दस दरवाज़े - 3

दस दरवाज़े

बंद दरवाज़ों के पीछे की दस अंतरंग कथाएँ

(चैप्टर - 3)

***

पहला दरवाज़ा (कड़ी-3)

रेणुका देवी : मैं तुझसे मुखातिब हूँ

हरजीत अटवाल

अनुवाद : सुभाष नीरव

***

कचेहरी में मैं उससे दूर रहने की कोशिश करता हूँ। वह भी समझती है और बिना मतलब बात नहीं करती। मेरे दोस्त उसका नाम लेकर मुझसे हल्के मजाक करते रहते हैं।

उसका पति राजेश कभी कभार कचेहरी आ जाया करता है। यद्यपि वह शांत स्वभाव का व्यक्ति है, पर अक्सर अपने खानदान के बारे में बातें करने लगता है। अपने घर में होती रस्मों के विषय मे बताता रहता है और अपने गाँव आने के निमंत्रण देता रहता है। अपने परिवार के शेष सदस्यों से मिलने के भी। एक दिन कहता है -

“वकील साहब, मैं कोई कारोबार खोलना चाहता हूँ। बताओ, कौन-सा ठीक रहेगा?“

“राजेश जी, मुझे कारोबार की अधिक जानकारी नहीं, मैं तो सोचता हूँ कि आपकी सरकारी नौकरी है, टिके रहो।“

“बात तो आपकी ठीक है, पर तसल्ली नहीं इसमें। वैसे तो हम पहले डेरी में रहते थे, रेणुका की भी सरकारी स्कूल में ही जॉब थी। हमारा गुज़ारा ठीक ही था, पर आदमी आगे की ओर देखता है।“

“बात तो आपकी ठीक है।“

“अब कभी-कभी लगता है कि स्कूल मास्टर का रुतबा कोई खास नहीं। बिजनेसमैन चाहे छोटा ही हो, नाम बड़ा होता है।“

मैं समझ जाता हूँ कि अब वह अपने आप को रेणुका के वकील होने से मिलाकर देखता होगा। एक दिन वह मुझसे पूछने लगता है -

“वकील साहब, एक बात बताओ, सच-सच।“

“कौन-सी?“

“क्या रेणुका का काम चल पड़ेगा? इतना समय हो गया इसको कोर्ट में आते, आज तक कुछ कमाकर घर नहीं लाई।“

“राजेश जी, यह व्यवसाय बहुत अजीब है। इतनी जल्दी कुछ नहीं होता। आप ठहरे मास्टर लोग, वकीलों वाली मानसिकता बनने में वक्त लगेगा। कचेहरी में पैसे कमाने के लिए उंगली टेढ़ी करनी पड़ती है। जिस दिन रेणुका जी यह सीख गईं, पैसा कमाने लग पड़ेंगी।“

मेरी बात सुनकर वह चुप हो जाता है मानो मायूस हो गया हो। कुछ देर बाद फिर कहने लगता है -

“वकील साहब, सच बात बताऊँ, इस हिसाब से तो हम डेरी में ही ठीक थे। हमारे पास अपना प्लाट था। अब तक घर बना लेना था। यहाँ आकर तो हाथ तंग हो गया है।“

मेरा मन होता है कि कह दूँ कि यहाँ कचेहरी में तो जाने-माने लोगों के पैर नहीं लगते, रेणुका के क्या लगेंगे, पर मैं उसका दिल नहीं तोड़ना चाहता।

इन्हीं दिनों मेरे लिए एक खूबसूरत घटना यह घटित होती है कि मुझे इंग्लैंड से विवाह के लिए रिश्ता आ जाता है। लड़की वाले रिश्ते के लिए बहुत ही उतावले हैं और रिश्ता तय भी कर जाते हैं। ख़तरनाक बात यह होती है कि रिश्ता करवाने वाला जत्थेदार रणजीत सिंह इन्द्रेश शर्मा का पुराना साइल है। उसके कई मुकदमे इन्द्रेश शर्मा के पास है। वह कचेहरी आता-जाता रहता है। लड़की जत्थेदार की पत्नी की भान्जी है। अब वह कचेहरी आने पर कुछ देर के लिए मुझसे भी मिलने आ जाया करता है। नई रिश्तेदारी का मान रखने के लिए जत्थेदार मेरे पिता से मिलने हमारे गाँव में भी आने लगता है। वह यह रिश्ता करवाकर बहुत खुश-खुश घूमता है।

