Musafir Cafe Book Review - मुसाफिर काफे पुस्तक परिचय

मुसाफिर कैफे, दिव्य प्रकाश दुबे के काफे में मज़ेदार चाय के साथ पराठे वाली फीलिंग कराने वाली कहानी है।

कहानी की शुरूआत ही दमदार है, लेखक के अपने शब्दों में कहें तो
"बातों को जब पहली बार किसीने संभाल के रखा होगा तब पहला पन्ना बना होगा, ऐसे पन्नों को जोड़कर पहली किताब बनी होगी। कहानी लिखते लिखते लेखक खुद कहानी बन जाता है।"

क्या हम कभी मिले हैं?
हाँ शायद
कहाँ?
किसी किताब में जो अभी लिखी ही नहीं गई...

कहानी शुरू हुई एक लडके और लड़की की मुलाकात से और उनके बीच की बातचीत बहुत दिलचस्प रही। कुश अजनबी इतना दिल खोलके बात करते हैं जैसे वो बहुत करीबी दोस्त हों। समाज के खोखले रीति रिवाजों को सुंदर मज़ाकिया तरिके से पेश किया गया है।

हमारे समाज का सबसे मज़बूत रिश्ता मतलब "शादी"।
पर क्या हमने इस रिश्ते को करीब से देखा और महसूस किया है या फिर बस इसके बंधक बनकर कभी अधूरी या फिर पूरी ज़िन्दगी जी लेते हैं?

शादी के विषय पर लेखक के किरदार कुश फॉरवर्ड लगे पर शायद वर्तमान या फिर मेट्रो सिटी में यही किरदार जी रहे है या फिर आकार ले रहे हैं।
ये किरदार वो सब कर रहे हैं जो शादीशुदा दम्पत्ति करता है पर वे शादी नहीं कर रहे। यहाँ लड़की के पास एक ठोस वजह है जो उसे शादी जैसी सदियों पुरानी प्रथा में अविश्वास दिलाती है।

अनकही बातों को समझना, ईमानदारी से अपनी बात को अगले के सामने रखना और कोई सहानुभूति की उम्मीद नहीं रखना, रिश्तों को बहुत नज़दीकी से और किरदारों के संवाद से इस कहानी में समझाया गया है। मज़बूत रिश्ते आपको कभी बांधेंगे नहीँ। वो आपको खुला छोड़ेंगे ताकि आपको उनका मतलब और मजबूती दोंनो ही खोजने का समय मिले। 

इस किताब का दूसरा पहलू भी खुश कम दिलचस्प नहीं।
कहानी का हीरो एक टॉप परफॉर्मर होने के बावजूद अपनी जॉब से खुश नहीं। आजकल यह बहुत सुनने और देखने को मिला है। 

पूरी दुनिया के लिए सफलता का एक ही पर्याय है "पैसा कमाना", इस पर लेखक ने बहुत बड़ा सवाल उठा दिया है।
हम क्यों जी रहे हैं उसको खोजना जीवन का एक मतलब ढूंढना मुश्किल है पर उसका एक प्रयास तो करना होता है। हर एक व्यक्ति बहुत बड़ा नहीं हो सकता पर क्या हम अपनी छोटी सी दुनियां बनाकर बड़े हो सकते हैं?
कहानी का हीरो आने वाले समय मे शायद युवाओं के लिए मिसाल बन जाए।

उनके एक किरदार का कहना है
"लाइफ की कोई मीनिंग नहीं होती। उसमें मीनिंग डालना पड़ता है। कभी अपने पागलपन से तो कभी अपने सपनों से।"

तीसरा पहलू है अकेलापन या फिर कहें अपने अकेलेपन से प्यार।
लेखक ने अकेले कुश पल या फिर कुश दिन बिताने पर, अकेले घूमने पर और उससे मिलने वाले लाइफ लेसन्स पर इस कहानी में कई बार विशेष चर्चा की है जैसे कि वे कहते हैं "
सच्चि आज़ादी का मतलब अपनी मर्ज़ी से भटकना है।"

मुझे लेखक के लिखने का तरीके बहुत पसंद आया , खास तौर पर उनके फिलोसोफी और फंडे के बीच का सरल समझाने का तरीका | 
कहानी में कई बातें आपको लगेगा जैसे आपने ही कहीं हों या फिर किसी आपके बहुत करीबी दोस्त ने कहीं हों।

इस कहानी में मेरी कुश पसंदीदा लाइनें
"थोड़ी सी घबराहट ज़रूरी है नहीं तो फिर वो काम ज़रूरी नहीं है।"

"रोते हुए हम अपने सबसे करीब होते हैं और हंसते हुए दूसरों के।"

"थोड़ा थोड़ा गुस्सा करते रहना चाहिए। रिश्तों और ज़िन्दगी चलाते रहने के लिए अच्छा रहता है।"

लेखक ने केवल सजीव नहीं निर्जीव चीजों को भी किरदार बनाया है, कभी हवा, कभी लहरें, कभी खिड़की कभी सूरज, कभी पहाड़, कभी समंदर कुश न कहकर इन सभीने कुश न कुश कहा है । कहा क्या है गुनगुनाया है।

और आखिर में कहानी का शानदार अंत हिंदी फिल्म के क्लाइमेक्स से कम नहीं। इतने सुंदर तरीके से शुरुआत , मध्य और फिर अंत, एक पूरी हिंदी फ़िल्म देखने जैसा फील करा दिया। पर किताब का मज़ा फिल्मों से ज़्यादा आता है क्योंकि यहां हर एक सीन और बातचीत को आप बार बार पढ़के जी लेते हो।

कहानी के अंत मे आखरी सिख देते हुए लेखक कहते हैं
"बिना भटके मिली हुई मंज़िलें और जवाब दोनों ही नकली होते हैं।"

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