दहलीज़ के पार - 15

दहलीज़ के पार

डॉ. कविता त्यागी

(15)

प्रभा की एम. ए. की शिक्षा सम्पन्न हो चुकी थी, किन्तु सिविल सर्विस की परीक्षा मे वह अभी तक पूर्ण सफलता प्राप्त नही कर पायी थी। यद्यपि वह लिखित परीक्षा मे दो बार उत्तीर्ण होकर साक्षात्कार के चरण तक पहुँच चुकी थी, परन्तु दोनो बार साक्षात्कार मे अनुत्तीर्ण हो गयी। दो बार साक्षात्कार मे अनुत्तीर्ण होकर भी प्रभा की लगन तथा साहस मे कमी नही आयी थी। अपनी असफलता को वह सफलता तक पहुँचने की सीढ़ी बताती थी और अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए निरन्तर प्रयास कर रही थी। उसके प्रयास मे सहयोग और प्रोत्साहन देने के लिए उसका परिवार प्रतिक्षण उसके मनोबल को बढ़ाता था।

परिवार का सहयोग एव प्रोत्साहन पाकर प्रभा मे अपने लक्ष्य के प्रति लगन तथा लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए कठोर परिश्रम करने की सामर्थ्य कई गुना बढ़ जाती थी। परन्तु उसको उसके लक्ष्य से भटकाने वाली तथा उसको हतोत्साहित करने वाली शक्तियाँ भी निरन्तर क्रियाशील थी। ये शक्तियाँ प्रभा के चारो ओर नकारात्मक वातावरण का निर्माण करके उसके लक्ष्य से उसको दूर करना चाहती थी। अपने नकारात्मक उद्‌देश्यो को पूरा करने के लिए ऐसी शक्तियाँ पग—पग पर उसके मार्ग मे अवरोध उत्पन्न कर रही थी। यह अवरोध अनेकानेक रूपो मे उसके समक्ष आ खड़ा होता था। कभी यह अवरोध उसके गाँव—समाज की टिप्पणियो मे प्रकट होता था, तो कभी अर्थाभाव का रूप ग्रहण करके प्रभा को हतोत्साहित करने मे अपनी भूमिका—निर्वाह करता था और कभी उसकी भावी सास के दमनकारी आदेश उसकी प्रतिभा को कुठित करने के प्रयास के रूप मे उसके लक्ष्य मे अवरोधक बनते थे।

सामान्यतया प्रभा अपनी स्वस्थ परम्पराओ और अपने से बड़ो का वर्चस्व स्वीकार कर लेती थी। ये सस्कार उसे उसके परिवार से मिले थे और अब यह उसका स्वभाव बन चुका था। किन्तु अपने लक्ष्य के सापेक्ष उसके लिए सब कुछ गौण हो जाता था, इसलिए किसी का वर्चस्व स्वीकार करके अपने लक्ष्य से पीछे हटना उसको स्वीकार नही था। लक्ष्य प्राप्ति के समक्ष आने वाले अवरोधो के सामने घुटने टेककर बैठना उसकी प्रकृति नही थी। अपना लक्ष्य प्राप्त होने तक निरन्तर सघर्ष करते हुए आगे बढ़ना उसका स्वभाव बन चुका था। अब रुकना उसके लिए सम्भव नही था, भले ही मार्ग मे बड़ी—से़़—बड़ी कठिनाई आकर खड़ी हो जाएँ।

अपने समाज की उपेक्षा को प्रभा सहन कर लेती थी। अपने समाज मे व्याप्त रूढ़ियो से सघर्ष करना भी उसके लिए आसान था और रूढ़िवादी लोगो की आलोचना के व्यग्य—बाणो का सामना करने की भी वह आदी हो चुकी थी। किन्तु, अब उसके लक्ष्य को प्राप्त करने के मार्ग मे इन सब बातो की अपेक्षा अधिक दुस्साध्य अवरोध उत्पन्न हो गया था। लगभग एक वर्ष पहले विनय के साथ प्रभा का विवाह निश्चित हो गया था और उन दोनो की सगाई हो चुकी थी। अब विनय की माँ प्रभा तथा उसके परिवार पर दबाव बना रही थी कि उन दोनो का विवाह शीघ्रतिशीघ्र समपन्न हो जाए।

