पर थोड़े ही है भाई। मैं दूँए तो भी जमीन निकल जाएगीए न दूँए तो निकल जाएगी। रुपयेवाले सब कुछ कर सकते हैं।

बजरंगी—साहब रुपयेवाले होंगेए अपने घर के होंगे। हमारी जमीन क्या खाकर ले लेंगेघ् माथे गिर जाएँगेए माथे! ठट्ठा नहीं है।

अभी ये ही बातें हो रही थीं कि सैयद ताहिर अली आकर खड़े हो गएए और नायकराम से बोले—पंडाजीए मुझे आपसे कुछ कहना हैए जरा इधार चले आइए।

बजरंगी—उसी जमीन के बारे में कुछ बातचीत करनी है नघ् वह जमीन न बिकेगी।

ताहिर—मैं तुमसे थोड़े ही पूछता हूँ। तुम उस जमीन के मालिक—मुख्तार नहीं हो।

बजरंगी—कह तो दियाए वह जमीन न बिकेगीए मालिक—मुख्तार कोई हो।

ताहिर—आइए पंडाजीए आइएए इन्हें बकने दीजिए।

नायकराम—आपको जो कुछ कहना हो कहिएय ये सब लोग अपने ही हैंए किसी से परदा नहीं है। सुनेंगेए तो सब सुनेंगेए और जो बात तय होगीए सबकी सलाह से होगी। कहिएए क्या कहते हैंघ्

ताहिर—उसी जमीन के बारे में बातचीत करनी थी।

नायकराम—तो उस जमीन का मालिक तो आपके सामने बैठा हुआ है। जो कुछ कहना हैए उसी से क्यों नहीं कहतेघ् मुझे बीच में दलाली नहीं खानी है। जब सूरदास ने साहब के सामने इनकार कर दियाए तो फिर कौन—सी बात बाकी रह गईघ्

बजरंगी—इन्होंने सोचा होगा कि पंडाजी को बीच में डालकर काम निकाल लेंगे। साहब से कह देनाए यहाँ साहबी न चलेगी।

ताहिर—तुम अहीर हो नए तभी इतने गर्म हो रहे हो। अभी साहब को जानते नहीं होए तभी बढ़़—बढ़़कर बातें कर रहे हो। जिस वक्त साहब जमीन लेने पर आ जाएँगेए ले ही लेंगेए तुम्हारे रोके न रुकेंगे। जानते होए शहर के हाकिमों से उनका कितना रब्त—जब्त हैघ् उनकी लड़की की मँगनी हाकिम—जिला से होनेवाली है। उनकी बात को कौन टाल सकता हैघ् सीधो सेए रजामंदी के साथ दे दोगेए तो अच्छे दाम पा जाओगेय शरारत करोगेए तो जमीन भी निकल जाएगीए कौड़ी भी हाथ न लगेगी। रेलों के मालिक क्या जमीन अपने साथ लाए थेघ् हमारी ही जमीन तो ली हैघ् क्या उसी कायदे से यह जमीन नहीं निकल सकतीघ्

बजरंगी—तुम्हें भी कुछ तय—कराई मिलनेवाली होगीए तभी इतनी खैरखाही कर रहे हो।

जगधार—उनसे जो कुछ मिलनेवाला होए वह हमीं से ले लीजिएए और उनसे कह दीजिएए जमीन न मिलेगी। आप लोग झाँसेबाज हैंए ऐसा झाँसा दीजिए कि साहब की अकिल गुम हो जाए।

ताहिर—खैरख्वाही रुपये के लालच से नहीं है। अपने मालिक की अॉंख बचाकर एक कौड़ी भी लेना हराम समझता हूँ। खैरख्वाही इसलिए करता हूँ कि उनका नमक खाता हूँ।

जगधार—अच्छा साहबए भूल हुईए माफ कीजिए। मैंने तो संसार के चलन की बात कही थी।

ताहिर—तो सूरदासए मैं साहब से जाकर क्या कह दूँघ्

सूरदास—बसए यही कह दीजिए कि जमीन न बिकेगी।

ताहिर—मैं फिर कहता हूँए धोखा खाओगे। साहब जमीन लेकर ही छोड़ेंगे।

सूरदास—मेरे जीते—जी तो जमीन न मिलेगी। हाँए मर जाऊँ तो भले ही मिल जाए।

ताहिर अली चले गएए तो भैरों बोला—दुनिया अपना ही फायदा देखती है। अपना कल्याण होए दूसरे जिएँ या मरें। बजरंगीए तुम्हारी तो गायें चरती हैंए इसलिए तुम्हारी भलाई तो इसी में है कि जमीन बनी रहे। मेरी कौन गाय चरती हैघ् कारखाना खुलाए तो मेरी बिक्री चौगुनी हो जाएगी। यह बात तुम्हारे धयान में क्यों नहीं आईघ् तुम सबकी तरफ से वकालत करनेवाले कौन होघ् सूरे की जमीन हैए वह बेचे या रखेए तुम कौन होते होए बीच में कूदनेवालेघ्

नायकराम—हाँ बजरंगीए जब तुमसे कोई वास्ता—सरोकार नहींए तो तुम कौन होते हो बीच में कूदनेवालेघ् बोलोए भैरों को जवाब दो।

बजरंगी—वास्ता—सरोकार कैसे नहींघ् दस गाँवों और मुहल्लों के जानवर यहाँ चरने आते हैं। वे कहाँ जाएँगेघ् साहब के घर कि भैरों केघ् इन्हें तो अपनी दूकान की हाय—हाय पड़ी हुई है। किसी के घर सेंधा क्यों नहीं मारतेघ् जल्दी से धानवान हो जाओगे।

भैरों—सेंधा मारो तुमय यहाँ दूध में पानी नहीं मिलाते।

दयागिरि—भैरोंए तुम सचमुच बड़े झगड़ालू हो। जब तुम्हें प्रियवचन बोलना नहीं आताए तो चुप क्यों नहीं रहतेघ् बहुत बातें करना बुध्दिमानी का लक्षण नहींए मूर्खता का लक्षण है।

भैरों—ठाकुरजी के भोग के बहाने से रोज छाछ पा जाते हो नघ् बजरंगी की जय क्यों न मनाओगे!

नायकराम—पट्ठा बात बेलाग कहता है कि एक बार सुनकर फिर किसी की जबान नहीं खुलती।

ठाकुरदीन—अब भजन—भाव हो चुका। ढ़ोल—मँजीरा उठाकर रख दो।

दयागिरि—तुम कल से यहाँ न आया करोए भैरों।

भैरों—क्यों न आया करेंघ् मंदिर तुम्हारा बनवाया नहीं है। मंदिर भगवान्‌ का है। तुम किसी को भगवान्‌ के दरबार में आने से रोक दोगेघ्

नायकराम—लो बाबाजीए और लोगेए अभी पेट भरा कि नहींघ्

जगधार—बाबाजीए तुम्हीं गम खा जाओए इससे साधु—संतों की महिमा नहीं घटती। भैरोंए साधु—संतों की बात का तुम्हें बुरा न मानना चाहिए।

भैरों—तुम खुशामद करोए क्योंकि खुशामद की रोटीयाँ खाते हो। यहाँ किसी के दबैल नहीं हैं।

बजरंगी—ले अब चुप ही रहना भैरोंए बहुत हो चुका। छोटा मुँहए बड़ी बात।

नायकराम—तो भैरों को धामकाते क्या होघ् क्या कोई भगोड़ा समझ लिया हैघ् तुमने जब दंगल मारे थेए तब मारे थेए अब तुम वही नहीं हो। आजकल भैरों की दुहाई है।

भैरों नायकराम के व्यंग्य—हास्य पर झल्लाया नहींए हँस पड़ा। व्यंग्य में विष नहीं थाए रस था। संखिया मरकर रस हो जाती है।

भैरों का हँसना था कि लोगों ने अपने—अपने साज सँभालेए और भजन होने लगा। सूरदास की सुरीली तान आकाश—मंडल में यों नृत्य करती हुई मालूम होती थीए जैसे प्रकाश—ज्योति जल के अंतस्तल में नृत्य करती है—

श्श्झीनी—झीनी बीनी चदरिया।

काहे कै तानाए काहे कै भरनीए कौन तार से बीनी चदरियाघ्

इँगला—पिंगला ताना—भरनीए सुखमन तार से बीनी चदरिया।

आठ कँवल—दस—चरखा डोलेए पाँच तत्ताए गुन तीनी चदरियाय

साईं को सियत मास दस लागैए ठोक—ठोक कै बीनी चदरिया।

सो चादर सुर—नर—मुनि ओढ़़ैंए ओढ़़िकै मैली कीनी चदरियाय

दास कबीर जतन से ओढ़़ीए ज्यों—की—त्यों धार दीनी चदरिया।श्श्

बातों में रात अधिक जा चुकी थी। ग्यारह का घंटा सुनाई दिया। लोगों ने ढ़ोलक—मँजीरे समेट दिए। सभा विसर्जित हुई। सूरदास ने मिट्ठू को फिर गोद में उठायाए और अपनी झोंपड़ी में लाकर टाट पर सुला दिया। आप जमीन पर लेट रहा

'''

अध्याय 3

मि. जॉन सेवक का बँगला सिगरा में था। उनके पिता मि. ईश्वर सेवक ने सेना—विभाग में पेंशन पाने के बाद वहीं मकान बनवा लिया थाए और अब तक उसके स्वामी थे। इसके आगे उनके पुरखों का पता नहीं चलताए और न हमें उसकी खोज करने की विशेष जरूरत है। हाँ इतनी बात अवश्य निश्चित है कि प्रभु ईसा की शरण जाने का गौरव ईश्वर सेवक को नहींए उनके पिता को था। ईश्वर सेवक को अब भी अपना बाल्य जीवन कुछ—कुछ याद आता थाए जब वह अपनी माता के साथ गंगास्नान को जाया करते थे। माता की दाह—क्रिया की स्मृति भी अभी न भूली थी। माता के देहांत के बाद उन्हें याद आता था कि मेरे घर में कई सैनिक घुस आए थेए और मेरे पिता को पकड़कर ले गए थे। इसके बाद स्मृति विशृंखल हो जाती थी। हाँए उनके गोरे रंग और आकृति से यह सहज ही अनुमान किया जा सकता था कि वह उच्चवंशीय थेए और कदाचित्‌ इसी सूबे में उनका पूर्व निवास भी था।

यह बँगला उस जमाने में बना थाए जब सिगरा में भूमि का इतना आदर न था। अहाते में फूल—पत्तिायों की जगह शाक—भाजी और फलों के वृक्ष थे। यहाँ तक कि गमलों में भी सुरुचि की अपेक्षा उपयोगिता पर अधिक धयान दिया गया था। बेलें परवलए कद्दूए कुँदरूए सेम आदि की थींए जिनसे बँगले की शोभा होती थी और फल भी मिलता था। एक किनारे खपरैल का बरामदा थाए जिसमें गाय—भैंस पली हुई थीं। दूसरी ओर अस्तबल था। मोटर का शौक न बाप को थाए न बेटे को। फिटन रखने में किफायत भी थी और आराम भी। ईश्वर सेवक को तो मोटरों से चिढ़़ थी। उनके शोर से उनकी शांति में विघ्न पड़ता था। फिटन का घोड़ा अहाते में एक लम्बी रस्सी से बाँधकर छोड़ दिया जाता था। अस्तबल से बाग के लिए खाद निकल आती थीए और केवल एक साईस से काम चल जाता। ईश्वर सेवक गृह—प्रबंध में निपुण थेए और गृह—कायोर्ं में उनका उत्साह लेश—मात्रा भी कम न हुआ था। उनकी आराम—कुर्सी बंगले के सायबान में पड़ी रहती थी। उस पर वह सुबह से शाम तक बैठे जॉन सेवक की फिजूलखर्ची और घर की बरबादी का रोना रोया करते थे। वह अब भी नियमित रूप से पुत्रा को घंटे—दो—घंटे उपदेश दिया करते थेए और शायद इसी उपदेश का फल था कि जॉन सेवक का धान और मान दिनोंदिन बढ़़ता जाता था। श्किफायतश् उनके जीवन का मूल तत्तव था। और इसका उल्लंघन उन्हें असह्य था। वह अपने घर में धान का अपव्यय नहीं देख सकते थेए चाहे वह किसी मेहमान ही का धान क्यों न हो। धार्मानुरागी इतने थे कि बिला नागा दोनों वक्त गिरजाघर जाते। उनकी अपनी अलग सवारी थी। एक आदमी इस तामजान को खींचकर गिरजाघर के द्वार तक पहुँचा आया करता था। वहाँ पहुँचकर ईश्वर सेवक उसे तुरंत घर लौटा देते थे। गिरजा के अहाते में तामजान की रक्षा के लिए किसी आदमी के बैठे रहने की जरूरत न थी। घर आकर वह आदमी और कोई काम कर सकता था। बहुधा उसे लौटाते समय वह काम भी बतलाया करते थे। दो घंटे बाद वह आदमी जाकर उन्हें खींच लाता था। लौटती बार वह यथासाधय खाली हाथ न लौटते थेए कभी दो—चार पपीते मिल जातेए कभी नारंगियाँए कभी सेर—आधा—सेर मकोय। पादरी उनका बहुत सम्मान करता था। उनकी सारी उम्मत (अनुयायियों की मंडली) में इतना वयोवृध्द और दूसरा आदमी न थाए उस पर धर्म का इतना प्रेमी! वह उसके धार्मोपदेशों को जितनी तन्मयता से सुनते थे और जितनी भक्ति से कीर्तन में भाग लेते थेए वह आदर्श कही जा सकती थी।

प्रातरूकाल था। लोग जलपान करके या छोटी हाजिरी खाकरए मेज पर से उठे थे। मि. जॉन सेवक ने गाड़ी तैयार करने का हुक्म दिया। ईश्वर सेवक ने अपनी कुरसी पर बैठे—बैठे चाय का एक प्याला पिया थाए और झ्रुझला रहे थे कि इसमें शकर क्यों इतनी झोंक दी गई है। शकर कोई नियामत नहीं कि पेट फाड़कर खाई जाएए एक तो मुश्किल से पचती हैए दूसरे इतनी महँगी। इसकी आधी शकर चाय को मजेदार बनाने के लिए काफी थी। अंदाज से काम करना चाहिए थाए शकर कोई पेट भरने की चीज नहीं है। सैकड़ों बार कह चुका हूँए पर मेरी कौन सुनता है। मुझे तो सबने कुत्ता समझ लिया है। उसके भूँकने की कौन परवा करता हैघ्

मिसेज सेवक ने धार्मानुराग और मितव्ययिता का पाठ भलीभाँति अभ्यस्त किया था। लज्जित होकर बोली—पापाए क्षमा कीजिए। आज सोफी ने शकर ज्यादा डाल दी थी। कल से आपको यह शिकायत न रहेगीए मगर करूँ क्याए यहाँ तो हलकी चाय किसी को अच्छी ही नहीं लगती।

ईश्वर सेवक ने उदासीन भाव से कहा—मुझे क्या करना हैए कुछ कयामत तक तो बैठा रहूँगा नहींए मगर घर के बरबाद होने के ये ही लक्षण हैं। ईसूए मुझे अपने दामन में छुपा।

मिसेज सेवक—मैं अपनी भूल स्वीकार करती हूँ। मुझे अंदाज से शकर निकाल देनी चाहिए थी।

ईश्वर सेवक—अरेए तो आज यह कोई नई बात थोड़े ही है! रोज तो यही रोना रहता है। जॉन समझता हैए मैं घर का मालिक हूँए रुपये कमाता हूँए खर्च क्यों न करूँघ् मगर धान कमाना एक बात हैए उसका सद्व्‌यय करना दूसरी बात। होशियार आदमी उसे कहते हैंए जो धान का उचित उपयोग करे। इधार से लाकर उधार खर्च कर दियाए तो क्या फायदाघ् इससे तो न लाना ही अच्छा। समझाता ही रहाय पर इतनी ऊँची रास का घोड़ा ले लिया। इसकी क्या जरूरत थीघ् तुम्हें घुड़दौड़ नहीं करना है। एक टट्टू से काम चल सकता था। यही न कि औरों के घोड़े आगे निकल जातेए तो इसमें तुम्हारी क्या शेखी मारी जाती थी। कहीं दूर जाना नहीं पड़ता। टट्टू होताए छरू सेर की जगह दो सेर दाना खाता। आखिर चार सेर दाना व्यर्थ ही जाता है नघ् मगर मेरी कौन सुनता हैघ् ईसूए मुझे अपने दामन में छुपा। सोफीए यहाँ आ बेटीए कलामेपाक सुना।

सोफिया प्रभु सेवक के कमरे में बैठी हुई उनसे मसीह के इस कथन पर शंका कर रही थी कि गरीबों के लिए आसमान की बादशाहत हैए और अमीरों का स्वर्ग में जाना उतना ही असम्भव हैए जितना ऊँट का सुई की नोक में जाना। उसके मन में शंका हो रही थीए क्या दरिद्र होना स्वयं कोई गुण हैए और धानी होना स्वयं कोई अवगुणघ् उसकी बुध्दि इस कथन की सार्थकता को ग्रहण न कर सकती थी। क्या मसीह ने केवल अपने भक्तों को खुश करने के लिए ही धान की इतनी निंदा की हैघ् इतिहास बतला रहा है कि पहले केवल दीनए दुरूखीए दरिद्र और समाज के पतित जनता ने ही मसीह के दामन में पनाह ली। इसीलिए तो उन्होंने धान की इतनी अवहेलना नहीं कीघ् कितने ही गरीब ऐसे हैंए जो सिर से पाँव तक अधर्म और अविचार में डूबे हुए हैं। शायद उनकी दुष्टता ही उनकी दरिद्रता का कारण है। क्या केवल दरिद्रता उनके सब पापों का प्रायश्चित्त कर देगीघ् कितने ही धानी हैंए जिनके हृदय आईने की भाँति निर्मल हैं। क्या उनका वैभव उनके सारे सत्कमोर्ं को मिटा देगाघ्

सोफिया सत्यासत्य के निरूपण में सदैव रत रहती थी। धर्मतत्तवों को बुध्दि की कसौटी पर कसना उसका स्वाभाविक गुण थाए और जब तक तर्क—बुध्दि स्वीकार न करेए वह केवल धर्म—ग्रंथों के आधार पर किसी सिध्दांत को न मान सकती थी। जब उसके मन में कोई शंका होतीए तो वह प्रभु सेवक की सहायता से उसके निवारण की चेष्टा किया करती।

सोफिया—मैं इस विषय पर बड़ी देर से गौर कर रही हूँय पर कुछ समझ में नहीं आता। प्रभु मसीह ने दरिद्रता को इतना महत्व क्यों दिया और धान—वैभव को क्यों निषिध्द बतलायाघ्

प्रभु सेवक—जाकर मसीह से पूछा।

सोफिया—तुम क्या समझते होघ्

प्रभु सेवक—मैं कुछ नहीं समझताए और न कुछ समझना ही चाहता हूँ। भोजनए निद्रा और विनोदए ये ही मनुष्य—जीवन के तीन तत्तव हैं। इसके सिवा सब गोरखधंधा है। मैं धर्म को बुध्दि से बिल्कुल अलग समझता हूँ। धर्म को तोलने के लिए बुध्दि उतनी ही अनुपयुक्त हैए जितना बैंगन तोलने के लिए सुनार का काँटा। धर्म धर्म हैए बुध्दिए बुध्दि। या तो धर्म का प्रकाश इतना तेजोमय है कि बुध्दि की अॉंखें चौंधिया जाती हैंए या इतना घोर अंधकार है कि बुध्दि को कुछ नजर ही नहीं आता। इन झगड़ों में व्यर्थ सिर खपाती हो। सुनाए आज पापा चलते—चलते क्या कह गए!

सोफिया—नहींए मेरा धयान उधार न था।

प्रभु सेवक—यही कि मशीनों के लिए शीघ्र आर्डर दे दो। उस जमीन को लेने का इन्होंने निश्चय कर लिया। उसका मौका बहुत पसंद आया। चाहते हैं कि जल्द—से—जल्द बुनियाद पड़ जाएए लेकिन मेरा जी इस काम से घबराता है। मैंने यह व्यवसाय सीखा तोय पर सच पूछोए तो मेरा दिल वहाँ न लगता था। अपना समय दर्शनए साहित्यए काव्य की सैर में काटता था। वहाँ के बड़े—बड़े विद्वानों और साहित्य—सेवियों से वार्तालाप करने में जो आनंद मिलता थाए वह कारखाने में कहाँ नसीब थाघ् सच पूछोए तो मैं इसीलिए वहाँ गया ही था। अब घोर संकट में पड़ा हुआ हूँ। अगर इस काम में हाथ नहीं लगाताए तो पापा को दुरूख होगाए वह समझेंगे कि मेरे हजारों रुपये पानी में गिर गए! शायद मेरी सूरत से घृणा करने लगें। काम शुरू करता हूँ तो यह भय होता है कि कहीं मेरी बेदिली से लाभ के बदले हानि न हो। मुझे इस काम में जरा भी उत्साह नहीं। मुझे तो रहने को एक झोंपड़ी चाहिए और दर्शन तथा साहित्य का एक अच्छा—सा पुस्तकालय। और किसी वस्तु की इच्छा नहीं रखता। यह लोए दादा को तुम्हारी याद आ गई। जाओए नहीं तो वह यहाँ आ पहुँचेंगे और व्यर्थ की बकवास से घंटों समय नष्ट कर देंगे।

सोफिया—यह विपत्ति मेरे सिर बुरी पड़ी है। जहाँ पढ़़ने कुछ बैठी कि इनका बुलावा पहुँचा। आजकल श्उत्पत्तिश् की कथा पढ़़वा रहे हैं। मुझे एक—एक शब्द पर शंका होती है। कुछ बोलूँए तो बिगड़ जाएँ। बिल्कुल बेगार करनी पड़ती है।

मिसेज सेवक बेटी को बुलाने आ रही थीं। अंतिम शब्द उनके कानों में पड़ गए। तिलमिला गईं। आकर बोलीं—बेशकए ईश्वर—ग्रंथ पढ़़ना बेगार हैए मसीह का नाम लेना पाप हैए तुझे तो उस भिखारी अंधे की बातों में आनंद आता हैए हिंदुओं के गपोड़े पढ़़ने में तेरा जी लगता हैय ईश्वर—वाक्य तो तेरे लिए जहर है। खुदा जानेए तेरे दिमाग में यह खब्त कहाँ से समा गया है। जब देखती हूँए तुझे अपने पवित्र धर्म की निंदा ही करते देखती हूँ। तू अपने मन में भले ही समझ ले कि ईश्वर—वाक्य कपोल—कल्पना हैए लेकिन अंधे की अॉंखों में अगर सूर्य का प्रकाश न पहुँचेए तो सूर्य का दोष नहींए अंधे की अॉंखों का ही दोष है! आज तीन—चौथाई दुनिया जिस महात्मा के नाम पर जान देती हैए जिस महान्‌ आत्मा की अमृत—वाणी आज सारी दुनिया को जीवन प्रदान कर रही हैए उससे यदि तेरा मन विमुख हो रहा हैए तो यह तेरा दुर्भाग्य है और तेरी दुर्बुध्दि है। खुदा तेरे हाल पर रहम करे।

सोफिया—महात्मा ईसा के प्रति कभी मेरे मुँह से कोई अनुचित शब्द नहीं निकला। मैं उन्हें धर्मए त्याग और सद्विचार का अवतार समझती हूँ! लेकिन उनके प्रति श्रध्दा रखने का यह आशय नहीं है कि भक्तों ने उनके उपदेशों में जो असंगत बातें भर दी हैं या उनके नाम से जो विभूतियाँ प्रसिध्द कर रखी हैंए उन पर भी ईमान लाऊँ! औरए यह अनर्थ कुछ प्रभु मसीह ही के साथ नहीं किया गयाए संसार के सभी महात्माओं के साथ यही अनर्थ किया गया है।

मिसेज सेवक—तुझे ईश्वर—ग्रंथ के प्रत्येक शब्द पर ईमान लाना पड़ेगाए वरना तू अपनी गणना प्रभु मसीह के भक्तों में नहीं कर सकती।

सोफिया—तो मैं मजबूर होकर अपने को उनकी उम्मत से बाहर समझ्रूगीय क्योंकि बाइबिल के प्रत्येक शब्द पर ईमान लाना मेरे लिए असम्भव है!

मिसेज सेवक—तू विधार्मिणी और भ्रष्टा है। प्रभु मसीह तुझे कभी क्षमा न करेंगे!

सोफिया—अगर धार्मिक संकीर्णता से दूर रहने के कारण ये नाम दिए जाते हैंए तो मुझे स्वीकार करने में कोई आपत्ति नहीं है।

मिसेज सेवक से अब जब्त न हो सका। अभी तक उन्होंने कातिल वार न किया था। मातृस्नेह हाथों को रोके हुए था। लेकिन सोफिया के वितंडावाद ने अब उनके धैर्य का अंत कर दिया! बोलीं—प्रभु मसीह से विमुख होनेवाले के लिए इस घर में जगह नहीं है।

प्रभु सेवक—मामाए आप घोर अन्याय कर रही हैं। सोफिया यह कब कहती हैए कि मुझे प्रभु मसीह पर विश्वास नहीं हैघ्

मिसेज सेवक—हाँए वह यही कह रही हैए तुम्हारी समझ का फेर है। ईश्वर—ग्रंथ पर ईमान न लाने का और क्या अर्थ हो सकता हैघ् इसे प्रभु मसीह के अलौकिक कृत्यों पर अविश्वास और उनके नैतिक उपदेशों पर शंका है। यह उनके प्रायश्चित्त के तत्तव को नहीं मानतीए उनके पवित्र आदेशों को स्वीकार नहीं करतीं।

प्रभु सेवक—मैंने इसे मसीह के आदेशों का उल्लंघन करते कभी नहीं देखा।

सोफिया—धार्मिक विषयों में मैं अपनी विवेक—बुध्दि के सिवा और किसी के आदेशों को नहीं मानती।

मिसेज सेवक—मैं तुझे अपनी संतान नहीं समझतीए और तेरी सूरत नहीं देखना चाहती।

यह कहकर सोफिया के कमरे में धुस गईंए और उसकी मेज पर से बौध्द—धर्म और वेदांत के कई ग्रंथ उठाकर बाहर बरामदे में फेंक दिए! उसी आवेश में उन्हें पैरों से कुचला और जाकर ईश्वर सेवक से बोलीं—पापाए आप सोफी को नाहक बुला रहे हैंए वह प्रभु मसीह की निंदा कर रही है।

मि. ईश्वर सेवक ऐसे चौंकेए मानो देह पर आग की चिनगारी गिर पड़ी होए और अपनी ज्योति—विहीन अॉंखों को फाड़कर बोले—क्या कहाए सोफी प्रभु मसीह की निंदा कर रही है! सोफीघ्

मिसेज सेवक—हाँ—हाँए सोफी। कहती हैए मुझे उनकी विभूतियों परए उनके उपदेशों और आदेशों परए विश्वास नहीं है।

ईश्वर सेवक—(ठंडी साँस खींचकर) प्रभु मसीहए मुझे अपने दामन में छुपाए अपनी भटकती हुई भेड़ों को सच्चे मार्ग पर ला। कहाँ है सोफीघ् मुझे उसके पास ले चलोए मेरे हाथ पकड़कर उठाओ। खुदाए मेरी बेटी के हृदय को अपनी ज्योति से जगा। मैं उसके पैरों पर गिरूँगाए उसकी मिंनतें करूँगाय उसे दीनता से समझाऊँगा। मुझे उसके पास तो ले चलो।

मिसेज सेवक—मैं सब कुछ करके हार गई। उस पर खुदा की लानत है। मैं इनका मुँह नहीं देखना चाहती।

ईश्वर सेवक—ऐसी बातें न करो। वह मेरे खून का खूनए मेरी जान की जानए मेरे प्राणों का प्राण है। मैं उसे कलेजे से लगाऊँगा। प्रभु मसीह ने विधार्मियों को छाती से लगाया थाए कुकर्मियों को अपने दामन में शरण दी थीए वह मेरी सोफिया पर अवश्य दया करेंगे। ईसूए मुझे अपने दामन में छुपा।

जब मिसेज सेवक ने अब भी सहारा न दियाए तो ईश्वर सेवक लकड़ी के सहारे उठे और लाठी टेकते हुए सोफिया के कमरे में द्वार पर आकर बोले—बेटी सोफीए कहाँ हैघ् इधार आ बेटीए तुझे गले से लगाऊँ। मेरा मसीह खुदा का दुलारा बेटा थाए दीनों का सहायकए निर्बलों का रक्षकए दरिद्रों का मित्रए डूबतों का सहाराए पापियों का उध्दारकए दुखियों का पार लगानेवाला! बेटीए ऐसा और कौन—सा नबी हैए जिसका दामन इतना चौड़ा होए जिसकी गोद में संसार के सारे पापोंए सारी बुराइयों के लिए स्थान होघ् वही एक ऐसा नबी हैए जिसने दुरात्माओं कोए अधार्मियों कोए पापियों को मुक्ति की शुभ सूचना दीए नहीं तो हम—जैसे मलिनात्माओं के लिए मुक्ति कहाँ थीघ् हमें उबारनेवाला कौन थाघ्

यह कहकर उन्होंने सोफी को हृदय से लगा लिया। माता के कठोर शब्दों ने उसके निर्बल क्रोध को जागृत कर दिया था। अपने कमरे में आकर रो रही थीए बार—बार मन उद्विग्न हो उठता था। सोचती थीए अभीए इसी क्षणए इस घर से निकल जाऊँ। क्या इस अनंत संसार में मेरे लिए जगह नहीं हैघ् मैं परिश्रम कर सकती हूँए अपना भार आप सँभाल सकती हूँ। आत्मस्वातंत्रय का खून करके अगर जीवन की चिंताओं से निवृत्ति हुईए तो क्याघ् मेरी आत्मा इतनी तुच्छ वस्तु नहीं है कि उदर पालने के लिए उसकी हत्या कर दी जाए। प्रभु सेवक को अपनी बहन से सहानुभूति थी। धर्म पर उन्हें उससे कहीं कम श्रध्दा थी। किंतु वह अपने स्वतंत्रा विचारों को अपने मन ही में संचित रखते थे। गिरजा चले जाते थेए पारिवारिक प्रार्थनाओं में भाग लेते थेय यहाँ तक कि धार्मिक भजन भी गा लेते थे। वह धर्म को गम्भीर विचार के क्षेत्र से बाहर समझते थे। वह गिरजा उसी भाव से जाते थेए जैसे थिएटर देखने जाते। पहले अपने कमरे से झाँककर देखा कि कहीं मामा तो नहीं देख रही हैंय नहीं तो मुझ पर वज्र—प्रहार होने लगेंगे। तब चुपके से सोफिया के पास आए और बोले—सोफीए क्योंए नादान बनती होघ् साँप के मुँह में उँगली डालना कौन—सी बुध्दिमानी हैघ् अपने मन में जो विचार रखए जिन बातों को जी चाहेए मानोय जिनको जी न चाहेए न मानोय पर इस तरह ढ़िंढ़ोरा पीटने से क्या फायदाघ् समाज में नक्कू बनने की क्या जरूरतघ् कौन तुम्हारे दिल के अंदर देखने जाता है!

सोफिया ने भाई को अवहेलना की द्रष्टि से देखकर कहा—धर्म के विषय में मैं कर्म को वचन के अनुरूप ही रखना चाहती हूँ। चाहती हूँए दोनों से एक ही स्वर निकले। धर्म का स्वाँग भरना मेरी क्षमता से बाहर है। आत्मा के लिए मैं संसार के सारे दुरूख झेलने को तैयार हूँ। अगर मेरे लिए इस घर में स्थान नहीं हैए तो ईश्वर का बनाया हुआ विस्तृत संसार तो है! कहीं भी अपना निर्वाह कर सकती हूँ। मैं सारी विडम्बनाएँ सह लूँगीए लोक—निंदा की मुझे चिंता नहीं हैय मगर अपनी ही नजरों में गिरकर मैं जिंदा नहीं रह सकती। अगर यही मान लूँ कि मेरे लिए चारों तरफ से द्वार बंद हैए तो भी मैं आत्मा को बेचने की अपेक्षा भूखों मर जाना कहीं अच्छा समझती हूँ।

प्रभु सेवक—दुनिया उससे कहीं तंग हैए जितना तुम समझती हो।

सोफिया—कब्र के लिए तो जगह निकल ही आएगी।

सहसा ईश्वर सेवक ने जाकर उसे छाती से लगा लियाए और अपने भक्ति—गद्‌गद नेत्रा—जल से उसके संतप्त हृदय को शांत करने लगे। सोफिया को उनकी श्रध्दालुता पर दया आ गई। कौन ऐसा निर्दय प्राणी हैए जो भोले—भाले बालक के कठघोड़े का उपहास करके उसका दिल दुरूखाएए उसके मधुर स्वप्न को विशृंखल कर देघ्

सोफिया ने कहा—दादाए आप आकर इस कुर्सी पर बैठ जाएँए खड़े—खड़े आपको तकलीफ होती है।

ईश्वर सेवक—जब तक तू अपने मुख से न कहेगी कि मैं प्रभु मसीह पर विश्वास करती हूँए तब तक मैं तेरे द्वार परए यों हीए भिखारियों की भाँति खड़ा रहूँगा।

सोफिया—दादाए मैंने यह कभी नहीं कहा कि मैं प्रभु ईसू पर ईमान नहीं रखतीए या मुझे उन पर श्रध्दा नहीं है। मैं उन्हें महान्‌ आदर्श पुरुष और क्षमा तथा दया का अवतार समझती हूँए और समझती रहूँगी।

ईश्वर सेवक ने सोफिया के कपोलों का चुम्बन करके कहा—बसए मेरा चित्ता शांत हो गया। ईसू तुझे अपने दामन में लें। मैं बैठता हूँए मुझे ईश्वर—वाक्य सुनाए कानों को प्रभु मसीह की वाणी से पवित्र कर।

सोफिया इनकार न कर सकी। श्उत्पत्तिश् का एक परिच्छेद खोलकर पढ़़ने लगी। ईश्वर सेवक अॉंखें बंद करके कुर्सी पर बैठ गए और तन्मय होकर सुनने लगे। मिसेज सेवक ने यह —श्य देखा और विजयगर्व से मुस्कराती हुई चली गईं।

यह समस्या तो हल हो गईय पर ईश्वर सेवक के मरहम से उसके अंतरूकरण का नासूर न अच्छा हो सकता था। आए—दिन उसके मन में धार्मिक शंकाएँ उठती रहती थीं और दिन—प्रतिदिन उसे अपने घर में रहना दुस्सह होता जाता था। शनैरू—शनैरू प्रभु सेवक की सहानुभूति भी क्षीण होने लगी। मि. जॉन सेवक को अपने व्यावसायिक कामों से इतना अवकाश ही न मिलता था कि उसके मानसिक विप्लव का निवारण करते। मिसेज सेवक पूर्ण निरंकुशता से उस पर शासन करती थीं। सोफिया के लिए सबसे कठिन परीक्षा का समय वह होता थाए जब वह ईश्वर सेवक को बाइबिल पढ़़कर सुनाती थी। इस परीक्षा से बचने के लिए वह नित्य बहाने ढ़ूँढ़़ती रहती थी। अतरू अपने कृत्रिम जीवन से उसे घृणा होती जाती थी। उसे बार—बार प्रबल अंतरूप्रेरणा होती कि घर छोड़कर कहीं चली जाऊँ और स्वाधीनता होकर सत्यासत्य की विवेचना करूँय पर इच्छा व्यवहार—क्षेत्र में पैर रखते हुए संकोच से विवश हो जाती थी। पहले प्रभु सेवक से अपनी शंकाएँ प्रकट करके वह शांत—चित्ता हो जाया करती थीय पर ज्यों—ज्यों उनकी उदासीनता बढ़़ने लगीय सोफिया के हृदय से भी उनके प्रति प्रेम और आदर उठने लगा। उसे धारणा होने लगी कि इनका मन केवल भोग और विलास का दास हैए जिसे सिध्दांतों से कोई लगाव नहीं। यहाँ तक कि उनकी काव्य—रचनाएँ भीए जिन्हें वह पहले बड़े शौक से सुना करती थीए अब उसे कृत्रिम भावों से परिपूर्ण मालूम होतीं। वह बहुधा टाल दिया करती कि मेरे सिर में दर्द हैए सुनने को जी नहीं चाहता। अपने मन में कहतीए इन्हें उन सद्‌भावों और पवित्र आवेगों को व्यक्त करने का क्या अधिकार हैए जिनका आधार आत्म—दर्शन और अनुभव पर न हो।

एक दिन जब घर से सब प्राणी गिरजाघर जाने लगेए तो सोफिया ने सिरदर्द का बहाना किया। अब तक वह शंकाओं के होते हुए भी रविवार को गिरजाघर चली जाया करती थी। प्रभु सेवक उसका मनोभाव ताड़ गएए बोले—सोफी गिरजा जाने में तुम्हें क्या आपत्ति हैघ् वहाँ जाकर आधा घंटे चुपचाप बैठे रहना कोई ऐसा मुश्किल काम नहीं।

प्रभु सेवक बड़े शौक से गिरजा जाया करते थेए वहाँ उन्हें बनाव और दिखावए पाखंड और ढ़कोसलों की दार्शनिक मीमांसा करने और व्यंग्योक्तियों के लिए सामग्री जमा करने का अवसर मिलता था। सोफिया के लिए आराधाना विनोद की वस्तु नहींए शांति और तृप्ति की वस्तु थी। बोली—तुम्हारे लिए आसान होए मेरे लिए मुश्किल ही है।

प्रभु सेवक—क्यों अपनी जान बवाल में डालती होघ् मामा का स्वभाव तो जानती हो।

सोफिया—मैं तुमसे परामर्श नहीं चाहतीए अपने कामों की जिम्मेदारी अपने ऊपर लेने को तैयार हूँ!

मिसेज सेवक ने आकर पूछा—सोफीए क्या सिर में दर्द इतना है कि गिरजे तक नहीं चल सकतींघ्

सोफिया—जा क्यों नहीं सकतीय पर जाना नहीं चाहती।

मिसेज सेवक—क्योंघ्

सोफिया—मेरी इच्छा। मैंने गिरजा जाने की प्रतिज्ञा नहीं की है।

मिसेज सेवक—क्या तू चाहती है कि हम कहीं मुँह दिखाने के लायक न रहेंघ्

सोफिया—हरगिज नहींए मैं सिर्फ इतना ही चाहती हूँ क आप मुझे चर्च जाने के लिए मजबूर न करें।

ईश्वर सेवक पहले ही अपने तामजान पर बैठकर चल दिए थे। जॉन सेवक ने आकर केवल इतना पूछा—क्या बहुत ज्यादा दर्द हैघ् मैं उधार से कोई दवा लेता आऊँगाए जरा पढ़़ना कम कर दो और रोज घूमने जाया करो।

यह कहकर वह प्रभु सेवक के साथ फिटन पर आ बैठे। लेकिन मिसेज सेवक इतनी आसानी से उसका गला छोड़ने वाली न थीं। बोलीं—तुझे ईसू के नाम से इतनी घृणा हैघ्

सोफिया—मैं हृदय से उनकी श्रध्दा करती हूँ।

माँ—तू झूठ बोलती है।

सोफिया—अगर दिल में श्रध्दा न होतीए तो जबान से कदापि न कहती।

माँ—तू प्रभु मसीह को अपना मुक्तिदाता समझती हैघ् तुझे यह विश्वास है कि वही तेरा उध्दार करेंगेघ्

सोफिया—कदापि नहीं। मेरा विश्वास है कि मेरी मुक्तिए अगर मुक्ति हो सकती हैए तो मेरे कमोर्ं से होगी।

माँ—तेरे कमोर्ं से तेरे मुँह में कालिख लगेगीए मुक्ति न होगी।

यह कहकर मिसेज सेवक फिटन पर जा बैठीं। संध्या हो गई थी। सड़क पर ईसाइयों के दल—के—दल कोई ओवरकोट पहनेए कोई माघ की ठंड से सिकुड़े हुएए खुश गिरजे चले जा रहे थेए पर सोफिया को सूर्य की मलिन ज्योति भी असह्य हो रही थीए वह एक ठंडी साँस खींचकर बैठ गई। श्तेरे कमोर्ं से तेरे मुँह में कालिख लगेगीश्—ये शब्द उसके अंतरूकरण को भाले के समान बेधाने लगे। सोचने लगी—मेरी स्वार्थ—सेवा का यही उचित दंड है। मैं भी केवल रोटीयों के लिए अपनी आत्मा की हत्या कर रही हूँए अपमान और अनादर के झोंके सह रही हूँ। इस घर में कौन मेरा हितैषी हैघ् कौन हैए जो मेरे मरने की खबर पाकर आँसू की चार बूँदें गिरा देघ् शायद मेरे मरने से लोगों को खुशी होगी। मैं इनकी नजरों में इतनी गिर गई हूँ। ऐसे जीवन पर धिक्कार है। मैंने देखे हैं हिंदू—घरानों में भिन्न—भिन्न मतों के प्राणी कितने प्रेम से रहते हैं। बाप सनातन—धार्मावलम्बी हैए तो बेटा आर्यसमाजी। पति ब्रह्मसमाज में हैए तो स्त्री पाषाण—पूजकों में। सब अपने—अपने धर्म का पालन करते हैं। कोई किसी से नहीं बोलता। हमारे यहाँ आत्मा कुचली जाती है। फिर भी यह दावा है कि हमारी शिक्षा और सभ्यता विचार—स्वातंत्रय के पोषक हैं। हैं तो हमारे यहाँ भी उदार विचारों के लोगए प्रभु सेवक ही उनकी एक मिसाल हैए पर इनकी उदारता यथार्थ में विवेकशून्यता है। ऐसे उदार प्राणियों से तो अनुदार ही अच्छे। इनमें कुछ विश्वास तो हैए निरे बहुरूपिए तो नहीं हैं। आखिर मामा अपने दिल में क्या समझती है कि बात—बात पर वाग्बाणों से छेदने लगती हैंघ् उनके दिल में यही विचार होगा कि इसे कहीं और ठिकाना नहीं हैए कोई इसका पूछनेवाला नहीं है। मैं इन्हें दिखा दूँगी कि मैं अपने पैरों पर खड़ी हो सकती हूँ। अब इस घर में रहना नरकवास के समान है। इस बेहयाई की रोटीयाँ खाने से भूखों मर जाना अच्छा है। बला से लोग हँसेंगेए आजाद तो हो जाऊँगी। किसी के ताने—मेहने तो न सुनने पड़ेंगे।

सोफिया उठीए और मन में कोई स्थान निश्चित किए बिना ही अहाते से बाहर निकल आई। उस घर की वायु उसे दूषित मालूम होती थी। वह आगे बढ़़ती जाती थीय पर दिल में लगातार प्रश्न हो रहा थाए कहाँ जाऊँघ् जब वह घनी आबादी में पहुँचीए तो शोहदों ने उस पर इधार—उधार से आवाजें कसनी शुरू कीं। किंतु वह शर्म से सिर नीचा करने के बदले उन आवाजों और कुवासनामयी द्रष्टियों का जवाब घृणायुक्त नेत्रों से देती चली जाती थीए जैसे कोई सवेग जल—धारा पत्थरों को ठुकराती हुई आगे बढ़़ती चली जाए। यहाँ तक कि वह उस खुली हुई सड़क पर आ गईए जो दशाश्वमेधा घाट की ओर जाती है।

उसके जी में आयाए जरा दरिया की सैर करती चलूँ। कदाचित्‌ किसी सज्जन से भेंट हो जाए। जब तक दो—चार आदमियों से परिचय न होए और वे मेरा हाल न जानेंए मुझसे कौन सहानुभूति प्रकट करेगाघ् कौन मेरे हृदय की बात जानता हैघ् ऐसे सदय प्राणी सौभाग्य ही से मिलते हैं। जब अपने माता—पिता अपने शत्रु हो रहे हैंए तो दूसरों से भलाई की क्या आशाघ्

वह इसी नैराश्य की दशा में चली जा रही थी कि सहसा उसे एक विशाल प्रासाद देख पड़ाए जिसके सामने बहुत चौड़ा हरा मैदान था। अंदर जाने के लिए एक ऊँचा फाटक थाए जिसके ऊपर एक सुनहरा गुम्बद बना था। इस गुम्बद में नौबत बज रही थीए फाटक से भवन तक सुर्खी की एक रविश थीए जिसके दोनों ओर बेलें और गुलाब की क्यारियाँ थीं। हरी—हरी घास पर बैठे कितने ही नर—नारी माघ की शीतल वायु का आनंद ले रहे थे। कोई लेटा हुआ थाए कोई तकिएदार चौकियों पर बैठा सिगार पी रहा था।

सोफिया ने शहर में ऐसा रमणीक स्थान न देखा था। उसे आश्चर्य हुआ कि शहर के मध्य भाग में भी ऐसे मनोरम स्थान मौजूद हैं। वह एक चौकी पर बैठ गई और सोचने लगी—अब लोग चर्च से आ गए होंगे। मुझे घर में न देखकर चौंकेंगे तो जरूरय पर समझेंगेए कहीं घूमने गई होगी। अगर रात—भर यहीं बैठी रहूँए तो भी वहाँ किसी को चिंता न होगीए आराम से खा—पीकर सोएँगे। हाँए दादा को अवश्य दुरूख होगाए वह भी केवल इसीलिए कि उन्हें बाइबिल पढ़़कर सुनानेवाला कोई नहीं। मामा तो दिल में खुश होंगी की अच्छा हुआए अॉंखों से दूर हो गई। मेरा किसी से परिचय नहीं। इसी से कहाए सबसे मिलते रहना चाहिएए न जाने कब किससे काम पड़ जाए। मुझे बरसों रहते हो गए और किसी से राह—रस्म न पैदा की। मेरे साथ नैनीताल में यहाँ के किसी रईस की लड़की पढ़़ती थीए भला—सा नाम था। हाँए इंदु। कितना कोमल स्वभाव था! बात—बात से प्रेम टपका पड़ता था। हम दोनों गले में बाँहें डाले टहलती थीं। वहाँ कोई बालिका इतनी सुंदर और ऐसी सुशील न थी। मेरे और उसके विचारों में कितना सा—श्य था! कहीं उसका पता मिल जाताए तो दस—पाँच दिन उसी के यहाँ मेहमान हो जाती। उसके पिता का अच्छा—सा नाम था। हाँए कुँवर भरतसिंह। पहले यह बात धयान में न आईए नहीं तो एक कार्ड लिखकर डाल देती। मुझे भूल तो क्या गई होगीए इतनी निष्ठुर तो न मालूम होती थी। कम—से—कम मानव—चरित्र का तो अनुभव हो जाएगा।

मजबूरी में हमें उन लोगों की याद आती हैए जिनकी सूरत भी विस्मृत हो चुकी होती है। विदेश में हमें अपने मुहल्ले का नाई या कहार भी मिल जाएए तो हम उसके गले मिल जाते हैंए चाहे देश में उससे कभी सीधो मुँह बात भी न की हो।

सोफिया सोच रही थी कि किसी से कुँवर भरतसिंह का पता पूछूँए इतने में भवन में सामनेवाले पक्के चबूतरे पर फर्श बिछ गया। कई आदमी सितारए बेलाए मृदंग लेए आ बैठेए और इन साजों के साथ स्वर मिलाकर कई नवयुवक एक स्वर से गाने लगे रू

श्शांति—समर में कभी भूलकर धैर्य नहीं खोना होगाय

वज्र—प्रहार भले सिर पर होए नहीं किंतु रोना होगा।

अरि से बदला लेने का मन—बीज नहीं बोना होगाय

घर में कान तूल देकर फिर तुझे नहीं सोना होगा।

देश—दाग को रुधिर वारि से हर्षित हो धोना होगाय

देश—कार्य की सारी गठरी सिर पर रख ढ़ोना होगा।

अॉंखें लालए भवें टेढ़़ी करए क्रोध नहीं करना होगाय

बलि—वेदी पर तुझे हर्ष से चढ़़कर कट मरना होगा।

नश्वर है नर—देहए मौत से कभी नहीं डरना होगाय

सत्य—मार्ग को छोड़ स्वार्थ—पथ पैर नहीं धारना होगा।

होगी निश्चय जीत धर्म की यही भाव भरना होगाय

मातृभूमि के लिए जगत में जीना औश् मरना होगा।श्

संगीत में न लालित्य थाए न माधुर्यय पर वह शक्तिए वह जागृति भरी हुई थीए जो सामूहिक संगीत का गुण हैए आत्मसमर्पण और उत्कर्ष का पवित्र संदेश विराट आकाश मेंए नील गगन में और सोफिया के अशांत हृदय में गूँजने लगा। वह अब तक धार्मिक विवेचन ही में रत रहती थी। राष्ट्रीय संदेश सुनने का अवसर उसे कभी न मिला था। उसके रोम—रोम से वही धवनिए दीपक—से ज्योति के समान निकलने लगी—

श्मातृभूमि के लिए जगत में जीना औश् मरना होगा।श्

उसके मन में एक तरंग उठी कि मैं भी जाकर गानेवालों के साथ गाने लगती। भाँति—भाँति के उद्‌गार उठने लगे—मैं किसी दूसरे देश में जाकर भारत कार् आत्तानाद सुनाती। यहीं खड़ी होकर कह दूँए मैं अपने को भारत—सेवा के लिए समर्पित करती हूँ। अपने जीवन के उद्देश्य पर एक व्याख्यान देती—हम भाग्य के दुरूखड़े रोने के लिएए अपनी अवनत दशा पर आँसू बहाने के लिए नहीं बनाए गए हैं।

समा बँधा हुआ थाए सोफिया के हृदय की अॉंखों के सामने इन्हीं भावों के चित्र नृत्य करते हुए मालूम होते थे।

अभी संगीत की धवनि गूँज ही रही थी कि अकस्मात्‌ उसी अहाते के अंदर एक खपरैल के मकान में आग लग गई। जब तक लोग उधार दौड़ेए अग्नि की ज्वाला प्रचंड हो गई। सारा मैदान जगमगा उठा। वृक्ष और पौधो प्रदीप्त प्रकाश के सागर में नहा उठे। गानेवालों ने तुरंत अपने—अपने साज वहीं छोड़े धोतियाँ ऊपर उठाईंए आस्तीनें चढ़़ाईं और आग बुझाने दौड़े। भवन से और भी कितने ही युवक निकल पड़े। कोई कुएँ से पानी लाने दौड़ाए कोई आग के मुँह में घुसकर अंदर की चीजें निकाल—निकालकर बाहर फेंकने लगा। लेकिन कहीं वह उतावलापनए वह घबराहटए वह भगदड़ए वह कुहरामए वह श्दौड़ो—दौड़ोश् का शोरए वह स्वयं कुछ न करके दूसरों को हुक्म देने का गुल न थाए जो ऐसी दैवी आपदाओं के समय साधारणतरू हुआ करता है। सभी आदमी ऐसे सुचारु और सुव्यवस्थित रूप से अपना—अपना काम कर रहे थे कि एक बूँद पानी भी व्यर्थ न गिरने पाता थाए और अग्नि का वेग प्रतिक्षण घटता जाता था। लोग इतनी निर्भयता से आग में कूदते थेए मानो वह जलकुंडहै।

अभी अग्नि का वेग पूर्णतरू शांत न हुआ था कि दूसरी तरफ से आवाज आई—श्दौड़ो—दौड़ोए आदमी डूब रहा है।श् भवन के दूसरी ओर एक पक्की बावली थीए जिसके किनारे झाड़ियाँ लगी हुई थींए तट पर एक छोटी—सी नौका खूँटी से बँधी हुई पड़ी थी। आवाज सुनते ही आग बुझानेवाले दल से कई आदमी निकलकर बावली की तरफ लपकेए और डूबनेवाले को बचाने के लिए पानी में कूद पड़े। उनके कूदने की आवाज श्धाम! धाम!श् सोफिया के कानों में आई। ईश्वर का यह कैसा प्रकोप कि एक ही साथ दोनों प्रधान तत्तवों में विप्लव! और एक ही स्थान पर! वह उठकर बावली की ओर जाना ही चाहती थी कि अचानक उसने एक आदमी को पानी का डोल लिए फिसलकर जमीन पर गिरते देखा। चारों ओर अग्नि शांत हो गई थीय पर जहाँ वह आदमी गिरा थाए वहाँ अब तक अग्नि बड़े वेग से धाधाक रही थी। अग्नि—ज्वाला विकराल मुँह खोले उस अभागे मनुष्य की तरफ लपकी। आग की लपटें उसे निगल जातींय पर सोफिया विद्युत—गति से ज्वाला की तरफ दौड़ी और उस आदमी को खींचकर बाहर निकाल लाई। यह सब कुछ क्षण—मात्रा में हो गया। अभागे की जान बच गईय लेकिन सोफिया का कोमल गात आग की लपट से झुलस गया। वह ज्वालाओं के घेरे से बाहर आते ही अचेत होकर जमीन पर गिर पड़ी।

सोफिया ने तीन दिन तक अॉंखें न खोलीं। मन न जाने किन लोकों में भ्रमण किया करता था। कभी अद्‌भुतए कभी भयावह —श्य दिखाई देते। कभी ईसा की सौम्य मूर्ति अॉंखों के सामने आ जातीए कभी किसी विदुषी महिला के चंद्रमुख के दर्शन होतेए जिन्हें यह सेंट मेरी समझती।

चौथे दिन प्रातरूकाल उसने अॉंखें खोलींए तो अपने को एक सजे हुए कमरे में पाया। गुलाब और चंदन की सुगंधा आ रही थी। उसके सामने कुरसी पर वही महिला बैठी हुई थीए जिन्हें उसने सुषुप्तावस्था में सेंट मेरी समझा थाए और सिरहाने की ओर एक वृध्द पुरुष बैठे थेए जिनकी अॉंखों से दया टपकी पड़ती थी। इन्हीं को कदाचित्‌ उसनेए अर्ध्‌द चेतना की दशा मेंए ईसा समझा था। स्वप्न की रचना स्मृतियों की पुनरावृत्ति—मात्रा होती है।

सोफिया ने क्षीण स्वर में पूछा—मैं कहाँ हूँघ् मामा कहाँ हैंघ्

वृध्द पुरुष ने कहा—तुम कुँवर भरतसिंह के घर में हो। तुम्हारे सामने रानी साहबा बैठी हुई हैंए तुम्हारा जी अब कैसा हैघ्

सोफिया—अच्छी हूँए प्यास लगी है। मामा कहाँ हैंए पापा कहाँ हैंए आप कौन हैंघ्

रानी—यह डॉक्टर गांगुली हैंए तीन दिन से तुम्हारी दवा कर रहे हैं। तुम्हारे पापा—मामा कौन हैंघ्

सोफिया—पापा का नाम मि. जॉन सेवक है। हमारा बँगला सिगरा में है।

डॉक्टर—अच्छाए तुम मि. जॉन सेवक की बेटी होघ् हम उसे जानता हैय अभी बुलाता है।

रानी—किसी को अभी भेज दूँघ्

सोफिया—कोई जल्दी नहीं हैए आ जाएँगे। मैंने जिस आदमी को पकड़कर खींचा थाए उसकी क्या दशा हुईघ्

रानी—बेटीए वह ईश्वर की कृपा से बहुत अच्छी तरह है। उसे जरा भी अॉंच नहीं लगी। वह मेरा बेटा विनय है। अभी आता होगा। तुम्हीं ने तो उसके प्राण बचाए। अगर तुम दौड़कर न पहुँच जातींए तो आज न जाने क्या होता। मैं तुम्हारे ऋण से कभी मुक्त नहीं हो सकती। तुम मेरे कुल की रक्षा करनेवाली देवी हो।

सोफिया—जिस घर में आग लगी थीए उसके आदमी सब बच गएघ्

रानी—बेटीए यह तो केवल अभिनय थाए विनय ने यहाँ एक सेवा—समिति बना रखी है! जब शहर में कोई मेला होता हैए या कहीं से किसी दुर्घटना का समाचार आता हैए तो समिति वहाँ पहुँचकर सेवा—सहायता करती है। उस दिन समिति की परीक्षा के लिए कुँवर साहब ने वह अभिनय किया था।

डॉक्टर—कुँवर साहब देवता हैए कितने गरीब लागों की रक्षा करता है। यह समितिए अभी थोड़े दिन हुएए बंगाल गई थी। यहाँ सूर्य—ग्रहण का स्नान होनेवाला है। लाखों यात्राी दूर—दूर से आएँगे। उसके लिए यह सब तैयारी हो रही है।

इतने में एक युवती रमणी आकर खड़ी हो गई। उसके मुख से उज्ज्वल दीपक के समान प्रकाश की रश्मियाँ छिटक रही थीं। गले में मोतियों के हार के सिवा उसके शरीर पर कोई आभूषण न था। उषा की शुभ्र छटा मूर्तिमान्‌ हो गई थी।

सोफिया ने उसे एक क्षण—भर देखाए तब बोली—इंदुए तुम यहाँ कहाँघ् आज कितने दिनों के बाद तुम्हें देखा हैघ्

इंदु चौंक पड़ी। तीन दिन से बराबर सोफिया को देख रही थीए खयाल आता था कि इसे कहीं देखा हैय पर कहाँ देखा हैए यह याद न आती थी। उसकी बातें सुनते ही स्मृति जागृत हो गईए अॉंखें चमक उठींए गुलाब खिल गया। बोली—ओहो! सोफीए तुम होघ्

दोनों सखियाँ गले मिल गईं। यह वही इंदु थीए जो सोफिया के साथ नैनीताल में पढ़़ती थी। सोफिया को आशा न थी कि इंदु इतने प्रेम से मिलेगी। इंदु कभी पिछली बातें याद करके रोतीए कभी हँसतीए कभी गले मिल जाती। अपनी माँ से उसका गुणानुवाद करने लगी। माँ उसका प्रेम देखकर फूली न समाती। अंत में सोफिया ने झेंपे हुए कहा—इंदुए ईश्वर के लिए अब मेरी और ज्यादा तारीफ न करोए नहीं तो मैं तुमसे न बोलूँगी। इतने दिनों तक कभी एक खत भी न लिखाए मुँह—देखे का प्रेम करती हो।

रानी—नहीं बेटी सोफीए इंदु मुझसे कई बार तुम्हारी चर्चा कर चुकी है। यहाँ किसी से हँसकर बोलती तक नहीं। तुम्हारे सिवा मैंने इसे किसी की तारीफ करते नहीं सुना।

इंदु—बहनए तुम्हारी शिकायत वाजिब हैए पर करूँ क्याए मुझे खत नहीं लिखना आता। एक तो बड़ी भूल यह हुई कि तुम्हारा पता नहीं पूछाए और अगर पता मालूम भी होताए तो भी मैं खत न लिख सकती। मुझे डर लगता है कि कहीं तुम हँसने न लगो। मेरा पत्र कभी समाप्त ही न होताए और न जाने क्या—क्या लिख जाती।

कुँवर साहब को मालूम हुआ कि सोफिया बातें कर रही हैए तो वह भी उसे धन्यवाद देने के लिए आए। पूरे छरू फीट के मनुष्य थेए बड़ी—बड़ी अॉंखेंए लम्बे बालए लम्बी दाढ़़ीए मोटे कपड़े का एक नीचा कुरता पहने हुए थे। सोफिया ने ऐसा तेजस्वी स्वरूप कभी न देखा था। उसने अपने मन में ऋषियों की जो कल्पना कर रखी थीए वह बिल्कुल ऐसी ही थी। श्इस विशाल शरीर में बैठी हुई विशाल आत्मा को वह दोनों नेत्रों से ताक रही थी। सोफी ने सम्मान—भाव से उठना चाहाय पर कुँवर साहब मधुर ए सरल स्वर में बोले—बेटीए लेटी रहोए तुम्हें उठने में कष्ट होगा। लोए मैं बैठ जाता हूँए तुम्हारे पापा से मेरा परिचय हैए पर क्या मालूम था कि तुम मि. सेवक की बेटी हो। मैंने उन्हें बुलाया हैए लेकिन मैं कहे देता हूँए मैं अभी तुम्हें न जाने दूँगा। यह कमरा अब तुम्हारा हैए और यहाँ से चले जाने पर भी तुम्हें एक बार नित्य यहाँ आना पड़ेगा। (रानी से) जाह्नवीए यहाँ प्यानो मँगवाकर रख दो। आज मिस सोहराबजी को बुलवाकर सोफिया का एक तैल चित्र खिंचवाओ। सोहराबजी ज्यादा कुशल हैय पर मैं नहीं चाहता कि सोफिया को उनके सामने बैठना पड़े। वह चित्र हमें याद दिलाता रहेगा कि किसने महान्‌ संकट के अवसर पर हमारी रक्षा की।

रानी—कुछ नाज भी दान करा दूँघ्

यह कहकर रानी ने डॉक्टर गांगुली की ओर देखकर अॉंखें मटकाईं। कुँवर साहब तुरंत बोले—फिर वही ढ़कोसले! इस जमाने में जो दरिद्र हैए उसे दरिद्र होना चाहिएए जो भूखों मरता हैए उसे भूखों मरना चाहिएय जब घंटे—दो घंटे की मिहनत से खाने—भर को मिल सकता हैए तो कोई सबब नहीं कि क्यों कोई आदमी भूखों मरे। दान ने हमारी जाति में जितने आलसी पैदा कर दिए हैंए उतने सब देशों ने मिलकर भी न पैदा किए होंगे। दान का इतना महत्व क्यों रखा गयाए यह मेरी समझ में नहीं आता।

रानी—ऋषियों ने भूल की कि तुमसे सलाह न ले ली।

कुँवर—हाँए मैं होताए तो साफ कह देता—आप लोग यह आलस्यए कुकर्म और अनर्थ का बीज बो रहे हैं। दान आलस्य का मूल है और आलस्य सब पापों का मूल है। इसलिए दान ही सब पापों का मूल हैए कम—से—कम पोषक तो अवश्य ही है। दान नहींए अगर जी चाहता होए तो मित्रों को एक भोज दे दो।

डॉक्टर गांगुली—सोफियाए तुम राजा साहब का बात सुनता हैघ् तुम्हारा प्रभु मसीह तो दान को सबसे बढ़़कर महत्व देता हैए तुम कुँवर साहब से कुछ नहीं कहताघ्

सोफिया ने इंदु की ओर देखाए और मुस्कराकर अॉंखें नीची कर लींए मानो कह रही थी कि मैं इनका आदर करती हूँए नहीं तो जवाब देने में असमर्थ नहीं हूँ।

सोफिया मन ही मन इन प्राणियों के पारस्परिक प्रेम की तुलना अपने घरवालों से कर रही थी। आपस में कितनी मुहब्बत है। माँ—बाप दोनों इंदु पर प्राण देते हैं। एक मैं अभागिनी हूँ कि कोई मुँह भी नहीं देखना चाहता। चार दिन यहाँ पड़े हो गएए किसी ने खबर तक न ली। किसी ने खोज ही न की होगी। मामा ने तो समझा होगाए कहीं डूब मरी। मन में प्रसन्न हो रही होंगी कि अच्छा हुआए सिर से बला टली। मैं ऐसे सहृदय प्राणियों में रहने योग्य नहीं हूँ। मेरी इनसे क्या बराबरी।

यद्यपि यहाँ किसी के व्यवहार में दया की झलक भी न थीए लेकिन सोफिया को उन्हें अपना इतना आदर—सत्कार करते देखकर अपनी दीनावस्था पर ग्लानि होती थी। इंदु से भी शिष्टाचार करने लगी। इंदु उसे प्रेम से श्तुमश् कहती थीय पर वह उसे श्आपश् कहकर सम्बोधित करती थी।

कुँवर साहब कह गए थेए मैंने मि. सेवक को सूचना दे दी हैए वह आते ही होंगे। सोफिया को अब यह भय होने लगा कि कहीं वह आ न रहे हों। आते—ही—आते मुझे अपने साथ चलने को कहेंगे। मेरे सिर फिर वही विपत्ति पड़ेगी। इंदु से अपनी विपत्ति कथा कहूँए तो शायद उसे मुझसे कुछ सहानुभूति हो। वह नौकरानी यहाँ व्यर्थ ही बैठी हुई है। इंदु आई भीए तो उससे कैसे बातें करूँगी। पापा के आने के पहले एक बार इंदु से एकांत में मिलने का मौका मिल जाताए तो अच्छा होता। क्या करूँए इंदु को बुला भेजूँघ् न जाने क्या करने लगी। प्यानो बजाऊँए तो शायद सुनकर आए।

उधार इंदु भी सोफिया से कितनी ही बातें करना चाहती थी। रानीजी के सामने उसे दिल की बातें करने का अवसर न मिला था। डर रही थी कि सोफिया के पिता उसे लेते गएए तो मैं फिर अकेली हो जाऊँगी। डॉक्टर गांगुली ने कहा था कि इन्हें ज्यादा बातें मत करने देनाए आज और आराम से सो लेंए तो फिर कोई चिंता न रहेगी। इसलिए वह आने का इरादा करके भी रह जाती थी। आखिर नौ बजते—बजते वह अधीर हो गई। आकर नौकरानी को अपना कमरा साफ करने के बहाने से हटा दिया और सोफिया के सिरहाने बैठकर बोली—क्यों बहनए बहुत कमजोरी तो नहीं मालूम होतीघ्

सोफिया—बिल्कुल नहीं। मुझे तो मालूम होता है कि मैं चंगी हो गई।

इंदु—तुम्हारे पापा कहीं तुम्हें अपने साथ ले गएए तो मेरे प्राण निकल जाएँगे। तुम भी उनकी राह देख रही हो। उनके आते ही खुश होकर चली जाओगीए और शायद फिर कभी याद न करोगी।

यह कहते—कहते इंदु की अॉंखें सजल हो गईं। मनोभावों के अनुचित आवेश को हम बहुधा मुस्कराहट से छिपाते हैं। इंदु की अॉंखों में आँसू भरे हुए थेए पर वह मुस्करा रही थी।

सोफिया बोली—आप मुझे भूल सकती हैंए पर मैं आपको कैसे भूलूँगीघ्

वह अपने दिल का दर्द सुनाने ही जा रही थी कि संकोच ने आकर जबान बंद कर दीए बात फेरकर बोली—मैं कभी—कभी आपसे मिलने आया करूँगी।

इंदु—मैं तुम्हें यहाँ से अभी पंद्रह दिन तक न जाने दूँगी। धर्म बाधक न होताए तो कभी न जाने देती। अम्माँजी तुम्हें अपनी बहू बनाकर छोड़तीं। तुम्हारे ऊपर बेतरह रीझ गई हैं। जहाँ बैठती हैंए तुम्हारी ही चर्चा करती हैं। विनय भी तुम्हारे हाथों बिका हुआ—सा जान पड़ता है। तुम चली जाओगीए तो सबसे ज्यादा दुरूख उसी को होगा। एक बात भेद की तुमसे कहती हूँ। अम्माँजी तुम्हें कोई चीज तोहफा समझकर देंए तो इनकार मत करनाए नहीं तो उन्हें बहुत दुरूख होगा।

इस प्रेममय आग्रह ने संकोच का लंगर उखाड़ दिया। जो अपने घर में नित्य कटु शब्द सुनने का आदी होए उसके लिए उतनी मधुर सहानुभूति काफी से ज्यादा थी। अब सोफी को इंदु से अपने मनोभावों को गुप्त रखना मैत्री के नियमों के विरुध्द प्रतीत हुआ। करुण स्वर में बोली—इंदुए मेरा वश चलता तो कभी रानी के चरणों को न छोड़तीए पर अपना क्या काबू हैघ् यह स्नेह और कहाँ मिलेगाघ्

इंदु यह भाव न समझ सकी। अपनी स्वाभाविक सरलता से बोली—कहीं विवाह की बातचीत हो रही है क्याघ्

उसकी समझ में विवाह के सिवा लड़कियों के इतना दुरूखी होने का कोई कारण न था।

सोफिया—मैंने तो इरादा कर लिया है कि विवाह न करूँगी।

इंदु—क्योंघ्

सोफिया—इसलिए कि विवाह से मुझे अपनी धार्मिक स्वाधीनता त्याग देनी पड़ेगी। धर्म विचार—स्वतंत्रता का गला घोंट देता है। मैं अपनी आत्मा को किसी मत के हाथ नहीं बेचना चाहती। मुझे ऐसा ईसाई पुरुष मिलने की आशा नहींए जिसका हृदय इतना उदार हो कि वह मेरी धार्मिक शंकाओं को दरगुजर कर सके। मैं परिस्थिति से विवश होकर ईसा को खुदा का बेटा और अपना मुक्तिदाता नहीं मान सकतीए विवश होकर गिरजाघर में ईश्वर की प्रार्थना करने नहीं जाना चाहती। मैं ईसा को ईश्वर नहीं मान सकती।

इंदु—मैं तो समझती थीए तुम्हारे यहाँ हम लोगों के यहाँ से कहीं ज्यादा आजादी हैय जहाँ चाहोए अकेली जा सकती हो। हमारा तो घर से निकलना मुश्किल है।

सोफिया—लेकिन इतनी धार्मिक संकीर्णता तो नहीं हैघ्

इंदु—नहींए कोई किसी को पूजा—पाठ के लिए मजबूर नहीं करता। बाबूजी नित्य गंगास्नान करते हैंए घंटों शिव की आराधाना करते हैं। अम्माँजी कभी भूलकर भी स्नान करने नहीं जातींए न किसी देवता की पूजा करती हैंय पर बाबूजी कभी आग्रह नहीं करते। भक्ति तो अपने विश्वास और मनोवृत्ति पर ही निर्भर है। हम भाई—बहन के विचारों में आकाश—पताल का अंतर है। मैं कृष्ण की उपासिका हूँए विनय ईश्वर के अस्तित्व को भी स्वीकार नहीं करताय पर बाबूजी हम लोगों से कभी कुछ नहीं कहतेए और न हम भाई—बहन में कभी इस विषय पर वाद—विवाद होता है।

सोफिया—हमारी स्वाधीनता लौकिक और इसलिए मिथ्या है। आपकी स्वाधीनता मानसिक और इसलिए सत्य है। असली स्वाधीनता वही हैए जो विचार के प्रवाह में बाधक न हो।

इंदु—तुम गिरजे में कभी नहीं जातींघ्

सोफिया—पहले दुराग्रह—वश जाती थीए अबकी नहीं गई। इस पर घर के लोग बहुत नाराज हुए। बुरी तरह तिरस्कार किया गया।

इंदु ने प्रेममयी सरलता से कहा—वे लोग नाराज हुए होंगेए तो तुम बहुत रोयी होगी। इन प्यारी अॉंखों से आँसू बहे होंगे। मुझसे किसी का रोना नहीं देखा जाता।

सोफिया—पहले रोया करती थीए अब परवा नहीं करती।

इंदु—मुझे तो कभी कोई कुछ कह देता हैए तो हृदय पर तीर—सा लगता है। दिन—दिन भर रोती ही रह जाती हूँ। आँसू ही नहीं थमते। वह बात बार—बार हृदय में चुभा करती है। सच पूछोए तो मुझे किसी के क्रोध पर रोना नहीं आताए रोना आता है अपने ऊपर कि मैंने उन्हें क्यों नाराज कियाए क्यों मुझसे ऐसी भूल हुई।

सोफिया को भ्रम हुआ कि इंदु मुझे अपनी क्षमाशीलता से लज्जित करना चाहती हैए माथे पर शिकन पड़ गई। बोली—मेरी जगह पर आप होतींए तो ऐसा न कहतीं। आखिर क्या आप अपने धार्मिक विचारों को छोड़ बैठतींघ्

इंदु—यह तो नहीं कह सकती कि क्या करतीय पर घरवालों को प्रसन्न रखने की चेष्टा किया करती।

सोफिया—आपकी माताजी अगर आपको जबरदस्ती कृष्ण की उपासना करने से रोकेंए तो आप मान जाएँगीघ्

इंदु—हाँए मैं तो मान जाऊँगी। अम्माँ को नाराज न करूँगी। कृष्ण तो अंतर्यामी हैंए उन्हें प्रसन्न रखने के लिए उपासना की जरूरत नहीं। उपासना तो केवल अपने मन के संतोष के लिए है।

सोफिया—(आश्चर्य से) आपको जरा भी मानसिक पीड़ा न होगीघ्

इंदु—अवश्य होगीय पर उनकी खातिर मैं सह लूँगी।

सोफिया—अच्छाए अगर वह आपकी इच्छा के विरुध्द आपका विवाह करना चाहें तोघ्

इंदु—(लजाते हुए) वह समस्या तो हल हो चुकी। माँ—बाप ने जिससे उचित समझाए कर दिया। मैंने जबान तक नहीं खोली।

सोफिया—अरेए यह कबघ्

इंदु—इसे तो दो साल हो गए। (अॉंखें नीची करके) अगर मेरा अपना वश होताए तो उन्हें कभी न वरतीए चाहे कुँवारी ही रहती। मेरे स्वामी मुझसे प्रेम करते हैंए धान की कोई कमी नहीं। पर मैं उनके हृदय के केवल चतुथार्ंश की अधिकारिणी हूँए उसके तीन भाग सार्वजनिक कामों में भेंट होते हैं। एक के बदले चौथाई पाकर कौन संतुष्ट हो सकता हैघ् मुझे तो बाजरे की पूरी बिस्कुट के चौथाई हिस्से से कहीं अच्छी मालूम होती है। क्षुधा तो तृप्त हो जाती हैए जो भोजन का यथार्थ उद्देश्य है।

सोफिया—आपकी धार्मिक स्वाधीनता में तो बाधा नहीं डालतेघ्

इंदु—नहीं। उन्हें इतना अवकाश कहाँघ्

सोफिया—तब तो मैं आपको मुबारकबाद दूँगी।

इंदु—अगर किसी कैदी को बधाई देना उचित होए तो शौक से दो।

सोफिया—बेड़ी प्रेम की हो तोघ्

इंदु—ऐसा होताए तो मैं तुमसे बधाई देने को आग्रह करती। मैं बँधा गईए वह मुक्त हैं। मुझे यहाँ आए तीन महीने होने आते हैंय पर तीन बार से ज्यादा नहीं आएय और वह भी एक—एक घंटे के लिए। इसी शहर में रहते हैंए दस मिनट में मोटर आ सकती हैय पर इतनी फुर्सत किसे है। हाँए पत्रों से अपनी मुलाकात का काम निकालना चाहते हैंए और वे पत्र भी क्या होते हैंए आदि से अंत तक अपने दुरूखड़ों से भरे हुए। आज यह काम हैए कल वह काम हैय इनसे मिलने जाना हैए उनका स्वागत करना है। म्युनिसिपैलिटी के प्रधान क्या हो गएए राज्य मिल गया। जब देखोए वही धुन सवार! और सब कामों के लिए फुर्सत है। अगर फुर्सत नहीं हैए तो सिर्फ यहाँ आने की। मैं तुम्हें चिताए देती हूँए किसी देश—सेवक से विवाह न करनाए नहीं तो पछताओगी। तुम उसके अवकाश के समय की मनोरंजन—सामग्री—मात्रा रहोगी।

सोफिया—मैं तो पहले ही अपना मन स्थिर कर चुकीय सबसे अलग—ही—अलग रहना चाहती हूँए जहाँ मेरी स्वाधीनता में बाधा डालनेवाला कोई न हो। मैं सत्पथ पर रहूँगीए या कुपथ पर चलूँगीए यह जिम्मेवारी भी अपने ही सिर लेना चाहती हूँ। मैं बालिग हूँ और अपना नफा—नुकसान देख सकती हूँ। आजन्म किसी की रक्षा में नहीं रहना चाहतीय क्योंकि रक्षा का कार्य पराधीनता के सिवा और कुछ नहीं।

इंदु—क्या तुम अपने मामा और पापा के अधीन नहीं रहना चाहतींघ्

सोफिया—नए पराधीनता में प्रकार का नहींए केवल मात्राओं का अंतर है।

इंदु—तो मेरे ही घर क्यों नहीं रहतींघ् मैं इसे अपना सौभाग्य समझ्रूगी! और अम्माँजी तो तुम्हें अॉंखों की पुतली बनाकर रखेंगी। मैं चली जाती हूँए तो वह अकेले घबराया करती हैं। तुम्हें पा जाएँ तो फिर गला न छोड़ें। कहो तो अम्माँ से कहूँघ् यहाँ तुम्हारी स्वाधीनता में कोई दखल न देगा। बोलोए कहूँ जाकर अम्माँ सेघ्

सोफिया—नहींए अभी भूलकर भी नहीं। आपकी अम्माँजी को जब मालूम होगा कि इसके माँ—बाप इसकी बात नहीं पूछतेए मैं उनकी अॉंखों से भी गिर जाऊँगी। जिसकी अपने घर में इज्जत नहींए उसकी बाहर भी इज्जत नहीं होती।

इंदु—नहीं सोफीए अम्माँजी का स्वभाव बिल्कुल निराला है। जिस बात से तुम्हें अपने निरादर का भय हैए वही बात अम्माँजी के आदर की वस्तु है। वह स्वयं अपनी माँ से किसी बात पर नाराज हो गई थींए तब से मैके नहीं गईं। नानी मर गईंय पर अम्माँ ने उन्हें क्षमा नहीं किया। सैकड़ों बुलावे आएय पर उन्हें देखने तक न गईं। उन्हें ज्यों ही यह बात मालूम होगीए तुम्हारी दूनी इज्जत करने लगेंगी।

सोफी ने अॉंखों में आँसू भरकर कहा—बहनए मेरी लाज अब आप ही के हाथ में है।

इंदु ने उसका सिर अपनी जाँघ पर रखकर कहा—वह मुझे अपनी लाज से कम प्रिय नहीं है।

उधार मि. जॉन सेवक को कुँवर साहब का पत्र मिलाए तो जाकर स्त्री से बोले—देखाए मैं कहता न था कि सोफी पर कोई संकट आ पड़ा। यह देखोए कुँवर भरतसिंह का पत्र है। तीन दिनों से उनके घर पड़ी हुई है। उनके एक झोंपड़े में आग लग गई थीए वह भी उसे बुझाने लगी। वहीं लपट में आ गई।

मिसेज सेवक—ये सब बहाने हैं। मुझे उसकी किसी बात पर विश्वास नहीं रहा। जिसका दिल खुदा से फिर गयाए उसे झूठ बोलने का क्या डरघ् यहाँ से बिगड़कर गई थीए समझा होगाए घर से निकलते ही फूलों की सेज बिछी हुई मिलेगी। जब कहीं शरण न मिलीए तो यह पत्र लिखवा दिया। अब आटे—दाल का भाव मालूम होगा। यह भी सम्भव हैए खुदा ने उसके अविचार का यह दंड दिया हो।

मि. जॉन सेवक—चुप भी रहोए तुम्हारी निर्दयता पर मुझे आश्चर्य होता है। मैंने तुम—जैसी कठोर हृदया स्त्री नहीं देखी।

मिसेज सेवक—मैं तो नहीं जाती। तुम्हें जाना होए तो जाओ।

जॉन सेवक—मुझे तो देख रही होए मरने की फुरसत नहीं है। उसी पाँड़ेपुरवाली जमीन के विषय में बातचीत कर रहा हूँ। ऐसे मूँजी से पाला पड़ा है कि किसी तरह चंगुल में नहीं आता। देहातियों को जो लोग सरल कहते हैंए बड़ी भूल करते हैं। इनसे ज्यादा चालाक आदमी मिलना मुश्किल है। तुम्हें इस वक्त कोई काम नहीं हैए मोटर मँगवाए देता हूँए शान से चली जाओए और उसे अपने साथ लेती आओ।

ईश्वर सेवक वहीं आराम—कुरसी पर अॉंखें बंद किए ईश्वर—भजन में मग्न बैठे थे। जैसे बहरा आदमी मतलब की बात सुनते ही सचेत हो जाता हैए मोटरकार का जिक्र सुनते ही धयान टूट गया। बोले—मोटरकार की क्या जरूरत हैघ् क्या दस—पाँच रुपये काट रहे हैं। यों उड़ाने से तो कारूँ का खजाना भी काफी न होगा। क्या गाड़ी पर न जाने से शान में फर्क आ जाएगाघ् तुम्हारी मोटर देखकर कुँवर साहब रोब में न आएँगेए उन्हें खुदा ने बहुतेरी मोटरें दी है। प्रभुए दास को अपनी शरण में लोए अब देर न करोए मेरी सोफी बेचारी वहाँ बेगानों में पड़ी हुई हैए न जाने इतने दिन किस तरह काटे होंगे। खुदा उसे सच्चा रास्ता दिखाए। मेरी अॉंखें उसे ढ़ूँढ़़ रही हैं। वहाँ उस बेचारी का कौन पुछत्तार होगाए अमीरों के घर में गरीबों का कहाँ गुजर!

