दास्तान-ए-अश्क - 5

 

 

 

( पिछले पार्ट में हमने देखा की नाईका  अखबार के लिए लिखे आर्टिकल  प्रीति को पोस्ट करने भेजती है...! वो अपने बारे मे प्रीति को बताती है..  अब आगे.. 

                          5

जब वह 10th क्लास में आई तब उसकी मां का बर्ताव उसके प्रति और भी रुखा हो गया!
उसने अपनी मां से एक वादा किया!
मम्मी तुम टेंशन मत लो तुम्हें जैसी बेटी चाहिए वैसी ही मैं बन कर दिखाऊंगी!
तब उसकी मां ने मन का दुख जाहिर किया! मुझे ऐसी मोटी बेटी नहीं  अच्छी नहीं लगती है! तुझे बाहर लेकर जाने में भी मुझे शर्म आती है !
लोगों के मुंह को ताला नहीं मार सकती में सब कहते हैं तुम इतनी खूबसूरत और तुम्हारी बेटी ऐसी मोटी..!
बाकी बच्चे ठीक है ! मगर सिर्फ उसी का मोटापा उसके लिए अभिशाप बन चुका था!
उसने अपनी मां से वादा करके तसल्ली दी कि वह जैसी बेटी चाहती है, वो वैसे ही वह बन जाएगी! बदले में वो फिर अपनी मां से अपने हिस्से का प्यार चाहती थी!
प्यार तो  मनोरमाजी उससे बहुत करती थी! मगर शायद उसकी फिकर प्यार पर हावी हो रही थी!
यही बात उसके मन को खा रही थी की मां का बर्ताव उसके साथ दूसरे भाई बहन जैसा कब होगा..?
फिर उसने अपने मनोबल को मजबूत कर लिया!
खाने पीने पर कंट्रोल कर दिया..!  काफी एक्सरसाइज की..! तकरीबन 1 साल के अंदर उसने अपने आप को ऐसा बदला जैसे कोई सोच ही नहीं सकता था ,कि वह ये वही लड़की है जो 1 साल पहले मोटी सी गोलमोल थी!
अब देखने वालों की धड़कने रुक जाती थी!
लोग उसकी सुंदरता को घूर घूर के देखते थे ! उसका  सप्रमाण शरीर और अद्भुत रूप एक -एक लड़के की आंख में बस गया था!
वो बाजार निकलती तो सब उसे ही देखते रहते!
मनोरमा देवी यह देख कर काफी खुश हो रही थी!
किंतु इस बात का उस लड़की पर जरा भी प्रभाव नहीं पडा!
वह अपनी मां से अब बेहद नाराज रहने लगी!
क्योंकि वह उस बात को समझ चुकी थी की इंसान के शरीर की बनावट की वजह से ही इंसान को प्यार मिलता है तो इस शरीर का कोई मोल नहीं है!
कभी-कभी वह सोचती थी मेरे अंदर इतने गुण है वह मेरी मां को नहीं दीखें!
दिखा तो उसे मेरा सिर्फ प्लस साइज..!
लेकिन वह कभी खुलकर बोल नहीं पाती! मां को जरा सी भी तकलीफ होती तो उस उसकी जान पर बन आती !
ऊपर से पापा जी की बीमारी!
बच्चा पाने के लिए उन्होंने एक दवाई ली थी , जिसकी वजह से उन्हें मधुमेह का रोग हो गया कम उम्र मे !
दिन प्रतिदिन वह कमजोर हो रहे थे!
एक तरफ बच्चे बड़े हो रहे थे तो दूसरी ओर पापाकी हालत बदतर होती जा रही थी!
पापा की बिगड़ती सेहत को देख कर सबसे ज्यादा कोई परेशान था तो वह लड़की थी !
पापा को समय पर खाना देना! दवाई देनी!
पापा की सेवा करनी !
सब उसकी जिम्मेदारी थी!
पापा जी को कभी चोट लग जाती तो उसकी पट्टी भी वह खुद करती थी!
उनके लिए ही उसने नर्स से इंजेक्शन लगवाना सिखा!
क्योंकि छोटे गांव में जल्दी डॉक्टर नहीं मिलते!
कोई भी दवाई लेनी होती तो बहुत दूर जाना पड़ता था! और वो पापा जी की सेहत के साथ कोई भी रिस्क लेना नहीं चाहती थी!
पापाजी के साथ साथ वह अपने दादीजी की  भी बहोत केअर करती !
लेकिन उसे दादी की केअर करते देख मनोरमा चिढती..! पता नहीं क्यों?