विनय की माँ का कहना था कि प्रभा के आई. ए. एस. मे चयन हो पाने से उन्हे कोई विशेष अन्तर नही पड़ता है। उन्हे प्रभा को अब भी अपनी बहू के रूप मे स्वीकार करने मे कोई आपत्ति नही है। उन्होने अपना मत प्रस्तुत करते हुए कहा कि प्रभा यदि नौकरी करना चाहे तो एम. ए. की शिक्षा के आधार पर कर सकती है, परन्तु उनके परिवार को एक बहू की आवश्यकता है, जो उनके बेटे को और अपने घर को सँभाल सके। विनय की माँ के इस मत से प्रभा सहमत नही थी। उसने अपनी माँ से तथा अपने भाई अथर्व से स्पष्ट शब्दो मे कह दिया था कि वह केवल पति तथा उसका घर सँभालने के लिए नही जन्मी है। वह प्रशासनिक सेवाओ मे अपनी यथाश्क्ति प्रतिभागिता से देश की दशा सुधारने मे अपना योगदान करना चाहती है और आई. ए. एस. मे चयन होने से पहले वह किसी भी दशा मे अपना विवाह नही करेगी।

विनय ने अपनी माँ के निर्णय तथा प्रभा के निर्णय के बीच का रास्ता निकालकर यह निर्णय दिया कि प्रभा विवाह के पश्चात्‌ भी आई. ए. एस. की तैयारी करती रह सकती है। प्रभा को विनय का प्रस्ताव भी स्वीकार नही था । वह अपने निश्चय पर अटल थी कि अपना लक्ष्य प्राप्त करने से पहले वह विवाह नही करेगी। उसने विनय तथा उसकी माँ के समक्ष यह भी स्पष्ट कर दिया था कि एक स्त्री घर सँभालने के साथ—साथ अपनी प्रतिभा के अनुरूप घर से बाहर भी महत्वपूर्ण भूमिकाओ का निर्वाह कर सकती है, अतः वह घर की चारदीवारी मे रहने का दबाव स्वीकार नही करेगी। प्रभा ने उनसे यह भी कहा कि घर सँभालने का दायित्व अकेले स्त्री का नही होता है। जब एक स्त्री घर के बाहर महत्वपूर्ण दायित्व का निर्वाह करती है, तब पुरुष का कर्तव्य है कि वह शक्ति और योग्यता के अनुसार घर के काम मे अपना सहयोग करके अपने दायित्व का निर्वाह करे।

प्रभा के स्पष्टीकरण से विनय की माँ का माथा ठनक गया। अब तक जिस लड़की को वे गुणो का भण्डार कहती थी, वही लड़की उन्हे चुनौती दे, यह उन्हे सहन नही था। वे अपने बेटे विनय का विवाह प्रभा के साथ इसलिए करना चाहती थी, क्योकि प्रथम दृष्ट्‌या प्रभा को देखकर उन्हे लगा था कि यह लड़की जीवन मे अवश्य ही कुछ बड़ा करेगी। परन्तु दो बार आई . ए. एस. के साक्षात्कार मे अनुत्तीर्ण होकर उसने विनय की माँ को निराश कर दिया था। अपने निराश मन को समझाने के लिए उन्होने सोचा था कि कम—से—कम उनके बेटे को और घर को तो वह भली—भाँति सँभाल ही सकती है। साथ ही उसका बड़ा भाई अक्षय एक बड़ा अधिकारी है, तो बड़े घर से सम्बन्ध भी जुड़ेगा और दान—दहेज भी अच्छा मिलेगा। परन्तु प्रभा ने अब उनकी इस आशा पर भी पानी फेर दिया था।