जॉन सेवक—अच्छा ही हुआ। यहाँ होतीए तो रोजाना डॉक्टर की फीस न देनी पड़तीघ्

ईश्वर सेवक—डॉक्टर का क्या काम था। ईश्वर की दया से मैं खुद थोड़ी—बहुत डॉक्टरी कर लेता हूँ। घरवालों का स्नेह डॉक्टर की दवाओं से कहीं ज्यादा लाभदायक होता है। मैं अपनी बच्ची को गोद में लेकर कलामे—पाक सुनाताए उसके लिए खुदा से दुआ माँगता।

मिसेज सेवक—तो आप ही चले जाइए!

ईश्वर सेवक—सिर और अॉंखों सेए मेरा ताँगा मँगवा दो। हम सबों को चलना चाहिए। भूले—भटके को प्रेम ही सन्मार्ग पर लाता है। मैं भी चलता हूँ। अमीरों के सामने दीन बनना पड़ता है। उनसे बराबरी का दावा नहीं किया जाता।

जॉन सेवक—मुझे अभी साथ न ले जाइएए मैं किसी दूसरे अवसर पर जाऊँगा। इस वक्त वहाँ शिष्टाचार के सिवा और कोई काम न होगा। मैं उन्हें धन्यवाद दूँगाए वह मुझे धन्यवाद देंगे। मैं इस परिचय को दैवी प्रेरणा समझता हूँ। इतमीनान से मिलूँगा। कुँवर साहब का शहर में बड़ा दबाव है। म्युनिसिपैलिटी के प्रधान उनके दामाद हैं। उनकी सहायता से मुझे पाँड़ेपुरवाली जमीन बड़ी आसानी से मिल जाएगी। सम्भव हैए वह कुछ हिस्से भी खरीद लें। मगर आज इन बातों का मौका नहीं है।

ईश्वर सेवक—मुझे तुम्हारी बुध्दि पर हँसी आती है। जिस आदमी से राह—रस्म पैदा करके तुम्हारे इतने काम निकल सकते हैंए उससे मिलने में भी तुम्हें इतना संकोचघ् तुम्हारा समय इतना बहुमूल्य है कि आधा घंटे के लिए भी वहाँ नहीं जा सकतेघ् पहली ही मुलाकात में सारी बातें तय कर लेना चाहते होघ् ऐसा सुनहरा अवसर पाकर भी तुम्हें उससे फायदा उठाना नहीं आताघ्

जॉन सेवक—खैरए आपका अनुरोध हैए तो मैं ही चला जाऊँगा। मैं एक जरूरी काम कर रहा थाए फिर कर लूँगा। आपको कष्ट करने की जरूरत नहीं। (स्त्री से) तुम तो चल रही होघ्

मिसेज सेवक—मुझे नाहक ले चलते होय मगर खैरए चलो।

भोजन के बाद चलना निश्चित हुआ। अंगरेजी प्रथा के अनुसार यहाँ दिन का भोजन एक बजे होता था। बीच का समय तैयारियों में कटा। मिसेज सेवक ने अपने आभूषण निकालेए जिनसे वृध्दावस्था ने भी उन्हें विरक्त नहीं किया था। अपना अच्छे—से—अच्छा गाउन और ब्लाउज निकाला। इतना शृंगार वह अपनी बरस—गाँठ के सिवा और किसी उत्सव में न करती थीं। उद्देश्य था सोफिया को जलानाए उसे दिखाना कि तेरे आने से मैं रो—रोकर मरी नहीं जा रही हूँ। कोचवान को गाड़ी धोकर साफ करने का हुक्म दिया गया। प्रभु सेवक को भी साथ ले चलने की राय हुई। लेकिन जॉन सेवक ने जाकर उसके कमरे में देखाए तो उसका पता न था। उसकी मेज पर एक दर्शन—ग्रंथ खुला पड़ा था। मालूम होता थाए पढ़़ते—पढ़़ते उठकर कहीं चला गया है। वास्तव में यह ग्रंथ तीन दिनों से इसी भाँति पड़ा हुआ था। प्रभु सेवक को उसे बंद करके रख देने का अवकाश न था। वह प्रातरूकाल से दो घड़ी रात तक शहर का चक्कर लगाया करता। केवल दो बार भोजन करने घर आता था। ऐसा कोई स्कूल न थाए जहाँ उसने सोफी को न ढ़ूँढ़़ा हो। कोई जान—पहचान का आदमीए कोई मित्र ऐसा न थाए जिसके घर जाकर उसने तलाश न की हो। दिन—भर की दौड़—धूप के बाद रात को निराश होकर लौट आताए और चारपाई पर लेटकर घंटों सोचता और रोता। कहाँ चली गईघ् पुलिस के दफ्तर में दिन—भर में दस—दस बार जाता और पूछताए कुछ पता चलाघ् समाचार—पत्रों में भी सूचना दे रखी थी। वहाँ भी रोज कई बार जाकर दरियाफ्त करता। उसे विश्वास होता जाता था कि सोफी हमसे सदा के लिए विदा हो गई। आज भीए रोज की भाँतिए एक बजे थका—माँदाए उदास और निराश लौटकर आयाए तो जॉन सेवक ने शुभ सूचना दी—सोफिया का पता मिल गया।

प्रभु सेवक का चेहरा खिल उठा। बोला—सच! कहाँघ् क्या उसका कोई पत्र आया हैघ्

जॉन सेवक—कुँवर भरतसिंह के मकान पर है। जाओए खाना खा लो। तुम्हें भी वहाँ चलना है।

प्रभु सेवक—मैं तो लौटकर खाना खाऊँगा। भूख गायब हो गई। है तो अच्छी तरहघ्

मिसेज सेवक—हाँए हाँए बहुत अच्छी तरह है। खुदा ने यहाँ से रूठकर जाने की सजा दे दी।

प्रभु सेवक—मामाए खुदा ने आपका दिल न जाने किस पत्थर का बनाया है। क्या घर से आप ही रूठकर चली गई थीघ् आप ही ने उसे निकालाए और अब भी आपको उस पर जरा भी दया नहीं आतीघ्

मिसेज सेवक—गुमराहों पर दया करना पाप है।

प्रभु सेवक—अगर सोफी गुमराह हैए तो ईसाइयों में 100 में 99 आदमी गुमराह हैं! वह धर्म का स्वाँग नहीं दिखाना चाहतीए यही उसमें दोष हैय नहीं तो प्रभु मसीह से जितनी श्रध्दा उसे हैए उतनी उन्हें भी न होगीए जो ईसा पर जान देते हैं।

मिसेज सेवक—खैरए मालूम हो गया कि तुम उसकी वकालत खूब कर सकते हो। मुझे इन दलीलों को सुनने की फुरसत नहीं।

यह कहकर मिसेज सेवक वहाँ से चली गईं। भोजन का समय आया। लोग मेज पर बैठे। प्रभु सेवक आग्रह करने पर भी न गया। तीनों आदमी फिटन पर बैठेए तो ईश्वर सेवक ने चलते—चलते जॉन सेवक से कहा—सोफी को जरूर साथ लानाए और इस अवसर को हाथ से न जाने देना। प्रभु मसीह तुम्हें सुबुध्दि देए सफल मनोरथ करें।

थोड़ी देर में फिटन कुँवर साहब के मकान पर पहुँच गई। कुँवर साहब ने बड़े तपाक से उनका स्वागत किया। मिसेज सेवक ने मन में सोचा थाए मैं सोफिया से एक शब्द भी न बोलूँगीए दूर से खड़ी देखती रहूँगी। लेकिन जब सोफिया के कमरे में पहुँची और उसका मुरझाया हुआ चेहरा देखाए तो शोक से कलेजा मसोस उठा। मातृस्नेह उबल पड़ा। अधीर होकर उससे लिपट गईं। अॉंखों से आँसू बहने लगे। इस प्रवाह में सोफिया का मनोमालिन्य बह गया। उसने दोनों हाथ माता की गर्दन में डाल दिएए और कई मिनट तक दोनों प्रेम का स्वर्गीय आनंद उठाती रहीं। जॉन सेवक ने सोफिया का माथा चूमाय किंतु प्रभु सेवक अॉंखों में आँसू—भरे उसके सामने खड़ा रहा। आलिंगन करते हुए उसे भय होता था कि कहीं हृदय फट न जाए। ऐसे अवसरों पर उसके भाव और भाषाए दोनों ही शिथिल हो जाते थे।

जब जॉन सेवक सोफी को देखकर कुँवर साहब के साथ बाहर चले गएए तो मिसेज सेवक बोलीं—तुझे उस दिन क्या सूझी कि यहाँ चली आईघ् यहाँ अजनबियों में पड़े—पड़े तेरी तबीयत घबराती रही होगी। ये लोग अपने धान के घमंड में तेरी बात भी न पूछते होंगे।

सोफिया—नहीं मामाए यह बात नहीं है। घमंड तो यहाँ किसी में छू भी नहीं गया है। सभी सहृदयता और विनय के पुतले हैं। यहाँ तक कि नौकर—चाकर भी इशारों पर काम करते हैं। मुझे आज चौथे दिन होश आया है। पर इन लोगों ने इतने प्रेम से सेवा—शुश्रूषा न की होतीए तो शायद मुझे हफ्तों बिस्तर पर पड़े रहना पड़ता। मैं अपने घर में भी ज्यादा—से—ज्यादा इतने ही आराम से रहती।

मिसेज सेवक—तुमने अपनी जान जोखिम में डाली थीए तो क्या ये लोग इतना भी करने से रहेघ्

सोफिया—नहीं मामाए ये लोग अत्यंत सुशील और सज्जन हैं। खुद रानीजी प्रायरू मेरे पास बैठी पंखा झलती रहती हैं। कुँवर साहब दिन में कई बार आकर देख जाते हैंए और इंदु से तो मेरा बहनापा—सा हो गया है। यही लड़की हैए जो मेरे साथ नैनीताल में पढ़़ा करती थी।

मिसेज सेवक—(चिढ़़कर) तुझे दूसरों में सब गुण—ही—गुण नजर आते हैं। अवगुण सब घरवालों ही के हिस्से में पड़े हैं। यहाँ तक कि दूसरे धर्म भी अपने धर्म से अच्छे हैं।

प्रभु सेवक—मामाए आप तो जरा—जरा—सी बात पर तिनक उठती हैं। अगर कोई अपने साथ अच्छा बरताव करेए तो क्या उसका एहसान न माना जाएघ् कृतघ्नता से बुरा कोई दूषण नहीं है।

मिसेज सेवक—यह कोई आज नई बात थोड़े ही है। घरवालों की निंदा तो इसकी आदत हो गई है। यह मुझे जताना चाहती है कि ये लोग इसके साथ मुझसे ज्यादा प्रेम करते हैं। देखूँए यहाँ से जाती हैए तो कौन—सा तोहफा दे देते हैं। कहाँ हैं तेरी रानी साहबघ् मैं भी उन्हें धन्यवाद दे दूँ। उनसे आज्ञा ले लो और घर चलो। पापा अकेले घबरा रहे होंगे।

सोफिया—वह तो तुमसे मिलने को बहुत उत्सुक थीं। कब की आ गई होतींए पर कदाचित्‌ हमारी बीच में बिना बुलाए आना अनुचित समझती होंगी।

प्रभु सेवक—मामाए अभी सोफी को यहाँ दो—चार दिन और आराम से पड़ी रहने दीजिए। अभी इसे उठने में कष्ट होगा। देखिएए कितनी दुर्बल हो गई है!

सोफिया—रानीजी भी यही कहती थीं कि अभी मैं तुम्हें जाने न दूँगी।

मिसेज सेवक—यह क्यों नहीं कहती कि तेरा ही जी यहाँ से जाने को नहीं चाहता। वहाँ तेरा इतना प्यार कौन करेगा!

सोफिया—नहीं मामाए आप मेरे साथ अन्याय कर रही हैं। मैं अब यहाँ एक दिन भी नहीं रहना चाहती। इन लोगों को मैं अब और कष्ट नहीं दूँगी। मगर एक बात मुझे मालूम हो जानी चाहिए। मुझ पर फिर तो अत्याचार न किया जाएगाघ् मेरी धार्मिक स्वतंत्रता में फिर तो कोई बाधा न डाली जाएगीघ्

प्रभु सेवक—सोफीए तुम व्यर्थ इन बातों की क्यों चर्चा करती होघ् तुम्हारे साथ कौन—सा अत्याचार किया जाता हैघ् जरा—सी बात का बतंगड़ बनाती हो।

मिसेज सेवक—नहींए तूने यह बात पूछ लीए बहुत अच्छा कया। मैं भी मुगालते में नहीं रखना चाहती। मेरे घर में प्रभु मसीह के द्रोहियों के लिए जगह नहीं है।

प्रभु सेवक—आप नाहक उससे उलझती हैं। समझ लीजिएए कोई पगली बक रही है।

मिसेज सेवक—क्या करूँए मैंने तुम्हारी तरह दर्शन नहीं पढ़़ा। यथार्थ को स्वप्न नहीं समझ सकती। यह गुण तो तत्तवज्ञानियों ही में हो सकता है। यह मत समझो कि मुझे अपनी संतान से प्रेम नहीं है। खुदा जानता हैए मैंने तुम्हारी खातिर क्या—क्या कष्ट नहीं झेले। उस समय तुम्हारे पापा एक दफ्तर में क्लर्क थे। घर का सारा काम—काज मुझी को करना पड़ता था। बाजार जातीए खाना पकातीए झाड़ई लगातीय तुम दोनों ही बचपन में कमजोर थेए नित्य एक—न—एक रोग लगा ही रहता था। घर के कामों से जरा फुरसत मिलती तो डॉक्टर के पास जाती। बहुधा तुम्हें गोद में लिए—ही—लिए रातें कट जातीं। इतने आत्मसमर्पण से पाली हुई संतान को जब ईश्वर से विमुख होते देखती हूँए तो मैं दुरूख और क्रोध से बावली हो जाती हूँ। तुम्हें मैं सच्चाए ईमान का पक्काए मसीह का भक्त बनाना चाहती थी। इसके विरुध्द जब तुम्हें ईसू से मुँह मोड़ते देखती हूँय उनके उपदेशए उनके जीवन और उनके अलौकिक कृत्यों पर शंका करते पाती हूँए तो मेरे हृदय के टुकड़े—टुकड़े हो जाते हैंए और यही इच्छा होती है कि इसकी सूरत न देखूँ। मुझे अपना मसीह सारे सांसर सेए यहाँ तक कि अपनी जान से भी प्यारा है।

सोफिया—आपको ईसू इतना प्यारा हैए तो मुझे भी अपनी आत्माए अपना ईमान उससे कम प्यारा नहीं है। मैं उस पर किसी प्रकार का अत्याचार नहीं सह सकती।

मिसेज सेवक—खुदा तुझे इस अभक्ति की सजा देगा। मेरी उससे यही प्रार्थना है कि वह फिर मुझे तेरी सूरत न दिखाए।

यह कहकर मिसेज सेवक कमरे के बाहर निकल आईं। रानी और इंदु उधार से आ रही थीं। द्वार पर उनसे भेंट हो गई। रानीजी मिसेज सेवक के गले लिपट गई और कृतज्ञतापूर्ण शब्दों का दरिया बहा दिया। मिसेज सेवक को इस साधु प्रेम में बनावट की बू आई। लेकिन रानी को मानव—चरित्र का ज्ञान न था। इंदु से बोलीं—देखए मिस सोफिया से कह देए अभी जाने की तैयारी न करे। मिसेज सेवकए आप मेरी खातिर से सोफिया को अभी दो—चार दिन यहाँ रहने देंए मैं आपसे सविनय अनुरोध करती हूँ। अभी मेरा मन उसकी बातोें से तृप्त नहीं हुआए और न उसकी कुछ सेवा ही कर सकी। मैं आपसे वादा करती हूँए मैं स्वयं उसे आपके पास पहुँचा दूँगी। जब तक वह यहाँ रहेगीए आपसे दिन में एक बार भेंट तो होती ही रहेगीघ् धान्य हैं आपए जो ऐसी सुशीला लड़की पाई! दया और विवेक की मूर्ति है। आत्मत्याग तो इसमें कूट—कूटकर भरा हुआ है।

मिसेज सेवक—मैं इसे अपने साथ चलने के लिए मजबूर नहीं करती। आप जितने दिन चाहेंए शौक से रखें।

रानी—बस—बसए मैं इतना ही चाहती थी। आपने मुझे मोल ले लिया। आपसे ऐसी ही आशा भी थी। आप इतनी सुशीला न होतींए तो लड़की में ये गुण कहाँ से आतेघ् एक मेरी इंदु है कि बातें करने का भी ढ़ंग नहीं जानती। एक बड़ी रियासत की रानी हैय पर इतना भी नहीं जानती कि मेरी वार्षिक आय कितनी है! लाखों के गहने संदूक में पड़े हुए हैंए उन्हें छूती तक नहीं। हाँए सैर करने को कह दीजिएए तो दिन—भर घूमा करे। क्यों इंदुए झूठ कहती हूँघ्

इंदु—तो क्या करूँए मन—भर सोना लादे बैठी रहूँघ् मुझे तो इस तरह अपनी देह को जकड़ना अच्छा नहीं लगता।

रानी—सुनीं आपने इसकी बातेंघ् गहनों से इसकी देह जकड़ जाती है! आइएए अब आपको अपने घर की सैर कराऊँ। इंदुए चाय बनाने को कह दे।

मिसेज सेवक—मिस्टर सेवक बाहर खड़े मेरा इंतजार कर रहे होंगे। देर होगी।

रानी—वाहए इतनी जल्दी। कम—से—कम आज यहाँ भोजन तो कर ही लीजिएगा। लंच करके हवा खाने चलेंए फिर लौटकर कुछ देर गप—शप करें। डिनर के बाद मेरी मोटर आपको घर पहुँचा देगी।

मिसेज सेवक इनकार न कर सकीं। रानीजी ने उनका हाथ पकड़ लियाए और अपने राजभवन की सैर कराने लगीं। आधा घंटे तक मिसेज सेवक मानो इंद्र—लोक की सैर करती रहीं। भवन क्या थाए आमोदए विलासए रसज्ञता और वैभव का क्रीड़ास्थल था। संगमरमर के फर्श पर बहुमूल्य कालीन बिछे हुए थे। चलते समय उनमें पैर धाँस जाते थे। दीवारों पर मनोहर पच्चीकारीय कमरों की दीवारों में बड़े—बड़े आदम—कद आईनेय गुलकारी इतनी सुंदर कि अॉंखें मुग्धा हो जाएँय शीशे की अमूल्य—अलभ्य वस्तुएँए प्राचीन चित्रकारों की विभूतियाँय चीनी के विलक्षण गुलदानय जापानए चीनए यूनान और ईरान की कला—निपुणता के उत्ताम नमूनेय सोने के गमलेय लखनऊ की बोलती हुई मूर्तियाँय इटली के बने हुए हाथी—दाँत के पलँगय लकड़ी के नफीस ताकय दीवारगीरेंय किश्तियाँय अॉंखों को लुभानेवालीए पिंजड़ों में चहकती हुई भाँति—भाँति की चिड़ियाँय अॉंगन में संगमरमर का हौज और उसके किनारे संगमरमर की अप्सराएँ—मिसेज सेवक ने इन सारी वस्तुओं में से किसी की प्रशंसा नहीं कीए कहीं भी विस्मय या आनंद का एक शब्द भी मुँह से न निकला। उन्हें आनंद के बदलेर् ईर्ष्‌या हो रही थी।र् ईर्ष्‌या में गुणग्राहकता नहीं होती। वह सोच रही थीं—एक यह भाग्यवान्‌ हैं कि ईश्वर ने इन्हें भोग—विलास और आमोद—प्रमोद की इतनी सामग्रियाँ प्रदान कर रखी हैं। एक अभागिनी मैं हूँ कि एक झोंपड़े में पड़ी हुई दिन काट रही हूँ। सजावट और बनावट का जिक्र ही क्याए आवश्यक वस्तुएँ भी काफी नहीं। इस पर तुर्रा यह कि हम प्रातरू से संध्या तक छाती फाड़कर काम करती हैंए यहाँ कोई तिनका तक नहीं उठाता। लेकिन इसका क्या शोकघ् आसमान की बादशाहत में तो अमीरों का हिस्सा नहीं। वह तो हमारी मीरास होगी। अमीर लोग कुत्तों की भाँति दुतकारे जाएँगेए कोई झाँकने तक न पाएगा।

इस विचार से उन्हें कुछ तसल्ली हुई।र् ईर्ष्‌या की व्यापकता ही साम्यवाद की सर्वप्रियता का कारण है। रानी साहब को आश्चर्य हो रहा था कि इन्हें मेरी कोई चीज पसंद न आईए किसी वस्तु का बखान न किया। मैंने एक—एक चित्र और एक—एक प्याले के लिए हजारों खर्च किए हैं। ऐसी चीजें यहाँ और किसके पास हैं। अब अलभ्य हैंए लाखों में भी न मिलेंगी। कुछ नहींए बन रही हैंए या इतना गुण—ज्ञान ही नहीं है कि इनकी कद्र कर सकें।

इतने पर भी रानीजी को निराशा नहीं हुई। उन्हें अपने बाग दिखाने लगीं। भाँति—भाँति के फूल और पौधो दिखाए। माली बड़ा चतुर था। प्रत्येक पौदे का गुण और इतिहास बतलाता जाता था—कहाँ से आयाए कब आयाए किस तरह लगाया गयाए कैसे उसकी रक्षा की जाती हैय पर मिसेज सेवक का मुँह अब भी न खुला। यहाँ तक कि अंत में उसने एक ऐसी नन्हीं—सी जड़ी दिखाईए जो येरुसलम से लाई गई थी। कुँवर साहब उसे स्वयं बड़ी सावधानी से लाए थेए और उसमें एक—एक पत्ती निकलना उनके लिए एक—एक शुभ सम्वाद से कम न था। मिसेज सेवक ने तुरंत उस गमले को उठा लियाए उसे अॉंखों से लगाया और पत्तिायों को चूमा। बोलीं—मेरी सौभाग्य है कि इस दुर्लभ वस्तु के दर्शन हुए।

रानी ने कहा—कुँवर साहब स्वयं इसका बड़ा आदर करते हैं। अगर यह आज सूख जाएए तो दो दिन तक उन्हें भोजन अच्छा न लगेगा।

इतने में चाय तैयार हुई। मिसेज सेवक लंच पर बैठीं। रानीजी को चाय से रुचि न थी। विनय और इंदु के बारे में बातें करने लगीं। विनय के आचार—विचारए सेवा—भक्ति और परोपकार—प्रेम की सराहना कीए यहाँ तक कि मिसेज सेवक का जी उकता गया। इसके जवाब में वह अपनी संतानों का बखान न कर सकती थीं।

उधार मि. जॉन सेवक और कुँवर साहब दीवानखाने में बैठे लंच कर रहे थे। चाय और अंडों से कुँवर साहब को रुचि न थी। विनय भी इन दोनों वस्तुओं को त्याज्य समझते थे। जॉन सेवक उन मनुष्यों में थेए जिनका व्यक्तित्व शीघ्र ही दूसरों को आकर्षित कर लेता है। उनकी बातें इतनी विचारपूर्ण होती थीं कि दूसरे अपनी बातें भूलकर उन्हीं की सुनने लगते थे। औरए यह बात न थी कि उनका भाषण शब्दाडम्बर—मात्रा होता हो। अनुभवशील और मानव—चरित्र के बड़े अच्छे ज्ञाता थे। ईश्वरदत्ता प्रतिभा थीए जिसके बिना किसी सभा में सम्मान नहीं प्राप्त हो सकता। इस समय वह भारत की औद्योगिक और व्यावसायिक दुर्बलता पर अपने विचार प्रकट कर रहे थे। अवसर पाकर उन साधानों का भी उल्लेख करते जाते थेए जो इस कुदशा—निवारण के लिए उन्होंने सोच रखे थे। अंत में बोले—हमारी जाति का उध्दार कला—कौशल और उद्योग की उन्नति में है। इस सिगरेट के कारखाने से कम—से—कम एक हजार आदमियों के जीवन की समस्या हल हो जाएगी और खेती के सिर से उनका बोझ टल जाएगा। जितनी जमीन एक आदमी अच्छी तरह जोत—बो सकता हैए उसमें घर—भर का लगा रहना व्यर्थ है। मेरा कारखाना ऐसे बेकारों को अपनी रोटी कमाने का अवसर देगा।

कुँवर साहब—लेकिन जिन खेतों में इस वक्त नाज बोया जाता हैए उन्हीं खेतों में तम्बाकू बोई जाने लगेगी। फल यह होगा कि नाज और महँगा हो जाएगा।

जॉन सेवक—मेरी समझ में तम्बाकू की खेती का असर जूटए सनए तेलहन और अफीम पर पड़ेगा। निर्यात जिंस कुछ कम हो जाएगी। गल्ले पर इसका कोई असर नहीं पड़ सकता। फिर हम उस जमीन को भी जोत में लाने का प्रयास करेंगेए जो अभी तक परती पड़ी हुई है।

कुँवर साहब—लेकिन तम्बाकू कोई अच्छी चीज तो नहीं। इसकी गणना मादक वस्तुओं में है और स्वास्थ्य पर इसका बुरा असर पड़ता है।

जॉन सेवक—(हँसकर) ये सब डॉक्टरों की कोरी कल्पनाएँ हैंए जिन पर गम्भीर विचार करना हास्यास्पद है। डॉक्टरों के आदेशानुसार हम जीवन व्यतीत करना चाहेंए तो जीवन का अंत ही हो जाए। दूध में सिल के कीड़े रहते हैंए घी में चरबी की मात्रा अधिक हैए चाय और कहवा उत्तोजक हैंए यहाँ तक कि साँस लेने से भी कीटाणु शरीर में प्रवेश कर जाते हैं। उनके सिध्दांतों के अनुसार समस्त संसार कीटों से भरा हुआ हैए जो हमारे प्राण लेने पर तुले हुए हैं। व्यवसायी लोग इन गोरख—घंधों में नहीं पड़तेय उनका लक्ष्य केवल वर्तमान परिस्थितियों पर रहता है। हम देखे हैं कि इस देश में विदेश से करोड़ों रुपये के सिगरेट और सिगार आते हैं। हमारा कर्तव्य है कि इस धान—प्रवाह को विदेश जाने से रोकें। इसके बगैर हमारा आर्थिक जीवन कभी पनप नहीं सकता।

यह कहकर उन्होंने कुँवर साहब को गर्वपूर्ण नेत्रों से देखा। कुँवर साहब की शंकाएँ बहुत कुछ निवृत्ता हो चुकी थीं। प्रायरू वादी को निरुत्तार होते देखकर हम दिलेर हो जाते हैं। बच्चा भी भागते हुए कुत्तो पर निर्भय होकर पत्थर फेंकता है।

जॉन सेवक निरूशंक होकर बोले—मैंने इन सब पहलुओं पर विचार करके ही यह मत स्थिर कियाए और आपके इस दास को (प्रभु सेवक की ओर इशारा करके) इस व्यवसाय का वैज्ञानिक ज्ञान प्राप्त करने के लिए अमेरिका भेजा। मेरी कम्पनी के अधिकांश हिस्से बिक चुके हैंए पर अभी रुपये नहीं वसूल हुए। इस प्रांत में अभी सम्मिलित व्यवसाय करने का दस्तूर नहीं। लोगों में विश्वास नहीं। इसलिए मैंने दस प्रति सैकड़े वसूल करके काम शुरू कर देने का निश्चय किया है। साल—दो—साल में जब आशातीत सफलता होगी और वार्षिक लाभ होने लगेगाए तो पूँजी आप—ही—आप दौड़ी आएगी। छत पर बैठा हुआ कबूतर श्आ—आश् की आवाज सुनकर सशंक हो जाता है और जमीन पर नहीं उतरताय पर थोड़ा—सा दाना बखेर दीजिएए तो तुरंत उतर आता है। मुझे पूरा विश्वास है कि पहले ही साल हमें 25 प्रति सैकड़े लाभ होगा। यह प्रास्सपेक्ट्‌स हैए इसे गौर से देखिए। मैंने लाभ का अनुमान करने में बड़ी सावधानी से काम लिया हैय बढ़़ भले ही जाएए कम नहीं हो सकता।

कुँवर साहब—पहले ही साल 25 प्रति सैकड़ेघ्

जॉन सेवक—जी हाँए बड़ी आसानी से। आपसे मैं हिस्से लेने के लिए विनय करताए पर जब तक एक साल का लाभ दिखा न दूँए आग्रह नहीं कर सकता। हाँ इतना अवश्य निवेदन करूँगा कि उस दशा में सम्भव हैए हिस्से बराबर पर न मिल सकें। 100 रुपये के हिस्से शायद 200 रुपये पर मिलें।

कुँवर साहब—मुझे अब एक ही शंका और है। यदि इस व्यवसाय में इतना लाभ हो सकता हैए तो अब तक ऐसी और कम्पनियाँ क्यों न खुलींघ्

जॉन सेवक—(हँसकर) इसलिए कि अभी तक शिक्षित समाज में व्यवसाय—बुध्दि पैदा नहीं हुई। लोगों की नस—नस में गुलामी समाई हुई है। कानून और सरकारी नौकर के सिवा और किसी ओर निगाह जाती ही नहीं। दो—चार कम्पनियाँ खुलीं भीए किंतु उन्हें विशेषज्ञों के परामर्श और अनुभव से लाभ उठाने का अवसर न मिला। अगर मिला भीए तो बड़ा महँगा पड़ा! मशीनरी मँगाने में एक के दो देने पड़ेए प्रबंध अच्छा न हो सका। विवश होकर कम्पनियों को कारबार बंदर करना पड़ा। यहाँ प्रायरू सभी कम्पनियों का यही हाल है। डाइरेक्टरों की थैलियाँ भरी जाती हैंए हिस्से बेचने और विज्ञापन देने में लाखों रुपये उड़ा दिए जाते हैंए बड़ी उदारता से दलालों का आदर—सत्कार किया जाता हैए इमारतों में पूँजी का बड़ा भाग खर्च कर दिया जाता है। मैनेजर भी बहु—वेतन—भोगी रखा जाता है। परिणाम क्या होता हैघ् डाइरेक्टर अपनी जेब भरते हैंए मैनेजर अपना पुरस्कार भोगता हैए दलाल अपनी दलाली लेता हैय मतलब यह कि सारी पूँजी ऊपर—ही—ऊपर उड़ जाती है। मेरा सिध्दांत हैए कम—से—कम खर्च और ज्यादा—से—ज्यादा नफा। मैंने एक कौड़ी दलाली नहीं दीए विज्ञापनों की मद उड़ा दी। यहाँ तक कि मैनेजर के लिए भी केवल 500 रुपये ही वेतन देना निश्चित किया हैए हालाँकि किसी दूसरे कारखाने में एक हजार सहज ही में मिल जाते। उस पर घर का आदमी। डाइरेक्टर के बारे में भी मेरा यही निश्चय है कि सफर—खर्च के सिवा और कुछ न दिया जाए।

कुँवर साहब सांसारिक पुरुष न थे। उनका अधिकांश समय धर्म—ग्रंथों के पढ़़ने में लगता था। वह किसी ऐसे काम में शरीक न होना चाहते थेए जो उनकी धार्मिक एकाग्रता में बाधक हो। धूतोर्ं ने उन्हें मानव—चरित्र का छिद्रान्वेषी बना दिया था। उन्हें किसी पर विश्वास न होता था। पाठशालाओं और अनाथालयों को चंदे देते हुए वह बहुत डरते रहते थे और बहुधा इस विषय में औचित्य की सीमा से बाहर निकल जाते थे—सुपात्राों को भी उनसे निराश होना पड़ता था। पर संयमशीलता जहाँ इतनी सशंक रहती हैए वहाँ लाभ का विश्वास होने पर उचित से अधिक निरूशंक भी हो जाती है। मिस्टर जॉन सेवक का भाषण व्यावसायिक ज्ञान से परिपूर्ण थाय पर कुँवर साहब पर इससे ज्यादा प्रभाव उनके व्यक्तित्व का पड़ा। उनकी द्रष्टि में जॉन सेवक अब केवल धान के उपासक न थेए वरन्‌ हितैषी मित्र थे। ऐसा आदमी उन्हें मुगालता न दे सकता था। बोले—जब आप इतनी किफायत से काम करेंगेए तो आपका उद्योग अवश्य सफल होगाए इसमें कोई संदेह नहीं। आपको शायद अभी मालूम न होए मैंने यहाँ एक सेवा—समिति खोल रखी है। कुछ दिनों से यही खब्त सवार है। उसमें इस समय लगभग एक सौ स्वयंसेवक हैं। मेले—ठेले में जनता की रक्षा और सेवा करना उसका काम है। मैं चाहता हूँ कि उसे आर्थिक कठिनाइयों से सदा के लिए मुक्त कर दूँ। हमारे देश की संस्थाएँ बहुधा धानाभाव के कारण अल्पायु होती हैं। मैं इस संस्था को सु—ढ़़ बनाना चाहता हूँ और मेरी यह हार्दिक अभिलाषा है कि इससे देश का कल्याण हो। मैं किसी से इस काम में सहायता नहीं लेना चाहता। उसके निर्विघ्न संचालन के लिए एक स्थायी कोष की व्यवस्था कर देना चाहता हूँ। मैं आपको अपना मित्र और हितचिंतक समझकर पूछता हूँए क्या आपके कारखाने में हिस्से ले लेने से मेरा उद्देश्य पूरा हो सकता हैघ् आपके अनुमान में कितने रुपये लगाने से एक हजार की मासिक आमदनी हो सकती हैघ्

जॉन सेवक की व्यावसायिक लोलुपता ने अभी उनकी सद्‌भावनाओं को शिथिल नहीं किया था। कुँवर साहब ने उनकी राय पर फैसला छोड़कर उन्हें दुविधा में डाल दिया। अगर उन्हें पहले से मालूम होता कि यह समस्या सामने आवेगीए तो नफा का तखमीना बताने में ज्यादा सावधान हो जाते। गैरों से चालें चलना क्षम्य समझा जाता हैय लेकिन ऐसे स्वार्थ के भक्त कम मिलेंगेए जो मित्रों से दगा करें। सरल प्राणियों के सामने कपट भी लज्जित हो जाता है।

जॉन सेवक ऐसा उत्तर देना चाहते थेए जो स्वार्थ और आत्माए दोनों ही को स्वीकार हो। बोले—कम्पनी की जो स्थिति हैए वह मैंने आपके सामने खोलकर रख दी है। संचालन—विधि भी आपको बतला चुका हूँ। मैंने सफलता के सभी साधानों पर निगाह रखी है। इस पर भी सम्भव है मुझसे भूलें हो गई होंए और सबसे बड़ी बात तो यह है कि मनुष्य विधाता के हाथों का खिलौना—मात्रा है। उसके सारे अनुमानए सारी बुध्दिमत्तााए सारी शुभ—चिंताएँ नैसर्गिक शक्तियों के अधीन हैं। तम्बाकू की उपज बढ़़ाने के लिए किसानों को पेशगी रुपये देने ही पड़ेंगे। एक रात का पाला कम्पनी के लिए घातक हो सकता है। जले हुए सिगरेट का एक टुकड़ा कारखाने को खाक में मिला सकता है। हाँए मेरी परिमित बुध्दि की दौड़ जहाँ तक हैए मैंने कोई बात बढ़़ाकर नहीं कही है। आकस्मिक बाधाओं को देखते हुए आप लाभ के अनुमान में कुछ और कमी कर सकते हैं।

कुँवर साहब—आखिर कहाँ तकघ्

जॉन सेवक—20 रुपये सैकड़े समझिए।

कुँवर साहब—और पहले वर्षघ्

जॉन सेवक—कम—से—कम 15 रुपये प्रति सैकड़े।

कुँवर साहब—मैं पहले वर्ष 10 रुपये और उसके बाद 15 रुपये प्रति सैकड़े पर संतुष्ट हो जाऊँगा।

जॉन सेवक—तो फिर मैं आपसे यही कहूँगा कि हिस्से लेने में विलम्ब न करें। खुदा ने चाहाए तो आपको कभी निराशा न होगी।

सौ—सौ रुपये के हिस्से थे। कुँवर साहब ने 500 हिस्से लेने का वादा किया और बोले—कल पहली किस्त के दस हजार रुपये बैंक द्वारा आपके पास भेज दूँगा।

जॉन सवक की ऊँची—से—ऊँची उड़ान भी यहाँ तक न पहुँची थीय पर वह इस सफलता पर प्रसन्न न हुए। उनकी आत्मा अब भी उनका तिरस्कार कर रही थी कि तुमने एक सरल—हृदय सज्जन पुरुष को धोखा दिया। तुमने देश की व्यावसायिक उन्नति के लिए नहींए अपने स्वार्थ के लिए यह प्रयत्न किया है। देश के सेवक बनकर तुम अपनी पाँचों उँगलियाँ घी में रखना चाहते हो। तुम्हारा मनोवांछित उद्देश्य यही है कि नफे का बड़ा भाग किसी—न—किसी हीले से आप हज्म करो। तुमने इस लोकोक्ति को प्रमाणित कर दिया कि श्बनिया मारे जानए चोर मारे अनजान।श्

अगर कुँवर साहब के सहयोग से जनता में कम्पनी की साख जम जाने का विश्वास न होताए तो मिस्टर जॉन सेवक साफ कह देते कि कम्पनी इतने हिस्से आपको नहीं दे सकती। एक परोपकारी संस्था के धान को किसी संदिग्धा व्यवसाय में लगाकर उसके अस्तित्व को खतरे में डालना स्वार्थपरता के लिए भी कड़घवा ग्रास थाय मगर धान का देवता आत्मा का बलिदान पाए बिना प्रसन्न नहीं होता। हाँए इतना अवश्य हुआ कि अब तक वह निजी स्वार्थ के लिए यह स्वाँग भर रहे थेए उनकी नीयत साफ नहीं थीए लाभ को भिन्न—भिन्न नामों से अपने ही हाथ में रखना चाहते थे। अब उन्होंने निरूस्पृह होकर नेकनीयती का व्यवहार करने का निश्चय किया। बोले—मैं कम्पनी के संस्थापक की हैसियत से इस सहायता के लिए हृदय से आपका अनुगृहीत हूँ। खुदा ने चाहाए तो आपको आज के फैसले पर कभी पछताना न पड़ेगा। अब मैं आपसे एक और प्रार्थना करता हूँ। आपकी कृपा ने मुझे धाृष्ट बना दिया है। मैंने कारखाने के लिए जो जमीन पसंद की हैए वह पाँड़ेपुर के आगे पक्की सड़क पर स्थित है। रेल का स्टेशन वहाँ से निकट है और आस—पास बहुत—से गाँव हैं। रकबा दस बीघे का है। जमीन परती पड़ी हुई है। हाँए बस्ती के जानवर उसमें चरने आया करते हैं। उसका मालिक एक अंधा फकीर है। अगर आप उधार कभी हवा खाने गए होंगेए तो आपने उस अंधे को अवश्य देखा होगा।

कुँवर साहब—हाँ—हाँए अभी तो कल ही गया थाए वही अंधा है नए काला—कालाए दुबला—दुबलाए जो सवारियों के पीछे दौड़ा करता हैघ्

जॉन सेवक—जी हाँए वही—वही। वह जमीन उसकी हैय किंतु वह उसे किसी दाम पर नहीं छोड़ना चाहता। मैं उसे पाँच हजार तक देता थाय पर राजी न हुआ। वह बहुत झक्की—सा है। कहता हैए मैं वहाँ धर्मशालाए मंदिर और तालाब बनवाऊँगा। दिन—भर भीख माँगकर तो गुजर करता हैए उस पर इरादे इतने लम्बे हैं। कदाचित्‌ मुहल्लेवालों के भय से उसे कोई मामला करने का साहस नहीं होता। मैं एक निजी मामले में सरकार से सहायता लेना उचित नहीं समझताय पर ऐसी दशा में मुझे इसके सिवा दूसरा कोई उपाय भी नहीं सूझता। औरए फिर यह बिल्कुल निजी बात भी नहीं है। म्युनिसिपैलिटी और सरकार दोनों ही को इस कारखाने से हजारों रुपये साल की आमदनी होगीए हजारों शिक्षित और अशिक्षित मनुष्यों का उपकार होगा। इस पहलू से देखिएए तो यह सार्वजनिक काम हैए और इसमें सरकार से सहायता लेने में मैं औचित्य का उल्लंघन नहीं करता। आप अगर जरा तवज्जह करेंए तो बड़ी आसानी से काम निकल जाए।

कुँवर साहब—मेरा उस फकीर पर कुछ दबाव नहीं हैए और होता भीए तो मैं उससे काम न लेता।

जॉन सेवक—आप राजा साहब चतारी...

कुँवर साहब—नहींए मैं उनसे कुछ नहीं कह सकता। वह मेरे दामाद हैंए और इस विषय में मेरा उनसे कहना नीति—विरुध्द है। क्या वह आपके हिस्सेदार नहीं हैंघ्

जॉन सेवक—जी नहींए वह स्वयं अतुल सम्पत्ति के स्वामी होकर भी धानियों की उपेक्षा करते हैं। उनका विचार है कि कल—कारखाने पूँजीवालों का प्रभुत्व बढ़़ाकर जनता का अपकार करते हैं। इन्हीं विचारों ने तो उन्हें यहाँ प्रधान बना दिया।

कुँवर साहब—यह तो अपना—अपना सिध्दांत है। हम द्वैधा जीवन व्यतीत कर रहे हैंए और मेरा विचार यह है कि जनतावाद के प्रेमी उच्च श्रेणी में जितने मिलेंगेए उतने निम्न श्रेणी में न मिल सकेंगे। खैरए आप उनसे मिलकर देखिए तो। क्या कहूँए शहर के आस—पास मेरी एक एकड़ जमीन भी नहीं हैए नहीं तो आपको यह कठिनाई न होती। मेरे योग्य और जो काम होए उसके लिए हाजिर हूँ।

जॉन सेवक—जी नहींए मैं आपको और कष्ट देना नहीं चाहताए मैं स्वयं उनसे मिलकर तय कर लूँगा।

कुँवर साहब—अभी तो मिस सोफिया पूर्ण स्वस्थ होने तक यहीं रहेंगी नघ् आपको तो इसमें कोई आपत्ति नहीं हैघ्

जॉन सेवक इस विषय में सिर्फ दो—चार बातें करके यहाँ से विदा हुए। मिसेज सेवक फिटन पर पहले ही से आ बैठी थीं। प्रभु सेवक विनय के साथ बाग में टहल रहे थे। विनय ने आकर जॉन सेवक से हाथ मिलाया। प्रभु सेवक उनसे कल फिर मिलने का वादा करके पिता के साथ चले। रास्ते में बातें होने लगीं।

जॉन सेवक—आज एक मुलाकात में जितना काम हुआए उतना महीनों की दौड़—धूप से भी न हुआ था। कुँवर साहब बड़े सज्जन आदमी हैं। 50 हजार के हिस्से ले लिए। ऐसे ही दो—चार भले आदमी और मिल जाएँए तो बेड़ा पार है।

प्रभु सेवक—इस घर के सभी प्राणी दया और धर्म के पुतले हैं। विनयसिंह जैसा वाक्—मर्मज्ञ नहीं देखा। मुझे तो इनसे प्रेम हो गया।

जॉन सेवक—कुछ काम की बातचीत भी कीघ्

प्रभु सेवक—जी नहींए आपके नजदीक जो काम की बातचीत हैए उन्हें उसमें जरा भी रुचि नहीं। वह सेवा का व्रत ले चुके हैंए और इतनी देर तक अपनी समिति की ही चर्चा करते रहे।

जॉन सेवक—क्या तुम्हें आशा है कि तुम्हारा यह परिचय चतारी के राजा साहब पर भी कुछ असर डाल सकता हैघ् विनयसिंह राजा साहब से हमारा कुछ काम निकलवा सकते हैंघ्

प्रभु सेवक—उनसे कहे कौनए मुझमें तो इतनी हिम्मत नहीं। उन्हें आप स्वदेशानुरागी संन्यासी समझिए। मुझसे अपनी समिति में आने के लिए उन्होंने बहुत आग्रह किया है।

जॉन सेवक—शरीक हो गए नघ्

प्रभु सेवक—जी नहींए कह आया हूँ कि सोचकर उत्तर दूँगा। बिना सोचे—समझे इतना कठिन व्रत क्योंकर धारण कर लेता।

जॉन सेवक—मगर सोचने—समझने में महीनों न लगा देना। दो—चार दिन में आकर नाम लिखा लेना। तब तुम्हें उनसे कुछ काम की बातें करने का अधिकार हो जाएगा। (स्त्री से) तुम्हारी रानीजी से कैसी निभीघ्

मिसेज सेवक—मुझे तो उनसे घृणा हो गई। मैंने किसी में इतना घमंड नहीं देखा।

प्रभु सेवक—मामाए आप उनके साथ घोर अन्याय कर रही हैं।

मिसेज सेवक—तुम्हारे लिए देवी होंगीए मेरे लिए तो नहीं हैं।

जॉन सेवक—यह तो मैं पहले ही समझ गया था कि तुम्हारी उनसे न पटेगी। काम की बातें न तुम्हें आती हैंए न उन्हें। तुम्हारा काम तो दूसरों में ऐब निकालना है। सोफी को क्यों नहीं लाईंघ्

मिसेज सेवक—वह आए भी तोए या जबरन घसीट लातीघ्

जॉन सेवक—आई नहीं या रानी ने आने नहीं दियाघ्

प्रभु सेवक—वह तो आने को तैयार थीए किंतु इसी शर्त पर कि मुझ पर कोई धार्मिक अत्याचार न किया जाए।

जॉन सेवक—इन्हें यह शर्त क्यों मंजूर होने लगी!

मिसेज सेवक—हाँए इस शर्त पर मैं उसे नहीं ला सकती। वह मेरे घर रहेगीए तो मेरी बात माननी पड़ेगी।

जॉन सेवक—तुम दोनों में एक का भी बुध्दि से सरोकार नहीं। तुम सिड़ी होए वह जिद्दी है। उसे मना—मनूकर जल्दी लाना चाहिए।

प्रभु सेवक—अगर मामा अपनी बात पर अड़ी रहेंगीए तो शायद वह फिर घर न जाए।

जॉन सेवक—आखिर जाएगी कहाँघ्

प्रभु सेवक—उसे कहीं जाने की जरूरत ही नहीं। रानी उस पर जान देती हैं।

जॉन सेवक—यह बेल मुँढ़़े चढ़़ने की नहीं है। दो में से एक को दबना पड़ेगा।

लोग घर पहुँचेए तो गाड़ी की आहट पाते ही ईश्वर सेवक ने बड़ी स्नेहमयी उत्सुकता से पूछा—सोफी आ गई नघ् आए तुझे गले लगा लूँ। ईसू तुझे अपने दामन में ले।

जॉन सेवक—पापाए वह अभी यहाँ आने के योग्य नहीं है। बहुत अशक्त हो गई है। दो—चार दिन बाद आवेगी।

ईश्वर सेवक—गजब खुदा का! उसकी यह दशा हैए और तुम सब उसे उसके हाल पर छोड़ आए! क्या तुम लोगों में जरा भी मानापमान का विचार नहीं रहा! बिल्कुल खून सफेद हो गयाघ्

मिसेज सेवक—आप जाकर उसकी खुशामद कीजिएगाए तो आवेगी। मेरे कहने से तो नहीं आई। बच्ची तो नहीं कि गोद में उठा लातीघ्

जॉन सेवक—पापाए वहाँ बहुत आराम से है। राजा और रानीए दोनों ही उसके साथ प्रेम करते हैं। सच पूछिएए तो रानी ही ने उसे नहीं छोड़ा।

ईश्वर सेवक—कुँवर साहब से कुछ काम की बातचीत भी हुईघ्

जॉन सेवक—जी हाँए मुबारक हो। 50 हजार की गोटी हाथ लगी।

ईश्वर सेवक—शुक्र हैए शुक्र हैए ईसूए मुझ पर अपना साया कर। यह कहकर वह फिर आराम—कुर्सी पर बैठ गए।

'''

अध्याय 4

चंचल प्रकृति बालकों के लिए अंधे विनोद की वस्तु हुआ करते हैं। सूरदास को उनकी निर्दय बाल—क्रीड़ाओं से इतना कष्ट होता था कि वह मुँह—अंधोरे घर से निकल पड़ता और चिराग जलने के बाद लौटता। जिस दिन उसे जाने में देर होतीए उस दिन विपत्ति में पड़ जाता था। सड़क परए राहगीरों के सामनेए उसे कोई शंका न होती थीय किंतु बस्ती की गलियों में पग—पग पर किसी दुर्घटना की शंका बनी रहती थी। कोई उसकी लाठी छीनकर भागताय कोई कहता—सूरदासए सामने गङ्‌ढ़ा हैए बाईं तरफ हो जाओ। सूरदास बाएँ घूमताए तो गङ्‌ढ़े में गिर पड़ता। मगर बजरंगी का लड़का घीसू इतना दुष्ट था कि सूरदास को छेड़ने के लिए घड़ी—भर रात रहते ही उठ पड़ता। उसकी लाठी छीनकर भागने में उसे बड़ा आनंद मिलता था।

एक दिन सूर्योदय के पहले सूरदास घर से चलेए तो घीसू एक तंग गली में छिपा हुआ खड़ा था। सूरदास को वहाँ पहुँचते ही कुछ शंका हुई। वह खड़ा होकर आहट लेने लगा। घीसू अब हँसी न रोक सका। झपटकर सूरे का डंडा पकड़ लिया। सूरदास डंडे को मजबूत पकड़े हुए था। घीसू ने पूरी शक्ति से खींचा। हाथ फिसल गयाए अपने ही जोर में गिर पड़ाए सिर में चोट लगीए खून निकल आया। उसने खून देखाए तो चीखता—चिल्लाता घर पहुँचा। बजरंगी ने पूछाए क्यों रोता है रेघ् क्या हुआघ् घीसू ने उसे कुछ जवाब न दिया। लड़के खूब जानते हैं कि किस न्यायशाला में उनकी जीत होगी। आकर माँ से बोला—सूरदास ने मुझे ढ़केल दिया। माँ ने सिर की चोट देखीए तो अॉंखों में खून उतर आया। लड़के का हाथ पकड़े हुए आकर बजरंगी के सामने खड़ी हो गई और बोली—अब इस अंधे की शामत आ गई है। लड़के को ऐसा ढ़केला कि लहूलुहान हो गया। उसकी इतनी हिम्मत! रुपये का घमंड उतार दँगी।

बजरंगी ने शांत भाव से कहा—इसी ने कुछ छेड़ा होगा। वह बेचारा तो इससे आप अपनी जान छिपाता फिरता है।

जमुनी—इसी ने छेड़ा थाए तो भी क्या इतनी बेदर्दी से ढ़केलना चाहिए था कि सिर फूट जाए! अंधों को सभी लड़के छेड़ते हैंय पर वे सबसे लठियाँव नहीं करते फिरते।

इतने में सूरदास भी आकर खड़ा हो गया। मुख पर ग्लानि छाई हुई थी। जमुनी लपककर उसके सामने आई और बिजली की तरह कड़ककर बोली—क्यों सूरेए साँझ होते ही रोज लुटीया लेकर दूध के लिए सिर पर सवार हो जाते हो और अभी घिसुआ ने जरा लाठी पकड़ लीए तो उसे इतनी जोर से धक्का दिया कि सिर फूट गया। जिस पत्ताल में खाते होए उसी में छेद करते हो। क्योंए रुपये का घमंड हो गया है क्याघ्

सूरदास—भगवान्‌ जानते हैंए जो मैंने घीसू को पहचाना हो। समझाए कोई लौंडा होगाए लाठी को मजबूत पकड़े रहा। घीसू का हाथ फिसल गयाए गिर पड़ा। मुझे मालूम होता कि घीसू हैए तो लाठी उसे दे देता। इतने दिन हो गएए लेकिन कोई कह दे कि मैंने किसी लड़के को झूठमूठ मारा है। तुम्हारा ही दिया खाता हूँए तुम्हारे ही लड़के को मारूँगाघ्

जमुनी—नहींए अब तुम्हें घमंड हुआ है। भीख माँगते होए फिर भी लाज नहीं आतीए सबकी बराबरी करने को मरते हो। आज मैं लहू का घूँट पीकर रह गईय नहीं तो जिन हाथों से तुमने उसे ढ़केला हैए उसमें लूका लगा देती।

बजरंगी जमुनी को मना कर रहा थाए और लोग भी समझा रहे थेए लेकिन वह किसी की न सुनती थी। सूरदास अपराधियों की भाँति सिर झुकाए यह वाग्बाण सह रहा था। मुँह से एक शब्द भी न निकालता था।

भैरों ताड़ी उतारने जा रहा थाए रुक गयाए और सूरदास पर दो—चार छींटे उड़ा दिए—जमाना ही ऐसा हैए सब रोजगारों से अच्छा भीख माँगना। अभी चार दिन पहले घर में भूँजी भाँग न थीए अब चार पैसे के आदमी हो गए हैं। पैसे होते हैंए तभी घमंड होता हैय नहीं क्या घमंड करेंगे हम और तुमए जिनकी एक रुपया कमाई हैए तो दो खर्च है!

जगधार औरों से तो भीगी बिल्ली बना रहता थाए सूरदास को धिक्कारने के लिए वह भी निकल पड़ा। सूरदास पछता रहा था कि मैंने लाठी क्यों न छोड़ दीए कौन कहे कि दूसरी लकड़ी न मिलती। जगधार और भैरों के कटु वाक्य को सुन—सुनकर वह और भी दुरूखी हो रहा था। अपनी दीनता पर रोना आता था। सहसा मिठुआ भी आ पहुँचा। वह भी शरारत का पुतला थाए घीसू से भी दो अंगुल बढ़़ा हुआ। जगधार को देखते ही यह सरस पद गा—गाकर चिढ़़ाने लगा—

लालू का लाल मुँहए जगधार का कालाए

जगधार तो हो गया लालू का साला।

भैरों को भी उसने एक स्वरचित पद सुनाया रू

भैरोंए भैरोंए ताड़ी बेचए

या बीबी की साड़ी बेच।

चिढ़़नेवाले चिढ़़ते क्यों हैंए इसकी मीमांसा तो मनोविज्ञान के पंडित ही कर सकते हैं। हमने साधारणतया लोगों को प्रेम और भक्ति के भाव ही से चिढ़़ते देखा है। कोई राम या कृष्ण के नामों से इसलिए चिढ़़ता है कि लोग उसे चिढ़़ाने ही के बहाने से ईश्वर के नाम लें। कोई इसलिए चिढ़़ता है कि बाल—वृंद उसे घेरे रहें। कोई बैंगन या मछली से इसलिए चिढ़़ता है कि लोग इन अखाद्य वस्तुओं के प्रति घृणा करें। सारांश यह कि चिढ़़ना एक दार्शनिक क्रिया है। इसका उद्देश्य केवल सत्—शिक्षा है। लेकिन भैरों और जगधार में यह भक्तिमयी उदारता कहाँघ् वे बाल—विनोद का रस लेना क्या जानेंघ् दोनों झल्ला उठे। जगधार मिठुआ को गाली देने लगाय लेकिन भैरों को गालियाँ देने से संतोष न हुआ। उसने लपककर उसे पकड़ लिया। दो—तीन तमाचे जोर—जोर से मारे और बड़ी निष्ठुरता से उसके कान पकड़कर खींचने लगा। मिठुआ बिलबिला उठा। सूरदास अब तक दीन भाव से सिर झुकाए खड़ा था। मिठुआ का रोना सुनते ही उसकी त्योरियाँ बदल गईं। चेहरा तमतमा उठा। सिर उठाकर फूटी हुई अॉंखों से ताकता हुआ बोला—भैरोंए भला चाहते होए तो उसे छोड़ दोय नहीं तो ठीक न होगा। उसने तुम्हें कौन—सी ऐसी गोली मार दी थी कि उसकी जान लिए लेते हो। क्या समझते हो कि उसके सिर पर कोई है ही नहीं! जब तक मैं जीता हूँए कोई उसे तिरछी निगाह से नहीं देख सकता। दिलावरी तो जब देखता कि किसी बड़े आदमी से हाथ मिलाते। इस बालक को पीट लियाए तो कौन—सी बड़ी बहादुरी दिखाई!

भैरों—मार की इतनी अखर हैए तो इसे रोकते क्यों नहींघ् हमको चिढ़़ाएगाए तो हम पीटेंगे—एक बार नहींए हजार बारय तुमको जो करना होए कर लो।

जगधार—लड़के को डाँटना तो दूरए ऊपर से और सह देते हो। तुम्हारा दुलारा होगाए दूसरे क्यों...

सूरदास—चुप भी रहोए आए हो वहाँ से न्याय करने। लड़कों को तो यह बात ही होती हैय पर कोई उन्हें मार नहीं डालता। तुम्हीं लोगों को अगर किसी दूसरे लड़के ने चिढ़़ाया होताए तो मुँह तक न खोलते। देखता तो हूँए जिधार से निकलते होए लड़के तालियाँ बजाकर चिढ़़ाते हैंय पर अॉंखें बंद किए अपनी राह चले जाते हो। जानते हो न कि जिन लड़कों के माँ—बाप हैंए उन्हें मारेंगेए तो वे अॉंखें निकाल लेंगे। केले के लिए ठीकरा भी तेज होता है।

भैरों—दूसरे लड़कों की और उसकी बराबरी हैघ् दरोगाजी की गालियाँ खाते हैंए तो क्या डोमड़ों की गालियाँ भी खाएँघ् अभी तो दो ही तमाचे लगाए हैंए फिर चिढ़़ाएए तो उठाकर पटक दूँगाए मरे या जिए।

सूरदास—(मिट्ठू का हाथ पकड़कर) मिठुआए चिढ़़ा तोए देखूँ यह क्या करते हैं। आज जो कुछ होना होगाए यहीं हो जाएगा।

लेकिन मिठुआ के गालों में अभी तक जलन हो रही थीए मुँह भी सूज गया थाए सिसकियाँ बंद न होती थीं। भैरों का रौद्र रूप देखाए तो रहे—सहे होश भी उड़ गए। जब बहुत बढ़़ावे देने पर भी उसका मुँह न खुलाए तो सूरदास ने झुँझलाकर कहा—अच्छाए मैं ही चिढ़़ाता हूँए देखूँ मेरा क्या बना लेते हो!

यह कहकर उसने लाठी मजबूत पकड़ लीए और बार—बार उसी पद की रट लगाने लगा मानो कोई बालक अपना सबक याद कर रहा हो—

भैरोंए भैरोंए ताड़ी बेचए

या बीबी की साड़ी बेच।

एक ही साँस में उसने कई बार यही रट लगाई। भैरों कहाँ तो क्रोध से उन्मत्ता हो रहा थाए कहाँ सूरदास का यह बाल—हठ देखकर हँस पड़ा। और लोग भी हँसने लगे। अब सूरदास को ज्ञात हुआ कि मैं कितना दीन और बेकस हूँ। मेरे क्रोध का यह सम्मान है! मैं सबल होताए तो मेरा क्रोध देखकर ये लोग थर—थर काँपने लगतेय नहीं तो खड़े—खड़े हँस रहे हैंए समझते हैं कि हमारा कर ही क्या सकता है। भगवान्‌ ने इतना अपंग न बना दिया होताए तो क्यों यह दुर्गत होती। यह सोचकर हठात्‌ उसे रोना आ गया। बहुत जब्त करने पर भी अॉंसू न रुक सके।

बजरंगी ने भैरों और जगधार दोनों को धिक्कारा—क्या अंधे से हेकड़ी जताते हो! सरम नहीं आतीघ् एक तो लड़के का तमाचों से मुँह लाल कर दियाए उस पर और गरजते हो। वह भी तो लड़का ही हैए गरीब का हैए तो क्याघ् जितना लाड़—प्यार उसका होता हैए उतना भले घरों के लड़कों का भी नहीं होता है। जैसे और सब लड़के चिढ़़ाते हैंए वह भी चिढ़़ाता है। इसमें इतना बिगड़ने की क्या बात है। (जमुनी की ओर देखकर) यह सब तेरे कारण हुआ। अपने लौंडे को डाँटती नहींए बेचारे अंधे पर गुस्सा उतारने चली है।

जमुनी सूरदास का रोना देखकर सहम गई थी! जानती थीए दीन की हाय कितनी मोटी होती है। लज्जित होकर बोली—मैं क्या जानती थी कि जरा—सी बात का इतना बखेड़ा हो जाएगा। आ बेटा मिट्ठूए चल बछवा पकड़ लेए तो दूध दुहूँ।

दुलारे लड़के तिनके की मार भी नहीं सह सकते। मिट्ठू दूध की पुचकार से भी शांत न हुआए तो जमुनी ने आकर उसके अॉंसू पोंछे और गोद में उठाकर घर ले गई। उसे क्रोध जल्द आता थाय पर जल्द ही पिघल भी जाती थी।

मिट्ठू तो उधार गयाए भैरों और जगधार भी अपनी—अपनी राह चलेए पर सूरदास सड़क की ओर न गया। अपनी झोंपड़ी में जाकर अपनी बेकसी पर रोने लगा। अपने अंधेपन पर आज उसे जितना दुरूख हो रहा थाए उतना और कभी न हुआ था। सोचाए मेरी यह दुर्गत इसलिए न है कि अंधा हूँए भीख माँगता हूँ। मसक्कत की कमाई खाता होताए तो मैं भी गरदन उठाकर न चलताघ् मेरा भी आदर—मान होताय क्यों चिऊँटी की भाँति पैरों के नीचे मसला जाता! आज भगवान्‌ ने अपंग न बना दिया होताए तो क्या दोनों आदमी लड़के को मारकर हँसते हुए चले जातेए एक—एक की गरदन मरोड़ देता। बजरंगी से क्यों नहीं कोई बोलता! घिसुआ ने भैरों की ताड़ी का मटका फोड़ दिया थाए कई रुपये का नुकसान हुआय लेकिन भैरों ने चूँ तक न की। जगधार को उसके मारे घर से निकलना मुश्किल है। अभी दस—ही—पाँच दिनों की बात हैए उसका खोंचा उलट दिया था। जगधार ने चूँ तक न की। जानते हैं न कि जरा भी गरम हुए कि बजरंगी ने गरदन पकड़ी। न जाने उस जनम में ऐसे कौन—से आपराधा किए थेए जिसकी यह सजा मिल रही है। लेकिन भीख न माँगूँए तो खाऊँ क्याघ् और फिर जिंदगी पेट ही पालने के लिए थोड़े ही है। कुछ आगे के लिए भी तो करना है। नहीं इस जनम में तो अंधा हूँ हीए उस जनम में इससे भी बड़ी दुर्दशा होगी। पितरों का रिन सिर सवार हैए गयाजी में उनका सराधा न कियाए तो वे भी क्या समझेंगे कि मेरे वंश में कोई है! मेरे साथ तो कुल का अंत ही है। मैं यह रिन न चुकाऊँगाए तो और कौन लड़का बैठा हुआ हैए जो चुका देगाघ् कौन उद्दम करूँघ् किसी बड़े आदमी के घर पंखा खींच सकता हूँए लेकिन यह काम भी तो साल भर में चार ही महीने रहता हैए बाकी महीने क्या करूँगाघ् सुनता हूँ अंधे कुर्सीए मोढ़़ेए दरीए टाट बुन सकते हैंए पर यह काम किससे सीखूँघ् कुछ भी होए अब भीख न माँगूँगा।

चारों ओर से निराश होकर सूरदास के मन में विचार आया कि इस जमीन को क्यों न बेच दूँ। इसके सिवा अब मुझे और कोई सहारा नहीं है। कहाँ तक बाप—दादों के नाम को रोऊँ! साहब उसे लेने को मुँह फैलाए हुए हैं। दाम भी अच्छा दे रहे हैं। उन्हीं को दे दूँ। चार—पाँच हजार बहुत होते हैं। अपने घर सेठ की तरह बैठा हुआ चौन की बंसी बजाऊँगा। चार आदमी घेरे रहेंगेए मुहल्ले में अपना मान होने लगेगा। ये ही लोगए जो आज मुझ पर रोब जमा रहे हैंए मेरा मुँह जोहेंगेए मेरी खुशामद करेंगे। यही न होगाए मुहल्ले की गउएँ मारी—मारी फिरेंगीय फिरेंए इसको मैं क्या करूँघ् जब तक निभ सकाए निभाया। अब नहीं निभताए तो क्या करूँघ् जिनकी गायें चरती हैंए कौन मेरी बात पूछते हैंघ् आज कोई मेरी पीठ पर खड़ा हो जाताए तो भैरों मुझे रुलाकर यों मूँछों पर ताव देता हुआ न चला जाता। जब इतना भी नहीं हैए तो मुझे क्या पड़ी है कि दूसरों के लिए मरूँघ् जी से जहान हैय जब आबरू ही न रहीए तो जीने पर धिक्कार है।

मन में यह विचार स्थिर करके सूरदास अपनी झोंपड़ी से निकला और लाठी टेकता हुआ गोदाम की तरफ चला। गोदाम के सामने पहुँचाए तो दयागिरि से भेंट हो गई। उन्होंने पूछा—इधार कहाँ चले सूरदासघ् तुम्हारी जगह तो पीछे छूट गई।

सूरदास—जरा इन्हीं मियाँ साहब से कुछ बातचीत करनी है।

दयागिरि—क्या इसी जमीन के बारे मेंघ्

सूरदास—हाँए मेरा विचार है कि यह जमीन बेचकर कहीं तीर्थयात्रा करने चला जाऊँ। इस मुहल्ले में अब निबाह नहीं है।

दयागिरि—सुनाए आज भैरों तुम्हें मारने की धमकी दे रहा था।

सूरदास—मैं तरह न दे जाताए तो उसने मार ही दिया था। सारा मुहल्ला बैठा हँसता रहाए किसी की जबान न खुली कि अंधे—अपाहिज आदमी पर यह कुन्याव क्यों करते हो। तो जब मेरा कोई हितू नहीं हैए तो मैं क्यों दूसरों के लिए मरूँघ्

दयागिरि—नहीं सूरेए मैं तुम्हें जमीन बेचने की सलाह न दूँगा। धर्म का फल इस जीवन में नहीं मिलता। हमें अॉंखें बंद करके नारायन पर भरोसा रखते हुए धर्म—मार्ग पर चलते रहना चाहिए। सच पूछोए तो आज भगवान्‌ ने तुम्हारे धर्म की परीक्षा ली है। संकट ही में धीरज और धर्म की परीक्षा होती है। देखोए गुसाईंजी ने कहा है रू

श्आपत्ति—काल परखिये चारी। धीरजए धर्मए मित्र अरु नारी।श्

जमीन पड़ी हैए पड़ी रहने दो। गउएँ चरती हैंए यह कितना बड़ा पुण्य है। कौन जानता हैए कभी कोई दानीए धार्मात्मा आदमी मिल जाएए और धर्मशालाए कुअॉंए मंदिर बनवा देए तो मरने पर भी तुम्हारा नाम अमर हो जाएगा। रही तीर्थ—यात्राए उसके लिए रुपये की जरूरत नहीं। साधु—संत जन्म—भर यही किया करते हैंय पर घर से रुपयों की थैली बाँधकर नहीं चलते। मैं भी शिवरात्रि के बाद बद्रीनारायण जानेवाला हूँ। हमारा—तुम्हारा साथ हो जाएगा। रास्ते में तुम्हारी एक कौड़ी न खर्च होगीए इसका मेरा जिम्मा है।

सूरदास—नहीं बाबाए अब यह कुन्याव नहीं सहा जाता। भाग्य में धर्म करना नहीं लिखा हुआ हैए तो कैसे धर्म करूँगा। जरा इन लोगों को भी तो मालूम हो जाए कि सूरे भी कुछ है।

दयागिरि—सूरेए अॉंखें बंद होने पर भी कुछ नहीं सूझता। यह अहंकार हैए इसे मिटाओए नहीं तो यह जन्म भी नष्ट हो जाएगा। यही अहंकार सब पापों का मूल है—

श्मैं अरु मोर तोर तैं मायाए जेहि बस कीन्हें जीव निकाया।श्

न यहाँ तुम होए न तुम्हारी भूमिय न तुम्हारा कोई मित्र हैए न शत्रु हैय जहाँ देखो भगवान्—ही—भगवान्‌ हैं—

श्ज्ञान—मान जहँ एकौ नाहींए देखत ब्रह्म रूप सब गाहीं।श्

इन झगड़ों में मत पड़ो।

सूरदास—बाबाजीए जब तक भगवान्‌ की दया न होगीए भक्ति और वैराग्य किसी पर मन न जमेगा। इस घड़ी मेरा हृदय रो रहा हैए उसमें उपदेश और ज्ञान की बातें नहीं पहुँच सकतीं। गीली लकड़ी खराद पर नहीं चढ़़ती।

दयागिरि—पछताओगे और क्या।

यह कहकर दयागिरि अपनी राह चले गए। वह नित्य गंगा—स्नान को जाया करते थे।

उनके जाने के बाद सूरदास ने अपने मन में कहा—यह भी मुझी को ज्ञान का उपदेश करते हैं। दीनों पर उपदेश का भी दाँव चलता हैए मोटों को कोई उपदेश नहीं करता। वहाँ तो जाकर ठकुरसुहाती करने लगते हैं। मुझे ज्ञान सिखाने चले हैं। दोनों जून भोजन मिल जाता है न! एक दिन न मिलेए तो सारा ज्ञान निकल जाए।

वेग से चलती हुई गाड़ी रुकावटों को फाँद जाती है। सूरदास समझाने से और भी जिद पकड़ गया। सीधो गोदाम के बरामदे में जाकर रुका। इस समय यहाँ बहुत—से चमार जमा थे। खालों की खरीद हो रही थी। चौधारी ने कहा—आओ सूरदासए कैसे चलेघ्

सूरदास इतने आदमियों के सामने अपनी इच्छा न प्रकट कर सका। संकोच ने उसकी जबान बंद कर दी। बोला—कुछ नहींए ऐसे ही चला आया।

ताहिर—साहब इनसे पीछेवाली जमीन माँगते हैंए मुँह—माँगे दाम देने को तैयार हैं! पर यह किसी तरह राजी नहीं होते। उन्होंने खुद समझायाए मैंने कितनी मिंनत कीय लेकिन इनके दिल में कोई बात जमती ही नहीं।

लज्जा अत्यंत निर्लज्ज होती है। अंतिम काल में भी जब हम समझते हैं कि उसकी उलटी साँसें चल रही हैंए वह सहसा चौतन्य हो जाती हैए और पहले से भी अधिकर् कर्तव्यशील हो जाती है। हम दुरावस्था में पड़कर किसी मित्र से सहायता की याचना करने को घर से निकलते हैंए लेकिन मित्र से अॉंखें चार होते ही लज्जा हमारे सामने आकर खड़ी हो जाती है और हम इधार—उधार की बातें करके लौट आते हैं। यहाँ तक कि हम एक शब्द भी ऐसा मुँह से नहीं निकलने देतेए जिसका भाव हमारी अंतर्वेदना का द्योतक हो।

ताहिर अली की बातें सुनते ही सूरदास की लज्जा ठट्ठा मारती हुई बाहर निकल आई। बोला—मियाँ साहबए वह जमीन तो बाप—दादों की निसानी हैए भला मैं उसे बय या पट्टा कैसे कर सकता हूँघ् मैंने उसे धरम काज के लिए संकल्प कर दिया है।

ताहिर—धरम काज बिना रुपये के कैसे होगाघ् जब रुपये मिलेंगेए तभी तो तीरथ करोगेए साधु—संतों की सेवा करोगेय मंदिर—कुअॉं बनवाओगेघ्

चौधारी—सूरेए इस बखत अच्छे दाम मिलेंगे। हमारी सलाह तो यही है कि दे दोए तुम्हारा कोई उपकार तो उससे होता नहीं।

सूरदास—मुहल्ले—भर की गउएँ चरती हैंए क्या इससे पुन्न नहीं होताघ् गऊ की सेवा से बढ़़कर और कौन पुन्न का काम हैघ्

ताहिर—अपना पेट पालने के लिए तो भीख माँगते फिरते होए चले हो दूसरों के साथ पुन्न करने। जिनकी गायें चरती हैंए वे तो तुम्हारी बात भी नहीं पूछतेए एहसान मानना तो दूर रहा। इसी धरम के पीछे तुम्हारी यह दसा हो रही हैए नहीं तो ठोकरें न खाते फिरते।

ताहिर अली खुद बड़े दीनदार आदमी थेए पर अन्य धामोर्ं की अवहेलना करने में उन्हें संकोच न होता था। वास्तव में वह इस्लाम के सिवा और किसी धर्म को धर्म ही नहीं समझते थे।

सूरदास ने उत्तोजित होकर कहा—मियाँ साहबए धरम एहसान के लिए नहीं किया जाता। नेकी करके दरिया में डाल देना चाहिए।

ताहिर—पछताओगे और क्या। साहब से जो कुछ कहोगेए वही करेंगे। तुम्हारे लिए घर बनवा देंगेए माहवार गुजारा देंगेय मिठुआ को किसी मदरसे में पढ़़ने को भेज देंगेए उसे नौकर रखा देंगेए तुम्हारी अॉंखों की दवा करा देंगेए मुमकिन हैए सूझने लगे। आदमी बन जाओगेए नहीं तो धाक्के खाते रहोगे।

सूरदास पर और किसी प्रलोभन का असर तो न हुआय हाँए द्रष्टि—लाभ की सम्भावना ने जरा नरम कर दिया। बोला—क्या जनम के अंधों की दवा भी हो सकती हैघ्

ताहिर—तुम जनम के अंधे हो क्याघ् तब तो मजबूरी है। लेकिन वह तुम्हारे आराम के इतने सामान जमा कर देंगे कि तुम्हें अॉंखों की जरूरत ही न रहेगी।

सूरदास—साहबए बड़ी नामूसी होगी। लोग चारों ओर से धिक्कारने लगेंगे।

चौधारी—तुम्हारी जायदाद हैए बय करोए चाहे पट्टा लिखोए किसी दूसरे को दखल देने की क्या मजाल है!

