शेनेल लौट आएगी - 4

शेनेल लौट आएगी

प्रदीप श्रीवास्तव

भाग 4

आने के एक दिन पहले उसने यह बात अपने अच्छे वाले सौतेले पिता को बताई तो उन्होंने कहा था कि ‘मैं तुम्हें रोक तो नहीं सकता। लेकिन मेरी सलाह है कि तुम्हें इस तरह किसी दूसरे देश में नहीं जाना चाहिए। दुनिया में इस समय माहौल बहुत तनावपूर्ण है। तुम जिस व्यक्ति के पास जा रही हो उससे पहले कभी मिली भी नहीं हो।’ लेकिन ऐमिलियो के अडिग रहने पर कहा कि ‘ठीक है अपनी लोकेशन, अपने इस इंडियन फ्रेंड के बारे में बराबर ज़्यादा से ज़्यादा डिटेल्स मेल करती रहना।’

उन्होंने ही आते समय उसे ‘आई फ़ोन’ फोन दिया था। एयर पोर्ट तक छोड़ने आए थे। जब कि मां घर के दरवाजे पर भी नहीं आयी। बस इतना कहा था ‘ध्यान रखना अपना, फोन करती रहना।’ ऐमिलियो यह कहते हुए बहुत भावुक हो गई थी। कि वह अपनी मां से ज़्यादा अपने इस अच्छे वाले सौतेले पिता को चाहती है। उसे अपने बॉयोलॉजिकल पिता के बारे में अब कुछ पता नहीं कि अब वह कहां हैं? कैसे हैं? उसे उनका चेहरा भी याद नहीं है। क्यों कि वह जब छोड़कर गए थे तब वह बहुत छोटी थी। और मां ने उनका एक फोटो तक नहीं रखा है कि वह अपने पिता की सूरत भी पहचान सके।

इन बातों को बताते समय ऐमिलियो पिछली कई बार की तरह यह कहना नहीं भूली कि ‘रोहिट मैं तुम्हारे साथ रहना चाहती हूं। तुम्हें लाइफ पार्टनर बनाना चाहती हूं। तुमसे शादी करना चाहती हूं। इतने दिनों में ही तुम्हारे कंट्री को जितना देखा है उसी से मैं इतना इंप्रेस हुई हूं कि इसे छोड़ कर जाने का जी नहीं कर रहा है।’ ऐमिलियो की यह नई कहानी मुझे उसकी पहले की कई बातों से ज़्यादा प्रभावकारी लगी। सच के ज़्यादा करीब लगी। वह जिस तरह से बार-बार हमेशा के लिए साथ रहने को कहती उससे मैं सोचने लगता कि इसका प्रस्ताव गलत तो नहीं है।

जब तक उसकी तबियत ठीक नहीं हुई तब तक उसने ना जानें कितनी बातें बताईं। साथ ही हम दोनों अगले टूर पर निकलने की भी तैयारी करते रहे। नेट के जरिए तमाम जानकारियों के बाद एक लंबा प्रोग्राम भी फाइनल कर लिया गया। इस बार ऐमिलियो का ज़्यादा जोर बीच पर चलने का था। इसके लिए मैंने चेन्नई का कोवलंग बीच, गोल्डेन समुद्र तट रिजॉर्ट, मनीला बीच और इसके अलावा गोवा के अगोंडा बीच, कैंडोलिम बीच, कैलोंगुट बीच को चुना। नेट पर ही देखकर ऐमिलियो साउथ की स्थापत्य शिल्प को भी जरूर देखना चाहती थी। खजुराहो की मूर्तिशिल्प कला की तो वह इतनी दिवानी हो गई कि दिन भर में दो तीन बार तो उसके चित्र, उसके वीडियो देखती।