गरिमा भी विनय की माँ से भेट करती रहती थी। वह जब भी अपने पिता के घर आती थी, तब महिला मच मे अपनी प्रतिभागिता अवश्य दर्ज कराती थी। वही पर उसकी भेट विनय की माँ विजयलक्ष्मी जी से होती थी। जब भी गरिमा के साथ उनकी भेट होती थी, तभी वे स्नेहपूर्वक प्रभा की कुशल—क्षेम के विषय मे पूछती थी। उनके स्नेह को देखकर पता चलता था कि वे एक आदर्श सास है ; जो विवाह के पहले भी अपनी बहू के विषय मे इतनी चिन्ता करती है। विजयलक्ष्मी जी के स्वभाव की प्रशसा करते हुए गरिमा ने एक बार प्रभा के समक्ष इस विषय मे चर्चा की थी, तब प्रभा ने कहा था कि विवाह से पहले स्नेह का प्रदर्शन करने वाली स्त्रियाँ बेटे के विवाह के पश्चात्‌ भी अपनी बहू को स्नेह और स्वतत्रता दे, यह आवश्यक नही है। विजय लक्ष्मी के प्रति प्रभा के सन्देहास्पद भावो को देखकर गरिमा सोच मे पड़ गयी। उसने कुछ क्षणो तक सोचते रहने के पश्चात्‌ प्रभा से पूछ ही लिया —

प्रभा, अपनी होने वाली सास के लिए तुम ऐसा क्यो सोचती हो कि वे तुम्हे अपनी बहू बनाने के बाद स्नेह और स्वतत्रता नही देगी ? उन्होने ऐसा कुछ कहा है क्या ?

हाँ भाभी जी, अभी तो मेरा विवाह हुआ भी नही है और मेरी होने वाली सास ने अभी से इतने प्रतिबन्ध लगा दिए है कि एक लम्बी सूची बन सकती है। कभी वे कहती है कि मै विवाह के पश्चात्‌ सिविल सर्विस की तैयारी नही कर पाऊँगी, कभी कहती है ; उन्हे मेरी नौकरी की आवश्यकता नही है और कभी... !

अपनी बात कहते—कहते प्रभा बीच मे रुक गयी, मानो वह बहुत थक गयी थी। कुछ क्षण रुककर प्रभा ने एक लम्बी साँस लेकर पुनः कहा —

भैया का फोन आया था कि विनय की माँ हमसे शीघ्रातिशीघ्र भेट करना चाहती है ! ईश्वर जाने इस भेट मे वे कौन—सा नया प्रतिबन्ध लगायेगी ! म्ुाझे तो शका हो रही है कि वे मेरे और विनय के विवाह मे किसी प्रकार की अड़चन खड़ी न कर दे !

तुम्हे ऐसा क्यो लगता है ?

क्योकि मैने उनकी उन सभी अपेक्षाओ को धराशायी कर दिया है, जो मेरी उन्नति मे बाधक है ! वे मुझे परम्परागत बहू के रूप मे देखना, स्वीकार करना चाहती है, जो उनके बेटे और उनके घर को सँभालने के लिए घर के अन्दर बन्द रहेगी। मै यह स्वीकार नही कर सकती, इसलिए यह सब कुछ मैने उनसे स्पष्ट शब्दो मे कह दिया !

ऐसा दोगला चरित्र है उनका, हाथी के दाँत खाने के अलग दिखाने के अलग ! विजयलक्ष्मी के चरित्र के विषय मे आश्चर्य प्रकट करके गरिमा प्रभा को सात्वना दी कि वह चिन्ता न करे, समय सभी समस्याओ का समाधान कर देता है।

सिविल सर्विस के चयन मे प्रभा की असफलता और एक परम्परागत बहू बनकर घर की चारदीवारी मे रहने के विरोध मे उसके स्पष्टीकरण के बाद विनय की माँ ने निश्चय कर लिया था कि वे अपने बेटे का विवाह प्रभा के साथ नही करेगी। परन्तु, अपने निश्चय को अभी तक वे निर्णय का रूप नही दे पायी थी। ‘महिला मच' की अध्यक्षा होने के नाते वे यह कहने मे सकोच कर रही थी कि प्रभा स्त्र्योचित स्वतत्रता चाहती है, इसलिए वे उसे अपनी बहू बनाना नही चाहती है। वे किसी ऐसे अवसर की प्रतीक्षा मे थी, जिसकी आड़ लेकर वे कोई ऐसा बहाना कर सके, जिससे प्रभा को बहू के रूप मे स्वीकार नही करना पड़े। यह अवसर उन्हे अश को चेन—स्नेचिग करते हुए रगे हाथो पकड़े जाने से मिल गया था। इस अवसर का विनय की माँ पूरा लाभ उठाना चाहती थी, इसलिए उन्होने प्रभा के परिवार को सन्देश भिजवाया था कि वे उनसे शीघ्रातिशीघ्र भेट करना चाहती है।