सूरदास—बाप—दादों का नाम तो नहीं डुबाया जाता।

मूखोर्ं के पास युक्तियाँ नहीं होतींए युक्तियों का उत्तर वे हठ से देते हैं। युक्ति कायल हो सकती हैए नरम हो सकती हैए भ्रांत हो सकती हैय हठ को कौन कायल करेगाघ्

सूरदास की जिद से ताहिर अली को क्रोध आ गया। बोले—तुम्हारी तकदीर में भीख माँगना लिखा हैए तो कोई क्या कर सकता है। इन बड़े आदमियों से अभी पाला नहीं पड़ा है। अभी खुशामद कर रहे हैंए मुआवजा देने पर तैयार हैंय लेकिन तुम्हारा मिजाज नहीं मिलताए और वही जब कानूनी दाँव—पेंच खेलकर जमीन पर कब्जा कर लेंगेए दो—चार सौ रुपये बरायनाम मुआवजा दे देंगेए तो सीधो हो जाओगे। मुहल्लेवालों पर भूले बैठे हो। पर देख लेनाए जो कोई पास भी फटके। साहब यह जमीन लेंगे जरूरए चाहे खुशी से दोए चाहे रोकर।

सूरदास ने गर्व से उत्तर दिया—खाँ साहबए अगर जमीन जाएगीए तो इसके साथ मेरी जान भी जाएगी।

यह कहकर उसने लकड़ी सँभाली और अपने अव्‌ पर आ बैठा।

उधार दयागिरि ने जाकर नायकराम से यह समाचार कहा। बजरंगी भी बैठा था। यह खबर सुनते ही दोनों के होश उड़ गए। सूरदास के बल पर दोनों उछलते रहेए उस दिन ताहिर अली से कैसी बातें कींए और आज सूरदास ने ही धोखा दिया। बजरंगी ने चिंतित होकर कहा—अब क्या करना होगा पंडाजीए बताओघ्

नायकराम—करना क्या होगाए जैसा किया हैए वैसा भोगना होगा। जाकर अपनी घरवाली से पूछो। उसी ने आज आग लगाई थी। जानते तो हो कि सूरे मिठुआ पर जान देता हैए फिर क्यों भैरों की मरम्मत नहीं की। मैं होताए तो भैरों को दो—चार खरी—खोटी सुनाए बिना न जाने देताए और नहीं तो दिखावे के लिए सही। उस बेचारे को भी मालूम हो जाता कि मेरी पीठ पर है कोई। आज उसे बड़ा रंज हुआ हैए नहीं तो जमीन बेचने का कभी उसे धयान ही न आया था।

बजरंगी—अरेए तो अब कोई उपाय निकालोगे या बैठकर पिछली बातों के नाम को रोएँ!

नायकराम—उपाय यही है कि आज सूरे आएए तो चलकर उसके पैरों पर गिरोए उसे दिलासा दोए जैसे राजी होए वैसे राजी करोए दादा—भैया करोए मान जाए तो अच्छाए नहीं तो साहब से लड़ने के लिए तैयार हो जाओए उनका कब्जा न होने दोए जो कोई जमीन के पास आएए मारकर भगा दो। मैंने तो यही सोच रखा है। आज सूरे को अपने हाथ से बना के दूधिया पिलाऊँगा और मिठुआ को भर—पेट मिठाइयाँ खिलाऊँगा। जब न मानेगाए तो देखी जाएगी।

बजरंगी—जरा मियाँ साहब के पास क्यों नहीं चले चलतेघ् सूरदास ने उससे न जाने क्या—क्या बातें की हों। कहीं लिखा—पढ़़ी कराने को कह आया होए तो फिर चाहे कितनी ही आरजू—बिनती करोगेए कभी अपनी बात न पलटेगा।

नायकराम—मैं उस मुंशी के द्वार पर न जाऊँगा। उसका मिजाज और भी आसमान पर चढ़़ जाएगा।

बजरंगी—नहीं पंडाजीए मेरी खातिर से जरा चले चलो।

नायकराम आखिर राजी हुए। दोनों आदमी ताहिर अली के पास पहुँचे। वहाँ इस वक्त सन्नाटा था। खरीद का काम हो चुका था। चमार चले गए थे। ताहिर अली अकेले बैठे हुए हिसाब—किताब लिख रहे थे। मीजान में कुछ फर्क पड़ता था। बार—बार जोड़ते थे! पर भूल पर निगाह न पहुँचती थी। सहसा नायकराम ने कहा—कहिए मुंसीजीए आज सूरे से क्या बातचीत हुईघ्

ताहिर—अहाए आइए पंडाजीए मुआफ कीजिएगाए मैं जरा मीजान लगाने में मसरूफ थाए इस मोढ़़े पर बैठिए। सूरे से कोई बात तय न होगी। उसकी तो शामतें आई हैं। आज तो धमकी देकर गया है कि जमीन के साथ मेरी जान भी जाएगी। गरीब आदमी हैए मुझे उस पर तरस आता है। आखिर यही होगा कि साहब किसी कानून की रूह से जमीन पर काबिज हो जाएँगे। कुछ मुआवजा मिलाए तो मिलाए नहीं तो उसकी भी उम्मीद नहीं।

नायकराम—जब सूरे राजी नहीं हैए तो साहब क्या खाके यह जमीन ले लेंगे! देख बजरंगीए हुई न वही बातए सूरे ऐसा कच्चा आदमी नहीं है।

ताहिर—साहब को अभी आप जानते नहीं हैं।

नायकराम—मैं साहब और साहब के बापए दोनों को अच्छी तरह जानता हूँ। हाकिमों की खुशामद की बदौलत आज बड़े आदमी बने फिरते हैं।

ताहिर—खुशामद ही का तो आजकल जमाना है। वह अब इस जमीन को लिए बगैर न मानेंगे।

नायकराम—तो इधार भी यही तय है कि जमीन पर किसी पर कब्जा न होने देंगेए चाहे जान जाए। इसके लिए मर मिटेंगे। हमारे हजारों यात्राी आते हैं। इसी खेत में सबको टीका देता हूँ। जमीन निकल गईए तो क्या यात्रियों को अपने सिर पर ठहराऊँगाघ् आप साहब से कह दीजिएगाए यहाँ उनकी दाल न गलेगी। यहाँ भी कुछ दम रखते हैं। बारहों मास खुले—खजाने जुआ खेलते हैं। एक दिन में हजारों के वारे—न्यारे हो जाते हैं। थानेदार से लेकर सुपरीडंट तक जानते हैंए पर मजाल क्या कि कोई दौड़ लेकर आए। खून तक छिपा डाले हैं।

ताहिर—तो आप ये सब बातें मुझसे क्यों कहते हैंए क्या मैं जानता नहीं हूँघ् आपने सैयद रजा अली थानेदार का नाम तो सुना ही होगाए मैं उन्ही का लड़का हूँ। यहाँ कौन पंडा हैए जिसे मैं नहीं जानता।

नायकराम—लीजिएए घर ही बैदए तो मरिए क्योंघ् फिर तो आप अपने घर ही के आदमी हैं। दरोगाजी की तरह भला क्या कोई अफसर होगा। कहते थेए बेटाए जो चाहे करोए लेकिन मेरे पंजे में न आना। मेरे द्वार पर फड़ जाती थीए वह कुर्सी पर बैठे देखा करते थे। बिलकुल घराँव हो गया था। कोई बात बनी—बिगड़ीए जाके सारी कथा सुना देता था। पीठ पर हाथ फेरकर कहते—बस जाओए अब हम देख लेंगे। ऐसे आदमी अब कहाँघ् सतजुगी लोग थे। आप तो अपने भाई ही ठहरेए साहब को धाता क्यों नहीं बतातेघ् आपको भगवान्‌ ने विद्या—बुध्दि दी हैए बीसों बहाने निकाल सकते हैं। बरसात में पानी जमता हैए दीमक बहुत हैए लोनी लगेगीए ऐसे ही और कितने बहाने हैं।

ताहिर—पंडाजीए जब आपसे भाईचारा हो गयाए तो क्या परदा है। साहब पल्ले सिरे का घाघ है। हाकिमों से उसका बड़ा मेल—जोल है। मुफ्त में जमीन ले लेगा। सूरे को तो चाहे सौ—दो—सौ मिल भी रहेंए मेरा इनाम—इकराम गायब हो जाएगा। आप सूरे से मुआमला तय करा दीजिएए तो उसका भी फायदा होए मेरा भी फायदा हो और आपका भी फायदा हो।

नायकराम—आपको वहाँ से इनाम—इकराम मिलनेवाला होए वह हमीं लोगों से ले लीजिए। इसी बहाने कुछ आपकी खिदमत करेंगे। मैं तो दरोगाजी को जैसा समझता थाए वैसा ही आपको समझता हूँ।

ताहिर—मुआजल्लाहए पंडाजीए ऐसी बात न कहिए। मैं मालिक की निगाह बचाकर एक कौड़ी लेना भी हराम समझता हूँ। वह अपनी खुशी से जो कुछ दे देंगेए हाथ फैलाकर ले लूँगाय पर उनसे छिपाकर नहीं। खुदा उस रास्ते से बचाए। वालिद ने इतना कमायाए पर मरते वक्त घर में एक कौड़ी कफन को भी न थी।

नायकराम—अरे यारए मैं तुम्हें रुसवत थोड़े ही देने को कहता हूँ। जब हमारा—आपका भाईचारा हो गयाए तो हमारा काम आपसे निकलेगाए आपका काम हमसे। यह कोई रुसवत नहीं।

ताहिर—नहीं पंडाजीए खुदा मेरी नीयत को पाक रखेए मुझसे नमकहरामी न होगी। मैं जिस हाल में हूँ उसी में खुश हूँए जब उसके करम की निगाह होगीए तो मेरी भलाई की कोई सूरत निकल ही आएगी।

नायकराम—सुनते हो बजरंगीए दरोगाजी की बातें। चलोए चुपके से घर बैठोए जो कुछ आगे आएगीए देखी जाएगी। अब तो साहब ही से निबटना है।

बजरंगी के विचार में नायकराम ने उतनी मिंनत—समाजत न की थीए जितनी करनी चाहिए थी। आए थे अपना काम निकालने के हेकड़ी दिखाने। दीनता से जो काम निकल जाता हैए वह डींग मारने से नहीं निकलता। नायकराम ने तो लाठी कंधो पर रखीए और चले। बजरंगी ने कहा—मैं जरा गोरुओं को देखने जाता हूँए उधार से होता हुआ आऊँगा। यों बड़ा अक्खड़ आदमी थाए नाक पर मक्खी न बैठने देता। सारा मुहल्ला उसके क्रोध से काँपता थाए लेकिन कानूनी कारवाइयों से डरता था। पुलिस और अदालत के नाम ही से उसके प्राण सूख जाते थे। नायकराम को नित्य ही अदालत से काम रहता थाए वह इस विषय में अभ्यस्त थे। बजरंगी को अपनी जिंदगी में कभी गवाही देने की भी नौबत न आई थी। नायकराम के चले आने के बाद ताहिर अली भी घर गएय पर बजरंगी वहीं आस—पास टहलता रहा कि वह बाहर निकलेंए तो अपना दुरूखड़ा सुनाऊँ।

ताहिर अली के पिता पुलिस—विभाग के कांस्टेबिल से थानेदारी के पद तक पहुँचे थे। मरते समय कोई जायदाद तक न छोड़ीए यहाँ तक कि उनकी अंतिम क्रिया कर्ज से की गईय लेकिन ताहिर अली के सिर पर दो विधवाओं और उनकी संतान का भार छोड़ गए। उन्होंने तीन शादियाँ की थीं। पहली स्त्री से ताहिर अली थेए दूसरी से माहिर अली और जाहिर अलीए और तीसरी से जाबिर अली। ताहिर अली धैर्यशील और विवेकी मनुष्य थे। पिता का देहांत होने पर साल—भर तक तो रोजगार की तलाश में मारे—मारे फिरे। कहीं मवेशीखाने की मुहर्रिरी मिल गईए कहीं किसी दवा बेचनेवाले के एजेेंट हो गएए कहीं चुंगी—घर के मुंशी का पद मिल गया। इधार कुछ दिनों से मिस्टर जॉन सेवक के यहाँ स्थायी रूप से नौकर हो गए थे। उनके आचार—विचार अपने पिता से बिलकुल निराले थे। रोजा—नमाज के पाबंद और नीयत के साफ थे। हराम की कमाई से कोसों भागते थे। उनकी माँ तो मर चुकी थींय पर दोनों विमाताएँ जीवित थीं। विवाह भी हो चुका थाय स्त्री के अतिरिक्त एक लड़का था—साबिर अलीए और एक लड़की—नसीमा। इतना बड़ा कुटुम्ब था और 30 रुपये मासिक आय! इस महँगी के समय मेंए जबकि इससे पँचगुनी आमदनी में सुचारु रूप से निर्वाह नहीं होताए उन्हें बहुत कष्ट झेलने पड़ते थेय पर नीयत खोटी न होती थी। ईश्वर—भीरुता उनके चरित्र का प्रधान गुण थी। घर में पहुँचेए तो माहिर अली पढ़़ रहा थाए जाहिर और जाबिर मिठाई के लिए रो रहे थेए और साबिर अॉंगन में उछल—उछलकर बाजरे की रोटीयाँ खा रहा था। ताहिर अली तख्त पर बैठे गए और दोनों छोटे भाइयों को गोद में उठाकर चुप कराने लगे। उनकी बड़ी विमाता ने जिनका नाम जैनब थाए द्वार पर खड़ी होकर नायकराम और बजरंगी की बातें सुनी थीं। बजरंगी दस ही पाँच कदम चला था कि माहिर अली ने पुकारा—सुनो जीए ओ आदमी! जरा यहाँ आनाए तुम्हें अम्माँ बुला रही हैं।

बजरंगी लौट पड़ाए कुछ आस बँधी। आकर फिर बरामदे में खड़ा हो गया। जैनब टाट के परदे की आड़ में खड़ी थींए पूछा—क्या बात थी जीघ्

बजरंगी—वही जमीन की बातचीत थी। साहब इसे लेने को कहते हैं। हमारा गुजर—बसर इसी जमीन से होता है! मुंसीजी से कह रहा हूँए किसी तरह इस झगड़े को मिटा दीजिए। नजर—नियाज देने को भी तैयार हूँए मुआ मुंसीजी सुनते ही नहीं।

जैनब—सुनेंगे क्यों नहींए सुनेंगे न तो गरीबों की हाय किस पर पड़ेगीघ् तुम भी तो गँवार आदमी होए उनसे क्या कहने गएघ् ऐसी बातें मरदों से कहने की थोड़ी ही होती हैं। हमसे कहतेए हम तय करा देते।

जाबिर की माँ का नाम था रकिया। वह भी आकर खड़ी हो गईं। दोनों महिलाएँ साये की तरह साथ—साथ रहती थीं। दोनों के भाव एकए दिल एकए विचार एकए सौतिन का जलापा नाम को न था। बहनों का—सा प्रेम था। बोली—और क्याए भला ऐसी बातें मरदों से की जाती हैंघ्

बजरंगी—माताजीए मैं गँवार आदमीए इसका हाल क्या जानूँ। अब आप ही तय करा दीजिए। गरीब आदमी हूँए बाल—बच्चे जिएँगे।

जैनब—सच—सच कहनाए यह मुआमला दब जाएए तो कहाँ तक दोगेघ्

बजरंगी—बेगम साहबए 50 रुपये तक देने को तैयार हूँ।

जैनब—तुम भी गजब करते होए 50 रुपये ही में इतना बड़ा काम निकालना चाहते होघ्

रकिया—(धीरे से) बहनए कहीं बिदक न जाए।

बजरंगी—क्या करूँए बेगम साहबए गरीब आदमी हूँ। लड़कों को दूध—दही जो कुछ हुकुम होगाए खिलाता रहूँगाय लेकिन नगद तो इससे ज्यादा मेरा किया न होगा।

रकिया—अच्छाए तो रुपयों का इंतजाम करो। खुदा न चाहाए तो सब तय हो जाएगा।

जैनब—(धीरे से) रकियाए तुम्हारी जल्दबाजी से मैं आजिज हूँ।

बजरंगी—माँजीए यह काम हो गयाए तो सारा मुहल्ला आपका जस गायगा।

जैनब—मगर तुम तो 50 रुपये से आगे बढ़़ने का नाम ही नहीं लेते। इतने तो साहब ही दे देंगेए फिर गुनाह बेलज्जत क्यों किया जाए।

बजरंगी—माँजीए आपसे बाहर थोड़े ही हूँ। दस—पाँच रुपये और जुटा दूँगा।

बजरंगी—बसए दो दिन की मोहलत मिल जाए। तब तक मुंसीजी से कह दीजिएए साहब से कहें—सुनें।

जैनब—वाह महतोए तुम तो बड़े होशियार निकले। सेंत ही में काम निकालना चाहते हो। पहले रुपये लाओए फिर तुम्हारा काम न होए तो हमारा जिम्मा।

बजरंगी दूसरे दिन आने का वादा करके खुश—खुश चला गयाए तो जैनब ने रकिया से कहा—तुम बेसब्र हो जाती हो। अभी चमारों से दो पैसे खाल लेने पर तैयार हो गईं। मैं दो आने लेतीए और वे खुशी से देते। यही अहीर पूरे सौ गिनकर जाता। बेसब्री से गरजमंद चौकन्ना हो जाता है। समझता हैए शायद हमें बेवकूफ बना रही हैं जितनी ही देर लगाओए जितनी बेरुखी से काम लोए उतना एतबार बढ़़ता है।

रकिया—क्या करूँ बहनए मैं डरती हूँ कि कहीं बहुत सख्ती से निशाना खता न कर जाए।

जैनब—वह अहीर रुपये जरूर लाएगा। ताहिर को आज ही से भरना शुरू कर दो। बसए अजाब का खौफ दिलाना चाहिए। उन्हें हत्थे चढ़़ाने का यही ढ़ंग है।

रकिया—और कहीं साहब न मानेए तोघ्

जैनब—तो कौन हमारे ऊपर नालिश करने जाता है।

ताहिर अली खाना खाकर लेटे थे कि जैनब ने जाकर कहा—साहब दूसरों की जमीन क्यों लिए लेते हैंघ् बेचारे रोते फिरते हैं।

ताहिर—मुफ्त थोड़े ही लेना चाहते हैं! उसका माकूल मुआवजा देने पर तैयार हैं।

जैनब—यह तो गरीबों पर जुल्म है।

रकिया—जुल्म ही नहीं हैए अजाब है। भैयाए तुम साहब से साफ—साफ कह दोए मुझे इस अजाब में न डालिए। खुदा ने मेरे आगे भी बाल—बच्चे दिए हैंए न जाने कैसी पड़ेए कैसी न पड़ेय मैं यह अजाब सिर पर न लूँगा।

जैनब—गँवार तो हैं हीए तुम्हारे ही सिर हो जाएँ। तुम्हें साफ कह देना चाहिए कि मैं मुहल्लेवालों से दुश्मनी मोल न लूँगाए जान—जोखिम की बात है।

रकिया—जान—जोखिम तो है हीए ये गँवार किसी के नहीं होते।

ताहिर—क्या आपने भी कुछ अफवाह सुनी हैघ्

रकिया—हाँए ये सब चमार आपस में बातें करते जा रहे थे कि साहब ने जमीन लीए तो खून की नदी बह जाएगी। मैंने तो जब से सुना हैए होश उड़े जा रहे हैं।

जैनब—होश उड़ने की बात ही है।

ताहिर—मुझे सब नाहक बदनाम कर रहे हैं। मैं लेने मेंए न देने में। साहब ने उस अंधे से जमीन की निस्बत बातचीत करने का हुक्म दिया था। मैंने हुक्म की तामील कीए जो मेरा फर्ज थाय लेकिन ये अहमक यही समझ रहे हैं कि मैंने ही साहब को इस जमीन की खरीदारी पर आमादा किया हैय हालाँकि खुदा जानता हैए मैंने कभी उनसे इसका जिक्र ही नहीं किया।

जैनब—मुझे बदनामी का खौफ तो नहीं हैय हाँए खुदा के कहर से डरती हूँ। बेकसों की आह क्यों सिर पर लोघ्

ताहिर—मेरे ऊपर क्यों अजाब पड़ने लगाघ्

जैनब—और किसके ऊपर पड़ेगा बेटाघ् यहाँ तो तुम्हीं होए साहब तो नहीं बैठे हैं। वह तो भुस में आग लगाकर दूर से तमाशा देखेंगेए आई—गई तो तुम्हारे सिर जाएगी। इस पर कब्जा तुम्हें करना पड़ेगा। मुकदमे चलेंगेए तो पैरवी तुम्हें करनी पड़ेगी। ना भैयाए मैं इस आग में नहीं कूदना चाहती।

रकिया—मेरे मैके में एक कारिंदे ने किसी काश्तकार की जमीन निकाल ली थी। दूसरे ही दिन जवान बेटा उठ गया। किया उसने जमींदार ही के हुक्म सेए मगर बला आई उस गरीब के सिर। दौलतवालों पर अजाब भी नहीं पड़ता। उसका वार भी गरीबों पर ही पड़ता है। हमारे बच्चे रोज ही नजर और आसेब की चपेट में आते रहते हैंय पर आज तक कभी नहीं सुना कि किसी अंगरेज के बच्चे को नजर लगी हो। उन पर बलैयात का असर ही नहीं होता।

यह पते की बात थी। ताहिर अली को भी इसका तुजुर्बा था। उनके घर के सभी बच्चे गंडों और तावीजों से मढ़़े हुए थेए उस पर भी आए दिन झाड़—फूँक और राई—नोन की जरूरत पड़ा ही करती थी।

धर्म का मुख्य स्तम्भ भय है। अनिष्ट की शंका को दूर कीजिएए फिर तीर्थ—यात्राए पूजा—पाठए स्नान—धयानए रोजा—नमाजए किसी का निशान भी न रहेगा। मसजिदें खाली नजर आएँगीए और मंदिर वीरान!

ताहिर अली को भय ने परास्त कर दिया। स्वामिभक्ति औरर् कर्तव्य—पालन का भाव ईश्वरीय कोप का प्रतिकार न कर सका।

'''

अध्याय 5

चतारी के राजा महेंद्रकुमार सिंह यौवनावस्था ही में अपनी कार्य—दक्षता और वंश प्रतिष्ठा के कारण म्युनिसिपैलिटी के प्रधान निर्वाचित हो गए थे। विचारशीलता उनके चरित्र का दिव्य गुण थी। रईसों की विलास—लोलुपता और सम्मान—प्रेम का उनके स्वभाव में लेश भी न था। बहुत ही सादे वस्त्र पहनतेए ठाठ—बाट से घृणा थी और व्यसन तो उन्हें छू तक न गया था। घुड़दौड़ए सिनेमाए थिएटरए राग—रंगए सैर और शिकारए शतरंज या ताशबाजी से उन्हें कोई प्रयोजन न था। हाँए अगर कुछ प्रेम थाए तो उद्यान—सेवा से। वह नित्य घंटे—दो—घंटे अपनी वाटीका में काम किया करते थे। बसए शेष समय नगर के निरीक्षण और नगर—संस्था के संचालन में व्यतीत करते थे। राज्याधिकारियों से वह बिला जरूरत बहुत कम मिलते थे। उनके प्रधानत्व में शहर के केवल उन्हीं भागों को सबसे अधिक महत्व न दिया जाता थाए जहाँ हाकिमों के बँगले थे। नगर की अंधोरी गलियों और दुगर्ंधामय परनालों की सफाई सुविस्तृत सड़कों और सुरम्य विनोद—स्थानों की सफाई से कम आवश्यक न समझी जाती थी। इसी कारण हुक्काम उनसे खिंचे रहते थेए उन्हें दम्भी और अभिमानी समझते थे किंतु नगर के छोटे—से—छोटे मनुष्य की भी उनसे अभिमान या अविनय की शिकायत न थी। हर समय हरएक प्राणी से प्रसन्न—मुख मिलते थे। नियमों का उल्लंघन करने के लिए उन्हें जनता पर जुर्माना करने का अभियोग चलाने की बहुत कम जरूरत पड़ती थी। उनका प्रभाव और सद्‌भाव कठोर नीति को दबाए रखता था। वह अत्यंत मितभाषी थे। वृध्दावस्था में मौन विचार—प्रौढ़़ता का द्योतक होता हैए और युवावस्था में विचार—दारिद्रय काय लेकिन राजा साहब का वाक्—संयम इस धारणा को असत्य सिध्द करता था। उनके मुँह से जो बात निकलती थीए विवेक और विचार से परिष्कृत होती थी। एक ऐश्वर्यशाली ताल्लुकदार होने पर भी उनकी प्रवृत्ति साम्यवाद की ओर थी। सम्भव हैए यह उनके राजनीतिक सिध्दांतों का फल होय क्योंकि उनकी शिक्षाए उनका प्रभुत्वए उनकी परिस्थितिए उनका स्वार्थए सब इस प्रवृत्ति के प्रति प्रतिकूल थाय पर संयम और अभ्यास ने अब इसे उनके विचार—क्षेत्र से निकालकर उनके स्वभाव के अंतर्गत कर दिया था। नगर निर्वाचन—क्षेत्रों के परिमार्जन में उन्होंने प्रमुख भाग लिया थाए इसलिए शहर के अन्य रईस उनसे सावधान रहते थेय उनके विचार में राजा साहब का जनतावाद केवल उनकी अधिकार—रक्षा का साधान था। वह चिरकाल तक इस सामान्य पद का उपभोग करने के लिए यह आवरण धारण किए हुए थे। पत्रों में भी कभी—कभी इस पर टीकाएँ होती रहती थींए किंतु राजा साहब इनका प्रतिवाद करने में अपनी बुध्दि और समय का अपव्यय न करते थे। यशस्वी बनना उनके जीवन का मुख्य उद्देश्य था। पर वह खूब जानते थे कि इस महान्‌ पद पर पहुँचने के लिए सेवा—और निरूस्वार्थ सेवा—के सिवा और कोई मार्ग नहीं है।

प्रातरूकाल था। राजा साहब स्नान—धयान से निवृत्ता होकर नगर का निरीक्षण करने जा ही रहे थे कि इतने में मिस्टर जॉन सेवक का मुलाकाती कार्ड पहुँचा। जॉन सेवक का राज्याधिकारियों से ज्यादा मेल—जोल थाए उनकी सिगरेट कम्पनी के हिस्सेदार भी अधिकांश अधिकारी लोग थे। राजा साहब ने कम्पनी की नियमावली देखी थीय पर जॉन सेवक से उनकी कभी भेंट न हुई थी। दोनों को एक दूसरे पर वह अविश्वास थाए जिसका आधार अफवाहों पर होता है। राजा साहब उन्हें खुशामदी और समय—सेवी समझते थे। जॉन सेवक को वह एक रहस्य प्रतीत होते थे। किंतु राजा साहब कल इंदु से मिलने गए थे। वहाँ सोफिया से उनकी भेंट हो गई थी। जॉन सेवक की कुछ चर्चा आ गई। उस समय मि. सेवक के विषय में उनकी धारणा बहुत कुछ परिवर्तित हो गई थी। कार्ड पाते ही बाहर निकल आएए और जॉन सेवक से हाथ मिलाकर अपने दीवानखाने में ले गए। जॉन सेवक को वह किसी योगी की कुटी—सा मालूम हुआए जहाँ अलंकारए सजावट का नाम भी न था। चंद कुर्सियों और एक मेज के सिवा वहाँ और कोई सामान न था। हाँए कागजों और समाचार—पत्रों का एक ढ़ेर मेज पर तितर—बितर पड़ा हुआ था।

हम किसी से मिलते ही अपने सूक्ष्म बुध्दि से जान जाते हैं कि हमारे विषय में उसके क्या भाव हैं। मि. सेवक को एक क्षण तक मुँह खोलने का साहस न हुआए कोई समयोचित भूमिका न सूझती थी। एक पृथ्वी से और दूसरा आकाश से इस अगम्य सागर को पार करने की सहायता माँग रहा था। राजा साहब को भूमिका तो सूझ गई थी—सोफी के देवोपम त्याग और सेवा की प्रशंसा से बढ़़कर और कौन—सी भूमिका होती—किंतु कतिपय मनुष्यों को अपनी प्रशंसा सुनने से जितना संकोच होता हैए उतना ही किसी दूसरे की प्रशंसा करने से होता है। जॉन सेवक में यह संकोच न था। वह निंदा और प्रशंसा दोनों ही के करने में समान रूप से कुशल थे। बोले—आपके दर्शनों की बहुत दिनों से इच्छा थीय लेकिन परिचय न होने के कारण न आ सकता था। औरए साफ बात यह है कि (मुस्कराकर) आपके विषय में अधिकारियों के मुख से ऐसी—ऐसी बातें सुनता थाए जो इस इच्छा को व्यक्त न होने देती थीं। लेकिन आपने निर्वाचन—क्षेत्रों को सुगम बनाने में जिस विशुध्द देश—प्रेम का परिचय दिया हैए उसने हाकिमों की मिथ्याक्षेपों की कलई खोल दी।

अधिकारियों के मिथ्याक्षेपों की चर्चा करके जॉन सेवक ने अपने वाक्—चातुर्य को सिध्द कर दिया। राजा साहब की सहानुभूति प्राप्त करने के लिए इससे सुलभ और कोई उपाय नहीं था। राजा साहब को अधिकारियों से यही शिकायत थीए इसी कारण उन्हें अपने कायोर्ं के सम्पादन में कठिनाई पड़ती थीए विलम्ब होता थाए बाधाएँ उपस्थित होती थीं। बोले—यह मेरा दुर्भाग्य है कि हुक्काम मुझ पर इतना अविश्वास करते हैं। मेरा अगर कोई अपराध हैए तो इतना ही कि जनता के लिए भी स्वास्थ्य और सुविधाओं को उतना ही आवश्यक समझता हूँए जितना हुक्काम और रईसों के लिए।

मिस्टर सेवक—महाशयए इन लोगों के दिमाग को कुछ न पूछिए। संसार इनके उपयोग के लिए है। और किसी को इसमें जीवित रहने का भी अधिकार नहीं है। जो प्राणी इनके द्वारा पर अपना मस्तक न घिसेए वह अपवादी हैए अशिष्ट हैए राजद्रोही हैय और जिस प्राणी में राष्ट्रीयता का लेश—मात्रा भी आभास हो—विशेषतरू वह जो यहाँ कला—कौशल और व्यवसाय को पुनर्जीवित करना चाहता होए दंडनीय है। राष्ट्र—सेवा इनकी द्रष्टि में सबसे अधाम पाप है। आपने मेरे सिगरेट के कारखाने की नियमावली तो देखी होगीघ्

महेंद्र—जी हाँए देखी थी।

जॉन सेवक—नियमावली का निकलना कहिए कि एक सिरे से अधिकारी वर्ग की निगाहें मुझसे फिर गईं। मैं उनका कृपा—भाजन थाए कितने ही अधिकारियों से मेरी मैत्री थी। किंतु उसी दिन से मैं उनकी बिरादरी से टाट—बाहर कर दिया गयाए मेरा हुक्का—पानी बंद हो गया। उनकी देखा—देखी हिंदुस्तानी हुक्काम और रईसों ने भी आनाकानी शुरू की। अब मैं उन लोगों की द्रष्टि में शैतान से भी ज्यादा भयंकर हूँ।

इतनी लम्बी भूमिका के बाद जॉन सेवक अपने मतलब पर आए। बहुत सकुचाते हुए अपना उद्देश्य प्रकट किया। राजा साहब मानव—चरित्र के ज्ञाता थेए बने हुए तिलकधारियों को खूब पहचानते थे। उन्हें मुगालता देना आसान न था। किंतु समस्या ऐसी आ पड़ी थी कि उन्हें अपनी धर्म—रक्षा के हेतु अविचार की शरण लेनी पड़ी। किसी दूसरे अवसर पर वह इस प्रस्ताव की ओर अॉंख उठाकर भी न देखते। एक दीन—दुर्बल अंधे की भूमि कोए जो उसके जीवन का एकमात्र आधार होए उसके कब्जे से निकालकर एक व्यवसायी को दे देना उनके सिध्दांत के विरुध्द था। पर आज पहली बार उन्हें अपने नियम को ताक पर रखना पड़ा। यह जानते हुए कि मिस सोफिया ने उनके एक निकटतम सम्बंधी की प्राण—रक्षा की हैए यह जानते हुए कि जॉन सेवक के साथ सद्व्‌यवहार करना कुँवर भरतसिंह को एक भारी ऋण से मुक्त कर देगाए वह इस प्रस्ताव की अवहेलना न कर सकते थे। कृतज्ञता हमसे वह सब कुछ करा लेती हैए जो नियम की द्रष्टि से त्याज्य है। यह वह चक्की हैए जो हमारे सिध्दांतों और नियमों को पीस डालती है। आदमी जितना ही निरूस्पृह होता हैए उपकार का बोझ उसे उतना ही असह्य होता है। राजा साहब ने इस मामले को जॉन सेवक क़्ी इच्छानुसार तय कर देने का वचन दियाए और मिस्टर सेवक अपनी सफलता पर फूले हुए घर आए।

स्त्री ने पूछा—क्या तय कर आएघ्

जॉन सेवक—वहीए जो तय करने गया था।

स्त्री —शुक्र हैए मुझे आशा न थी।

जॉन सेवक—यह सब सोफी के एहसान की बरकत है। नहीं तो यह महाशय सीधो मुँह से बात करनेवाले न थे। यह उसी के आत्मसमर्पण की शक्ति हैए जिसने महेन्द्रकुमार सिंह जैसे अभिमानी और बेमुरौवत आदमी को नीचा दिखा दिया। ऐसे तपाक से मिलेए मानो मैं उनका पुराना दोस्त हूँ। यह असाधय कार्य थाए और सफलता के लिए मैं सोफी का आभारी हूँ।

मिसेज सेवक—(क्रुध्द होकर) तो तुम जाकर उसे लिवा लाओए मैंने तो मना नहीं किया है। मुझे ऐसी बातें क्यों बार—बार सुनाते होघ् मैं तो अगर प्यासी मरती भी रहूँगीए तो उससे पानी न माँगूँगी। मुझे लल्लो—चप्पो नहीं आती। जो मन में हैए वही मुख में है। अगर वह खुदा से मुँह फेरकर अपनी टेक पर —ढ़़ रह सकती हैए तो मैं अपने ईमान पर —ढ़़ रहते हुए क्यों उसकी खुशामद करूँ।

प्रभु सेवक नित्य एक बार सोफिया से मिलने जाया करते था। कुँवर साहब और विनयए दोनों ही की विनयशीलता और शालीनता ने उसे मंत्र—मुग्धा कर दिया था। कुँवर साहब गुणज्ञ थे। उन्होंने पहले ही दिनए एक निगाह में ताड़ लिया कि वह साधारण बुध्दि का युवक नहीं है। उन पर शीघ्र ही प्रकट हो गया कि इसकी स्वाभाविक रुचि साहित्य—दर्शन की ओर है। वाणिज्य और व्यापार से इसे उतनी ही भक्ति हैए जितनी विनय की जमींदारी से। इसलिए वह प्रभु सेवक से प्रायरू साहित्य और काव्य आदि विषयों पर वर्तालाप किया करते थे। वह उसकी प्रवृत्तियों को राष्ट्रीयता के भावों से अलंकृत कर देना चाहते थे। प्रभु सेवक को भी ज्ञात हो गया कि यह महाशय काव्य—कला के मर्मज्ञ हैं। इनसे उसे वह स्नेह हो गया थाए जो कवियों को रसिक जनों से हुआ करता है। उसने इन्हें अपनी कई काव्य—रचनाएँ सुनाई थींए और उनकी उदार अभ्यर्थनाओं से उस पर एक नशा—सा छाया रहता था। वह हर वक्त रचना—विचार में निमग्न रहता। यह शंका और नैराश्यए जो प्रायरू नवीन साहित्य—सेवियों को अपनी रचनाओं के प्रचार और सम्मान के विषय में हुआ करता हैए कुँवर साहब के प्रोत्साहन के कारण विश्वास और उत्साह के रूप में परिवर्तित हो गया था। वही प्रभु सेवकए जो पहले हफ्तों कलम न उठाता थाए अब एक—एक दिन में कई कविताएँ रच डालता। उसके भावोद्‌गारों में सरिता के—से प्रवाह और बाहुल्य का आविर्भाव हो गया था। इस समय वह बैठा हुआ कुछ लिख रहा था। जॉन सेवक को आते देखकर वहाँ आया कि देखूँए क्या खबर लाए हैं। जमीन के मिलने में जो कठिनाइयाँ उपस्थित हो गई थींए उनसे उसे आशा हो गई थी कि कदाचित्‌ कुछ दिनों तक इस बंधान में न फँसना पड़े। जॉन सेवक की सफलता ने वह आशा भंग कर दी। मन की इस दशा में माता के अंतिम शब्द उसे बहुत प्रिय मालूम हुए। बोला—मामाए अगर आपका विचार है कि सोफी वहाँ निरादर और अपमान सह रही हैए और उकताकर स्वयं चली आवेगीए तो आप बड़ी भूल कर रही हैं। सोफी अगर वहाँ बरसों रहेए तो भी वे लोग उसका गला न छोड़ेंगे। मैंने इतने उदार और शीलवान प्राणी ही नहीं देखे। हाँए सोफी का आत्माभिमान इसे स्वीकार न करेगा कि वह चिरकाल तक उनके आतिथ्य और सज्जनता का उपभोग करें। इन दो सप्ताहों में वह जितनी क्षीण हो गई हैए उतनी महीनों बीमार रहकर भी न हो सकती थी। उसे संसार के सब सुख प्राप्त हैंय किंतु जैसे कोई शीतप्रधान देश का पौधा उष्ण देश में आकर अनेकों यत्न करने पर भी दिन—दिन सूखता जाता हैए वैसी ही दशा उसकी भी हो गई है। उसे रात—दिन यही चिंता व्याप्त रहती है कि कहाँ जाऊँए क्या करूँघ् अगर आपने जल्द उसे वहाँ से बुला न लियाए तो आपको पछताना पड़ेगा। वह आजकल बौध्द और जैन—ग्रंथों को देखा करती हैए और मुझे आश्चर्य न होगाए अगर वह हमसे सदा के लिए छूट जाए।

जॉन सेवक—तुम तो रोज वहाँ जाते होए क्यों अपने साथ नहीं लातेघ्

मिसेज सेवक—मुझे इसकी चिंता नहीं है। प्रभु मसीह का द्रोही मेरे यहाँ आश्रय नहीं पा सकता।

प्रभु सेवक—गिरजे न जाना ही अगर प्रभु मसीह का द्रोही बनना हैए तो लीजिए आज से मैं भी गिरजे न जाऊँगा। निकाल दीजिए मुझे भी घर से।

मिसेज सेवक—(रोकर) तो यहाँ मेरा ही क्या रखा है। अगर मैं ही विष की गाँठ हूँए तो मैं मुँह के कालिख लगाकर क्यों न निकल जाऊँ। तुम और सोफी आराम से रहोए मेरा भी खुदा मालिक है।

जॉन सेवक—प्रभुए तुम मेरे सामने अपनी माँ का निरादर नहीं कर सकते।

प्रभु सेवक—खुदा न करेए मैं अपनी माँ का निरादर करूँ। लेनिक मैं दिखावे के धर्म के लिए अपनी आत्मा पर यह अत्याचार न होने दूँगा। आप लोगों की नाराजी के खौफ से अब तक मैंने इस विषय में कभी मुँह नहीं खोला। लेकिन जब देखता हूँ कि और किसी बात में तो धर्म की परवा नहीं की जातीए और सारा धार्मानुराग दिखावे के धर्म पर ही किया जा रहा हैए तो मुझे संदेह होने लगता है कि इसका तात्पर्य कुछ और तो नहीं!

जॉन सेवक—तुमने किस बात में मुझे धर्म के विरुध्द आचरण करते देखाघ्

प्रभु सेवक—सैकड़ों ही बातें हैंए एक हो तो कहूँ।

जॉन सेवक—नहींए एक ही बतलाओ।

प्रभु सेवक—उस बेकस अंधे की जमीन परए कब्जा करने के लिए आप जिन साधानों का उपयोग कर रहे हैंए क्या वे धर्मसंगत हैंघ् धर्म का अंत वहीं हो गयाए जब उसने कहा दिया कि मैं अपनी जमीन किसी तरह न दूँगा। जब कानूनी विधानों सेए कूटनीति सेए धमकियों से अपना मतलब निकालना आपको धर्मसंगत मालूम होता होय पर मुझे तो वह सर्वथा अधर्म और अन्याय ही प्रतीत होता है।

जॉन सेवक—तुम इस वक्त अपने होश में नहीं होए मैं तुमसे वाद—विवाद नहीं करना चाहता। पहले जाकर शांत हो जाओए फिर मैं तुम्हें इसका उत्तर दूँगा।

प्रभु सेवक क्रोध से भरा हुआ अपने कमरे में आया और सोचने लगा कि क्या करूँ। यहाँ तक उसका सत्याग्रह शब्दों ही तक सीमित थाए अब उसके क्रियात्मक होने का अवसर आ गयाए पर क्रियात्मक शक्ति का उसके चरित्र में एकमात्र अभाव था। इस उद्विग्न दशा में वह कभी एक कोट पहनताए कभी उसे उतारकर दूसरा पहनताए कभी कमरे के बाहर चला जाताए कभी अंदर आ जाता। सहसा जॉन सेवक आकर बैठ गएए और गम्भीर भाव से बोले—प्रभुए आज तुम्हारा आवेश देखकर मुझे जितना दुरूख हुआ हैए उससे कहीं अधिक चिंता हुई है। मुझे अब तक तुम्हारी व्यावहारिक बुध्दि पर विश्वास थाय पर अब विश्वास उठ गया। मुझे निश्चय था कि तुम जीवन और धर्म के सम्बंध को भलीभाँति समझते होय पर अब ज्ञात हुआ कि सोफी और अपनी माता की भाँति तुम भी भ्रम में पड़े हुए हो। क्या तुम समझते हो कि मैं और मुझ—जैसे और हजारों आदमीए जो नित्य गिरजे आते हैंए भजन गाते हैंए अॉंखें बंद करके ईश—प्रार्थना करते हैंए धार्मानुराग में डूबे हुए हैंघ् कदापि नहीं। अगर अब तक तुम्हें नहीं मालूम हैए तो अब मालूम हो जाना चाहिए कि धर्म केवल स्वार्थ—संगठन है। सम्भव हैए तुम्हें ईसा पर विश्वास होए शायद तुम उन्हें खुदा का बेटा या कम—से—कम महात्मा समझते होए पर मुझे तो यह भी विश्वास नहीं है। मेरे हृदय में उनके प्रति उतनी ही श्रध्दा हैए जितनी किसी मामूली फकीर के प्रति। उसी प्रकार फकीर भी दान और क्षमा की महिमा गाता फिरता हैए परलोक के सुखों का राग गाया करता है। वह भी उतना ही त्यागीए उतना ही दीनए उतना ही धर्मरत है। लेकिन इतना अविश्वास होने पर भी मैं रविवार को सौ काम छोड़कर गिरजे अवश्य जाता हूँ। न जाने से अपने समाज में अपमान होगाए उसका मेरे व्यवसाय पर बुरा असर पड़ेगा। फिर अपने ही घर में अशांति फैल जाएगी। मैं केवल तुम्हारी माता की खातिर से अपने ऊपर यह अत्याचार करता हूँए और तुमसे भी मेरा यही अनुरोध है कि व्यर्थ का दुराग्रह न करो। तुम्हारी माता क्रोध के योग्य नहींए दया के योग्य हैं। बोलोए तुम्हें कुछ कहना हैघ्

प्रभु सेवक—जी नहीं।

जॉन सेवक—अब तो फिर इतनी उच्छृंखलता न करोगेघ्

प्रभु सेवक ने मुस्कराकर कहा—जी नहीं।

'''

अध्याय 6

धर्मभीरुता में जहाँ अनेक गुण हैंए वहाँ एक अवगुण भी हैय वह सरल होती है। पाखंडियों का दाँव उस पर सहज ही में चल जाता है। धर्मभीरु प्राणी तार्किक नहीं होता। उसकी विवेचना—शक्ति शिथिल हो जाती है। ताहिर अली ने जब से अपनी दोनों विमाताओं की बाते सुनी थींए उनके हृदय में घोर अशांति हो रही थी। बार—बार खुदा से दुआ माँगते थेए नीति—ग्रंथों से अपनी शंका का समाधान करने की चेष्टा करते थे। दिन तो किसी तरह गुजराए संध्या होते ही वह मि. जॉन सेवक के पास पहुँचे और बड़े विनीत शब्दों में बोले—हुजूर की खिदमत में इस वक्त एक खास अर्ज करने के लिए हाजिर हुआ हूँ। इर्शाद हो तो कहूँ।

जॉन सेवक—हाँ—हाँए कहिएए कोई नई बात है क्याघ्

ताहिर—हुजूर उस अंधे की जमीन लेने का खयाल छोड़ देंए तो बहुत ही मुनासिब हो। हजारों दिक्कतें हैं। अकेला सूरदास ही नहींए सारा मुहल्ला लड़ने पर तुला हुआ है। खासकर नायकराम पंडा बहुत बिगड़ा हुआ है। वह बड़ा खौफनायक आदमी है। जाने कितनी बार फौजदारियाँ कर चुका है। अगर ये सब दिक्कतें किसी तरह दूर भी हो जाएँए तो भी मैं आपसे यही अर्ज करूँगा कि इसके बजाए किसी दूसरी जमीन की फिक्र कीजिए।

जॉन सेवक—यह क्योंघ्

ताहिर—हुजूरए यह सब अजाब का काम है। सैंकड़ों आदमियों का काम उस जमीन से निकलता हैए सबकी गायें वहीं चरती हैंए बरातें ठहरती हैंए प्लेग के दिनो में लोग वहीं झोंपड़े डालते हैं। वह जमीन निकल गईए तो सारी आबादी को तकलीफ होगीए और लोग दिल में हमें सैंकड़ों बददुआएँ देंगे। इसका अजाब जरूर पड़ेगा।

जॉन सेवक—(हँसकर) अजाब तो मेरी गरदन पर पड़ेगा नघ् मैं उसका बोझ उठा सकता हूँ।

ताहिर—हुजूरए मैं भी तो आप ही के दामन से लगा हुआ हूँ। मैं उस अजाब से कब बच सकता हूँघ् बल्कि मुहल्लेवाले मुझी को बागी समझते हैं। हुजूर तो यहाँ तशरीफ रखते हैंए मैं तो आठों पहर उनकी अॉंखों के सामने रहूँगाए नित्य उनकी नजरों में खटकता रहूँगाए औरतें भी राह चलते दो गालियाँ सुना दिया करेंगी। बाल—बच्चों वाला आदमी हूँय खुदा जाने क्या पड़ेए क्या न पड़े। आखिर शहर के करीब और जमीनें भी तो मिल सकती हैं।

धर्मभीरुता जड़वादियों की द्रष्टि में हास्यास्पद बन जाती है। विशेषतरू एक जवान आदमी में तो यह अक्षम्य समझी जाती है। जॉन सेवक ने कृत्रिम क्रोध धारण करके कहा—मेरे भी बाल—बच्चे हैं। जब मैं नहीं डरताए तो आप क्यों डरते हैंघ् क्या आप समझते हैं कि मुझे अपने बाल—बच्चे प्यारे नहींए या मैं खुदा से नहीं डरताघ्

ताहिर—आप साहबे—एकबाल हैंए आपको अजाब का खौफ नहीं। एकबाल वालों से अजाब भी काँपता है। खुदा का कहर गरीबों ही पर गिरता है।

जॉन सेवक—इस नए धर्म—सिध्दांत के जन्मदाता शायद आप ही होंगेय क्योंकि मैंने आज तक कभी नहीं सुना कि ऐश्वर्य से ईश्वरीय कोप भी डरता है। बल्कि हमारे धर्म—ग्रंथों में तो धानिकों के लिए स्वर्ग का द्वार ही बंद कर दिया गया है।

ताहिर—हुजूरए मुझे इस झगड़े से दूर रखेंए तो अच्छा हो।

जॉन सेवक—आज आपको इस झगड़े से दूर रखूँए कल आपको यह शंका हो कि पशु—हत्या से खुदा नाराज होता हैए आप मुझे वालों की खरीद से दूर रखेंए तो मैं आपको किन—किन बातों से दूर रखूँगाए और कहाँ—कहाँ ईश्वर के कोप से आपकी रक्षा करूँगाघ् इससे तो कहीं अच्छा यही है कि आपको अपने ही से दूर रखूँ। मेरे यहाँ रहकर आपको ईश्वरीय कोप का सामना करना पड़ेगा।

मिसेज सेवक—जब आपको ईश्वरीय कोप का इतना भय हैए तो आपसे हमारे यहाँ काम नहीं हो सकता।

ताहिर—मुझे हुजूर की खिदमत से इनकार थोड़े ही हैए मैं तो सिर्फ...

मिसेज सेवक—आपको हमारी प्रत्येक आज्ञा का पालन करना पड़ेगाए चाहे उससे आपका खुदा खुश हो या नाखुश। हम अपने कामों में आपके खुदा को हस्तक्षेप न करने देंगे।

ताहिर अली हताश हो गए। मन को समझाने लगे—ईश्वर दयालु हैए क्या वह देखता नहीं कि मैं कैसी बेड़ियों में जकड़ा हुआ हूँ। मेरा इसमें क्या वश हैघ् अगर स्वामी की आज्ञाओं को न मानूँए तो कुटुम्ब का पालन क्योंकर हो। बरसों मारे—मारे फिरने के बाद तो यह ठिकाने की नौकरी हाथ आई है। इसे छोड़ दूँए तो फिर उसी तरह की ठोकरें खानी पड़ेंगी। अभी कुछ और नहीं हैए तो रोटी—दाल का सहारा तो है। गृहचिंता आत्मचिंतन की घातिका है।

ताहिर अली को निरुत्तार होना पड़ा। बेचारे अपने स्त्री के सारे गहने बेचकर खा चुके थे। अब एक छल्ला भी न था। माहिर अली अंगरेजी पढ़़ता था। उसके लिए अच्छे कपड़े बनवाने पड़तेए प्रतिमास फीस देनी पड़ती। जाबिर अली और जाहिर अली उर्दू मदरसे में पढ़़ते थेय किंतु उनकी माता नित्य जान खाया करती थीं कि इन्हें भी अंगरेजी मदरसे में दाखिल करा दोए उर्दू पढ़़ाकर क्या चपरासगिरी करानी हैघ् अंगरेजी थोड़ी भी आ जाएगीए तो किसी—न—किसी दफ्तर में घुस ही जाएँगे। भाइयों के लालन—पालन पर उनकी आवश्यकताएँ ठोकर खाती रहती थीं। पाजामे में इतने पैबंद लग जाते थे कि कपड़े का यथार्थ रूप छिप जाता था। नए जूते तो शायद इन पाँच बरसों में उन्हें नसीब ही नहीं हुए। माहिर अली के पुराने जूतों पर संतोष करना पड़ता था। सौभाग्य से माहिर अली के पाँव बड़े थे। यथासाधय यह भाइयों को कष्ट न होने देते थे। लेकिन कभी हाथ तंग रहने के कारण उनके लिए नए कपड़े न बनवा सकतेए या फीस देने में देर हो जातीए या नाश्ता न मिल सकताए या मदरसे में जलपान करने के लिए पैसे न मिलतेए तो दोनों माताएँ व्यंग्यों और कटूक्तियों से उनका हृदय छेद डालती थीं। बेकारी के दिनों में वह बहुधाए अपना बोझ हलका करने के लिएए स्त्री और बच्चों को मैके पहुँचा दिया करते थे। उपहास से बचने के खयाल से एक—आधा महीने के लिए बुला लेतेए और फिर किसी—न—किसी बहाने से विदा कर देते। जब से मि. जॉन सेवक की शरण आए थेए एक प्रकार से उनके सुदिन आ गए थेय कल की चिंता सिर पर सवार न रहती थी। माहिर अली की उम्र पंद्रह से अधिक हो गई थी। अब सारी आशाएँ उसी पर अवलम्बित थीं। सोचतेए जब माहिर मैटी्रक पास हो जाएगाए तो साहब से सिफारिश कराके पुलिस में भरती करा दूँगा। पचास रुपये से क्या कम वेतन मिलेगा! हम दोनों भाइयों की आय मिलाकर 80 रुपये हो जाएगी। तब जीवन का कुछ आनंद मिलेगा। तब तक जाहिर अली भी हाथ—पैर सम्भाल लेगाए फिर चौन ही चौन है। बसए तीन—चार साल की और तकलीफ है। स्त्री से बहुधा झगड़ा हो जाता। वह कहा करती—ये भाई—बंद एक भी काम न आएँगे। ज्यों ही अवसर मिलाए पर झाड़कर निकल जाएँगेए तुम खड़े ताकते रह जाओगे। ताहिर अली इन बातों पर स्त्री से रूठ जाते। उसे घर में आग लगाने वालीए विष की गाँठ कहकर रुलाते।

आशाओं और चिंताओं से इतना दबा हुआ व्यक्ति मिसेज सेवक के कटु वाक्यों का क्या उत्तर देता! स्वामी के कोप ने ईश्वर के कोप को परास्त कर दिया। व्यथित कंठ से बोले—हुजूर का नमक खाता हूँए आपकी मरजी मेरे लिए खुदा के हुक्म का दरजा रखती है। किताबों में आका को खुश करने का वही सबाब लिखा हैए जो खुदा को खुश रखने का है। हुजूर की नमकहरामी करके खुदा को क्या मुँह दिखाऊँगा!

जॉन सेवक—हाँए अब आप आए सीधो रास्ते पर। जाइएए अपना काम कीजिए। धर्म और व्यापार को एक तराजू तौलना मूर्खता है। धर्म धर्म हैए व्यापार व्यापारय परस्पर कोई सम्बंध नहीं। संसार में जीवित रहने के लिए किसी व्यापार की जरूरत हैए धर्म की नहीं। धर्म तो व्यापार का शृंगार है। वह धानाधीशों ही को शोभा देता है। खुदा आपको समाई देए अवकाश मिलेए घर में फालतू रुपये होंए तो नमाज पढ़़िएए हज कीजिएए मसजिद बनवाइएए कुएँ खुदवाइएय तब मजहब हैए खाली पेट खुदा को नाम लेना पाप है।

ताहिर अली ने झुककर सलाम किया और घर लौट आए।

'''

अध्याय 7

संध्या हो गई थी। किंतु फागुन लगने पर भी सर्दी के मारे हाथ—पाँव अकड़ते थे। ठंडी हवा के झोंके शरीर की हड्डियों में चुभे जाते थे। जाड़ाए इंद्र की मदद पाकर फिर अपनी बिखरी हुई शक्तियों का संचय कर रहा था और प्राणपण से समय—चक्र को पलट देना चाहता था। बादल भी थेए बूँदें भी थींए ठंडी हवा भी थीए कुहरा भी था। इतनी विभिन्न शक्तियों के मुकाबिले में ऋतुराज की एक न चलती। लोग लिहाफ में यों मुँह छिपाए हुए थेए जैसे चूहे बिलों में से झाँकते हैं। दूकानदार अंगीठियों के सामनेए बैठे हाथ सेंकते थे। पैसों के सौदे नहींए मुरौवत के सौदे बेचते थे। राह चलते लोग अलाव पर यों गिरते थेए मानो दीपक पर पतंगे गिरते हों। बड़े घरों की स्त्रियाँ मनाती थीं—मिसराइन न आएए तो आज भोजन बनाएँए चूल्हे के सामने बैठने का अवसर मिले। चाय की दूकानों पर जमघट रहता था। ठाकुरदीन के पान छबड़ी में पड़े सड़ रहे थेय पर उसकी हिम्मत न पड़ती थी कि उन्हें फेरे! सूरदास अपनी जगह पर तो आ बैठा थाय पर इधार—उधार से सूखी टहनियाँ बटोरकर जला ली थीं और हाथ सेंक रहा था। सवारियाँ आज कहाँ! हाँए कोई इक्का—दुक्का मुसाफिर निकल जाता थाए तो बैठे—बैठे उसका कल्याण मना लेता था। जब से सैयद ताहिर अली ने उसे धामकियाँ दी थींए जमीन के निकल जाने की शंका उसके हृदय पर छाई रहती थी। सोचता—क्या इसी दिन के लिएए मैंने इस जमीन का इतना जतन किया थाघ् मेरे दिन सदा यों ही थोड़े ही रहेंगेए कभी तो लच्छमी प्रसन्न होंगी! अंधों की आँखें न खुलेंय पर भाग खुल सकता है। कौन जानेए कोई दानी मिल जाएए या मेरे ही हाथ में धीरे—धीरे कुछ रुपये इकट्ठे हो जाएँए बनते देर नहीं लगती। यही अभिलाषा थी कि यहाँ एक कुआँ और एक छोटा—सा मंदिर बनवा देताए मरने के पीछे अपनी कुछ निशानी रहती। नहीं तो कौन जानेगा कि अंधा कौन था। पिसनहारी ने कुआँ खुदवाया थाए आज तक उसका नाम चला जाता है। झक्कड़ साईं ने बावली बनवाई थीए आज तक झक्कड़ की बावली मशहूर है। जमीन निकल गईए तो नाम डूब जाएगा। कुछ रुपये मिले भीए तो किस काम केघ्

नायकराम उसे ढ़ाढ़़स देता रहता था—तुम कुछ चिंता मत करोए कौन माँ का बेटा हैए जो मेरे रहते तुम्हारी जमीन निकाल ले। लहू की नदी बहा दूँगा। उस किरंटे की क्या मजालए गोदाम में आग लगा दूँगाए इधार का रास्ता छुड़ा दूँगा। वह है किस गुमान में! बस तुम हामी न भरना। किंतु इन शब्दों से जो तस्कीन होती थीए वह भैरों और जगधार कीर् ईर्ष्‌यापूर्ण वितंडाओं से मिट जाती थीए और वह एक लम्बी साँस खींचकर रह जाता था।

वह इन्हीं विचारों में मग्न था कि नायकराम कंधो पर लट्ठ रखेए एक अंगोछा कंधो पर डालेए पान के बीड़े मुँह में भरेए आकर खड़ा हो गया और बोला—सूरदासए बैठे टापते ही रहोगेघ् साँझ हो गईए हवा खानेवाले अब इस ठंड में न निकलेंगे। खाने—भर को मिल गया कि नहींघ्

सूरदास—कहाँ महाराजए आज तो एक भागवान से भी भेंट न हुई।

नायकराम—जो भाग्य में थाए मिल गया। चलोए घर चलें। बहुत ठंड लगती होए तो मेरा यह अंगोछा कंधो पर डाल लो। मैं तो इधार आया था कि कहीं साहब मिल जाएँए तो दो—दो बातें कर लूँ। फिर एक बार उनकी और हमारी भी हो जाए।

सूरदास चलने को उठा ही था कि सहसा एक गाड़ी की आहट मिली। रुक गया। आस बँधी। एक क्षण में फिटन आ पहुँची। सूरदास ने आगे बढ़़कर कहा—दाताए भगवान्‌ तुम्हारा कल्यान करेंए अंधे की खबर लीजिए।

फिटन रुक गईए और चतारी के राजा साहब उतर पड़े। नायकराम उनका पंडा था। साल में दो—चार सौ रुपये उनकी रियासत से पाता था। उन्हें आशीर्वाद देकर बोला—सरकार का इधार कैसे आना हुआघ् आज तो बड़ी ठंड है।

राजा साहब—यही सूरदास हैए जिसकी जमीन आगे पड़ती हैघ् आओए तुम दोनों आदमी मेरे साथ बैठ जाओए मैं जरा उस जमीन को देखना चाहता हूँ।

नायकराम—सरकार चलेंए हम दोनों पीछे—पीछे आते हैं।

राजा साहब—अजी आकर बैठ जाओए तुम्हें आने में देर होगीए और मैंने अभी संध्या नहीं की है।

सूरदास—पंडाजीए तुम बैठ जाओए मैं दौड़ता हुआ चलूँगाए गाड़ी के साथ—ही—साथ पहुँचूँगा।

राजा साहब—नहीं—नहींए तुम्हारे बैठने में कोई हरज नहीं हैए तुम इस समय भिखारी सूरदास नहींए जमींदार सूरदास हो।

नायकराम—बैठो सूरेए बैठो। हमारे सरकार साक्षात्‌ देवरूप हैं।

सूरदास—पंडाजीए मैं...

राजा साहब—पंडाजीए तुम इनका हाथ पकड़कर बिठा दोए यों न बैठेंगे।

नायकराम ने सूरदास को गोद में उठाकर गद्दी पर बैठा दियाए आप भी बैठेए और फिटन चली। सूरदास को अपने जीवन में फिटन पर बैठने का यह पहला ही अवसर था। ऐसा जान पड़ता था कि मैं उड़ा जा रहा हूँ। तीन—चार मिनट में जब गोदाम पर गाड़ी रुक गई और राजा साहब उतर पड़ेए तो सूरदास को आश्चर्य हुआ कि इतनी जल्दी क्योंकर आ गए।

राजा साहब—जमीन तो बड़े मौके की है।

सूरदास—सरकारए बाप—दादों की निसानी है।

सूरदास के मन में भाँति—भाँति की शंकाएँ उठ रही थीं—क्या साहब ने इनको यह जमीन देखने के लिए भेजा हैघ् सुना हैए यह बड़े धार्मात्मा पुरुष हैं। तो इन्होंने साहब को समझा क्यों न दियाघ् बड़े आदमी सब एक होते हैंए चाहे हिंदू हों या तुर्कय तभी तो मेरा इतना आदर कर रहे हैंए जैसे बकरे की गरदन काटने से पहले उसे भर—पेट दाना खिला देते हैं। लेकिन मैं इनकी बातों में आनेवाला नहीं हूँ।

राजा साहब—असामियों के साथ बंदोबस्त हैंघ्

नायकराम—नहीं सरकारए ऐसे ही परती पड़ी रहती हैए सारे मुहल्ले की गऊएं यहीं चरने आती हैं। उठा दी जाएए तो 200 रुपये से कम नफा न होए पर यह कहता हैए जब भगवान्‌ मुझे यों ही खाने—भर को देते हैंए तो इसे क्यों उठाऊँ।

राजा साहब—अच्छाए तो सूरदास दान लेता ही नहींए देता भी है। ऐसे प्राणियों के दर्शन ही से पुण्य होता है।

नायकराम की निगाह में सूरदास का इतना आदर कभी न हुआ था। बोले—हुजूरए उस जन्म का कोई बड़ा भारी महात्मा है।

राजा साहब—उस जन्म का नहींए इस जन्म का महात्मा है।

सच्चा दानी प्रसिध्दि का अभिलाषी नहीं होता। सूरदास को अपने त्याग और दान के महत्व का ज्ञान ही न था। शायद होताए तो स्वभाव में इतनी सरल दीनता न रहतीए अपनी प्रशंसा कानों को मधुर लगती है। सभ्य द्रष्टि में दान का यही सर्वोत्ताम पुरस्कार है। सूरदास का दान पृथ्वी या आकाश का दान थाए जिसे स्तुति या कीर्ति की चिंता नहीं होती। उसे राजा साहब की उदारता में कपट की गंधा आ रही थी। वह यह जानने के लिए विकल हो रहा था कि राजा साहब का इन बातों से अभिप्राय क्या है।

नायकराम राजा साहब को खुश करने के लिए सूरदास का गुणानुवाद करने लगे—धार्मावतारए इतने पर भी इन्हें चौन नहीं है। यहाँए धर्मशालाए मंदिर और कुआँ बनवाने का विचार कर रहे हैं।

राजा साहब—वाहए तब तो बात ही बन गई। क्यों सूरदासए तुम इस जमीन में से 9 बीघे मिस्टर जॉन सेवक को दे दो। उनसे जो रुपये मिलेंए उन्हें धर्म—कार्य में लगा दो। इस तरह तुम्हारी अभिलाषा भी पूरी हो जाएगी और काम भी निकल जाएगा। दूसरों से इतने अच्छे दाम न मिलेंगे। बोलोए कितने रुपये दिला दूँघ्

नायकराम सूरदास को मौन देखकर डरे कि कहीं यह इनकार कर बैठाए तो मेरी बात गई! बोले—सूरेए हमारे मालिक को जानते हो नए चतारी के महाराज हैंए इसी दरबार से हमारी परवरिस होती है। मिनिसपलटी के सबसे बड़े हाकिम हैं। आपके हुक्म बिना कोई अपने द्वार पर खूँटा भी नहीं गाड़ सकता। चाहेंए तो सब इक्केवालों को पकड़वा लेंए सारे शहर का पानी बंद कर दें।

सूरदास—जब आपका इतना बड़ा अखतियार हैए तो साहब को कोई दूसरी जमीन क्यों नहीं दिला देतेघ्

राजा साहब—ऐसे अच्छे मौके पर शहर में दूसरी जमीन मिलनी मुश्किल है। लेकिन तुम्हें इसके देने में क्या आपत्ति हैघ् इस तरह न जाने कितने दिनों में तुम्हारी मनोकामनाएँ पूरी होंगी। यह तो बहुत अच्छा अवसर हाथ आयाए रुपये लेकर धर्म—कार्य में लगा दो।

सूरदास—महाराजए मैं खुशी से जमीन न बेचूँगा।

नायकराम—सूरेए कुछ भंग तो नहीं खा गएघ् कुछ खयाल हैए किससे बातें कर रहे हो!