खुश तो मैं भी बहुत हूँ, पर सोचता हूँ, रेणुका देवी का क्या करूँ? इन्द्रेश शर्मा मेरे साथ ज़रा नाराज़ है। वह समझ रहा है कि मैंने उसकी जूनियर को छीन लिया है। बाकी सारी कचेहरी में भी हमारे संबंधों की चर्चा चलती रहती है। यह सब एक दिन जत्थेदार रणजीत सिंह तक तो पहुँच ही जाएगा। सो, पता नहीं यह रिश्ता सफल हो या ना। मैं सारी बात रेणुका को बताते हुए कहता हूँ -

“मैडम, जितनी निभ गई बढ़िया, अब और नहीं मैं तुम्हारे साथ चल सकूँगा।“

वह मेरी बात पकड़कर कहती है -

“जोगी, तू सचमुच जोगी बनने की कोशिश न कर...तू कौन-सा पहाड़ से उतरा है कि इतना जोगी बनेगा?“

वह मुँह टेढ़ा करके बात करती है। मुझे उसका यह अंदाज बहुत प्यारा लगता है। मैं पूछता हूँ -

“मैडम, तुम पैदा हुए राजस्थान में, पले-बड़े हुए बिहार में, पंजाबियत के बारे में इतना कैसे जानते हो?“

“तेरी खातिर मैंने बहुत कुछ जानने-समझने की कोशिश की है, तू भी तो कुछ समझ।“

“मैं इतना समझता हूँ कि मेरा रिश्ता इंग्लैंड में हुआ है और मुझे इंग्लैंड जाना है, बस।“

“इंग्लैंड तो तूने पढ़ने के लिए जाना है।“

“नहीं, विवाह करवा लूँगा तो पढ़ने के साथ-साथ और बहुत कुछ आसान हो जाएगा।“ मैं कहता हूँ।

वह बहुत देर तक नहीं बोलती। फिर अचानक कहने लगती है -

“ये रिश्ते तो अंधे कुएँ होते हैं जोगी। जब मेरा रिश्ता हुआ तो मैंने इस काले-कलूटे को देखकर एकदम ना कर दी थी। मेरी माँ ने कहा था कि अगर कोई दूसरा भी मिल गया तो क्या मालूम, तू खुश भी रहेगी कि नहीं। मैंने कहा था कि कोई गोरा-चिट्टा मिल गया तो मैं उसके साथ भाग जाऊँगी। वो जैसे भी रखेगा, मैं रह लूँगी। सो जोगी, तू एकबार हाँ कह।“

फिर, वह अपनी बाहें ऊपर हवा में लहराती हुई गाने लगती है -

“यार मिले तां इज्ज़त समझां, मैं कंजरी बण के रहिणा...।“

फिर कहती है -

“ठीक है जोगी, जैसा तू कहे। तुझे तेरी विलायत मुबारक, पर एक बार तो हम कहीं बाहर जा सकते हैं।“

“चलो सही है। सिर्फ़ एक दिन, पर बहुत परदे के साथ। मैं नहीं चाहता कि कोर्ट में भी पता चले कि हम इकट्ठे बाहर गए हैं।“

उस रात हम चंडीगढ़ के बस-स्टैंड के सामने एक होटल में ठहरते हैं। खूब मस्ती चलती है। सवेरे उठकर हम लौटने के लिए काउंटर पर आकर हिसाब करने आते हैं तो क्या देखते हैं कि इन्द्रेश शर्मा भी वहीं खड़ा है। अब हम न वापस जाने लायक रहे और न आगे बढ़ने योग्य। इन्द्रेश शर्मा अधिक प्रतिक्रिया दिखाये बग़ैर हमें ‘हैलो’ कहता है। मैं अवसर को संभालते हुए कहता हूँ -