विनय की माँ के सन्देश के अनुसार प्रभा और उसके परिवार ने उनसे भेट करने की तैयारी कर ली और उन्हे प्रभा के भाई अक्षय के घर पर बुला भेजा। विनय की माँ के पास अपने आने के सन्देश के साथ बुलावा भेजने के बाद से प्रभा का पूरा परिवार एक अज्ञात भय और शका से ग्रस्त होकर उनकी प्रतीक्षा करने लगा। परिवार का प्रत्येक सदस्य अपनी क्षमतानुसार यह अनुमान करने का प्रयास कर रहा था कि विनय की माँ उनसे भेट क्यो करना चाहती है ? इस बार उनकी कौन—सी नयी माँग हो सकती है ? परिवार मे किसी के मनःमष्तिस्क मे यह शका नही थी कि अश के विषय मे उन्हे कुछ ज्ञात हो सकता है और उसी घटना की आड़ मे वे विनय तथा प्रभा के विवाह मे बाधा उत्पन्न करने का प्रयास कर सकती है। यद्यपि अपने स्पष्टीकरण की प्रतिक्रियास्वरूप प्रभा को विवाह मे अड़चन उत्पन्न होने की सम्भावना थी, परन्तु उसने इस विषय मे अपने परिवार मे किसी को कुछ भी नही बताया था। अश के विषय मे वह स्वय अनभिज्ञ थी कि वह अपराध की दुनिया मे प्रवेश कर चुका है और एक बार पुलिस की दृष्टि उस पर पड़ चुकी है।

पर्याप्त प्रतीक्षा करने के पश्चात्‌्‌ प्रभा के परिवार को विनय की माँ के दर्शन हुए। जिस समय विजयलक्ष्मी जी अक्षय के घर पहुँची, उनका मन अत्यधिक अस्थिर थी। उन्होने वहाँ आकर अभिवादन की औपचारिकता मे भी वैसा उत्साह नही दिखाया, जैसे उस दिन से पहले या प्रभा और विनय का विवाह निश्चित करने के प्रारम्भिक दिनो मे दिखाती थी। अक्षय तथा अर्थव अपनी बहन की ससुराल वालो के स्वागत मे किसी प्रकार की कसर नही छोड़ना चाहते थे, इसलिए उनके व्यवहार मे यथोचित उत्साह और अतिथियो के प्रति यथोचित सम्मान झलक रहा था, किन्तु विजयलक्ष्मी जी के व्यवहार मे उसी अनुपात मे उदासीनता झलक रही थी। उस दिन उन्होने नाश्ता—पानी ग्रहण करने मे भी पहले जैसी रुचि नही दिखायी। वे अधिकाश समय चुप ही बैठी रही और केवल उन्ही प्रश्नो का सीमित शब्दो मे उत्तर देती रही थी, जो प्रभा के परिवार द्वारा उनके कुशलक्षेम के विषय मे पूछे गये थे। उनकी उदासीनता से प्रभा और उसके परिवार की चिन्ता बढ़ती जा रही थी। अतः प्रभा की माँ ने पूछ ही लिया —

बहन जी, आज आप कुछ चुप—सी लग रही है, क्या बात है ?

बात बहुत बड़ी है ! कहाँ से शुरू करूँ, यह नही समझ पा रही हूँ, इसीलिए मै चुप बैठी हूँ ! पर जिस बात को कहने के लिए यहाँ तक आयी हूँ कहनी तो पड़ेगी !

हाँ—हाँ, बहनजी आप निश्चिन्त होकर कहिए, जो कुछ कहना चाहती है !