सूरदास—पंडाजीए सब खियाल हैए आँखें नहीं हैंए तो क्या अक्किल भी नहीं है! पर जब मेरी चीज है ही नहींए तो मैं उसका बेचनेवाला कौन होता हूँघ्

राजा साहब—यह जमीन तो तुम्हारी ही हैघ्

सूरदास—नहीं सरकारए मेरी नहींए मेरे बाप—दादों की है। मेरी चीज वही हैए जो मैंने अपने बाँह—बल से पैदा की हो। यह जमीन मुझे धारोहर मिली हैए मैं इसका मालिक नहीं हूँ।

राजा साहब—सूरदासए तुम्हारी यह बात मेरे मन में बैठ गई। अगर और जमींदारों के दिल में ऐसे ही भाव होतेए तो आज सैकड़ों घर यों तबाह न होते। केवल भोग—विलास के लिए लोग बड़ी—बड़ी रियासतें बरबाद कर देते हैं। पंडाजीए मैंने सभा में यही प्रस्ताव पेश किया है कि जमींदारों को अपनी जायदाद बेचने का अधिकार न रहेए लेकिन जो जायदाद धर्म—कार्य के लिए बेची जाएए उसे मैं बेचना नहीं कहता।

सूरदास—धारमावतारए मेरा तो इस जमीन के साथ इतना ही नाता है कि जब तक जिऊँए इसकी रक्षा करूँए और मरूँए तो इसे ज्यों—की—त्यों छोड़ जाऊँ।

राजा साहब—लेकिन यह तो सोचो कि तुम अपनी जमीन का एक भाग केवल इसलिए दूसरे को दे रहे हो कि मंदिर बनवाने के लिए रुपये मिल जाएँ।

नायकराम—बोलो सूरेए महाराज की इस बात का क्या जवाब देते होघ्

सूरदास—मैं सरकार की बातों का जवाब देने जोग हूँ कि जवाब दूँघ् लेकिन इतना तो सरकार जानते ही हैं कि लोग उँगली पकड़ते—पकड़ते पहुँचा पकड़ लेते हैं।

साहब पहले तो न बोलेंगेए फिर धीरे—धीरे हाता बना लेंगेए कोई मंदिर में जाने न पाएगाए उनसे कौन रोज—रोज लड़ाई करेगा।

नायकराम—दीनबंधुए सूरदास ने यह बात पक्की कहीए बड़े आदमियों से कौन लड़ता फिरेगाघ्

राजा साहब—साहब क्या करेंगेए क्या तुम्हारा मंदिर खोदकर फेंक देंगेघ्

नायकराम—बोलो सूरेए अब क्या कहते होघ्

सूरदास—सरकारए गरीब की घरवाली गाँव—भर की भावज होती है। साहब किरस्तान हैंए धरमशाले में तमाकू का गोदाम बनाएँगेए मंदिर में उनके मजूर सोएँगेए कुएँ पर उनके मजूरों का अड्डा होगाए बहू—बेटीयाँ पानी भरने न जा सकेंगी। साहब न करेंगेए साहब के लड़के करेंगे। मेरे बाप—दादों का नाम डूब जाएगा। सरकारए मुझे इस दलदल में न फँसाइए।

नायकराम—धारमावतारए सूरदास की बात मेरे मन में भी बैठती है। थोड़े दिनों में मंदिरए धरमशालाए कुआँए सब साहब का हो जाएगाए इसमें संदेह नहीं।

राजा साहब—अच्छाए यह भी मानाय लेकिन जरा यह भी तो सोचो कि इस कारखाने से लोगों को क्या फायदा होगा। हजारों मजदूरए मिस्त्री ए बाबूए मुंशीए लुहारए बढ़़ई आकर आबाद हो जाएँगेए एक अच्छी बस्ती हो जाएगीए बनियों की नई—नई दूकानें खुल जाएँगीए आस—पास के किसानों को अपनी शाक—भाजी लेकर शहर न जाना पड़ेगाए यहीं खरे दाम मिल जाएँगे। कुँजड़ेए खटीकए ग्वालेए धोबीए दरजीए सभी को लाभ होगा। क्या तुम इस पुण्य के भागी न बनोगेघ्

नायकराम—अब बोलो सूरेए अब तो कुछ नहीं कहना हैघ् हमारे सरकार की भलमंसी है कि तुमसे इतनी दलील कर रहे हैं। दूसरा हाकिम होता तो एक हुकुमनामे में सारी जमीन तुम्हारे हाथ से निकल जाती।

सूरदास—भैयाए इसीलिए न लोग चाहते हैं कि हाकिम धारमात्मा होए नहीं तो क्या देखते नहीं हैं कि हाकिम लोग बिना डाम—फूल—सूअर के बात नहीं करते। उनके सामने खड़े होने का तो हियाव ही नहीं होताए बातें कौन करता। इसीलिए तो मानते हैं कि हमारे राजों—महाराजों का राज होताए जो हमारा दुरूख—दर्द सुनते। सरकार बहुत ठीक कहते हैंए मुहल्ले की रौनक जरूर बढ़़ जाएगीए रोजगारी लोगों को फायदा भी खूब होगा। लेकिन जहाँ यह रौनक बढ़़ेगीए वहाँ ताड़ी—शराब का भी तो परचार बढ़़ जाएगाए कसबियाँ भी तो आकर बस जाएँगीए परदेशी आदमी हमारी बहू—बेटीयों को धूरेंगेए कितना अधरम होगा! दिहात के किसान अपना काम छोड़कर मजूरी के लालच से दौड़ेंगेए यहाँ बुरी—बुरी बातें सीखेंगे और अपने बुरे आचरन अपने गाँव में फैलाएँगे। दिहातों की लड़कियाँए बहुएँ मजूरी करने आएँगी और यहाँ पैसे के लोभ में अपना धरम बिगाड़ेंगी। यही रौनक शहरों में है। वही रौनक यहाँ हो जाएगी। भगवान्‌ न करेंए यहाँ वह रौनक हो। सरकारए मुझे इस कुकरम और अधरम से बचाएँ। यह सारा पाप मेरे सिर पड़ेगा।

नायकराम—दीनबंधुए सूरदास बहुत पक्की बात कहता है। कलकत्तााए बम्बईए अहमदाबादए कानपुरए आपके अकबाल से सभी जगह घूम आया हूँए जजमान लोग बुलाते रहते हैं। जहाँ—जहाँ कल—कारखाने हैंए वहाँ यही हाल देखा है।

राजा साहब—क्या बुराइयाँ तीर्थस्थान में नहीं हैंघ्

सूरदास—सरकारए उनका सुधार भी तो बड़े आदमियों ही के हाथ में हैए जहाँ बुरी बातें पहले ही से हैंए वहाँ से हटाने के बदले उन्हें और फैलाना तो ठीक नहीं है।

राजा साहब—ठीक कहते हो सूरदासए बहुत ठीक कहते हो। तुम जीतेए मैं हार गया। जिस वक्त मैंने साहब से इस जमीन को तय करा देने का वादा किया थाए ये बातें मेरे धयान में न आई थीं। अब तुम निश्चिंत हो जाओए मैं साहब से कह दूँगाए सूरदास अपनी जमीन नहीं देता। नायकरामए देखोए सूरदास को किसी बात की तकलीफ न होने पाएए अब मैं चलता हूँ। यह लो सूरदासए यह तुम्हारी इतनी दूर आने की मजूरी है।

यह कहकर उन्होंने एक रुपया सूरदास के हाथ में रखा और चल दिए।

नायकराम ने कहा—सूरदासए आज राजा साहब भी तुम्हारी खोपड़ी को मान गए।

'''

अध्याय 8

सोफिया को इंदु के साथ रहते चार महीने गुजर गए। अपने घर और घरवालों की याद आते ही उसके हृदय में एक ज्वाला—सी प्रज्वलित हो जाती थी। प्रभु सेवक नित्यप्रति उससे एक बार मिलने आताय पर कभी उससे घर का कुशल—समाचार न पूछती। वह कभी हवा खाने भी न जाती कि कहीं मामा से साक्षात्‌ न हो जाए। यद्यपि इंदु ने उसकी परिस्थिति को सबसे गुप्त रखा थाय पर अनुमान से सभी प्राणी उसकी यथार्थ दशा से परिचित हो गए थे। इसलिए प्रत्येक प्राणी को यह ख्याल रहता था कि कोई ऐसी बात न होने पावेए जो उसे अप्रिय प्रतीत हो! इंदु को तो उससे इतना प्रेम हो गया था कि अधिकतर उसी के पास बैठी रहती। उसकी संगति में इंदु को भी धर्म और दर्शन के ग्रंथों से रुचि होने लगी।

घर टपकता होए तो उसकी मरम्मत की जाती हैय गिर जाएए तो उसे छोड़ दिया जाता है। सोफी को जब ज्ञात हुआ कि इन लोगों को मेरी सब बातें मालूम हो गईं तो उसने परदा रखने की चेष्टा करनी छोड़ दीय धर्म—ग्रंथों के अधययन में डूब गई। पुरानी कुदूरतें दिल से मिटने लगीं। माता के कठोर वाक्य—बाणों का घाव भरने लगा। वह संकीर्णताए जो व्यक्तिगत भावों और चिंताओं को अनुचित महत्व दे देती हैए इस सेवा और सद्व्‌यवहार के क्षेत्र में आकर तुच्छ जान पड़ने लगी। मन ने कहाए यह मामा के दोष नहींए उनकी धार्मिक अनुदारता का दोष हैय उनका विचारक्षेत्र परिमित हैए उनमें विचार—स्वातंत्रय का सम्मान करने की क्षमता ही नहींए मैं व्यर्थ उनसे रुष्ट हो रही हूँ। यही एक काँटा थाए जो उसके अंतस्तल में सदैव खटकता रहता था। जब वह निकल गयाए तो चित्ता शांत हो गया। उसका जीवन धर्म—ग्रंथों के अवलोकन और धर्म—सिध्दांतों के मनन तथा चिंतन में व्यतीत होने लगा। अनुराग अंतर्वेदना की सबसे उत्ताम औषधि है।

किंतु इस मनन और अवलोकन से उसका चित्ता शांत होता होए यह बात न थी। नाना प्रकार की शंकाएँ नित्य उपस्थित होती रहती थीं—जीवन का उद्देश्य क्या हैघ् प्रत्येक धर्म में इसके विविधा उत्तर मिलते थेय पर एक भी ऐसा नहीं मिलाए जो मन में बैठ जाए। ये विभूतियाँ क्या हैंए क्या केवल भक्तों की कपोल—कल्पनाएँ हैंघ् सबसे जटील समस्या यह थी कि उपासना का उद्देश्य क्या हैघ् ईश्वर क्यों मनुष्यों से अपनी उपासना करने का अनुरोध करता हैए इससे उसका क्या अभिप्राय हैघ् क्या वह अपनी ही सृष्टि से अपनी स्तुति सुनकर प्रसन्न होता हैघ् वह इन प्रश्नों की मीमांसा में इतनी तल्लीन रहती कि कई—कई दिन कमरे के बाहर न निकलतीए खाने—पीने की सुधि न रहतीए यहाँ तक कि कभी—कभी इंदु का आना उसे बुरा मालूम होता।

एक दिन प्रातरूकाल वह कोई धर्मग्रंथ पढ़़ रही थी कि इंदु आकर बैठ गई। उसका मुख उदास था। सोफिया उसकी ओर आकृष्ट न हुईए पूर्ववत्‌ पुस्तक देखने में मग्न रही। इंदु बोली—सोफीए अब यहाँ दो—चार दिन की और मेहमान हूँए मुझे भूल तो न जाओगीघ्

सोफी ने बिना सिर उठाए ही कहा—हाँ।

इंदु—तुम्हारा मन तो अपनी किताबों में बहल जाएगाए मेरी याद भी न आएगीय पर मुझसे तुम्हारे बिना एक दिन न रहा जाएगा।

सोफी ने किताब की तरफ देखते हुए कहा—हाँ।

इंदु—फिर न जाने कब भेंट हो। सारे दिन अकेले पड़े—पड़े बिसूरा करूँगी।

सोफी ने किताब का पन्ना उलटकर कहा—हाँ।

इंदु से सोफिया की निष्ठुरता अब न सही गई। किसी और समय वह रुष्ट होकर चली जातीए अथवा उसे स्वाध्याय में मग्न देखकर कमरे में पाँव ही न रखतीय किंतु इस समय उसका कोमल हृदय वियोग—व्यथा से भरा हुआ थाए उसमें मान का स्थान नहीं थाए रोकर बोली—बहनए ईश्वर के लिए जरा पुस्तक बंद कर दोय चली जाऊँगीए तो फिर खूब पढ़़ना। वहाँ से तुम्हें छेड़ने न आऊँगी।

सोफी ने इंदु की ओर देखाए मानो समाधि टूटी! उसकी अॉंखों में अॉंसू थेए मुख उतरा हुआए सिर के बाल बिखरे हुए। बोली—अरे! इंदुए बात क्या हैघ् रोती क्यों होघ्

इंदु—तुम अपनी किताब देखोए तुम्हें किसी के रोने—धोने की क्या परवा है! ईश्वर ने न जाने क्यों मुझे तुझ—सा हृदय नहीं दिया।

सोफिया—बहनए क्षमा करनाए मैं एक बड़ी उलझन में पड़ी हुई थी। अभी तक वह गुत्थी नहीं सुलझी। मूर्तिपूजा को सर्वथा मिथ्या समझती थी। मेरा विचार था कि ऋषियों ने केवल मूखोर्ं की आधयात्मिक शांति के लिए यह व्यवस्था कर दी हैय आज से मैं मूर्ति—पूजा की कायल हो गई। लेखक ने इसे वैज्ञानिक सिध्दांतों से सिध्द किया हैए यहाँ तक कि मूर्तियों का आकार—प्रकार भी वैज्ञानिक नियमों ही के आधार पर अवलम्बित बतलाया है।

इंदु—मेरे लिए बुलावा आ गया। तीसरे दिन चली जाऊँगी।

सोफिया—यह तो तुमने बुरी खबर सुनाईए फिर मैं यहाँ कैसे रहूँगीघ्

इस वाक्य में सहानुभूति नहींए केवल स्वहित था। किंतु इंदु ने इसका आशय यह समझा कि सोफी को मेरा वियोग असह्य होगा। बोली—तुम्हारा जी तो किताबों में बहल जाएगा। हाँए मैं तुम्हारी याद में तड़पा करूँगी। सच कहती हूँए तुम्हारी सूरत एक क्षण के लिए भी चित्ता से न उतरेगीए यह मोहिनी मूर्ति अॉंखों के सामने फिरा करेगी। बहनए अगर तुम्हें बुरा न लगेए तो एक याचना करूँ। क्या यह सम्भव नहीं हो सकता कि तुम भी कुछ दिन मेरे साथ रहोघ् तुम्हारे सत्संग में मेरा जीवन सार्थक हो जाएगा। मैं इसके लिए तुम्हारी सदैव अनुगृहीत रहूँगी।

सोफिया—तुम्हारे प्रेम के बंधान में बँधी हुई हूँए जहाँ चाहोए ले चलो। चाहूँ तो जाऊँगीए न चाहूँ तो भी जाऊँगी। मगर यह तो बताओए तुमने राजा साहब से भी पूछ लिया हैघ्

इंदु—यह ऐसी कौन—सी बात हैए जिसके लिए उनकी अनुमति लेनी पड़े। मुझसे बराबर कहते रहते हैं कि तुम्हारे लिए एक लेडी की जरूरत हैए अकेले तुम्हारा जी घबराता होगा। यह प्रस्ताव सुनकर फूले न समाएँगे।

रानी जाह्नवी तो इंदु की विदाई की तैयारियाँ कर रही थींए और इंदु सोफिया के लिए लैस और कपड़े आदि ला—लाकर रखती थी। भाँति—भाँति के कपड़ों से कई संदूक भर दिए। वह ऐसे ठाठ से ले जाना चाहती थी कि घर की लौंडियाँ—बाँदियाँ उसका उचित आदर करें। प्रभु सेवक को सोफी का इंदु के साथ जाना अच्छा न लगता था। उसे अब भी आशा थी कि मामा का क्रोध शांत हो जाएगा और वह सोफी को गले लगाएँगी। सोफी के जाने से वैमनस्य का बढ़़ जाना निश्चित था। उसने सोफी को समझायाय किंतु वह इंदु का निमंत्रण अस्वीकार न करना चाहती थी। उसने प्रण कर लिया था कि अब घर न जाऊँगी।

तीसरे दिन राजा महेंद्रकुमार इंदु को विदा कराने आएए तो इंदु ने और बातों के साथ सोफी को साथ ले चलने का जिक्र छेड़ दिया। बोली—मेरी जी वहाँ अकेले घबराया करता हैए मिस सोफिया के रहने से मेरा जी बहल जाएगा।

महेंद्र.—क्या मिस सेवक अभी तक वहीं हैंघ्

इंदु—बात यह है कि उनके धार्मिक विचार स्वतंत्रा हैंए और उनके घरवाले उनके विचारों की स्वतंत्रता सहन नहीं कर सकते। इसी कारण वह अपने घर नहीं जाना चाहतीं।

महेंद्र.—लेकिन यह तो सोचोए उनके मेरे घर में रहने से मेरी कितनी बदनामी होगी। मि. सेवक को यह बात बुरी लगेगीए और यह नितांत अनुचित है कि मैं उनकी लड़की कोए उनकी मरजी के बगैरए अपने घर में रखूँ। सरासर बदनामी होगी।

इंदु—मुझे तो इसमें बदनामी की कोई बात नहीं नजर आती। क्या सहेली अपनी सहेली के यहाँ मेहमान नहीं होतीघ् सोफी का स्वभाव भी तो ऐसा उच्छृंखल नहीं है कि वह इधार—उधार घूमने लगेगी।

महेंद्र.—वह देवी सहीय लेकिन ऐसे कितने ही कारण हैं कि मैं उनका तुम्हारे साथ जाना उचित नहीं समझता हूँ। तुममें यह बड़ा दोष है कि कोई काम करने से पहले उसके औचित्य का विचार नहीं करतीं। क्या तुम्हारे विचार में कुल—मर्यादा की अवहेलना करना कोई बुराई नहींघ् उनके घरवाले यही तो चाहते हैं कि वह प्रकट रूप से अपने धर्म के नियमों का पालन करें। अगर वह इतना भी नहीं कर सकतींए तो मैं यही कहूँगा कि उनका विचार—स्वातंत्रय औचित्य की सीमा से बहुत आगे बढ़़ गया है।

इंदु—किंतु मैं तो उनसे वादा कर चुकी हूँ। कई दिन से मैं इन्हीं तैयारियों में व्यस्त हूँ। यहाँ अम्माँ से आज्ञा ले चुकी हूँ। घर के सभी प्राणीए नौकर—चाकर जानते हैं वह मेरे साथ जा रही हैं। ऐसी दशा में अगर मैं उन्हें न ले गईए तो लोग अपने मन में क्या कहेंगेघ् सोचिएए इसमें मेरी कितनी हेठी होगी। मैं किसी को मुँह दिखाने लायक न रहूँगी।

महेंद्र.—बदनामी से बचने के लिए सब कुछ किया जा सकता है। तुम्हें मिस सेवक से कहते शर्म आती होए तो मैं कह दूँ। वह इतनी नादान नहीं हैं कि इतनी मोटी—सी बात न समझें।

इंदु—मुझे उनके साथ रहते—रहते उनसे इतना प्रेम हो गया है कि उनसे एक दिन भी अलग रहना मेरे लिए असाधय—सा जान पड़ता है। इसकी तो खैर परवा नहींय जानती हूँए कभी—न—कभी उनसे वियोग होगा हीय इस समय मुझे सबसे बड़ी चिंता अपनी बात खोने की है। लोग कहेंगेए बात कहकर पलट गई। सोफी ने पहले साफ इनकार कर दिया था। मेरे बहुत कहने—सुनने पर राजी हुई थी। आप मेरी खातिर से अब की मेरी प्रार्थना स्वीकार कीजिएए फिर मैं आपसे पूछे बगैर कोई काम न करूँगी।

महेंद्रकुमार किसी तरह राजी न हुए। इंदु रोईए अनुनय—विनय कीए पैरों पड़ीए वे सभी मंत्र फूँकेए जो कभी निष्फल ही न होतेय पर पति का पाषाण—हृदय न पसीजाय उन्हें अपना नाम संसार की सब वस्तुओं से प्रिय था।

जब महेंद्रकुमार बाहर चले गएए तो इंदु बहुत देर तक शोकावस्था में बैठी रही। बार—बार यही खयाल आता—सोफी अपने मन में क्या कहेगी। मैंने उससे कह रखा है कि मेरे स्वामी मेरी कोई बात नहीं टालते। अब वह समझेगीए वह इसकी बात भी नहीं पूछते। बात भी ऐसी ही हैए इन्हें मेरी क्या परवा हैघ् बातें ऐसी करेंगेए मानो इनसे उदार संसार में कोई प्राणी न होगाए पर वह सब कोरी बकवास हैघ् इन्हें तो यही मंजूर है कि यह दिन—भर अकेली बैठी अपने नाम को रोया करे। दिल में जलते होंगे कि सोफी के साथ इसके दिन आराम से गुजरंगे। मुझे कैदियों की भाँति रखना चाहते हैं। इन्हें जिद करना आता हैए तो मैं भी क्या जिद नहीं कर सकतीघ् मैं भी कहे देती हूँ आप सोफी को न चलने देंगेए तो मैं भी न जाऊँगी। मेरा कर ही क्या सकते हैंए कुछ नहीं। दिल में डरते हैं कि सोफी के जाने से घर का खर्च बढ़़ जाएगा। स्वभाव के कृपण तो हैं ही। उस कृपणता को छिपाने के लिए बदनामी का बहाना निकाला है। दुरूखी आत्मा दूसरों की नेकनीयती पर संदेह करने लगती है।

संध्या—समय जब जाह्नवी सैर करने चलींए तो इंदु ने उनसे यह समाचार कहाए और आग्रह किया कि तुम महेंद्र को समझाकर सोफी को ले चलने पर राजी कर दो। जाह्नवी ने कहा—तुम्हीं क्यों नहीं मान जातींघ्

इंदु—अम्माँए मैं सच्चे हृदय से कह रही हूँए मैं जिद नहीं करती। अगर मैंने पहले ही सोफिया से न कह दिया होताए तो मुझे जरा भी दुरूख न होताय पर सारी तैयारियाँ करके अब उसे न ले जाऊँए तो वह अपने दिल में क्या कहेगी। मैं उसे मुँह नहीं दिखा सकती। यह इतनी छोटी—सी बात है कि अगर मेरा जरा भी ख्याल होताए तो वह इंकार न करते। ऐसी दशा में आप क्योंकर आशा कर सकती हैं कि मैं उनकी प्रत्येक आज्ञा शिरोधार्य करूँघ्

जाह्नवी—वह तुम्हारे स्वामी हैंए उनकी सभी बातें तुम्हें माननी पड़ेंगी।

इंदु—चाहे वह मेरी जरा—जरा—सी बातें भी न मानेंघ्

जाह्नवी—हाँए उन्हें इसका अख्तियार है। मुझे लज्जा आती है कि मेरे उपदेशों का तुम्हारे ऊपर जरा भी असर नहीं हुआ। मैं तुम्हें पति—परायणा सती देखना चाहती हूँए जिसे अपने पुरुष की आज्ञा या इच्छा के सामने अपने मानापमान का जरा भी विचार नहीं होता। अगर वह तुम्हें सिर के बल चलने को कहेंए तो भी तुम्हारा धर्म है कि सिर के बल चलो। तुम इतने में ही घबरा गईंघ्

इंदु—आप मुझसे वह करने को कहती हैंए जो मेरे लिए असम्भव है।

जाह्नवी—चुप रहोए मैं तुम्हारे मुँह ऐसी बातें नहीं सुन सकती। मुझे भय हो रहा है कि कहीं सोफी के विचार—स्वातंत्रय का जादू तुम्हारे ऊपर भी तो नहीं चल गया!

इंदु ने इसका कुछ उत्तर न दिया। भय होता था कि मेरे मुँह से कोई ऐसा शब्द न निकल पड़ेए जिससे अम्माँ के मन में यह संदेह और भी जम जाएए तो बेचारी सोफी का यहाँ रहना कठिन हो जाए। वह रास्ते—भर मौन धारण किए बैठी रही। जब गाड़ी फिर मकान पर पहुँचीए और वह उतरकर अपने कमरे की ओर चलीए तो जाह्नवी ने कहा—बेटीए मैं तुमसे हाथ जोड़कर कहती हूँए महेंद्र से इस विषय में अब एक शब्द भी न कहनाए नहीं तो मुझे बहुत दुरूख होगा।

इंदु ने माता को मर्माहत भाव से देखा और अपने कमरे में चली गई। सौभाग्य से महेंद्रकुमार भोजन करके सीधो बाहर चले गएए नहीं तो इंदु के लिए अपने उद्‌गारों का रोकना अत्यंत कठिन हो जाता। उसके मन में रह—रहकर इच्छा होती थी कि चलकर सोफिया से क्षमा माँगूँए साफ—साफ कह दूँ—बहनए मेरा कुछ वश नहीं है। मैं कहने को रानी हूँए वास्तव में मुझे उतनी स्वाधीनता भी नहीं हैए जितनी मेरे घर की महरियों को। लेकिन यह सोचकर रह जाती थी कि पति—निंदा मेरी धर्म—मर्यादा के प्रतिकूल है। सोफी की निगाहों से गिर जाऊँगी। वह समझेगीए इसमें जरा भी आत्माभिमान नहीं है।

नौ बजे विनयसिंह उससे मिलने आए। वह मानसिक अशांति की दशा में बैठी हुई अपने संदूकों में से सोफी के लिए खरीदे हुए कपड़े निकाल रही थी और सोच रही थी कि इन्हें उनके पास कैसे भेजूँ। खुद जाने का साहस न होता था। विनयसिंह को देखकर बोली—क्यों विनयए अगर तुम्हारी स्त्री अपनी किसी सहेली को कुछ दिनों के लिए अपने साथ रखना चाहेए तो तुम उसे मना कर दोगेए या खुश होगेघ्

विनय—मेरे सामने यह समस्या कभी आएगी ही नहींए इसलिए मैं इसकी कल्पना करके अपने मस्तिष्क को कष्ट नहीं देना चाहता।

इंदू—यह समस्या तो पहले ही उपस्थित हो चुकी है।

विनय—बहनए मुझे तुम्हारी बातों से डर लग रहा है।

इंदु—इसीलिए कि तुम अपने को धोखा दे रहे होय लेकिन वास्तव में तुम उससे बहुत गहरे पानी में होए जितना तुम समझते हो। क्या तुम समझते हो कि तुम्हारा कई—कई दिनों तक घर में न आनाए नित्य सेवा—समिति के कामों में व्यस्त रहनाए मिस सोफिया की ओर अॉंख उठाकर न देखनाए उसके साये से भागनाए उस अंतर्द्‌वंद्व को छिपा सकता हैए जो तुम्हारे हृदय—तल में विकराल रूप से छिड़ा हुआ हैघ् लेकिन याद रखनाए इस द्वंद्व की एक झंकार भी न सुनाई देए नहीं तो अनर्थ हो जाएगा। सोफिया तुम्हारा इतना सम्मान करती हैए जितना कोई सती अपने पुरुष का भी न करती होगी। वह तुम्हारी भक्ति करती है। तुम्हारे संयमए त्याग और सेवा ने उसे मोहित कर लिया है। लेकिन अगर मुझे धोखा नहीं हुआ हैए तो उसकी भक्ति में प्रणय का लेश भी नहीं। यद्यपि तुम्हें सलाह देना व्यर्थ हैए क्योंकि तुम इस मार्ग की कठिनाइयों को खूब जानते होए तथापि मैं तुमसे यही अनुरोध करती हूँ कि तुम कुछ दिनों के लिए कहीं चले जाओ। तब तक कदाचित्‌ सोफी भी अपने लिए कोई—न—कोई रास्ता ढ़ूँढ़़ निकालेगी। सम्भव हैए इस समय सचेत हो जाने से दो जीवनों का सर्वनाश होने से बच जाए।

विनय—बहनए जब सब कुछ जानती हो हीए तो तुमसे क्या छिपाऊँ। अब मैं सचेत नहीं हो सकता। इन चार—पाँच महीनों में मैंने जो मानसिक ताप सहन किया हैए उसे मेरा हृदय ही जानता है। मेरी बुध्दि भ्रष्ट हो गई हैए मैं अॉंखें खोकर गढ़़े में गिर रहा हूँए जान—बूझकर विष का प्याला पी रहा हूँ। कोई बाधाए कोई कठिनाईए कोई शंका अब मुझे सर्वनाश से नहीं बचा सकती। हाँए इसका मैं तुम्हें विश्वास दिलाता हूँ कि इस आग की एक चिनगारी या एक लपट भी सोफी तक न पहुँचेगी। मेरा सारा शरीर भस्म हो जाएए हड्डियाँ तक राख हो जाएँय पर सोफी को उस ज्वाला की झलक तक न दिखाई देगी। मैंने भी यही निश्चय किया है कि जितनी जल्दी हो सकेए मैं यहाँ से चला जाऊँ—अपनी रक्षा के लिए नहींए सोफी की रक्षा के लिए। आह! इससे तो यह कहीं अच्छा था कि सोफी ने मुझे उसी आग में जल जाने दिया होताय मेरा परदा ढ़ँका रह जाता। अगर अम्माँ को यह बात मालूम हो गईए तो उनकी क्या दशा होगी। इसकी कल्पना ही से मेरे रोएँ खड़े हो जाते हैं। बसए अब मेरे लिए मुँह में कालिख लगाकर कहीं डूब मरने के सिवा और कोई उपाय नहीं है।

यह कहकर विनयसिंह बाहर चले गए। इंदु श्बैठो—बैठोश् कहती रह गई। वह इस समय आवेश में उससे बहुत ज्यादा कह गए थेए जितना वह कहना चाहते थे। और देर तक बैठतेए तो न जाने और क्या—क्या कह जाते। इंदु की दशा उस प्राणी की—सी थीए जिसके पैर बँधो हों और सामने उसका घर जल रहा हो। वह देख रही थीए यह आग सारे घर को जला देगीय विनय के ऊँचे—ऊँचे मंसूबेए माता की बड़ी—बड़ी अभिलाषाएँए पिता के बड़े—बड़े अनुष्ठानए सब विधवंस हो जाएँगे। वह इन्हीं शोकमय विचारों में पड़ी सारी रात करवटें बदलती रही। प्रातरूकाल उठीए तो द्वार पर उसके लिए पालकी तैयार खड़ी थी। वह माता के गले से लिपटकर रोईए पिता के चरणों को अॉंसुओं से धोया और घर से चली। रास्ते में सोफी का कमरा पड़ता था। इंदु ने उस कमरे की ओर ताका भी नहीं। सोफी उठकर द्वार पर आईए और अॉंखों में अॉंसू भरे हुए उससे हाथ मिलाया। इंदु ने जल्दी से हाथ छुड़ा लिया और आगे बढ़़ गई।

'''

अध्याय 9

सोफिया इस समय उस अवस्था में थीए जब एक साधारण हँसी की बातए एक साधारण अॉंखों का इशाराए किसी का उसे देखकर मुस्करा देनाए किसी महरी का उसकी आज्ञा का पालन करने में एक क्षण विलम्ब करनाए ऐसी हजारों बातेंए जो नित्य घरों में होती हैं और जिनकी कोई परवा भी नहीं करताए उसका दिल दुरूखाने के लिए काफी हो सकती थीं। चोट खाए हुए अंग को मामूली—सी ठेस भी असह्य हो जाती है। फिर इंदु का बिना उससे कुछ कहे—सुने चला जाना क्यों न दुरूखजनक होता! इंदु तो चली गईय पर वह बहुत देर तक अपने कमरे के द्वार पर मूर्ति की भाँति खड़ी सोचती रही—यह तिरस्कार क्योंघ् मैंने ऐेसा कौन—सा अपराध किया हैए जिसका मुझे यह दंड मिला हैघ् अगर उसे यह मंजूर न था कि मुझे साथ ले जातीए तो साफ—साफ कह देने में क्या आपत्ति थीघ् मैंने उसके साथ चलने के लिए आग्रह तो किया न था! क्या मैं इतना नहीं जानती कि विपत्ति में कोई किसी का साथी नहीं होताघ् वह रानी हैए उसकी इतनी ही कृपा क्या कम थी कि मेरे साथ हँस—बोल लिया करती थी! मैं उसकी सहेली बनने के योग्य कब थीय क्या मुझे इतनी समझ भी न थी! लेकिन इस तरह अॉंखें फेर लेना कौन—सी भलमंसी है! राजा साहब ने न माना होगाए यह केवल बहाना है। राजा साहब इतनी—सी बात को कभी अस्वीकार नहीं कर सकते। इंदु ने खुद ही सोचा होगा—वहाँ बड़े—बड़े आदमी मिलने आवेंगेए उनसे इसका परिचय क्योंकर कराऊँगी। कदाचित्‌ यह शंका हुई हो कि कहीं इसके सामने मेरा रंग फीका न पड़ जाए। बसए यही बात हैए अगर मैं मूर्खाए रूप—गुणविहीना होतीए तो वह मुझे जरूर साथ ले जातीय मेरी हीनता से उसका रंग और चमक उठता। मेरा दुर्भाग्य!

वह अभी द्वार पर खड़ी ही थी कि जाह्नवी बेटी को विदा करके लौटींए और सोफी के कमरे में आकर बोलीं—बेटीए मेरा अपराध क्षमा करोए मैंने ही तुम्हें रोक लिया। इंदु को बुरा लगाए पर करूँ क्याए वह तो गई ही तुम भी चली जातींए तो मेरा दिन कैसे कटताघ् विनय भी राजपूताना जाने को तैयार बैठे हैंए मेरी तो मौत हो जाती। तुम्हारे रहने से मेरा दिल बहलता रहेगा। सच कहती हूँ बेटीए तुमने मुझ पर कोई मोहिनी—मंत्र फूँक दिया है।

सोफिया—आपकी शालीनता हैए जो ऐसा कहती हैं। मुझे खेद हैए इंदु ने जाते समय मुझसे हाथ भी न मिलाया।

जाह्नवी—केवल लज्जावश बेटीए केवल लज्जावश। मैं तुझसे कहती हूँए ऐसी सरल बालिका संसार में न होगी। तुझे रोककर मैंने उस पर घोर अन्याय किया है। मेरी बच्ची का वहाँ जरा भी जी नहीं लगताय महीने—भर रह जाती हैए तो स्वास्थ्य बिगड़ जाता है। इतनी बड़ी रियासत हैए महेंद्र सारा बोझा उसी के सिर डाल देते हैं। उन्हें तो म्युनिसिपैलिटी ही से फुरसत नहीं मिलती। बेचारी आय—व्यय का हिसाब लिखते—लिखते घबरा जाती हैए उस पर एक—एक पैसे का हिसाब! महेंद्र को हिसाब रखने की धुन है। जरा—सा फर्क पड़ाए तो उसके सिर हो जाते हैं। इंदु को अधिकार हैए जितना चाहे खर्च करेए पर हिसाब जरूर लिखे। राजा साहब किसी की रू—रियासत नहीं करते। कोई नौकर एक पैसा भी खा जाएए तो उसे निकाल देते हैंय चाहे उसने उनकी सेवा में अपना जीवन बिता दिया हो। यहाँ मैं इंदु को कभी कड़ी निगाह से नहीं देखतीए चाहे घी का घड़ा लुढ़़का दे। वहाँ जरा—जरा—सी बात पर राजा साहब की घुड़कियाँ सुननी पड़ती हैं। बच्ची से बात नहीं सही जाती। जवाब तो देती नहीं—और यही हिंदू स्त्री का धर्म है—पर रोने लगती है। वह दया की मूर्ति है। कोई उसका सर्वस्व खा जाएए लेकिन ज्यों ही उसके सामने आकर रोयाए बस उसका दिल पिघला। सोफीए भगवान्‌ ने मुझे दो बच्चे दिएए और दोनों ही को देखकर हृदय शीतल हो जाता है। इंदु जितनी ही कोमल प्रकृति और सरल हृदया हैए विनय उतना ही धर्मशील और साहसी है। थकना तो जानता ही नहीं। मालूम होता हैए दूसरों की सेवा करने के लिए ही उसका जन्म हुआ है। घर में किसी टहलनी को भी कोई शिकायत हुईए और सब काम छोड़कर उसकी दवा—दारू करने लगा। एक बार मुझे ज्वर आने लगा था—इस लड़के ने तीन महीने तक द्वार का मुँह नहीं देखा। नित्य मेरे पास बैठा रहताए कभी पंखा झलताए कभी पाँव सहलाताए कभी रामायण और महाभारत पढ़़कर सुनाता। कितना कहतीए बेटा जाओए घूमो—फिरोय आखिर ये लौंडियाँ—बाँदियाँ किस दिन काम आएँगीए डॉक्टर रोज आते ही हैंय तुम क्यों मेरे साथ सती होते होय पर किसी तरह न जाता। अब कुछ दिनों से सेवा—समिति का आयोजन कर रहा है। कुँवर साहब को जो सेवा—समिति से इतना प्रेम हैए वह विनय ही के सत्संग का फल हैए नहीं तो आज से तीन साल पहले इनका—सा विलासी सारे नगर में न था। दिन में दो बार हजामत बनती थी। दरजनों धोबी और दरजी कपड़े धोने और सीने के लिए नौकर थे। पेरिस से एक कुशल धोबी कपड़े सँवारने के लिए आया था। कश्मीर और इटली के बावरची खाना पकाते थे। तसवीरों का इतना व्यसन था कि कई बार अच्छे चित्र लेने के लिए इटली तक की यात्रा की। तुम उन दिनों मंसूरी रही होगी। सैर करने निकलतेए तो सशस्त्रा सवारों का एक दल साथ चलता। शिकार खेलने की लत थीए महीनों शिकार खेलते रहते। कभी कश्मीरए कभी बीकानेरए कभी नेपालए केवल शिकार खेलने जाते। विनय ने उनकी काया ही पलट दी। जन्म का विरागी है। पूर्व—जन्म में अवश्य कोई ऋषि रहा होगा।

सोफी—आपके दिल में सेवा और भक्ति के इतने ऊँचे भाव कैसे जागृत हुएघ् यहाँ तो प्रायरू रानियाँ अपने भोग—विलास में ही मग्न रहती हैंघ्

जाह्नवी—बेटीए यह डॉक्टर गांगुली के सदुपदेश का फल है। जब इंदु दो साल की थीए तो मैं बीमार पड़ी। डॉक्टर गांगुली मेरी दवा करने के लिए आए। हृदय का रोग थाए जी घबराया करताए मानो किसी ने उच्चाटन—मंत्र मार दिया हो। डॉक्टर महोदय ने मुझे महाभारत पढ़़कर सुनाना शुरू किया। उसमें मेरा ऐसा जी लगा कि कभी—कभी आधी रात तक बैठी पढ़़ा करती। थक जाती तो डॉक्टर साहब से पढ़़वाकर सुनती। फिर तो वीरतापूर्ण कथाओं के पढ़़ने का मुझे ऐसा चस्का लगा कि राजपूतों की ऐसी कोई कथा नहींए जो मैंने न पढ़़ी हो। उसी समय से मेरे मन में जातिप्रेम का भाव अंकुरित हुआ। एक नई अभिलाषा उत्पन्न हुई—मेरी कोख से भी कोई ऐसा पुत्रा जन्म लेताए जो अभिमंयुए दुर्गादास और प्रताप की भाँति जाति का मस्तक ऊँचा करता। मैंने व्रत लिया कि पुत्रा हुआए तो उसे देश और जाति के हित के लिए समर्पित कर दूँगी। मैं उन दिनों तपस्विनी की भाँति जमीन पर सोतीए केवल एक बार रूखा भोजन करतीए अपने बरतन तक अपने हाथ से धोती थी। एक वे देवियाँ थींए जो जाति की मर्यादा रखने के लिए प्राण तक दे देती थींय एक मैं अभागिनी हूँ कि लोक—परलोक की सब चिंताएँ छोड़कर केवल विषय—वासनाओं में लिप्त हूँ। मुझे जाति की इस अधोगति को देखकर अपनी विलासिता पर लज्जा आती थी। ईश्वर ने मेरी सुन ली। तीसरे साल विनय का जन्म हुआ। मैंने बाल्यावस्था ही से उसे कठिनाइयों का अभ्यास कराना शुरू किया। न कभी गद्दों पर सुलातीए न कभी महरियों और दाइयों की गोद में जाने देतीए न कभी मेवे खाने देती। दस वर्ष की अवस्था तक केवल धार्मिक कथाओं द्वारा उसकी शिक्षा हुई। इसके बाद मैंने डॉक्टर गांगुली के साथ छोड़ दिया। मुझे उन्हीं पर पूरा विश्वास थाय और मुझे इसका गर्व है कि विनय की शिक्षा—दीक्षा का भार जिस पुरुष पर रखाए वह इसके सर्वथा योग्य था। विनय पृथ्वी के अधिकांश प्रांतों का पर्यटन कर चुका है। संस्कृत और भारतीय भाषाओं के अतिरिक्त योरप की प्रधान भाषाओं का भी उसे अच्छा ज्ञान है। संगीत का उसे इतना अभ्यास है कि अच्छे—अच्छे कलावंत उसके सामने मुँह खोलने का साहस नहीं कर सकते। नित्य कम्बल बिछाकर जमीन पर सोता है और कम्बल ही ओढ़़ता है। पैदल चलने में कई बार इनाम पा चुका है। जलपान के लिए मुट्ठी—भर चनेए भोजन के लिए रोटी और सागए बस इसके सिवा संसार के और सभी भोज्य पदार्थ उसके लिए वर्जित—से हैं। बेटीए मैं तुझसे कहाँ तक कहूँए पूरा त्यागी है। उसके त्याग का सबसे उत्ताम फल यह हुआ कि उसके पिता को भी त्यागी बनना पड़ा। जवान बेटे के सामने बूढ़़ा बाप कैसे विलास का दास बना रह सकता! मैं समझती हूँ कि विषय—भोग से उनका मन तृप्त हो गयाए और बहुत अच्छा हुआ। त्यागी पुत्रा का भोगी पिताए अत्यंत हास्यास्पद —श्य होता। वह मुक्त हृदय से विनय के सत्कायोर्ं में भाग लेते हैं और कह सकती हूँ कि उनके अनुराग के बगैर विनय को कभी इतनी सफलता न प्राप्त होती। समिति में इस समय एक सौ नवयुवक हैंए जिनमें कितने ही सम्पन्न घरों के हैं। कुँवर साहब की इच्छा है कि समिति के सदस्यों की पूर्ण संख्या पाँच सौ तक बढ़़ा दी जाए। डॉक्टर गांगुली इस वृध्दावस्था में भी अदम्य उत्साह से समिति का संचालन करते हैं। वही इसके अधयक्ष हैं। जब व्यवस्थापक सभा के काम से अवकाश मिलता हैए तो नित्य दो—ढ़ाई घंटे युवकों को शरीर—विज्ञान—सम्बंधी व्याख्यान देते हैं। पाठयक्रम तीन वषोर्ं में समाप्त हो जाता हैय तब सेवा—कार्य आरम्भ होता है। अब की बीस युवक उत्ताीर्ण होंगेए और यह निश्चय किया गया है कि वे दो साल भारत का भ्रमण करेंय पर शर्त यह है कि उनके साथ एक लुटीयाए डोरए धोती और कम्बल के सिवा और सफर का सामान न हो। यहाँ तक कि खर्च के लिए रुपये भी न रखे जाएँ। इससे कई लाभ होंगे—युवकों को कठिनाइयों का अभ्यास होगाए देश की यथार्थ दशा का ज्ञान होगाए द्रष्टि—क्षेत्र विस्तीर्ण हो जाएगाए और सबसे बड़ी बात यह है कि चरित्र बलवान्‌ होगाए धैर्यए साहसए उद्योगए संकल्प आदि गुणों की वृध्दि होगी। विनय इन लोगों के साथ जा रहा हैए और मैं गर्व से फूली नहीं समाती कि मेरा पुत्रा जाति—हित के लिए यह आयोजन कर रहा हैए और तुमसे सच कहती हूँए अगर कोई ऐसा अवसर आ पड़े कि जाति—रक्षा के लिए उसे प्राण भी देना पड़ेए तो मुझे जरा भी शोक न होगा। शोक तब होगाए जब मैं उसे ऐश्वर्य के सामने सिर झुकाते यार् कर्तव्य के क्षेत्र से हटते देखूँगी। ईश्वर न करेए मैं वह दिन देखने के लिए जीवित रहूँ। मैं नहीं कह सकती कि उस वक्त मेरे चित्ता की क्या दशा होगी। शायद मैं विनय के रक्त की प्यासी हो जाऊँय शायद इन निर्बल हाथों में इतनी शक्ति आ जाए कि मैं उसका गला घोंट दूँ।

यह कहते—कहते रानी के मुख पर एक विचित्र तेजस्विता की झलक दिखाई देने लगीए अश्रुपूर्ण नेत्रों में आत्मगौरव की लालिमा प्रस्फुटीत होने लगी। सोफिया आश्चर्य से रानी का मुँह ताकने लगी। इस कोमल काया में इतना अनुरक्त और परिष्कृत हृदय छिपा हुआ हैए इसकी वह कल्पना भी न कर सकती थी।

एक क्षण में रानी ने फिर कहा—बेटीए मैं आवेश में तुमसे अपने दिल की कितनी ही बातें कह गईय पर क्या करूँए तुम्हारे मुख पर ऐसी मधुर सरलता हैए जो मेरे मन को आकर्षित करती है। इतने दिनों में मैंने तुम्हें खूब पहचान लिया। तुम सोफी नहींए स्त्री के रूप में विनय हो। कुँवर साहब तो तुम्हारे ऊपर मोहित हो गए हैं। घर में आते हैंए तो तुम्हारी चर्चा जरूर करते हैं। यदि धार्मिक बाधा न होतीए तो (मुस्कराकर) उन्होंने मिस्टर सेवक के पास विनय के विवाह का संदेशा कभी का भेज दिया होता!

सोफी का चेहरा शर्म से लाल हो गयाए लम्बी—लम्बी पलकें नीचे को झुक गईं और अधारों पर एक अति सूक्ष्मए शांतए मृदुल मुस्कान की छटा दिखाई दी। उसने दोनों हाथों से मुँह छिपा लिया और बोली—आप मुझे गालियाँ दे रही हैंए मैं भाग जाऊँगी।

रानी—अच्छाए शर्माओ मत। लोए यह चर्चा ही न करूँगी। मेरा तुमसे यही अनुरोध है कि अब तुम्हें यहाँ किसी बात का संकोच न करना चाहिए। इंदु तुम्हारी सहेली थीए तुम्हारे स्वभाव से परिचित थीए तुम्हारी आवश्यकताओं को समझती थी। मुझमें इतनी बुध्दि नहीं। तुम इस घर को अपना घर समझोए जिस चीज की जरूरत होए निस्संकोच भाव से कह दो। अपनी इच्छा के अनुसार भोजन बनवा लो। जब सैर करने को जी चाहेए गाड़ी तैयार करा लो। किसी नौकर को कहीं भेजना चाहोए भेज दोय मुझसे कुछ पूछने की जरूरत नहीं। मुझसे कुछ कहना होए तुरंत चली आओय पहले से सूचना देने का काम नहीं। यह कमरा अगर पसंद न होए तो मेरे बगलवाले कमरे में चलोए जिसमें इंदु रहती थी। वहाँ जब मेरा जी चाहेगाए तुमसे बातें कर लिया करूँगी। जब अवकाश होए मुझे इधार—उधार के समाचार सुना देना। बसए यह समझो कि तुम मेरी प्राइवेट सेक्रेटरी हो।

यह कहकर जाह्नवी चली गई। सोफी का हृदय हलका हो गया। उसे बड़ी चिंता हो रही थी कि इंदु के चले जाने पर यहाँ मैं कैसे रहूँगीए कौन मेरी बात पूछेगाए बिन—बुलाए मेहमान की भाँति पड़ी रहूँगी। यह चिंता शांत हो गई।

उस दिन से उसका और भी आदर—सत्कार होने लगा। लौंडियाँ उसका मुँह जोहती रहतींए बार—बार आकर पूछ जाती—मिस साहबए कोई काम तो नहीं हैघ् कोचवान दोनों जून पूछ जाता—हुक्म हो तो गाड़ी तैयार करूँ। रानीजी भी दिन में एक बार जरूर आ बैठतीं। सोफी को अब मालूम हुआ कि उनका हृदय स्त्री —जाति के प्रति सदिच्छाओं से कितना परिपूर्ण था। उन्हें भारत की देवियों को ईंट और पत्थर के सामने सिर झुकाते देखकर हार्दिक वेदना होती थी। वह उनके जड़वाद कोए उनके मिथ्यावाद कोए उनके स्वार्थवाद को भारत की अधोगति का मुख्य कारण समझती थीं। इन विषयों पर सोफी से घंटों बातें किया करतीं।

इस कृपा और स्नेह ने धीरे—धीरे सोफी के दिल से विरानेपन के भावों को मिटाना शुरू किया। उसके आचार—विचार में परिवर्तन होने लगा। लौंडियों से कुछ कहते हुए अब झेंप न होतीए भवन के किसी भाग में जाते हुए अब संकोच न होताय किंतु चिंताएँ ज्यों—ज्यों घटती थींए विलास—प्रियता बढ़़ती थी। उसके अवकाश की मात्रा में वृध्दि होने लगी। विनोद से रुचि होने लगी। कभी—कभी प्राचीन कवियों के चित्रों को देखतीए कभी बाग की सैर करने चली जातीए कभी प्यानो पर जा बैठतीय यहाँ तक कि कभी—कभी जाह्नवी के साथ शतरंज भी खेलने लगी। वस्त्राभूषण से अब वह उदासीनता न रही। गाउन के बदले रेशमी साड़ियाँ पहनने लगी। रानीजी के आग्रह में कभी—कभी पान भी खा लेती। कंघी—चोटी से प्रेम हुआ। चिंता त्यागमूलक होती है। निश्चिंतता का आमोद—विनोद से मेल है।

एक दिनए तीसरे पहरए वह अपने कमरे में बैठी हुई कुछ पढ़़ रही थी। गरमी इतनी सख्त थी कि बिजली के पंखे और खस की टट्टियों के होते हुए भी शरीर से पसीना निकल रहा था। बाहर लू से देह झुलसी जाती थी। सहसा प्रभु सेवक आकर बोले—सोफीए जरा चलकर एक झगड़े का निर्णय कर दो। मैंने एक कविता लिखी हैए विनयसिंह को उसके विषय में कई शंकाएँ हैं। मैं कुछ कहता हूँए वह कुछ कहते हैंय फैसला तुम्हारे ऊपर छोड़ा गया है। जरा चलो।

सोफी—मैं काव्य सम्बंधी विवाद का क्या निर्णय करूँगीए पिंगल का अक्षर तक नहीं जानतीए अलंकारों का लेश—मात्रा भी ज्ञान नहींय मुझे व्यर्थ ले जाते हो।

प्रभु सेवक—उस झगड़े का निर्णय करने के लिए पिंगल जानने की जरूरत नहीं। मेरे और उनके आदर्श में विरोध है। चलो तो।

सोफी अॉंगन से निकलीए तो ज्वाला—सी देह में लगी। जल्दी—जल्दी पग उठाते हुए विनय के कमरे में आईए जो राजभवन के दूसरे भाग में था। आज तक वह यहाँ कभी न आई थी। कमरे में कोई सामान न था। केवल एक कम्बल बिछा हुआ था और जमीन पर ही दस—पाँच पुस्तकें रखी हुई थीं। न पंखाए न खस की टट्टीए न परदेए न तसवीरें। पछुआ सीधो कमरे में आती थी। कमरे की दीवारें जलते तवे की भाँति तप रही थीं। वहीं विनय कम्बल पर सिर झुकाए बैठे हुए थे। सोफी को देखते ही वह उठ खड़े हुए और उसके लिए कुर्सी लाने दौड़े।

सोफी—कहाँ जा रहे हैंघ्

प्रभु सेवक—(मुस्कराकर) तुम्हारे लिए कुर्सी लाने।

सोफी—वह कुर्सी लगाएँगे और मैं बैठूँगी! कितनी भद्दी बात है!

प्रभु सेवक—मैं रोकता भीए तो वह न मानते।

सोफी—इस कमरे में इनसे कैसे रहा जाता हैघ्

प्रभु सेवक—पूरे योगी हैं। मैं तो प्रेम—वश चला आता हूँ।

इतने में विनय ने एक गद्देदार कुर्सी लाकर सोफी के लिए रख दी। सोफी संकोच और लज्जा से गड़ी जा रही थी। विनय की ऐसी दशा हो रही थीए मानो पानी में भीग रहे हैं। सोफी मन में कहती थी—कैसा आदर्श जीवन है! विनय मन में कहते थे—कितना अनुपम सौंदर्य है! दोनों अपनी—अपनी जगह खड़े रहे! आखिर विनय को एक उक्ति सूझी। प्रभु सेवक की ओर देखकर बोले—हम और तुम वादी हैंए खड़े रह सकते हैंए पर न्यायाधाीश का तो उच्च स्थान पर बैठना ही उचित है।

सोफी ने प्रभु सेवक की ओर ताकते हुए उत्तर दिया—खेल में बालक अपने को भूल नहीं जाता।

अंत में तीनों प्राणी कम्बल पर बैठे। प्रभु सेवक ने अपनी कविता पढ़़ सुनाई। कविता माधुर्य में डूबी हुईए उच्च और पवित्र भावों से परिपूर्ण थी। कवि ने प्रसादगुण कूट—कूटकर भर दिया था। विषय था—एक माता का अपनी पुत्री को आशीर्वाद। पुत्री ससुराल जा रही हैय माता उसे गले लगाकर आशीर्वाद देती है—पुत्रीए तू पति—परायण होए तेरी गोद फलेए उसमें फूल के—से कोमल बच्चे खेलेंए उनकी मधुर हास्य—धवनि से तेरा घर और अॉंगन गूँजे। तुझ पर लक्ष्मी की कृपा हो। तू पत्थर भी छूएए तो कंचन हो जाए। तेरा पति तुझ पर उसी भाँति अपने प्रेम की छाया रखेए जैसे छप्पर दीवार को अपनी छाया में रखता है।

कवि ने इन्हीं भावों के अंतर्गत दाम्पत्य जीवन का ऐसा सुललित चित्र खींचा था कि उसमें प्रकाशए पुष्प और प्रेम का आधिक्य थाय कहीं अंधोरी घाटीयाँ न थींए जिनमें हम गिर पड़ते हैंय कहीं वे काँटे न थेए जो हमारे पैरों में चुभते हैंय कहीं वह विकार न थाए जो हमें मार्ग से विचलित कर देता है। कविता समाप्त करके प्रभु सेवक ने विनयसिंह से कहा—अब आपको इसके विषय में जो कुछ कहना होए कहिए।

विनयसिंह ने सकुचाते हुए उत्तर दिया—मुझे जो कुछ कहना थाए कह चुका।

प्रभु सेवक—फिर से कहिए।

विनयसिंह—बार—बार वही बातें क्या कहूँ।

प्रभु सेवक—मैं आपके कथन का भावार्थ कर दूँघ्

विनयसिंह—मेरे मन में एक बात आईए कह दीय आप व्यर्थ उसे इतना बढ़़ा रहे हैं।

प्रभु सेवक—आखिर आप उन भावों को सोफी के सामने प्रकट करते क्यों शर्माते हैंघ्

विनयसिंह—शर्माता नहीं हूँए लेकिन आपसे मेरा कोई विवाद नहीं है। आपको मानव—जीवन का यह आदर्श सर्वोत्ताम प्रतीत होता हैए मुझे वह अपनी वर्तमान अवस्था के प्रतिकूल जान पड़ता है। इसमें झगड़े की कोई बात नहीं है।

प्रभु सेवक—(हँसकर) हाँए यही तो मैं आपसे कहलाना चाहता हूँ कि आप उसे वर्तमान अवस्था के प्रतिकूल क्यों समझते हैंघ् क्या आपके विचार में दाम्पत्य जीवन सर्वथा निंद्य हैघ् औरए क्या संसार के समस्त प्राणियों को संन्यास धारण कर लेना चाहिएघ्

विनयसिंह—यह मेरा आशय कदापि नहीं कि संसार के समस्त प्राणियों को संन्यास धारण कर लेना चाहिएय मेरा आशय केवल यह था कि दाम्पत्य जीवन स्वार्थपरता का पोषक है। इसके लिए प्रमाण की आवश्यकता नहींए और इस अधोगति की दशा मेंए जबकि स्वार्थ हमारी नसों में कूट—कूटकर भरा हुआ हैए जब कि हम बिना स्वार्थ के कोई काम या कोई बात नहीं करतेए यहाँ तक कि माता—पुत्रा—सम्बंध में—गुरु—शिष्य—सम्बंध में—पत्नी—पुरुष—सम्बंध में स्वार्थ का प्राधान्य हो गया हैए किसी उच्चकोटी के कवि के लिए दाम्पत्य जीवन की सराहना करना—उसकी तारीफों के पुल बाँधना—शोभा नहीं देता। हम दाम्पत्य सुख के दास हो रहे हैं। हमने इसी को अपने जीवन का लक्ष्य समझ रखा है। इस समय हमें ऐसे व्रतधारियों कीए त्यागियों कीए परमार्थ—सेवियों की आवश्यकता हैए जो जाति के उध्दार के लिए अपने प्राण तक दे दें। हमारे कविजनों को इन्हीं उच्च और पवित्र भावों को उत्तोजित करना चाहिए। हमारे देश में जनसंख्या जरूरत से ज्यादा हो गई है। हमारी जननी संतान—वृध्दि के भार को अब नहीं सँभाल सकती। विद्यालयों मेंए सड़कों परए गलियों में इतने बालक दिखाई देते हैं कि समझ में नहीं आताए ये क्या करेंगे। हमारे देश में इतनी उपज भी नहीं होती कि सबके के लिए एक बार इच्छापूर्ण भोजन भी प्राप्त हो। भोजन का अभाव ही हमारे नैतिक और आर्थिक पतन का मुख्य कारण है। आपकी कविता सर्वथा असामयिक है। मेरे विचार में इससे समाज का उपकार नहीं हो सकता। इस समय हमारे कवियों कार् कर्तव्य है त्याग का महत्व दिखानाए ब्रह्मचर्य में अनुराग उत्पन्न करनाए आत्मनिग्रह का उपदेश करना। दाम्पत्य तो दासत्व का मूल है और यह समय उसके गुण—गान के लिए अनुकूल नहीं है।

प्रभु सेवक—आपको जो कुछ कहना थाए कह चुकेघ्

विनयसिंह—अभी बहुत कुछ कहा जा सकता है। पर इस समय इतना ही काफी है।

प्रभु सेवक—मैं आपसे पहले ही कह चुका हूँ कि बलिदान और त्याग के आदर्श की मैं निंदा नहीं करता। वह मनुष्य के लिए सबसे ऊँचा स्थान हैय और वह धान्य हैए जो उसे प्राप्त कर ले। किंतु जिस प्रकार कुछ व्रतधारियों के निर्जल और निराहार रहने से अन्न और जल की उपयोगिता में बाधा नहीं पड़तीए उसी प्रकार दो—चार योगियों के त्याग से दाम्पत्य जीवन त्याज्य नहीं हो जाता। दाम्पत्य मनुष्य के सामाजिक जीवन का मूल है। उसका त्याग कर दीजिएए बस हमारे सामाजिक संगठन का शीराजा बिखर जाएगाए और हमारी दशा पशुओं के समान हो जाएगी। गार्हस्थ्य को ऋषियों ने सर्वोच्च धर्म कहा हैय और अगर शांत हृदय से विचार कीजिए तो विदित हो जाएगा कि ऋषियों का यह कथन अत्युक्ति—मात्रा नहीं है। दयाए सहानुभूतिए सहिष्णुताए उपकारए त्याग आदि देवोचित गुणों के विकास के जैसे सुयोग गार्हस्थ्य जीवन में प्राप्त होते हैंए और किसी अवस्था में नहीं मिल सकते। मुझे तो यहाँ तक कहने में संकोच नहीं है कि मनुष्य के लिए यही एक ऐसी व्यवस्था हैए जो स्वाभाविक कही जा सकती है। जिन कृत्यों ने मानव—जाति का मुख उज्ज्वल कर दिया हैए उनका श्रेय योगियों को नहींए दाम्पत्य—सुख—भोगियों को है। हरिश्चंद्र योगी नहीं थेए रामचंद्र योगी नहीं थेए कृष्ण त्यागी नहीं थेए नेपोलियन त्यागी नहीं थाए नेलसन योगी नहीं था। धर्म और विज्ञान के क्षेत्र में त्यागियों ने अवश्य कीर्ति—लाभ की हैय लेकिन कर्मक्षेत्र में यश का सेहरा भोगियों के ही सिर बँधा है। इतिहास में ऐसा एक भी प्रमाण नहीं मिलता कि किसी जाति का उध्दार त्यागियों द्वारा हुआ हो। आज भी हिंदुस्तान में 10 लाख से अधिक त्यागी बसते हैंय पर कौन कह सकता है कि उनसे समाज का कुछ उपकार हो रहा है। सम्भव हैए अप्रत्यक्ष रूप से होता होय पर प्रत्यक्ष रूप से नहीं होता। फिर यह आशा क्योंकर की जा सकती है कि दाम्पत्य जीवन की अवहेलना से जाति का विशेष उपकार होगाघ् हाँए अगर अविचार को उपकार कहेंए तो अवश्य उपकार होगा।

यह कथन समाप्त करके प्रभु सेवक ने सोफिया से कहा—तुमने दोनों वादियों के कथन सुन लिएए तुम इस समय न्यास के आसन पर होए सत्यासत्य का निर्णय करो।

सोफी—इसका निर्णय तुम आप ही कर सकते हो। तुम्हारी समझ में संगीत बहुत अच्छी चीज हैघ्

प्रभु सेवक—अवश्य।

सोफी—लेकिनए अगर किसी के घर में आग लगी हुई होए तो उसके निवासियों को गाते—बजाते देखकर तुम उन्हें क्या कहोगेघ्

प्रभु सेवक—मूर्ख कहूँगाए और क्या।

सोफी—क्योंए गाना तो कोई बुरी चीज नहींघ्

प्रभु सेवक—तो यह साफ—साफ क्यों नहीं कहतीं कि तुमने इन्हें डिग्री दे दीघ् मैं पहले ही समझ रहा था कि तुम इन्हीं की तरफ झुकोगी।

सोफी—अगर यह भय थाए तो तुमने मुझे निर्णायक क्यों बनाया थाघ् तुम्हारी कविता उच्च कोटी की है। मैं इसे सवार्ंग—सुंदर कहने को तैयार हूँ। लेकिन तुम्हारार् कर्तव्य है कि अपनी इस अलौकिक शक्ति को स्वदेश—बंधुओं के हित में लगाओ। अवनति की दशा में शृंगार और प्रेम का राग अलापने की जरूरत नहीं होतीए इसे तुम भी स्वीकार करोगे। सामान्य कवियों के लिए कोई बंधान नहीं है—उन पर कोई उत्तरदायित्व नहीं है। लेकिन तुम्हें ईश्वर ने जितनी ही महत्व पूर्ण शक्ति प्रदान की हैए उतना ही उत्तरदायित्व भी तुम्हारे ऊपर ज्यादा है।

जब सोफिया चली गईए तो विनय ने प्रभु सेवक से कहा—मैं इस निर्णय को पहले ही से जानता था। तुम लज्जित तो न हुए होगेघ्

प्रभु सेवक—उसने तुम्हारी मुरौवत की है।

विनयसिंह—भाईए तुम बड़े अन्यायी हो। इतने युक्तिपूर्ण निर्णय पर भी उनके सिर इलजाम लगा ही दिया। मैं तो उनकी विचारशीलता का पहले ही से कायल थाए आज से भक्त हो गया। इस निर्णय ने मेरे भाग्य का निर्णय कर दिया। प्रभुए मुझे स्वप्न में भी यह आशा न थी कि मैं इतनी आसानी से लालसा का दास हो जाऊँगा। मैं मार्ग से विचलित हो गयाए मेरा संयम कपटी मित्र की भाँति परीक्षा के पहले ही अवसर पर मेरा साथ छोड़ गया। मैं भली भाँति जानता हूँ कि मैं आकाश के तारे तोड़ने जा रहा हूँ—वह फल खाने जा रहा हूँए जो मेरे लिए वर्जित है। खूब जानता हूँए प्रभुए कि मैं अपने जीवन को नैराश्य की वेदी पर बलिदान कर रहा हूँ। अपनी पूज्य माता के हृदय पर कुठाराघात कर रहा हूँए अपनी मर्यादा की नौका को कलंक के सागर में डुबा रहा हूँए अपनी महत्तवाकांक्षाओं को विसर्जित कर रहा हूँय पर मेरा अंतरूकरण इसके लिए मेरा तिरस्कार नहीं करता। सोफिया मेरी किसी तरह नहीं हो सकतीय पर मैं उसका हो गयाए और आजीवन उसी का रहूँगा।

प्रभु सेवक—विनयए अगर सोफी को यह बात मालूम हो गईए तो वह यहाँ एक क्षण भी न रहेगीय कहीं वह आत्महत्या न कर ले। ईश्वर के लिए यह अनर्थ न करो।

विनयसिंह—नहीं प्रभुए मैं बहुत जल्द यहाँ से चला जाऊँगाए ओर फिर कभी न आऊँगा। मेरा हृदय जलकर भस्म हो जाएय पर सोफी को अॉंच भी न लगने पावेगी। मैं दूर देश में बैठा हुआ इस विद्याए विवेक और पवित्रता की देवी की उपासना किया करूँगा। मैं तुमसे सत्य कहता हूँए मेरे र्प्रेम में वासना का लेश भी नहीं है। मेरे जीवन को सार्थक बनाने के लिए यह अनुराग ही काफी है। यह मत समझो कि मैं सेवा—धर्म का त्याग कर रहा हूँ। नहींए ऐसा न होगाए मैं अब भी सेवा—मार्ग का अनुगामी रहूँगाय अंतर केवल इतना होगा कि निराकार की जगह साकार कीए अ—श्य की जगह —श्यमान की भक्ति करूँगा।

सहसा जाह्नवी ने आकर कहा—विनयए जरा इंदु के पास चले जाओए कई दिन से उसका समाचार नहीं मिला। मुझे शंका हो रही हैए कहीं बीमार तो नहीं हो गई। खत भेजने में विलम्ब तो कभी न करती थी!

विनय तैयार हो गए। कुरता पहनाए हाथ में सोटा लिया और चल दिए। प्रभु सेवक सोफी के पास आकर बैठ गए और सोचने लगे—विनयसिंह की बातें इससे कहूँ या न कहूँ। सोफी ने उन्हें चिंतित देखकर पूछा—कुँवर साहब कुछ कहते थेघ्

प्रभु सेवक—उस विषय में तो कुछ नहीं कहते थेय पर तुम्हारे विषय में ऐसे भाव प्रकट किएए जिनकी सम्भावना मेरी कल्पना में भी न आ सकती थी।

सोफी ने क्षण—भर जमीन की ओर ताकने के बाद कहा—मैं समझती हूँए पहले ही समझ जाना चाहिए थाय पर मैं इससे चिंतित नहीं हूँ। यह भावना मेरे हृदय में उसी दिन अंकुरित हुईए जब यहाँ आने के चौथे दिन बाद मैंने अॉंखें खोलींए और उस अर्ध्‌दचेतना की दशा में एक देव—मूर्ति को सामने खड़े अपनी ओर वात्सल्य—द्रष्टि से देखते हुए पाया। वह द्रष्टि और वह मूर्ति आज तक मेरे हृदय पर अंकित है और सदैव अंकित रहेगी।

प्रभु सेवक—सोफीए तुम्हें यह कहते हुए लज्जा नहीं आतीघ्

सोफिया—नहींए लज्जा नहीं आती। लज्जा की बात ही नहीं है। वह मुझे अपने प्रेम के योग्य समझते हैंए यह मेरे लिए गौरव की बात है। ऐसे साधु—प्रकृतिए ऐसे त्यागमूर्तिए ऐसे सदुत्साही पुरुष की प्रेम—पात्राी बनने में कोई लज्जा नहीं। अगर प्रेम—प्रसाद पाकर किसी युवती को गर्व होना चाहिएए तो वह युवती मैं हूँ। यही वरदान थाए जिसके लिए मैं इतने दिनों तक शांत भाव से धैर्य धारण किए हुए मन में तप कर रही थी। वह वरदान आज मुझे मिल गया हैए तो यह मेरे लिए लज्जा की बात नहींए आनंद की बात है।

प्रभु सेवक—धर्म—विरोध के होते हुए भीघ्

सोफिया—यह विचार उन लोगों के लिए हैए जिनके प्रेम वासनाओें से युक्त होते हैं। प्रेम और वासना में उतना ही अंतर हैए जितना कंचन और काँच में। प्रेम की सीमा भक्ति से मिलती हैए और उनमें केवल मात्रा का भेद है। भक्ति में सम्मान और प्रेम में सेवाभाव का आधिक्य होता है। प्रेम के लिए धर्म की विभिन्नता कोई बंधान नहीं है। ऐसी बाधाएँ उस मनोभाव के लिए हैंए जिसका अंत विवाह हैए उस प्रेम के लिए नहींए जिसका अंत बलिदान है।

प्रभु सेवक—मैंने तुम्हें जता दियाए यहाँ से चलने के लिए तैयार रहो।

सोफिया—मगर घर पर किसी से इसकी चर्चा करने की जरूरत नहीं।

प्रभु सेवक—इससे निश्चिंत रहो।

सोफिया—कुछ निश्चय हुआए यहाँ से उनके जाने का कब इरादा हैघ्

प्रभु सेवक—तैयारियाँ हो रही हैं। रानीजी को यह बात मालूम हुईए तो विनय के लिए कुशल नहीं। मुझे आश्चर्य न होगाए अगर मामा से इसकी शिकायत करें।

सोफिया ने गर्व से सिर उठाकर कहा—प्रभुए कैसी बच्चो की—सी बातें करते होघ् प्रेम अभय का मंत्र है। प्रेम का उपासक संसार की समस्त चिंताओं और बाधाओं से मुक्त हो जाता है।

प्रभु सेवक चले गएए तो सोफिया ने किताब बंद कर दी और बाग में आकर हरी घास पर लेट गई। उसे आज लहराते हुए फूलों मेंए मंद—मंद चलनेवाली वायु मेंए वृक्षों पर चहकनेवाली चिड़ियों के कलरव मेंए आकाश पर छाई लालिमा में एक विचित्र शोभाए एक अकथनीय सुषमाए एक अलौकिक छटा का अनुभव हो रहा था। वह प्रेम—रत्न पा गई थी।

उस दिन के बाद एक सप्ताह हो गयाए पर विनयसिंह ने राजपूताने को प्रस्थान न किया। वह किसी—न—किसी हीले से दिन टालते जाते थे। कोई तैयारी न करनी थीए फिर भी तैयारियाँ पूरी न होती थीं। अब विनय और सोफियाए दोनों ही को विदित होने लगा कि प्रेम कोए जब वह स्त्री और पुरुष में होए वासना से निर्लिप्त रखना उतना आसान नहींए जितना उन्होंने समझा था। सोफी एक किताब बगल में दबाकर प्रातरूकाल बाग में जा बैठती। शाम को भी कहीं और सैर करने न जाकर वहीं आ जाती। विनय भी उससे कुछ दूर पर लिखते—पढ़़तेए कुत्तो से खेलते या किसी मित्र से बातें करते अवश्य दिखाई देते। दोनों एक दूसरे की ओर दबी अॉंखों से देख लेते थेय पर संकोचवश कोई बातचीत करने में अग्रसर न होता था। दोनों ही लज्जाशील थेय पर दोनों इस मौन भाषा का आशय समझते थे। पहले इस भाषा का ज्ञान न था। दोनों के मन में एक ही उत्कंठाए एक ही विकलताए एक ही तड़पए एक ही ज्वाला थी। मौन भाषा से उन्हें तस्कीन न होतीय पर किसी को वार्तालाप करने का साहस न होता। दोनों अपने—अपने मन में प्रेम—वार्ता कीर् नई—नई उक्तियाँ सोचकर आते और यहाँ आकर भूल जाते। दोनों ही व्रतधारीए दोनों ही आदर्शवादी थेय किंतु एक का धर्मग्रंथों की ओर ताकने को जी न चाहता थाए दूसरा समिति को अपने निर्धारित विषय पर व्याख्यान देने का अवसर भी न पाता था। दोनों ही के लिए प्रेम—रत्न प्रेम—मद सिध्द हो रहा था।

एक दिनए रात कोए भोजन करने के बाद सोफिया रानी जाह्नवी के पास बैठी हुई कोई समाचार—पत्र पढ़़कर सुना रही थी कि विनयसिंह आकर बैठ गए। सोफी की विचित्र दशा हो गईए पढ़़ते—पढ़़ते भूल जाती कि कहाँ तक पढ़़ चुकी हूँए और पढ़़ी हुई पंक्तियों को फिर पढ़़ने लगतीए वह भी अटक—अटककरए शब्दों पर अॉंखें न जमतीं। वह भूल जाना चाहती थी कि कमरे में रानी के अतिरिक्त कोई और बैठा हुआ हैए पर बिना विनय की ओर देखे ही उसे दिव्य ज्ञान—सा हो जाता था कि अब वह मेरी ओर ताक रहे हैंए और तत्क्षण उसका मन अस्थिर हो जाता। जाह्नवी ने कई बार टोका—सोती तो नहीं होघ् क्या बात हैए रुक क्यों जाती होघ् आज तुझे क्या हो गया है बेटीघ् सहसा उनकी द्रष्टि विनयसिंह की ओर फिरी—उसी समय जब वह प्रेमातुर नेत्रों से उसकी ओर ताक रहे थे। जाह्नवी का विकसितए शांत मुख—मंडल तमतमा उठाए मानो बाग में आग लग गई। अग्निमय नेत्रों से विनय की ओर देखकर बोलीं—तुम कब जा रहे होघ्

विनयसिंह—बहुत जल्द।

जाह्नवी—मैं बहुत जल्द का आशय यह समझती हूँ कि तुम कल प्रातरूकाल ही प्रस्थान करोगे।

विनयसिंह—अभी साथ जानेवाले कई सेवक बाहर गए हुए हैं।

जाह्नवी—कोई चिंता नहीं। वे पीछे चले जाएँगेए तुम्हें कल प्रस्थान करना होगा।

विनयसिंह—जैसी आज्ञा।

जाह्नवी—अभी जाकर सब आदमियों को सूचना दे दो। मैं चाहती हूँ कि तुम स्टेशन पर सूर्य के दर्शन करो।

विनय—इंदु से मिलने जाना है।

जाह्नवी—कोई जरूरत नहीं। मिलने—भेंटने की प्रथा स्त्रियों के लिए हैए पुरुषों के लिए नहींए जाओ।

विनय को फिर कुछ कहने की हिम्मत न हुईए आहिस्ता से उठे और चले गए।

सोफी ने साहस करके कहा—आजकल तो राजपूताने में आग बरसती होगी!

जाह्नवी ने निश्चयात्मक भाव से कहा—

र्

कर्तव्य कभी आग और पानी की परवा नहीं करता। जाओए तुम भी सो रहोए सवेरे उठना है।

सोफी सारी रात बैठी रही। विनय से एक बार मिलने के लिए उसका हृदय तड़फड़ा रहा था—आह! वह कल चले जाएँगेए और मैं उनसे विदा भी न हो सकूँगी। वह बार—बार खिड़की से झाँकती कि कहीं विनय की आहट मिल जाए। छत पर चढ़़कर देखाय अंधकार छाया हुआ थाए तारागण उसकी आतुरता पर हँस रहे थे। उसके जी में कई बार प्रबल आवेग हुआ कि छत पर से नीचे बाग में कूद पड़ूँए उनके कमरे में जाऊँ और कहूँ—मैं तुम्हारी हूँ! आह! अगर सम्प्रदाय ने हमारे और उनके बीच में बाधा न खड़ी कर दी होतीए तो वह इतने चिंतित क्यों होतेए मुझको इतना संकोच क्यों होताए रानी मेरी अवहेलना क्यों करतींघ् अगर मैं राजपूतानी होती तो रानी सहर्ष मुझे स्वीकार करतींए पर मैं ईसा की अनुचरी होने के कारण त्याज्य हूँ। ईसा और कृष्ण में कितनी समानता हैय पर उनके अनुचरों में कितनी विभिन्नता! कौन कह सकता है कि साम्प्रदायिक भेदों ने हमारी आत्माओं पर कितना अत्याचार किया है!

ज्यों—ज्यों रात बीतती थीए सोफी का दिल नैराश्य से बैठा जाता था—हायए मैं यों ही बैठी रहूँगी और सबेरा हो जाएगाए विनयए चले जाएँगे। कोई भी तो नहींए जिसके हाथों एक पत्र लिखकर भेज दूँ। मेरे ही कारण तो उन्हें यह दंड मिल रहा है। माता का हृदय भी निर्दय होता है। मैं समझी थीए मैं ही अभागिनी हूँय पर अब मालूम हुआए ऐसी माताएँ और भी हैं!

तब वह छत पर से उतरी और अपने कमरे में जाकर लेट रही। नैराश्य ने निद्रा की शरण लीय पर चिंता की निद्रा क्षुधावस्था का विनोद है—शांति—विहीन और नीरस। जरा ही देर सोई थी कि चौंककर उठ बैठी। सूर्य का प्रकाश कमरे में फैल गया थाए और विनयसिंह अपने बीसों साथियों के साथ स्टेशन जाने को तैयार खड़े थे। बाग में हजारों आदमियों की भीड़ लगी हुई थी।

वह तुरंत बाग में आ पहुँची और भीड़ को हटाती हुई यात्रियों के सम्मुख आकर खड़ी हो गई। राष्ट्रीय गान हो रहा थाए यात्राी नंगे सिरए नंगे पैरए एक—एक कुरता पहनेए हाथ में लकड़ी लिएए गरदनों में एक—एक थैली लटकाए चलने को तैयार थे। सब—के—सब प्रसन्न—वदनए उल्लास से भरे हुएए जातीयता के गर्व से उन्मत्ता थेए जिनको देखकर दर्शकों के मन गौरवान्वित हो रहे थे। एक क्षण में रानी जाह्नवी आईं और यात्रियों के मस्तक पर केशर के तिलक लगाए। तब कुँवर भरतसिंह ने आकर उनके गलों में हार पहनाए। इसके बाद डॉक्टर गांगुली ने चुने हुए शब्दों में उन्हें उपदेश दिया। उपदेश सुनकर यात्राी लोग प्रस्थित हुए। जयजयकार की धवनि सहख्—सहख् कठों से निकलकर वायुमंडल को प्रतिधवनित करने लगी। स्त्रियों और पुरुषों का एक समूह उनके पीछे—पीछे चला। सोफिया चित्रवत्‌ खड़ी यह —श्य देख रही थी। उसके हृदय में बार—बार उत्कंठा होती थीए मैं भी इन्हीं यात्रियों के साथ चली जाऊँ और अपने दुरूखित बंधुओं की सेवा करूँ। उसकी अॉंखें विनयसिंह की ओर लगी हुई थीं। एकाएक विनयसिंह की अॉंखें उसकी ओर फिरींय उनमें कितना नैराश्य थाए कितनी मर्म—वेदनाए कितनी विवशताए कितनी विनय! वह सब यात्रियों के पीछे चल रहे थेए बहुत धीरे—धीरेए मानो पैरों में बेड़ी पड़ी हो। सोफिया उपचेतना की अवस्था में यात्रियों के पीछे—पीछे चलीए और उसी दशा में सड़क पर आ पहुँचीय फिर चौराहा मिलाए इसके बाद किसी राजा का विशाल भवन मिलाय पर अभी तक सोफी को खबर न हुई कि मैं इनके साथ चली आ रही हूँ। उसे इस समय विनयसिंह के सिवा और कोई नजर ही न आता था। कोई प्रबल आकर्षण उसे खींचे लिए जाता था। यहाँ तक कि वह स्टेशन के समीप के चौराहे पर पहुँच गई। अचानक उसके कानों में प्रभु सेवक की आवाज आईए जो बड़े वेग से फिटन दौड़ाए चले आते थे।

प्रभु सेवक ने पूछा—सोफीए तुम कहाँ जा रही होघ् जूते तक नहींए केवल स्लीपर पहने हो!

सोफिया पर घड़ों पानी पड़ गया—आह! मैं इस वेश में कहाँ चली आई! मुझे सुधि ही न रही। लजाती हुई बोली—कहीं तो नहीं!

