एक अपवित्र रात - 4

एक अपवित्र रात

(विश्वकथाएं)

(4)

आत्मस्वीकृति

गियोवानी बोकेशियो

बोकेशियो (1313-1375) विश्व साहित्य के महान व्यक्तित्वों में से एक हैं। ‘डेकामेरॉन’ की सौ कहानियाँ मजाकिया लहजे और पार्थिव दायित्वों के कारण, अपने वक्त की पहचान बन गयी हैं। इनमें जिन्दगी के प्यार और मानवीय आत्मा की झलक है। यहाँ ‘डेकामेरॉन’ की पहली कहानी का रूपान्तर दिया जा रहा है।

एक बहुत ही धनी-मानी व्यापारी था, जिसका नाम था - मेसे म्युसियाटो फ्रांजेसी। उसे नाइट का खिताब मिल गया था। कुछ ऐसी मजबूरी आयी कि उसे फ्रांस के बादशाह के भाई, कालो से जातेरा के साथ तसकानी की यात्रा पर जाना पड़ा। जिसका निवेदन मिला पोप केनोफेस से। म्युसियाटो के काम कुछ इस कदर चारों तरफ उलझे और फैले हुए थे कि वह इतनी जल्दी और आसानी से छूट नहीं पा रहा था। इसलिए उसने तय किया कि वह दूसरों के जिम्मे अपने काम सौंप देगा। लेकिन एक मुश्किल बाकी रह गयी कि कोई विश्वासी आदमी मिल सके, जो उसकी उधारी रकम का बकाया बरगुण्डियन लोगों से वसूल सके। वह जानता था कि बरगुण्डियन लोग कितने झगड़ालू, धोखेबाज और बेहूदे हैं और उनसे पार पा सकनेवाला कोई माई का लाल उसे मिल सकेगा, यह वह सोच नहीं पा रहा था।

बड़ी गहन विचारणा और चिन्तन के बाद उसे एक नाम सूझा - से सियापेलेट्टो दा प्रैटो, जो अक्सर उसके पेरिस वाले निवासस्थान पर आता-जाता था। वह बहुत ही ठिगना था लेकिन वेशभूषा से बड़ा ही तेजदम लगता था।

सियापेलेट्टो दस्तावेजों को प्रमाणित करनेवाला एक अफसर था। जब भी उसे जाली दस्तावेज बनाने को कहा जाता, वह बना देता। ऐसा वह स्वेच्छा से कर देता, जबिक दूसरा कोई अगर करता भी, तो भारी रकम लेता। वह कसमें खाकर झूठी गवाही बड़ी शान से देता। उन दिनों फ्रांसीसियों का कसमों पर बड़ा विश्वास था और झूठी कसमें खाना-खिलाना आसान नहीं रह गया था।

कुछ और भी खसूसियत उसमें थीं, जैसे शैतानियाँ, शरारतें करने में उसे तकलीफ भी उठानी पड़ जाए, तो उसे तकलीफ नहीं होती थी। अफवाहें और दुश्मनी पैदा करके दोस्त-दोस्त या रिश्तेदारों को लड़ा देने में उसे मजा आता था। कत्ल तक के षड्यन्त्र में शामिल होने में उसे शरमिन्दगी नहीं होती थी, बल्कि खुशी-खुशी वह शामिल होता था। कई बार तो उसने खुद लोगों की गरदनें साफ कर दीं।

गिरजे की तरफ कभी उसे कदम उठाते नहीं देखा गया था। औरतों की तरफ उसकी रुचि कुत्सित थी। यानी कह लीजिए कि शायद उससे ज्यादा बुरा आदमी पैदा नहीं हुआ था। लम्बे अरसे तक उसकी चालाकियाँ मेसे म्युसियाटो की मदद करती रहीं, जिसके कारण मेसे म्युसियाटो उसे फँसने से बचा लेता।

