आखर चौरासी - 12

आखर चौरासी

बारह

झटके से जगीर सिंह की आँख खुल गई। उसका दिल बुरी तरह धड़क रहा था। सारा बदन पसीने से सराबोर था। काफी देर तक वे ‘वाहे गुरु... वाहे गुरु’’ का जाप करते रहे। रात आधी बीत चुकी थी।

बिस्तर पर बेचैन करवटें बदलते-बदलते न जानें उन्हें कब नींद आ गई। लेकिन इस बार भी वे ज्यादा देर तक नहीं सो सके। आँख लगते ही एक नया दृष्य उनकें अवचेतन पर छाता चल गया था.....।

नई दिल्ली के प्रधानमंत्री आवास में एक ओर को जाती हुई प्रधानमंत्री के सामने उनके ही दो सिक्ख अंगरक्षक तन कर खड़े हो गये। उन दोनों के हाथों में थमे हथियार भी तन चुके थे। पलक झपकने से भी पूर्व वे हथियार आग उगलने लगे। पल भर में प्रधानमंत्री का खून से लथपथ, गोलियों से छलनी शरीर नीचे गिरा पड़ा था। चारों तरफ खून ही खून नज़र आ रहा था।

पास ही कहीं झाड़ियों में जगीर सिंह भी छिपे बैठे थे। उनके मुँह से चीखें निकल पड़ीं, ‘‘खून... खून, पकड़ो... पकड़ो, इन हत्यारों ने हमारी प्रधानमंत्री को मार डाला.... पकड़ो... पकड़ो....!’’

स्वयं को वहां पाने से भी ज्यादा जगीर सिंह इस बात पर हैरान थे कि इस बार उनकी चीखें गले में घुट कर नहीं रह जा रही थीं। वे पूरी ताकत से चीख पा रहे थे। इसका कारण भी उन्हें जल्द ही समझ में आया, अब वे अपने वर्तमान समय में थे। आदमी केवल इतिहास का ही मूक दर्शक रह सकता है, अपने वर्तमान का नहीं ! अतः अपने वर्तमान में हस्तक्षेप करने से काल भला उन्हें क्यों रोकता ? अपनी ही चीखों से जगीर सिंह की नींद टूट गई। इस बार भी उनका दिल बुरी तरह धड़क रहा था। उसी बेचैनी में वे बिस्तर से उठे और दवाखाने का दरवाजा खोल कर बाहर बरामदे में निकल आये। चहलकदमी करते हुए वे बड़बड़ा रहे थे, ‘‘ये क्या हो गया ? ...ऐसा नहीं हो सकता !’’

अपनी बड़बड़ाहट का स्वर आज उन्हें स्वयं को ही अनजाना-सा लग रहा था। ...तब तक किसी को भी कहाँ पता था कि अभी और भी बहुत कुछ अजीब-सा और अनजाना-सा घटने वाला है!

रात की तीखी ठंढ का नश्तर भी उनकी बेचैनी नहीं रोक पा रहा था। जब उधर से रात का पहरेदार डंडा ठकठकाते गुजरा तो जगीर सिंह को यूँ परेशान हाल देख उनकी ओर बढ़ आया, ‘‘क्या बात है डाक्टर साहब, इतनी ठंढ में बाहर क्या कर रहे हैं ? कोई गड़बड़ है क्या ?’’

‘‘...ये क्या हो गया ? ...ये क्या हो गया...’’ बड़बड़ाते हुए जगीर सिंह ने रुक कर एक नजर पहरेदार पर डाली, मगर बोले कुछ नहीं।

पहरेदार की समझ में भी उनकी बड़बड़ाहट नहीं आयी, ‘‘डाकटर साहब जाइये भीतर जा कर सो जाइए।’’ कहता हुआ वह अपना डंडा ठकठकाता आगे बढ़ गया।

बेचैन जगीर सिंह पूर्ववत् वहीं टहलते रहे। रात ब-दस्तूर फिसलती जा रही थी.... रात....भयानक.... काली रात।

***

नेताजी सुरेन्दर सिंह के बरामदे में मौजूद सभी लोगों की नजरें टी.वी. स्क्रीन पर चिपकी थीं। ‘लाइव टेलीकास्ट’ करता कैमरा बार-बार उस भीड़ पर फोकस हो जाता जो हवा में अपने हाथ-पैर फेंकती पागलों की तरह चीख रही थी-