प्रभा की माँ ने विषय को आरम्भ कर दिया था। अब विनय की माँ के लिए अपनी बात को कहना आसान हो गया था। इतना ही नही, अब उनके व्यवहार मे धीरे—धीरे कठोरता आ गयी थी। उन्होने साफ—साफ कह दिया था कि जिस परिवार का लड़का लूटपाट करने वाले गिरोह से जुड़ा हुआ हो और अपराध करते हुए प्रत्यक्षतः पुलिस द्वारा पकड़ा जा चुका हो, वे उस परिवार की बेटी के साथ अपने बेटे का विवाह करके अपनी मान—प्रतिष्ठा को दाँव पर नही लगायेगी !

विनय की माँ के शब्द कानो मे पड़ते ही प्रभा के पूरे परिवार को एक झटका—सा लगा। उनके मुँह से कोई शब्द नही निकल पाया। वे सोच भी नही सके कि प्रत्युत्तर मे क्या कहे। लेकिन इस स्थिति के लिए प्रभा पहले से तैयार थी कि विनय की माँ उनके विवाह के विषय मे किसी भी प्रकार से नकारात्मक प्रतिक्रिया दे सकती है। हाँ, उसको यह अनुमान नही था कि उस नकारात्मक प्रतिक्रिया का आधार उसके भतीजे का कोई अवैध—अनीतिक कार्य—व्यवहार हो सकता है। यह स्थिति क्षण—भर के लिए प्रभा को असहज अनुभव हुई थी। अगले ही क्षण प्रभा ने विनय की माँ से कहा —

आटी जी, आप तो महिलाओ के पक्ष मे आवाज उठाने वाली सामाजिक कार्यकर्ता है और महिलाओ को उनके अधिकार, मान—सम्मान दिलाने मे सहायता करती है ! आप मेरे साथ ऐसा अन्याय कैसे कर सकती है कि एक ऐसे अपराध का दण्ड़ मेरे लिए निश्चित कर दे,

जो मैने नही किया है !

हाँ, मै महिलाओ के अधिकारो के लिए और उन्हे न्याय दिलाने के लिए आवाज उठाती हूँ, मै लेकिन अपने बेटे को ऐसी लड़की के साथ जीवन—भर के बन्धन मे नही बाँध सकती, जो... ! खैर, छोड़िए, मेरा मुँह खुल गया, तो बात लम्बी खिच जाएगी, जो मै नही चाहती हूँ ! मुझे जो भी कहना था कह चुकी हूँ !

आटी जी ! आप जो भी कहना चाहती थी, कह चुकी, लेकिन आप जो कुछ करना चाहती है, वह कदापि नही होगा ! प्रभा ने कहा।

तुम्हारे कहने का क्या आशय है ? स्पष्ट कहो जो कुछ कहना चाहती हो ! विनय की माँ ने प्रभा को घूरते हुए आवेशमयी स्वर मे कहा।

आटी जी, आपने अभी—अभी अपना निर्णय सुनाया था। मै जानना चाहती हूँ क्या आपने इस विषय मे विनय से विचार—विमर्श किया था ?

वह मेरा बेटा है ! मै उसकी माँ हूँ और उसके विषय मे मेरा निर्णय ही अन्तिम निर्णय होगा। अपने बेटे को मै जो कहूँगी, वह वही करेगा ! मैने अपने बच्चो को श्रेष्ठ सस्कार दिये है, तुम्हारे भतीजे की तरह नही है मेरा बेटा !

ठीक है, आपने अपने बेटे को श्रेष्ठ सस्कार दिये है, किन्तु आप भूल रही है कि अब आपका बेटा वयस्क हो चुका है और वह उचित—अनुचित का भेद कर सकता है। वह इस तथ्य को भली—भाँति समझ सकता है कि अश के अपराध का दण्ड मुझे नही दिया जाना चाहिए ! और आप जानती है कि मै और विनय एक दूसरे को अपना जीवन—साथी स्वीकार कर चुके है !