शायद सास बहू के बीच कोई कड़वी अनबन रही होगी!
पर उसे इन बातों से कोई मतलब नहीं था!
उसके लिए दादा दादी और पापा बहुत ही अनमोल थे !
उसका अनुभव रहा था कि कुदरत उससे हमेशा उसकी प्यारी चीज छिनती रही थी! उस वक्त भी ऐसा ही हुवा!
अचानक उसकी दादी की डेथ हो गई!  तब वह हायरसेकेंडरी में थी!
अपने घर में उसने सबसे पहले यही मौत देखी !
दादी की मौत में उसे इस तरह से हिला दिया  जैसे ऊपर वाले ने उससे सारी खुशियां छीन ली थी!
  दादाजी को भी सदमा लगा था उन्हें भी उसी मंथ में हार्ट का दौरा आया!
वह दादाजी को खोना नहीं चाहती थी! पापा के साथ मिलकर उसने दादा जी को शहर के एक बड़े अस्पताल में एडमिट कर दिया!
उनकी खूब सेवा की उनके पास रही ! पापा जी ने भी यही बोल दिया था बेटा तेरी मां से कुछ नहीं बन पाएगा !
अब जो भी करना है तू ही कर सकती हैं! मैं बीमार रहता हूं !
मुझसे कुछ नहीं होगा!
तब उसने अपनी जिम्मेदारी पूरी इमानदारी के साथ निभाई !
और दादाजी को तैयार करके घर ले आई!
दादाजी के लिए तो पहले से ही वो लाडली थी !
मगर अब तो वह पूरी तरह  उससे आश्रित हो गए!
दादा जी को दवाई देना! उनके खाने का ध्यान रखना !
सब कुछ करना पढ़ाई करनी और ऊपर से चोरी चोरी आर्टिकल लिखना!
उसकी मां को यह सब अच्छा नहीं लग रहा था!
उन्हीं दिनों में एक दिन अचानक बुआ जी का आना हुआ!
  उन्होंने अपनी कहानी की नायिका को समझाया !
"बेटा चाहे तुम जितना भी काम कर लो मगर जब तक तुम घर का काम नहीं सीखोगी बाकी सब काम बेकार है !
क्योंकि लड़कियों के लिए सबसे ज्यादा जरूरी घर का काम माना जाता है!
उन्हें एक न एक दिन ससुराल जाना है!
बुआ की बात सुनकर वो बोली
बुआ जी आप फिकर ना करें मैं वह भी कर लूंगी!
उसने अपनी मां को किचनमे हाथ बटाना शुरू कर दीया !
धीरे-धीरे वह सब कुकिंग सीखने लगी!
कुछ ही दिनों में अपनी मां और बुआ से घर के सारे काम मे वह एक्सपर्ट हो गई!
लेकिन उसे नहीं पता था कि यह सब उसकी बलि देने के लिए करवाया जा रहा है !
जैसे बकरे को बलि देने के लिए तैयार किया जाता है ,वैसे ही उसको तैयार किया गया!
बलि भी उसकी शादी की रूप में!
16 साल की उम्र में उसकी पढ़ाई बीच में ही रोककर शादी की तैयारियां होने लगी ! बातें होने लगी!
और जिस दादाजी को उसने सबसे अधिक माना उसी दादाजी ने उसके सामने दो हाथ जोड़कर कहा!
बेटा तेरी दादी चली गई ! मैं भी इसी तरह चला जाऊंगा, मगर जाने से पहले तेरे हाथ पीले देखना चाहता हूं !
तू मना मत कर ! तुजे शादी करनी है!
उससे यह पूछा नहीं गया मगर बताया गया कि तुझे शादी करनीं है!
उसके सारे अरमा सारे सपने वह तूट गए! और वह चोरी चोरी लिखना सब कुछ  एक ही झटके में छूट गया !
उसके लिए लड़का ढूंढा जाने लगा!
इन हालातों के बीच भी उसके अंदर एक आग थी! ऐसी आग जो भीतर ही भीतर सुलग रही थी!
चाहे उस आग पर कोई कितना ही पानी क्यों ना डाल दे मगर उसने अपने मन में से उस चिंगारी को बूझने ना दिया!
उसको एक ख्याल आया!
जब तक लड़का नहीं मिलता क्यों न कुछ किया जाए!
कुछ ऐसा जो उसे आगे जाकर काम आए! और फिर उसी सोच को अंजाम देते हुए उसने अपनी पढ़ाई चोरी चोरी जारी रखी!
1 साल और निकल गया !