प्रभु सेवक—क्या इन लोगों के साथ स्टेशन तक जाओगीघ् आओए गाड़ी पर बैठ जाओ। मैं भी वहीं चलता हूँ। मुझे तो अभी—अभी मालूम हुआ कि ये लोग जा रहे हैंए जल्दी से गाड़ी तैयार करके आ पहुँचाए नहीं तो मुलाकात भी न होती।

सोफी—मैं इतनी दूर निकल आईए और जरा भी ख्याल न आया कि कहाँ जा रही हूँ।

प्रभु सेवक—आकर बैठ न जाओ। इतनी दूर आई होए तो स्टेशन तक और चली चलो।

सोफी—मैं स्टेशन न जाऊँगी। यहीं से लौट जाऊँगी।

प्रभु सेवक—मैं स्टेशन से लौटता हुआ आऊँगा। आज तुम्हें मेरे साथ घर चलना होगा।

सोफी—मैं वहाँ न जाऊँगी।

प्रभु सेवक—बड़े पापा नाराज होंगे। आज उन्होंने तुम्हें बहुत आग्रह करके बुलाया है।

सोफी—जब तक मामा मुझे खुद आकर न ले जाएँगीए उस घर में कदम न रखूँगी।

यह कहकर सोफी लौट पड़ीए और प्रभु सेवक स्टेशन की तरफ चल दिए।

स्टेशन पर पहुँचकर विनय ने चारों तरफ अॉंखें फाड़—फाड़कर देखाए सोफी न थी।

प्रभु सेवक ने उसके कान में कहा—धर्मशाले तक यों ही रात के कपड़े पहने चली आई थीए वहाँ से लौट गई। जाकर खत जरूर लिखिएगाए वरना वह राजपूताने जा पहुँचेगी।

विनय ने गद्‌गद कंठ से कहा—केवल देह लेकर जा रहा हूँए हृदय यहीं छोड़े जाता हूँ।

'''

अध्याय 10

बालकों पर प्रेम की भाँति द्वेष का असर भी अधिक होता है। जबसे मिठुआ और घीसू को मालूम हुआ था कि ताहिर अली हमारा मैदान जबरदस्ती ले रहे हैंए तब से दोनों उन्हें अपना दुश्मन समझते थे। चतारी के राजा साहब और सूरदास में जो बातें हुई थींए उनकी उन दोनों को खबर न थी। सूरदास को स्वयं शंका थी कि यद्यपि राजा साहब ने आश्वासन दियाए पर शीघ्र ही यह समस्या फिर उपस्थित होगी। जॉन सेवक साहब इतनी आसानी से गला छोड़नेवाले नहीं हैं। बजरंगीए नायकराम आदि भी इसी प्रकार की बातें करते रहते थे। मिठुआ और घीसू इन बातों को बड़े प्रेम से सुनतेए और उनकी द्वेषाग्नि और भी प्रचंड होती थी। घीसू जब भैंसे लेकर मैदान जाता तो जोर—जोर से पुकारता—देखेंए कौन हमारी जमीन लेता हैए उठाकर ऐसा पटकूँ कि वह भी याद करे। दोनों टाँगें तोड़ दूँगा। कुछ खेल समझ लिया है! वह जरा था भी कड़े दमए कुश्ती लड़ता था। बजरंगी खुद भी जवानी में अच्छा पहलवान था। घीसू को वह शहर के पहलवानों की नाक बना देना चाहता थाए जिससे पंजाबी पहलवानों को भी ताल ठोकने की हिम्मत न पड़ेए दूर—दूर जाकर दंगल मारेए लोग कहें—श्यह बजरंगी का बेटा है।श् अभी से घीसू को अखाड़े भेजता था। घीसू अपने घमंड में समझता था कि मुझे जो पेच मालूम हैंए उनसे जिसे चाहूँए गिरा दूँ। मिठुआ कुश्ती तो न लड़ता थाय पर कभी—कभी अखाड़े की तरफ जा बैठता था। उसे अपनी पहलवानी की डींग मारने के लिए इतना काफी थी। दोनों जब ताहिर अली को कहीं देखतेए तो सुना—सुनाकर कहते—दुश्मन जाता हैए उसका मुँह काला। मिठुआ कहता—जै शंकरए काँटा लगे न कंकरए दुश्मन को तंग कर। घीसू कहता—बम भोलाए बैरी के पेट में गोलाए उससे कुछ न जाए बोला।

ताहिर अली इन छोकरों की छिछोरी बातें सुनते और अनसुनी कर जाते। लड़कों के मुँह क्या लगें। सोचते—कहीं ये सब गालियाँ दे बैठेंए तो इनका क्या बना लूँगा। वे दोनों समझतेए डर के मारे नहीं बोलतेए और शेर हो जाते। घीसू मिठुआ पर उन पेचों का अभ्यास करताए जिनसे वह ताहिर अली को पटकेगा। पहले यह हाथ पकड़ाय फिर अपनी तरफ खींचाय तब वह हाथ गर्दन में डाल दिया और अडंगी लगाईए बस चित। मिठुआ फौरन गिर पड़ता थाए और उसे इस पेच के अद्‌भुत प्रभाव का विश्वास हो जाता था।

एक दिन दोनों ने सलाह की—चलकर मियाँजी के लड़कों की खबर लेनी चाहिए। मैदान में जाकर जाहिर और जाबिर को खेलने के लिए बुलायाए और खूब चपतें लगाईं। जाबिर छोटा थाए उसे मिठुआ ने दाबा। जाहिर और घीसू का जोड़ थाय लेकिन घीसू अखाड़ा देखे हुए थाए कुछ दाँव—पेच जानता ही थाए आन—की—आन में जाहिर को दबा बैठा। मिठुआ ने जाबिर के चुटकियाँ काटनी शुरू कीं। बेचारा रोने लगा। घीसू ने जाहिर को कई घिस्से दिएए वह भी चौंधिया गयाय जब देखा कि यह तो मार ही डालेगाए तो उसने फरियाद मचाई। इन दोनों का रोना सुनकर नन्हा—सा साबिर एक पतली—सी टहनी लिएए अकड़ता हुआ पीड़ितों की सहायता करने आयाए और घीसू को टहनी से मारने लगा। जब इस शस्त्रा—प्रहार का घीसू पर कुछ असर न हुआए तो उसने इससे ज्यादा चोट करनेवाला बाण निकाला—घीसू पर थूकने लगा। घीसू ने जाहिर को छोड़ दियाए और साबिर के दो—तीन तमाचे लगाए। जाहिर मौका पाकर फिर उठाए और अबकी ज्यादा सावधान होकर घीसू से चिमट गया। दोनों में मल्ल—युध्द होने लगा। आखिर घीसू ने सावधान उसे फिर पटका और मुश्कें चढ़़ा दीं। जाहिर को अब रोने के सिवा कोई उपाय न सूझाए जो निर्बलों का अंतिम आधार है। तीनों की आर्तधवनि माहिर अली के कान में पहुँची। वह इस समय स्कूल जाने को तैयार थे। तुरंत किताबें पटक दीं और मैदान की तरफ दौड़े। देखाए तो जाबिर और जाहिर नीचे पड़े हाय—हाय कर रहे हैं और साबिर अलग बिलबिला रहा है! कुलीनता का रक्त खौल उठाय मैं सैयद पुलिस के अफसर का बेटाए चुंगी के मुहर्रिर का भाईए अंगरेजी के आठवें दरजे का विद्यार्थी! यह मूर्खए उजड्ड अहीर का लौंडाए इसकी इतनी मजाल कि मेरे भाइयों को नीचा दिखाए! घीसू के एक ठोकर लगाई और मिठुआ के कई तमाचे। मिठुआ तो रोने लगाय किंतु घीसू चिमड़ा था। जाहिर को छोड़कर उठाए हौसले बढ़़े हुए थेए दो मोरचे जीत चुका थाए ताल ठोककर माहिर अली से भी लिपट गया। माहिर का सफेद पाजामा मैला हो गयाए आज ही जूते में रोगन लगाया थाए उस पर गर्द पड़ गईय सँवारे हुए बाल बिखर गएए क्रोधोंन्मत्ता होकर घीसू को इतनी जोर से धक्का दिया कि वह दो कदम पर जा गिरा। साबिरए जाहिरए जाबिरए सब हँसने लगे। लड़कों की चोट प्रतिकार के साथ ही गायब हो जाती है। घीसू इनको हँसते देखकर और भी झुँझलायाय फिर उठा और माहिर अली से लिपट गया। माहिर ने उसका टेंटुआ पकड़ा और जोर से दबाने लगे। घीसू समझाए अब मराए यह बिना मारे न छोड़ेगा। मरता क्या न करताए माहिर के हाथ में दाँत जमा दिएय तीन दाँत गड़ गएए खून बहने लगा। माहिर चिल्ला उठेए उसका गला छोड़कर अपना हाथ छुड़ाने का यत्न करने लगेय मगर घीसू किसी भाँति न छोड़ता था। खून बहते देखकर तीनों भाइयोें ने फिर रोना शुरू किया। जैनब और रकिया यह हंगामा सुनकर दरवाजे पर आ गईं। देखा तो समरभूमि रक्त से प्लावित हो रही हैए गालियाँ देती हुई ताहिर अली के पास आईं। जैनब ने तिरस्कार भाव से कहा—तुम यहाँ बैठे खालें नोच रहे होए कुछ दीन—दुनिया की भी खबर है! वहाँ वह अहीर का लौंडा हमारे लड़कों का खून—खच्चर किए डालता है। मुए को पकड़ पातीए तो खून ही चूस लेती।

रकिया—मुआ आदमी है कि देव—बच्चा है! माहिर के हाथ में इतनी जोर से दाँत काटा है कि खून के फौवारे निकल रहे हैं। कोई दूसरा मर्द होताए तो इसी बात पर मुए को जीता गाड़ देता।

जैनब—कोई अपना होताए तो इस वक्त मूड़ीकाटे को कच्चा ही चबा जाता।

ताहिर अली घबराकर मैदान की ओर दौड़े। माहिर के कपड़े खून से तर देखेए तो जामे से बाहर हो गए। घीसू के दोनों कान पकड़कर जोर से हिलाए और तमाचे—पर—तमाचे लगाने शुरू किए। मिठुआ ने देखाए अब पिटने की बारी आईय मैदान हमारे हाथ से गयाए गालियाँ देता हुआ भागा। इधार घीसू ने भी गालियाँ देनी शुरू कीं। शहर के लौंडे गाली की कला में सिध्दहस्त होते हैं। घीसू नई—नई अछूती गालियाँ दे रहा था और ताहिर अली गालियों का जवाब तमाचों से दे रहे थे। मिठुआ ने जाकर इस संग्राम की सूचना बजरंगी को दी—सब लोग मिलकर घीसू को मार रहे हैंए उसके मुँह से लहू निकल रहा है। वह भैंसें चरा रहा थाए बस तीनों लड़के आकर भैसों को भगाने लगे। घीसू ने मना कियाए तो सबों ने मिलकर माराए और बड़े मियाँ भी निकलकर मार रहे हैं। बजरंगी यह खबर सुनते ही आग हो गया। उसने ताहिर अली की माताओं को 50 रुपये दिए थे और उस जमीन को अपनी समझे बैठा था। लाठी उठाई और दौड़ा। देखाए तो ताहिर अली घीसू के हाथ—पाँव बँधावा रहे हैं। पागल हो गयाए बोला—बसए मुंशीजीए भला चाहते होए तो हट जाओय नहीं तो सारी सेखी भुला दूँगाए यहाँ जेहल का डर नहीं हैए साल—दो—साल वहीं काट आऊँगाए लेकिन तुम्हें किसी काम का न रखूँगा। जमीन तुम्हारे बाप की नहीं है। इसीलिए तुम्हें 50 रुपये दिए हैं। क्या वे हराम के रुपये थेघ् बसए हट ही जाओए नहीं तो कच्चा चबा जाऊँगाय मेरा नाम बजरंगी है!

ताहिर अली ने अभी कुछ जवाब न दिया था कि घीसू ने बाप को देखते ही जोर से छलाँग मारी और एक पत्थर उठाकर ताहिर अली की तरफ फेंका। वह सिर नीचा न कर लेंए तो माथा फट जाए। जब तक घीसू दूसरा पत्थर उठाएए उन्होंने लपककर उसका हाथ पकड़ा और इतनी जोर से ऐंठा कि वह श्अहा मरा! अहा मरा!श् कहता हुआ जमीन पर गिर पड़ा। अब बजरंगी आपे से बाहर हो गया। झपटकर ऐसी लाठी मारी कि ताहिर अली तिरमिराकर गिर पड़े। कई चमारए जो अब तक इसे लड़कों का झगड़ा समझकर चुपचाप बैठे थेए ताहिर अली को गिरते देखकर दौड़े और बजरंगी को पकड़ लिया। समर—क्षेत्र में सन्नाटा छा गया। हाँए जैनब और रकिया द्वार पर खड़ी शब्द—बाण चलाती जाती थीं—मूड़ीकाटे ने गजब कर दियाए इस पर खुदा का कहर गिरेए दूसरा दिन देखना नसीब न होए इसकी मैयत उठेए कोई दौड़कर साहब के पास जाकर क्यों इत्तिला नहीं करता! अरे—अरे चमारोए बैठे मुँह क्या ताकते होए जाकर साहब को खबर क्यों नहीं देतेय कहना—अभी चलिए। साथ लानाए कहना—पुलिस लेते चलिएए यहाँ जान देने नहीं आए हैं।

बजरंगी ने ताहिर अली को गिरते देखाए तो सँभल गयाए दूसरा हाथ न चलाया। घीसू का हाथ पकड़ा और घर चला गया। यहाँ घर में कुहराम मचा। दो चमार जॉन सेवक के बँगले की तरफ गए। ताहिर अली को लोगों ने उठाया और चारपाई पर लादकर कमरे में लाए। कंधो पर लाठी पड़ी थीए शायद हड़डी टूट गई थी। अभी तक बेहोश थे। चमारों ने तुरंत हल्दी पीसी और उसे गुड़—चूने में मिलाकर उनके कंधो में लगाया। एक आदमी लपककर पेड़े के पत्तो तोड़ लायाए दो आदमी बैठकर सेंकने लगे। जैनब और रकिया तो ताहिर अली की मरहम—पट्टी करने लगींए बेचारी कुल्सूम दरवाजे पर खड़ी रो रही थी। पति की ओर उससे ताका भी न जाता था। गिरने से उनके सिर में चोट आ गई थी। लहू बहकर माथे पर जम गया था। बालों में लटें पड़ गई थींए मानो किसी चित्रकार के ब्रुश में रंग सूख गया हो। हृदय में शूल उठ रहा थाय पर पति के मुख की ओर ताकते ही उसे मूर्छा—सी आने लगती थीए दूर खड़ी थीय यह विचार भी मन में उठ रहा था कि ये सब आदमी अपने दिल में क्या कहते होंगे। इसे पति के प्रति जरा भी प्रेम नहींए खड़ी तमाशा देख रही है। क्या करूँए उनका चेहरा न जाने कैसा हो गया है। वही चेहराए जिसकी कभी बलाएँ ली जाती थींए मरने के बाद भयावह हो जाता हैए उसकी ओर द्रष्टिपात करने के लिए कलेजे को मजबूत करना पड़ता है। जीवन की भाँति मृत्यु का भी सबसे विशिष्ट आलोक मुख ही पर पड़ता है। ताहिर अली की दिन—भर सेंक—बाँध हुईए चमारों ने इस तरह दौड़—धूप कीए मानो उनका कोई अपना इष्ट मित्र है। क्रियात्मक सहानुभूति ग्राम—निवासियों का विशेष गुण है। रात को भी कई चमार उनके पास बैठे सेंकते—बाँधते रहे! जैनब और रकिया बार—बार कुल्सूम को ताने देतीं—बहनए तुम्हारा दिल भी गजब का है। शौहर का वहाँ बुरा हाल हो रहा है और तुम यहाँ मजे से बैठी हो। हमारे मियाँ के सिर में जरा—सा दर्द होता थाए तो हमारी जान नाखून में समा जाती थी। आजकल की औरतों का कलेजा सचमुच पत्थर का होता है। कुल्सूम का हृदय इन बाणों से बिंधा जाता थाय पर यह कहने का साहस न होता था कि तुम्हीं दोनों क्यों नहीं चली जातींघ् आखिर तुम भी तो उन्हीं की कमाई खाती होए और मुझसे अधिक। किंतु इतना कहतीए तो बचकर कहाँ जातीए दोनों उसके गले पड़ जातीं। सारी रात जागती रही। बार—बार द्वार पर जाकर आहट ले आती थी। किसी भाँति रात कटी। प्रातरूकाल ताहिर अली की अॉंखें खुलींय दर्द से अब भी कराह रहे थेय पर अब अवस्था उतनी शोचनीय न थी। तकिये के सहारे बैठ गए। कुल्सूम ने उन्हें चमारों से बातें करते सुना। उसे ऐसा जान पड़ा कि इनका स्वर कुछ विकृत हो गया है। चमारों ने ज्यों ही उन्हें होश में देखाए समझ गए कि अब हमारी जरूरत नहीं रहीए अब घरवाली की सेवा—शुश्रूषा का अवसर आ गया। एक—एक करके विदा हो गए। अब कुल्सूम ने चित्ता सावधान किया और पति के पास आ बैठी। ताहिर अली ने उसे देखाए तो क्षीण स्वर में बोले—खुदा ने हमें नमकहरामी की सजा दी है। जिनके लिए अपने आका का बुरा चेताए वही अपने दुश्मन हो गए।

कुल्सूम—तुम यह नौकरी छोड़ क्यों नहीं देतेघ् जब तक जमीन का मुआमला तय न हो जाएगाए एक—न—एक झगड़ा—बखेड़ा रोज होता रहेगाए लोगों से दुश्मनी बढ़़ती जाएगी। यहाँ जान थोड़े ही देना है। खुदा ने जैसे इतने दिन रोजी दी हैए वैसे ही फिर देगा। जान तो सलामत रहेगी।

ताहिर—जान तो सलामत रहेगीए पर गुजर क्योंकर होगाए कौन इतना दिए देता हैघ् देखती हो कि अच्छे—अच्छे पढ़़े—लिखे आदमी मारे—मारे फिरते हैं।

कुल्सूम—न इतना मिलेगाए न सहीय इसका आधा तो मिलेगा! दोंनों वक्त न खाएँगेए एक ही वक्त सहीय जान तो आफत में न रहेगी।

ताहिर—तुम एक वक्त खाकर खुश रहोगीए घर में और लोग भी तो हैंए उनके दुरूखड़े रोज कौन सुनेगाघ् मुझे अपनी जान से दुश्मनी थोड़े ही हैय पर मजबूर हूँ। खुदा को जो मंजूर होगाए वह पेश आएगा।

कुल्सूम—घर के लोगों के पीछे क्या जान दे दोगेघ्

ताहिर—कैसी बातें करती होए आखिर वे लोग कोई गैर तो नहीं हैंघ् अपने ही भाई हैंए अपनी माँएँ हैं। उनकी परवरिश मेरे सिवा और कौन करेगाघ्

कुल्सूम—तुम समझते होगेए वे तुम्हारे मोहताज हैंय मगर उन्हें तुम्हारी रत्ती—भर भी परवा नहीं। सोचती हैंए जब तक मुफ्त का मिलेए अपने खजाने में क्यों हाथ लगाएँ। मेरे बच्चे पैसे—पैसे को तरसते हैं और वहाँ मिठाइयों की हाँड़ियाँ आती हैंए उनके लड़के मजे से खाते हैं। देखती हूँ और अॉंखें बंद कर लेती हूँ।

ताहिर—मेरा जो फर्ज हैए उसे पूरा करता हूँ। अगर उनके पास रुपये हैंए तो इसका मुझे क्यों अफसोस होए वे शौक से खाएँए आराम से रहें। तुम्हारी बातों से हसद की बू आती है। खुदा के लिए मुझसे ऐसी बातें न किया करो।

कुल्सूम—पछताओगेय जब समझाती हूँए मुझ ही पर नाराज होते होय लेकिन देख लेनाए कोई बात न पूछेगा।

ताहिर—यह सब तुम्हारी नियत का कसूर है।

कुल्सूम—हाँए औरत हूँए मुझे अक्ल कहाँ! पड़े तो होए किसी ने झाँका तक नहीं। कलक होतीए तो यों चौन से न बैठी रहतीं।

ताहिर अली ने करवट लीए तो कंधो में असह्य वेदना हुई। श्आह—आहश् करके चिल्ला उठे। माथे पर पसीना आ गया। कुल्सूम घबराकर बोली—किसी को भेजकर डॉक्टर को क्यों नहीं बुला लेतेघ् कहीं हड़डी पर जरब न आ गया हो।

ताहिर—हाँए मुझे भी ऐसा ही खौफ होता हैए मगर डॉक्टर को बुलाऊँ तो उसकी फीस के रुपये कहाँ से आवेंगेघ्

कुल्सूम—तनख्वाह तो अभी मिली थीए क्या इतनी जल्द खर्च हो गईघ्

ताहिर—खर्च तो नहीं हो गईए लेकिन फीस की गुंजाइश नहीं है। अबकी माहिर की तीन महीने की फीस देनी होगी। 12 रुपये तो फीस ही के निकल जाएँगेए सिर्फ 18 रुपये बचेंगे! अभी तो पूरा महीना पड़ा हुआ है। क्या फाके करेंगेघ्

कुल्सूम—जब देखोए माहिर की फीस का तकाजा सिर पर सवार रहता है। अभी दस दिन हुएए फीस दी नहीं गईघ्

ताहिर—दस दिन नहीं हुएए एक महीना हो गया।

कुल्सूम—फीस अबकी न दी जाएगी। डॉक्टर की फीस उनकी फीस से जरूरी है। वह पढ़़कर रुपये कमाएँगेए तो मेरे घर न भरेंगे। मुझे तो तुम्हारी ही जान का भरोसा है।

ताहिर—(बात बदलकर) इन मुजियों की जब तक अच्छी तरह तंबीह न हो जाएगीए शरारत से बाज न आएँगे।

कुल्सूम—सारी शरारत इसी माहिर की थी। लड़कों में लड़ाई—झगड़ा होता ही रहता है। यह वहाँ न जाता तो क्यों मुआमला इतना तूल खींचताघ् इस पर जो अहीर के लौंडे ने जरा दाँत काट लियाए तो तुम भन्ना उठे।

ताहिर—मुझे तो खून के छींटे देखते ही जैसे सिर पर भूत सवार हो गया।

इतने में घीसू की माँ जमुनी आ पहुँची। जैनब ने उसे देखते ही तुरंत बुला लिया और डाँटकर कहा—मालूम होता हैए तेरी शामत आ गई है।

जमुनी—बेगम साहबए शामत नहीं आई हैए बुरे दिन आए हैंए और क्या कहूँ। मैं कल ही दही बेचकर लौटीए तो यह हाल सुना। सीधो आपकी खिदमत में दौड़ीय पर यहाँ बहुत—से आदमी जमा थेए लाज के मारे लौट गई। आज दही बेचने नहीं गई। बहुत डरते—डरते आई हूँ। जो कुछ भूल—चूक हुईए उसे माफ कीजिएए नहीं तो उजड़ जाएँगेए कहीं ठिकाना नहीं है।

जैनब—अब हमारे किए कुछ नहीं हो सकता। साहब बिना मुकदमा चलाए न मानेंगेए और वह न चलाएँगेए तो हम चलाएँगे। हम कोई धुनिये—जुलाहे हैंघ् यों सबसे दबते फिरेंए तो इज्जत कैसे रहेघ् मियाँ के बाप थानेदार थेय सारा इलाका नाम से काँपता थाए बड़े—बड़े रईस हाथ बाँधो सामने खड़े रहते थे। उनकी औलाद क्या ऐसी गई—गुजरी हो गई कि छोटे—छोटे आदमी बेइज्जती करें। तेरे लौंडे ने माहिर को इतनी जोर से दाँत काटा कि लहू—लुहान हो गयाय पट्टी बाँधो पड़ा है। तेरे शौहर ने आकर लड़के को डाँट दिया होताए तो बिगड़ी बात बन जाती।लेकिन उसने तो आते—ही—आते लाठी का वार कर दिया। हम शरीफ लोग हैंए इतनी रियायत नहीं कर सकते।

रकिया—जब पुलिस आकर मारते—मारते कचूमर निकाल देगीए तब होश आएगाय नजर—नियाज देनी पड़ेगीए वह अलग। तब आटे—दाल का भाव मालूम होगा।

जमुनी को अपने पति के हिस्से का व्यावहारिक ज्ञान भी मिला था। इन धमकियों से भयभीत न होकर बोली—बेगम साहबए यहाँ इतने रुपये कहाँ धरे हैंए दूध—पानी करके दस—पाँच रुपये बटोरे हैं। वहीं तक अपनी दौड़ है। इस रोजगार में अब क्या रखा है! रुपये का तीन पसेरी तो भूसा मिलता है। एक रुपये में एक भैंस का पेट नहीं भरता। उस पर खलीए बिनौलीए भूसीए चोकर सभी कुछ चाहिए। किसी तरह दिन काट रहे हैं। आपके बाल—बच्चों को साल—छरू महीने दूध पिला दूँगी।

जैनब समझ गई कि यह अहीरन कच्ची गोटी नहीं खेली है। इसके लिए किसी दूसरे ही मंत्र का प्रयोग करना चाहिए। नाक सिकोड़कर बोली—तू अपना दूध अपने घर रखए यहाँ दूध—घी के ऐसे भूखे नहीं हैं। यह जमीन अपनी हुई जाती हैय जितने जानवर चाहूँगीए पाल लूँगी। मगर तुझसे कहे देती हूँ कि तू कल से घर में न बैठने पाएगी। पुलिस की रपट तो साहब के हाथ में हैय पर हमें भी खुदा ने ऐसा इल्म दिया है कि जहाँ एक नक्श लिखकर दम किया कि जिन्नात अपना काम करने लगें। जब हमारे मियाँ जिंदा थेए तो एक बार पुलिस के एक बड़े अंगरेज हाकिम से कुछ हुज्जत हो गई। बोला—हम तुमको निकाल देंगे। मियाँ ने कहाए हमें निकाल दोगेए तो तुम भी आराम से न बैठोगे। मियाँ ने आकर मुझसे कहा। मैंने उसी रात को सुलेमानी नक्श लिखकर दम कियाए उसकी मेम साहब का पूरा हमल गिर गया। दौड़ा हुआ आयाए खुशामदें कींए पैरों पर गिराए मियाँ से कसूर मुआफ करायाए तब मेम की जान बची। क्यों रकियाए तुम्हें याद है नघ्

रकिया—याद क्यों नहीं हैए मैंने ही तो दुआ पढ़़ी थीय साहब रात को दरवाजे पर पुकारता था।

जैनब—हम अपनी तरफ से किसी की बुराई नहीं चाहतेय लेकिन जब जान पर आ बनती हैए तो सबक भी ऐसा दे देते हैं कि जिंदगी भर न भूलें। अभी अपने पीर से कह देंए तो खुदा जाने क्या गजब ढ़ाए। तुम्हें याद है रकियाए एक अहीर ने उन्हें दूध में पानी मिलाकर दिया थाए उनकी जबान से इतना ही निकला—जाए तुझसे खुदा समझें। अहीर ने घर आकर देखाए तो उसकी 200 रुपये की भैंस मर गई थी।

जमुनी ने ये बातें सुनींए तो होश उड़ गए। अन्य स्त्रियों की भाँति वह भी थानाए पुलिसए कचहरी और दरबार की अपेक्षा भूत—पिशाचों से ज्यादा डरी रहती थी। पास—पड़ोस में पिशाच—लीला देखने के अवसर आए दिन मिलते ही रहते थे। मुल्लाओं के यंत्र—मंत्र कहीं ज्यादा लागू होते हैंए यह भी मानती थी। जैनब बेगम ने उसकी पिशाच—भीरुता को लक्षित करके अपनी विषय चातुरी का परिचय दिया। जमुनी भयभीत होकर बोली—नहीं बेगम साहबए आपको भी भगवान्‌ ने बाल—बच्चे दिए हैंए ऐसा जुलुम न कीजिएगाए नहीं तो मर जाऊँगी।

जैनब—यह भी न करेंए वह भी न करेंए तो इज्जत कैसे रहेघ् कल को तेरा अहीर फिर लट्ठ लेकर आ पहुँचे तोघ् खुदा ने चाहाए तो अब वह लट्ठ उठाने लायक रह ही न जाएगा।

जमुनी थरथराकर पैरों पर गिर पड़ी और बोली—बीबीए जो हुकुम होए उसके लिए हाजिर हूँ।

जैनब ने चोट—पर—चोट लगाई और जमुनी के बहुत रोने—गिड़गिड़ाने पर 25 रुपये लेकर जिन्नात से उसे अभय—दान दिया। घर गईए रुपये लाकर दिए और पैरों पर गिरीय मगर बजरंगी से यह बात न कही। वह चली तो जैनब ने हँसकर कहा—खुदा देता है तो छप्पर फाड़कर देता है। इसका तो सान—गुमान भी न था। तुम बेसब्र हो जाती होए नहीं तो मैंने कुछ—न—कुछ और ऐंठा होता। सवार को चाहिए कि बाग हमेशा कड़ी रखे।

सहसा साबिर ने आकर जैनब से कहा—आपको अब्बा बुलाते हैं। जैनब वहाँ गईए तो ताहिर अली को पड़े कराहते देखा। कुल्सूम से बोली—बीबीए गजब का तुम्हारा जिगर है। अरे भले आदमीए जाकर जरा मूँग का दलिया पका दे। गरीब ने रात को कुछ नहीं खायाए इस वक्त भी मुँह में कुछ न जाएगाए तो क्या हाल होगाघ्

ताहिर—नहींए मेरा कुछ खाने को जी नहीं चाहता। आपको इसलिए तकलीफ दी है कि अगर आपके पास कुछ रुपये होंए तो मुझे कर्ज के तौर पर दे दीजिए। मेरे कंधों में बड़ा दर्द हैए शायद हड्डी टूट गई हैए डॉक्टर को दिखाना चाहता हूँय मगर उसकी फीस के लिए रुपयों की जरूरत है।

जैनब—बेटाए भला सोचो तोए मेरे पास रुपये कहाँ से आएँगेए तुम्हारे सिर की कसम खाकर कहती हूँ। मगर तुम डॉक्टर को बुलाओ ही क्योंघ् तुम्हें सीधो साहब के यहाँ जाना चाहिए। यह हंगामा उन्हीं की बदौलत तो हुआ हैए नहीं तो यहाँ हमसे किसी को क्या गरज थी। एक इक्का मँगवा लो और साहब के यहाँ चले जाओ। वह एक रुक्की लिख देंगेए तो सरकारी शिफाखाने में खासी तरह इलाज हो जाएगा। तुम्हीं सोचोए हमारी हैसियत डॉक्टर बुलाने की हैघ्

ताहिर अली के दिल में यह बात बैठ गई। माता को धन्यवाद दिया। सोचाए न जाने यही बात मेरी समझ में क्यों नहीं आई। इक्का मँगवायाए लाठी के सहारे बड़ी मुश्किल से उस पर सवार हुए और साहब के बँगले पर पहुँचे।

मिस्टर सेवकए राजा महेंद्रकुमार से मिलने के बादए कम्पनी के हिस्से बेचने के लिए बाहर चले गए थे और उन्हें लौटे हुए आज तीन दिन हो गए थे। कल वह राजा साहब से फिर मिले थेय मगर जब उनका फैसला सुनाए तो बहुत निराश हुए। बहुत देर तक बैठे तर्क—वितर्क करते रहेय लेकिन राजा साहब ने कोई संतोषजनक उत्तर न दिया। निराश होकर आए और मिसेज सेवक से सारा वृत्तांत कह सुनाया।

मिसेज सेवक को हिंदुस्तानियों से चिढ़़ थी। यद्यपि इसी देश के अन्न—जल से उनकी सृष्टि हुई थीए पर अपने विचार से हजरत ईसा की शरण में आकरए वह हिंदुस्तानियों के अवगुणों से मुक्त हो चुकी थीं। उनके विचार में यहाँ के आदमियों को खुदा ने सज्जनताए सहृदयताए उदारताए शालीनता आदि दिव्य गुणों से सम्पूर्णतरू वंचित रक्खा है। वह योरपीय सभ्यता की भक्त थीं और आहार—विहार में उसी का अनुसरण करती थींय खान—पानए वेश—भूषाए रहन—सहनए सब अंगरेजी थीय मजबूरी केवल अपने साँवले रंग से थी। साबुन के निरंतर प्रयोग और अन्य रासायनिक पदाथोर्ं का व्यवहार करने पर भी मनोकामना पूरी होती न थी। उनके जीवन की एकमात्र यही अभिलाषा थी कि हम ईसाइयों की श्रेणी से निकलकर अंगरेजों में जा मिलेंए हमें लोग साहब समझेंए हमारा रब्त—जब्त अंगरेजों से होए हमारे लड़कों की शादियाँ ऐंग्लो इंडियन या कम—से—कम उच्च श्रेणी के यूरोपियन लोगों से हों। सोफी की शिक्षा—दीक्षा अंगरेजी ढ़ंग पर हुई थीय किंतु वह माता के बहुत आग्रह करने पर भी अंगरेजी दावतों और पार्टीयों में शरीक होती न थीए और नाच से तो उसे घृणा ही थी। किंतु मिसेज सेवक इन अवसरों को हाथ से न जाने देती थींए यों काम न चलता तो विशेष प्रयत्न करके निमंत्रण—पत्र मँगवाती थीं। अगर स्वयं उनके मकान पर दावतें और पार्टीयाँ बहुत कम होती थींए तो इसका कारण ईश्वर सेवक की कृपणता थी।

यह समाचार सुनकर मिसेज सेवक बोलीं—देख ली हिन्दुस्तानियों की सज्जनताघ् फूले न समाते थे। अब तो मालूम हुआ कि ये लोग कितने कुटील और विश्वासघातक हैं। एक अंधे भिखारी के सामने तुम्हारी यह इज्जत है। पक्षपात तो इन लोगों की घुट्टी में पड़ा हुआ हैए और यह उन बड़े—बड़े आदमियों का हाल हैए जो अपनी जाति के नेता समझे जाते हैंए जिनकी उदारता पर लोगों को गर्व है। मैंने मिस्टर क्लार्क से एक बार चर्चा की थी। उन्होंने तहसीलदारों को हुक्म दे दिया कि अपने—अपने इलाके में तम्बाकू की पैदावार बढ़़ाओ। यह सोफी के आग में कूदने का पुरस्कार है! जरा—सा म्युनिसिपैलिटी का अख्तियार क्या मिल गयाए सबों के दिमाग फिर गए। मिस्टर क्लार्क कहते थे कि अगर राजा साहब जमीन का मुआमला न तय करेंगेए तो मैं जाब्ते से उसे आपको दिला दूँगा।

मिस्टर जोजफ क्लार्क जिला के हाकिम थे। अभी थोड़े ही दिनों से यहाँ आए थे। मिसेज सेवक ने उनसे रब्त—जब्त पैदा कर लिया था। वास्तव में उन्होंने क्लार्क को सोफी के लिए चुना था। दो—एक बार उन्हें अपने घर बुला भी चुकी थीं। गृह—निर्वासन से पहले दो—तीन बार सोफी से उनकी मुलाकात भी हो चुकी थीय किंतु वह उनकी ओर विशेष आकृष्ट न हुई थी। तो भी मिसेज सेवक इस विषय में अभी निराश न हुई थीं। क्लार्क से कहती थीं—सोफी मेहमानी करने गई है। इस प्रकार अवसर पाकर उनकी प्रेमाग्नि को भड़काती रहती थी।

जॉन सेवक ने लज्जित होकर कहा—मैं क्या जानता थाए यह महाशय भी दगा देंगे। यहाँ उनकी बड़ी ख्याति हैए अपने वचन के पक्के समझे जाते हैं। खैरए कोई मुजायका नहीं। अब कोई दूसरा उपाय सोचना पड़ेगा।

मिसेज सेवक—मैं मिस्टर क्लार्क से कहूँगी। पादरी साहब से भी सिफारिश कराऊँगी।

जॉन सेवक—मिस्टर क्लार्क को म्युनिसिपैलिटी के मुआमलों में हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं।

जॉन सेवक इसी चिंता में पड़े हुए थे कि इस हंगामे की खबर मिली। सन्नाटे में आ गए। पुलिस को रिपोर्ट की। दूसरे दिन गोदाम जाने का विचार कर ही रहे थे कि ताहिर अली लाठी टेकते हुए आ पहुँचे। आते—आते एक कुरसी पर बैठ गए। इक्के के हचकोलों ने अंधामुआ—सा कर दिया था।

मिसेज सेवक ने अंगरेजी में कहा—कैसी सूरत बना ली हैए मानो विपत्ति का पहाड़ टूट पड़ा है!

जॉन सेवक—कहिए मुंशीजीए मालूम होता हैए आपको बहुत चोट आई। मुझे इसका बड़ा दुरूख है।

ताहिर—हुजूरए कुछ न पूछिएए कम्बख्तों ने मार डालने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी।

जॉन सेवक—और इन्हीं दुष्टों की आप मुझसे सिफारिश कर रहे थे।

ताहिर—हुजूरए अपनी खता की बहुत सजा पा चुका। मुझे ऐसा मालूम होता है कि मेरी गरदन की हड्डी पर जरब आ गया है।

जॉन सेवक—यह आपकी भूल है। हड्डी टूट जाना कोई मामूली बात नहीं है। आप यहाँ तक किसी तरह न आ सकते थे। चोट जरूर आई हैए मगर दो—चार रोज मालिश कर लेने से आराम हो जाएगा। आखिर यह मारपीट हुई क्योंघ्

ताहिर—हुजूरए यह सब उसी शैतान बजरंगी अहीर की हरकत है।

जॉन सेवक—मगर चोट खा जाने ही से आप निरापराध नहीं हो सकते। मैं इसे आपकी नादानी और असावधानी समझता हूँ। आप ऐसे आदमियों से उलझे ही क्योंघ् आपको मालूम हैए इसमें मेरी कितनी बदनामी हैघ्

ताहिर—मेरी तरफ से ज्यादती तो नहीं हुई।

जॉन सेवक—जरूर हुईए वरना देहातों में आदमी किसी से छेड़कर लड़ने नहीं आते। आपको इस तरह रहना चाहिए कि लोगों पर आपका रोब रहे। यह नहीं कि छोटे—छोटे आदमियों को आपसे मार—पीट करने की हिम्मत हो।

मिसेज सेवक—कुछ नहींए यह सब इनकी कमजोरी है। कोई राह चलते किसी को नहीं मारता।

ईश्वर सेवक कुरसी पर पड़े—पड़े बोले—खुदा के बेटेए मुझे अपने साये में लेए सच्चे दिल से उसकी बंदगी न करने की यही सजा है।

ताहिर अली को ये बातें घाव पर नमक के समान लगीं। ऐसा क्रोध आया कि इसी वक्त कह दूँए जहन्नुम में जाए तुम्हारी नौकरीय पर जॉन सेवक को उनकी दुरवस्था से लाभ उठाने की एक युक्ति सूझ गई। फिटन तैयार कराई और ताहिर अली को लिए हुए राजा महेंद्रकुमार के मकान पर जा पहुँचे। राजा साहब शहर का गश्त लगाकर मकान पर पहुँचे ही थे कि जॉन सेवक का कार्ड पहुँचा। झुँझलाएए लेकिन शील आ गयाए बाहर निकल आए। मिस्टर सेवक ने कहा—क्षमा कीजिएगाए आपको कुसमय कष्ट हुआए किंतु पाँड़ेपुरवालों ने इतना उपद्रव मचा रखा है कि मेरी समझ में नहीं आताए आपके सिवा किसका दामन पकड़ूँ। कल सबों ने मिलकर गोदाम पर धावा कर दिया। शायद आग लगा देना चाहते थेए पर आग तो न लगा सकेय हाँए यह मेरे एजेंट हैंए सब—के—सब इन पर टूट पड़े। इनको और इनके भाइयों को मारते—मारते बेदम कर दिया। इतने पर भी उन्हें तस्कीन न हुईए जनाने मकान में घुस गएय और अगर स्त्रियाँ अंदर से द्वार न बंद कर लें तो उनकी आबरू बिगड़ने में कोई संदेह न था। इनके तो ऐसी चोटें लगी हैं कि शायद महीनों चलने—फिरने लायक न होंए कंधो की हड्डी टूट गई है।

महेंद्रकुमार सिंह स्त्रियों का बड़ा सम्मान करते थे। उनका अपमान होते देखकर तैश में आ जाते थे। रौद्र रूप धारण करके बोले—सब जनाने में घुस गए!

जॉन सेवक—किवाड़ तोड़ना चाहते थेए मगर चमारों ने धामकाया तो हट गए।

महेंद्रकुमार—कमीने! स्त्रियों पर अत्याचार करना चाहते थे!

जॉन सेवक—यही तो इस ड्रामा का सबसे लज्जास्पद अंश हैं।

महेंद्रकुमार—लज्जास्पद नहीं महाशयए घृणास्पद कहिए।

जॉन सेवक—अब यह बेचारे कहते हैं कि या तो मेरी इस्तीफा लीजिएए या गोदाम की रक्षा के लिए चौकीदारों का प्रबंध कीजिए। स्त्रियाँ इतनी भयभीत हो गई हैं कि वहाँ एक क्षण भी नहीं रहना चाहतीं। यह सारा उपद्रव उसी अंधे की बदौलत हो रहा है।

महेंद्रकुमार—मुझे तो वह बहुत गरीबए सीधा—सा आदमी मालूम होता हैय मगर है छँटा हुआ। उसी की दीनता पर तरस खाकर मैंने निश्चय किया था कि आपके लिए कोई दूसरी जमीन तलाश करूँ। लेकिन जब उन लोगों ने शरारत पर कमर बाँधी है और आपको जबरदस्ती वहाँ से हटाना चाहते हैंए तो इसका उन्हें अवश्य दंड मिलेगा।

जॉन सेवक—बसए यही बात हैए वे लोग मुझे वहाँ से निकाल देना चाहते हैं। अगर रिआयत की गईए तो मेरे गोदाम में जरूर आग लग जाएगी।

महेंद्रकुमार—मैं खूब समझ रहा हूँ। यों मैं स्वयं जनवादी हूँ और उस नीति का हृदय से समर्थन करता हूँय पर जनवाद के नाम पर देश में जो अशांति फैली हुई हैए उसका मैं घोर विरोधी हूँ। ऐसे जनवाद से तो धानवादए एकवादए सभी वाद अच्छे हैं। आप निश्चिंत रहिए।

इसी भाँति कुछ देर और बातें करके राजा साहब को खूब भरकर जॉन सेवक विदा हुए। रास्ते में ताहिर अली सोचने लगे—साहब को मेरी दुर्गति से अपना स्वार्थ सिध्द करने में जरा भी संकोच नहीं हुआ। क्या ऐसे धानी—मानीए विशिष्टए विचारशील विद्वान्‌ प्राणी भी इतने स्वार्थ—भक्त होते हैं!

जॉन सेवक अनुमान से उनके मन के भाव ताड़ गए। बोले—आप सोच रहे होंगेए मैंने बातों इतना रंग क्यों भराए केवल घटना का यथार्थ वृत्तांत क्यों न कह सुनायाय किंतु सोचिएए बिना रंग भरे मुझे यह फल प्राप्त हो सकताघ् संसार में किसी काम का अच्छा या बुरा होना उसकी सफलता पर निर्भर है। एक व्यक्ति राजसत्ता का विरोध करता है। यदि अधिकारियों ने उसका दमन कर दियाए तो वह राजद्रोही कहा जाता हैए और प्राणदंड पाता है। यदि उसका उद्देश्य पूरा हो गयाए तो वह अपनी जाति का उध्दारकर्ता और विजयी समझा जाता हैए उसके स्मारक बनाए जाते हैं। सफलता में दोषों को मिटाने की विलक्षण शक्ति है। आप जानते हैंए दो साल पहले मुस्तफा कमाल क्या थाघ् बागीए देश उसके खून का प्यासा था। आज वह अपनी जाति का प्राण है। क्योंघ् इसलिए कि वह सफल—मनोरथ हुआ। लेकिन कई साल पहले प्राणभय से अमेरिका भागा थाए आज वह प्रधान है। इसलिए कि उसका विद्रोह सफल हुआ। मैंने राजा साहब को स्वपक्षी बना लियाए फिर रंग भरने का दोष कहाँ रहाघ्

इतने में फिटन बँगले पर आ पहुँची। ईश्वर सेवक ने आते ही आते पूछा—कहोए क्या कर आएघ्

जॉन सेवक ने गर्व से कहा—राजा को अपना मुरीद बना आया। थोड़ा—सा रंग तो जरूर भरना पड़ाए पर उसका असर बहुत अच्छा हुआ।

ईश्वर सेवक—खुदाए मुझ पर दया—द्रष्टि कर। बेटाए रंग मिलाए बगैर भी दुनिया का कोई काम चलता हैघ् सफलता का यही मूल—मंत्र हैए और व्यवसाय की सफलता के लिए तो यह सर्वथा अनिवार्य है। आपके पास अच्छी—से—अच्छी वस्तु हैय जब तक आप स्तुति नहीं करतेए कोई ग्राहक खड़ा ही नहीं होता। अपनी अच्छी वस्तु को अमूल्यए दुर्लभए अनुपम कहना बुरा नहीं। अपनी औषधि को आप सुधा—तुल्यए रामबाणए अक्सीरए ऋषि—प्रदत्ताए संजीवनीए जो चाहेंए कह सकते हैंए इसमें कोई बुराई नहीं। किसी उपदेशक से पूछोए किसी वकील से पूछोए किसी लेखक से पूछोए सभी एक स्वर से कहेंगे कि रंग और सफलता समानार्थक हैं। यह भ्रम है कि चित्रकार ही को रंगों की जरूरत होती है। अब तो तुम्हें निश्चय हो गया कि वह जमीन मिल जाएगीघ्

जॉन सेवक—जी हाँए अब कोई संदेह नहीं।

यह कहकर उन्होंने प्रभु सेवक को पुकारा और तिरस्कार करके बोले—बैठे—बैठे क्या कर रहे होघ् जरा पाँड़ेपुर क्यों नहीं चले जातेघ् अगर तुम्हारा यही हाल रहाए तो मैं कहाँ तक तुम्हारी मदद करता फिरूँगा।

प्रभु सेवक—मुझे जाने में कोई आपत्ति नहींय पर इस समय मुझे सोफी के पास जाना है।

जॉन सेवक—पाँड़ेपुर से लौटते हुए सोफी के पास बहुत आसानी से जा सकते हो।

प्रभु सेवक—मैं सोफी से मिलना ज्यादा जरूरी समझता हूँ।

जॉन सेवक—तुम्हारे रोज—रोज मिलने से क्या फायदाए जब तुम आज तक उसे घर लाने में सफल नहीं हो सकेघ्

प्रभु सेवक के मुँह से ये शब्द निकलते—निकलते रह गए—मामा ने जो आग लगा दी हैए वह मेरे बुझाए नहीं बुझ सकी। तुरंत अपने कमरे में आएए कपड़े पहने और उसी वक्त ताहिर अली के साथ पाँड़ेपुर चलने को तैयार हो गए। ग्यारह बज चुके थेए जमीन से आग की लपट निकल रही थीए दोपहर का भोजन तैयार थाए मेज लगा दी गई थीय किंतु प्रभु सेवक माता ओर पिता के बहुत आग्रह करने पर भी भोजन पर न बैठे। ताहिर अली खुदा से दुआ कर रहे थे कि किसी तरह दोपहरी यहीं कट जाएए पंखे के नीचे टट्टियों से छनकर आने वाली शीतल वायु ने उनकी पीड़ा को बहुत शांत कर दिया थाय किंतु प्रभु सेवक के हठ ने उन्हें यह आनंद न उठाने दिया।

'''

अध्याय 11

भैरों पासी अपनी माँ का सपूत बेटा था। यथासाधय उसे आराम से रखने की चेष्टा करता रहता था। इस भय से कि कहीं बहू सास को भूखा न रखेए वह उसकी थाली अपने सामने परसा लिया करता था और उसे अपने साथ ही बैठाकर खिलाता था। बुढ़़िया तम्बाकू पीती थी। उसके वास्ते एक सुंदरए पीतल से मढ़़ा हुआ नारियल लाया था। आप चाहे जमीन पर सोयेए पर उसे खाट पर सुलाता। कहताए इसने न जाने कितने कष्ट झेलकर मुझे पाला—पोसा हैय मैं इससे जीते—जी कभी उरिन नहीं हो सकता। अगर माँ का सिर भी दर्द करता तो बेचौन हो जाताए ओझे—सयाने बुला लाता। बुढ़़िया को गहने—कपड़े का भी शौक था। पति के राज में जो सुख न पाए थेए वे बेटे के राज में भोगना चाहती थी। भैरों ने उसके लिए हाथों के कड़ेए गले की हँसली और ऐसी ही कई चीजें बनवा दी थीं। पहनने के लिए मोटे कपड़ों की जगह कोई रंगीन छींट लाया करता था। अपनी स्त्री को ताकीद करता रहता था कि अम्माँ को कोई तकलीफ न होने पाए। इस तरह बुढ़़िया का मन बढ़़ गया था। जरा—सी कोई बात इच्छा के विरुध्द होतीए तो रूठ जाती और बहू को आड़े हाथों लेती। बहू का नाम सुभागी था। बुढ़़िया ने उसका नाम अभागी रख छोड़ा था। बहू ने जरा चिलम भरने में देर कीए चारपाई बिछाना भूल गईए या मुँह से निकलते ही उसका पैर दबाने या सिर की जुएँ निकालने न आ पहुँचीए तो बुढ़़िया उसके सिर हो जाती। उसके बाप और भाइयों के मुँह में कालिख लगातीए सबों की दाढ़़ियाँ जलातीए और उसे गालियों ही से संतोष न होताए ज्योंही भैरों दूकान से आताए एक—एक की सौ—सौ लगाती। भैरों सुनते ही जल उठताए ण्कभी जली—कटी बातों से और कभी डंडों से स्त्री की खबर लेता। जगधार से उसकी गहरी मित्रता थी। यद्यपि भैरों का घर बस्ती के पश्चिम सिरे पर थाए और जगधार का घर पूर्व सिरे परए किंतु जगधार की यहाँ बहुत आमद—रफ्त थी। यहाँ मुफ्त में ताड़ी पीने को मिल जाती थीए जिसे मोल लेने के लिए उसके पास पैसे न थे। उसके घर में खानेवाले बहुत थेए कमानेवाला अकेला वही था। पाँच लड़कियाँ थींए एक लड़का और स्त्री । खोंचे की बिक्री में इतना लाभ कहाँ कि इतने पेट भरे और ताड़ी—शराब भी पिए! वह भैरों की हाँ—में—हाँ मिलाया करता था। इसलिए सुभागी उससे जलती थी।

दो—तीन साल पहले की बात हैए एक दिनए रात के समयए भैरों और जगधार बैठे हुए ताड़ी पी रहे थे। जाड़ों के दिन थेय बुढ़़िया खा—पीकरए अंगीठी सामने रखकरए आग ताप रही थी। भैरों ने सुभागी से कहा—थोड़े—से मटर भून ला। नमकए मिर्चए प्याज भी लेती आना। ताड़ी के लिए चिखने की जरूरत थी। सुभागी ने मटर तो भूनेए लेकिन प्याज घर में न था। हिम्मत न पड़ी कि कह दे—प्याज नहीं है। दौड़ी हुई कुँजड़े की दूकान पर गई। कुँजड़ा दूकान बंद कर चुका था। सुभागी ने बहुत चिरौरी कीए पर उसने दूकान न खोली। विवश होकर उसने भूने हुए मटर लाकर भैरों के सामने रख दिए। भैरों ने प्याज न देखाए तो तेवर बदले। बोला—क्या मुझे बैल समझती है कि भुने हुए मटर लाकर रख दिएए प्याज क्यों नहीं लाईघ्

सुभागी ने कहा—प्याज घर में नहीं हैए तो क्या मैं प्याज हो जाऊँघ्

जगधार—प्याज के बिना मटर क्या अच्छे लगेंगेघ्

बुढ़़िया—प्याज तो अभी कल ही धोले का आया था। घर में कोई चीज तो बचती ही नहीं। न जाने इस चुड़ैल का पेट है या भाड़।

सुभागी—मुझसे कसम ले लोए जो प्याज हाथ से भी छुआ हो। ऐसी जीभ होतीए तो इस घर में एक दिन भी निबाह न होता।

भैरों—प्याज नहीं थाए तो लाई क्यों नहींघ्

जगधार—जो चीज घर में न रहेए उसकी फिकर रखनी चाहिए।

सुभागी—मैं क्या जानती थी कि आज आधी रात को प्याज की धुन सवार होगी।

भैरों ताड़ी के नशे में था। नशे में भी क्रोध का—सा गुण हैए निर्बलों ही पर उतरता है। डंडा पास ही धारा थाए उठाकर एक डंडा सुभागी को मारा। उसके हाथ की सब चूड़ियाँ टूट गईं। घर से भागी। भैरों पीछे दौड़ा। सुभागी एक दूकान की आड़ में छिप गई। भैरों ने बहुत ढ़ूँढ़़ाए जब उसे न पाया तो घर जाकर किवाड़ बंद कर लिए और फिर रात भर खबर न ली। सुभागी ने सोचाए इस वक्त जाऊँगी तो प्राण न बचेंगे। पर रात—भर रहूँगी कहाँघ् बजरंगी के घर गई। उसने कहा—नाए बाबाए मैं यह रोग नहीं पालता। खोटा आदमी हैए कौन उससे रार मोल ले! ठाकुरदीन के द्वार बंद थे। सूरदास बैठा खाना पका रहा था। उसकी झोपड़ी में घुस गई और बोली—सूरेए आज रात—भर मुझे पड़े रहने दोए मारे डालता हैए अभी जाऊँगीए तो एक हड्डी भी न बचेगी।

सूरदास ने कहा—आओए लेट रहोए भोरे चली जानाए अभी नसे में होगा।

दूसरे दिन जब भैरों को यह बात मालूम हुईए तो सूरदास से गाली—गलौज की और मारने की धमकी दी। सुभागी उसी दिन से सूरदास पर स्नेह करने लगी। जब अवकाश पातीए तो उसके पास आ बैठतीए कभी—कभी उसके घर में झाड़ू लगा जातीए कभी घरवालों की अॉंख बचाकर उसे कुछ दे जातीए मिठुआ को अपने घर बुला ले जाती और उसे गुड़—चबेना खाने को देती।

भैरों ने कई बार उसे सूरदास के घर से निकलते देखा। जगधार ने दोनों को बातें करते हुए पाया। भैरों के मन में संदेह हो गया कि जरूर इन दोनों में कुछ साठ—गाँठ हैए तभी से वह सूरदास से खार खाता था। उससे छेड़कर लड़ता। नायकराम के भय से उसकी मरम्मत न कर सकता था। सुभागी पर उसका अत्याचार दिनोंदिन बढ़़ता जाता था और जगधारए शांत स्वभाव होने पर भीए भैरों का पक्ष लिया करता था।

जिस दिन बजरंगी और ताहिर अली में झगड़ा हुआ थाए उसी दिन भैरों और सूरदास में संग्राम छिड़ गया। बुढ़़िया दोपहर को नहाई थी सुभागी उसकी धोती छाँटना भूल गई। गरमी के दिन थे हीए रात को 9 बजे बुढ़़िया को फिर गरमी मालूम र्हुई। गरमियों के दिनों में दो बार स्नान करती थीए जाड़ों में दो महीने में एक बार! जब वह नहाकर धोती माँगने लगीए तो सुभागी को याद आई। काटो तो बदन में लहू नहीं। हाथ जोड़कर बोली—अम्माँए आज धोती धोने की याद नहीं रही। तुम जरा देर मेरी धोती पहन लोए तो मैं उसे छाँटकर अभी सुखाए देती हूँ।

बुढ़़िया इतनी क्षमाशील न थीए हजारों गालियाँ सुनाईं और गीली धोती पहने बैठी रही। इतने में भैरों दूकान से आया और सुभागी से बोला—जल्दी खाना लाए आज संगत होनेवाली है। आओ अम्माँए तुम भी खा लो।

बुढ़़िया बोली—नहाकर गीली धोती पहने बैठी हूँ। अब अपने हाथों धोती धो लिया करूँगी।

भैरों—क्या इसने धोती नहीं धोईघ्

बुढ़़िया—वह अब मेरी धोती क्यों धोने लगी। घर की मालकिन है। यही क्या कम है कि एक रोटी खाने को दे देती है!

सुभागी ने बहुत कुछ उज्र कियाय किंतु भैरों ने एक न सुनीए डंडा लेकर मारने दौड़ा। सुभागी भागी और आकर सूरदास के घर में घुस गई। पीछे—पीछे भैरों भी वहीं पहुँचा। झोपड़े में घुसा और चाहता था कि सुभागी का हाथ पकड़कर खींच ले कि सूरदास उठकर खड़ा हो गया और बोला—क्या बात है भैरोंए इसे क्यों मार रहे होघ्

भैरों गर्म होकर बोला—द्वार पर से हट जाओए नहीं तो पहले तुम्हारी हड्डीयां तोड़ूँगाए सारा बगुलाभगतपन निकल जाएगा। बहुत दिनों से तुम्हारा रंग देख रहा हूँए आज सारी कसर निकाल लूँगा।

सूरदास—मेरा क्या छैलापन तुमने देखाघ् बसए यही न कि मैंने सुभागी को घर से निकाल नहीं दियाघ्

भैरों—बसए अब चुप ही रहना। ऐसे पापी न होतेए तो भगवान्‌ ने अॉंखें क्यों फोड़ दी होतीं। भला चाहते होए तो सामने से हट जाओ।

सूरदास—मेरे घर में तुम उसे न मारने पाओगेय यहाँ से चली जाएए तो चाहे जितना मार लेना।

भैरों—हटता है सामने से कि नहींघ्

सूरदास—मैं अपने घर यह उपद्रव न मचाने दूँगा।

भैरों ने क्रोध में आकर सूरदास को धक्का दिया। बेचारा बेलाग खड़ा थाए गिर पड़ाए पर फिर उठा और भैरों की कमर पकड़कर बोला—अब चुपके से चले जाओए नहीं तो अच्छा न होगा!

सूरदास था तो दुबला—पतलाए पर उसकी हड्डीयां लोहे की थीं। बादल—बूँदीए सरदी—गरमी झेलते—झेलते उसके अंग ठोस हो गए थे। भैरों को ऐसा ज्ञात होने लगाए मानो कोई लोहे का शिकंजा है। कितना ही जोर मारताए पर शिकंजा जरा भी ढ़ीला न होता था। सुभागी ने मौका पायाए तो भागी। अब भैरों जोर—जोर से गालियाँ देने लगा। मुहल्लेवाले यह शोर सुनकर आ पहुँचे। नायकराम ने मजाक करके कहा—क्यों सूरेए अच्छी सूरत देखकर अॉंखें खुल जाती हैं क्या मुहल्ले ही मेंघ्

सूरदास—पंडाजीए तुम्हें दिल्लगी सूझी है और यहाँ मुख में कालिख लगाई जा रही है। अंधा थाए अपाहिज थाए भिखारी थाए नीच थाए चोरी—बदमासी के इलजाम से तो बचा हुआ था! आज वह इलजाम भी लग गया।

बजरंगी—आदमी जैसा आप होता हैए वैसा ही दूसरों को समझता है।

भैरों—तुम कहाँ के बड़े साधु हो। अभी आज ही लाठी चलाकर आए हो। मैं दो साल से देख रहा हूँए मेरी घरवाली इससे आकर अकेले में घंटों बातें करती है। जगधार ने भी उसे यहाँ से रात को आते देखा है। आज हीए अभीए उसके पीछे मुझसे लड़ने को तैयार था।

नायकराम—सुभा होने की बात ही है। अंधा आदमी देवता थोड़े ही होता हैए और फिर देवता लोग भी तो काम के तीर से नहीं बचे। सूरदास तो फिर भी आदमी हैए और अभी उमर ही क्या हैघ्

ठाकुरदीन—महाराजए क्यों अंधे के पीछे पड़े हुए हो। चलोए कुछ भजन—भाव हो।

नायकराम—तुम्हें भजन—भाव सूझता हैए यहाँ एक भले आदमी की इज्जत का मुआमला आ पड़ा है। भैरोंए हमारी एक बात मानोए तो कहें। तुम सुभागी को मारते बहुत होए इससे उसका मन तुमसे नहीं मिलता। अभी दूसरे दिन बारी आती हैए अब महीने में दो बार से ज्यादा न आने पाए।

भैरों देख रहा था कि मुझे लोग बना रहे हैं। तिनककर बोला—अपनी मेहरिया हैए मारते—पीटते हैंए तो किसी का साझा हैघ् जो घोड़ी पर कभी सवार ही नहीं हुआए वह दूसरों को सवार होना क्या सिखाएगाघ् वह क्या जानेए औरत कैसे काबू में रहती हैघ्

यह व्यंग नायकराम पर थाए जिसका अभी तक विवाह नहीं हुआ था। घर में धान थाए यजमानों की बदौलत किसी बात की चिंता न थीए ण् किंतु न जाने क्यों अभी तक उसका विवाह नहीं हुआ था। वह हजार—पाँच सौ रुपये से गम खाने को तैयार थाय पर कहीं शिप्पा न जमता था। भैरों ने समझा थाए नायकराम दिल में कट जाएँगेय मगर वह छँटा हुआ शहरी गुंडा ऐसे व्यंगों को कब धयान में लाता था। बोला—कहो बजरंगी इसका कुछ जवाब दो औरत कैसे बस में रहती हैघ्

बजरंगी—मार—पीट से नन्हा—सा लड़का तो बस में आता नहींए औरत क्या बस में आएगी।

भैरों—बस में आए औरत का बापए औरत किस खेत की मूली है! मार से भूत भागता है।

बजरंगी—तो औरत भी भाग जाएगीए लेकिन काबू में न आएगीघ्

नायकराम—बहुत अच्छी कही बजरंगीए बहुत पक्की कहीए वाह—वाह! मार से भूत भागता हैए तो औरत भी भाग जाएगी। अब तो कट गई तुम्हारी बातघ्

भैरों—बात क्या कट जाएगीए दिल्लगी हैघ् चूने को जितना ही कूटोए उतना ही चिमटता है।

जगधार—ये सब कहने की बातें हैं। औरत अपने मन से बस में आती हैए और किसी तरह नहीं।

नायकराम—क्यों बजरंगीए नहीं है कोई जवाबघ्

ठाकुरदीन—पंडाजीए तुम दोनों को लड़ाकर तभी दम लोगेय बिचारे अपाहिज आदमी के पीछे पड़े हो।

नायकराम—तुम सूरदास को क्या समझते होए यह देखने ही में इतने दुबले हैं। अभी हाथ मिलाओए तो मालूम हो। भैरोंए अगर इन्हें पछाड़ दोए तो पाँच रुपये इनाम दूँ।

भैरों—निकल जाओगे।

नायकराम—निकलनेवाले को कुछ कहता हूँ। यह देखोए ठाकुरदीन के हाथ में रखे देता हूँ।

जगधार—क्या ताकते हो भैरोंए ले पड़ो।

सूरदास—मैं नहीं लड़ता।

नायकराम—सूरदासए देखोए नाम—हँसाई मत कराओ। मर्द होकर लड़ने से डरते होघ् हार ही जाओगे या और कुछ!

सूरदास—लेकिन भाईए मैं पेंच—पाच नहीं जानता। पीछे से यह न कहनाए हाथ क्यों पकड़ा। मैं जैसे चाहूँगाए वैसे लड़ूँगा।

जगधार—हाँ—हाँए तुम जैसे चाहनाए वैसे लड़ना।

सूरदास—अच्छा तो आओए कौन आता है!

नायकराम—अंधे आदमी का जीवट देखना। चलो भैरोंए आओ मैदान में।

भैरों—अंधे से क्या लड़ूँगा!

नायकराम—बसए इसी पर इतना अकड़ते थेघ्

जगधार—निकल आओ भैरोंए एक झपट्टे में तो मार लोगे!

भैरों—तुम्हीं क्यों नहीं लड़ जातेए तुम्हीं इनाम ले लेना।

जगधार को रुपयों की नित्य चिंता रहती थी। परिवार बड़ा होने के कारण किसी तरह चूल न बैठती थीए घर में एक—न—एक चीज घटी ही रहती थी। धानोपार्जन के किसी उपाय को हाथ से न छोड़ना चाहता था। बोला—क्यों सूरेए हमसे लड़ोगेघ्

सूरदास—तुम्हीं आ जाओए कोई सही।

जगधार—क्यों पंडाजीए इनाम दोगे नघ्

नायकराम—इनाम तो भैरों के लिए थाए लेकिन कोई हरज नहीं! हाँए शर्त यह है कि एक ही झपट्टे में गिरा दो।

जगधार ने धोती ऊपर चढ़़ा ली और सूरदास से लिपट गया। सूरदास ने उसकी एक टाँग पकड़ ली और इतनी जोर से खींचा कि जगधार धाम से गिर पड़ा। चारों तरफ से तालियाँ बजने लगीं।

बजरंगी बोला—वाहए सूरदासए वाह! नायकराम ने दौड़कर उसकी पीठ ठोंकी।

भैरों—मुझे तो कहते थेए एक ही झपट्टे में गिरा दोगेए तुम कैसे गिर गएघ्

जगधार—सूरे ने टाँग पकड़ लीए नहीं तो क्या गिरा लेते। वह अड़ंगा मारता कि चारों खाने चित गिरते।

नायकराम—अच्छाए तो एक बाजी और हो जाए।

जगधार—हाँ—हाँए अबकी देखना।

दोनों योध्दाओं में फिर मल्ल—युध्द होने लगा। सूरदास ने अबकी जगधार का हाथ पकड़कर इतने जोर से ऐंठा कि वह श्आह! आह!श् करता हुआ जमीन पर बैठ गया। सूरदास ने तुरंत उसका हाथ छोड़ दिया और गरदन पकड़कर दोनों हाथों से ऐसा दबोचा कि जगधार की अॉंखें निकल आईंय नायकराम ने दौड़कर सूरदास को हटा लिया। बजरंगी ने जगधार को उठाकर बिठाया और हवा करने लगा।

भैरों ने बिगड़कर कहा—यह कोई कुश्ती है कि जहाँ पकड़ पायाए वहीं धार दबाया। यह तो गँवारों की लड़ाई हैए कुश्ती थोड़े ही है।

नायकराम—यह बात तो पहले तय हो चुकी थी।

जगधार सँभलकर उठ बैठा और चुपके से सरक गया। भैरों भी उसके पीछे चलता हुआ। उनके जाने के बाद यहाँ खूब कहकहे उड़ेए और सूरदास की खूब पीठ ठोंकी गई। सबको आश्चर्य हो रहा था कि सूरदास—जैसा दुर्बल आदमी जगधार—जैसे मोटे—ताजे आदमी को कैसे दबा बैठा। ठाकुरदीन यंत्र—मंत्र का कायल था। बोला—सूरे को किसी देवता का इष्ट है। हमें भी बताओ सूरेए कौन—सा मंत्र जगाया थाघ्

सूरदास—सौ मंत्रों का मंत्र हिम्मत है। ये रुपये जगधार को दे देनाए नहीं तो मेरी कुशल नहीं है!

ठाकुरदीन—रुपये क्यों दे दूँए कोई लूट हैघ् तुमने बाजी मारी हैए तुमको मिलेंगे।

नायकराम—अच्छा सूरदासए ईमान से बता दोए सुभागी को किस मंत्र से बस में कियाघ् अब तो यहाँ सब लोग अपने ही हैंए कोई दूसरा नहीं है। मैं भी कहीं कँपा लगाऊँ।

सूरदास ने करुण स्वर में कहा—पंडाजीए अगर तुम भी मुझसे ऐसी बातें करोगेए तो मैं मुँह में कालिख लगाकर कहीं निकल जाऊँगा। मैं पराई स्त्री को अपनी माताए बेटीए बहन समझता हूँ। जिस दिन मेरा मन इतना चंचल हो जाएगाए तुम मुझे जीता न देखोगे। यह कहकर सूरदास फूट—फूटकर रोने लगा। जरा देर में आवाज सँभालकर बोला—भैरों रोज उसे मारता है। बिचारी कभी—कभी मेरे पास आकर बैठ जाती है। मेरा अपराध इतना ही है कि मैं उसे दुतकार नहीं देता। इसके लिए चाहे कोई बदनाम करेए चाहे जो इलजाम लगाएए मेरा जो धरम थाए वह मैंने किया। बदनामी के डर से जो आदमी धरम से मुँह फेर लेए वह आदमी नहीं है।

बजरंगी—तुम्हें हट जाना थाए उसकी औरत थीए मारता चाहे पीटताए तुमसे मतलबघ्

सूरदास—भैयाए अॉंखों देखकर रहा नहीं जाताए यह तो संसार का व्यवहार हैय पर इतनी—सी बात पर कोई बड़ा कलंक तो नहीं लगा देता। मैं तुमसे सच कहता हूँए आज मुझे जितना दुरूख हो रहा हैए उतना दादा के मरने पर भी न हुआ था। मैं अपाहिजए दूसरों के टुकड़े खानेवाला और मुझ पर यह कलंक! (रोने लगा)

नायकराम—तो रोते क्यों हो भले आदमीए अंधे हो तो क्या मर्द नहीं होघ् मुझे तो कोई यह कलंक लगाताए तो और खुश होता। ये हजारों आदमी जो तड़के गंगा—स्नान करने जाते हैंए वहाँ नजरबाजी के सिवा और क्या करते हैं! मंदिरों में इसके सिवा और क्या होता है! मेले—ठेलों में भी यही बहार रहती है। यही तो मरदों के काम हैं। अब सरकार के राज में लाठी—तलवार का तो कहीं नाम नहीं रहाए सारी मनुसाई इसी नजरबाजी में रह गई है। इसकी क्या चिंता! चलो भगवान का भजन होए यह सब दुरूख दूर हो जाएगा।

बजरंगी को चिंता लगी हुई थी—आज की मार—पीट का न जाने क्या फल होघ् कल पुलिस द्वार पर आ जाएगी। गुस्सा हराम होता है। नायकराम ने आश्वासन दिया—भले आदमीए पुलिस से क्या डरते होघ् कहोए थानेदार को बुलाकर नचाऊँए कहो इंस्पेक्टर को बुलाकर चपतियाऊँ। निश्चिंत बैठे रहोए कुछ न होने पाएगा। तुम्हारा बाल भी बाँका हो जाएए तो मेरा जिम्मा।

तीनों आदमी यहाँ से चले। दयागिरि पहले ही से इनकी राह देख रहे थे। कई गाड़ीवान और बनिए भी आ बैठे थे। जरा देर में भजन की तानें उठने लगीं। सूरदास अपनी चिंताओं को भूल गयाए मस्त होकर गाने लगा। कभी भक्ति से विह्नल होकर नाचताए उछलने—कूदने लगताए कभी रोताए कभी हँसता। सभा विसर्जित हुई तो सभी प्राणी प्रसन्न थेए सबके हृदय निर्मल हो गए थेए मलिनता मिट गई थीए मानो किसी रमणीक स्थान की सैर करके आए हों। सूरदास तो मंदिर के चबूतरे ही पर लेटा और लोग अपने—अपने घर गए। किंतु थोड़ी ही देर बाद सूरदास को फिर उन्हीं चिंताओं ने आ घेरा—मैं क्या जानता था कि भैरों के मन में मेरी ओर से इतना मैल हैए नहीं तो सुभागी को अपने झोंपड़े में आने ही क्यों देता। जो सुनेगाए वही मुझ पर थूकेगा। लोगों को ऐसी बातों पर कितनी जल्द विश्वास आ जाता है। मुहल्ले में कोई अपने दरवाजे पर खड़ा न होने देगा। ऊँह! भगवान्‌ तो सबके मन की बात जानते हैं। आदमी का धरम है कि किसी को दुरूख में देखेए तो उसे तसल्ली दे। अगर अपना धरम पालने में भी कलंक लगता हैए तो लगेए बला से। इसके लिए कहाँ तक रोऊँघ् कभी—न—कभी तो लोगों को मेरे मन का हाल मालूम ही हो जाएगा।

किंतु जगधार और भैरों दोनों के मन में ईर्ष्‌या का फोड़ा पक रहा था। जगधार कहता था—मैंने तो समझा थाए सहज में पाँच रुपये मिल जाएँगेए नहीं तो क्या कुत्तो ने काटा था कि उससे भिड़ने जाताघ् आदमी काहे का हैए लोहा है।

भैरों—मैं उसकी ताकत की परीक्षा कर चुका हूँ। ठाकुरदीन सच कहता हैए उसे किसी देवता का इष्ट है।

जगधार—इष्ट—विष्ट कुछ नहीं हैए यह सब बेफिकरी है। हम—तुम गृहस्थी के जंजाल में फँसे हुए हैंए नोन—तेल—लकड़ी की चिंता सिर पर सवार रहती हैए घाटे—नफे के फेर में पड़े रहते हैं। उसे कौन चिंता हैघ् मजे से जो कुछ मिल जाता हैए खाता है और मीठी नींद सोता है। हमको—तुमको रोटी—दाल भी दोनों जून नसीब नहीं होती है। उसे क्या कमी हैए किसी ने चावल दिएए कहीं मिठाई पा गयाए घी—दूध बजरंगी के घर से मिल ही जाता है। बल तो खाने से होता है।

भैरों—नहींए यह बात नहीं। नसा खाने से बल का नास हो जाता है।

जगधार—कैसी उलटी बातें करते होय ऐसा होताए तो फौज में गोरों को बारांडी क्यों पिलाई जातीघ् अंगरेज सभी शराब पीते हैंए तो क्या कमजोर होते हैंघ्

भैरों—आज सुभागी आती हैए तो गला दबा देता हूँ।

जगधार—किसी के घर में छिपी बैठी होगी।

भैरों—अंधे ने मेरी आबरू बिगाड़ दी। बिरादरी में यह बात फैलेगीए तो हुक्का बंद हो जाएगाए भात देना पड़ जाएगा।

जगधार—तुम्हीं तो ढ़िंढ़ोरा पीट रहे हो। यह नहींए पटकनी खाई थीए तो चुपके से घर चले आते। सुभागी घर आती तो उससे समझते। तुम लगे वहीं दुहाई देने।

भैरों—इस अंधे को मैं ऐसा कपटी न समझता थाए नहीं तो अब तक कभी उसका मजा चखा चुका होता। अब उस चुड़ैल को घर में न रखूँगा। चमार के हाथों यह बेआबरुई!

जगधार—अब इससे बड़ी और क्या बदनामी होगीए गला काटने का काम है।

भैरों—बसए यही मन में आता है कि चलकर गँड़ासा मारकर काम तमाम कर दूँ। लेकिन नहींए मैं उसे खेला—खेलाकर मारूँगा। सुभागी का दोष नहीं। सारा तूफान इसी ऐबी अंधे का खड़ा किया हुआ है।

जगधार—दोष दोनों का है।

भैरों—लेकिन छेड़छाड़ तो पहले मर्द ही करता है। उससे तो अब मुझे कोई वास्ता नहीं रहाए जहाँ चाहे जाएए जैसे चाहे रहे। मुझे तो अब इसी अंधे से भुगतना है। सूरत से कैसा गरीब मालूम होता हैए जैसे कुछ जानता ही नहींए और मन में इतना कपट भरा हुआ है। भीख माँगते दिन जाते हैंए उस पर भी अभागे की अॉंखें नहीं खुलतीं। जगधारए इसने मेरा सिर नीचा कर दिया। मैं दूसरों पर हँसा करता थाए अब जमाना मुझ पर हँसेगा। मुझे सबसे बड़ा मलाल तो यह है कि अभागिन गई भीए तो चमार के साथ गई। अगर किसी ऐसे आदमी के साथ जातीए जो जात—पाँत मेंए देखने—सुनने मेंए धान—दौलत में मुझसे बढ़़कर होताए तो मुझे इतना रंज न होता। जो सुनेगाए अपने मन में यही कहेगा कि मैं इस अंधे से भी गया—बीता हूँ।

जगधार—औरतों का सुभाव कुछ समझ में नहीं आताय नहीं तोए कहाँ तुम और कहाँ वह अंधा। मुँह पर मक्खियाँ भिनका करती हैंए मालूम होता हैए जूते खाकर आया है।

भैरों—और बेहया कितना बड़ा है! भीख माँगता हैए अंधा हैय पर जब देखो हँसता ही रहता है। मैंने उसे कभी रोते ही नहीं देखा।

जगधार—घर में रुपये गड़े हैंय रोए उसकी बला। भीख तो दिखाने की माँगता है।

भैरों—अब रोएगा। ऐसा रुलाऊँगा कि छठी का दूध याद आ जाएगा।

यों बातें करते हुए दोनों अपने—अपने घर गए। रात के दो बजे होंगे कि अकस्मात्‌ सूरदास की झोंपड़ी से ज्वाला उठी। लोग अपने—अपने द्वारों पर सो रहे थे। निद्रावस्था में भी उपचेतना जागती रहती है। दम—के—दम में सैकड़ों आदमी जमा हो गए। आसमान पर लाली छाई हुई थीए ज्वालाएँ लपक—लपककर आकाश की ओर दौड़ने लगीं। कभी उनका आकार किसी मंदिर के स्वर्ण—कलश का—सा हो जाता थाए कभी वे वायु के झोंकों से यों कम्पित होने लगती थींए मानो जल में चाँद का प्रतिबिम्ब है। आग बुझाने का प्रयत्न किया जा रहा थाय पर झोंपड़े की आगए ईर्ष्‌या की आग की भाँति कभी नहीं बुझती। कोई पानी ला रहा थाए कोई यों ही शोर मचा रहा थाय किंतु अधिकांश लोग चुपचाप खड़े नैराश्यपूर्ण द्रष्टि से अग्निदाह को देख रहे थेए मानो किसी मित्र की चिताग्नि है।

सहसा सूरदास दौड़ा हुआ आया और चुपचाप ज्वाला के प्रकाश में खड़ा हो गया।

बजरंगी ने पूछा—यह कैसे लगी सूरेए चूल्हे में तो आग नहीं छोड़ दी थीघ्

सूरदास—झोंपड़े में जाने का कोई रास्ता ही नहीं हैघ्

बजरंगी—अब तो अंदर—बाहर सब एक हो गया है। दीवारें जल रही हैं।

सूरदास—किसी तरह नहीं जा सकताघ्

बजरंगी—कैसे जाओगेघ् देखते नहीं होए यहाँ तक लपटें आ रही हैं!