“हम कल किसी ज़रूरी काम से यहाँ आए थे और आखिरी बस निकल गई। हमें रुकना पड़ गया।“

“ऐसा हो जाता है कई बार... मैं अक्सर यहीं रुकता हूँ, यह होटल सस्ता पड़ता है।“ वह हँसते हुए कहता है और चला जाता है।

मैं बहुत डर जाता हूँ कि अब क्या होगा। जत्थेदार रणजीत सिंह तो इसका खास क्लाइंट है, यह उसको अवश्य बताएगा और साथ ही, सारी कचेहरी में डोंडी पीटेगा। मुझे यकीन हो चला है कि मेरा इंग्लैंड जाना कैंसिल। वीज़ा तो यद्यपि मैंने स्टुडेंट के तौर पर लेना है, पर अब लड़की वाले मुझे स्पांसर कर रहे हैं। जत्थेदार तो पता चलते ही इंग्लैंड फोन करके मेरी पोल खोल देगा। मैं अपने आप को कोसने लगता हूँ। मुझे अपना सुनेहरा भविष्य गहरी खड्ड में गिरा पड़ा प्रतीत होता है।

वापस कचेहरी आकर मैं रेणुका से दूर रहने का यत्न करता हूँ, पर वह जबरन मेरे पास आ बैठती है। एडवोकेट देव सरीन कई बार हमें चंडीगढ़ के होटल के बारे में मसखरियाँ कर चुका है। राणा कहने लगता है -

“तुझे बहुत समझाया, पर तू अपना फ्यूचर दांव पर लगाए बैठा है। इश्क का भूत तुझे सोचने का मौका ही नहीं दे रहा। सारी कचेहरी थू-थू कर रही है।“

“अब क्या करूँ?“

“अब तू क्या करेगा। अब तो जत्थेदार ही करेगा जो करना है! मैं तो कहता हूँ, अभी भी संभल जा।“

राणा बहुत फिक्रमंद है।

ब्रिटिश हाई कमीशन की ओर से मुझे इंटरव्यू का निमंत्रण आता है। मैं रेणुका को बताता हूँ। वह पूछती है-

“अब क्या प्रोग्राम है?“

“रेणुका जी, अगर जत्थेदार की ओर से कोई बाधा न पड़ी तो मुझे वीजा मिल जाएगा और यदि वीजा मिल गया तो मैं नहीं रुकने वाला।“

“सच बताऊँ, अगर तू चला गया तो मैं भी इस शहर में नहीं रहूँगी।“

“क्यों नहीं रहना? तेरा पति यहाँ है, यह बगल में ही ससुराल है, तुम और कहाँ रहोगे?“

“हमारा यहाँ कोई नहीं। अकेले राजेश की तनख्वाह से गुज़ारा नहीं हो रहा। वकालत में से कुछ आता नहीं। ससुराल वाले ज़मीन में से राजेश का हिस्सा नहीं दे रहे। सो, यहाँ हमारे पैर नहीं लग रहे। मैं तो यहाँ तेरे कारण ही बैठी हूँ। तू भी चला गया तो मैं यहाँ क्या करूँगी।“

मैं उसकी बात का कोई उत्तर नहीं देता। वह फिर कहती है -

“मैं तेरे साथ दिल्ली चलूँगी।“

“यह नहीं हो सकता। तुम मेरे साथ कैसे जाओग?“

“मैं घर में यह कहकर जाऊँगी कि मैं वापस डेरी जा रही हूँ और दिल्ली में उतर जाऊँगी। हम वहाँ मिलेंगे। इस तरह दो दिन निकालने मेरे लिए सरल हैं।“