जब म्युसियाटो के दिमाग में सियापेलेट्टो का नाम आया, तो मेसे के दिमाग में उसकी सारी जिन्दगी भी कौंध गयी। और उसने तय कर लिया कि उससे बढ़कर बरगुण्डियन लोगों से निबटने वाला मुश्किल से मिल पाएगा। यह सोचकर उसने से सियापेलेट्टो को बुलवाया और उससे कहा, “से सियापेलेट्टो, तुम जानते ही हो कि मैं अब हर चीज से मुक्ति ले रहा हूँ। तमाम सारी बातों के बीच मेरी यह भी परेशानी थी कि इन बदजात बरगुण्डियन लोगों से कैसे निबटा जाएगा। तुमसे अच्छा और कोई आदमी इस काम के लिए नजर नहीं आता, जो उनसे मेरा बकाया रुपया वसूल कर सके। तुम वसूल करके लाओ। उसका उचित हिस्सा तुम्हें मिले, ऐसी भी इच्छा है।”

से सियापेलेट्टो ने फौरन काम की हाँ भर ली। अदालती अधिकार उसे मिल गये। बादशाह की तरफ से सुरक्षा सम्बन्धी कागजात भी मिल गये। यह सब साथ बटोर कर जनाब बरगुण्डी पहुँच गये। और वहाँ पहुँचकर उसने बड़े सलीके से, शान्ति से पैसे वसूलने शुरू किये - ऐसे, जैसे कि उसने अपनी सारी शैतानी हरकतें आखिर के लिए सुरक्षित रख छोड़ी थीं।

वह जिनके यहाँ ठहरा था, वह दो भाई थे और दोनों मेसे म्युसियाटो की वजह से उसकी बड़ी इज्जत करते थे। इनके घर में वह बीमार हो गया। दोनों भाई परेशान थे। फौरन डॉक्टर को बुलाया गया। नौकर-चाकर उसकी देखभाल में लगा दिये गये और वह सब कुछ मुहैया करने की कोशिश की गयी, जिससे सियापेलेट्टो स्वस्थ हो सके। लेकिन सारी उपचार-व्यवस्था बेकार सिद्ध हो रही थी क्योंकि (जैसा डॉक्टरों ने बताया) भला आदमी एक तो काफी बूढ़ा हो चुका था और दूसरे बड़ी अव्यवस्थित जिन्दगी जीने के कारण रोजाना खराब से खराबतर स्थिति में बढ़ता जा रहा था। दोनों भाई बड़े परेशान! एक दिन दोनों इस समस्या पर विचार करने लगे।

“इस आदमी के बारे में अब क्या किया जाए?” एक ने कहा, “उसका काफी पैसा अपने पास है। इस तरह बीमार हालत में उसे भेजा भी नहीं जा सकता क्योंकि लोग कहेंगे, पहले अपने घर में रखा, डॉक्टर बुलाया, अब, जब मरने के नजदीक पहुँच गया है, तब घर से बाहर कर दिया। वह जिन्दगी भर बुराइयों में फँसा रहा है। गिरजे जाने का नाम नहीं लेगा और न अपने पाप स्वीकारेगा। बिना स्वीकार के कोई भी गिरजा उसकी लाश तक नहीं स्वीकारेगा। फिर लाश कुत्तों की तरह गटर में फेंक दी जाएगी और अगर ऐसा हो गया, तो इस देश के लोग हमारे घरों पर धावा बोलेंगे, चीजें उठा ले जाएँगे, कौन जाने आग लगा बैठें। इसलिए हम हर तरह से मुसीबत में हैं।”

से सियापेलेट्टो, दीवार के बिलकुल पास ही लेटा हुआ था। उसने वह सब सुन लिया था, जो उसके बारे में कहा गया था। उसने उन दोनों भाइयों को बुलवाया और कहा, “तुम्हें मेरे बारे में किसी प्रकार के संकोच करने की जरूरत नहीं है। तुमने जो कुछ कहा, वह सब मैंने सुन लिया है। और जैसा तुम सोचते हो, यदि ऐसा है, तो स्थिति वैसी ही होगी, जैसा तुम सोचते हो। लेकिन ऐसा होगा नहीं। मैंने अपनी जिन्दगी में ईश्वर के खिलाफ बड़े पाप किये हैं। अब अगर मरते समय एक और कर लिया, तो कोई फर्क नहीं पड़ेगा। इसलिए कोई अच्छा पवित्रात्मा सन्त बुलवाओ, और बाकी मेरे ऊपर छोड़ दो।”