प्रभा और विजयलक्ष्मी जी के बीच पर्याप्त समय तक वाद—प्रतिवाद चलता रहा। बीच—बीच मे प्रभा की माँ ने अपनी बेटी को समझाने का प्रयास किया कि अपने से बड़ो के साथ वाद—प्रतिवाद नही करना चाहिए, किन्तु वह उनकी बाते समझने के लिए तैयार नही थी। वह भूल चुकी थी कि विजयलक्ष्मी जी उसकी होने वाली सास है। उस समय प्रभा को केवल इतना याद रहा कि उसके साथ अन्याय हो रहा है, जिसे वह सहज स्वीकार नही करेगी। कई बार विजयलक्ष्मी जी ने वहाँ से उठकर जाने का प्रयास किया, किन्तु हर बार प्रभा कोई—न—कोई ऐसी बात कह देती थी, जिसका उत्तर दिये बिना चले जाना उन्हे अपना अपमान अनुभव होता था। इसका कारण यह था कि प्रभा का प्रत्येक शब्द, प्रत्येक वाक्य शिष्टता की सीमा के अन्दर होते हुए भी विजयलक्ष्मी जी के दोहरे मानदण्ड़ो पर करारा प्रहार करता था।

रात हो चली थी और अब वाद—प्रतिवाद भी अवसान की दशा को प्राप्त करने लगा था। उसी समय विजयलक्ष्मी जी के मोबाईल पर एक कॉल आयी। कॉल रिसीव करते ही उनके चेहरे पर भाव—परिवर्तन दिखाई देने लगा। उनकी बातो से प्रकट होने वाला रूखापन और अहकार भी उस समय अप्रत्याशित रुप से समाप्त हो गया था। किसी को यह अनुमान नही हो सका कि अचानक विजयलक्ष्मी जी के व्यवहार मे चमत्कारिक परिवर्तन कैसे हो गया ? प्रभा ने अनुमान लगाया कि शायद विनय ने फोन पर अपनी माँ से कोई ऐसी बात की है, जिससे उनके व्यवहार मे असम्भावित परिवर्तन सम्भव हो सका है। अपने अनुमान के आधार पर प्रभा अपने होने वाले जीवन—साथी पर गर्व का अनुभव कर रही थी। उसी समय उसके मोबाईल पर विनय की कॉल आयी। विनय से बातचीत करते हुए प्रभा को ज्ञात हुआ कि अपनी माँ के साथ विनय की कोई बात नही हुई थी। इतनी ही नही, विनय को तो यह भी ज्ञात नही था कि उसकी माँ प्रभा के घर पहुँची हुई है। विनय ने प्रभा को बताया कि उसका परिवार एक विकट समस्या से घिर गया है, जिसकी सूचना अभी तक उसकी माँ को नही दी गई है। उस समस्या के विषय मे प्रभा के पूछे जाने पर विनय क्षण—भर चुप रहा। तत्पश्चात्‌ असहज—सा होकर बोला—

प्रभा, मेरी बहन नन्दिनी को ड्रग्स लेते हुए पकड़ा गया है। अभी तक वह घर नही आयी है। वह पुलिस की कस्टडी मे है और जाँच रिपोर्ट आने के बाद ही हम उसको घर ला सकते है, उससे पहले नन्दिनी का घर लौटना सम्भव नही है।

क्या ...अ ...कहरहे हो तुम ?

हाँ, प्रभा, मै सच कह रहा हूँ, पर तुम यह सब मम्मी को मत बताना ! वे अपनी बेटी की पुलिस कस्टड़ी की सूचना सुनकर खुद को सँभाल नही पाएँगी !

ठीक है, मै उन्हे कुछ नही बताऊँगी !

प्रभा ने विनय को विश्वास दिलाया कि वह उसकी माँ को नन्दिनी की पुलिस कस्टड़ी के विषय मे नही बतायेगी। उसने विनय को ईश्वर पर भरोसा रखकर धैर्य से समस्या का सामना करने के लिए प्रेरित किया। पर्याप्त समय तक बातचीत करने के दौरान विनय ने प्रभा को पूरी घटना सूनायी कि किस प्रकार नन्दिनी प्रायः अपने मित्रो के साथ बदनाम होटलो मे मौज—मस्ती करने के लिए जाती थी। विनय ने कहा कि लड़को के समान अपने जीवन को स्वतत्रतापूर्वक जीने तथा कही भी—कभी भी निर्बाध आने—जाने की चाहत ने ही नन्दिनी को इस विषम परिस्थिति के भँवर मे फँसाया है। विनय के विचारो का समर्थन करते हुए प्रभा ने कहा —