ऐसा ही होता है। दो दिन वह दिल्ली में मेरे साथ रहती है। हम पूरी दिल्ली घूमते हैं। मुझे वीज़ा मिल जाता है। मैं उसको डेरी के लिए ट्रेन में बिठा देता हूँ। ट्रेन में चढ़ते हुए वह मेरे गले लगकर धाहें मारकर रोने लगती है। शायद उसको भी पता है कि हम फिर कभी नहीं मिलेंगे। यकीनन यह मेरी उसके साथ आखि़री मुलाकात है। मेरा दिल कुछ देर के लिए दुखता है, पर मैं अपने भविष्य की ओर देखने लगता हूँ।

घर आकर मैं इंग्लैंड जाने की तैयारी करने लगता हूँ। टिकट बुक हो जाती है। मित्रों-रिश्तेदारों से विदाई लेने लगता हूँ। एक डर अभी भी मन में तैर रहा है कि रेणुका के कारण अभी भी मेरे जाने में कोई बाधा पड़ सकती है।

मेरे जाने से एक दिन पहले रेणुका का पत्र आता है। लिखती है कि वह गर्भवती है और बच्चे को रखना चाहती है। परंतु उसकी माँ घर में बखेड़ा डाले बैठी है। यह भी लिखा है कि राजेश को हमारे बारे में सब पता चल चुका है और उसने उसको छोड़ दिया है। गाँव से चलते समय मेरा मन बहुत उदास हो जाता है। कई बार हम न चाहते हुए भी दिल लगा बैठते हैं।

मैं इंग्लैंड पहुँच जाता हूँ। रेणुका को ख़त लिखता हूँ। मैं ज्यादा बातें नहीं लिखता, पर घुमाकर यह जानने का यत्न अवश्य करता हूँ कि उसने बच्चा रख लिया है कि गिरवा दिया है। पाँच-छह महीने बाद वह मेरे ख़त का संक्षिप्त-सा जवाब देती है। लिखती है कि किसी न किसी तरह उसकी राजेश से सुलह हो गई है। उसके पिता ने उनको डेरी में ही घर बनवाने के लिए कुछ पैसे दे दिए हैं। वे अब डेरी में ही रहेंगे। वह स्वयं किसी स्कूल में पुनः अध्यापिका लगने की कोशिश कर रही है। बच्चे के बारे में वह कुछ नहीं लिखती।

राजेश के संग उसकी सुलह हो जाने के कारण मुझे बहुत खुशी होती है, नहीं तो मेरे मन पर एक बोझ ही बना रहता, पर बच्चे वाला कांटा अभी भी मन में चुभ रहा है। मैं इस चुभन को दिल में लिए अपनी नई ज़िन्दगी में विचरने लगता हूँ। मैं अपनी नई राहों पर चल पड़ता हूँ, पर मुझे हर समय एक प्रतीक्षा-सी रहती है कि रेणुका मुझे ख़त लिखेगी और सारी बात बताएगी।

कुछ समय बाद रेणुका का ख़त आता है। लिखती है कि उसके घर में पुत्र ने जन्म लिया है। वह चाहती तो है कि बच्चे का नाम मेरे वाला ही रखे, पर काफी कुछ सोचते हुए उसने अपने किसी अन्य हीरो वाला नाम रख लिया है। मैं उसके पुत्र के बारे में और जानने के लिए चिट्ठी लिखता हूँ, पर वह कोई जवाब नहीं देती। कुछ अन्य पत्र लिखता हूँ जो निष्फल रहते हैं। मेरे अन्दर हर समय एक तड़फ-सी रहने लगती है। कई बार यह तड़फ तंग भी करने लगती है। मैं कुछ और जानना चाहता हूँ, ख़ासतौर पर बच्चे के बारे में। क्या बच्चे के साथ मेरा कोई संबंध है? पर बताए कौन? राणा अमेरिका जा चुका है। अन्य ख़ास दोस्त भी इधर-उधर बिखर चुके हैं। फिर रेणुका अब रहती भी पंजाब से बहुत दूर है, किसी को क्या पता होगा।