गोकि दोनों भाई इस दिशा में बहुत उम्मीद नहीं बाँध पा रहे थे, फिर भी उन्होंने सन्त-महात्मा की खोज में नौकर भेजा ताकि कोई साधु आकर उसकी स्वीकारोक्ति सुन सके। एक बूढ़ा सन्त मिला -विद्वान, धर्मात्मा, जिसके प्रति लोग स्वतः श्रद्धालु थे।

और जब सन्त सियापेलेट्टो के कमरे में पहुँचा, तो वह उसकी बगल में जाकर बैठ गया और उसे धीरे-धीरे सान्त्वना देने लगा। सन्त ने पूछा कि वह कितने अरसे से स्वीकारोक्ति की मनःस्थिति में है। से सियापेलेट्टो, जो कभी भी इस मनःस्थिति में नहीं आया था, बोला, “फादर, यह हमारा रिवाज है कि कम-से-कम हफ्ते में एक बार तो गिरजे में जाकर अपने गुनाहों पर नजर डालें, तो गोकि ऐसे अनेक सप्ताह बीते हैं, जब हमने अक्सर गुनाहों पर नजर डाली है, लेकिन यह सही है कि पिछले आठ दिनों से, जब से मैं बीमार पड़ा, मन ऐसा नहीं किया। बीमारी ने मुझे मजबूर कर दिया।” सन्त ने कहा, “बेटे, तुमने ठीक किया है, बल्कि तुमने जैसा किया है, उसको तो लोगों को आदर्श मानकर चलना चाहिए।”

सन्त ने फिर पूछा कि उसने कभी किसी स्त्री के साथ किसी वासना-सम्बन्ध में अपने को अपवित्र तो नहीं किया? से सियापेलेट्टो ने एक आह भरी। “फादर, इस बारे में सच बोलते मुझे शर्म आ रही है, क्योंकि डर है कि उसे झूठी शान बघारना न मान लिया जाए।”

“बहादुरी से सच-सच बताओ,” सन्त ने कहा, “क्योंकि सत्य बोलने में कोई पाप नहीं होता।”

“चूँकि आप मुझे ढाढस बँधा रहे हैं। मैं बता रहा हूँ, मैं उसी तरह पवित्र हूँ, जिस तरह माँ की कोख से पवित्र आया था।”

“भगवान तुमपर मेहरबान हो।” सन्त ने कहा, “ऐसा करके तुमने बहुत बड़ा काम किया है, क्योंकि उसके विपरीत करने के लिए हमसे ज्यादा तुम स्वतन्त्र हो, जो कि अनुशासन के बन्धन में बँधे रहते हैं। इस तरह तुमने ज्यादा पुण्य कमाया है।”

सन्त ने प्रसन्न होकर फिर कहा, “तुम इस तरह अपनी आत्मा में सोच रहे हो, इससे मुझे खुशी है। लेकिन यह तो बताओ, तुम कभी माया की तरफ खिंचे हो, यानी कि क्या तुमने उचित से अधिक की चाहना की है?”

से सियापेलेट्टो बोला, “फादर, आप मुझे गलत न समझें, इसलिए कि मैं इन सूदखोरों के घर में ठहरा हुआ हूँ, मेरा इनसे कोई लेना-देना नहीं। मैं तो केवल इन्हें चेताने आया था और इन्हें इस घिनौनी अर्थ-लिप्सा से छुड़ाने आया था। आपको विश्वास होना चाहिए, मेरे पिता मेरे पास काफी सम्पत्ति छोड़ गये, लेकिन जब वे मरे, तो मैंने उसका अधिकांश ईश्वर के काम में दे दिया। अपने काम से अपनी जीविका कमाकर जो बचाया, उसका आधा हमेशा ईश्वर के बन्दों के लिए बाँट दिया। बाकी आधा अपने लिए रखा।”

इसके बाद सन्त ने उससे और तमाम बातों पर सवाल किये, जिनका उत्तर उसने इसी तरह दिया लेकिन जब वह मुक्ति-मन्त्र देने को ही था कि से सियापेलेट्टो आहें भरते-भरते रोने लगा।