जगधार—सूरेए क्या आज चूल्हा ठंडा नहीं किया थाघ्

नायकराम—चूल्हा ठंडा किया होताए तो दुसमनों का कलेजा कैसे ठंडा होता।

जगधार—पंडाजीए मेरा लड़का काम न आएए अगर मुझे कुछ भी मालूम हो। तुम मुझ पर नाहक सुभा करते हो।

नायकराम—मैं जानता हूँ जिसने लगाई है। बिगाड़ न दूँए तो कहना।

ठाकुरदीन—तुम क्या बिगाड़ोगेए भगवान आप ही बिगाड़ देंगे। इसी तरह जब मेरे घर में चोरी हुई थीए तो सब स्वाहा हो गया।

जगधार—जिसके मन में इतनी खुटाई होए भगवान उसका सत्यानाश कर दें।

सूरदास—अब तो लपट नहीं आती।

बजरंगी—हाँए फूस जल गयाए अब धारन जल रही है।

सूरदास—अब तो अंदर जा सकता हूँघ्

नायकराम—अंदर तो जा सकते होय पर बाहर नहीं निकल सकते। अब चलो आराम से सो रहोय जो होना थाए हो गया। पछताने से क्या होगाघ्

सूरदास—हाँए सो रहूँगाए जल्दी क्या है।

थोड़ी देर में रही—सही आग भी बुझ गई। कुशल यह हुई कि और किसी के घर में आग न लगी। सब लोग इस दुर्घटना पर आलोचनाएँ करते हुए विदा हुए। सन्नाटा छा गया। किंतु सूरदास अब भी वहीं बैठा हुआ था। उसे झोंपड़े के जल जाने का दुरूख न थाए बरतन आदि के जल जाने का भी दुरूख न थाय दुरूख था उस पोटली काए जो उसकी उम्र—भर की कमाई थीए जो उसके जीवन की सारी आशाओं का आधार थीए जो उसकी सारी यातनाओं और रचनाओं का निष्कर्ष थी। इस छोटी—सी पोटली में उसकाए उसके पितरों का और उसके नामलेवा का उध्दार संचित था। यही उसके लोक और परलोकए उसकी दीन—दुनिया का आशा—दीपक थी। उसने सोचा—पोटली के साथ रुपये थोड़े ही जल गए होंगेघ् अगर रुपये पिघल भी गए होंगेए तो चाँदी कहाँ जाएगीघ् क्या जानता था कि आज यह विपत्ति आनेवाली हैए नहीं तो यहीं न सोता। पहले तो कोई झोंपड़ी के पास आता ही नय और अगर आग लगाता भीए तो पोटली को पहले ही निकाल लेता। सच तो यों है कि मुझे यहाँ रुपये रखने ही न चाहिए थे। पर रखता कहाँघ् मुहल्ले में ऐसा कौन हैए जिसे रखने को देताघ् हाय! पूरे पाँच सौ रुपये थेए कुछ पैसे ऊपर हो गए थे। क्या इसी दिन के लिए पैसे—पैसे बटोर रहा थाघ् खा लिया होताए तो कुछ तस्कीन होती। क्या सोचता था और क्या हुआ! गया जाकर पितरों को पिंडा देने का इरादा किया था। अब उनसे कैसे गला छूटेगाघ् सोचता थाए कहीं मिठुआ की सगाई ठहर जाएए तो कर डालूँ। बहू घर में आ जायए तो एक रोटी खाने को मिले! अपने हाथों ठोंक—ठोंककर खाते एक जुग बीत गया। बड़ी भूल हुई। चाहिए था कि जैसे—जैसे हाथ में रुपये आतेए एक—एक काम पूरा करता जाता। बहुत पाँव फैलाने का यही फल है!

उस समय तक राख ठंडी हो चुकी थी। सूरदास अटकल से द्वार की ओर झोंपड़े में घुसाय पर दो—तीन पग के बाद एकाएक पाँव भूबल में पड़ गया। ऊपर राख थीए लेकिन नीचे आग। तुरंत पाँव खींच लिया और अपनी लकड़ी से राख को उलटने—पलटने लगाए जिससे नीचे की आग भी जल्द राख हो जाए। आधा घंटे में उसने सारी राख नीचे से ऊपर कर दीए और तब फिर डरते—डरते राख में पैर रखा। राख गरम थीए पर असह्य न थी। उसने उसी जगह की सीधा में राख को टटोलना शुरू कियाए जहाँ छप्पर में पोटली रखी थी। उसका दिल धाड़क रहा था। उसे विश्वास था कि रुपये मिलें या न मिलेंए पर चाँदी तो कहीं गई ही नहीं। सहसा वह उछल पड़ाए कोई भारी चीज हाथ लगी। उठा लियाय पर टटोलकर देखाए तो मालूम हुआ ईंट का टुकड़ा है। फिर टटोलने लगाए जैसे कोई आदमी पानी में मछलियाँ टटोले। कोई चीज हाथ न लगी। तब तो उसने नैराश्य की उतावली और अधीरता के साथ सारी राख छान डाली। एक—एक मुट्ठी राख हाथ में लेकर देखी। लोटा मिलाए तवा मिलाए किंतु पोटली न मिली। उसका वह पैरए जो अब तक सीढ़़ी पर थाए फिसल गया और अब वह अथाह गहराई में जा पड़ा। उसके मुख से सहसा एक चीख निकल आई। वह वहीं राख पर बैठ गया और बिलख—बिलखकर रोने लगा। यह फूस की राख न थीए उसकी अभिलाषाओं की राख थी। अपनी बेबसी का इतना दुरूख उसे कभी न हुआ था।

तड़का हो गयाए सूरदास अब राख के ढ़ेर को बटोरकर एक जगह कर रहा था। आशा से ज्यादा दीर्घजीवी और कोई वस्तु नहीं होती।

उसी समय जगधार आकर बोला—सूरेए सच कहनाए तुम्हें मुझ पर तो सुभा नहीं हैघ्

सूरे को सुभा तो थाए पर उसने इसे छिपाकर कहा—तुम्हारे ऊपर क्यों सुभा करूँगाघ् तुमसे मेरी कौन—सी अदावत थीघ्

जगधार—मुहल्लेवाले तुम्हें भड़काएँगेए पर मैं भगवान से कहता हूँए मैं इस बारे में कुछ नहीं जानता।

सूरदास—अब तो जो कुछ होना थाए हो चुका। कौन जानेए किसी ने लगा दीए या किसी की चिलम से उड़कर लग गईघ् यह भी तो हो सकता है कि चूल्हे में आग रह गई हो। बिना जाने—बूझे किस पर सुभा करूँघ्

जगधार—इसी से तुम्हें चिता दिया कि कहीं सुभे में मैं भी न मारा जाऊँ।

सूरदास—तुम्हारी तरफ से मेरा दिल साफ है।

जगधार को भैरों की बातों से अब यह विश्वास हो गया कि उसी की शरारत है। उसने सूरदास को रुलाने की बात कही थी। उस धमकी को इस तरह पूरा किया। वह वहाँ से सीधो भैरों के पास गया। वह चुपचाप बैठा नारियल का हुक्का पी रहा थाए पर मुख से चिंता और घबराहट झलक रही थी। जगधार को देखते ही बोला—कुछ सुनाय लोग क्या बातचीत कर रहे हैंघ्

जगधार—सब लोग तुम्हारे ऊपर सुभा करते हैं। नायकराम की धमकी तो तुमने अपने कानों से सुनी।

भैरों—यहाँ ऐसी धमकियों की परवा नहीं है। सबूत क्या है कि मैंने लगाईघ्

जगधार—सच कहोए तुम्हीं ने लगाईघ्

भैरों—हाँए चुपके से एक दियासलाई लगा दी।

जगधार—मैं कुछ—कुछ पहले ही समझ गया थाय पर यह तुमने बुरा किया। झोंपड़ी जलाने से क्या मिलाघ् दो—चार दिन में फिर दूसरी झोंपड़ी तैयार हो जाएगी।

भैरों—कुछ होए दिल की आग तो ठंडी हो गई! यह देखो!

यह कहकर उसने एक थैली दिखाईए जिसका रंग धुएँ से काला हो गया था। जगधार ने उत्सुक होकर पूछा—इसमें क्या हैघ् अरे! इसमें तो रुपये भरे हुए हैं।

भैरों—यह सुभागी को बहका ले जाने का जरीबाना है।

जगधार—सच बताओए ये रुपये कहाँ मिलेघ्

भैरों—उसी झोंपड़े में। बड़े जतन से धारन की आड़ में रखे हुए थे। पाजी रोज राहगीरों को ठग—ठगकर पैसे लाता थाए और इसी थैली में रखता था। मैंने गिने हैं। पाँच सौ से ऊपर हैं। न जाने कैसे इतने रुपये जमा हो गए! बचा को इन्हीं रुपयों की गरमी थी। अब गरमी निकल गई। अब देखूँ किस बल पर उछलते हैं। बिरादरी को भोज—भात देने का सामान हो गया। नहीं तोए इस बखत रुपये कहाँ मिलतेघ् आजकल तो देखते ही होए बल्लमटेरों के मारे बिकरी कितनी मंदी है।

जगधार—मेरी तो सलाह है कि रुपये उसे लौटा दो। बड़ी मसक्कत की कमाई है। हजम न होगी।

जगधार दिल का खोटा आदमी नहीं थाय पर इस समय उसने यह सलाह उसे नेकनीयती से नहींए हसद से दी थी। उसे यह असह्य था कि भैरों के हाथ इतने रुपये लग जाएँ। भैरों आधो रुपये उसे देताए तो शायद उसे तस्कीन हो जातीय पर भैरों से यह आशा न की जा सकती थी। बेपरवाही से बोला—मुझे अच्छी तरह हजम हो जाएगी। हाथ में आए हुए रुपये को नहीं लौटा सकता। उसने तो भीख ही माँगकर जमा किए हैंए गेहूँ तो नहीं तौला था।

जगधार—पुलिस सब खा जाएगी।

भैरों—सूरे पुलिस में न जाएगा। रो—धोकर चुप हो जाएगा।

जगधार—गरीब की हाय बड़ी जान—लेवा होती है।

भैरों—वह गरीब है! अंधा होने से ही गरीब हो गयाघ् जो आदमी दूसरों की औरतों पर डोरे डालेए जिसके पास सैकड़ों रुपये जमा होंए जो दूसरों को रुपये उधार देता होए वह गरीब हैघ् गरीब जो कहोए तो हम—तुम हैं। घर में ढ़ूँढ़़ आओए एक पूरा रुपया न निकलेगा। ऐसे पापियों को गरीब नहीं कहते। अब भी मेरे दिल का काँटा नहीं निकला। जब तक उसे रोते न देखूँगाए यह काँटा न निकलेगा। जिसने मेरी आबरू बिगाड़ दीए उसके साथ जो चाहे करूँए मुझे पाप नहीं लग सकता।

जगधार का मन आज खोंचा लेकर गलियों का चक्कर लगाने में न लगा। छाती पर साँप लोट रहा था—इसे दम—के—दम में इतने रुपये मिल गएए अब मौज उड़ाएगा। तकदीर इस तरह खुलती है। यहाँ कभी पड़ा हुआ पैसा भी न मिला। पाप—पुन्न की कोई बात नहीं। मैं ही कौन दिन—भर पुन्न किया करता हूँघ् दमड़ी—छदाम—कौड़ियों के लिए टेनी मारता हूँ! बाट खोटे रखता हूँए तेल की मिठाई को घी की कहकर बेचता हूँ। ईमान गँवाने पर भी कुछ नहीं लगता। जानता हूँए यह बुरा काम हैय पर बाल—बचों को पालना भी तो जरूरी है। इसने ईमान खोयाए तो कुछ लेकर खोयाए गुनाह बेलज्जत नहीं रहा। अब दो—तीन दूकानों का और ठेका ले लेगा। ऐसा ही कोई माल मेरे हाथ भी पड़ जाताए तो जिंदगानी सुफल हो जाती।

जगधार के मन में ईर्ष्‌या का अंकुर जमा। वह भैरों के घर से लौटा तो देखा कि सूरदास राख को बटोरकर उसे आटे की भाँति गूँधा रहा है। सारा शरीर भस्म से ढ़का हुआ है और पसीने की धारें निकल रही हैं। बोला—सूरेए क्या ढ़ूँढ़़ते होघ्

सूरदास—कुछ नहीं। यहाँ रखा ही क्या था! यही लोटा—तवा देख रहा था।

जगधार—और वह थैली किसकी हैए जो भैरों के पास हैघ्

सूरदास चौंका। क्या इसीलिए भैरों आया थाघ् जरूर यही बात है। घर में आग लगाने के पहले रुपये निकाल लिए होंगे।

लेकिन अंधे भिखारी के लिए दरिद्रता इतनी लज्जा की बात नहीं हैए जितना धान। सूरदास जगधार से अपनी आर्थिक हानि को गुप्त रखना चाहता था। वह गया जाकर पिंड दान करना चाहता थाए मिठुआ का ब्याह करना चाहता थाए कुअॉं बनवाना चाहता थाय किंतु इस ढ़ंग से कि लोगों को आश्चर्य हो कि इसके पास रुपये कहाँ से आएए लोग यही समझें कि भगवान्‌ दीन जनों की सहायता करते हैं। भिखारियों के लिए धान—संचय पाप—संचय से कम अपमान की बात नहीं है। बोला—मेरे पास थैली—वैली कहाँघ् होगी किसी की। थैली होतीए तो भीख माँगताघ्

जगधार—मुझसे उड़ते होघ् भैरों मुझसे स्वयं कह रहा था कि झोंपड़े में धारन के ऊपर यह थैली मिली। पाँच सौ रुपये से कुछ बेसी हैं।

सूरदास—वह तुमसे हँसी करता होगा। साढ़़े पाँच रुपये तो कभी जुड़े ही नहींए साढ़़े पाँच सौ कहाँ से आते!

इतने में सुभागी वहाँ आ पहुँची। रात—भर मंदिर के पिछवाड़े अमरूद के बाग में छिपी बैठी थी। वह जानती थीए आग भैरों ने लगाई है। भैरों ने उस पर जो कलंक लगाया थाए उसकी उसे विशेष चिंता न थीए क्योंकि वह जानती थी किसी को इस पर विश्वास न आएगा। लेकिन मेरे कारण सूरदास का यों सर्वनाश हो जाएए इसका उसे बड़ा दुरूख था। वह इस समय उसको तस्कीन देने आई थी। जगधार को वहाँ खड़े देखाए तो झिझकी। भय हुआए कहीं यह मुझे पकड़ न ले। जगधार को वह भैरों ही का दूसरा अवतार समझती थी। उसने प्रण कर लिया था कि अब भैरों के घर न जाऊँगीए अलग रहूँगी और मेहनत—मजूरी करके जीवन का निर्वाह करूँगी। यहाँ कौन लड़के रो रहे हैंए एक मेरा ही पेट उसे भारी है नघ् अब अकेले ठोंके और खाएए और बुढ़़िया के चरण धो—धोकर पिएए मुझसे तो यह नहीं हो सकता। इतने दिन हुएए इसने कभी अपने मन से धोले का सेंदुर भी न दिया होगाए तो मैं क्यों उसके लिए मरूँघ्

वह पीछे लौटना ही चाहती थी कि जगधार ने पुकारा—सुभागीए कहाँ जाती हैघ् देखी अपने खसम की करतूतए बेचारे सूरदास को कहीं का न रखा।

सुभागी ने समझाए मुझे झाँसा दे रहा है। मेरे पेट की थाह लेने के लिए यह जाल फेंका है। व्यंग से बोली—उसके गुरु तो तुम्हीं होए तुम्हीं ने मंत्र दिया होगा।

जगधार—हाँए यही मेरा काम हैए चोरी—डाका न सिखाऊँए तो रोटीयाँ क्योंकर चलें!

सुभागी ने फिर व्यंग किया—रात ताड़ी पीने को नहीं मिली क्याघ्

जगधार—ताड़ी के बदले क्या अपना ईमान बेच दूँगाघ् जब तक समझता थाए भला आदमी हैए साथ बैठता थाए हँसता—बोलता थाए ताड़ी भी पी लेता थाए कुछ ताड़ी के लालच से नहीं जाता था (क्या कहना हैए आप ऐेसे धार्मात्मा तो हैं!)य लेकिन आज से कभी उसके पास बैठते देखाए तो कान पकड़ लेना। जो आदमी दूसरों के घर में आग लगाएए गरीबों के रुपये चुरा ले जाएए वह अगर मेरा बेटा भी हो तो उसकी सूरत न देखूँ। सूरदास ने न जाने कितने जतन से पाँच सौ रुपये बटोरे थे। वह सब उड़ा ले गया। कहता हूँए लौटा दोए तो लड़ने पर तैयार होता है।

सूरदास—फिर वही रट लगाए जाते हो। कह दिया कि मेरे पास रुपये नहीं थेए कहीं और जगह से मार लाया होगाय मेरे पास पाँच सौ रुपये होतेए तो चौन की बंसी न बजाताए दूसरों के सामने हाथ क्यों पसारताघ्

जगधार—सूरेए अगर तुम भरी गंगा में कहो कि मेरे रुपये नहीं हैए तो मैं न मानूँगा। मैंने अपनी अॉंखों से वह थैली देखी है। भैरों ने अपने मुँह से कहा है कि यह थैली झोंपड़े में धारन के ऊपर मिली। तुम्हारे बात कैसे मान लूँघ्

सुभागी—तुमने थैली देखी हैघ्

जगधार—हाँए देखी नहीं तो क्या झूठ बोल रहा हूँघ्

सुभागी—सूरदासए सच—सच बता दोए रुपये तुम्हारे हैं!

सूरदास—पागल हो गई है क्याघ् इनकी बातों में आ जाती है! भला मेरे पास रुपये कहाँ से आतेघ्

जगधार—इनसे पूछए रुपये न थेए तो इस घड़ी राख बटोरकर क्या ढ़ूँढ़़ रहे थेघ्

सुभागी ने सूरदास के चेहरे की तरफ अन्वेषण की द्रष्टि से देखा। उसकी उस बीमार की—सी दशा थीए जो अपने प्रियजनों की तस्कीन के लिए अपनी असह्य वेदना को छिपाने का असफल प्रयत्न कर रहा हो। जगधार के निकट आकर बोली—रुपये जरूर थेए इसका चेहरा कहे देता है।

जगधार—मैंने थैली अपनी अॉंखों से देखी है।

सुभागी—अब चाहे वह मुझे मारे या निकालेए पर रहूँगी उसी के घर। कहाँ—कहाँ थैली को छिपाएगाघ् कभी तो मेरे हाथ लगेगी। मेरे ही कारण इस पर यह बिपत पड़ी है। मैंने ही उजाड़ा है मैं ही बसाऊँगी। जब तक इसके रुपये न दिला दूँगीए मुझे चौन न आएगी।

यह कहकर वह सूरदास से बोली—तो अब रहोगे कहाँघ्

सूरदास ने यह बात न सुनी। वह सोच रहा था—रुपये मैंने ही तो कमाए थेए क्या फिर नहीं कमा सकताघ् यही न होगाए जो काम इस साल होताए वह कुछ दिनों के बाद होगा। मेरे रुपये थे ही नहींए शायद उस जन्म में मैंने भैरों के रुपये चुराए होंगे। यह उसी का दंड मिला है। मगर बिचारी सुभागी का अब क्या हाल होगाघ् भैरों उसे अपने घर में कभी न रखेगा। बिचारी कहाँ मारी—मारी फिरेगी! यह कलंक भी मेरे सिर लगना था। कहीं का न हुआ। धान गयाए घर गयाए आबरू गईय जमीन बच रही हैए यह भी न जानेए जाएगी या बचेगी। अंधापन ही क्या थोड़ी बिपत थी कि नित ही एक—न—एक चपत पड़ती रहती है। जिसके जी में आता हैए चार खोटी—खरी सुना देता है।

इन दुरूखजनक विचारों से मर्माहत—सा होकर वह रोने लगा। सुभागी जगधार के साथ भैरों के घर की ओर चली जा रही थी और यहाँ सूरदास अकेला बैठा हुआ रो रहा था।

सहसा वह चौंक पड़ा। किसी ओर से आवाज आई—तुम खेल में रोते हो!

मिठुआ घीसू के घर से रोता चला आता थाए शायद घीसू ने मारा था। इस पर घीसू उसे चिढ़़ा रहा था—खेल में रोते हो!

सूरदास कहाँ तो नैराश्यए ग्लानिए चिंता और क्षोभ के अपार जल में गोते खा रहा थाए कहाँ यह चेतावनी सुनते ही उसे ऐसा मालूम हुआए किसी ने उसका हाथ पकड़कर किनारे पर खड़ा कर दिया। वाह! मैं तो खेल में रोता हूँ। कितनी बुरी बात है! लड़के भी खेल में रोना बुरा समझते हैंए रोनेवाले को चिढ़़ाते हैंए और मैं खेल में रोता हूँ। सच्चे खिलाड़ी कभी रोते नहींए बाजी—पर—बाजी हारते हैंए चोट—पर—चोट खाते हैंए धाक्के—पर—धाक्के सहते हैंय पर मैदान में डटे रहते हैंए उनकी त्योरियों पर बल नहीं पड़ते। हिम्मत उनका साथ नहीं छोड़तीए दिल पर मालिन्य के छींटे भी नहीं आतेए न किसी से जलते हैंए न चिढ़़ते हैं। खेल में रोना कैसाघ् खेल हँसने के लिएए दिल बहलाने के लिए हैए रोने के लिए नहीं।

सूरदास उठ खड़ा हुआए और विजय—गर्व की तरंग में राख के ढ़ेर को दोनों हाथों से उड़ाने लगा।

आवेग में हम उद्दिष्ट स्थान से आगे निकल जाते हैं। वह संयम कहाँ हैए जो शत्रु पर विजय पाने के बाद तलवार को म्यान में कर लेघ्

एक क्षण में मिठुआए घीसू और मुहल्ले के बीसों लड़के आकर इस भस्म—स्तूप के चारों ओर जमा हो गए और मारे प्रश्नों के सूरदास को परेशान कर दिया। उसे राख फेंकते देखकर सबों को खेल हाथ आया। राख की वर्षा होने लगी। दम—के—दम में सारी राख बिखर गईए भूमि पर केवल काला निशान रह गया।

मिठुआ ने पूछा—दादाए अब हम रहेंगे कहाँघ्

सूरदास—दूसरा घर बनाएँगे।

मिठुआ—और कोई फिर आग लगा देघ्

सूरदास—तो फिर बनाएँगे।

मिठुआ—और फिर लगा देघ्

सूरदास—तो हम भी फिर बनाएँगे।

मिठुआ—और कोई हजार बार लगा देघ्

सूरदास—तो हम हजार बार बनाएँगे।

बालकों को संख्याओं से विशेष रुचि होती है। मिठुआ ने फिर पूछा—और जो कोई सौ लाख बार लगा देघ्

सूरदास ने उसी बालोचित सरलता से उत्तर दिया—तो हम भी सौ लाख बार बनाएँगे।

जब वहाँ राख की चुटकी भी न रहीए तो सब लड़के किसी दूसरे खेल की तलाश में दौड़े। दिन अच्छी तरह निकल आया था। सूरदास ने भी लकड़ी सँभाली और सड़क की तरफ चला। उधार जगधार वहाँ से नायकराम के पास गयाय और यहाँ भी यह वृत्तांत सुनाया। पंडा ने कहा—मैं भैरों के बाप से रुपये वसूल करूँगाए जाता कहाँ हैए उसकी हडिडयों से रुपये निकालकर दम लूँगाए अंधा अपने मुँह से चाहे कुछ कहे या न कहे।

जगधार वहाँ से बजरंगीए दयागिरिए ठाकुरदीन आदि मुहल्ले के सब छोटे—बड़े आदमियों से मिला और यह कथा सुनाई। आवश्यकतानुसार यथार्थ घटना में नमक—मिर्च भी लगाता जाता था। सारा मुहल्ला भैरों का दुश्मन हो गया।

सूरदास तो सड़क के किनारे राहगीरों की जय मना रहा थाए यहाँ मुहल्लेवालों ने उसकी झोंपड़ी बसानी शुरू की। किसी ने फूस दियाए किसी ने बाँस दिएए किसी ने धारन दीए कई आदमी झोंपड़ी बनाने में लग गए। जगधार ही इस संगठन का प्रधान मंत्री था। अपने जीवन में शायद ही उसने इतना सदुत्साह दिखाया हो। ईर्ष्‌या में तम—ही—तम नहीं होताए कुछ सत्‌ भी होता है। संध्या तक झोंपड़ी तैयार हो गईए पहले से कहीं ज्यादा बड़ी और पायदार। जमुनी ने मिट्टी के दो घड़े और दो—तीन हाँड़ियाँ लाकर रख दीं। एक चूल्हा भी बना दिया। सबने गुट कर रखा था कि सूरदास को झोंपड़ी बनने की जरा भी खबर न हो। जब वह शाम को आएए तो घर देखकर चकित हो जाएए और पूछने लगेए किसने बनाईए तब सब लोग कहेंए आप—ही—आप तैयार हो गई।

'''

अध्याय 12

प्रभु सेवक ताहिर अली के साथ चलेए तो पिता पर झल्लाए हुए थे—यह मुझे कोल्हू का बैल बनाना चाहते हैं। आठों पहर तम्बाकू ही के नशे में डूबा पड़ा रहूँए अधिकारियों की चौखट पर मस्तक रगड़ूँए हिस्से बेचता फिरूँए पत्रों में विज्ञापन छपवाऊँए बस सिगरेट की डिबिया बन जाऊँ। यह मुझसे नहीं हो सकता। मैं धान कमाने की कल नहीं हूँए मनुष्य हूँए धान—लिप्सा अभी तक मेरे भावों को कुचल नहीं पाई है। अगर मैं अपनी ईश्वरदत्ता रचना—शक्ति से काम न लूँए तो यह मेरी कृतघ्नता होगी। प्रकृति ने मुझे धानोपार्जन के लिए बनाया ही नहींय नहीं तो वह मुझे इन भावों से क्यों भूषित करती। कहते तो हैं कि अब मुझे धान की क्या चिंताए थोड़े दिनों का मेहमान हूँए मानो ये सब तैयारियाँ मेरे लिए हो रही हैं। लेकिन अभी कह दूँ कि आप मेरे लिए यह कष्ट न उठाइएए मैं जिस दशा में हूँए उसी में प्रसन्न हूँए तो कुहराम मच जाए! अच्छी विपत्ति गले पड़ीए जाकर देहातियों पर रोब जमाइएए उन्हें धामकाइएए उनको गालियाँ सुनाइए। क्योंघ् इन सबों ने कोई नई बात नहीं की है। कोई उनकी जायदाद पर जबरदस्ती हाथ बढ़़ाएगाए तो वे लड़ने पर उतारू हो ही जाएँगे। अपने स्वत्वों की रक्षा करने का उनके पास और साधान ही क्या हैघ् मेरे मकान पर आज कोई अधिकार करना चाहेए तो मैं कभी चुपचाप न बैठूँगा। धैर्य तो नैराश्य की अंतिम अवस्था का नाम है। जब तक हम निरुपाय नहीं हो जातेए धैर्य की शरण नहीं लेते। इन मियाँजी को भी जरा—सी चोट आ गईए तो फरियाद लेकर पहुँचे। खुशामदी हैए चापलूसी से अपना विश्वास जमाना चाहता है। आपको भी गरीबों पर रोब जमाने की धुन सवार होगी। मिलकर नहीं रहते बनता। पापा की भी यही इच्छा है। खुदा करेए सब—के—सब बिगड़ खड़े होंए गोदाम में आग लगा दें और इस महाशय की ऐसी खबर लें कि यहाँ से भागते ही बने। ताहिर अली से सरोष होकर बोले—क्या बात हुई कि सब—के—सब बिगड़ खड़े हुएघ्

ताहिर—हुजूरए बिल्कुल बेसबब। मैं तो खुद ही इन सबों से जान बचाता रहता हूँ।

प्रभु सेवक—किसी कार्य के लिए कारण का होना आवश्यक हैय पर आज मालूम हुआ कि वह भी दार्शनिक रहस्य हैए क्योंघ्

ताहिर—(बात न समझकर) जी हाँए और क्या!

प्रभुसेवक—जी हाँए और क्या के क्या मानीघ् क्या आप बात भी नहीं समझतेए या बहरेपन का रोग हैघ् मैं कहता हूँए बिना चिनगारी के आग नहीं लग सकतीय आप फरमाते हैंए जी हाँए और क्या। आपने कहाँ तक शिक्षा पाई हैघ्

ताहिर—(कातर स्वर से) हुजूरए मिडिल तक तालीम पाई थीए पर बदकिस्मती से पास न हो सका। मगर जो काम कर सकता हूँए वह मिडिल पास कर देए तो जो जुर्माना कहिएए दूँ। बहुत दिनों तक चुंगी में मुंशी रह चुका हूँ।

प्रभु सेवक—तो फिर आपके पांडित्य और विद्वता पर किसे शंका हो सकती है! आपके कथन के आधार पर मुझे मान लेना चाहिए कि आप शांत बैठे हुए पुस्तकावलोकन में मग्न थेए या सम्भवतरू ईश्वर—भजन में तन्मय हो रहे थेए और विद्रोहियों का एक सशस्त्रा दल पहुँचकर आप पर हमले करने लगा।

ताहिर—हुजूर तो खुद ही चल रहे हैंए मैं क्या अर्ज करूँए तहकीकात कर लीजिएगा।

प्रभु सेवक—सूर्य को सिध्द करने के लिए दीपक की जरूरत नहीं होती। देहाती लोग प्रायरू बड़े शांतिप्रिय होते हैं। जब तक उन्हें भड़काया न जाएए लड़ाई—दंगा नहीं करते। आपकी तरह उन्हें ईश्वर—भजन से रोटीयाँ नहीं मिलतीं। सारे दिन सिर खपाते हैंए तब रोटीयाँ नसीब होती हैं। आश्चर्य है कि आपके सिर पर जो कुछ गुजरीए उसके कारण भी नहीं बता सकते। इसका आशय इसके सिवा और क्या हो सकता है कि या तो आपको खुदा ने बहुत मोटी बुध्दि दी हैए या आप अपना रोब जमाने के लिए लोगों पर अनुचित दबाव डालते हैं।

ताहिर—हुजूरए झगड़ा लड़कों से शुरू हुआ। मुहल्ले के कई लड़के मेरे लड़कों को मार रहे थे। मैंने जाकर उन सबों की गोशमाली कर दी। बसए इतनी जरा—सी बात पर लोग चढ़़ आए।

प्रभु सेवक—धान्य हैंए आपके साथ भगवान्‌ ने उतना अन्याय नहीं किया हैए जितना मैं समझता था। आपके लड़कों में और मुहल्ले के लड़कों में मार—पीट हो रही थी। अपने लड़कों के रोने की आवाज सुनी और आपका खून उबलने लगा। देहातियों के लड़कों की इतनी हिम्मत कि आपके लड़कों को मारें! खुदा का गजब! आपकी शराफत यह अत्याचार न सह सकी। आपने औचित्यए दूरदर्शिता और सहज बुध्दि को समेटकर ताक पर रख दिया और उन दुस्साहसी लड़कों को मारने दौड़े। तो अगर आप—जैसे सभ्य पुरुष को बाल—संग्राम में हस्तक्षेप करते देखकर और लोग भी आपका अनुसरण करेंए तो आपको शिकायत न होनी चाहिए। आपको दुनिया में इतने दिनों तक रहने के बाद यह अनुभव हो जाना चाहिए था कि लड़कों के बीच में बूढ़़ों को न पड़ना चाहिए। इसका नतीजा बुरा होता है। मगर आप इस अनुभव से वंचित थेए तो आपको इस पाठ के लिए प्रसन्न होना चाहिएए जिससे आपको एक परमावश्यक और महत्व पूर्ण ज्ञान प्राप्त हुआ। इसके लिए फरियाद करने की जरूरत न थी।

फिटन उड़ी जाती थी और उसके साथ ताहिर अली के होश भी उड़े जाते थे—मैं समझता थाए इन हजरत में ज्यादा इंसानियत होगीय पर देखता हूँ तो यह अपने बाप से भी दो अंगुल ऊँचे हैं। न हारी मानते हैंए न जीती। ये ताने बर्दाश्त नहीं हो सकते। कुछ मुफ्त में तनख्वाह नहीं देते। काम करता हूँए मजदूरी लेता हूँ। तानों—ही—तानों में मुझे कमीनाए अहमकए जाहिलए सब कुछ बना डाला। अभी उम्र में मुझसे कितने छोटे हैं! माहिर से दो—चार साल बड़े होंगेय मगर मुझे इस तरह आड़े हाथों ले रहे हैंए गोया मैं नादान बच्चा हूँ! दौलत ज्यादा होने से अक्ल भी ज्यादा हो जाती है। चौन से जिंदगी बसर होती हैए जभी ये बातें सूझ रही हैं। रोटीयों के लिए ठोकरें खानी पड़तींए तो मालूम होताए तजुर्बा क्या चीज है। आप कोई बात एतराज के लायक देखेंए तो उसे समझाने का हक हैए इसकी मुझे शिकायत नहींय पर जो कुछ कहोए नरमी और हमदर्दी के साथ। यह नहीं कि जहर उगलने लगोए कलेजे को चलनी बना डालो।

ये बातें हो रही थीं कि पाँड़ेपुर आ पहुँचा। सूरदास आज बहुत प्रसन्नचित्ता नजर आता था। और दिन सवारियों के निकल जाने के बाद दौड़ता था। आज आगे ही से उनका स्वागत कियाए फिटन देखते ही दौड़ा। प्रभु सेवक ने फिटन रोक दी और कर्कश स्वर में बोले—क्यों सूरदासए माँगते हो भीखए बनते हो साधु और काम करते हो बदमाशों काघ् मुझसे फौजदारी करने का हौसला हुआ हैघ्

सूरदास—कैसी फौजदारी हुजूरघ् मैं अंधा—अपाहिज आदमी भला क्या फौजदारी करूँगा।

प्रभु सेवक—तुम्हीं ने तो मुहल्लेवालों को साथ लेकर मेरे मुंशीजी पर हमला किया था और गोदाम में आग लगाने को तैयार थेघ्

सूरदास—सरकारए भगवान से कहता हूँए मैं नहीं था। आप लोगों का माँगता हूँए जान—माल का कल्यान मनाता हूँए मैं क्या फौजदारी करूँगाघ्

प्रभु सेवक—क्यों मुंशीजीए यही अगुआ था नघ्

ताहिर—नहीं हुजूरए इशारा इसी का थाए पर यह वहाँ न था।

प्रभु सेवक—मैं इन चालों को खूब समझता हूँ। तुम जानते होगेए इन धमकियों से ये लोग डर जाएँगेए मगर एक—एक से चक्की न पिसवाईए तो कहना कि कोई कहता था। साहब को तुमने क्या समझा है! अगर हाकिमों से झूठ भी कह देंए तो सारा मुहल्ला बँधा जाए। मैं तुम्हें जताए देता हूँ।

फिटन आगे बढ़़ीए तो जगधार मिला। खोंचा हथेली पर रखेए एक हाथ से मक्खियाँ उड़ाता चला जाता था। प्रभु सेवक को देखते ही सलाम करके खड़ा हो गया। प्रभु सेवक ने पूछा—तुम भी कल फौजदारी करनेवालों में थेघ्

जगधार—सरकारए मैं टके का आदमी क्या खाके फौजदारी करूँगाए और बिचारे सूरदास की क्या मजाल है कि सरकार के सामने अकड़ दिखाए। अपनी ही बिपत में पड़ा हुआ है। किसी ने रात को बिचारे की झोंपड़ी में आग लगा दी। बरतन—भाँड़ा सब जल गया। न जाने किस—किस जतन से कुछ रुपये जुटाए थेय वे भी लुट गए। गरीब ने सारी रात रो—रोकर काटी है। आज हम लोगों ने उसका झोंपड़ा बनाया है। अभी छुट्टी मिली हैए तो खोंचा लेकर निकला हूँ। हुकुम होए तो कुछ खिलाऊँ। कचालू खूब चटपटे हैं।

प्रभु सेवक का जी ललचा गया। खोंचा उतारने को कहा और कचालूए दही—बड़ेए फुलौड़ियाँ खाने लगे। भूख लगी हुई थी। ये चीजें बहुत प्रिय लगीं। कहा—सूरदास ने तो यह बात मुझसे नहीं कहीघ्

जगधार—वह कभी न कहेगा। कोई गला भी काट लेए तो शिकायत न करेगा।

प्रभुसेवक—तब तो वास्तव में कोई महापुरुष है। कुछ पता न चलाए किसने झोंपड़े में आग लगाई थीघ्

जगधार—सब मालूम हो गयाए हुजूरए पर किया क्या जाए। कितना कहा गया कि उस पर थाने में रपट कर देए मुआ कहता हैए कौन किसी को फँसाए! जो कुछ भाग में लिखा थाए वह हुआ। हुजूरए सारी करतूत इसी भैरों ताड़ीवाले की है।

प्रभु सेवक—कैसे मालूम हुआघ् किसी ने उसे आग लगाते देखाघ्

जगधार—हुजूरए वह खुद मुझसे कह रहा था। रुपयों की थैली लाकर दिखाई। इससे बढ़़कर और क्या सबूत होगाघ्

प्रभु सेवक—भैरों के मुँह पर कहोगेघ्

जगधार—नहीं सरकारए खून हो जाएगा।

सहसा भैरों सिर पर ताड़ी का घड़ा रखे आता हुआ दिखाई दिया। जगधार ने तुरंत खोंचा उठायाए बिना पैसे लिए कदम बढ़़ाता हुआ दूसरी तरफ चल दिया। भैरों ने समीप आकर सलाम किया। प्रभु सेवक ने अॉंखें दिखाकर पूछा—तू ही भैरों ताड़ीवाला है नघ्

भैरों—(काँपते हुए) हाँ हुजूरए मेरा ही नाम भैरों है।

प्रभु सेवक—तू यहाँ लोगों के घरों में आग लगाता फिरता हैघ्

भैरों—हुजूरए जवानी की कसम खाता हूँए किसी ने हुजूर से झूठ कह दिया है।

प्रभु सेवक—तू कल मेरे गोदाम पर फौजदारी करने में शरीक थाघ्

भैरों—हुजूर का ताबेदार हूँए आपसे फौजदारी करूँगा। मुंसीजी से पूछिएए झूठ कहता हूँ या सच। सरकारए न जाने क्यों सारा मोहल्ला मुझसे दुश्मनी करता है। अपने घर में एक रोटी खाता हूँए वह भी लोगों से नहीं देखा जाता। यह जो अंधा हैए हुजूरए एक ही बदमास है। दूसरों की बहू—बेटीयों पर बुरी निगाह रखता है। माँग—माँगकर रुपये जोड़ लिए हैंए लेन—देन करता है। सारा मोहल्ला उसके कहने में है। उसी के चेले बजरंगी ने फौजदारी की है। मालमस्त हैए गाएं—भैंसे हैंए पानी मिला—मिलाकर दूध बेचता है। उसके सिवा किसका गुरदा है कि हुजूर से फौजदारी करे!

प्रभु सेवक—अच्छा! इस अंधे के पास रुपये भी हैंघ्

भैरों—हुजूरए बिना रुपये के इतनी गरमी और कैसे होगी! जब पेट भरता हैए तभी तो बहू—बेटीयों पर निगाह डालने की सूझती है।

प्रभु सेवक—बेकार क्या बकता हैए अंधा आदमी क्या बुरी निगाह डालेगाघ् मैंने तो सुना हैए वह बहुत सीधा—सादा आदमी है।

भैरों—आपका कुत्ता आपको थोड़े ही काटता हैए आप तो उसकी पीठ सुहलाते हैंय पर जिन्हें काटने दौड़ता हैए वे तो उसे इतना सीधा न समझेंगे।

इतने में भैरों की दूकान आ गई। ग्राहक उसकी राह देख रहे थे। वह अपनी दूकान में चला गया। तब प्रभु सेवक ने ताहिर अली से कहा—आप कहते हैंए सारा मुहल्ला मिलकर मुझे मारने आया था। मुझे इस पर विश्वास नहीं आता। जहाँ लोगों में इतना बैर—विरोध हैए वहाँ इतना एका होना असम्भव है। दो आदमी मिलेए दोनों एक—दूसरे के दुश्मन। अगर आपकी जगह कोई दूसरा होताए तो इस वैमनस्य से मनमाना फायदा उठाता। उन्हें आपस में लड़ाकर दूर से तमाशा देखता। मुझे तो इन आदमियों पर क्रोध के बदले दया आती है।

बजरंगी का घर मिला। तीसरा पहर हो गया था। वह भैसों की नाँद में पानी डाल रहा था। फिटन पर ताहिर अली के साथ प्रभु सेवक को बैठे देखाए तो समझ गया—मियाँजी अपने मालिक को लेकर रोब जमाने आए हैं। जानते हैंए इस तरह मैं दब जाऊँगा। साहब अमीर होंगेए अपने घर के होंगे। मुझे कायल कर दें तो अभी जो जुरमाना लगा देंए वह देने को तैयार हूँय लेकिन जब मेरा कोई कसूर नहींए कसूर सोलहों आने मियाँ ही का हैए तो मैं क्यों दबूँघ् न्याय से दबा लेंए पद से दबा लेंए लेकिन भबकी से दबनेवाले कोई और होंगे।

ताहिर अली ने इशारा कियाए यही बजरंगी है। प्रभु सेवक ने बनावटी क्रोध धारण करके कहा—क्यों बेए कल के हंगामे में तू भी शरीक थाघ्

बजरंगी—शरीक किसके साथ थाघ् मैं अकेला था।

प्रभु सेवक—तेरे साथ सूरदास और मुहल्ले के और लोग न थेय झूठ बोलता है!

बजरंगी—झूठ नहीं बोलताए किसी का दबैल नहीं हूँ। मेरे साथ न सूरदास था और न मोहल्ले का कोई दूसरा आदमी। मैं अकेला था।

घीसू ने हाँक लगाई—पादड़ी! पादड़ी!

मिठुआ बोला—पादड़ी आयाए पादड़ी आया!

दोनों अपने हमजोलियों को यह आनंद—समाचार सुनाने दौड़ेए पादड़ी गाएगाए तसवीरें दिखाएगाए किताबें देगाए मिठाइयाँ और पैसे बाँटेगा। लड़कों ने सुनाए तो वे भी इस लूट का माल बँटाने दौड़े। एक क्षण में वहाँ बीसों बालक जमा हो गए। शहर के दूरवर्ती मोहल्लों में अंगरेजी वस्त्रधारी पुरुष पादड़ी का पर्याय है। नायकराम भंग पीकर बैठे थेए पादड़ी का नाम सुनते ही उठेए उनकी बेसुरी तानों में उन्हें विशेष आनंद मिलता था। ठाकुरदीन ने भी दूकान छोड़ दीए उन्हें पादड़ियों से धार्मिक वाद—विवाद करने की लत थी। अपना धर्मज्ञान प्रकट करने के ऐसे सुंदर अवसर पाकर न छोड़ते थे। दयागिरि भी आ पहुँचेए पर जब लोग पहुँचे तो भेद फिटन के पास खुला। प्रभु सेवक बजरंगी से कह रहे थे—तुम्हारी शामत न आएए नहीं तो साहब तुम्हें तबाह कर देंगे। किसी काम के न रहोगे। तुम्हारी इतनी मजाल!

बजरंगी इसका जवाब देना ही चाहता था कि नायकराम ने आगे बढ़़कर कहा—उस पर आप क्यों बिगड़ते हैंए फौजदारी मैंने की हैए जो कहना होए मुझसे कहिए।

प्रभु सेवक ने विस्मित होकर पूछा—तुम्हारा क्या नाम हैघ्

नायकराम को कुछ तो राजा महेंद्रकुमार के आश्वासनए कुछ विजया की तरंग और कुछ अपनी शक्ति के ज्ञान ने उच्छृंखल बना दिया था। लाठी सीधी करता हुआ बोला—लट्ठमार पाँड़े!

इस जवाब में हेकड़ी की जगह हास्य का आधिक्य था। प्रभु सेवक का बनावटी क्रोध हवा हो गया। हँसकर बोले—तब तो यहाँ ठहरने में कुशल नहीं हैए कहीं बिल खोदना चाहिए।

नायकराम अक्खड़ आदमी था। प्रभु सेवक के मनोभाव न समझ सका। भ्रम हुआ—यह मेरी हँसी उड़ा रहे हैंए मानो कह रहे हैं कि तुम्हारी बकवास से क्या होता हैए हम जमीन लेंगे और जरूर लेंगे। तिनककर बोला—आप हँसते क्या हैंए क्या समझ रखा है कि अंधे की जमीन सहज ही में मिल जाएगीघ् इस धोखे में न रहिएगा।

प्रभु सेवक को अब क्रोध आया। पहले उन्होंने समझा थाए नायकराम दिल्लगी कर रहा है। अब मालूम हुआ कि वह सचमुच लड़ने पर तैयार है। बोले—इस धोखे में नहीं हूँए कठिनाइयों को खूब जानता हूँ। अब तक भरोसा था कि समझौते से सारी बातें तय हो जाएँगीए इसीलिए आया था। लेकिन तुम्हारी इच्छा कुछ और होए तो वही सही। अब तक मैं तुम्हें निर्बल समझता थाए और निर्बलों पर अपनी शक्ति का प्रयोग न करना चाहता था। पर आज जाना कि तुम हेकड़ होए अपने बल का घमंड है। इसलिए अब हम तुम्हें भी अपने हाथ दिखाएँए तो कोई अन्याय नहीं है।

इन शब्दों में नेकनीयती झलक रही थी। ठाकुरदीन ने कहा—हुजूरए पंडाजी की बातों का खियाल न करें। इनकी आदत ही ऐसी हैए जो कुछ मुँह में आयाए बक डालते हैं। हम लोग आपके ताबेदार हैं।

नायकराम—आप दूसरों के बल पर कूदते होंगेए यहाँ अपने हाथों के बल का भरोसा करते हैं। आप लोगों के दिल में जो अरमान होंए निकाल डालिए। फिर न कहना कि धोखे में वार किया। (धीरे से) एक ही हाथ में सारी किरस्तानी निकल जाएगी।

प्रभु सेवक—क्या कहाए जरा जोर से क्यों नहीं कहतेघ्

नायकराम—(कुछ डरकर) कह तो रहा हूँए जो अरमान होए निकाल डालिए।

प्रभु सेवक—नहींए तुमने कुछ और कहा है।

नायकराम—जो कुछ कहा हैए वही फिर कह रहा हूँ। किसी का डर नहीं है।

प्रभु सेवक—तुमने गाली दी है।

यह कहते हुए प्रभु सेवक फिटन से नीचे उतर पड़ेए नेत्रों से ज्वाला—सी निकलने लगीए नथुने फड़कने लगेए सारा शरीर थरथराने लगाए एड़ियाँ ऐसी उछल रही थीं मानो किसी उबलती हुई हाँड़ी का ढ़कना है। आकृति विकृत हो गई थी। उनके हाथ में केवल एक पतली—सी छड़ी थी। फिटन से उतरते ही वह झपटकर नायकराम के कल्ले पर पहुँच गएए उसके हाथ से लाठी छीनकर फेंक दीय और ताबड़तोड़ कई बेंत लगाए। नायकराम दोनों हाथों से वार रोकता पीछे हटता जाता था। ऐसा जान पड़ता था कि वह अपने होश में नहीं है। वह यह जानता था कि भद्र पुरुष मार खाकर चाहे चुप रह जाएँए गाली नहीं सह सकते। कुछ तो पश्चात्ताापए कुछ आघात की अविलम्बिता और कुछ परिणाम के भय ने उसे वार करने का अवकाश ही न दिया। इन अविरल प्रहारों से वह चौंधिया—सा गया। इसमें कोई संदेह नहीं कि प्रभु सेवक उसके जोड़ के न थेय किंतु उसमें वह सत्साहसए वह न्याय—पक्ष का विश्वास न थाए जो संख्या और शस्त्रा तथा बल की परवा नहीं करता।

और लोग भी हतबुध्दि—से खड़े रहेय किसी ने बीच—बचाव तक न किया। बजरंगी नायकराम के पसीने की जगह खून बहानेवालों में था। दोनों साथ खेले और एक ही अखाड़े में लड़े थे। ठाकुरदीन और कुछ न कर सकता थाए तो प्रभु सेवक के सामने खड़ा हो सकता थाय किंतु दोनों—के—दोनों सुम—गुम—से ताकते रहे। यह सब कुछ पल मारने में हो गया। प्रभु सेवक अभी तक बेंत चलाते ही जाते थे। जब छड़ी से कोई असर न होते देखाए तो ठोकर चलानी शुरू की। यह चोट कारगर हुई। दो—ही—तीन ठोकरें पड़ी थीं कि नायकराम जाँघ में चोट खाकर गिर पड़ा। उसके गिरते ही बजरंगी ने दौड़कर प्रभु सेवक को हटा दिया और बोला—बस साहबए बसए अब इसी में कुशल है कि आप चले जाइएए नहीं तो खून हो जाएगा।

प्रभु सेवक—हमको कोई चरकटा समझ लिया है बदमाशए खून पी जाऊँगाए गाली देता है!

बजरंगी—बसए अब बहुत न बढ़़िएए यह उसी गाली का फल है कि आप यों खड़े हैंय नहीं तो अब तक न जाने क्या हो गया होता।

प्रभु सेवक क्रोधोन्माद से निकलकर विचार के क्षेत्र में पहुँच चुके थे। आकर फिटन पर बैठ गए और घोड़े को चाबुक माराए घोड़ा हवा हो गया।

बजरंगी ने जाकर नायकराम को उठाया। घुटनों में बहुत चोट आई थीए खड़ा न हुआ जाता था। मालूम होता थाए हड़डी टूट गई है। बजरंगी का कंधा पकड़कर धीरे—धीरे लँगड़ाते हुए घर चले।

ठाकुरदीन ने कहा—नायकरामए भला या बुराए भूल तुम्हारी थी। ये लोग गाली नहीं बर्दाश्त कर सकते।

नायकराम—अरेए तो मैंने गाली कब दी थी भाईए मैंने तो यही कहा था कि एक ही हाथ में किरस्तानी निकल जाएगी। बसए इसी पर बिगड़ गया।

जमुनी अपने द्वार पर खड़े—खड़े यह तमाशा देख रही थी। आकर बजरंगी को कोसने लगी—खड़े मुँह ताकते रहेए और वह लौंडा मार—पीटकर चला गयाए सारी पहलवानी धारी रह गई।

बजरंगी—मैं तो जैसे घबरा गया।

जमुनी—चुप भी रहो। लाज नहीं आती। एक लौंडा आकर सबको पछाड़ गया। यह तुम लोगों के घमंड की सजा है।

ठाकुरदीन—बहुत सच कहती हो जमुनीए यह कौतुक देखकर यही कहना पड़ता है कि भगवान को हमारे गरूर की सजा देनी थीए नहीं तो क्या ऐसे—ऐसे जोधा कठपुतलियों की भाँति खड़े रहते! भगवान्‌ किसी का घमंड नहीं रखते।

नायकराम—यही बात होगी भाईए मैं अपने घमंड में किसी को कुछ न समझता था।

ये बातें करते हुए लोग नायकराम के घर आए। किसी ने आग बनाईए कोई हल्दी पीसने लगा। थोड़ी देर में मुहल्ले के और लोग आकर जमा हो गए। सबको आश्चर्य होता था कि नायकराम—जैसा फेकैत और लठैत कैसे मुँह की खा गया। कहाँ सैकड़ों के बीच से बेदाग निकल आता थाए कहाँ एक लौंडे ने लथेड़ डाला। भगवान की मरजी है।

जगधार हल्दी का लेप करता हुआ बोला—यह सारी आग भैरों की लगाई हुई है। उसने रास्ते ही में साहब के कान भर दिए थे। मैंने तो देखाए उसकी जेब में पिस्तौल भी था।

नायकराम—पिस्तौल और बंदूक सब देखूँगाए अब तो लाग पड़ गई।

ठाकुरदीन—कोई अनुष्ठान करवा दिया जाए।

नायकराम—इसे बीच बाजार में फिटन रोककर मारूँगाए फिर कहीं मुँह दिखाने लायक न रहेगा। अब मन में यही ठन गई है।

सहसा भैरों आकर खड़ा हो गया। नायकराम ने ताना दिया—तुम्हें तो बड़ी खुशी हुई होगी भैरों!

भैरों—क्यों भैयाघ्

नायकराम—मुझ पर मार न पड़ी है!

भैरों—क्या मैं तुम्हारा दुसमन हूँ भैयाघ् मैंने तो अभी दूकान पर सुना। होस उड़ गए। साहब देखने में तो बहुत सीधा—सादा मालूम होता था। मुझसे हँस—हँसकर बातें कींए यहाँ आकर न जाने कौन भूत उस पर सवार हो गया।

नायकराम—उसका भूत मैं उतार दूँगाए अच्छी तरह उतार दूँगाए जरा खड़ा तो होने दो। हाँए जो कुछ राय होए उसकी खबर वहाँ न होने पाएए नहीं तो चौकन्ना हो जाएगा।

बजरंगी—यहाँ हमारा ऐसा कौन बैरी बैठा हुआ हैघ्

जगधार—यह न कहोए घर का भेदी लंका दाहे। कौन जानेए कोई आदमी साबासी लूटने के लिएए इनाम लेने के लिएए सुर्खरू बनने के लिएए वहाँ सारी बातें लगा आए!

भैरों—मुझी पर शक कर रहे हो नघ् तो मैं इतना नीच नहीं हूँ कि घर का भेद दूसरों में खोलता फिरूँ। इस तरह चार आदमी एक जगह रहते हैंए तो आपस में खटपट होती ही हैय लेकिन इतना कमीना नहीं हूँ कि भभीखन की भाँति अपने भाई के घर में आग लगवा दूँ। क्या इतना नहीं जानता कि मरने—जीने मेंए बिपत—सम्पत में मुहल्ले के लोग ही काम आते हैंघ् कभी किसी के साथ विश्वासघात किया हैघ् पंडाजी कह देंए कभी उनकी बात दुलखी हैघ् उनकी आड़ न होतीए तो पुलिस ने अब तक मुझे कब का लदवा दिया होताए नहीं तो रजिस्टर में नाम तक नहीं है।

नायकराम—भैरोंए तुमने अवसर पड़ने पर कभी साथ नहीं छोड़ाए इतना तो मानना ही पड़ेगा।

भैरों—पंडाजीए तुम्हारा हुक्म होए तो आग में कूद पड़ईँ।

इतने में सूरदास भी आ पहुँचा। सोचता आता था—आज कहाँ खाना बनाऊँगाए इसकी क्या चिंता हैय बसए नीम के पेड़ के नीचे बाटीयाँ लगाऊँगा। गरमी के तो दिन हैंए कौन पानी बरस रहा है। ज्यों ही बजरंगी के द्वार पर पहुँचा कि जमुनी ने आज का सारा वृत्तांत कह सुनाया। होश उड़ गए। उपले—ईंधान की सुधि न रही। सीधो नायकराम के यहाँ पहुँचा। बजरंगी ने कहा—आओ सूरेए बड़ी देर लगाईए क्या अभी चले आते होघ् आज तो यहाँ बड़ा गोलमाल हो गया।

सूरदास—हाँए जमुनी ने मुझसे कहा। मैं तो सुनते ही ठक रह गया।

बजरंगी—होनहार थीए और क्या। है तो लौंडाए पर हिम्मत का पक्का है। जब तक हम लोग हाँ—हाँ करेंए तब तक फिटन पर से कूद ही तो पड़ा और लगा हाथ—पर—हाथ चलाने।

सूरदास—तुम लोगों ने पकड़ भी न लियाघ्

बजरंगी—सुनते तो होए जब तक दौड़ेंए तब तक तो उसने हाथ चला ही दिया।

सूरदास—बड़े आदमी गाली सुनकर आपे से बाहर हो जाते हैं।

जगधार—जब बीच बाजार में बेभाव की पड़ेंगीए तब रोएँगे। अभी तो फूले न समाते होंगे।

बजरंगी—जब चौक में निकलेए तो गाड़ी रोककर जूतों से मारें।

सूरदास—अरेए अब जो हो गयाए सो हो गयाए उसकी आबरू बिगाड़ने से क्या मिलेगाघ्

नायकराम—तो क्या मैं यों ही छोड़ दूँगा! एक—एक बेंत के बदले अगर सौ—सौ जूते न लगाऊँ तो मेरा नाम नायकराम नहीं। यह चोट मेरे बदन पर नहींए मेरे कलेजे पर लगी है। बड़ों—बड़ों का सिर नीचा कर चुका हूँए इन्हें मिटाते क्या देर लगती है! (चुटकी बजाकर) इस तरह उड़ा दूँगा!

सूरदास—बैर बढ़़ाने से कुछ फायदा न होगा। तुम्हारा तो कुछ न बिगड़ेगाए लेकिन मुहल्ले के सब आदमी बँधा जाएँगे।

नायकराम—कैसी पागलों की—सी बातें करते हो। मैं कोई धुनिया—चमार हूँ कि इतनी बेइज्जती कराके चुप हो जाऊँघ् तुम लोग सूरदास को कायल क्यों नहीं करते जीघ् क्या चुप होके बैठ रहूँघ् बोलो बजरंगीए तुम लोग भी डर रहे हो कि वह किरस्तान सारे मुहल्ले को पीसकर पी जाएगाघ्

बजरंगी—औरों की तो मैं नहीं कहताए लेकिन मेरा बस चलेए तो उसके हाथ—पैर तोड़ दूँए चाहे जेहल ही क्यों न काटना पड़े। यह तुम्हारी बेइज्ज्ती नहीं हैए मुहल्ले भर के मुँह में कालिख लग गई है।

भैरों—तुमने मेरे मुँह से बात छीन ली। क्या कहूँए उस वक्त मैं न थाए नहीं तो हड़डी तोड़ डालता।

जगधार—पंडाजीए मुँह—देखी नहीं कहताए तुम चाहे दूसरों के कहने—सुनने में आ जाओए लेकिन मैं बिना उसकी मरम्मत किए न मानूँगा।

इस पर कई आदमियों ने कहा—मुखिया की इज्जत गईए तो सबकी गई। वही तो किरस्तान हैंए जो गली—गली ईसा मसीह के गीत गाते फिरते हैं। डोमड़ाए चमारए जो गिरजा में जाकर खाना खा लेए वही किरस्तान हो जाता है। वही बाद को कोट—पतलून पहनकर साहब बन जाते हैं।

ठाकुरदीन—मेरी तो सलाह यही है कि कोई अनुष्ठान कर दिया जाए।

नायकराम—अब बताओ सूरेए तुम्हारी बात मानूँ या इतने आदमियों कीघ् तुम्हें यह डर होगा कि कहीं मेरी जमीन पर अॉंच न आ जाएए तो इससे तुम निश्चिंत रहो। राजा साहब ने जो बात कह दीए उसे पत्थर की लकीर समझो। साहब सिर रगड़कर मर जाएँए तो भी अब जमीन नहीं पा सकते।

सूरदास—जमीन की मुझे चिंता नहीं है। मरूँगाए तो सिर पर लाद थोड़े ही ले जाऊँगा। पर अंत में यह सारा पाप मेरे ही सिर पड़ेगा। मैं ही तो इस सारे तूफान की जड़ हूँए मेरे ही कारन तो यह रगड़—झगड़ मची हुई हैए नहीं तो साहब को तुमसे कौन दुसमनी थी।

नायकराम—यारोए सूरे को समझाओ।

जगधार—सूरेए सोचोए हम लोगों की कितनी बेआबरूई हुई है!

सूरदास—आबरू को बनाने—बिगाड़नेवाला आदमी नहीं हैए भगवान्‌ है। उन्हीं की निगाह में आबरू बनी रहनी चाहिए। आदमियों की निगाह में आबरू की परख कहाँ है। जब सूद खानेवाला बनियाए घूस लेनेवाला हाकिम और झूठ बोलनेवाला गवाह बेआबरू नहीं समझा जाताए लोग उसका आदर—मान करते हैंए तो यहाँ सच्ची आबरू की कदर करने वाला कोई है ही नहीं।

बजरंगी—तुमसे कुछ मतलब नहींए हम लोग जो चाहेंगेए करेंगे।

सूरदास—अगर मेरी बात न मानोगेए तो मैं जाके साहब से सारा माजरा कह सुनाऊँगा।

नायकराम—अगर तुमने उधार पैर रखाए तो याद रखनाए वहीं खोदकर गाड़ दूँगा। तुम्हें अंधा—अपाहिज समझकर तुम्हारी मुरौवत करता हूँए नहीं तो तुम हो किस खेत की मूली! क्या तुम्हारे कहने से अपनी इज्जत गँवा दूँए बाप—दादों के मुँह में कालिख लगवा दूँ! बड़े आए हो वहाँ से ज्ञानी बनके। तुम भीख माँगते होए तुम्हें अपनी इज्जत की फिकिर न होए यहाँ तो आज तक पीठ में धूल नहीं लगी।

सूरदास ने इसका कुछ जवाब न दिया। चुपके से उठा और मंदिर के चबूतरे पर जाकर लेट गया। मिठुआ प्रसाद के इंतजार में वहीं बैठा हुआ था। उसे पैसे निकालकर दिए कि सत्तू —गुड़ खा ले। मिठुआ खुश होकर बनिए की दूकान की ओर दौड़ा। बच्चों को सत्तू और चबेना रोटीयों से अधिक प्रिय होता है।

सूरदास के चले जाने के बाद कुछ देर तक लोग सन्नाटे में बैठे रहे। उसके विरोध ने उन्हें संशय में डाल दिया था। उसकी स्पष्टवादिता से सब लोग डरते थे। यह भी मालूम था कि वह जो कुछ कहता हैए उसे पूरा कर दिखाता है। इसलिए आवश्यक था कि पहले सूरदास से निबट लिया जाए। उसे कायल करना मुश्किल था। धमकी से भी कोई काम न निकल सकता था। नायकराम ने उस पर लगे हुए कलंक का समर्थन करके उसे परास्त करने का निश्चय किया। बोला—मालूम होता हैए उन लोगों ने अंधे को फोड़ लिया है।

भैरों—मुझे भी यही संदेह होता है।

जगधार—सूरदास फूटनेवाला आदमी नहीं है।

बजरंगी—कभी नहीं।

ठाकुरदीन—ऐसा स्वभाव तो नहीं हैए पर कौन जाने। किसी की नहीं चलाई जाती। मेरे ही घर चोरी हुईए तो क्या बाहर के चोर थेघ् पड़ोसियों की करतूत थी। पूरे एक हजार का माल उठ गया। और वहीं के लोगए जिन्होंने माल उड़ायाए अब तक मेरे मित्र बने हुए हैं। आदमी का मन छिन—भर में क्या से क्या हो जाता है!

नायकराम—शायद जमीन का मामला करने पर राजी हो गया होय पर साहब ने इधार अॉंख उठाकर भी देखाए तो बँगले में आग लगा दूँगा। (मुस्कराकर) भैरों मेरी मदद करेंगे ही।

भैरों—पंडाजीए तुम लोग मेरे ऊपर सुभा करते होए पर मैं जवानी की कसम खाता हूँए जो उसके झोंपड़े के पास भी गया होऊँ। जगधार मेरे यहाँ आते—जाते हैंए इन्हीं से ईमान से पूछिए।

नायकराम—जो आदमी किसी की बहू—बेटी पर बुरी निगाह करेए उसके घर में आग लगाना बुरा नहीं। मुझे पहले तो विश्वास नहीं आता थायपर आज उसके मिजाज का रंग बदला हुआ है।

बजरंगी—पंडाजीए सूर को तुम आज 30 बरसों से देख रहे हो। ऐसी बात न कहो।

जगधार—सूरे में और चाहे जितनी बुराइयाँ होंए यह बुराई नहीं है।

भैरों—मुझे ऐसा जान पड़ता है कि हमने हक—नाहक उस पर कलंक लगाया। सुभागी आज सबेरे आकर मेरे पैरों पर गिर पड़ी और तब से घर से बाहर नहीं निकली। सारे दिन अम्माँ की सेवा—टहल करती रही।

यहाँ तो ये बातें होती रहीं कि प्रभु सेवक का सत्कार क्योंकर किया जाएगा। उसी के कार्यक्रम का निश्चय होता रहा। उधार प्रभु सेवक घर चलेए तो आज के कृत्य पर उन्हें वह संतोष न थाए जो सत्कार्य का सबसे बड़ा इनाम है। इसमें संदेह नहीं कि उनकी आत्मा शांत थी।

कोई भला आदमी अपशब्दों को सहन नहीं कर सकताए और न करना ही चाहिए। अगर कोई गालियाँ खाकर चुप रहेए तो इसका अर्थ यही है कि वह पुरुषार्थहीन हैए उसमें आत्माभिमान नहीं। गालियाँ खाकर भी जिसके खून में जोश न आएए वह जड़ हैए पशु हैए मृतक है।

प्रभु सेवक को खेद यह थी कि मैंने यह नौबत आने ही क्यों दी। मुझे उनसे मैत्री करनी चाहिए थी। उन लोगों को ताहिर अली के गले मिलाना चाहिए थाय पर यह समय—सेवा किससे सीखूँघ् उँह! ये चालें वह चलेए जिसे फैलने की अभिलाषा होए यहाँ तो सिमटकर रहना चाहते हैं। पापा सुनते ही झल्ला उठेंगे। सारा इलजाम मेरे सिर मढ़़ेंगे। मैं बुध्दिहीनए विचारहीनए अनुभवहीन प्राणी हूँ। अवश्य हूँ। जिसे संसार में रहकर सांसारिकता का ज्ञान न होए वह मंदबुध्दि है। पापा बिगड़ेंगेए मैं शांत भाव से उनका क्रोध सह लूँगा। अगर वह मुझसे निराश होकर यह कारखाना खोलने का विचार त्याग देंए तो मैं मुँह—माँगी मुराद पा जाऊँ।

किंतु प्रभु सेवक को कितना आश्चर्य हुआए जब सारा वृत्तांत सुनकर भी जॉन सेवक के मुख पर क्रोध का कोई लक्षण न दिखाई दियाय यह मौन व्यंग्य और तिरस्कार से कहीं ज्यादा दुस्सह था। प्रभु सेवक चाहते थे कि पापा मेरी खूब तम्बीह करेंए जिसमें मुझे अपनी सफाई देने का अवसर मिलेए मैं सिध्द कर दूँ कि इस दुर्घटना का जिम्मेदार मैं नहीं हूँ। मेरी जगह कोई दूसरा आदमी होताए तो उसके सिर भी यही विपत्ति पड़ती। उन्होंने दो—एक बार पिता के क्रोध को उकसाने की चेष्टा कीय किंतु जॉन सेवक ने केवल एक बार उन्हें तीव्र द्रष्टि से देखाए और उठकर चले गए। किसी कवि की यशेच्छा श्रोताओं के मौन पर इतनी मर्माहत न हुई होगी।

मिस्टर जॉन सेवक छलके हुए दूध पर अॉंसू न बहाते थे। प्रभु सेवक के कार्य की तीव्र आलोचना करना व्यर्थ था।वह जानते थे कि इसमें आत्मसम्मान कूट—कूटकर भरा हुआ है। उन्होंने स्वयं इस भाव का पोषण किया था। सोचने लगे—इस गुत्थी को कैसे सुलझाऊँघ् नायकराम मुहल्ले का मुखिया है। सारा मुहल्ला इसके इशारों का गुलाम है। सूरदास तो केवल स्वर भरने के लिए है। औरए नायकराम मुखिया ही नहींए शहर का मशहूर गुंडा भी है। बड़ी कुशल हुई कि प्रभु सेवक वहाँ से जीता—जागता लौट आया। राजा साहब बड़ी मुश्किलों से सीधो हुए थे! नायकराम उनके पास जरूर फरियाद करेगाए अबकी हमारी ज्यादती साबित होगी। राजा साहब को पूँजीवालों से यों ही चिढ़़ हैए यह कथा सुनते ही जामे से बाहर हो जाएँगे। फिर किसी तरह उनका मुँह सीधा न होगा। सारी रात जॉन सेवक इसी उधोड़बुन में पड़े रहे। एकाएक उन्हें एक बात सूझी। चेहरे पर मुस्कराहट की झलक दिखाई दी। सम्भव हैए यह चाल सीधी पड़ जाएए तो फिर बिगड़ा हुआ काम सँवर जाए। सुबह को हाजिरी खाने के बाद फिटन तैयार कराई और पाँड़ेपुर चल दिए।

नायकराम ने पैरों में पट्टियाँ बाँध ली थींए शरीर में हल्दी की मालिश कराए हुए थेए एक डोली मँगवा रखी थी और राजा महेंद्रकुमार के पास जाने को तैयार थे। अभी मुहूर्त में दो—चार पल की कसर थी। बजरंगी और जगधार साथ जानेवाले थे। सहसा फिटन पहुँचीए तो लोग चकित हो गए। एक क्षण में सारा मुहल्ला आकर जमा हो गयाए आज क्या होगाघ्

जॉन सेवक नायकराम के पास जाकर बोले—आप ही का नाम नायकराम पाँड़े है नघ् मैं आपसे कल की बातों के लिए क्षमा माँगने आया हूँ। लड़के ने ज्यों ही मुझसे यह समाचार कहाए मैंने उसको खूब डाँटाए और रात ज्यादा न हो गई होतीए तो मैं उसी वक्त आपके पास आया होता। लड़का कुमार्गी और मूर्ख है। कितना ही चाहता हूँ कि उसमें जरा आदमीयत आ जाएए पर ऐसी उलटी समझ है कि किसी बात पर धयान ही नहीं देता। विद्या पढ़़ने के लिए विलायत भेजाए वहाँ से भी पास हो आयाय पर सज्जनता न आई। उसकी नादानी का इससे बढ़़कर और क्या सबूत होगा कि इतने आदमियों के बीच में वह आपसे बेअदबी कर बैठा। अगर कोई आदमी शेर पर पत्थर फेंकेए तो उसकी वीरता नहींए उसका अभिमान भी नहींए उसकी बुध्दिहीनता है। ऐसा प्राणी दया के योग्य हैय क्योंकि जल्द या देर में वह शेर के मुँह का ग्रास बन जाएगा। इस लौंडे की ठीक यही दशा है। आपने मुरौवत न की होतीए क्षमा से न काम लिया होताए तो न जाने क्या हो जाता। जब आपने इतनी दया की हैए तो दिल से मलाल भी निकाल डालिए।

नायकराम चारपाई पर लेट गएए मानो खड़े रहने में कष्ट हो रहा हैए और बोले—साहबए दिल से मलाल तो न निकलेगाए चाहे जान निकल जाए। इसे हम लोगों की मुरौवत कहिएए चाहे उनकी तकदीर कहिए कि वह यहाँ से बेदाग चले गएय लेकिन मलाल तो दिल में बना हुआ है। वह तभी निकलेगाए जब या तो मैं न रहूँगा या वह न रहेंगे। रही भलमनसीए भगवान्‌ ने चाहा तो जल्द ही सीख जाएँगे। बसए एक बार हमारे हाथ में फिर पड़ जाने दीजिए। हमने बड़े—बड़े को भलामानुस बना दियाए उनकी क्या हस्ती है।

जॉन सेवक—अगर आप इतनी आसानी से उसे भलमनसी सिखा सकेंए तो कहिए आप ही के पास भेज दूँय मैं तो सब कुछ करके हार गया।

नायकराम—बोलो भाई बजरंगीए साहब की बातों का जवाब दोए मुझसे तो बोला नहीं जाताए रात कराह—कराहकर काटी है। साहब कहते हैंए माफ कर दोए दिल में मलाल न रखो। मैं तो यह सब व्यवहार नहीं जानता। यहाँ तो ईंट का जवाब पत्थर से देना सीखा है।

बजरंगी—साहब लोगों का यही दस्तूर है। पहले तो मारते हैंए और जब देखते हैं कि अब हमारे ऊपर भी मार पड़ा चाहती हैए तो चट कहते हैंए माफ कर दोय यह नहीं सोचते कि जिसने मार खाई हैए उसे बिन मारे कैसे तस्कीन होगी।

जॉन सेवक—तुम्हारा यह कहना ठीक हैए लेकिन यह समझ लो कि क्षमा बदले के भय से नहीं माँगी जाती। भय से आदमी छिप जाता हैए दूसरों की मदद माँगने दौड़ता हैए क्षमा नहीं माँगता। क्षमा आदमी उसी वक्त माँगता हैए जब उसे अपने अन्याय और बुराई का विश्वास हो जाता हैए और जब उसकी आत्मा उसे लज्जित करने लगती है। प्रभु सेवक से तुम माफी माँगने को कहोए तो कभी न राजी होगा। तुम उसकी गरदन पर तलवार चलाकर भी उसके मुँह से क्षमा—याचना का एक शब्द नहीं निकलवा सकते। अगर विश्वास न होए तो इसकी परीक्षा कर लोए इसका कारण यही है कि वह समझता हैए मैंने कोई ज्यादती नहीं की। वह कहता हैए मुझे उन लोगों ने गालियाँ दीं। लेकिन मैं इसे किसी तरह नहीं मान सकता कि आपने उसे गालियाँ दी होंगी। शरीफ आदमी न गालियाँ देता हैए न गालियाँ सुनता है। मैं जो क्षमा माँग रहा हूँए वह इसलिए कि मुझे यहाँ सरासर उसकी ज्यादती मालूम होती है। मैं उसके दुर्वव्यवहार पर लज्जित हूँए और मुझे इसका दुरूख है कि मैंने उसे यहाँ क्यों आने दिया। सच पूछिएए तो अब मुझे यही पछतावा हो रहा है कि मैंने इस जमीन को लेने की बात ही क्यों उठाई। आप लोगों ने मेरे गुमाश्ते को माराए मैंने पुलिस में रपट तक न की। मैंने निश्चय कर लिया कि अब इस जमीन का नाम न लूँगा। मैं आप लोगों को कष्ट नहीं देना चाहताए आपको उजाड़कर अपना घर नहीं बनाना चाहता। अगर तुम लोग खुशी से दोगे तो लूँगाए नहीं तो छोड़ दूँगा। किसी का दिल दुरूखाना सबसे बड़ा अधर्म कहा गया है। जब तक आप लोग मुझे क्षमा न करेंगेए मेरी आत्मा को शांति न मिलेगी।

उद्दंडता सरलता का केवल उग्र रूप है। साहब के मधुर वाक्यों ने नायकराम का क्रोध शांत कर दिया। कोई दूसरा आदमी इतनी ही आसानी से उसे साहब की गरदन पर तलवार चलाने के लिए उत्तोजित कर सकता थाय सम्भव थाए प्रभु सेवक को देखकर उसके सिर पर खून सवार हो जाताय पर इस समय साहब की बातों ने उसे मंत्रमुग्धा—सा कर दिया। बोला—कहो बजरंगीए क्या कहते होघ्

बजरंगी—कहना क्या हैए जो अपने सामने मस्तक नवातेए उसके सामने मस्तक नवाना ही पड़ता है। साहब यह भी तो कहते हैं कि अब इस जमीन से कोई सरोकार न रखेंगेए तो हमारे और इनके बीच में झगड़ा ही क्या रहाघ्

जगधार—हाँए झगड़े का मिट जाना ही अच्छा है। बैर—विरोध से किसी का भला नहीं होता।

भैंरों के—छोटे साहब को चाहिए कि आकर पंडाजी से खता माफ करावें। अब वह कोई बालक नहीं हैं कि आप उनकी ओर से सिपारिस करें। बालक होतेए तो दूसरी बात थीए तब हम लोग आप ही को उलाहना देते। वह पढ़़े—लिखे आदमी हैंए मूँछ—दाढ़़ी निकल आई है। उन्हें खुद आकर पंडाजी से कहना—सुनना चाहिए।

नायकराम—हाँए यह बात पक्की है। जब तक वह थूककर न चाटेंगेए मेरे दिल से मलाल न निकलेगा।

जॉन सेवक—तो तुम समझते हो कि दाढ़़ी—मूँछ आ जाने से बुध्दि आ जाती हैघ् क्या ऐसे आदमी नहीं देखे हैंए जिनके बाल पक गए हैंए दाँत टूट गए हैंए और अभी तक अक्ल नहीं आईघ् प्रभु सेवक अगर बुध्दू न होताए तो इतने आदमियों के बीच में और पंडाजी—जैसे पहलवान पर हाथ न उठाता। उसे तुम कितना ही दबाओए पर मुआफी न माँगेगा। रही जमीन की बातए अगर तुम लोगों की मरजी है कि मैं इस मुआमले को दबा रहने दूँए तो यही सही। पर शायद अभी तक तुम लोगों ने इस समस्या पर विचार नहीं कियाए नहीं तो कभी विरोध न करते। बतलाइए पंडाजीए आपको क्या शंका हैघ्

नायकराम—भैंरों केए इसका जवाब दो। अब तो साहब ने तुमको कायल कर दिया!