अब इस बात को बहुत वर्ष बीत गए हैं। इतने बरस कि अब तक उसका पुत्र ब्याहा भी गया होगा। उसका क्या नाम रखा होगा, मुझे नहीं पता। धीरे-धीरे यह दास्तान मेरे मन की एक गुफा में सिमट जाती है। इसके सारे दृश्य फ्रीज़ होने लगते हैं। उसके बाद और बहुत कुछ घटित होता है कि इस गुफा का दरवाज़ा मैं कभी खोलता ही नहीं। मैं इंडिया जाता हूँ, पर कभी भी रेणुका का पता करने की कोशिश नहीं करता। उसकी कभी कोई ख़बर नहीं आती। कचेहरी में भी कोई पुराना दोस्त उसके बारे में नहीं जानता। आज इतने समय बाद रेणुका के विषय में बात करना अच्छा लग रहा है।

आज इस गुफा का दरवाज़ा खोलते हुए उस कांटे की चीस फिर से जाग उठी है, पर इतनी तीखी नहीं है। शीघ्र ही दब जाएगी। शायद कोई ख़बर या कोई चेहरा कभी मिले तो फिर से पुरानी चीसें जाग उठें। वैसे मैं चाहता तो हूँ कि ऐसा हो।

हाँ, उस दिन की कहानी तो अधूरी ही रह गई जिस दिन हम बालमपुर से वापस लौट रहे थे।

मैं और राणा चल पड़ते हैं। हमारे पैरों के साथ जैसे पत्थर बंधे हों। हम करीब आधा किलोमीटर ही चले होंगे, पर हमें लग रहा है कि जैसे हम कई दिनों से चल रहे हों। हमें लगता है कि शीघ्र ही हम गिर पड़ेंगे। हमारा मन होता है कि यहीं कहीं चारपाई मिल जाए तो हम लेट जाएँ। अचानक गाँव की ओर से आती एक जीप की आवाज़ कानों में पड़ती है। हम उत्सुकता से उस ओर देखने लगते हैं। जीप हमारे बराबर आकर रुकती है। उसमें कुछ स्त्रियाँ घूंघट किए बैठी हैं। हमारा सारा उत्साह ठंडा पड़ जाता है क्योंकि स्त्रियों के साथ तो हमें कोई नहीं बिठाएगा। परंतु जीप का ड्राइवर हमें जीप में बैठने का संकेत करता है। हम जल्दी से जीप में जा चढ़ते हैं। ड्राइवर जीप आगे बढ़ा लेता है। मैं चोर निगाहों से स्त्रियों की ओर देखता हूँ। सबने घने दुपट्टों के घूंघट निकाल रखे हैं। घूंघट में से कोई हँसता है। फिर एक महीन-सी आवाज कहने लगती है -

“क्यों जोगी जी, भूखे ही चल पड़े थे! क्या सोचते थे कि रेणुका के घर से कुछ खाने को नहीं मिलेगा!“

स्पष्ट है कि यह रेणुका ही है। मैं उसकी ओर देखता हूँ। वह घूंघट उठा देती है और कहने लगती है

“मैं सब देख रही थी। मैंने अपने संग दो सहेलियों को तैयार किया तब जाकर कहीं तुम्हें राह में मिल सकी हूँ। ये लो, तुम्हारे लिए खाना भी लाई हूँ और पीने के लिए भी। हम तुम्हें बस-अड्डे पर छोड़ आते हैं।“

इसके बाद ज़िन्दगी में बड़े कठिन से कठिन राह देखे हैं, पर रेणुका की तरह रब बनकर कभी कोई नहीं आया।

00

आगे खुलेगा ‘दूसरा बंद दरवाज़ा’… क्या है दूसरे बंद दरवाज़े के पीछे? जानने के लिए पढ़िये अगली किस्त…

***

Rate & Review

Indu Talati

Indu Talati 5 months ago

Savita Davi

Savita Davi 10 months ago

Pinkal Pokar

Pinkal Pokar 10 months ago

F.k.khan

F.k.khan 11 months ago

Rupal Savalia

Rupal Savalia 11 months ago