हाँ विनय, तुम ठीक कहते हो ! स्वतत्रता का आशय अपने बच्चो को अपने अनुभवो से युक्त नियत्रण से मुक्त करना नही होता है। लड़की हो या लड़का सभी को सस्नेह नियन्त्रण की आवश्यकता होती है। जब माता—पिता अपने बच्चो की नियत्रणहीन स्नेह के साथ प्रत्येक माँग पूरी करते है, यह सोचे—विचारे बिना कि उनकी माँग उचित है अथवा अनुचित, तब यही होता है जो अश तथा नन्दिनी के साथ हो रहा है।

हाँ प्रभा, लेकिन इस समय सबसे पहले हमे नन्दिनी को घर लाना चाहिए ! शेष बाते बाद मे करेगे ! मै मोबाइल बन्द कर रहा हूँ। विनय ने फोन पर सम्पर्क काट दिया था। अब प्रभा को समझ मे आ रहा था कि अवश्य ही विनय की माँ को नन्दिनी के बारे मे अप्रिय समाचार मिल गया था। सम्भवतः उनके मोबाइल पर जो फोन कॉल आयी थी वह उसी की सूचना थी, इसीलिए उनके व्यवहार मे परिवर्तन आया था। नन्दिनी की पुलिस कस्टड़ी से प्रभा दुखी थी, परन्तु वह सोच रही थी कि विनय की माँ को सद्‌मार्ग दिखाने के लिए ईश्वर ने ऐसी परिस्थिति उत्पन्न कर दी है । यह अत्यन्त आवश्यक था, ताकि उन्हे उचित—अनुचित का ज्ञान हो सके। यदि नन्दिनी के साथ यह घटना घटित नही होती, तब उन्हे अपने अन्यायपूर्ण निर्णय को लेकर कभी ग्लानि नही होती। जब प्रभा को पूर्ण विश्वास हो गया था कि नन्दिनी की सूचना पाकर अश के प्रति विनय की माँ के दृष्टिकोण मे अवश्य परिवर्तन होगा और बिना किसी शर्त वे उसको अपनी बहू के रुप मे स्वीकारने के लिए तैयार हो जाएँगी, तब अपने सकारात्मक विचारो को धारण करके उसने विनय की माँ से अपने व्यवहार के लिए क्षमा—याचना की। उसके विनम्र व्यवहार और क्षमा—याचना से विनय की माँ ने भी सास की गरिमा का निर्वाह करते हुए अपने हाथो से स्वर्ण कगन उतारकर प्रभा के हाथो मे पहना दिये।

अब विनय की माँ के व्यवहार मे विनम्रता, आत्मीयता और अहकारहित बडप्पन आ गया था, फिर भी उनके चेहरे पर चिता की रेखाएँ स्पष्ट परिलक्षित हो रही थी। इस चिता का कारण प्रभा के अतिरिक्त किसी को ज्ञात नही था। प्रभा किसी को इस विषय मे कुछ बताना भी नही चाहती थी। अतः वह उन्हे शीघ्रातिशीघ्र विदा कर देना ही उचित समझती थी। उसने अपनी माँ तथा भाई—बहन को सकेत किया कि रात अधिक हो गयी है, उन्हे शीघ्र ही विदा करना चाहिए। प्रभा का सकेत पाकर उन्होने भी उसका समर्थन किया और विनय की माँ को शीघ्र ही विदा कर दिया। विदा होते—होते विनय की माँ ने कहा —

पडित जी से पूछकर मै शीघ्र ही विवाह की तिथि निश्चित करा लूँगी और आपको सूचना दे दूँगी !

बहन जी, हमसे अनजाने मे कुछ गलती हो गयी हो, तो हमे माफ कर देना ! प्रभा की माँ ने विनय की माँ से कहा। प्रभा की माँ के शब्दो को सुनकर विजयलक्ष्मी जी ने उनके दोनो हाथो को अपने हाथो मे लेकर कहा —

आप अपने कलेजे के टुकड़े को हमारे हाथो मे सौपने के लिए तैयार है ; इसके लिए मै आपकी आभारी हूँ। इतनी पढ़ी—लिखी और सुसस्कारो से युक्त बहू पाकर मै तो धन्य हो जाऊँगी ! इतना कहकर विजय लक्ष्मी जी ने विदा ली और चली गयी।

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