“यह क्यों, मेरे बेटे?” सन्त ने पूछा।

से सियापेलेट्टो ने कहा, “एक गुनाह और रह गया है, जिसकी चर्चा मैंने नहीं की। उसके कहने में मुझे बेहद शरमिन्दगी लग रही है। लेकिन जब-जब मैं उसकी याद करता हूँ, मुझे इसी तरह रोना आता है। ईश्वर उसके लिए मुझे कभी माफ नहीं करेगा।”

सन्त ने कहा, “तुम खुलकर बताओ, मैं ईश्वर से तुम्हारे लिए प्रार्थना करूँगा।”

से सियापेलेट्टो एक आह भरकर बोला, “फादर, आपने वादा किया है कि आप ईश्वर से मेरे लिए प्रार्थना करेंगे, इसलिए आपको बता रहा हूँ कि जब मैं छोटा था, मैंने एक बार अपनी माँ को कोसा था।”

सन्त ने कहा, “तुम्हें यह गुनाह इतना बड़ा लगता है? अरे, आदमी रोज दिन भर ईश्वर को कोसते रहते हैं और वह उनको माफ करता रहता है - जो सच्चे दिल से इसके लिए पछतावा करते हैं। तो क्या तुम सोचते हो, वह तुम्हें नहीं माफ करेगा?”

और जब सन्त ने देखा कि अब उसके पास स्वीकार करने के लिए कोई और गुनाह नहीं रह गया, तो उसने अपने वरदान देकर उसपर मुक्ति-मन्त्र की वर्षा कर दी। इस सबके बाद सन्त ने कहा, “से सियापेलेट्टो, ईश्वर की दया से तुम जल्दी ही अच्छे हो जाओगे, लेकिन मान लो, अगर ईश्वर तुम्हारी आत्मा को अपने पास बुलाना ही चाहे, तो क्या तुम इसके लिए तैयार हो कि तुम्हारी मिट्टी हमारे कानवेण्ट में दफनायी जाए?”

से सियापेलेट्टो ने कहा, “बेशक, फादर, आपके यहाँ के अलावा मैं और कहीं नहीं चाहता कि दफनाया जाऊँ। आप मेरे लिए ईश्वर से प्रार्थना करनेवाले हैं और मैं आपके प्रति विशेष श्रद्धा रखता हूँ।”

सन्त पुरुष ने कहा कि वह उसकी बातों से बहुत प्रसन्न है और अपना आशीष देकर वह वापस चला गया।

उसके थोड़ी ही देर के बाद से सियापेलेट्टो की हालत बिगड़ने लगी और वह चल बसा। दोनों भाइयों ने उसी के पैसे पर उसे बाइज्जत दफनाने की व्यवस्था कर दी।

जब पवित्र सन्त ने, जिसने उससे स्वीकारोक्ति करायी थी, सुना कि उसका देहान्त हो गया है, तो उसने सभी सन्तों को बुलाया और बताया कि उसके गुनाहों की स्वीकारोक्ति से उसने से सियापेलेट्टो को कितना महान समझा था और इस धारणा के साथ कि उसके माध्यम से ईश्वर कोई चमत्कार अवश्य करेगा, उसने सभी को इसके लिए राजी किया कि उसका शरीर कानवेण्ट में दफनाने के लिए विशेष आदर और निष्ठा के साथ प्राप्त किया जाना चाहिए।

जब लाकर उसे गिरजे में रखा गया, तो स्वीकारोक्ति कराने वाले सन्त ने उसके जीवन, उसके संयम, उसकी सादगी, उसकी पवित्रता आदि पर विशेष उपदेश दिये और फिर बताया कि उसने अपना आखिरी गुनाह किस तरह रो-रोकर बताया था।

इसके अलावा सन्त ने और भी बहुत-सी बातें कहीं, जिसका ऐसा गहरा प्रभाव पड़ा कि सारे लोग प्रार्थना के बाद उसकी लाश पर टूट पड़े और उसके स्पर्श को पाकर धन्य हो लेने के लिए लालायित हो उठे।

उसकी ख्याति ऐसी फैली कि उसकी पवित्रता और भक्ति के सामने बड़े-बड़े सन्तों की ख्याति फीकी पड़ गयी।

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