‘‘खून का बदला, खून से लेंगे।’’

‘‘खून का बदला, खून से लेंगे।’’

जब-जब वो भीड़ टी.वी.स्क्रीन पर उभरती नेताजी के बरामदे में बैठे हरीष बाबू, गोपाल चौधरी सहित अन्य लोगों की नसें तिड़कने लगतीं। अगर अपवाद थे तो विक्की के पिता रमण शंडिल्य। उन्हें टी.वी. पर पागलों की तरह चीखती उस भीड़ का बार-बार दिखाया जाना ज़रा भी अच्छा नहीं लग रहा था। स्क्रीन पर दिखाई जा रही अन्य सूचनाओं को ध्यान से देख रहे रमण शंडिल्य का ध्यान उस भीड़ के कारण बार-बार भंग हो जा रहा था। तभी हरीष बाबू ने खंखारकर गला साफ किया और बोले, ‘‘सुन रहे हैं नेताजी, भीड़ का नारा ! खून का बदला, खून से लेंगे !’’

नेताजी का ध्यान बड़ी देर से उसी भीड़ पर केन्द्रित था। फर्क सिर्फ यह था कि उनकी सोच हरीष बाबू की सोच से कहीं आगे थी। वे कुछ सोचते हुए बोले, ‘‘आप ठीक कह रहे हैं। हम भी इसी के बारे में सोच रहे हैं। सिक्खों को उनके किये की सजा मिलनी ही चाहिए।’’

रमण बाबू ने टी.वी. पर नज़रें टिकाए-टिकाए ही, नेताजी की बात की गहराई समझे बिना, हामी भरी, ‘‘गोलियाँ चलाने वाले हत्यारे पकड़ लिए गए हैं। उन्हें सजा जरुर मिलेगी।’’

‘‘गोलियाँ चलाने वाले ?’’ हरीष बाबू ने चौकते हुए कहा, ‘‘हम सिक्खों की बात कर रहे हैं और आप कहाँ खोये हैं ?’’

अब चौंकने की बारी रमण बाबू की थी, ‘‘क्यों आप सारे सिक्खों की बात क्यों कर रहे हैं?’’

‘‘क्यों कि सिक्खों ने इंदिरा गाँधी को मारा है।’’ गोपाल चौधरी बोल पड़े।

‘‘सिक्खों ने नहीं हत्यारों ने मारा है और हत्यारों का कोई धर्म-ईमान नहीं होता.....’’ रमण बाबू ने प्रतिवाद किया।

‘‘देख नहीं रहे टी.वी. पर सारा देश चीख रहा है। सिक्खों से खून का बदला लिया जाएगा।’’ हरीष बाबू ने उनकी बात काटते हुए कहा।

‘‘हरीष बाबू टी.वी. पर सारा देश नहीं आ सकता। ध्यान से देखिये वह भीड़ का एक छोटा-सा टुकड़ा है, जो बार-बार दिखलाया जा रहा है। ज़रा गौर कीजिए तो उनके चीखने का ढंग बिल्कुल चुनाव के दिनों में वोट माँगने वाली पार्टियों के जैसा लगेगा।’’ रमण शंडिल्य ने कहा।

‘‘अरे सुखना पानी ला।’’ नेताजी ने पान की पीक एक तरफ थूकते हुए कहा।

भीतर से पकौड़ियों की खुशबु बाहर आने लगी थी। इसलिए नेताजी उनके बाहर आने से पहले ही पान फेंकने के बाद कुल्ला आदि कर, खाने को तैयार हो जाना चाहते थे। नेताजी पकौड़ियाँ खाने के मामले में भी दूरदृष्टि रखते थे। सुखना पानी ले आया था। वैसे तो उसका असली नाम सुखानन्द था। जब नेताजी उसे दस साल की छोटी-सी उम्र में गाँव से लेकर आये थे, तभी से उसके नाम में संशोधन होना शुरु हो गया जो जवान होते-होते सुखना पर आ कर अटक गया था। अब शायद ही किसी को उसका असली नाम पता हो।