उस दौरान उसने बैंकिंग की एग्जाम दी ! उसे बैंकिंग का बहुत शौक था! वह फर्स्ट ग्रेड में पास हुई ! उसको इंटरव्यू लेटर भी आया!
पर उसकी  बदकिस्मती से वह इंटरव्यू लेटर उसके दादाजी के हाथ लग गया!
इंटरव्यू लेटर देखकर दादा जी ने बहुत बड़ा बवाल मचाया !
"हमारे घर की बेटी नौकरी करेगी?
इस घर में सारे मर्द मर गए हैं कमाने वाले, जो लड़कियों की कमाई खाई जाएगी!
दादाजी का आक्रोश फटा था!
वैसे आज के दौर में सब लेडीस काम करती है!
उसे बुरा भी नहीं माना जाता!
लेकिन ये वो दौर था जिसमें लड़कियों का काम करना बहुत ही गलत माना जाता था!
और लड़कियों को उनके पैरों पर खड़े होने की बात को उसके चरित्र से नापा जाता था!
वह बात वहीं रुक गई! अपने सपनों के साथ वह कैद हो गई!
उसके लिए लड़का ढूंढने का युद्ध जारी था!
दादाजी उसके लिए एक अच्छे खानदान  का शरीफ  लड़का ढूंढ रहे थे !
जो चाहे कम पढ़ा लिखा ही हो लेकिन अपनी खुद की दुकान संभालता हो !
वह चाहती थी कोई ऐसा लड़का हो जो उसके सपनों को परवाज दे !
पर उससे कौन पूछता है उसे तो कहा जाता है ! तू अपने रूप रंग पर ध्यान दें!
जैसे रूप रंग ही सब कुछ है बाकी कुछ नहीं !
उसने अपने जीवन साथी के रूप में एक ऐसे शख्स की कल्पना की थी!
जो उसे समझ सके जो उसे पहचान सके  उसके गुणों के साथ!
वह चाहती थी कि उसकी शादी कोई पढ़े लिखे लड़के से हो!  जिसे लिखने का शौक हो!
लिखने का शौक ना भी हो चलेगा पर पढ़ने का जरूर हो! जो उसके अरमानों को आंखों को, और उसके मन के भावों को बिना बताए पढ़ सके!
उसने सोचा था जो इस उसको इस घर में नहीं मिला वह जीवन साथी के रूप में अगले घर में मिल जाएगा !
इसी उम्मीद के साथ वह अपनी जिंदगी जी रही थी! मगर विधि-विधान क्या थे वह किसको पता था!
हां, उसका कैरेक्टर बहुत ही साफ सुथरा था ! अपनी जिंदगी में किसी की तरफ उसने नजर उठा कर देखा नहीं था!
अपने परिवार से मिले  संस्कारों के अनुसार हर लड़की की तरह वो चाहती थी कि अपना सब कुछ बचा कर वह अपने होने वाले पति को दे! और उसे ही प्रेम करें!
बहुत लड़के थे जो उसे देख कर आहें भरते थे ! टुकुर टुकुर देखते रहते थे ! पर उसने अपने आप को संभाला था! उसकी यही शराफत ही उस की सबसे बड़ी दुश्मन बन गई!
वह अपनी जिंदगी कभी जी नहीं पाई! हमेशा डर डर के इमानदारी और संस्कारों से लिपट कर रहने के उसके आडंबर ने उसे दब्बू बना दिया  ! बुझदिल बना दिया!
उसके मन के भावों को कभी कोई समझ ही नहीं पाया!
रेत की तरह जिंदगी उसके हाथों से निकल रही थी!
एक बार हौसला करके उसने अपने दादाजी  से कहा!
दादा जी मैं उम्र में बहुत छोटी और रही बात शादी की तो  जब तक आपको अपने पसंद का लड़का नहीं मिलता तब तक क्या मैं पढ़ाई कर सकती हूं!
दादा जी ने गौर से उसके चेहरे को देखा! जैसे मरने वाले की कोई आखरी ख्वाहिश पूरी की जाती है !
उस तरह से वह बोले!
"हां तुम कर सकती हो मगर मेरी एक शर्त है ! घर से कोलेज नहीं जाने दूंगा! तुझे गांव में कहीं भी अच्छी ट्यूशन मिलती है उसे ज्वाइन कर ले !
जैसे ही कोई लड़का मिल जाता है तुझे अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़कर शादी करनी होगी हां तेरे ससुराल वाले चाहे तो तेरी पिटाई आगे जारी रखवा सकते हैं