यात्रा करने में ज़्यादा समय ना बरबाद हो इसके लिए मैंने चेन्नई, गोवा की यात्रा के लिए हवाई यात्रा का विकल्प चुना। मेरे लिए यह एक रोमांच भरा अनुभव भी होता। क्यों कि इसके पहले मैंने हवाई यात्रा नहीं की थी। मेरे पास पैसों को लेकर कोई समस्या नहीं थी। मैंने पर्सनल लोन ले रखा था। यहां तक की मैंने डिपार्टमेंट से दो लाख रुपए लोन के साथ-साथ दो महीने की मेडिकल लीव भी ले रखी थी। यह सब ऐमिलियो के प्रति मेरी दिवानगी का ही प्रतीक है।

चेन्नई के लिए उड़ान से एक दिन पहले ऐमिलियो ने बिल्कुल हिंदुस्तानी पत्नियों की तरह रात बेड पर बड़े प्यार मनुहार के साथ मुझे अपनी बांहों में समेटे हुए कहा ‘रोहिट मेरे पास इन टूर पर जाने के लिए कोई अच्छी ड्रेस नहीं है। कई दिनों से सोच रही थी लेकिन थोड़ा संकोच में थी।’ उसने इतने मनुहार के साथ कही थी यह बात कि उस पर मुझे प्यार आ गया।

दोनों हाथों से उसके दोनों गालों को प्यार से खींचते हुए कहा था ‘ओह डॉर्लिंग तुम्हें पहले बताना चाहिए था। खैर कोई बात नहीं कल दिन में ही ले आएंगे। उसने मेरे इस प्यार का भरपुर फायदा उठाया। अगले दिन करीब दो लाख रुपए से ज़्यादा की शॉपिंग कर डाली। निक्कॉन का एक शानदार कैमरा भी खरीद लिया कि रोहतांग टूर के समय जो कैमरा यूज किया उसका रिजल्ट अच्छा नहीं है। और इतना ही नहीं लगे हाथ एक आईपैड भी लिया।

अगले दिन चेन्नई के लिए चल दिए। वहां कोवलंग बीच, गोल्डेन समुद्र तट रिसॉर्ट, मनीला बीच पर हम दोनों ने वाकई ना भूलने वाली मस्ती की। ये कहने में मुझे कोई हिचक नहीं कि ऐमिलियो जैसी पार्टनर ना होती तो निश्चित ही इतना मजा नहीं ले पाता। मजा लेना भी अपने आप में एक कला है। जिसमें मैंने पाया कि ऐमिलियो पारंगत है और मैं उसके सामने खिलाड़ी छोड़िए अनाड़ी ही था। चेन्नई में साउथ इंडियन कुजीन में भी उसे बहुत मजा आया। सांभर, डोसा, इडली, रसम उसे बहुत भाए। योगगिरि की पहाड़ियों में छोटे-छोटे गावों में जाना मुझे बहुत भाया। हां मनीला तट पर एक बार ऐमिलियो के कारण थोड़ा अपमानित होना पड़ा।

उसके नाम मात्र के कपड़ों एवं वल्गर हरकतों के कारण हमें टोका गया। मेरे साथ एक विदेशी युवती वह भी आधी़ उम्र की यह भी लोगों की नजर में हमें तुरंत ला देता था। ऐमिलियो को मैंने आखिर समझाया कि यह इंडिया है। यहां हर बात की अपनी एक सीमा है। जिसका पालन करना ही पड़ेगा। उसने सॉरी बोला और बात खत्म। प्लान तो एक हफ्ते का था। लेकिन वहां दस दिन रुकने के बाद गोवा के लिए चल दिए। गोवा में तो वाकई अपनी अलग ही दुनिया रही। ऐमिलियो ने मुझे वहां वो सुख दिया जिसकी मैंने कल्पना भी नहीं की थी।