भैरों—कायल क्या कर दियाए साहब यही कहते हैं न कि छोटे साहब को अक्कल नहीं हैय तो वह कुएँ में क्यों नहीं कूद पड़तेए अपने दाँतों से अपना हाथ क्यों नहीं काट लेतेघ् ऐसे आदमियों को कोई कैसे पागल समझ लेघ्

जॉन सेवक—जो आदमी न समझे कि किस मौके पर कौन काम करना चाहिएए किस मौके पर कौन बात करनी चाहिएए वह पागल नहीं तो और क्या हैघ्

नायकराम—साहबए उन्हें मैं पागल तो किसी तरह न मानूँगा। हाँ आपका मुँह देखके उनसे बैर न बढ़़ाऊँगा। आपकी नम्रता ने मेरा सिर झुका दिया है। सच कहता हूँए आपकी भलमनसी और शराफत ने मेरा गुस्सा ठंडा कर दियाए नहीं तो मेरे दिल में न जाने कितना गुबार भरा हुआ था। अगर आप थोड़ी देर और न आतेए तो आज शाम तक छोटे साहब अस्पताल में होते। आज तक कभी मेरी पीठ में धूल नहीं लगी। जिंदगी में पहली बार मेरा इतना अपमान हुआ और पहली बार मैंने क्षमा करना भी सीखा। यह आपकी बुध्दि की बरकत है। मैं आपकी खोपड़ी को मान गया। अब साहब की दूसरी बात का जवाब दो बजरंगी।

बजरंगी—उसमें अब काहे का सवाल—जवाब। साहब ने तो कह दिया कि मैं उसका नाम न लूँगा। बसए झगड़ा मिट गया।

जॉन सेवक—लेकिन अगर उस जमीन के मेरे हाथ में आने से तुम्हारा सोलहों आने फायदा होए तो भी तुम हमें न लेने दोगेघ्

बजरंगी—हमारा फायदा क्या होगाए हम तो मिट्टी में मिल जाएँगे।

जॉन सेवक—मैं तो दिखा दूँगा कि यह तुम्हारा भ्रम है। बतलाओए तुम्हें क्या एतराज हैघ्

बजरंगी—पंडाजी के हजारों यात्री आते हैंए वे इसी मैदान में ठहरते हैं। दस—दसए बीस—बीस दिन पड़े रहते हैंए वहीं खाना बनाते हैंए वहीं सोते भी हैं। सहर के धरमसालों में देहात के लोगों को आराम कहाँघ् यह जमीन न रहेए तो कोई यात्री यहाँ झाँकने भी न आए।

जॉन सेवक—यात्रीयों के लिएए सड़क के किनारेए खपरैल के मकान बनवा दिए जाएँए तो कैसाघ्

बजरंगी—इतने मकान कौन बनवाएगाघ्

जॉन सेवक—इसका मेरा जिम्मा। मैं वचन देता हूँ कि यहाँ धर्मशाला बनवा दूँगा।

बजरंगी—मेरी और मुहल्ले के आदमियों की गायें—भैंसे कहाँ चरेंगीघ्

जॉन सेवक—अहाते में घास चराने का तुम्हें अख्तियार रहेगा। फिरए अभी तुम्हें अपना सारा दूध लेकर शहर जाना पड़ता है। हलवाई तुमसे दूध लेकर मलाईए मक्खनए दही बनाता हैए और तुमसे कहीं ज्यादा सुखी है। यह नफा उसे तुम्हारे ही दूध से तो होता है! तुम अभी यहाँ मलाई—मक्खन बनाओए तो लेगा कौनघ् जब यहाँ कारखाना खुल जाएगाए तो हजारों आदमियों की बस्ती हो जाएगीए तुम दूध की मलाई बेचोगेए दूध अलग बिकेगा। इस तरह तुम्हें दोहरा नफा होगा। तुम्हारे उपले घर बैठे बिक जाएँगे। तुम्हें तो कारखाना खुलने से सब नफा—ही—नफा है।

नायकराम—आता है समझ में न बजरंगीघ्

बजरंगी—समझ में क्यों नहीं आताए लेकिन एक मैं दूध की मलाई बना लूँगाए और लोग भी तो हैंए दूध खाने के लिए जानवर पाले हुए हैं। उन्हें तो मुसकिल पड़ेगी।

ठाकुरदीन—मेरी ही एक गाय है। चोरों का बस चलताए तो इसे भी ले गए होते। दिन—भर वह चरती है। साँझ सबेरे दूध दुहकर छोड़ देता हूँ। धोले का भी चारा नहीं लेना पड़ता। तब तो आठ आने रोज का भूसा भी पूरा न पड़ेगा।

जॉन सेवक—तुम्हारी पान की दूकान है नघ् अभी तुम दस—बारह आने पैसे कमाते होगे। तब तुम्हारी बिक्री चौगुनी हो जाएगी। इधार की कमी उधार पूरी हो जाएगी। मजदूरों को पैसे की पकड़ नहीं होतीय काम से जरा फुरसत मिली कि कोई पान पर गिराय कोई सिगरेट पर दौड़ा। खोंचेवाले की खासी बिक्री होगीए और शराब—ताड़ी का पूछना ही क्याए चाहो तो पानी को शराब बनाकर बेचो। गाड़ीवालों की मजदूरी बढ़़ जाएगी। यही मोहल्ला चौक की भाँति गुलजार हो जाएगा। तुम्हारे लड़के अभी शहर पढ़़ने जाते हैंए तब यहीं मदरसा खुल जाएगा।

जगधार—क्या यहाँ मदरसा भी खुलेगाघ्

जॉन सेवक—हाँए कारखाने के आदमियों के लड़के आखिर पढ़़ने कहाँ जाएँगेघ् अंगरेजी भी पढ़़ाई जाएगी।

जगधर—फीस कुछ कम ली जाएगीघ्

जॉन सेवक—फीस बिलकुल ही न ली जाएगीए कम—ज्यादा कैसी!

जगधार—तब तो बड़ा आराम हो जाएगा।

नायकराम—जिसका माल हैए उसे क्या मलेगाघ्

जॉन सेवक—जो तुम लोग तय कर दो। मैं तुम्हीं को पंच मानता हूँ। बसए उसे राजी करना तुम्हारा काम है।

नायकराम—वह राजी ही है। आपने बात—की—बात में सबको राजी कर लियाए नहीं तो यहाँ लोग मन में न जाने क्या—क्या समझे बैठे थे। सच हैए विद्या बड़ी चीज है।

भैरों—वहाँ ताड़ी की दूकान के लिए कुछ देना तो न पड़ेगाघ्

नायकराम—कोई और खड़ा हो गयाए तो चढ़़ा—ऊपरी होगी ही।

जॉन सेवक—नहींए तुम्हारा हक सबसे बढ़़कर समझा जाएगा।

नायकराम—तो फिर तुम्हारी चाँदी है भैरों!

जॉन सेवक—तो अब मैं चलूँ पंडाजीए अब आपके दिल में मलाल तो नहीं हैघ्

नायकराम—अब कुछ कहलाइए नए आपका—सा भलामानुस आदमी कम देखा।

जॉन सेवक चले गए तो बजरंगी ने कहा—कहीं सूरे राजी न हुएए तोघ्

नायकराम—हम तो राजी करेंगे! चार हजार रुपये दिलाने चाहिए। अब इसी समझौते में कुशल है। जमीन रह नहीं सकती। यह आदमी इतना चतुर है कि इससे हम लोग पेस नहीं पा सकते। यों निकल जाएगी तो हमारे साथ यह सलूक कौन करेगाघ् सेंत में जस मिलता होए तो छोड़ना न चाहिए।

जॉन सेवक घर पहुँचे तो डिनर तैयार था। प्रभु सेवक ने पूछा—आप कहाँ गए थेघ् जॉन सेवक ने रूमाल से मुँह पोंछते हुए कहा—हरएक काम करने की तमीज चाहिए। कविता रच लेना दूसरी बात हैए काम कर दिखाना दूसरी बात। तुम एक काम करने गएए मोहल्ले—भर से लड़ाई ठानकर चले आए। जिस समय मैं पहुँचा हूँए सारे आदमी नायकराम के द्वार पर जमा थे। वह डोली में बैठकर शायद राजा महेंद्रसिंह के पास जाने को तैयार था। मुझे सबों ने यों देखा जैसे फाड़ जाएँगे। लेकिन मैंने कुछ इस तरह धैर्य और विनय से काम लियाए उन्हें दलीलों और चिकनी—चुपड़ी बातों में ऐसा ढ़र्रे पर लाया कि जब चलाए तो सब मेरा गुणानुवाद कर रहे थे। जमीन का मुआमला भी तय हो गया। उसके मिलने में अब कोई बाधा नहीं है।

प्रभु सेवक—पहले तो सब उस जमीन के लिए मरने—मारने पर तैयार थे।

जॉन सेवक—और कुछ कसर थीए तो वह तुमने जाकर पूरी कर दी। लेकिन याद रखोए ऐसे विषयों में सदैव मार्मिक अवसर पर निगाह रखनी चाहिए। यही सफलता का मूल—मंत्र है। शिकारी जानता हैए किस वक्त हिरन पर निशाना मारना चाहिए। वकील जानता हैए अदालत पर कब उसकी युक्तियों का सबसे अधिक प्रभाव पड़ सकता है। एक महीना नहींए एक दिन पहलेए मेरी बातों का इन आदमियों पर जरा भी असर न होता। कल तुम्हारी उद्दंडता ने वह अवसर प्रस्तुत कर दिया। मैं क्षमाप्रार्थी बनकर उनके सामने गया। मुझे दबकरए झुककरए दीनता सेए नम्रता से अपनी समस्या को उनके सम्मुख उपस्थित करने का अवसर मिला। यदि उनकी ज्यादती होतीए तो मेरी ओर से भी कड़ाई की जाती। उस दशा में दबना नीति और आचरण के विरुध्द होता। ज्यादती हमारी ओर से हुईए बस यही मेरी जीत थी।

ईश्वर सेवक बोले—ईश्वरए इस पापी को अपनी शरण में ले। बर्फ आजकल बहुत महँगी हो गई हैए फिर समझ में नहीं आताए क्यों इतनी निर्दयता से खर्च की जाती है। सुराही का पानी काफी ठंडा होता है।

जॉन सेवक—पापाए क्षमा कीजिएए बिना बर्फ के प्यास ही नहीं बूझती।

ईश्वर सेवक—खुदा ने चाहा बेटाए तो उस जमीन का मुआमला तय हो जाएगा। आज तुमने बड़ी चतुरता से काम किया।

मिसेज सेवक—मुझे इन हिंदुस्तानियों पर विश्वास नहीं आता। दगाबाजी कोई इनसे सीख ले। अभी सब—के—सब हाँ—हाँ कह रहे हैंए मौका पड़ने पर सब निकल जाएँगे। महेंद्रसिंह ने नहीं धोखा दियाघ् यह जाति ही हमारी दुश्मन है। इनका वश चलेए तो एक ईसाई भी मुल्क में न रहने पाए।

प्रभु सेवक—मामाए यह आपका अन्याय हैघ् पहले हिंदुस्तानियों की ईसाइयों से कितना ही द्वेष रहा होए किंतु अब हालत बदल गई है। हम खुद अंगरेजों की नकल करके उन्हें चिढ़़ाते हैं। प्रत्येक अवसर पर अंगरेजों की सहायता से उन्हें दबाने की चेष्टा करते हैं। किंतु यह हमारी राजनीतिक भ्रांति है। हमारा उध्दार देशवासियों से भ्रातृभाव रखने में हैए उन पर रोब जमाने में नहीं। आखिर हम भी तो इसी जननी की संतान हैं। यह असम्भव है कि गोरी जातियाँ केवल धर्म के नाते हमारे साथ भाईचारे का व्यवहार करें। अमेरिका के हबशी ईसाई हैंए लेकिन अमेरिका के गोरे उनके साथ कितना पाशविक और अत्याचारपूर्ण बर्ताव करते हैं! हमारी मुक्ति भारतवासियों के साथ है।

मिसेज सेवक—खुदा वह दिन न लाए कि हम इन विधार्मियों की दोस्ती को अपने उध्दार का साधान बनाएँ। हम शासनाधिकारियों के सहधार्मी हैं। हमारा धर्मए हमारी रीति—नीतिए हमारा आहार—व्यवहार अंगरेजों के अनुकूल है। हम और वे एक कलिसिया मेंए एक परमात्मा के सामनेए सिर झुकाते हैं। हम इस देश में शासक बनकर रहना चाहते हैंए शासित बनकर नहीं। तुम्हें शायद कुँवर भरतसिंह ने यह उपदेश दिया है। कुछ दिन और उनकी सोहबत रहीए तो शायद तुम भी ईसू से विमुख हो जाओ।

प्रभु सेवक—मुझे तो ईसाइयों में जागृति के विशेष लक्षण नहीं दिखाई देते।

जॉन सेवक—प्रभु सेवकए तुमने बड़ा गहन विषय छेड़ दिया। मेरे विचार में हमारा कल्याण अंगरेजों के साथ मेल—जोल करने में है। अंगरेज इस समय भारतवासियों की संयुक्त शक्ति से चिंतित हो रहे हैं। हम अंगरेजों से मैत्री करके उन पर अपनी राजभक्ति का सिक्का जमा सकते हैंए और मनमाने स्वत्व प्राप्त कर सकते हैं। खेद यही है कि हमारी जाति ने अभी तक राजनीतिक क्षेत्र में पग ही नहीं रखा। यद्यपि देश में हम अन्य जातियों से शिक्षा में कहीं आगे बढ़़े हुए हैंय पर अब तक राजनीति पर हमारा कोई प्रभाव नहीं है। हिंदुस्तानियों में मिलकर हम गुम हो जाएँगेए खो जाएँगे। उनसे पृथक्‌ रहकर विशेष अधिकार और विशेष सम्मान प्राप्त कर सकते हैं।

ये ही बातें हो रही थीं कि एक चपरासी ने आकर एक खत दिया। यह जिलाधीश मिस्टर क्लार्क का खत था। उनके यहाँ विलायत से कई मेहमान आए हुए थे। क्लार्क ने उनके सम्मान में एक डिनर दिया थाए और मिसेज सेवक तथा मिस सोफिया सेवक को उसमें सम्मिलित होने के लिए निमंत्रित किया था। साथ ही मिसेज सेवक से विशेष अनुरोध भी किया था कि सोफिया को एक सप्ताह के लिए अवश्य बुला लीजिए।

चपरासी के चले जाने के बाद मिसेज सेवक ने कहा—सोफी के लिए यह स्वर्ण—संयोग है।

जॉन सेवक—हाँए है तोय पर वह आएगी कैसेघ्

मिसेज सेवक—उसके पास यह पत्र भेज दूँघ्

जॉन सेवक—सोफी इसे खोलकर देखेगी भी नहीं। उसे जाकर लिवा क्यों न हीं लातींघ्

मिसेज सेवक—वह तो आती ही नहीं।

जॉन सेवक—तुमने कभी बुलाया ही नहींए आती क्योंकरघ्

मिसेज सेवक—वह आने के लिए कैसी शर्त लगाती है!

जॉन सेवक—अगर उसकी भलाई चाहती होए तो अपनी शतोर्ं को तोड़ दो।

मिसेज सेवक—वह गिरजा न जाएए तो भी जबान न खोलूँघ्

जॉन सेवक—हजारों ईसाई कभी गिरजा नहीं जातेए और अंगरेज तो बहुत कम आते हैं।

मिसेज सेवक—प्रभु मसीह की निंदा करेए तो भी चुप रहूँघ्

जॉन सेवक—वह मसीह की निंदा नहीं करतीए और न कर सकती है। जिसे ईश्वर ने जरा भी बुध्दि दी हैए वह प्रभु मसीह का सच्चे दिल से सम्मान करेगा। हिंदू तक ईसू का नाम आदर के साथ लेते हैं। अगर सोफी मसीह को अपना मुक्तिदाताए ईश्वर का बेटा या ईश्वर नहीं समझतीए तो उस पर जब्र क्यों किया जाएघ् कितने ही ईसाइयों को इस विषय में शंकाएँ हैं चाहे वे उन्हें भयवश प्रकट न करें। मेरे विचार में अगर कोई प्राणी अच्छे कर्म करता है और शुध्द विचार रखता हैए तो वह उस मसीह के उस भक्त से कहीं श्रेष्ठ हैए जो मसीह का नाम तो जपता हैए पर नीयत का खराब है।

ईश्वर सेवक—या खुदाए इस खानदान पर अपना साया फैला। बेटाए ऐसी बातें जबान से न निकालो। मसीह का दास कभी सन्मार्ग से नहीं फिर सकता। उस पर प्रभु मसीह की दयाद्रष्टि रहती है।

जॉन सेवक—(स्त्री से) तुम कल सुबह चली जाओए रानी से भेंट भी हो जाएगी और सोफी को भी लेती आओगी।

मिसेज सेवक—अब जाना ही पड़ेगा। जी तो न हीं चाहताय पर जाऊँगी। उसी की टेक रहे!

सूरदास संध्या समय घर आयाए और सब समाचार सुनेए तो नायकराम से बोला—तुमने मेरी जमीन साहब को दे दीघ्

नायकराम—मैंने क्यों दीघ् मुझसे वास्ताघ्

सूरदास—मैं तो तुम्हीं को सब कुछ समझता था और तुम्हारे ही बल पर कूदता थाए पर आज तुमने भी साथ छोड़ दिया। अच्छी बात है। मेरी भूल थी कि तुम्हारे बल पर फूला हुआ था। यह उसी की सजा है। अब न्याय के बल पर लड़ूँगाए भगवान ही का भरोसा करूँगा।

नायकराम—बजरंगीए जरा भैरों को बुला लोए इन्हें सब बातें समझा दें। मैं इनसे कहाँ तक मगज लगाऊँ।

बजरंगी—भैरों को क्यों बुला लँए क्या मैं इतना भी नहीं कर सकता। भैरों को इतना सिर चढ़़ा दियाए इसी से तो उसे घमंड हो गया है।

यह कहकर बजरंगी ने जॉन सेवक की सारी आयोजनाएँ कुछ बढ़़ा—घटाकर बयान कर दीं और बोला बताओए जब कारखाने से सबका फायदा हैए तो हम साहब से क्यों लड़ेंघ्

सूरदास—तुम्हें विश्वास हो गया कि सबका फायदा होगाघ्

बजरंगी—हाँए हो गया। मानने—लायक बात होती हैए तो मानी ही जाती है।

सूरदास—कल तो तुम लोग जमीन के पीछे जान देने पर तैयार थेए मुझ पर संदेह कर रहे थे कि मैंने साहब से मेल कर लियाए आज साहब के एक ही चकमे में पानी हो गएघ्

बजरंगी—अब तक किसी ने ये सब बातें इतनी सफाई से न समझाई थीं। कारखाने से सारे मुहल्ले काए सारे शहर का फायदा है। मजूरों की मजूरी बढ़़ेगीए दूकानदारों की बिक्री बढ़़ेगी। तो अब हमें तो झगड़ा नहीं है। तुमको भी हम यही सलाह देते हैं कि अच्छे दाम मिल रहे हैंए जमीन दे डालो। यों न दोगेए तो जाबते से ले ली जाएगी। इससे क्या फायदाघ्

सूरदास—अधर्म और अविचार कितना बढ़़ जाएगाए यह भी मालूम हैघ्

बजरंगी—धान से तो अधर्म होता ही हैए पर धान को कोई छोड़ नहीं देता।

सूरदास—तो अब तुम लोग मेरा साथ न दोगेघ् मत दो। जिधार न्याय हैए उधार किसी की मदद की इतनी जरूरत भी नहीं है। मेरी चीज हैए बाप—दादों की कमाई हैए किसी दूसरे का उस पर कोई अखतियार नहीं है। अगर जमीन गईए तो उसके साथ मेरी जान भी जाएगी।

यह कहकर सूरदास उठ खड़ा हुआ और अपने झोंपड़े के द्वार पर आकर नीम के नीचे लेट रहा

'''

अध्याय 13

विनयसिंह के जाने के बाद सोफिया को ऐसा प्रतीत होने लगा कि रानी जाह्नवी मुझसे खिंची हुई हैं। वह अब उसे पुस्तकें तथा पत्र पढ़़ने या चिट्ठियाँ लिखने के लिए बहुत कम बुलातींय उसके आचार—व्यवहार को संदिग्धा द्रष्टि से देखतीं। यद्यपि अपनी बदगुमानी को वह यथासाधय प्रकट न होने देतींए पर सोफी को ऐसा खयाल होता कि मुझ पर अविश्वास किया जा रहा है। वह जब कभी बाग में सैर करने चली जाती या कहीं घूमने निकल जातीए तो लौटने पर उसे ऐसा मालूम होता कि मेरी किताबें उलट—पलट दी गई हैं। वह बदगुमानी उस वक्त और असह्य हो जातीए जब डाकिए के आने पर रानीजी स्वयं उसके हाथ से पत्र आदि लेतीं और बड़े धयान से देखतीं कि सोफिया का कोई पत्र तो नहीं है। कई बार सोफिया को अपने पत्रों के लिफाफे फटे हुए मिले। वह इस कूटनीति का रहस्य खूब समझती थी। यह रोक—थाम केवल इसलिए है कि मेरे और विनयसिंह के बीच में पत्र—व्यवहार न होने पाए। पहले रानीजी सोफिया से विनय और इंदु की चर्चा अकसर किया करतीं। अब भूलकर भी विनय का नाम न लेतीं। यह प्रेम की पहली परीक्षा थी।

किंतु आश्चर्य यह था कि सोफिया में अब वह आत्माभिमान न था। जो नाक पर मक्खी न बैठने देती थीए वह अब अत्यंत सहनशील हो गई थी। रानीजी से द्वेष करने के बदले वह उनकी संशय—निवृत्ति के लिए अवसर खोजा करती थी। उसे रानीजी का बर्ताव सर्वथा न्यायसंगत मालूम होता था। वह सोचती—इनकी परम अभिलाषा है कि विनय का जीवन आदर्श हो और मैं उनके आत्मसंयम में बाधक न बनूँ। मैं इन्हें कैसे समझाऊँ कि आपकी अभिलाषा को मेरे हाथों जरा—सा भी झोंका न लगेगा। मैं तो स्वयं अपना जीवन एक ऐसे उद्देश्य पर समर्पित कर चुकी हूँए जिसके लिए वह काफी नहीं। मैं स्वयं किसी इच्छा को अपने उद्देश्य मार्ग का काँटा न बनाऊँगी। लेकिन उसे यह अवसर न मिलता था। जो बातें जबान पर नहीं आ सकतींए उनके लिए कभी अवसर नहीं मिलता।

सोफी को बहुधा अपने मन की चंचलता पर खेद होता। वह मन को इधार से हटाने के लिए पुस्तकावलोकन में मग्न हो जाना चाहतीयलेकिन जब पुस्तक सामने खुली रहती और मन कहीं और जा पहुँचताए तो वह झुँझलाकर पुस्तक बंद कर देती और सोचती—यह मेरी क्या दशा है! क्या माया यह कपट—रूप धारण करके मुझे सन्मार्ग से विचलित करना चाहती हैघ् मैं जानकर क्यों अनजान बनी जाती हूँघ् अब प्रतिज्ञा करती हूँ कि मैं इस काँटे को हृदय से निकाल डालूँगी।

लेकिन प्रेम—ग्रस्त प्राणियों की प्रतिज्ञा कायर की समर—लालसा हैए जो द्वंद्वी की ललकार सुनते ही विलुप्त हो जाती है। सोफिया विनय को तो भूल जाना चाहती थीय पर इसके साथ ही शंकित रहती थी कि कहीं वह मुझे भूल न जाएँ। जब कई दिनों तक उनका कोई समाचार नहीं मिलाए तो उसने समझा—मुझे भूल गएए जरूर भूल गए। मुझे उनका पता मालूम होताए तो कदाचित्‌ रोज एक पत्र लिखतीए दिन में कई—कई पत्र भेजतीयपर उन्हें एक पत्र लिखने का भी अवकाश नहीं! वह मुझे भूल जाने का उद्योग कर रहे हैं। अच्छा ही है। वह एक क्रिश्चियन स्त्री से क्यों प्रेम करने लगेघ् उनके लिए क्या एक—से—एक परम सुंदरीए सुशिक्षिताए प्रेमपरायण राजकुमारियाँ नहीं हैंघ्

एक दिन इन भावनाओं ने उसे इतना व्याकुल किया कि वह रानी के कमरे में जाकर विनय के पत्रों को पढ़़ने लगी और एक क्षण में जितने पत्र मिलेए सब पढ़़ डाले। देखूँए मेरी ओर कोई संकेत है या नहींय कोई वाक्य ऐसा हैए जिसमें से प्रेम की सुगंधा आएघ् किंतु ऐसा शब्द एक भी न मिलाए जिससे वह खींच—तानकर भी कोई गुप्त आशय निकाल सकती। हाँए उस पहाड़ी देश में जिन कठिनाइयों का सामना करना पड़ता थाए उनका विस्तार से उल्लेख किया गया था। युवावस्था को अतिशयोक्ति से प्रेम है। हम बाधाओं पर विजय पाकर नहींए उनकी विशद व्याख्या करके अपना महत्व बढ़़ाना चाहते हैं। अगर सामान्य ज्वर हैए तो वह सन्निपात कहा जाता है। एक दिन पहाड़ों में चलना पड़ाए तो वह नित्य पहाड़ों से सिर टकराना कहा जाता है। विनयसिंह के पत्र ऐसी ही वीर—कथाओं से भरे हुए थे सोफिया यह हाल पढ़़कर विकल हो गई। वह इतनी विपत्ति झेल रहे हैंए और मैं यहाँ आराम से पड़ी हूँ! वह इसी उद्वेग में अपने कमरे में आई और विनय को एक लम्बा पत्र लिखाए जिसका एक—एक शब्द प्रेम में डूबा हुआ था। अंत में उसने बड़े प्रेम—विनीत शब्दों में प्रार्थना की कि मुझे अपने पास आने की आज्ञा दीजिएए मैं अब यहाँ नहीं रह सकती। उसकी शैली अज्ञात रूप से कवित्वमय हो गई। पत्र समाप्त करके वह उसी वक्त पास ही के लेटरबक्स में डाल आई।

पत्र डाल आने के बाद जब उसका उद्वेग शांत हुआ तोए उसे विचार आया कि मेरा रानीजी के कमरे में छिपकर जाना और पत्रों को पढ़़ना किसी तरह उचित न था। वह सारे दिन इसी चिंता में पड़ी रही। बार—बार अपने को धिक्कारती ईश्वर! मैं कितनी अभागिनी हूँ! मैंने अपना जीवन सच्चे धर्म की जिज्ञासा पर अर्पण कर दिया थाए बरसों से सत्य की मीमांसा में रत हूँय पर वासना की पहली ही ठोकर में नीचे गिर पड़ी। मैं क्यों इतनी दुर्बल हो गई हूँघ् क्या मेरा पवित्र उद्देश्य वासनाओं के भँवर में पड़कर डूब जाएगाघ् मेरी आदत इतनी बुरी हो जाएगी कि मैं किसी की वस्तुओं की चोरी करूँगीए इसकी मैंने कभी कल्पना भी न की थी। जिनका मुझ पर इतना विश्वासए इतना भरोसाए इतना प्रेमए इतना आदर हैए उन्हीं के साथ मेरा यह विश्वासघात! अगर अभी यह दशा हैए तो भगवान्‌ ही जानेए आगे चलकर क्या दशा होगी। इससे तो यह कहीं अच्छा है कि जीवन का अंत हो जाए! आह्‌ वह पत्रए जो मैं अभी छोड़ आई हूँए वापस मिल जाताए तो मैं फाड़ डालती।

वह इसी चिंता और ग्लानि में बैठी हुई थी कि रानीजी कमरे में आईं। सोफिया उठ खड़ी हुई और अपनी अॉंखें छिपाने के लिए जमीन की ओर ताकने लगी। किंतु अॉंसू पी जाना आसान नहीं है। रानी ने कठोर स्वर में पूछा—सोफीए क्यों रोती हैघ्

जब हम अपनी भूल पर लज्जित होते हैंए तो यथार्थ बात आप—ही—आप हमारे मुँह से निकल पड़ती है। सोफी हिचकती हुई बोली—जीए कुछ नहीं...मुझसे एक अपराध हो गया हैए आपसे क्षमा माँगती हूँ।

रानी ने और भी तीव्र स्वर में पूछा—क्या बात हैघ्

सोफी—आज जब आप सैर करने गई थींए तो मैं आपके कमरे में चली गई थी।

रानी—क्या काम थाघ्

सोफी लज्जा से आरक्त होकर बोली—मैंने आपकी कोई चीज नहीं छुई।

रानी—मैं तुम्हें इतना नीच नहीं समझती।

सोफी—एक पत्र देखना था।

रानी—विनयसिंह काघ्

सोफिया ने सिर झुका लिया। वह अपनी द्रष्टि में स्वयं इतनी पतित हो गई थी कि जी चाहता थाए जमीन फट जाती और मैं उसमें समा जाती। रानी ने तिरस्कार के भाव से कहा—सोफीए तुम मुझे कृतघ्न समझोगीए मगर मैंने तुम्हें अपने घर में रखकर बड़ी भूल की। ऐसी भूल मैंने कभी न की थी। मैं न जानती थी कि तुम आस्तीन का साँप बनोगी। इससे बहुत अच्छा होता कि विनय उसी दिन आग में जल गया होता। तब मुझे इतना दुरूख न होता। मैं तुम्हारे आचरण को पहले न समझी। मेरी अॉंखों पर परदा पड़ा था। तुम जानती होए मैंने क्यों विनय को इतनी जल्द यहाँ से भगा दियाघ् तुम्हारे कारणए तुम्हारे प्रेमाघातों से बचाने के लिए लेकिन अब भी तुम भाग्य की भाँति उसका दामन नहीं छोड़तीं। आखिर तुम उससे क्या चाहती होघ् तुम्हें मालूम हैए तुमसे उसका विवाह नहीं हो सकता। अगर मैं हैसियत और कुल—मर्यादा का विचार न करूँए तो भी तुम्हारे और हमारे बीच में धर्म की दीवार खड़ी है। इस प्रेम का फल इसके सिवा और क्या होगा कि तुम अपने साथ उसे भी ले डूबोगी और मेरी चिर संचित अभिलाषाओं को मिट्टी में मिला दोगीघ् मैं विनय को ऐसा मनुष्य बनाना चाहती हूँए जिस पर समाज को गर्व होए जिसके हृदय में अनुराग होए साहस होए धैर्य होए जो संकटों के सामने मुँह न मोड़ेए जो सेवा के हेतु सदैव सिर को हथेली पर लिए रहेए जिसमें विलासिता का लेश भी न होए जो धर्म पर अपने को मिटा दे। मैं उसे सपूत बेटाए निश्छल मित्र और निरूस्वार्थ सेवक बनाना चाहती हूँ। मुझे उसके विवाह की लालसा नहींए अपने पोतों को गोद में खेलाने की अभिलाषा नहीं। देश में आत्मसेवी पुरुषों और संतान—सेवी माताओं का अभाव नहीं है। धरती उनके बोझ से दबी जाती है। मैं अपने बेटे को सच्चा राजपूत बनाना चाहती हूँ। आज वह किसी की रक्षा के निमित्त अपने प्राण दे देए तो मुझसे अधिक भाग्यवती माता संसार में न होगी। तुम मेरे इस स्वर्ण—स्वप्न को विच्छिन्न कर रही हो। मैं तुमसे सत्य कहती हूँ सोफीए अगर तुम्हारे उपकार के बोझ से दबी न होतीए तो तुम्हें इस दशा में विष देकर मार्ग से हटा देना अपना कर्तव्य समझती। मैं राजपूतनी हूँए मरना भी जानती हूँ और मारना भी जानती हूँ। इसके पहले कि तुम्हें विनय से पत्र—व्यवहार करते देखूँए मैं तुम्हारा गला घोंट दूँगी। तुमसे भिक्षा माँगती हूँए विनय को अपने प्रेम—पाश में फँसाने की चेष्टा न करोए नहीं तो इसका फल बुरा होगा। तुम्हें ईश्वर ने बुध्दि दी हैए विवेक दिया है। विवेक से काम लो। मेरे कुल का सर्वनाश न करो।

सोफी ने रोते हुए कहा—मुझे आज्ञा दीजिएए आज चली जाऊँ।

रानी कुछ नर्म होकर बोलीं—मैं तुम्हें जाने को नहीं कहती। तुम मेरे सिर और अॉंखों पर रहोए (लज्जित होकर) मेरे मुँह से इस समय जो कटु शब्द निकले हैंए उनके लिए क्षमा करो। वृध्दावस्था बड़ी अविनयशील होती है। यह तुम्हारा घर है। शौक से रहो। विनय अब शायद फिर न आएगा। हाँए वह शेर का सामना कर सकता हैय पर मेरे क्रोध का सामना नहीं कर सकता। वह वन—वन की पत्तियाँ तोड़ेगाए पर घर न आएगा। अगर तुम्हें उससे प्रेम हैए तो अपने को उसके हित के लिए बलिदान करने को तैयार हो जाओ। अब उसकी जीवन—रक्षा का केवल एक ही उपाय है। जानती होए वह क्या हैघ्

सोफी ने सिर हिलाकर कहा—नहीं।

रानी—जानना चाहती होघ्

सोफी ने सिर हिलाकर कहा—हाँ।

रानी—आत्मसमर्पण के लिए तैयार होघ्

सोफी ने फिर सिर हिलाकर कहा—हाँ।

रानी—तो तुम किसी सुयोग्य पुरुष से विवाह कर लो। विनय को दिखा दो कि तुम उसे भूल गईंए तुम्हें उसकी चिंता नहीं है। यही नैराश्य उसको बचा सकता है। हो सकता है कि यह नैराश्य उसे जीवन से विरक्त कर देए वह ज्ञान—लाभ का आश्रय लेए जो नैराश्य का एकमात्र शरणस्थल हैए पर सम्भावना होने पर भी इस उपाय के सिवा दूसरा अवलम्ब नहीं है। स्वीकार करती होघ्

सोफी रानी के पैरों पर गिर पड़ी और रोती हुई बोली—उनके हित के लिए...कर सकती हूँ।

रानी ने सोफी को उठाकर गले लगा लिया और करुण स्वर में बोलीं—मैं जानती हूँए तुम उसके लिए सब कुछ कर सकती हो। ईश्वर तुम्हें इस प्रतिज्ञा को पूरा करने का बल प्रदान करें।

यह कहकर जाह्नवी वहाँ से चली गईं। सोफी एक कोच पर बैठ गई और दोनों हाथों से मुँह छिपाकर फूट—फूटकर रोने लगी। उसका रोम—रोम ग्लानि से पीड़ित हो रहा था। उसे जाह्नवी पर क्रोध न था। उसे उन पर असीम श्रध्दा हो रही थी। कितना उच्च और पवित्र उद्देश्य है! वास्तव में मैं ही दूध की मक्खी हूँए मुझको निकल जाना चाहिए। लेकिन रानी का अंतिम आदेश उसके लिए सबसे कड़घवा ग्रास था। वह योगिनी बन सकती थीय पर प्रेम को कलंकित करने की कल्पना ही से घृणा होती थी। उसकी दशा उस रोगी की—सी थीए जो किसी बाग में सैर करने जाए और फल तोड़ने के अपराध में पकड़ लिया जाए। विनय के त्याग ने उसे उनका भक्त बना दिया। भक्ति ने शीघ्र ही प्रेम का रूप धारण किया और वही प्रेम उसे बलात्‌ नारकीय अंधकार की ओर खींचे लिए जाता था। अगर वह हाथ—पैर छुड़ाती हैए तो भय है—वह इसके आगे कुछ न सोच सकी। विचार—शक्ति शिथिल हो गई। अंत में सारी चिंताएँए सारी ग्लानिए सारा नैराश्यए सारी विडम्बना एक ठंडी साँस में विलीन हो गई।

शाम हो गई थी। सोफिया मन—मारे उदास बैठी बाग की तरफ टकटकी लगाए ताक रही थीए मानो कोई विधवा पति—शोक में मग्न हो। सहसा प्रभु सेवक ने कमरे में प्रवेश किया।

सोफिया ने प्रभु सेवक से कोई बात नहीं की। चुपचाप अपनी जगह मूर्तिवत्‌ बैठी रही। वह उस दशा को पहुँच गई थीए जब सहानुभूति से भी अरुचि हो जाती है। नैराश्य की अंतिम अवस्था विरक्ति होती है।

लेकिन प्रभु सेवक अपनी नई रचना सुनाने के लिए इतने उत्सुक हो रहे थे कि सोफी के चेहरे की ओर उनका धयान ही न गया। आते—ही—आते बोले—सोफीए देखोए मैंने आज रात को यह कविता लिखी है। जरा धयान देकर सुनना। मैंने अभी कुँवर साहब को सुनाई है। उन्हें बहुत आनंद आई।

यह कहकर प्रभु सेवक ने मधुर स्वर में अपनी कविता सुनानी शुरू की। कवि ने मृत्युलोक के एक दुरूखी प्राणी के हृदय के भाव व्यक्त किए थेए जो तारागण को देखकर उठे। वह एक—एक चरण झूम—झूमकर पढ़़ते थे और दो—दोए तीन—तीन बार दुहराते थेय किंतु सोफिया ने एक बार भी दाद न दीए मानो वह काव्य—रस—शून्य हो गई थी। जब पूरी कविता समाप्त हो गईए तो प्रभु सेवक ने पूछा—इसके विषय में तुम्हारा क्या विचार हैघ्

सोफिया ने कहा—अच्छी तो है।

प्रभु सेवक—मेरी सूक्तियों पर तुमने धयान नहीं दिया। तारागण की आज तक किसी कवि ने देवात्माओं से उपमा नहीं दी है। मुझे तो विश्वास है कि इस कविता के प्रकाशित होते ही कवि—समाज में हलचल मच जाएगी।

सोफिया—मुझे तो याद आता है कि शेली और वर्ड्‌सवर्थ इस उपमा को पहले ही बाँध चुके हैं। यहाँ के कवियों ने भी कुछ ऐसा ही वर्णन किया है। कदाचित्‌ ह्यूगो की एक कविता का शीर्षक भी यही है। सम्भव हैए तुम्हारी कल्पना उन कवियों से लड़ गई हो।

प्रभु सेवक—मैंने काव्य—साहित्य तुमसे बहुत ज्यादा देखा हैय पर मुझे कहीं यह उपमा नहीं दिखाई दी।

सोफिया—खैरए हो सकता हैए मुझी को याद न होगा। कविता बुरी नहीं है।

प्रभु सेवक—अगर कोई दूसरा कवि यह चमत्कार दिखा देए तो उसकी गुलामी करूँ।

सोफिया—तो मैं कहूँगीए तुम्हारी निगाह में अपनी स्वाधीनता का मूल्य बहुत ज्यादा नहीं है।

प्रभु सेवक—तो मैं भी यही कहूँगा कि कवित्व के रसास्वादन के लिए अभी तुम्हें बहुत अभ्यास करने की जरूरत है।

सोफिया—मुझे अपने जीवन में इससे अधिक महत्व के काम करने हैं। आजकल घर के क्या समाचार हैंघ्

प्रभु सेवक—वही पुरानी दशा चली आती है। मैं तो आजिज आ गया हूँ। पापा को अपने कारखाने की धुन लगी हुई हैए और मुझे उस काम से घृणा है। पापा और मामाए दोनों हरदम भुनभुनाते रहते हैं। किसी का मुँह ही नहीं सीधा होता। कहीं ठिकाना नहीं मिलताए नहीं तो इस माया के घोंसले में एक दिन भी न रहता। कहाँ जाऊँए कुछ समझ में नहीं आता।

सोफिया—बड़े आश्चर्य की बात है कि इतने गुणी और विद्वान्‌ होकर भी तुम्हें अपने निर्वाह का कोई उपाय नहीं सूझता। क्या कल्पना के संसार में आत्मसम्मान का कोई स्थान नहीं हैघ्

प्रभु सेवक—सोफीए मैं और सब कुछ कर सकता हूँए पर गृह—चिंता का बोझ नहीं उठा सकता। मैं निर्द्‌वंद्वए निश्चिंतए निर्लिप्त रहना चाहता हूँ। एक सुरम्य उपवन मेंए किसी सघन वृक्ष के नीचेए पक्षियों का मधुर कलरव सुनता हुआ काव्य—चिंतन में मग्न पड़ा रहूँए यही मेरे जीवन का आदर्श है।

सोफिया—तुम्हारी जिंदगी इसी भाँति स्वप्न देखने में गुजरेगी।

प्रभु सेवक—कुछ होए चिंता से तो मुक्त हूँए स्वच्छंद तो हूँ!

सोफिया—जहाँ आत्मा और सिध्दांतों की हत्या होती होए वहाँ से स्वच्छंदता कोसों भागती है। मैं इसे स्वच्छंदता नहीं कहतीए यह निर्लज्जता है। माता—पिता की निर्दयता कम पीड़ाजनक नहीं होतीए बल्कि दूसरों का अत्याचार इतना असह्य नहीं होताए जितना माता—पिता का।

प्रभु सेवक—उँहए देखा जाएगाए सिर पर जो आ जाएगीए झेल लूँगाए मरने के पहले ही क्यों रोऊँघ्

यह कहकर प्रभु सेवक ने पाँड़ेपुर की घटना बयान की और इतनी डींग मारी कि सोफी चिढ़़कर बोली—रहने भी दोए एक गँवार को पीट लियाए तो कौन—सा बड़ा काम किया। अपनी कविताओं में तो अहिंसा के देवता बन जाते होए वहाँ जरा—सी बात पर इतने जामे से बाहर हो गए!

प्रभु सेवक—गाली सह लेताघ्

सोफिया—जब तुम मारनेवाले को मारोगेए गाली देनेवाले को भी मारोगेए तो अहिंसा का निर्वाह कब करोगेघ् राह चलते तो किसी को कोई नहीं मारता। वास्तव में किसी युवक को उपदेश करने का अधिकार नहीं हैए चाहे उसकी कवित्व—शक्ति कितनी ही विलक्षण हो। उपदेश करना सिध्द पुरुषों ही का काम है। यह नहीं कि जिसे जरा तुकबंदी आ गईए वह लगा शांति और अहिंसा का पाठ पढ़़ाने। जो बात दूसरों को सिखलाना चाहते होए वह पहले स्वयं सीख लो।

प्रभु सेवक—ठीक यही बात विनय ने भी अपने पत्र में लिखी है। लोए याद आ गया। यह तुम्हारा पत्र है। मुझे याद ही न रही थी। यह प्रसंग न आ जाताए तो जेब में रखे ही लौट जाता।

यह कहकर प्रभु सेवक ने एक लिफाफा निकालकर सोफिया के हाथ में रख दिया। सोफिया ने पूछा—आजकल कहाँ हैंघ्

प्रभु सेवक—उदयपुर के पहाड़ी प्रांतों में घूम रहे हैं। मेरे नाम जो पत्र आया हैए उसमें तो उन्होंने साफ लिखा है कि मैं इस सेवा कार्य के लिए सर्वथा अयोग्य हूँ। मुझमें उतनी सहनशीलता नहींए जितनी होनी चाहिए। युवावस्था अनुभव—लाभ का समय है। अवस्था प्रौढ़़ हो जाने पर ही सार्वजनिक कायोर्ं में सम्मिलित होना चाहिए। किसी युवक को सेवा—कार्य करने को भेजना वैसा ही हैए जैसे किसी बच्चे वैद्य को रोगियों के कष्टनिवारण के लिए भेजना।

प्रभु सेवक चले गएए तो सोफिया सोचने लगी—यह पत्र पढ़ूँ या न पढ़़ूँघ् विनय इसे रानीजी से गुप्त रखना चाहते हैंए नहीं तो यहीं के पते से भेजतेघ् मैंने अभी रानीजी को वचन दिया हैए उनसे पत्र—व्यवहार न करूँगी। इस पत्र को खोलना उचित नहीं। रानीजी को दिखा दूँ। इससे उनके मन में मुझ पर जो संदेह हैए वह दूर हो जाएगा। मगर न जाने क्या बातें लिखी हैं। सम्भव हैए कोई ऐसी बात होए जो रानी के क्रोध को और भी उत्तोजित कर दे। नहींए इस पत्र को गुप्त ही रखना चाहिए। रानी को दिखाना मुनासिब नहीं।

उसने फिर सोचा—पढ़़ने से क्या फायदाए न जाने मेरे चित्ता की क्या दशा हो। मुझे अब अपने ऊपर विश्वास नहीं रहा। जब इस प्रेमांकुर को जड़ से उखाड़ना ही हैए तो उसे क्यों सीचूँघ् इस पत्र को रानी के हवाले कर देना ही उचित है।

सोफिया ने और ज्यादा सोच—विचार नहीं किया। शंका हुईए कहीं मैं विचलित न हो जाऊँ। चलनी में पानी नहीं ठहरता।

उसने उसी वक्त वह पत्र ले जाकर रानी को दे दिया। उन्होंने पूछा—किसका पत्र हैघ् यह तो विनय की लिखावट जान पड़ती है। तुम्हारे नाम आया है नघ् तुमने लिफाफा खोला नहींघ्

सोफिया—जी नहीं।

रानी ने प्रसन्न होकर कहा—मैं तुम्हें आज्ञा देती हूँए पढ़़ो। तुमने अपना वचन पालन कियाए इससे मैं बहुत खुश हुई।

सोफिया—मुझे क्षमा कीजिए।

रानी—मैं खुशी से कहती हूँए पढ़़ोय देखोए क्या लिखते हैंघ्

सोफिया—जी नहीं।

रानी ने पत्र ज्यों—का—त्यों संदूक में बंद कर दिया। खुद भी नहीं पढ़़ा। कारणए यह नीति—विरुध्द था। तब सोफिया से बोली—बेटीए अब मेरी तुमसे एक और याचना है। विनय को एक पत्र लिखो और उसमें स्पष्ट लिख दोए हमारा और तुम्हारा कल्याण इसमें है कि हममें केवल भाई और बहन का सम्बंध रहे। तुम्हारे पत्र से यह प्रकट होना चाहिए कि तुम उनके प्रेम की अपेक्षा उनके जातीय भावों की ज्यादा कद्र करती हो। तुम्हारा यह पत्र मेरे और उनके पिता के हजारों उपदेशों से अधिक प्रभावशाली होगा। मुझे विश्वास हैए तुम्हारा पत्र पाते ही उनकी चेष्टाएँ बदल जाएँगी और वहर् कर्तव्य—मार्ग पर सु—ढ़़ हो जाएँगे। मैं इस कृपा के लिए जीवन—पयर्ंत तुम्हारी आभारी रहँगी।

सोफी ने कातर स्वर में कहा—आपकी आज्ञा पालन करूँगी।

रानी—नहींए केवल मेरी आज्ञा का पालन करना काफी नहीं है। अगर उससे यह भासित हुआ कि किसी की प्रेरणा से लिखा गया हैए तो उसका असर जाता रहेगा।

सोफिया—आपको पत्र लिखकर दिखा दूँघ्

रानी—नहींए तुम्हीं भेज देना।

सोफिया जब वहाँ से आकर पत्र लिखने बैठीए तो उसे सूझता ही न था कि क्या लिखूँ। सोचने लगी—वह मुझे निर्मम समझेंगेय अगर लिख दूँए मैंने तुम्हारा पत्र पढ़़ा ही नहींए तो उन्हें कितना दुरूख होगा! कैसे कहूँ कि मैं तुमसे प्रेम नहीं करतीघ्

वह मेज पर से उठ खड़ी हुई और निश्चय कियाए कल लिखूँगी। एक किताब पढ़़ने लगी। भोजन का समय हो गया। नौ बज गए। अभी वह मुँह—हाथ धोकर बैठी ही थी कि उसने रानी को द्वार से अंदर की ओर झाँकते देखा। समझीए किसी काम से जा रही होंगीए फिर किताब देखने लगी। पंद्रह मिनट भी न गुजरे थे कि रानी फिर दूसरी तरफ से लौटीं और कमरे में झाँका।

सोफी को उनका यों मँडलाना बहुत नागवार मालूम हुआ। उसने समझा—यह मुझे बिल्कुल काठ की पुतली बनाना चाहती हैं। बसए इनके इशारों पर नाचा करूँ। इतना तो नहीं हो सका कि जब मैंने बंद लिफाफा उनके हाथ में रख दियाए तो मुझे खत पढ़़कर सुना देतीं। आखिर मैं लिखूँ क्याघ् नहीं मालूमए उन्होंने अपने खत में क्या लिखा हैघ् सहसा उसे धयान आया कि कहीं मेरा पत्र उपदेश के रूप में न हो जाए। वह इसे पढ़़कर शायद मुझसे चिढ़़ जाएँ। अपने प्रेमियों से हम उपदेश और शिक्षा की बातें नहींए प्रेम और परितोष की बातें सुनना चाहते हैं। बड़ी कुशल हुईए नहीं तो वह मेरा उपदेश—पत्र पढ़़कर न जाने दिल में क्या समझते। उन्हें खयाल होताए गिरजा में उपदेश सुनते—सुनते इसकी प्रेम—भावनाएँ निर्जीव हो गई हैं। अगर वह मुझे ऐसा पत्र लिखतेए तो मुझे कितना बुरा मालूम होता! आह! मैंने बड़ा धोखा खाया। पहले मैंने समझा थाए उनसे केवल आधयात्मिक प्रेम करूँगी। अब विदित हो रहा है कि आधयात्मिक प्रेम या भक्ति केवल धर्म—जगत्‌ ही की वस्तु है। स्त्री —पुरुष में पवित्र प्रेम होना असम्भव है। प्रेम पहले उँगली पकड़कर तुरंत ही पहुँचा पकड़ता है। यह भी जानती हूँ कि यह प्रेम मुझे ज्ञान के ऊँचे आदर्श से गिरा रहा है। हमें जीवन इसलिए प्रदान किया गया है कि सद्विचारों और सत्कायोर्ं से उसे उन्नत करें और एक दिन अनंत ज्योति में विलीन हो जाएँ। यह भी जानती हूँ कि जीवन नश्वर हैए अनित्य है और संसार के सुख अनित्य और नश्वर हैं। यह सब जानते हुए भी पतंग की भाँति दीपक पर गिर रही हूँ। इसीलिए तो कि प्रेम में वह विस्मृति हैए जो संयमए ज्ञान और धारणा पर परदा डाल देती है। भक्तजन भीए आधयात्मिक आनंद भोगते रहते हैंए वासनाओं से मुक्त नहीं हो सकते। जिसे कोई बलात्‌ खींचे लिए जाता होए उससे कहना कि तू मत जाए कितना बड़ा अन्याय है!

पीड़ित प्राणियों के लिए रात एक कठिन तपस्या है। ज्यों—ज्यों रात गुजरती थीए सोफी की उद्विग्नता बढ़़ती जाती थी। आधी रात तक मनोभावों से निरंतर संग्राम करने के बाद अंत को उसने विवश होकर हृदय के द्वार प्रेम—क्रीड़ाओं के लिए उन्मुक्त कर दिएए जैसे किसी रंगशाला का व्यवस्थापक दर्शकों की रेल—पेल से तंग आकर शाला का पट सर्वसाधारण के लिए खोल देता है। बाहर का शोर भीतर के मधुर —स्वर—प्रवाह में बाधक होता है। सोफी ने अपने को प्रेम—कल्पनाओं की गोद में डाल दिया। अबाध रूप से उनका आनंद उठाने लगीरू

श्क्यों विनयए तुम मेरे लिए क्या—क्या मुसीबतें झेलोगेघ् अपमानए अनादरए द्वेषए माता—पिता का विरोधए तुम मेरे लिए यह सब विपत्ति सह लोगेघ् लेकिन धर्मघ् वह देखोए तुम्हारा मुख उदास हो गया। तुम सब कुछ करोगेय पर धर्म नहीं छोड़ सकते। मेरी भी यही दशा है। मैं तुम्हारे साथ उपवास कर सकती हूँए तिरस्कारए अपमानए निंदाए सब कुछ भोग सकती हूँए पर धर्म को कैसे त्याग दूँघ् ईसा का दामन कैसे छोड़ दूँघ् ईसाइयत की मुझे परवा नहींए वह केवल स्वाथोर्ं का संघटन हैय लेकिन उस पवित्र आत्मा से क्योंकर मुँह मोड़ूँए जो क्षमा और दया का अवतार थीघ् क्या यह सम्भव नहीं कि मैं ईसा के दामन से लिपटी रहकर भी अपनी प्रेमाकांक्षाओं को तृप्त करूँघ् हिंदू—धर्म की उदार छाया में किसके लिए शरण नहींघ् आस्तिक भी हिंदू हैंए नास्तिक भी हिंदू हैंए तैंतीस करोड़ देवताओं को माननेवाला भी हिंदू है। जहाँ महावीर के भक्तों के लिए स्थान हैए बुध्ददेव के भक्तों के लिए स्थान हैए वहाँ क्या ईसू के भक्त के लिए स्थान नहीं हैघ् तुमने मुझे अपने प्रेम का निमंत्रण दिया हैए मैं उसे अस्वीकार क्यों करूँघ् मैं भी तुम्हारे साथ सेवा—कार्य में रत हो जाऊँगीए तुम्हारे साथ वनों में विचरूँगीए झोंपड़ी में रहूँगी।श्

आहए मुझसे बड़ी भूल हुई। मैंने नाहक वह पत्र रानीजी को दे दिया। मेरा पत्र थाए मुझे उसके पढ़़ने का पूरा अधिकार था। मेरे और उनके बीच प्रेम का नाता हैए जो संसार के और सभी सम्बंधों से पवित्र और श्रेष्ठ है। मैं इस विषय में अपने अधिकार को त्यागकर विनय के साथ अन्याय कर रही हूँ। नहींए मैं उनसे दगा कर रही हूँ। मैं प्रेम को कलंकित कर रही हूँ। उनके मनोभावों का उपहास कर रही हूँ। यदि वह मेरा पत्र बिना पढ़़े ही फाड़कर फेंक देतेए तो मुझे इतना दुरूख होता कि उन्हें कभी क्षमा न करती। क्या करूँघ् जाकर रानीजी से वह पत्र माँग लूँघ् उसे देने में उन्हें कोई आपत्ति नहीं हो सकती। मन में चाहे कितना ही बुरा मानेंए पर मेरी अमानत मुझे अवश्य दे देंगी। वह मेरी मामा की भाँति अनुदार नहीं हैं। मगर मैं उनसे माँगू क्योंघ् वह मेरी चीज हैए किसी अन्य प्राणी का उस पर कोई दावा नहीं। अपनी चीज ले लेने के लिए मैं किसी दूसरे का एहसान क्यों उठाऊँघ्

ग्यारह बज रहे थे। भवन में चारों तरफ सन्नाटा छाया हुआ था। नौकर—चाकर सब सो गए थे। सोफिया ने खिड़की से बाहर बाग की ओर देखा। ऐसा मालूम होता था कि आकाश से दूध की वर्षा हो रही है। चाँदनी खूब छिटकी हुई थी। संगमरमर की दोनों परियाँए जो हौज के किनारे खड़ी थींए उसे निस्स्वर संगीत की प्रकाशमयी प्रतिमाओं—सी प्रतीत होती थींए जिससे सारी प्रकृति उल्लसित हो रही थी।

सोफिया के हृदय में प्रबल उत्कंठा हुई कि इसी क्षण चलकर अपना पत्र लाऊँ। वह —ढ़़ संकल्प करके अपने कमरे से निकली और निर्भय होकर रानीजी के दीवानखाने की ओर चली। वह अपने हृदय को बार—बार समझा रही थी—मुझे भय किसका हैए अपनी चीज लेने जा रही हूँयकोई पूछे तो उससे साफ—साफ कह सकती हूँ। विनयसिंह का नाम लेना कोई पाप नहीं है।

किंतु निरंतर यह आश्वासन मिलने पर भी उसके कदम इतनी सावधानी से उठते थे कि बरामदे के पक्के फर्श पर भी कोई आहट न होती थी। उसकी मुखाकृति से वह अशांति झलक रही थीए जो आंतरिक दुश्चिंता का चिद्द है। वह सहमी हुई अॉंखों से दाहिने—बाएँए आगे—पीछे ताकती जाती थी। जरा—सा भी कोई खटका होताए तो उसके पाँव स्वतरू रुक जाते थे और वह बरामदे के खम्भों की आड़ में छिप जाती थी। रास्ते में कई कमरे थे। यद्यपि उनमें अंधोरा थाए रोशनी गुल हो चुकी थीए तो भी वह दरवाजे पर एक क्षण के लिए रुक जाती थीए कि कोई उनमें बैठा न हो। सहसा एक टेरियन कुत्ताए जिसे रानीजी बहुत प्यार करती थींए सामने से आता हुआ दिखाई दिया। सोफी के रोयें खड़ा हो गए। इसने जरा भी मुँह खोलाए और सारे घर में हलचल हुई। कुत्तो ने उसकी ओर सशंक नेत्रों से देखा और अपने निर्णय की सूचना देना ही चाहता था कि सोफिया ने धीरे से उसका नाम लिया और उसे गोद में उठाकर उसकी पीठ सहलाने लगी। कुत्ता दुम हिलाने लगाए लेकिन अपनी राह जाने के बदले वह सोफिया के साथ हो लिया। कदाचित्‌ उसकी पशु—चेतना ताड़ रही थी कि कुछ दाल में काला जरूर है। इस प्रकार पाँच कमरों के बाद रानीजी का दीवानखाना मिला। उसके द्वार खुले हुए थेए लेकिन अंदर अंधोरा था। कमरे में बिजली के बटन लगे हुए थे। उँगलियों की एक अति सूक्ष्म गति से कमरे में प्रकाश हो सकता था। लेकिन इस समय बटन का दबाना बारूद के ढ़ेर में दियासलाई से कम भयकारक न था। प्रकाशसे वह कभी इतनी भयभीत न हुई थी। मुश्किल तो यह थी कि प्रकाश के बगैर वह सफल—मनोरथ भी न हो सकती थी। यही अमृत भी था और विष भी। उसे क्रोध आ रहा था कि किवाड़ों में शीशे क्यों लगे हुए हैंघ् परदे हैंए वे भी इतने बारीक कि आदमी का मुँह दिखाई देता है। घर न हुआए कोई सजी हुई दूकान हुई। बिल्कुल अंगरेजी नकल है। और रोशनी ठंडी करने की जरूरत ही क्या थीघ् इससे तो कोई बहुत बड़ी किफायत नहीं हो जाती।

हम जब किसी तंग सड़क पर चलते हैंए तो हमें सवारियों का आना—जाना बहुत ही कष्टदायक जान पड़ता है। जी चाहता है कि इन रास्तों पर सवारियों के आने की रोक होनी चाहिए। हमारा अख्तियार होताए तो इन सड़कों पर कोई सवारी न आने देतेए विशेषतरू मोटरों को। लेकिन उन्हीं सड़कों पर जब हम किसी सवारी पर बैठकर निकलते हैंए तो पग—पग पर पथिकों को हटाने के लिए रुकने पर झुँझलाते हैं कि ये सब पटरी पर क्यों नहीं चलतेए ख्वामख्वाह बीच में धाँसे पड़ते हैं। कठिनाइयों में पड़कर परिस्थिति पर क्रुध्द होना मानव—स्वभाव है।

सोफिया कई मिनट तक बिजली के बटन के पास खड़ी रही। बटन दबाने की हिम्मत न पड़ती थी। सारे अॉंगन में प्रकाश फैल जाएगाए लोग चौंक पड़ेंगे। अंधोरे में सोता हुआ मनुष्य भी उजाला फैलते ही जाग पड़ता है। विवश होकर उसने मेज को टटोलना शुरू किया। दावात लुढ़़क गईए स्याही मेज पर फैल गई और उसके कपड़ों पर दाग पड़ गए। उसे विश्वास था कि रानी ने पत्र अपने हैंडबैग में रखा होगा। जरूरी चिट्ठियाँ उसी में रखती थीं। बड़ी मुश्किल से उसे बैग मिला। वह उसमें से एक—एक—पत्र निकालकर अंधोरे में देखने लगी। लिफाफे अधिकांश एक ही आकार के थेए निगाहें कुछ काम न कर सकीं। आखिर इस तरह मनोरथ पूरा न होते देखकर उसने हैंडबैग उठा लिया और कमरे से बाहर निकली। सोचाए मेरे कमरे में अभी तक रोशनी हैए वहाँ वह पत्र सहज ही में मिल जाएगा। इसे लाकर फिर यहीं रख दूँगी। लेकिन लौटती बार वह इतनी सावधानी से पाँव न उठा सकी। आती बार वह पग—पग पर इधार—उधार देखती हुई आई थी। अब बड़े वेग से चली जा रही थीए इधार—उधार देखने की फुरसत न थी। खाली हाथ उज्र की गुंजाइश थी। रँगे हुए हाथों के लिए कोई उज्रए कोई बहाना नहीं है।

अपने कमरे में पहुँचते ही सोफिया ने द्वार बंद कर दिया और परदे डाल दिए। गरमी के मारे सारी देह पसीने से तर थीए हाथ इस तरह काँप रहे थेए मानो लकवा गिर गया हो। वह चिट्ठियों को निकाल—निकालकर देखने लगी। और पत्रों को केवल देखना ही न थाए उन्हें अपनी जगह सावधानी से रखना भी था। पत्रों का एक दफ्तर सामने थाए बरसों की चिट्ठियाँ वहाँ निर्वाण सुख भोग रही थीं। सोफिया को उनकी तलाशी लेते घंटों गुजर गएए दफ्तर समाप्त होने को आ गयाय पर वह चीज न मिली। उसे अब कुछ—कुछ निराशा होने लगीय यहाँ तक कि अंतिम पत्र भी उलट—पलटकर रख दिया गया। तब सोफिया ने एक लम्बी साँस ली। उसकी दशा उस मनुष्य की—सी थीए जो किसी मेले में अपने खोए हुए बंधु को ढ़ूँढ़़ता होय वह चारों ओर अॉंखें फाड़—फाड़कर देखता हैए उसका नाम लेकर जोर—जोर से पुकारता हैए उसे भ्रम होता हैयवह खड़ा हैए लपककर उसके पास जाता है और लज्जित होकर लौट आता है। अंत में वह निराश होकर जमीन पर बैठ जाता और रोने लगता है।

सोफिया भी रोने लगी। वह पत्र कहाँ गयाघ् रानी ने तो उसे मेरे सामने ही इसी बैग में रख दिया थाघ् उनके और सभी पत्र यहाँ मौजूद हैं। क्या उसे कहीं और रख दियाघ् मगर आशा उस घास की भाँति हैए जो ग्रीष्म के ताप से जल जाती हैए भूमि पर उसका निशान तक नहीं रहताए धरती ऐसी उज्ज्वल हो जाती हैए जैसे टकसाल का नया रुपयाय लेकिन पावस की बूँद पड़ते ही फिर जली हुई जड़ें पनपने लगती हैं और उसी शुष्क स्थल पर हरियाली लहराने लगती है।

सोफिया की आशा फिर हरी हुई। कहीं मैं कोई पत्र छोड़ तो नहीं गई। उसने दुबारा पत्रों को पढ़़ना शुरू किया और ज्यादा धयान देकर। एक—एक लिफाफे को खोलकर देखने लगी कि कहीं रानी ने उसे किसी दूसरे लिफाफे में रख दिया हो। जब देखा कि इस तरह तो सारी रात गुजर जाएगीए तो उन्हीं लिफाफों को खोलने लगीए जो भारी—भारी मालूम होते थे। अंत को यह शंका भी मिट गई। उस लिफाफे का कहीं पता न था। अब आशा की जड़ें भी सूख गईंए पावस की बूँद न मिली।

सोफिया चारपाई पर लेट गईए मानो थक गई हो। सफलता में अनंत सजीवता होती हैए विफलता में असह्य अशक्ति। आशा मद हैए निराशा मद का उतार। नशे में हम मैदान की तरफ दौड़ते हैंए सचेत होकर हम घर में विश्राम करते हैं। आशा जड़ की ओर ले जाती हैए निराशा चौतन्य की ओर। आशा अॉंखें बंद कर देती हैए निराशा अॉंखें खोल देती है। आशा सुलानेवाली थपकी हैए निराशा जगानेवाला चाबुक।

सोफिया को इस वक्त अपनी नैतिक दुर्बलता पर क्रोध आ रहा था—मैंने व्यर्थ ही अपनी आत्मा के सिर पर यह अपराध मढ़़ा। क्या मैं रानी से अपना पत्र न माँग सकती थीघ् उन्हें उसके देने में जरा भी विलम्ब न होता। फिर मैंने वह पत्र उन्हें दिया ही क्योंघ् रानीजी को कहीं मेरा यह कपट—व्यवहार मालूम हो गयाय और अवश्य ही मालूम हो जाएगाए तो वह मुझे अपने मन में क्या समझेंगीघ् कदाचित्‌ मुझसे नीच और निकृष्ट कोई प्राणी न होगा।

सहसा सोफिया के कानों में झाड़ू लगाने की आवाज आई। वह चौंकीए क्या सबेरा हो गयाघ् परदा उठाकर द्वार खोलाए तो दिन निकल आया था। उसकी अॉंखों में अंधोरा छा गया। उसने बड़ी कातर द्रष्टि से हैंडबैग की ओर देखा और मूर्ति के समान खड़ी रह गई। बुध्दि शिथिल हो गई। अपनी दशा और अपने कृत्य पर उसे ऐसा क्रोध आ रहा था कि गरदन पर छुरी फेर लूँ। कौन—सा मुँह दिखाऊँगीघ् रानी बहुत तड़के उठती हैंए मुझे अवश्य ही देख लेंगी। किंतु अब और हो ही क्या सकता हैघ् भगवन्! तुम दीनों के आधार—स्तम्भ होए अब लाज तुम्हारे हाथ है। ईश्वर करेए अभी रानी न उठी हों। उसकी इस प्रार्थना में कितनी दीनताए कितनी विवशताए कितनी व्यथाए कितनी श्रध्दा और कितनी लज्जा थी! कदाचित्‌ इतने शुध्द हृदय से उसने कभी प्रार्थना न की होगी!

अब एक क्षण भी विलम्ब करने का अवसर न था। उसने बैग उठा लिया और बाहर निकली। आत्म—गौरव कभी इतना पद—दलित न हुआ होगा। उसके मुँह में कालिख लगी होती हैए तो शायद वह इस भाँति अॉंखें चुराती हुई न जाती! कोई भद्र पुरुष अपराधी के रूप में बेड़ियाँ पहने जाता हुआ भी इतना लज्जित न होगा! जब वह दीवानखाने के द्वार पर पहुँचीए तो उसका हृदय यों धाड़कने लगाए मानो कोई हथौड़ा चला रहा हो। वह जरा देर ठिठकीए कमरे में झाँककर देखाए रानी बैठी हुई थीं। सोफिया की इस समय जो दशा हुईए उसकी केवल कल्पना ही की जा सकती है। वह गड़ गईए कट गईए सिर पर बिजली गिर पड़तीए नीचे की भूमि फट जातीए तो भी कदाचित्‌ वह इस महान्‌ संकट के सामने उसे पुष्प—वर्षा या जल—विहार के समान सुखद प्रतीत होती। उसने जमीन की ओर ताकते हुए हैंडबैग चुपके से ले जाकर मेज पर रख दिया। रानी ने उसकी ओर उस द्रष्टि से देखाए जो अंतस्तल पर शर के समान लगती है। उसमें अपमान भरा हुआ थाय क्रोध न थाए दया न थीए ज्वाला न थीए तिरस्कार था—विशुध्दए सजीव और सशब्द।

सोफिया लौटना ही चाहती थी कि रानी ने पूछा—विनय का पत्र ढ़ूँढ़़ रही थींघ्

सोफिया अवाक्‌ रह गई। मालूम हुआए किसी ने कलेजे में बर्छी मार दी।

रानी ने फिर कहा—उसे मैंने अलग रख दिया हैए मँगवा दूँघ्

सोफिया ने उत्तर न दिया। उसके सिर में चक्कर—सा आने लगा। मालूम हुआए कमरा घूम रहा है।

रानी ने तीसरा बाण चलाया—क्या यही सत्य की मीमांसा हैघ्

सोफिया मूर्छित होकर फर्श पर गिर पड़ी।

'''

अध्याय 14

सोफिया को होश आया तो वह अपने कमरे में चारपाई पर पड़ी हुई थी। कानों में रानी के अंतिम शब्द गूँज रहे थे—क्या यही सत्य की मीमांसा हैघ् वह अपने को इस समय इतनी नीच समझ रही थी कि घर का मेहतर भी उसे गालियाँ देताए तो शायद सिर न उठाती। वह वासना के हाथों में इतनी परास्त हो चुकी थी कि अब उसे अपने सँभलने की कोई आशा न दिखाई देती थी। उसे भय होता था कि मेरा मन मुझसे वह सब कुछ करा सकता हैए जिसकी कल्पना—मात्रा से मनुष्य का सिर लज्जा से झुक जाता है। मैं दूसरों पर कितना हँसती थीए अपनी धार्मिक प्रवृत्ति पर कितना अभिमान करती थीए मैं पुनर्जन्म और मुक्तिए पुरुष और प्रकृति जैसे गहन विषयों पर विचार करती थीए और दूसरों को इच्छा तथा स्वार्थ का दास समझकर उनका अनादर करती थी। मैं समझती थीए परमात्मा के समीप पहुँच गई हूँए संसार की उपेक्षा करके अपने को जीवनमुक्त समझ रही थीय पर आज मेरी सद्‌भक्ति का परदाफाश हो गया। आह! विनय को ये बातें मालूम होंगीए तो वह अपने मन में क्या समझेंगेघ् कदाचित्‌ मैं उनकी निगाहों में इतनी गिर जाऊँगी कि वह मुझसे बोलना भी पसंद न करें। मैं अभागिनी हूँए मैंने उन्हें बदनाम कियाए अपने कुल को कलंकित कियाए अपनी आत्मा की हत्या कीए अपने आश्रयदाताओं की उदारता को कलुषित किया। मेरे कारण धर्म भी बदनाम हो गयाए नहीं तो क्या आज मुझसे यह पूछा जाता—क्या यही सत्य की मीमांसा हैघ्

उसने सिरहाने की ओर देखा। अलमारियों पर धर्म—ग्रंथ सजे हुए रखे थे। उन ग्रंथों की ओर ताकने की हिम्मत न पड़ी। यही मेरे स्वाध्याय का फल है! मैं सत्य की मीमांसा करने चली थी और इस बुरी तरह गिरी कि अब उठना कठिन है।

सामने दीवार पर बुध्द भगवान्‌ का चित्र लटक रहा था। उनके मुख पर कितना तेज था! सोफिया की अॉंखें झुक गईं। उनकी ओर ताकते हुए उसे लज्जा आती थी। बुध्द के अमरत्व का उसे कभी इतना पूर्ण विश्वास न हुआ था। अंधकार में लकड़ी का कुंदा भी सजीव हो जाता है। सोफी के हृदय पर ऐसा ही अंधकार छाया हुआ था।

अभी नौ बजे का समय थाए पर सोफिया को भ्रम हो रहा था कि संध्या हो रही है। वह सोचती थी—क्या मैं सारे दिन सोती रह गईए किसी ने मुझे जगाया भी नहीं! कोई क्यों जगाने लगाघ् यहाँ अब मेरी परवा किसे हैए और क्यों हो! मैं कुलक्षणा हूँए मेरी जात से किसी का उपकार न होगाए जहाँ रहूँगीए वहीं आग लगाऊँगी। मैंने बुरी साइत में इस घर में पाँव रखे थे। मेरे हाथों यह घर वीरान हो जाएगाए मैं विनय को अपने साथ डूबो दूँगीए माता का शाप अवश्य पड़ेगा। भगवन्ए आज मेरे मन में ऐसे विचार क्यों आ रहे हैंघ्

सहसा मिसेज सेवक कमरे में दाखिल हुईं। उन्हें देखते ही सोफिया को अपने हृदय में एक जलोद्‌गार—सा उठता हुआ जान पड़ा। वह दौड़कर माता के गले से लिपट गई। यही अब उसका अंतिम आश्रय था। यहीं अब उसे वह सहानुभूति मिल सकती थीए जिसके बिना उसका जीना दूभर थाय यहीं अब उसे वह विश्रामए वह शांतिए वह छाया मिल सकती थीए जिसके लिए उसकी संतप्त आत्मा तड़प रही थी। माता की गोद के सिवा यह सुख—स्वर्ग और कहाँ हैघ् माता के सिवा कौन उसे छाती से लगा सकता हैए कौन उसके दिल पर मरहम रख सकता हैघ् माँ के कटु शब्द और उसका निष्ठुर व्यवहारए सब कुछ इस सुख—लालसा के आवेग में विलुप्त हो गया। उसे ऐसा जान पड़ाए ईश्वर ने मेरी दीनता पर तरस खाकर मामा को यहाँ भेजा है। माता की गोद में अपना व्यथित मस्तक रखकर एक बार फिर उसे बल और धैर्य का अनुभव हुआए जिसकी याद अभी तक दिल से न मिटी थी। वह फूट—फूट रोने लगी। लेकिन माता की अॉंखों में अॉंसू न थे। वह तो मिस्टर क्लार्क के निमंत्रण का सुख—सम्वाद सुनाने के लिए अधीर हो रही थीं। ज्यों ही सोफिया के अॉंसू थमेए मिसेज सेवक ने कहा—आज तुम्हें मेरे साथ चलना होगा। मिस्टर क्लार्क ने तुम्हें अपने यहाँ निमंत्रित किया है।

सोफिया ने उत्तर न दिया। उसे माता की यह बात भद्दी मालूम हुई।

मिसेज सेवक ने फिर कहा—जब से तुम यहाँ आई होए वह कई बार तुम्हारा कुशल—समाचार पूछ चुके हैं। जब मिलते हैंए तुम्हारी चर्चा जरूर करते हैं। ऐसा सज्जन सिविलियन मैंने नहीं देखा। उनका विवाह किसी अंगरेज के खानदान में हो सकता हैए और यह तुम्हारा सौभाग्य है कि वह अभी तक तुम्हें याद करते हैं।

सोफिया ने घृणा से मुँह फेर लिया। माता की सम्मान—लोलुपता असह्य थी। न मुहब्बत की बातें हैंए न आश्वासन के शब्दए न ममता के उद्‌गार। कदाचित्‌ प्रभु मसीह ने भी निमंत्रित किया होताए तो वह इतनी प्रसन्न न होती।

मिसेज सेवक बोलीं—अब तुम्हें इनकार न करना चाहिए। विलम्ब से प्रेम ठंडा हो जाता है और फिर उस पर कोई चोट नहीं पड़ सकती। ऐसा स्वर्ण—सुयोग फिर न हाथ आएगाए एक विद्वान्‌ ने कहा है—प्रत्येक प्राणी को जीवन में केवल एक बार अपने भाग्य की परीक्षा का अवसर मिलता हैए और वही भविष्य का निर्णय कर देता है। तुम्हारे जीवन में यह वही अवसर है। इसे छोड़ दियाए तो फिर हमेशा पछताओगी।

सोफिया ने व्यथित होकर कहा—अगर मिस्टर क्लार्क ने मुझे निमंत्रित न किया होताए तो शायद आप मुझे याद भी न करतींघ्

मिसेज सेवक ने अवरुध्द कंठ से कहा—मेरे मन में जो कुछ हैए वह तो ईश्वर ही जानता हैय पर ऐसा कोई दिन नहीं जाता कि मैं तुम्हारे और प्रभु के लिए ईश्वर से प्रार्थना न करती होऊँ। यह उन्हीं प्रार्थनाओं का शुभ फल है कि तुम्हें यह अवसर मिला है।

यह कहकर मिसेज सेवक जाह्नवी से मिलने गईं। रानी ने उनका विशेष आदर न किया। अपनी जगह पर बैठे—बैठे बोलीं—आपके दर्शन तो बहुत दिनों के बाद हुए।

मिसेज सेवक ने सूखी हँसी हँसकर कहा—अभी मेरी वापसी की मुलाकात आपके जिम्मे बाकी है।

रानी—आप मुझसे मिलने आईं ही कबघ् पहले भी सोफिया से मिलने आई थींए और आज भी। मैं तो आज आपको एक खत लिखनेवाली थीए अगर बुरा न मानिए तो एक बात पूछूँघ्

मिसेज सेवक—पूछिएए बुरा क्यों मानूँगी।

रानी—मिस सोफिया की उम्र तो ज्यादा हो गईए आपने उसकी शादी की कोई फिक्र की या नहींघ् अब तो उसका जितनी जल्दी विवाह हो जाएए उतना ही अच्छा। आप लोगों में लड़कियाँ बहुत सयानी होने पर ब्याही जाती हैं।

मिसेज सेवक—इसकी शादी कब की हो गई होतीए कई अंगरेज बेतरह पीछे पड़ेए लेकिन यह राजी ही नहीं होती। इसे धर्म—ग्रंथों से इतनी रुचि है कि विवाह को जंजाल समझती है। आजकल जिलाधीश मिस्टर क्लार्क के पैगाम आ रहे हैं। देखूँए अब भी राजी होती है या नहीं। आज मैं उसे ले जाने ही के इरादे से आई हूँ। मैं हिंदुस्तानी ईसाइयों से नाते नहीं जोड़ना चाहती। उनका रहन—सहन मुझे पसंद नहीं हैए और सोफी जैसी सुशिक्षिता लड़की के लिए कोई अंगरेज पति मिलने में कोई कठिनाई नहीं हो सकती।

जाह्नवी—मेरे विचार में विवाह सदैव अपने स्वजातियों में करना चाहिए। योरपियन लोग हिंदुस्तानी ईसाइयों का बहुत आदर नहीं करतेए और अनमेल विवाहों का परिणाम अच्छा नहीं होता।

मिसेज सेवक—(गर्व के साथ) ऐसा कोई योरपियन नहीं हैए जो मेरे खानदान में विवाह करना मर्यादा के विरुध्द समझे। हम और वे एक हैं। हम और वे एक ही खुदा को मानते हैंए एक ही गिरजा में प्रार्थना करते हैं और एक ही नबी के अनुचर हैं। हमारा और उनका रहन—सहनए खान—पानए रीति—व्यवहार एक है। यहाँ अंगरेजों के समाज मेंए क्लब मेंए दावतों में हमारा एक—सा सम्मान होता है। अभी तीन—चार दिन हुएए लड़कियों को इनाम देने का जलसा था। मिस्टर क्लार्क ने खुद मुझे उस जलसे का प्रधान बनाया और मैंने ही इनाम बाँटे। किसी हिंदू या मुसलमान लेडी को यह सम्मान न प्राप्त हो सकता था।

रानी—हिंदू या मुसलमानए जिन्हें कुछ भी अपने जातीय गौरव का खयाल हैए अंगरेजों के साथ मिलना—जुलना अपने लिए सम्मान की बात नहीं समझते। यहाँ तक कि हिंदुओं में जो लोग अंगरेजों से खान—पान रखते हैंए उन्हें लोग अपमान की द्रष्टि से देखते हैंए शादी—विावह का तो कहना ही क्या! राजनीतिक प्रभुत्व की बात और है। डाकुओं का एक दल विद्वानों की एक सभा को बहुत आसानी से परास्त कर सकता है। लेकिन इससे विद्वानों का महत्व कुछ कम नहीं होता। प्रत्येक हिंदू जानता है कि मसीह बौध्द काल में यहीं आए थेए यहीं उनकी शिक्षा हुई थी और जो ज्ञान उन्होंने यहाँ प्राप्त कियाए उसी का पश्चिम में प्रचार किया। फिर कैसे हो सकता है कि हिंदू अंगरेजों को श्रेष्ठ समझेंघ्

दोनों महिलाओं में इसी तरह नोक—झोंक होती रही। दोनों एक दूसरे को नीचा दिखाना चाहती थींय दोनों एक दूसरे के मनोभावों को समझती थीं। कृतज्ञता या धन्यवाद के शब्द किसी के मुँह से न निकले। यहाँ तक कि जब मिसेज सेवक विदा होने लगींए तो रानी जाह्नवी उनको पहुँचाने के लिए कमरे के द्वार तक भी न गईं। अपनी जगह पर बैठे—बैठे हाथ बढ़़ा दिया और अभी मिसेज सेवक कमरे ही में थीं कि अपना समाचार—पत्र पढ़़ने लगीं।

मिसेज सेवक सोफिया के पास आईंए तो वह तैयार थी। किताबों के गट्ठर बँधो हुए थे। कई दासियाँ इधार—उधार इनाम के लालच में खड़ी थीं। मन मं प्रसन्न थींए किसी तरह यह बला टली। सोफिया बहुत उदास थी। इस घर को छोड़ते हुए उसे दुरूख हो रहा था। उसे अपने उद्दिष्ट स्थान का पता न था। उसे कुछ मालूम न था कि तकदीर कहाँ ले जाएगीए क्या—क्या विपत्तियाँ झेलनी पड़ेंगीए जीवन—नौका किस घाट लगेगी। उसे ऐसा मालूम हो रहा था कि विनयसिंह से फिर मुलाकात न होगीए उनसे सदा के लिए बिछुड़ रही हूँ। रानी की अपमान—भरी बातेंए उनकी भर्त्‌सना और अपनी भ्रांति सब कुछ भूल गई। हृदय के एक—एक तार से यही धवनि निकल रही थी—अब विनय से फिर भेंट न होगी।

मिसेज सेवक बोलीं—कुँवर साहब से भी मिल लूँ।

सोफिया डर रही थी कि कहीं मामा को रात की घटना की खबर न मिल जाएए कुँवर साहब कहीं दिल्लगी—ही—दिल्लगी में कह न डालें। बोली—उनसे मिलने में देर होगीए फिर मिल लीजिएगा।

मिसेज सेवक—फिर किसे इतनी फुर्सत है!