उसने दादाजी की सारी शर्तें मान ली और मन ही मन यही दुआ करने लगी कि जल्दी लड़का ही ना मिले
दादा जी की यही नरमी ने  उस उसके जीवन में फिर से जीने की उम्मीद भर दी
घर से उसने ट्यूशन के लिए अकैडमी ज्वाइन कर ली
अपने ग्रेजुएशन की पढ़ाई पर ध्यान देने लगी
दिन गुजर रहे थे उसकी प्रतिभा अंदर ही अंदर निखर रही थी
किसी को कुछ पता नहीं था कि वह क्या लिखती है क्या पड़ती है क्या करती हैं
उसे जो भी मिलता था पढ़ लेते थे और जो भी मन में भावनाए उठते थे उसको कागज पर शब्दों से सवार  लेती थी
रोज अकैडमी जाते वक्त उसने एक बात नोटिस की एक लड़का था जो उसे डेईली आते जाते देखता रहता था
उसी गांव का लड़का था नरेंद्र!
बहुत खूबसूरत स प्रमाण शरीर लंबा ऊंचा और गोरा घुंघराले बाल वाला..!
वह उसको जानते थे बहुत सेंसिटिव  और भावुक था वो..!
मन ही मन हो उसको अच्छा लगने लगा था पर मन की बात को जुबां पर कभी नहीं लाई वह भी कुछ बोल नहीं रहा था बस उसे देखा करता था वह समझ रही थी इसके उस लड़के के मन में उसके प्रति कुछ है लडका अपनी ईमानदारी का पक्का उसने कभी उसका  रास्ता नहीं रोका
ना ही कभी उसको कुछ कहा!
कहते हैं यह ऐसी उम्र है जिसमें इंसान मन से कुछ नहीं बोलता मगर आंखें सब कुछ एक दूसरे के को पढना खुद ब खुद सीख लेती है!
उस लड़के के मनमैं उठे तरंगों को वो पढ चुकी थी!
पर उसे फिकर थी अपनी इज्जत की !
अपने घर की इज्जत की !
वह कोई भी ऐसा काम करना नहीं चाहती थी जिससे कोई अपने परिवार को पर उंगली उठाए!
और बीच रास्ते में ही उसकी पढ़ाई छूट जाए!
वह चुपचाप अपने रास्ते जाती और अपने रास्ते आती पर वह अपने मन को कंट्रोल नहीं कर पाई थी जिस दिन वह नरेंद्र को नहीं दिखती थी उसका मन व्याकुल हो उठता था!
सारा दिन खाली खाली जाता रहा था!
वह चोरी चोरी उस तरफ देखती जहां वो रोज खड़ा रहता था !
शायद वह जानबूझकर ऐसा कर रहा था! छिप जाता था उससे ऐसा लगता था जैसे वह मेरे मन की बात को पकड़ना चाहता  ना हो!
पर इस बात के लिए कभी उसने हौसला ही नहीं जुटाया!
अचानक उसे पता चला उसके लिए लड़का देखने  दादाजी और पापा जा रहे हैं!
उस दिन उसका मन बहुत ही उदास था
कोई बात थी जो उसके मन को खल रही थी !
उसकी आंखों में उदासी झलक रही थी चेहरा ऐसा हो रहा था जैसे अभी रो देगी
उस दिन उसने चाहा कि आज नरेंद्र ना दिखे तो अच्छा है !
उसको देख कर रो पड़े कहीं अपने मन के दबे हुए भाग बाहर ना आ जाए!
नरेंद्र भी तो बावला उसको मन ही मन बेइंतहा प्रेम करने लगा था
किसी तरह उसको  मेरी शादी की भनक लग गई थी!
उस दिन बड़ा हौसला झूठा करो उसने मेरा रास्ता रोका!
मेरा दिल धक से रह गया कलेजा निकल कर जैसे हलक में आ गया पहली बार उसने मेरा हाथ पकड़ा पूरे बदन में एक मीठी हल्की सी सिरहन दौड़ गई!
अपनी आंखों के बाद को उसने किस तरह से रोका था वह बस खुद ही जानती थी!
           ( क्रमश:)
अपनी कहानी की नायिका क्या नरेंद्र के प्रेम से बच पाएगी ? अपने मन के भावों को छुपाने की कोशिश में सफल हो पाएगी? जानने के लिए पढ़ते रहे 'दास्तान ए इश्क'

 

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