दो दिन तो वहां हम शहर घूमते रहे। उसके बाद पूरा एक दिन कलिंगोट बीच पर बिताया। लेकिन वहां की भीड़-भाड़ ने हमें बराबर असहज बनाए रखा। ऐमिलियो ना होती तो शायद इतना असहज ना होता। कुल मिला कर वहां का मेरा सारा मजा मारा गया। ऐमिलियो भी मनीला बीच की तरह यहां पर कुछ ख़ास मजा न ले पाई। एक दिन वहां रात में ओवर इटिंग के चलते हम दोनों की तबियत अगले दिन ढीली रही।

हम दिन भर रिसॉर्ट में ही पड़े रहे। अगले दिन हम फिट थे। और थोड़ा सूनसान बीच कौन है यह रिसॉर्ट के इंप्लाई से रात में ही जान लिया था। इस अपेक्षाकृत बहुत कम भीड़-भाड़ वाले बीच अगोंडा में हमने पिछले दो दिन की कसर पूरी की। समुद्र की लहरों में खेलकूद के बाद ऐमिलियो, हमने वहां की प्रसिद्ध काजूफ़ेनी पी। यह अपनी तरह की एक अलग ही वाइन है। एक अलग ही सुरूर देने वाली लोकल लिकर।

इसी के सुरूर में हम दोनों टहलते-टहलते लोगों से दूर बहुत, दूर निकल गए। ताड़ के पेड़ों की छाया में एक जगह बालू में वह पसर गई। ऐमिलियो ने वहां फिर पी। मैंने ना चाहते हुए भी और पी ली। बालू में पसरी ऐमिलियो ने फिर वह खेल खेला जिसके लिए मैंने सोचा भी नहीं था। अपने दोनों ब्रीफ उतार कर वह बार-बार हवा में ऊपर उछालती और ताली बजाकर हंसती। बिना कपड़ों के कभी इधर तो कभी उधर दौड़ती फिर बालू पर ही गिर जाती। मुझे भी बार-बार खींचती और एक बार मेरा भी ब्रीफ खींच ले गई। मैं बार-बार उससे लेकर पहनना चाहता लेकिन वह पहनने ना देती।

मैं किसी के आ जाने के डर से बराबर डरा जा रहा था। उसके गेहुंए रंग के शरीर पर बालू के कण धूप में चमक रहे थे। हम दोनों ने इस हुड़दंग का समापन समुद्र की लहरों के किनारे बालू पर सूरज की किरणों में नहाए एक घनघोर मिलन के साथ किया। जब हम रिसॉर्ट लौटे तो अंधेरा हो चुका था। हम बेहद थके हुए थे। नहा धो के आराम करने के बाद डिनर कर हम दोनों आलस्य में लेटे हुए थे। तभी ऐमिलियो उठी और फिर लैपटॉप ऑन कर कैमरे से बहुत सी फोटो कॉपी कर डिटेल सहित अपने अच्छे वाले सौतेले पिता को मेल किया।

इंडिया मेरे पास आने के बाद उसका यह डेली का काम था। गोवा में ऐमिलियो का मन ज़्यादा नहीं लगा। जब कि मैं बहुत एंज्वाय कर रहा था। और ज़्यादा रुकना चाहता था। मगर ऐमिलियो की जिद के आगे वहां से खजुराहो चल दिए। खजुराहो में ऐमिलियो के एकदम नए रूप से मेरा सामना हुआ। मैं उसके इस रूप से इस सोच में पड़ गया कि आखिर यह लड़की है क्या? वहां पहुंचने के बाद पहले तो वह दो दिन तक होटल से बाहर ही नहीं निकली।

होटल ही में खाना-पीना, टीवी या नेट पर कुछ टाइम बिताना या फिर सोना। वह बारह-बारह घंटे सोई। मैं बोर हो जाता। तो उसे कमरे में छोड़ कर कुछ देर को बाहर घूमने चला जाता। लेकिन बाहर भी ज़्यादा ठहर नहीं पाता। मन ऐमिलियो पर लगा रहता था। मैं उसे अकेला नहीं छोड़ना चाहता था। तीसरे दिन सुबह-सुबह घूमने निकलने का प्रोग्राम बना।

