असली आज़ादी वाली आज़ादी (भाग-4)

भाग 3 से आगे-

मनोरमा ने सभी के सामने चौहान साहब को चुनौती तो दे डाली पर उसके आगे क्या करना है और कैसे करना है उसे कुछ नही पता था। आधे गांव वाले तो डर ही गए थे कि अब तो चौहान या तो जान ले लेगा या तो मान ले लेगा। पीछे हटने में ही भलाई है। नन्नू के परिवार के लिए आगे का जीवन बिल्कुल भी आसान नही होने वाला था। अब दोनों बेटियों की फिक्र होने लगी थी और जिस तरह चौहान साहब का बेटा एक दरिंदे की तरह मनोरमा को देख रहा था। खतरा तो था जान का भी और मान का भी। एक औरत का सम्मान अमूल्य होता है और अगर उसी के गांव में कोई उठाए इस नज़र से देखे फिर औरत जाए तो जाए कहाँ। भाई के जाने का दर्द कम भी नहीं हुआ कि खुद की जान के बारे में सोंचना पड़ रहा था।

शैलेन्द्र की खबर आये एक सप्ताह हो चुका था पर शेखर की कोई भी जानकारी किसी के पास अभी भी ना थी। चैहान साहब और श्रीकांत को आख़िरकार फिक्र हुई और उन्होंने दिल्ली जाके अपने बेटे शेखर के बारे में जानने की सोंची। अब और टालना उनको सही नहीं लग रहा था।

चैहान साहब को उसी रात दिल्ली जाने पड़ा। इस बात का फायदा उठाके श्रीकांत ने एक चाल चली। श्रीकांत अपने एक मित्र के साथ रात को नन्नू के घर गया और वहां जाके बोला-

अरे नन्नू काका घर पर है क्या?

अंदर से आवाज आई- हाँ हम घर पर ही है। पर इतनी रात को कौन हो भैया।

श्रीकांत ने जवाब दिया- अरे हम है काका, श्रीकांत चौहान साहब के बड़े लड़के। जरा दरवाजा तो खोलो कुछ बात करनी है जरूरी।

परिवार में सिर्फ एक ही आदमी बचा था और तीन महिलाएं सभी डर गए। पर मनोरमा ने हिम्मत दिखाते हुए अपने परिवार को समझाया कि अब अपने पास खोने को कुछ भी नही है जो खोना था खो चुके। अब सिर्फ अपना सम्मान पाने के लिए संघर्ष करना है तो फिर डर कैसा। ये कहते हुए मनोरमा ने मुख्य द्वार खोल दिया।

द्वार खुलते ही श्रीकांत और उसका एक साथी अंदर आया और बोले- नन्नू काका आज जो भी हुआ उसके बारे में घर जाके बहुत सोंचा। आप भले ही नीची जाति के क्यूँ न हो पर जानके दुःख हुआ कि शैलेन्द्र भी तो हमारे भी जैसे ही था जो अब नहीं रहा। पिता जी भी बहुत शर्मिंदा है दिन वाली बात पर। वो माफी मांगने चाहते है इसलिए नहीं कि आज जो हुआ वो सही है या गलत पर इसलिए कि शैलेन्द्र ने अपने देश के लिए जान दी और हमने उसको थोड़ा सा भी सम्मान देने से मन कर दिया। काका, मैं भी बहुत शर्मिंदा हु और पिताजी भी।

नन्नू बोले- कोई बात नही बेटा आप लोग तो माई बाप हो। आप ऐसी बात मत कहो। हम सभी इंसान ही तो है गलती हो जाती है। कोई बात नहीं।

श्रीकांत ने फिर बोला- काका, आज पिताजी और मैं दिल्ली जा रहे है शेखर के बारे के पता करने उसकी कोई खबर नही है ना इसलिए। अगर मनोरमा भी साथ चले तो गांव का नाम बदलने और मूर्ति लगवाने के काम जल्दी हो जाएगा और सारा ख़र्चा भी क्या पता सरकार ही दे दे।