दोनों कुँवर साहब के दीवानखाने में पहुँचीं। यहाँ इस वक्त स्वयंसेवकों की भीड़ लगी हुई थी। गढ़़वाल प्रांत में दुर्भिक्ष का प्रकोप था। न अन्न थाए न जल। जानवर मरे जाते थेए पर मनुष्यों को मौत भी न आती थीय एड़ियाँ रगड़ते थेए सिसकते थे। यहाँ से पचास स्वयंसेवकों का एक दलए पीड़ितों का कष्ट निवारण करने के लिए जानेवाला था। कुँवर साहब इस वक्त उन लोगों को छाँट रहे थेय उन्हें जरूरी बातें समझा रहे थे। डॉक्टर गांगुली ने इस वृध्दावस्था में भी इस दल का नेतृत्व स्वीकार कर लिया था। दोनों आदमी इतने व्यस्त थे कि मिसेज सेवक की ओर किसी ने धयान न दिया। आखिर वह बोलीं—डॉक्टर साहबए आपका कब जाने का विचार हैघ्

कुँवर साहब ने मिसेज सेवक की तरफ देखा और बड़े तपाक से आगे बढ़़कर हाथ मिलायाए कुशल—समाचार पूछा और ले जाकर एक कुर्सी पर बैठा दिया। सोफिया माँ के पीछे जाकर खड़ी हो गई।

कुँवर साहब—ये लोग गढ़़वाल जा रहे हैं। आपने पत्रों में देखा होगाए वहाँ लोगों पर कितना घोर संकट पड़ा हुआ है।

मिसेज सेवक—खुदा इन लोगों का उद्योग सफल करें। इनके त्याग की जितनी भी प्रशंसा की जाएए कम है। मैं देखती हूँए यहाँ इनकी खास तादाद है।

कुँवर साहब—मुझे इतनी आशा न थीए विनय की बातों पर विश्वास न होता थाए सोचता थाए इतने वालंटीयर कहाँ मिलेंगे। सभी को नवयुवकों के निरुत्साह का रोना रोते हुए देखता थाए श्इनमें जोश नहीं हैए त्याग नहीं हैए जान नहीं हैए सब अपने स्वार्थ—चिंतन में मतवाले हो रहे हैं। कितनी ही सेवा—समितियाँ स्थापित हुईं पर एक भी पनप न सकी। लेकिन अब मुझे अनुभव हो रहा है कि लोगों को हमारे नवयुवकों के विषय में कितना भ्रम हुआ था। अब तक तीन सौ नाम दर्ज हो चुके हैं। कुछ लोगों ने आजीवन सेवा—धर्म पालन करने का व्रत लिया है। इनमें कई आदमी तो हजारों रुपये माहवार की आय पर लात मारकर आए हैं। इनका सत्साहस देखकर मैं बहुत आशावादी हो गया हूँ।

मिसेज सेवक—मिस्टर क्लार्क कल आपकी बहुत प्रशंसा कर रहे थे। ईश्वर ने चाहाए तो आप शीघ्र सी.आई.ई. होंगे और मुझे आपको बधाई देने का अवसर मिलेगा।

कुँवर साहब—(लजाते हुए) मैं इस सम्मान के योग्य नहीं हूँ। मिस्टर क्लार्क मुझे इस योग्य समझते हैंए तो वह उनकी कृपा—द्रष्टि है। मिस सेवकए तैयार रहनाए कल तीन बजे के मेल से ये लोग सिधारेंगे। प्रभु ने भी आने का वादा किया है।

मिसेज सेवक—सोफी तो आज घर जा रही है। (मुस्कराकर) शायद आपको जल्द ही इसका कन्यादान देना पड़े। (धीरे से) मिस्टर क्लार्क जाल फैला रहे हैं।

सोफिया शर्म से गड़ गई। उसे अपनी माता के ओछेपन पर क्रोध आ रहा था—इन सब बातों का ढ़िंढ़ोरा पीटने की क्या जरूरत हैघ् क्या यह समझती हैं कि मि. क्लार्क का नाम लेने से कुँवर साहब रोब में आ जाएँगेघ्

कुँवर साहब—बड़ी खुशी की बात है। सोफीए देखोए हम लोगों को और विशेषतरू अपने गरीब भाइयों को न भूल जाना। तुम्हें परमात्मा ने जितनी सहृदयता प्रदान की हैए वैसा ही अच्छा अवसर भी मिल रहा है। हमारी शुभेच्छाएँ सदैव तुम्हारे साथ रहेंगी। तुम्हारे एहसान से हमारी गरदन सदा दबी रहेगी। कभी—कभी हम लोगों को याद करती रहना। मुझे पहले न मालूम थाए नहीं तो आज इंदु को अवश्य बुला भेजता। खैरए देश की दशा तुम्हें मालूम है। मिस्टर क्लार्क बहुत ही होनहार आदमी हैं। एक दिन जरूर यह इस देश के किसी प्रांत के विधाता होंगे। मैं विश्वास के साथ यह भविष्यवाणी कर सकता हूँ। उस वक्त तुम अपने प्रभावए योग्यता और अधिकार से देश को बहुत कुछ लाभ पहुँचा सकोगी। तुमने अपने स्वदेशवासियों की दशा देखी हैए उनकी दरिद्रता का तुम्हें पूर्ण अनुभव है। इस अनुभव का उनकी सेवा और सुधार में सद्व्‌यय करना।

सोफिया मारे शर्म के कुछ बोल न सकी। माँ ने कहा—आप रानीजी को जरूर साथ लाइएगा। मैं कार्ड भेजूँगी।

कुँवर साहब—नहीं मिसेज सेवकए मुझे क्षमा कीजिएगा। मुझे खेद है कि मैं उस उत्सव में सम्मिलित न हो सकूँगा। मैंने व्रत कर लिया है कि राज्याधिकारियों से कोई सम्पर्क न रखूँगा। हाकिमों की कृपा—द्रष्टिए ज्ञात या अज्ञात रूप से हम लोगों को आत्मसेवी और निरंकुश बना देती है। मैं अपने को इस परीक्षा में नहीं डालना चाहताय क्योंकि मुझे अपने ऊपर विश्वास नहीं है। मैं अपनी जाति में राजा और प्रजा तथा छोटे और बड़े का विभेद नहीं करना चाहता। सब प्रजा हैंए राजा है वह भी प्रजा हैए रंक है वह भी प्रजा है। झूठे अधिकार के गर्व से अपने सिर को नहीं फिराना चाहता।

मिसेज सेवक—खुदा ने आपको राजा बनाया है। राजों ही के साथ तो राजा का मेल हो सकता है। अंगरेज लोग बाबुओं को मुँह नहीं लगातेए क्योंकि इससे यहाँ के राजों का अपमान होता है।

डॉ. गांगुली—मिसेज सेवकए यह बहुत दिनों तक राजा रह चुका हैए अब इसका जी भर गया है। मैं इसका बचपन का साथी हूँ। हम दोनों साथ—साथ पढ़़ते थे। देखने में यह मुझसे छोटा मालूम होता हैए पर कई साल बड़ा है।

मिसेज सेवक—(हँसकर) डॉक्टर के लिए यह तो कोई गर्व की बात नहीं है।

डॉ. गांगुली—हम दूसरों का दवा करना जानते हैंए अपना दवा करना नहीं जानता। कुँवर साहब उसी बखत से च्मेपउपेज है। उसी च्मेपउपेउ ने इसकी शिक्षा में बाधा डाली। अब भी इसका वही हाल है। हाँए अब थोड़ा फेरफार हो गया है। पहले कर्म से भी निराशावादी था और वचन से भी। अब इसके वचन और कर्म में सा—श्य नहीं है। वचन से तो अब भी च्मेपउपेज हैय पर काम वह करता हैए जिसे कोई पक्का व्चजपउपेज ही कर सकता है।

कुँवर साहब—गांगुलीए तुम मेरे साथ अन्याय कर रहे हो। मुझमें आशावादिता के गुण ही नहीं हैं। आशावादी परमात्मा का भक्त होता हैए पक्का ज्ञानीए पूर्ण ऋषि। उसे चारों ओर परमात्मा की ही ज्योति दिखाई देती है। इसी में उसे भविष्य पर अविश्वास नहीं होता। मैं आदि से भोग—विलास का दास रहा हूँय वह दिव्य ज्ञान न प्राप्त कर सकाए जो आशावादिता की कु़जी है। मेरे लिए च्मेपउपेउ के सिवा और कोई मार्ग नहीं है। मिसेज सेवकए डॉक्टर महोदय के जीवन का सार है—आत्मोत्सर्ग। इन पर जितनी विपत्तियाँ पड़ींए वे किसी ऋषि को नास्तिक बना देतीं। जिस प्राणी के सात बेटे जवान हो—होकर दगा दे जाएँए पर वह अपनेर् कर्तव्य—मार्ग से जरा भी विचलित न होए ऐसा उदाहरण विरला ही कहीं मिलेगा। इनकी हिम्मत तो टूटना जानती ही नहींए आपदाओं की चोटें इन्हें और भी ठोस बना देती हैं। मैं साहसहीनए पौरुषहीन प्राणी हूँ। मुझे यकीन नहीं आता कि कोई शासक जाति शासितों के साथ न्याय और साम्य का व्यवहार कर सकती है। मानव—चरित्र को मैं किसी देश मेंए किसी काल मेंए इतना निष्काम नहीं पाता। जिस राष्ट्र ने एक बार अपनी स्वाधीनता खो दीए वह फिर उस पद को नहीं पा सकता। दासता ही उसकी तकदीर हो जाती है। किंतु हमारे डॉक्टर बाबू मानव—चरित्र को इतना स्वार्थी नहीं समझते। इनका मत है कि हिंसक पशुओं के हृदय में भी अनंत ज्योति की किरणें विद्यमान रहती हैंए केवल परदे को हटाने की जरूरत है। मैं अंगरेजों की तरफ से निराश हो गया हूँए इन्हें विश्वास है कि भारत का उध्दार अंगरेज—जाति ही के द्वारा होगा।

मिसेज सेवक—(रुखाई से) तो क्या आप यह नहीं मानते कि अंगरेजों ने भारत के लिए जो कुछ किया हैए वह शायद ही किसी जाति ने किसी जाति या देश के साथ किया होघ्

कुँवर साहब—नहींए मैं यह नहीं मानता।

मिसेज सेवक—(आश्चर्य से) शिक्षा का इतना प्रचार और भी किसी काल में हुआ थाघ्

कुँवर साहब—मैं उसे शिक्षा ही नहीं कहताए जो मनुष्य को स्वार्थ का पुतला बना दे।

मिसेज सेवक—रेलए तारए जहाजए डाकए ये सब विभूतियाँ अंगरेजों ही के साथ आईं!

कुँवर साहब—अंगरेजों के बगैर भी आ सकती थींए और अगर आई भी हैं तो अधिकतर अंगरेजों ही के लाभ के लिए।

मिसेज सेवक—ठीक हैए ऐसा न्याय—विधान पहले कभी न था।

कुँवर साहब—ठीक हैए ऐसा न्याय—विधान कहाँ थाए जो अन्याय को न्याय और असत्य को सत्य सिध्द कर दे! यह न्याय नहींए न्याय का गोरखधंधा है।

सहसा रानी जाह्नवी कमरे में आईं। सोफिया का चेहरा उन्हें देखते ही सूख गयाए वह कमरे के बाहर निकल आईए रानी के सामने खड़ी न रह सकी। मिसेज सेवक को भी शंका हुई कि कहीं चलते—चलते रानी से फिर न विवाद हो जाए। वह भी बाहर चली आईं। कुँवर साहब ने दोनों को फिटन पर सवार कराया। सोफिया ने सजल नेत्रों से कर जोड़कर कुँवरजी को प्रणाम किया। फिटन चली। आकाश पर काली घटा छाई हुई थीए फिटन सड़क पर तेजी से दौड़ी चली जाती थी और सोफिया बैठी रो रही थी। उसकी दशा उस बालक की—सी थीए जो रोटी खाता हुआ मिठाईवाले की आवाज सुनकर उसके पीछे दौड़ेए ठोकर खाकर गिर पड़ेए पैसा हाथ से निकल जाए और वह रोता हुआ घर लौट आवे द्य

'''

अध्याय 15

राजा महेंद्रकुमार सिंह यद्यपि सिध्दांत के विषय में अधिकारियों से जौ—भर भी न दबते थेय पर गौण विषयों में वह अनायास उनसे विरोध करना व्यर्थ ही नहींए जाति के लिए अनुपयुक्त भी समझते थे। उन्हें शांत नीति पर जितना विश्वास थाए उतना उग्र नीति पर न थाए विशेषतरू इसलिए कि वह वर्तमान परिस्थिति में जो कुछ सेवा कर सकते थेए वह शासकों के विश्वासपात्रा होकर ही कर सकते थे। अतएव कभी—कभी उन्हें विवश होकर ऐसी नीति का अवलम्बन करना पड़ता थाए जिससे उग्र नीति के अनुयायियों को उन पर उँगली उठाने का अवसर मिलता था। उनमें यदि कोई कमजोरी थीए तो यह कि वह सम्मान—लोलुप मनुष्य थेय और ऐसे अन्य मनुष्यों की भाँति वह बहुत औचित्य की द्रष्टि से नहींए ख्याति लाभ की द्रष्टि से अपने आचरण का निश्चय करते थे। पहले उन्होंने न्याय—पक्ष लेकर जॉन सेवक को सूरदास की जमीन दिलाने से इनकार कर दिया थाय पर अब उन्हें इसके विरुध्द आचरण करने के लिए बाधय होना पड़ रहा था। अपने सहवर्गियों को समझाने के लिए तो पाँड़ेपुरवालों को ताहिर अली के घर में घुसने पर उद्यत होना ही काफी थाय पर यथार्थ में जॉन सेवक और मिस्टर क्लार्क की पारस्परिक मैत्री ने ही उन्हें अपना फैसला पलट देने को प्रेरित किया था। पर अभी तक उन्होंने बोर्ड में इस प्रस्ताव को उपस्थित न किया था। यह शंका होती थी कि कहीं लोग मुझे एक धानी व्यापारी के साथ पक्षपात करने का दोषी न ठहराने लगें। उनकी आदत थी कि बोर्ड में प्रस्ताव रखने के पहले वह इंदु सेए और इंदु न होतीए तो अपने इष्ट—मित्रों से परामर्श कर लिया करते थेय उनके सामने अपना पक्ष—समर्थन करकेए उनकी शंकाओं का समाधान करने का प्रयास करकेए अपना इतमीनान कर लेते थे। यद्यपि इस तर्कयुध्द से कोई अंतर न पड़ताए वह अपने पक्ष पर स्थिर रहतेय पर घंटे—दो घंटे के विचार—विनिमय से उनको बड़ा आश्वासन मिलता था।

तीसरे पहर का समय था। समिति के सेवक गढ़़वाल जाने के लिए स्टेशन पर जमा हो रहे थे। इंदु ने गाड़ी तैयार करने का हुक्म दिया। यद्यपि बादल घिरा हुआ था और प्रतिक्षण गगन श्याम वर्ण हुआ जाता थाए किंतु सेवकों को विदा करने के लिए स्टेशन पर जाना जरूरी था। जाह्नवी ने उसे बहुत आग्रह करके बुलाया था। वह जाने को तैयार ही थी कि राजा साहब अंदर आए और इंदु को कहीं जाने को तैयार देखकर बोले—कहाँ जाती होए बादल घिरा हुआ है।

इंदु—समिति के लोग गढ़़वाल जा रहे हैं। उन्हें विदा करने स्टेशन जा रही हूँ। अम्माँजी ने बुलाया भी है।

राजा—पानी अवश्य बरसेगा।

इंदु—परदा डाल दूँगीय और भीग भी गईए तो क्याघ् आखिर वे भी तो आदमी ही हैंए जो लोक—सेवा के लिए इतनी दूर जा रहे हैं।

राजा—न जाओए तो कोई हरज हैघ् स्टेशन पर भीड़ बहुत होगी।

इंदु—हरज क्या होगाए मैं जाऊँ या न जाऊँय वे लोग तो जाएँगे हीए पर दिल नहीं मानता। वे लोग घर—बार छोड़कर जा रहे हैंए न जाने क्या—क्या कष्ट उठाएँगेए न जाने कब लौटेंगेए मुझसे इतना भी न हो कि उन्हें विदा कर आऊँघ् आप भी क्यों नहीं चलतेघ्

राजा—(विस्मित होकर) मैंघ्

इंदु—हाँ—हाँए आपके जाने में कोई हरज हैघ्

राजा—मैं ऐसी संस्थाओं में सम्मिलित नहीं होता!

इंदु—कैसी संस्थाओं मेंघ्

राजा—ऐसी ही संस्थाओं में!

इंदु—क्या सेवा—समितियों से सहानुभूति रखना भी आपत्तिजनक हैघ् मैं तो समझती हूँए ऐसे शुभ कायोर्ं में भाग लेना किसी के लिए भी लज्जा या आपत्ति की बात नहीं हो सकती।

राजा—तुम्हारी समझ में और मेरी समझ में बड़ा अंतर है। यदि मैं बोर्ड का प्रधान न होताए यदि मैं शासन का एक अंग न होताए अगर मैं रियासत का स्वामी न होताए तो स्वच्छंदता से प्रत्येक सार्वजनिक कार्य में भाग लेता। वर्तमान स्थिति में मेरा किसी संस्था में भाग लेना इस बात का प्रमाण समझा जाएगा कि राज्याधिकारियों को उससे सहानुभूति है। मैं यह भ्रांति नहीं फैलाना चाहता। सेवा समिति युवकों का दल हैए और यद्यपि इस समय उसने सेवा का आदर्श अपने सामने रखा है और वह सेवा—पथ पर ही चलने की इच्छा रखती हैय पर अनुभव ने सिध्द कर दिया है कि सेवा और उपकार बहुधा ऐसे रूप धारण कर लेते हैंए जिन्हें कोई शासन स्वीकार नहीं कर सकता और प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से उसे उसका मूलोच्छेद करने के प्रयत्न करने पड़ते हैं। मैं इतना बड़ा उत्तरदायित्व अपने सिर पर नहीं लेना चाहता।

इंदु—तो आप इस पद को त्याग क्यों नहीं देतेघ् अपनी स्वाधीनता का क्यों बलिदान करते हैंघ्

राजा—केवल इसलिए कि मुझे विश्वास है कि नगर का प्रबंध जितनी सुंदरता से मैं कर सकता हूँए और कोई नहीं कर सकता। नगरसेवा का ऐसा अच्छा और दुर्लभ अवसर पाकर मैं अपनी स्वच्छंदता की जरा भी परवा नहीं करता। मैं एक राज्य का अधीश हूँ और स्वभावतरू मेरी सहानुभूति सरकार के साथ है। जनवाद और साम्यवाद का सम्पत्ति से वैर है। मैं उस समय तक साम्यवादियों का साथ न दूँगाए जब तक मन में यह निश्चय न कर लूँ कि अपनी सम्पत्ति त्याग दूँगा। मैं वचन से साम्यवाद का अनुयायी बनकर कर्म से उसका विरोधी नहीं बनना चाहता। कर्म और वचन में इतना घोर विरोध मेरे लिए असह्य है। मैं उन लोगों को धूर्त और पाखंडी समझता हूँए जो अपनी सम्पत्ति को भोगते हुए साम्य की दुहाई देते फिरते हैं। मेरी समझ में नहीं आता कि साम्यदेव के पुजारी बनकर वह किस मुँह से विशाल प्रासादों में रहते हैंए मोटर—बोटों में जल—क्रीड़ा करते हैं और संसार के सुखों का दिल खोलकर उपभोग करते हैं। अपने कमरे से फर्श हटा देना और सादे वस्त्र पहन लेना ही साम्यवाद नहीं है। यह निर्लज्ज धूर्तता हैए खुला हुआ पाखंड है। अपनी भोजनशाला के बचे—खुचे टुकड़ों को गरीबों के सामने फेंक देना साम्यवाद को मुँह चिढ़़ानाए उसे बदनाम करना है।

यह कटाक्ष कुँवर साहब पर था। इंदु समझ गई। त्योरियाँ बदल गईंए किंतु उसने जब्त किया और इस अप्रिय प्रसंग को समाप्त करने के लिए बोली—मुझे देर हो रही हैए तीन बजनेवाले हैंए साढ़़े तीन पर गाड़ी छूटती हैए अम्माँजी से मुलाकात हो जाएगीए विनय का कुशल—समाचार भी मिल जाएगा। एक पंथ दो काज होंगे।

राजा साहब—जिन कारणों से मेरा जाना अनुचित हैए उन्हीं कारणों से तुम्हारा जाना अनुचित है। तुम जाओ या मैं जाऊँए एक ही बात है।

इंदु उसी पाँव अपने कमरे में लौट आई और सोचने लगी—यह अन्याय नहींए तो और क्या हैघ् घोर अत्याचार! कहने को तो मैं रानी हूँए लेकिन इतना अख्तियार भी नहीं कि घर से बाहर जा सकूँ। मुझसे तो लौंडियाँ ही अच्छी हैं। चित्ता बहुत खिन्न हुआए अॉंखें सजल हो गईं। घंटी बजाई और लौंडी से कहा—गाड़ी खुलवा दोए मैं स्टेशन न जाऊँगी।

महेंद्रकुमार भी उसके पीछे—पीछे कमरे में जाकर बोले—कहीं सैर क्यों नहीं कर आतींघ्

इंदु—नहींए बादल घिरा हुआ हैए भीग जाऊँगी।

राजा साहब—क्या नाराज हो गईंघ्

इंदु—नाराज क्यों हूँघ् आपके हुक्म की लौंडी हूँ। आपने कहाए मत जाओए न जाऊँगी।

राजा साहब—मैं तुम्हें विवश नहीं करना चाहता। यदि मेरी शंकाओं को जान लेने के बाद भी तुम्हें वहाँ जाने में कोई आपत्ति नहीं दिखलाई पड़तीए तो शौक से जाओ। मेरा उद्देश्य केवल तुम्हारी सद्‌बुध्दि को प्रेरित करना था। मैं न्याय के बल से रोकना चाहता हूँए आज्ञा के बल से नहीं। बोलोए अगर तुम्हारे जाने से मेरी बदनामी होए तो तुम जाना चाहोगीघ्

यह चिड़िया के पर काटकर उसे उड़ाना था। इंदु ने उड़ने की चेष्टा ही न की। इस प्रश्न का केवल एक ही उत्तर हो सकता था—कदापि नहींए यह मेरे धर्म के प्रतिकूल है। किंतु इंदु को अपनी परवशता इतनी अखर रही थी कि उसने इस प्रश्न को सुना ही नहींए या सुना भीए तो उस पर धयान न दिया। उसे ऐसा जान पड़ाए यह मेरे जले पर नमक छिड़क रहे हैं। अम्माँ अपने मन में क्या कहेंगीघ् मैंने बुलायाए और नहीं आई! क्या दौलत की हवा लगीघ् कैसे क्षमा—याचना करूँघ् यदि लिखूँए अस्वस्थ हूँए तो वह एक क्षण में यहाँ आ पहुँचेंगी और मुझे लज्जित होना पड़ेगा। आह! अब तक तो वहाँ पहुँच गई होती। प्रभु सेवक ने बड़ी प्रभावशाली कविता लिखी होगी। दादाजी का उपदेश भी मार्के का होगा। एक—एक शब्द अनुराग और प्रेम में डूबा होगा। सेवक—दल वर्दी पहने कितना सुंदर लगता होगा!

इन कल्पनाओं ने इंदु को इतना उत्सुक किया कि वह दुराग्रह करने को उद्यत हो गई। मैं तो जाऊँगी। बदनामी नहींए पत्थर होगी। ये सब मुझे रोक रखने के बहाने हैं। तुम डरते होय अपने कमोर्ं के फल भोगोय मैं क्यों डरूँघ् मन में यह निश्चय करके उसने निश्चयात्मक रूप से कहा—आपने मुझे जाने की आज्ञा दे दीए मैं जाती हूँ।

राजा ने भग्न हृदय होकर कहा—तुम्हारी इच्छाए जाना चाहती होए शौक से जाओ।

इंदु चली गईए तो राजा साहब सोचने लगे—स्त्रियाँ कितनी निष्ठुरए कितनी स्वच्छंदताप्रियए कितनी मानशील होती हैं! चली जा रही हैंए मानो मैं कुछ हूँ ही नहीं। इसकी जरा भी चिंता नहीं कि हुक्काम के कानों तक यह बात पहुँचेगीए तो वह मुझे क्या कहेंगे। समाचार—पत्रों के संवाददाता यह वृत्तांत अवश्य ही लिखेंगेए और उपस्थित महिलाओं में चतारी की रानी का नाम मोटे अक्षरों में लिखा हुआ नजर आएगा। मैं जानता कि इतना हठ करेगीए तो मना ही क्यों करताए खुद भी साथ जाता। एक तरफ बदनाम होताए तो दूसरी ओर बखान होता। अब तो दोनों ओर से गया। इधार भी बुरा बनाए उधार भी बुरा बना। आज मालूम हुआ कि स्त्रियों के सामने कोरी साफगोई नहीं चलतीए वे लल्लो—चप्पो ही से राजी रहती हैं।

इंदु स्टेशन की तरफ चलीय पर ज्यों—ज्यों आगे बढ़़ती थीए उसका दिल एक बोझ से दबा जाता था। मैदान में जिसे हम विजय कहते हैंए घर में उसी का नाम अभिनयशीलताए निष्ठुरता और अभद्रता है। इंदु को इस विजय पर गर्व न था। अपने हठ का खेद था। सोचती जाती थी—वह मुझे अपने मन में कितनी अभिमानिनी समझ रहे होंगे। समझते होंगेए जब यह जरा—जरा बातों में यों अॉंखें फेर लेती हैए जरा—जरा—से मतभेद में यों लड़ने के लिए तैयार हो जाती हैए तो किसी कठिन अवसर पर इससे सहानुभूति की क्या आशा की जा सकती है! अम्माँजी यह सुनेंगीए तो मुझी को बुरा कहेंगी। निस्संदेह मुझसे भूल हुई। लौट चलूँ और उनसे अपने अपराध क्षमा कराऊँ। मेरे सिर पर न जाने क्यों भूत सवार हो जाता है। अनायास ही उलझ पड़ी! भगवान्‌ मुझे कब इतनी बुध्दि होगी कि उनकी इच्छा के सामने सिर झुकाना सीखूँगीघ्

इंदु ने बाहर की तरफ सिर निकालकर देखाए स्टेशन का सिगनल नजर आ रहा था। नर—नारियों के समूह स्टेशन की ओर दौड़े चले जा रहे थे। सवारियों का ताँता लगा हुआ था। उसने कोचवान से कहा—गाड़ी फेर दोए मैं स्टेशन न जाऊँगीए घर की तरफ चलो।

कोचवान ने कहा—सरकार अब तो आ गएय वह देखिएए कई आदमी मुझे इशारा कर रहे हैं कि घोड़ों को बढ़़ाओए गाड़ी पहचानते हैं।

इंदु—कुछ परवा नहींए फौरन घोड़े फेर दो।

कोचवान—क्या सरकार की तबीयत कुछ खराब हो गई क्याघ्

इंदु—बक—बक मत करोए गाड़ी लौटा ले चलो।

कोचवान ने गाड़ी फेड़ दी। इंदु ने एक लम्बी साँस ली और सोचने लगी—सब लोग मेरा इंतजार कर रहे होंगेय गाड़ी देखते ही पहचान गए थे। अम्माँ कितनी खुश हुई होंगीय पर गाड़ी लौटते देखकर उन्हें और अन्य सब आदमियों को कितना विस्मय हुआ होगा! कोचवान से कहा—जरा पीछे फिरकर देखोए कोई आ तो नहीं रहा हैघ्

कोचवान—हुजूरए कोई गाड़ी तो आ रही।

इंदु—घोड़ों को तेज कर दोए चौगाम छोड़ दो।

कोचवान—हुजूरए गाड़ी नहींए मोटर हैए साफ मोटर है।

इंदु—घोड़ों को चाबुक लगाओ।

कोचवान—हुजूरए यह तो अपनी ही मोटर मालूम होती हैए हींगनसिंह चला रहे हैं। खूब पहचान गयाए अपनी ही मोटर है।

इंदु—पागल होए अपनी मोटर यहाँ क्यों आने लगीघ्

कोचवान—हुजूरए अपनी मोटर न होए तो जो चोर की सजाए वह मेरी। साफ नजर आ रही हैए वही रंग है। ऐसी मोटर इस शहर में दूसरी है ही नहीं।

इंदु—जरा गौर से देखो।

कोचवान—क्या देखूँ हुजूरए वह आ पहुँचीए सरकार बैठे हैं।

इंदु—ख्वाब तो नहीं देख रहा है!

कोचवान—लीजिएए हुजूरए यह बराबर आ गई।

इंदु ने घबराकर बाहर देखाए तो सचमुच अपनी ही मोटर थी। गाड़ी के बराबर आकर रुक गई और राजा साहब उतर पड़े कोचवान ने गाड़ी रोक दी। इंदु चकित होकर बोली—आप कब आ गएघ्

राजा—तुम्हारे आने के पाँच मिनट बाद मैं भी चल पड़ा।

इंदु—रास्ते में तो कहीं नहीं दिखाई दिए।

राजा—लाइन की तरफ से आया हूँ। इधार की सड़क खराब है। मैंने समझाए जरा चक्कर तो पड़ेगाए मगर जल्द पहुँचूँगा। तुम स्टेशन के सामने से कैसे लौट आईंघ् क्या बात हैघ् तबियत तो अच्छी हैघ् मैं तो घबरा गया। आओए मोटर पर बैठ जाओ। स्टेशन पर गाड़ी आ गई हैए दस मिनट में छूट जाएगी। लोग उत्सुक हो रहे हैं।

इंदु—अब मैं न जाऊँगी। आप तो पहुँच ही गए थे।

राजा—तुम्हें चलना ही पड़ेगा।

इंदु—मुझे मजबूर न कीजिएए मैं न जाऊँगी।

राजा—पहले तो तुम यहाँ आने के लिए इतनी उत्सुक थींए अब क्यों इनकार कर रही होघ्

इंदु—आपकी इच्छा के विरुध्द आई थी। आपने मेरे कारण अपने नियम का उल्लंघन किया हैए तो मैं किस मुँह से वहाँ जा सकती हूँघ् आपने मुझे सदा के लिए शालीनता का सबक दे दिया।

राजा—मैं उन लोगों से तुम्हें लाने का वादा कर आया हूँ। तुम न चलोगीए तो मुझे कितना लज्जित होना पड़ेगा।

इंदु—आप व्यर्थ इतना आग्रह कर रहे हैं। आपको मुझसे नाराज होने का यह अंतिम अवसर था। अब फिर इतना दुस्साहस न करूँगी।

राजा—एंजिन सीटी दे रहा है।

इंदु—ईश्वर के लिए मुझे जाने दीजिए।

राजा ने निराश होकर कहा—जैसी तुम्हारी इच्छा! मालूम होता हैए हमारे और तुम्हारे ग्रहों में कोई मौलिक विरोध हैए जो पग—पग पर अपना फल दिखलाता रहता है।

यह कहकर वह मोटर पर सवार हो गएए और बड़े वेग से स्टेशन की तरफ से चले। बग्घी भी आगे बढ़़ी। कोचवान ने पूछा—हुजूर गईं क्यों नहींघ् सरकार बुरा मान गए।

इंदु ने इसका कुछ जवाब न दिया। वह सोच रही थी—क्या मुझसे फिर भूल हुईघ् क्या मेरा जाना उचित थाघ् क्या वह शुध्द हृदय से मेरे जाने के लिए आग्रह कर रहे थे या एक थप्पड़ लगाकर दूसरा थप्पड़ लगाना चाहते थेघ् ईश्वर ही जानें। वही अंतर्यामी हैंए मैं किसी के दिल की बात क्या जानूँ!

गाड़ी धीरे—धीरे आगे बढ़़ती जाती थी। आकाश पर छाए हुए बादल फटते जाते थेय पर इंदु के हृदय पर छाई हुई घटा प्रतिक्षण और भी घनी होती जाती थी—आह! क्या वस्तुतरू हमारे ग्रहों में कोई मौलिक विरोध हैए जो पग—पग पर मेरी आकांक्षाओं को दलित करता रहता हैघ् मैं कितना चाहती हूँ कि उनकी इच्छा के विरुध्द एक कदम भी न चलूँय किंतु यह प्रकृति—विरोध मुझे हमेशा नीचा दिखाता है। अगर वह शुध्द मन से अनुरोध कर रहे थेए तो मेरा इनकार सर्वथा असंगत था। आह! उन्हें मेरे हाथों फिर कष्ट पहुँचा। उन्होंने अपनी स्वाभाविक सज्जनता से मेरा अपराध क्षमा किया और मेरा मान रखने के लिए अपने सिध्दांत की परवा न की। समझे होंगेए अकेली जाएगीए तो लोग खयाल करेंगेए पति की इच्छा के विरुध्द आई हैए नहीं तो क्या वह भी न आतेघ् मुझे इस अपमान से बचाने के लिए उन्होंने अपने ऊपर इतना अत्याचार किया। मेरी जड़ता से वह कितने हताश हुए हैंए नहीं तो उनके मुँह से यह वाक्य कदापि न निकलता। मैं सचमुच अभागिनी हूँ।

इन्हीं विषादमय विचारों में डूबी हुई वह चंद्रभवन पहुँची और गाड़ी से उतरकर सीधो राजा साहब के दीवानखाने में जा बैठी। अॉंखें चुरा रही थी कि किसी नौकर—चाकर से सामना न हो जाए। उसे ऐसा जान पड़ता था कि मेरे मुख पर कोई दाग लगा हुआ है। जी चाहता थाए राजा साहब आते—ही—आते मुझ पर बिगड़ने लगेंए मुझे खूब आड़े हाथों लेंए हृदय को तानों से चलनी कर देंए यही उनकी शुध्द—हृदयता का प्रमाण होगा। यदि वह आकर मुझसे मीठी—मीठी बातें करने लगेंए तो समझ जाऊँगीए मेरी तरफ से उनका दिल साफ नहीं हैए यह सब केवल शिष्टाचार है। वह इस समय पति की कठोरता की इच्छुक थी। गरमियों में किसान वर्षा का नहींए ताप का भूखा होता है।

इंदु को बहुत देर तक न बैठना पड़ा। पाँच बजते—बजते राजा साहब आ पहुँचे। इंदु का हृदय धाक—धाक करने लगाए वह उठकर द्वार पर खड़ी हो गई। राजा साहब उसे देखते ही बड़े मधुर स्वर से बोले—तुमने आज जातीय उद्‌गारों का एक अपूर्व —श्य देखने का अवसर खो दिया। बड़ा ही मनोहर —श्य था। कई हजार मनुष्यों ने जब यात्रियों पर पुष्प—वर्षा कीए तो सारी भूमि फूलों से ढ़ँक गई। सेवकों का राष्ट्रीय गान इतना भावमयए इतना प्रभावोत्पादक था कि दर्शक—वृंद मुग्धा हो गए। मेरा हृदय जातीय गौरव से उछला पड़ता था। बार—बार यही खेद होता है कि तुम न हुईं। यही समझ लो कि मैं उस आनंद को प्रकट नहीं कर सकता। मेरे मन में सेवा—समिति के विषय में जितनी शंकाएँ थींए वे सब शांत हो गईं। यही जी चाहता था कि मैं भी सब कुछ छोड़—छाड़कर इस दल के साथ चला जाता। डॉक्टर गांगुली को अब तक मैं निरा बकवादी समझता था। आज मैं उनका उत्साह और साहस देखकर दंग रह गया। तुमसे बड़ी भूल हुई। तुम्हारी माताजी बार—बार पछताती थीं।

इंदु को जिस बात की शंका थीए वह पूरी हो गई। सोचा—यह सब कपटलीला है। इनका दिल साफ नहीं है। यह मुझे बेवकूफ समझते हैं और बेवकूफ बनाना चाहते हैं। इन मीठी बातों की आड़ में कितनी कटुता छिपी हुई है। चिढ़़कर बोली—मैं जातीए तो आपको जरूर बुरा मालूम होता।

राजा—(हँसकर) केवल इसलिए कि मैंने तुम्हें जाने से रोका थाघ् अगर मुझे बुरा मालूम होताए तो मैं खुद क्यों जाताघ्

इंदु—मालूम नहींए आप क्या समझकर गए। शायद मुझे लज्जित करना चाहते होंगे।

राजा—इंदुए इतना अविश्वास मत करो। सच कहता हूँए मुझे तुम्हारे जाने का जरा मलाल न होता। मैं यह स्वीकार करता हूँ कि पहले मुझे तुम्हारी जिद बुरी लगीय किंतु जब मैंने विचार कियाए तो मुझे अपना आचरण सर्वथा अन्यायपूर्ण प्रतीत हुआ। मुझे ज्ञात हुआ कि तुम्हारी स्वेच्छा को इतना दबा देना सर्वथा अनुचित है। अपने इसी अन्याय का प्रायश्चित्त करने के लिए मैं स्टेशन गया। तुम्हारी यह बात मेरे मन में बैठ गई कि हुक्काम का विश्वासपात्रा बने रहने के लिए अपनी स्वाधीनता का बलिदान क्यों करते होए नेकनाम रहना अच्छी बात हैए किंतु नेकनामी के लिए सच्ची बातों में दबना अपनी आत्मा की हत्या करना है। अब तो तुम्हें मेरी बातों का विश्वास आयाघ्

इंदु—आपकी दलीलों का जवाब नहीं दे सकतीय लेकिन मैं आपसे प्रार्थना करती हूँ कि जब मुझसे कोई भूल हो जाएए तो आप मुझे दंड दिया करेंए मुझे खूब धिक्कारा करें। अपराध और दंड में कारण और कार्य का सम्बंध हैए और यही मेरी समझ में आता है। अपराधी के सिर तेल चुपड़ते मैंने किसी को नहीं देखा। मुझे यह अस्वाभाविक जान पड़ता है। इससे मेरे मन में भाँति—भाँति की शंकाएँ उठने लगती हैं।

राजा—देवी रूठती हैंए तो लोग उन्हें मनाते हैं। इसमें अस्वाभाविकता क्या है!

दोंनों में देर तक सवाल—जवाब होता रहा। महेंद्र बहेलिए की भाँति दाना दिखाकर चिड़िया फँसाना चाहते थे और चिड़िया सशंक होकर उड़ जाती थी। कपट में से कपट ही पैदा होता है। वह इंदु को आश्वासित न कर सके। तब वह उनकी व्यथा को शांत करने का भार समय पर छोड़कर एक पत्र पढ़़ने लगे और इंदु दिल पर बोझ रखे हुए अंदर चली गई।

दूसरे दिन राजा साहब ने दैनिक पत्र खोलाए तो उसमें सेवकों की यात्रा का वृत्तांत बड़े विस्तार से प्रकाशित हुआ था। इसी प्रसंग में लेखक ने राजा साहब की उपस्थिति पर भी टीका की थी रू

श्इस अवसर पर म्युनिसिपैलिटी के प्रधान राजा महेंद्रकुमार सिंह का मौजूद होना बड़े महत्व की बात है। आश्चर्य है कि राजा साहब—जैसे विवेकशील पुरुष ने वहाँ जाना क्यों आवश्यक समझाघ् राजा साहब अपने व्यक्तित्व को अपने पद से पृथक्‌ नहीं कर सकते और उनकी उपस्थिति सरकार को उलझन में डालने का कारण हो सकती है। अनुभव ने यह बात सिध्द कर दी है कि सेवा—समितियाँ चाहे कितनी शुभेच्छाओं से भी गर्भित होंए पर कालांतर में वे विद्रोह और अशांति का केंद्र बन जाती हैं। क्या राजा साहब इसका जिम्मा ले सकते हैं कि यह समिति आगे चलकर अपनी पूर्ववर्ती संस्थाओं का अनुसरण न करेगीघ् श्

राजा साहब ने पत्र बंद करके रख दिया और विचारमग्न हो गए! उनके मुँह से बेअख्तियार निकल गया—वही हुआ जिसका मुझे डर था। आज क्लब जाते—ही—जाते मुझ पर चारों ओर से संदेहात्मक द्रष्टि पड़ने लगेगी। कल ही कमिश्नर साहब से मिलने जाना हैए उन्होंने पूछा तो क्या कहूँगाघ् इस दुष्ट सम्पादक ने मुझे बुरा चरका दिया। पुलिसवालों की भाँति इस समुआय में भी मुरौवत नहीं होतीए जरा भी रिआयत नहीं करते। मैं इसका मुँह बंद रखने के लिएए इसे प्रसन्न रखने के लिए कितने यत्न किया करता हूँय आवश्यक और अनावश्यक विज्ञापन छपवाकर इसकी मुट्ठियाँ गरम करता रहता हूँय जब कोई दावत या उत्सव होता हैए तो सबसे पहले इसे निमंत्रण भेजता हूँय यहाँ तक कि गत वर्ष म्युनिसिपैलिटी से इसे पुरस्कार भी दिला दिया था। इन सब खातिरदारियों का यह उपहार है! कुत्तो की दुम को सौ वषोर्ं तक गाड़ रखोए तो भी टेढ़़ी—की—टेढ़़ी। अब अपनी मान—रक्षा क्योंकर करूँ। इसके पास जाना तो उचित नहीं। क्या कोई बहाना सोचूँघ्

राजा साहब बड़ी देर तक इसी पेसोपेश में पड़े रहे। कोई ऐसी बात सोच निकालना चाहते थेए जिससे हुक्काम की निगाहों में आबरू बनी रहेए साथ ही जनता के सामने भी अॉंखें नीची न करनी पड़ेंय पर बुध्दि कुछ काम न करती थी। कई बार इच्छा हुई कि चलकर इंदु से इस समस्या को हल करने में मदद लूँए पर यह समझकर कि कहीं वह कह दे कि श्हुक्काम नाराज होते हैंए तो होने दोए तुम्हें उनसे क्या सरोकारय अगर वे तुम्हें दबाएँए तो तुरंत त्याग—पत्र भेज दोश्ए तो फिर मेरे लिए निकलने का कोई रास्ता न रहेगाए उससे कुछ कहने की हिम्मत न पड़ी।

वह सारी रात इसी चिंता में डूबे रहे। इंदु भी कुछ गुमसुम थी। प्रातरूकाल दो—चार मित्र आ गए और उसी लेख की चर्चा की। एक साहब बोले—मैं कमिश्नर से मिलने गया थाए तो वह उसी लेख को पढ़़ रहा था और रह—रहकर जमीन पर पैर पटकता था।

राजा साहब के होश और भी उड़ गए। झट उन्हें एक उपाय सूझ गया। मोटर तैयार कराई और कमिश्नर के बँगले पर जा पहुँचे। यों तो यह महाशय राजा साहब का कार्ड पाते ही बुला लिया करते थेए आज अरदली ने कहा—साहब एक जरूरी काम कर रहे हैंए मेम साहब बैठी हैंए आप एक घंटा ठहरें।

राजा साहब समझ गए कि लक्षण अच्छे नहीं हैं। बैठकर एक अंगरेजी पत्रिका के चित्र देखने लगे—वाहए कितने साफ और सुंदर चित्र हैं! हमारी पत्रिकाओं में कितने भद्दे चित्र होते हैंए व्यर्थ ही कागज लीप—पोतकर खराब किया जाता है। किसी ने बहुत कियाए तो बिहारीलाल के भावों को लेकर एक सुंदरी का चित्र बनवा दिया और उसके नीचे उसी भाव का दोहा लिख दियाय किसी ने पद्‌माकर के कवित्ता को चित्रित किया। बसए इसके आगे किसी की अक्ल नहीं दौड़ती।

किसी तरह एक घंटा गुजरा और साहब ने बुलाया। राजा साहब अंदर गए तो साहब की त्योरियाँ चढ़़ी हुई देखीं। एक घंटे इंतजार से झुँझला गए थेए खड़े—खड़े बोले—आपको अवकाश होए तो मैं कुछ कहूँए नहीं तो फिर कभी आऊँगा।

कमिश्नर साहब ने रुखाई से पूछा—मैं पहले आपसे यह पूछना चाहता हूँ कि इस पत्र ने आपके विषय में जो आलोचना की हैए वह आपकी नजर से गुजरी हैघ्

राजा साहब—जी हाँए देख चुका हूँ।

कमिश्नर—आप इसका कोई जवाब देना चाहते हैंघ्

राजा साहब—मैं इसकी कोई जरूरत नहीं समझताय अगर इतनी—सी बात पर मुझ पर अविश्वास किया जा सकता है और मेरी बरसों की वफादारी का कुछ विचार नहीं किया जाताए तो मुझे विवश होकर अपना पद—त्याग करना पड़ेगा। अगर आप वहाँ जातेए तो क्या इस पत्र को इतना साहस होता कि आपके विषय में यही आलोचना करताघ् हरगिज नहीं। यह मेरे भारतवासी होने का दंड है। जब तक मुझ पर ऐसी द्वेषपूर्ण टीका—टीप्पणी होती रहेगीए मैं नहीं समझ सकता कि अपनेर् कर्तव्य का कैसे पालन कर सकूँगा।

कमिश्नर ने कुछ नरम होकर कहा—गवर्नमेंट के हर एक कर्मचारी का धर्म है कि किसी को अपने ऊपर ऐेसे इलजाम लगाने का अवसर न दे।

राजा साहब—मैं जानता हूँ आप लोगों को यह किसी तरह भूल नहीं सकते कि मैं भारतवासी हूँए इसी प्रकार मेरे बोर्ड के सहयोगियों के लिए यह भूल जाना असम्भव है कि मैं शासन का एक अंग हूँ। आप जानते हैं कि मैं बोर्ड में मिस्टर जॉन सेवक को पाँड़ेपुर की जमीन दिलाने का प्रस्ताव करनेवाला हूँय लेकिन जब तक मैं अपने आचरण से यह सिध्द न कर दूँगा कि मैंने स्वतरूए बगैर किसी दबाव केए केवल प्रजा के हित के लिए यह प्रस्ताव उपस्थित किया हैए उसकी स्वीकृति की कोई आशा नहीं है। यही कारण हैए जो मुझे कल स्टेशन पर ले गया था।

कमिश्नर की बाँछें खिल गईं। हँस—हँसकर बातें बनाने लगा।

राजा साहब—ऐसी दशा में क्या आप समझते हैंए मेरा जवाब देना जरूरी हैघ्

कमिश्नर—नहीं—नहींए कभी नहीं।

राजा साहब—मुझे आपसे पूरी सहायता मिलनी चाहिए।

कमिश्नर—मैं यथाशक्ति आपकी सहायता करूँगा।

राजा साहब—बोर्ड ने मंजूर भी कर लियाए तो मुहल्लेवालों की तरफ से फसाद की आशंका है।

कमिश्नर—कुछ परवा नहींए मैं सुपरिंटेंडेंट—पुलिस को ताकीद कर दूँगा कि वह आपको मदद करते रहें।

राजा साहब यहाँ से चलेए तो ऐसा मालूम होता थाए मानो आकाश पर चल रहे हों। यहाँ से वह मि. क्लार्क के पास गए और वहाँ भी इसी नीति से काम लिया। दोपहर को घर आए। उनके हृदय में यह खयाल खटक रहा था कि इस बहाने से मेरा काम तो निकल गयाय लेकिन मैं सूरदास के साथ कहीं ऐसी ज्यादती तो नहीं कर रहा हूँ कि अंत में मुझे नगरवासियों के सामने लज्जित होना पड़ेघ् इसी विषय में बातचीत करने के लिए वह इंदु के पास आए और बोले—तुम कोई जरूरी काम तो नहीं कर रही होघ् मुझे एक बात में तुमसे कुछ सलाह करनी है।

इंदु डरी कि कहीं सलाह करते—करते वाद—विवाद न होने लगे। बोली—काम तो कुछ नहीं कर रही हूँय लेकिन मैं आपको कोई सलाह देने के योग्य नहीं हूँ। परमात्मा ने मुझे इतनी बुध्दि नहीं दी। मुझे तो उन्होंने केवल खानेए सोने और आपको दिक करने के लिए बनाया है।

राजा साहब—तुम्हारे दिक करने ही में तो मजा मिलता है। बतलाओए सूरदास की जमीन के बारे में तुम्हारी क्या राय हैघ् तुम मेरी जगह होतीं तो क्या करतींघ्

इंदु—आखिर आपने क्या निश्चय कियाघ्

राजा साहब—पहले तुम बताओए तो फिर मैं बताऊँगा।

इंदु—मेरी राय में तो सूरदास से उसके बाप—दादों की जायदाद छीन लेना अन्याय होगा।

राजा साहब—तुम्हें मालूम है कि सूरदास को इस जायदाद से कोई लाभ नहीं होताए केवल इधार—उधार के ढ़ोर चरा करते हैंघ्

इंदु—उसे यह इतमीनान तो है कि जमीन मेरी है। मुहल्लेवाले उसका एहसान तो मानते ही होंगेघ् उसकी धर्म—प्रवृत्ति पुण्य कार्य से संतुष्ट होगी।

राजा साहब—लेकिन मैं नगर के मुख्य व्यवस्थापक की हैसियत से एक व्यक्ति के यथार्थ या कल्पित हित के लिए नगर का हजारों रुपये का नुकसान तो नहीं करा सकताघ् कारखाना खुलने से हजारों मनुष्यों की जीविका चलेगीए नगर की आय में वृध्दि होगीए सबसे बड़ी बात यह है कि उस अमित धान का भाग देश में रह जाएगाए जो सिगरेट के लिए अन्य देशों को देना पड़ता है।

इंदु ने राजा के मुँह की ओर तीव्र द्रष्टि से देखा। सोचा—इनका अभिप्राय क्या हैघ् पूँजीपतियों से तो इन्हें विशेष प्रेम नहीं है। यह तो सलाहए नहींए बहस है। क्या अधिकारियों के दबाव से इन्होंने जमीन को मिस्टर सेवक के अधिकार में देने का फैसला कर लिया है और मुझसे अपने निश्चय का अनुमोदन कराना चाहते हैंघ् इनके भाव से तो कुछ ऐसा ही प्रकट हो रहा है। बोली—इस द्रष्टिकोण से तो यही न्यायसंगत है कि सूरदास की जमीन छीन ली जाए।

राजा साहब—भईए इतनी जल्द पहलू बदलने की सनद नहीं। अपनी उसी युक्ति पर स्थिर रहो। मैं केवल सलाह नहीं चाहताए मैं यह देखना चाहता हूँ कि तुम इस विषय में क्या—क्या शंकाएँ कर सकती होए और मैं उनका संतोषजनक उत्तर दे सकता हूँ या नहींघ् मुझे जो कुछ करना थाए कर चुकाय अब तुमसे तर्क करके अपना इतमीनान करना चाहता हूँ।

इंदु—अगर मेरे मुँह से कोई अप्रिय शब्द निकल जाएए तो आप नाराज तो न होंगेघ्

राजा साहब—इसकी परवा न करोए जातीय सेवा का दूसरा नाम बेहयाई है। अगर जरा—जरा—सी बात पर नाराज होने लगेंए तो हमें पागलखाने जाना पड़े।

इंदु—यदि एक व्यक्ति के हित के लिए आप नगर का अहित नहीं करना चाहते तो क्या सूरदास ही ऐसा व्यक्ति हैए जिसके पास दस बीघे जमीन होघ् ऐसे लोग भी तो नगर में हैंए जिनके पास इससे कहीं ज्यादा जमीन है। कितने ही ऐसे बँगले हैंए जिनका घेरा दस बीघे से अधिक है। हमारे बँगले का क्षेत्र पंद्रह बीघे से कम न होगा। मि. सेवक के बँगले का भी पाँच बीघे से कम का घेरा नहीं है और दादाजी का भवन तो पूरा एक गाँव है। आप इनमें से कोई भी जमीन इस कारखाने के लिए ले सकते हैं। सूरदास की जमीन में तो मोहल्ले के ढ़ोर चरते हैं। अधिक नहींए तो एक मोहल्ले का फायदा तो होता ही है। इन हातों से तो एक व्यक्ति के सिवा और किसी का कुछ फायदा नहीं होताए यहाँ तक कि कोई उनमें सैर भी नहीं कर सकताए एक फूल या पत्ती भी नहीं तोड़ सकता। अगर कोई जानवर अंदर चला जाएए तो उसे तुरंत गोली मार दी जाए।

राजा साहब—(मुस्कराकर) बड़े मार्के की युक्ति है। कायल हो गया। मेरे पास इसका कोई जवाब नहीं। लेकिन शायद मालूम नहीं कि उस अंधे को तुम जितना दीन और असहाय समझती होए उतना नहीं है। सारा मोहल्ला उसकी हिमायत करने पर तैयार हैय यहाँ तक कि लोग मि. सेवक के गुमाश्ते के घर में घुस गएए उनके भाइयों को माराए आग लगा दीए स्त्रियों तक की बेइज्जती की।

इंदु—मेरे विचार में तो यह इस बात का एक और प्रमाण है कि उस जमीन को छोड़ दिया जाए। उस पर कब्जा करने से ऐसी घटनाएँ कम न होंगीए बढ़़ेंगी। मुझे तो भय हैए कहीं खून—खराबा न हो जाए।

राजा साहब—जो लोग स्त्रियों की बेइज्जती कर सकते हैंए वे दया के योग्य नहीं।

इंदु—जिन लोगों की जमीन आप छीन लेंगेए वे आपके पाँव न सहलाएँगे।

राजा साहब—आश्चर्य हैए तुम स्त्रियों के अपमान को मामूली बात समझ रही हो।

इंदु—फौज के गोरेए रेल के कर्मचारीए नित्य हमारी बहनों का अपमान करते रहते हैंए उनसे तो कोई नहीं बोलता। इसीलिए कि आप उनका कुछ बिगाड़ नहीं सकते। अगर लोगों ने उपद्रव किया हैए तो अपराधियों पर मुकदमा दायर कीजिएए उन्हें दंड दिलाइए। उनकी जायदाद क्यों जब्त करते हैंघ्

राजा साहब—तुम जानती होए मि. सेवक की यहाँ के अधिकारियों से कितनी राह—रस्म है। मिस्टर क्लार्क तो उनके द्वार के दरबान बने हुए हैं। अगर मैं उनकी इतनी सेवा न कर सकाए तो हुक्काम का विश्वास मुझ पर से उठ जाएगा।

इंदु ने चिंतित स्वर में कहा—मैं नहीं जानती थी कि प्रधान की दशा इतनी शोचनीय होती है।

राजा साहब—अब तो मालूम हो गया। बतलाओए अब मुझे क्या करना चाहिएघ्

इंदु—पद—त्याग।

राजा साहब—मेरे पद त्याग से जमीन बच सकेगीघ्

इंदु—आप दोष—पाप से तो मुक्त हो जाएँगे!

राजा साहब—ऐसी गौण बातों के लिए पद—त्याग हास्यजनक है।

इंदु को अपने पति के प्रधान होने का बड़ा गर्व था। इस पद को वह बहुत श्रेष्ठ और आदरणीय समझती थी। उसका ख्याल था कि यहाँ राजा साहब पूर्ण रूप से स्वतंत्रा हैंए बोर्ड उनके अधाीन हैए जो चाहते हैंए करते हैंए पर अब विदित हुआ कि उसे कितना भ्रम था। उसका गर्व चूर—चूर हो गया। उसे आज ज्ञात हुआ कि प्रधान केवल राज्याधिकारियों के हाथों का खिलौना है। उनकी इच्छा से जो चाहे करेए उनकी इच्छा के प्रतिकिूल कुछ नहीं कर सकता। वह संख्या का बिंदु हैए जिसका मूल्य केवल दूसरी संख्याओं के सहयोग पर निर्भर है। राजा साहब की पद—लोलुपता उसे कुठाराघात के समान लगी। बोली—उपहास इतना निंद्य नहीं हैए जितना अन्याय। मेरी समझ में नहीं आता कि आपने इस पद की कठिनाइयों को जानते हुए भी क्यों इसे स्वीकार किया। अगर आप न्याय—विचार से सूरदास की जमीन का अपहरण करतेए तो मुझे आपसे कोई शिकायत न होतीय लेकिन केवल अधिकारियों के भय से या बदनामी से बचने के लिए न्याय—पथ से मुँह फेरना अत्यंत अपमानजनक है। आपको नगरवासियों और और विशेषतरू दीनजनों के स्वत्व की रक्षा करनी चाहिए। अगर हुक्काम किसी पर अत्याचार करेंए तो आपको उचित है कि दुखियों की हिमायत करें। निजी हानि—लाभ की चिंता न करके हुक्काम का विरोध करेंए सारे नगर में—सारे देश में—तहलका मचा देंए चाहे इसके लिए पद—त्याग ही नहींए किसी बड़ी—से—बड़ी विपत्ति का सामना करना पड़े। मैं राजनीति के सिध्दांतों से परिचित नहीं हूँ। पर आपका जो मानवीय धर्म हैए वह आपसे कह रही हूँ। मैं आपको सचेत किए देती हूँ कि आपने अगर हुक्काम के दबाव से सूरदास की जमीन लीए तो मैं चुपचाप बैठी न रह सकूँगी। स्त्री हूँ तो क्याय पर दिखा दूँगी कि सबल—से—सबल प्राणी भी किसी दीन को आसानी से पैरों—तले नहीं कुचल सकता।

यह कहते—कहते इंदु रुक गई। उसे धयान आ गया कि मैं आवेश में आकर औचित्य की सीमा से बाहर होती जाती हूँ। राजा साहब इतने लज्जित हुए कि बोलने को शब्द न मिलते थे। अंत में शरमाते हुए बोमले—तुम्हें मालूम नहीं कि राष्ट्र के सेवकों को कैसी—कैसी मुसीबतें झेलनी पड़ती हैं। अगर वे अपनेर् कर्तव्य का निर्भय होकर पालन करने लगेंए तो जितनी सेवा वे अब कर सकते हैंए उतनी भी न कर सकें। मि. क्लार्क और मि. सेवक में विशेष घनिष्ठता हो जाने के कारण परिस्थिति बिलकुल बदल गई है। मिस सेवक जब से तुम्हारे घर से गई हैए मि. क्लार्क नित्य ही उन्हीं के पास बैठे रहते हैंए इजलास पर नहीं जातेए कोई सरकारी काम नहीं करतेए किसी से मिलते तक नहीं। मिस सेवक ने उन पर मोहिनी—मंत्र—सा डाल दिया है। दोनों साथ—साथ सैर करने जाते हैंए साथ—साथ थिएटर देखने जाते हैं। मेरा अनुमान है कि मि. सेवक ने वचन दे दिया है।

इंदु—इतनी जल्दी! अभी उसे हमारे यहाँ से गए एक सप्ताह से ज्यादा न हुआ होगा।

राजा साहब—मिसेज सेवक ने पहले से ही सब कुछ पक्का कर रखा था। मिस सेवक के वहाँ जाते ही प्रेम—क्रीड़ा शुरू हो गई।

इंदु ने अब तक सोफिया को एक साधारण ईसाई की लड़की समझ रखा था। यद्यपि वह उससे बहन का—सा बर्ताव करती थीए उसकी योग्यता का आदर करती थीए उससे प्रेम करती थीए किंतु दिल में उसे अपने से नीचा समझती थी। पर मि. क्लार्क से उसके विवाह की बात ने उसके हृद्‌गत भावों को आंदोलित कर दिया। सोचने लगी—मि. क्लार्क से विवाह हो जाने के बाद जब सोफिया मिसेज क्लार्क बनकर मुझसे मिलेगीए तो अपने मन में मुझे तुच्छ समझेगीय उसके व्यवहार मेंए बातों मेंए शिष्टाचार में बनावटी नम्रता की झलक होगीए वह मेरे सामने जितना ही झुकेगीए उतना ही मेरा सिर नीचा करेगी। यह अपमान मेरे सहे न सहा जाएगा। मैं उससे नीची बनकर नहीं रह सकती। इस अभागे क्लार्क को क्या कोई योरपियन लेडी न मिलती थी कि सोफिया पर गिर पड़ा! कुल का नीचा होगाए कोई अंगरेज उससे अपनी लड़की का विवाह करने पर राजी न होता होगा। विनय इसी छिछोरी स्त्री पर जान देता है। ईश्वर ही जानेए अब उस बेचारे की क्या दशा होगी। कुलटा हैए और क्या। जाति और कुल का प्रभाव कहाँ जाएगाघ् सुंदरी हैए सुशिक्षित हैए चतुर हैए विचारशील हैए सब कुछ सहीय पर है तो ईसाइन। बाप ने लोगों को ठग—ठगाकर कुछ धान और सम्मान प्राप्त कर लिया है। इससे क्या होता है। मैं तो अब भी उससे वही पहले का—सा बर्ताव करूँगी। जब तक वह स्वयं आगे न बढ़़ेगीए हाथ न बढ़़ाऊँगी। लेकिन मैं चाहे जो कुछ करूँए उस पर चाहे कितना ही बड़प्पन जताऊँए उसके मन में यह अभिमान तो अवश्य ही होगा कि मेरी एक कड़ी निगाह उसके पति के सम्मान और अधिकार को खाक में मिला सकती है। सम्भव हैए वह अब और भी विनीत भाव से पेश आए। अपने सामर्थ्‌य का ज्ञान हमें शीलवान बना देता है। मेरा उससे मान करनाए तनना हँसी मालूम होगी। उसकी नम्रता से तो उसका ओछापन ही अच्छा। ईश्वर करेए वह मुझसे सीधो मुँह बात न करेए तब देखनेवाले उसे मन में धिक्कारेंगे इसी में अब मेरी लाज रह सकती हैय पर वह इतनी अविचारशील कहाँ है!

अंत में इंदु ने निश्चय किया—मैं सोफिया से मिलूँगी ही नहीं। मैं अपने रानी होने का अभिमान तो उससे कर ही नहीं सकती। हाँए एक जाति—सेवक की पत्नी बनकरए अपने कुलगौरव का गर्व दिखाकर उसकी उपेक्षा कर सकती हूँ।

ये सब बातें एक क्षण में इंदु के मन में आ गईं। बोली—मैं आपको कभी दबने की सलाह न दूँगी।

राजा साहब—और यदि दबना पड़ेघ्

इंदु—तो अपने को अभागिनी समझूँगी।

राजा साहब—यहाँ तक तो कोई हानि नहींय पर कोई आंदोलन तो न उठाओगीघ् यह इसलिए पूछता हूँ कि तुमने अभी मुझे यह धमकी दी है।

इंदु—मैं चुपचाप न बैठूँगी। आप दबेंए मैं क्यों दबूँघ्

राजा साहब—चाहे मेरी कितनी ही बदनामी हो जाएघ्

इंदु—मैं इसे बदनामी नहीं समझती।

राजा साहब—फिर सोच लो। यह मानी हुई बात है कि वह जमीन मि. सेवक को अवश्य मिलेगी। मैं रोकना भी चाहूँए तो नहीं रोक सकताए और यह भी मानी हुई बात है कि इस विषय में तुम्हें मौनव्रत का पालन करना पड़ेगा।

राजा साहब अपने सार्वजनिक जीवन में अपनी सहिष्णुता और मृदु व्यवहार के लिए प्रसिध्द थेय पर निजी व्यवहारों में वह इतने क्षमाशील न थे। इंदु का चेहरा तमतमा उठाए तेज होकर बोली—अगर आपको अपना सम्मान प्यारा हैए तो मुझे भी अपना धर्म प्यारा है।

राजा साहब गुस्से के मारे वहाँ से उठकर चले गए और इंदु अकेली रह गई।

साठ—आठ दिनों तक दोनों के मुँह में दही जमा रहा। राजा साहब कभी घर में आ जातेए तो दो—चार बातें करके यों भागतेए जैसे पानी में भीग रहे हों। न वह बैठतेए न इंदु उन्हें बैठने को कहती। उन्हें यह दुरूख था कि इसे मेरी जरा भी परवाह नहीं है। पग—पग पर मेरा रास्ता रोकती है। मैं अपना पदत्याग दूँए तब इसे तस्कीन होगी। इसकी यही इच्छा है कि सदा के लिए दुनिया से मुँह मोड़ लूँए संसार से नाता तोड़ लूँए घर में बैठा—बैठा राम—नाम भजा करूँए हुक्काम से मिलना—जुलना छोड़ दूँए उनकी अॉंखों में गिर जाऊँए पतित हो जाऊँ। मेरे जीवन की सारी अभिलाषाएँ और कामनाएँ इसके सामने तुच्छ हैंए दिल में मेरे सम्मान—भक्ति पर हँसती है। शायद मुझे नीचए स्वार्थी और आत्मसेवी समझती है। इतने दिनों तक मेरे साथ रहकर भी इसे मुझसे प्रेम नहीं हुआए मुझसे मन नहीं मिला। पत्नी पति की हितचिंतक होती हैए यह नहीं कि उसके कामों का मजाक उड़ाएए उसकी निंदा करे। इसने साफ कह दिया है कि मैं चुपचाप न बैठूँगी। न जाने क्या करने का इरादा है। अगर समाचारपत्रों में एक छोटा—सा पत्र भी लिख देगीए तो मेरा काम तमाम हो जाएगाए कहीं का न रहूँगाए डूब मरने का समय होगा। देखूँए यह नाव कैसे पार लगती है।

इधार इंदु को दुरूख था कि ईश्वर ने इन्हें सब कुछ दिया हैए यह हाकिमों से क्यों इतना दबते हैंए क्यों इतनी ठकुरसुहाती करते हैंए अपने सिध्दांतों पर स्थिर क्यों नहीं रहतेए उन्हें क्यों स्वार्थ के नीचे रखते हैंए जाति—सेवा का स्वाँग क्यों भरते हैंघ् वह भी कोई आदमी हैए जिसने मानापमान के पीछे धर्म और न्याय का बलिदान कर दिया होघ् एक वे योध्दा थेए जो बादशाहों के सामने सिर न झुकाते थेए अपने वचन परए अपनी मर्यादा पर मर मिटते थे। आखिर लोग इन्हें क्या कहते होंगे। संसार को धोखा देना आसान नहीं। इन्हें चाहे भ्रम हो कि लोग मुझे जाति का सच्चा भक्त समझते हैंय पर यथार्थ में सभी इन्हें पहचानते हैं। सब मन में कहते होंगेए कितना बना हुआ आदमी है!

शनैरू—शनैरू उसके विचारों में परिवर्तन होने लगा—यह उनका कसूर नहीं हैए मेरा कसूर है। मैं क्यों उन्हें अपने आदर्श के अनुसार बनाना चाहती हूँघ् आजकल प्रायरू इसी स्वभाव के पुरुष होते हैं। उन्हें संसार चाहे कुछ कहेए चाहे कुछ समझेए पर उनके घरों में तो कोई मीन—मेख नहीं निकालता। स्त्री कार् कर्तव्य है कि अपने पुरुष की सहगामिनी बने। पर प्रश्न यह हैए क्या स्त्री का अपने पुरुष से पृथक्‌ कोई अस्तित्व नहीं हैघ् इसे तो बुध्दि स्वीकार नहीं करती। दोनों अपने कर्मानुसार पाप—पुण्य के अधिकारी होते हैं। वास्तव में यह हमारे भाग्य का दोष हैए ण्अन्यथा हमारे विचारों में क्यों इतना भेद होताघ् कितना चाहती हूँ कि आपस में कोई अंतर न होने पाएए कितना बचाती हूँए पर आए दिन कोई—न—कोई विघ्न उपस्थित हो ही जाता है। अभी एक घाव नहीं भरने पाया था कि दूसरा चरका लगा। क्या मेरा सारा जीवन यों ही बीतेगाघ् हम जीवन में शांति की इच्छा रखते हैंए प्रेम और मैत्री के लिए जान देते हैं। जिसके सिर पर नित्य नंगी तलवार लटकती होए उसे शांति कहाँघ् अंधेर तो यह है कि मुझे चुप भी नहीं रहने दिया जाता। कितना कहती थी कि मुझे इस बहस में न घसीटीएए इन काँटों में न दौड़ाइएए पर न माना। अब जो मेरे पैरों में काँटे चुभ गएए दर्द से कराहती हूँए तो कानों पर उँगली रखते हैं। मुझे रोने की स्वाधीनता भी नहीं। श्जबर मारे और रोने न दे।श् आठ दिन गुजर गएए बात भी नहीं पूछी कि मरती हो या जीती। बिल्कुल उसी तरह पड़ी हूँए जैसे कोई सराय हो। इससे तो कहीं अच्छा था कि मर जाती। सुख गयाए आराम गयाए पल्ले क्या पड़ाए रोना और झींकना। जब यही दशा हैए तो कब तक निभेगीए श्बकरे की माँ कब तक खैर मनाएगीघ् श् दोनों के दिल एक दूसरे से फिर जाएँगेए कोई किसी की सूरत भी न देखना चाहेगा।

शाम हो गई थी। इंदु का चित्ता बहुत घबरा रहा था। उसने सोचाए जरा अम्माँ जी के पास चलूँ कि सहसा राजा साहब सामने आकर खड़े हो गए। मुख निष्प्रभ हो रहा थाए मानो घर में आग लगी हुई हो। भय—कम्पित स्वर में बोले—इंदुए मिस्टर क्लार्क मिलने आए हैं। अवश्य उसी जमीन के सम्बंध में कुछ बातचीत करेंगे। अब मुझे क्या सलाह देती होघ् मैं एक कागज लाने का बहाना करके चला आया हूँ।

यह कहकर उन्होंने बड़े कातर नेत्रों से इंदु की ओर देखाए मानो सारे संसार की विपत्ति उन्हीं के सिर आ पड़ी होए मानो कोई देहाती किसान पुलिस के पंजे में फँस गया हो। जरा साँस लेकर फिर बोले—अगर मैंने इनसे विरोध कियाए तो मुश्किल में फँस जाऊँगा। तुम्हें मालूम नहींए इन अंगरेज हुक्काम के कितने अधिकार होते हैं। यों चाहूँए तो इसे नौकर रख लूँए मगर इसकी एक शिकायत में मेरी सारी आबरू खाक में मिल जाएगी। ऊपरवाले हाकिम इसके खिलाफ मेरी एक भी न सुनेंगे। रईसों को इतनी स्वतंत्रता भी नहींए जो एक साधारण किसान