स्थापत्य खासतौर से मूर्तिशिल्प के अद्भुत नमूने वहां के मंदिरों को देखकर ऐमिलियो एकदम अवाक रह गई। मंदिरों की भव्यता और बाहर दिवारों पर स्त्री-पुरुषों की अकल्पनीय मैथुनी मुद्राओं में बनीं असंख्य मूर्तियों ने उसे अचंभे में डाल दिया। मैं भी पहली बार देख रहा था। तो अचंभे में मैं भी था। लेकिन ऐमिलियो जितना नहीं। मैं हतप्रभ था यह देखकर कि कैसे सदियों पहले शिल्पियों ने यह बनाया। कला तो अवर्णनीय है ही। सबसे बड़ी बात विषय वस्तु की है। कि इतने समय पहले सेक्स को लेकर समाज की क्या सोच रही होगी।

रात में डिनर के बाद ऐमिलियो के साथ बेड पर बैठा टीवी देख रहा था। और ऐमिलियो दिन भर की डिटेल्स, फोटो मेल कर रही थी। बीच-बीच में मूर्तियों को लेकर कुछ-कुछ बातें भी करती जा रही थी। अपना काम खत्म कर उसने फिर शाम की तरह तमाम क्योश्चन शुरू कर दिए। मैंने कहा ‘देखो गाइड ने जो बताया मैं उतना भी नहीं जानता। इतिहास कभी पढ़ा नहीं इसलिए अपनी इस विरासत धरोहर के बारे में विश्वास से कुछ ज़्यादा नहीं कह सकता। सदियों पहले चंदेल राजाओं ने इन्हें बनवाया था। वास्तव में यह निर्माण बरसों में पूरा हुआ। इसमें कई राजाओं का योगदान है।

मैंने उसे ऋषि वात्स्यायन, मैथुनरत मूर्तियों के बारे में बताया कि शायद तब यहां के लोगों के लिए सेक्स एक प्राकृतिक, स्वाभाविक क्रिया, एक सामान्य काम रहा होगा। ऐसा भी मानते हैं कि अध्यात्म, मोक्ष का एक रास्ता सेक्स से होकर गुजरता माना गया होगा। या मंदिरों में प्रवेश करने वाले विकारों से मुक्त हो प्रवेश करें। यदि वह मुक्त नहीं हैं, तो ये मैथुनरत मूर्तियां और विकारग्रस्त बना देंगी। और वो गंदे मन से अंदर नहीं जाएंगे।

मैंने इसी क्रम में संभोग से समाधि की ओर रजनीश की किताब का उल्लेख करते हुए पूछा कि ‘ऐमिलियो क्या उन मूर्तियों को देखते हुए तुममें उस समय सेक्स करने या इस तरफ दिमाग क्षणभर को भी गया था?’ उसने कहा ‘मैं इमेजिन नहीं कर पा रही थी कि पत्थरों पर ऐसा कुछ बनाया जा सकता है। सारी मूर्तियां लगता है जैसे अभी बोलने ही वाली हैं। जैसे वहां वह मूवी चल रही है और हम दर्शक बने देख रहे हैं। लेकिन इतने समय पहले लोग सेक्स को लेकर इतने ओपेन माइंडेड थे। यह यकीन नहीं कर पा रही हूं।’

ऐमिलियो ने उस दिन और फिर आगे कई दिन, जब तक वहां रहे रोज तमाम वीडियो बनाए, फोटो खींची। और तमाम तर्क-वितर्क किए। उसका यह तर्क बड़ा बचकाना सा लगा कि मूर्तिकारों के सामने तमाम स्त्री-पुरुषों ने यही करके दिखाया होगा। तभी वह यह बना पाए। कितने हिम्मती थे वो स्त्री-पुरुष जिन्होंने लोगों के सामने सेक्स किए। ऐसे-ऐसे पोज में।