नन्नू को बात अच्छी न लगी पर क्यूंकि श्रीकांत माफी मांग रहा था और अपनी और अपने पिता की करनी पर शर्मिंदा भी था नन्नू की सोंच बदलने लगी उसने कहा बहुत भला हो माई बाप का। हमारे लिए इतना सोंचा। चलो बेटा मैं साथ चलता हूं दिल्ली। श्रीकांत भौचक्का रह गया। हड़बड़ाते हुए बोला- अरे नही काका आप नहीं, मनोरमा जाएगी न अपने भाई के लिए दिल्ली में सबसे बात करने आखिर वो भी तो आपके बेटे जैसी ही है। आप बूढ़े बुजुर्ग कहाँ परेशान हो जाओगे। आप रहने दो। मनोरमा सब संभाल लेगी।

अपने ऊपर इतना विश्वास देखकर मनोरमा का आत्मविश्वास भी बढ़ गया और वो भी दिल्ली जाने को तैयार हो गयी। कुछ कपड़े और खाना बांधकर वो श्रीकांत के साथ दिल्ली चल दी इस उम्मीद से कि वहाँ पर कोई बड़ा अधिकारी मिल जाएगा जो जल्दी ही आदेश भी दिलवा देगा और कुछ रुपये की मदद भी दिलवा देगा। थोड़ी ही दूर जाकर बिल्कुल अंधेरा हो गया। यह देखकर मनोरमा थोड़ा सा घबरा गई पर फिर भी वो श्रीकांत और उसके दोस्त पर भरोसा रखते हुए आगे बढ़ती रही। आगे जाके श्रीकांत और उसके दोस्त ने पानी पीने के बहाने मनोरमा को कुछ पिला दिया और पास के ही जंगल मे जाके मनोरमा के साथ इंसानियत की सारी हदें पार कर दी। वो बेचारी सिर्फ चिल्लाती एंड चीखती रह गयी पर उनदोनों जानवरों को उसपे और उसके हालातों पर दया नहीं आयी। फटे कपड़े और खून से लथपत वो मासूम लड़की सारी रात वही पड़ी रही इस उम्मीद से कि शायद सुबह तक कोई आएगा और उसकी मदद करेगा पर गरीबों और पिछड़ों के साथ तो भगवान भी अक्सर सोंच समझ के ही आता है और हुआ भी ऐसा ही सुबह तो हो चुकी थी पर उसकी मदद को कोई नही आया। जब सूरज आसमान के बीचोंबीच चमचमाने लगा तब उसे बेहोश हालात में एक गांव वाले ने देखा और चिल्लाता हुआ गांव की तरफ भागा।

वो आदमी कुछ ही समय मे नन्नू के पास पहुंचा और सारी कहानी सुनाई। नन्नू को लगा था कि उसकी बेटी श्रीकांत के साथ दिल्ली गयी है पर उसकी ये हालत के बारे में सुनके नन्नू के पैरों के नीचे की जमीन निकल गयी। वो बेचारा नंगे पांव ही खेतों की तरफ भागा और जोर जोर से मनोरमा का नाम लेके चिल्ला रहा था। मनोरमा के पास पहुंच कर वो जोर जोर से रोने लगा। कुछ गांव वालों ने निर्वस्त्र पड़ी मनोरमा के ऊपर कपड़े डाले और उसे उठाके कानपुर शहर की तरफ अस्पताल लेके भागे। आधा गांव अस्पताल पहुंच गया और सबने सिर्फ यही पूंछा की आखिर मनोरमा को हुआ क्या और वो दूर खेतों में कैसे पहुंची। नन्नू ने सभी को बताया कि रात श्रीकांत और उसका एक दोस्त आए थे और मनोरमा को दिल्ली ले जाने के बहाने घर से ले गए और फिर उसके बाद ये सब हो गया।

यह सब सुनके एक बार फिर गांव वालों में आक्रोश भर गया और फिर......

To be continued..... भाग-5.


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