उस वक्त बातचीत में मैंने उसे जो थोड़ी-बहुत जानकारी़ ऋषि वात्स्यायन की दी थी। वह सब उसके रोमांच उसके एक्साइटमेंट को बढ़ाने वाली साबित हुईं। उस दिन उसने मिलन कई ऐसे पोज में संपन्न किए जो वहां देखे थे। और अमूमन आज एक आम आदमी नहीं करता। लेकिन ऐमिलियो जब तक रही तब तक खजुराहो को दोहराने का प्रयास अवश्य किया। वहां से उसने तमाम चीजें लोहे, तांबे, पत्थर की ऐसी खरीदीं जिनमें सेक्स की कृतिया बनी थीं, या उन मूर्तियों की अनुकृति थीं। वह मेरे साथ वहां से थोड़ी ही दूर कालिंजर और अजेय गढ़ किले को भी देखने गई। लेकिन वहां उसका मन नहीं लगा।

इस पूरी खजुराहो यात्रा में मैंने ऐमिलियो की एक और बात जानी। कि वह सामने वाले को उतना ही अपने बारे में जानने देती है, जितना वह चाहती है। मैं तमाम कोशिशों के बाद भी उससे उतना ही जान पा रहा था जितना कि वह चाह रही थी। उस दिन होटल में मैंने जाना कि वह अंग्रेजी लिट्रेचर भी बहुत अच्छा जानती है। वह ड्रॉमा की बहुत शौकीन है। अंग्रेजी के प्रमुख ड्रामा राइटर्स को उसने खूब पढ़ा है।

बचपन में वह एक्टिंग करना चाहती थी, प्ले करना चाहती थी लेकिन हालात ने उसका यह सपना तोड़ दिया। उसी से मैंने पहली बार जाना कि महान अंग्रेजी नाटक लेखक विलियम शेक्सपीयर से पहले सोलहवीं सदी में उनसे भी बड़े नाटककार क्रिस्टोफर मारलो हुए थे। जो उनतालीस वर्ष में ही मार दिए गए थे। उन्हीं के नाटकों को पढ़ कर शेक्सपीयर आगे बढ़े और महान बने।

इसी क्रम में उसने एक लेखिका का वर्णन किया जिनका नाम मैं क्रिस्टोफर मारलो की ही तरह पहली बार सुन रहा था। यह थीं ईव इंसलर। जिनकी ऐमिलियो दिवानी थी। वह उनको महिलाओं के मनोविज्ञान को समझने वाली सबसे अच्छी लेखिका मानती थी। उसने उनके ड्रामा ‘वजाइना मोनोलॉग’ को आधुनिक साहित्य का सबसे बोल्ड और कालजयी रचना कहा। मैंने कहा देखो यह तुम्हारा विचार हो सकता है। समय के साथ परिवर्तन होता रहता है।

अब तुम देखो ना कि हमारे देश में वात्स्यायन जैसे ऋषि हुए जिन्होंने दुनिया का पहला ‘कामसूत्र’ लिखा। सदियों बाद आज भी वह दुनिया में सबसे ज्यादा बिकने वाली किताबों में शामिल है। खजुराहो जैसी सेक्स में रत मूर्तियां बनीं। लेकिन आज देश में हम प्वाइंट वन परसेंट को छोड़ कर अन्य महिलाओं के सामने ईव इंसलर के ड्रामा ‘वजाइना मोनोलॉग’ का नाम भी नहीं ले सकते। खुलकर बात हुई तभी मुझे याद आया कि भारत में तमाम अड़चनों के बाद एक दो बार यह ड्रामा प्ले हुआ है। वह भी विशेष वर्ग के दर्शकों के सामने।

मैंने उसके बताए डॉयलाग को दोहराते हुए कहा ऐसा यहां पब्लिकली प्ले होने वाले ड्रामा में बोल पाना मुश्किल है। मैं लिट्रेचर के मामले में ऐमिलियो के सामने कहीं नहीं टिक पा रहा था। मैंने कामसूत्र की बात बताई तो उसने जापान के शुंगा एलबम का नाम बताया कि उसमें सेक्स के अनेकों पोज बनाए गए हैं। यह एलबम विशेष अवसर पर लोगों को भेंट किए जाते हैं।

मैंने मन में ही कहा कि भारत में मैंने किसी को ‘कामसूत्र’ गिफ्ट करते ना देखा है ना सुना। ऐमिलियो को जैसी जानकारी थी उससे मुझे लगा कि यदि इसे सही परवरिश, पढ़ने-लिखने का ढंग से मौका मिला होता तो यह एक शानदार कॅरियर बनाती। जैसा इसने बताया उस हिसाब से इसकी मां और इसके देश लाइबेरिया का गृह युद्ध इसकी बरबादी का मुख्य कारण हैं

ऐमिलियो के साथ हफ्तों का भारत भ्रमण कर जब हम वापस घर पहुंचे तब तक मैंने यह अहसास किया कि ऐमिलियो के प्रति मुझमें कुछ भावनात्मक लगाव पैदा हो गया है। उसके पहले तो बस एक दूसरे से एक अजब किस्म की स्थितियों में मिलना और एक दूसरे को कंपनी देने या लेने जैसी ही बातें थीं। ऐमिलियो में भी मैं कई बार ऐसा महसूस कर रहा था। जब वह अंतरंग क्षणों में या यूं ही जिस तरह से मिलती या खाते-पीते समय जैसा विहैव करती, उसमें मैं भावनात्मक लगाव का पुट महसूस करता था। जब हम घर आए तो ऐमिलियो की अपने देश वापसी के मात्र पांच दिन और बचे थे।

यह पांच दिन हमने फिर से दिल्ली घूमने खाने-पीने या फिर घर में ही मौज-मस्ती में बिताए। जहां-जहां गए वहां के बारे में भी खूब बातें हुईं। इस बीच मैंने देखा कि उसके जाने की जैसे-जैसे तारीख निकट आ रही है मेरी बेचैनी वैसे-वैसे ज़्यादा बढ़ती जा रही है। मेरा मन कर रहा था कि ऐमिलियो जाए ही नहीं। वो मेरे ही साथ रहे। इस स्थिति के चलते मैंने ऐमिलियो की जितनी चाहत थी उससे भी कहीं ज़्यादा शॉपिंग कराई। उसकी मन-पसंद चीजों का ढेर लगा दिया। सच यह था कि मेरे मन में उससे शादी कर लेने की भावना एकदम उमड़ सी पड़ रही थी। मैं विधिवत शादी कर उसे अपने देश का नागरिक बनाना चाहता था। जब कि ऐमिलियो ने पहले कई बार लिवइन के लिए संकेत किया था। लेकिन मैं इससे आगे की सोच रहा था।

आखिर जाने को एक दिन रह गए तो मैंने उससे कहा ‘ऐमिलियो तुम्हारे साथ इतने दिनों रहने के बाद मैंने तुम्हें जितना जाना समझा है, मेरे मन पर तुम्हारा जो प्रभाव पड़ा है। उससे मैंने ये डिसाइड किया है कि यदि तुम्हें एतराज ना हो तो मैं तुमसे शादी करना चाहता हूं। तुम्हें यहीं की नागरिकता मिल जाएगी। देखा जाए तो यह दो महीने से लिवइन में तो हैं ही। तुम चाहोगी तो हम दोनों एक बढ़िया जीवन जी सकते हैं। बच्चे भी कर सकते हैं। मेरी इस बात पर ऐमिलियो ने जिस तरह की प्रतिक्रिया दी उससे मैं शुरू में खुशी से एकदम पागल सा हो उठा।

उसने पहले तो कुछ क्षण मुझे एक-टक देखा, मुझे लगा कि उसकी आँखें भर आई हैं। फिर उसने मुझे अपनी बांहों में भर कर दर्जनों जगह चूम लिया। मुझे जकड़े बैठी रही। फिर बोली ‘रोहिट मैं भी यही चाहती हूं। लेकिन डरती हूं कि कहीं मेरी वजह से तुम्हें कोई दिक्कत ना हो जाए। मैं नीग्रो हूं। आज तुम मुझे पसंद कर रहे हो। कहीं जल्दी ही तुम मुझे अधर में ना छोड़ दो।

कहीं यह ना कहो कि हमारे बीच बहुत बड़ा एज गैप है। हमारे विचार इतने नहीं मिलते कि हम जीवनभर साथ रह सकें। इन दो महीनों में मैंने जितना तुम्हारे देश को जाना। जितना देखा है, उससे भी यह सोचती हूं कि तुम अपने कंट्री, अपने लोगों की बातों को कैसे फेस कर पाओगे? रोहिट मैं तो लाइफ पार्टनर बनने का सपना लेकर ही आई हूं तुम्हारे पास। तुम्हें परेशानी ना हो बस यही एक मात्र मेरी चिंता है।’ उसकी बातों ने मुझे और भावुक कर दिया।

उसे एक बार गले से लगा कर कहा ‘ऐमिलियो तुम जितनी बातें कह रही हो यह कोई मैटर ही नहीं है। रिश्ते में एज गैप के लिए तुमने तो स्वयं पहले ही कहा था कि एज कोई मैटर नहीं रखता। फैमिली से मेरा कोई संबंध ही नहीं है। इसलिए वहां से सहमति-असहमति का प्रश्न ही नहीं। बाकी हमारा समाज अब इतना व्यस्त है कि उसे ये सब देखने की फुरसत ही कहां? सबसे बड़ी बात यह कि तुमने कहा कि तुम नीग्रो हो। इसलिए मैं जल्दी ही अलग हो जाऊंगा। मेरा यकीन करो ऐमिलियो ऐसा कुछ नहीं है। मैं तुम्हें इमोशनली चाहने लगा हूं। असल में मुझे लगता है कि यह तुम्हारा एक डर है और जल्दी ही दूर हो जाएगा। तुम्हारे पास आकर मन का रिश्ता पहले ही बन गया है। तन का बाद में।

फिर तुम्हारा रंग एकदम नीग्रो जैसा कहां है? तुम्हारे रंग को हम व्हीटिश या गेंहुआ कहते हैं। तुम्हारा रंग मुझसे ज़्यादा दबा नहीं है। ऐमिलियो मैं तुम से बहुत साफ कहना चाहता हूं कि कोई समस्या ही नहीं है। बस तुम्हारी हां चाहिए। जो अभी तक नहीं मिली। हमारे तुम्हारे बीच सही मायने में यही पहली और आखिरी समस्या है।’ इसके बाद मेरी और कई बातों के बाद ऐमिलियो मेरे गले से लग गई। मुझे बांहों में कस लिया था। वो एकदम चुप थी। कुछ ही पलों बाद मैंने अपने कंधे पर कुछ गीलापन महसूस किया। मैंने दोनों हाथों से पकड़ कर उसका चेहरा सामने किया। वह रो रही थी।

उसके आंसू देख कर मैं भी एकदम भावुक हो उठा। उसे ऐमिलियो-ऐमिलियो कहते हुए बांहों में भर लिया। वह सुबुक पड़ी। उसने सुबुकते हुए कहा। ‘रोहिट मैं जाना ही नहीं चाहती। मैं भी तुम्हारी ही तरह सोच रही हूं। कई दिन से यही सोच रही हूं।’

मैंने कहा ‘ऐमिलियो जब हम दोनों यही सोच रहे हैं तो फिर कोई बाधा ही नहीं है। रुक जाओ। तुम जाओ ही नहीं। कानूनी अड़चनों का भी कोई हल निकाल ही लेंगे। तुम चाहो तो कल ही कोर्ट मैरिज कर लेते हैं।’

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