‘‘इसीलिए तो हमने आपको अपना पार्टी सेक्रेटरी बना रखा है। चीज़ों को जिस तीखी नज़र से आप पकड़ते हैं, भई वाह! दिल खुश हो जाता है।’’ कुल्ला आदि से निवृत्त होकर अपने आसान पर जमते हुए नेताजी बोले।

उन्हें अपनी बात का समर्थन करते देख रमण बाबू का हौसला बढ़ा। वे बोले, ‘‘हरीष बाबू, कुछ हत्यारों के लिए आप पूरे सम्प्रदाय को दोषी नहीं बना सकते।’’

‘‘आप अपने मन से हिसाब मत लगाइये रमण बाबू !’’ गोपाल चौधरी पुनः हस्तक्षेप करते हुए बोले, ‘‘एक तरफ आप अकेले हैं, दूसरी तरफ देश का टी.वी. है। आपकी बात कैसे मानें ? हम तो टी.वी. की बात ही मानेंगे न !’’

‘‘लेकिन चौधरी बाबू.....’’ रमण षांडिल्य ने कुछ बोलना चाहा।

‘‘गइल भैंस पानी में।’’ नेता जी ने एक पकौड़ा मुँह में घुसेड़ते हुए कहा, ‘‘बस इसी लेकिन पर आकर आप मार खा जाते हैं। अरे रमण बाबू, जब पूरे पूरे देश की सिम्पैथी उमड़ रही है तो केवल यह सोचिये कि उस सिम्पैथी को कैश कैसे किया जाए ? यही पॉलिटिक्स है। ’’ नेता जी की मुस्कान कुटिल हो गई थी।

‘‘आप जानते हैं इसका परिणाम क्या होगा?’’ अब तक रमण बाबू उन लोगों की बातों का मर्म समझ चुके थे। वे चिन्तित नज़र आने लगे।

‘‘आप भी क्या बच्चों जैसी बातें कर रहे हैं, हम ही नहीं जानेंगे ? उसी परिणाम को तो पाने का जुगाड़ बैठाना है।’’ नेताजी बदस्तूर मुस्कराये जा रहे थे, ‘‘लगता है आपने दिल्ली में हमारे नेताजी का कथन नहीं सुना कि जब एक बड़ा पेड़ गिरता है तो आस-पास की धरती काँपती ही है। बड़ी आसानी से इस वाक्य से समझा जा सकता है कि केन्द्रीय नेतृत्व हमसे क्या चाहता है ? एक बात और समझ लीजिए अगली बार चुनाव में पार्टी टिकट उसे ही मिलेगा, जो केन्द्रीय नेतृत्व की इस कसौटी पर खरा उतरेगा। अगर पार्टी का टिकट चाहिए तब कुछ उपाय तो करना ही पड़ेगा न !’’

नेताजी की बातों से रमण बाबू को धक्का लगा। उन्होंने सोचा था कि हरीष बाबू और गोपाल बाबू की बातों के खिलाफ नेताजी उनकी बातों का समर्थन करेंगे। मगर यहाँ तो कुछ और ही निकला। अब सारी स्थिति उनके सामने स्पष्ट गई थी। वे चिन्तित स्वर में बोले, ‘‘चाहे उस परिणाम की प्राप्ति के लिए हिन्दू-सिक्ख का बंटवारा ही करना पड़े ?’’

‘‘बिल्कुल !’’ नेताजी छूटते ही बोले, ‘‘रमण बाबू, हमारी राजनीति में मुख्य बात सत्ता होती है। सत्ता के आगे हिन्दू, मुस्लिम, सिक्ख या ईसाई इन सबकी कोई अहमियत नहीं होती। इतनी छोटी-सी बात भी आप नहीं समझते। ज़रा ठण्ढे दिमाग से सोचिए, हमने कोई आश्रम नहीं खोल रखा। हम यहाँ राजनीति करने बैठे हैं। हमारा केन्द्रीय नेतृत्व जो चाहता है, उसी बात का प्रचार टी.वी. पर भी हो रहा है। हम अपने केन्द्रीय नेतृत्व की इच्छा ज़रुर पूरी करेंगे। ...खून का बदला खून से जरुर लिया जाएगा।’’ बोलते-बोलते नेताजी का स्वर किसी भेड़िये की गुर्राहट में बदल गया प्रतीत हो रहा था।

रमण बाबू ठगे से देखते रह गये। आवाज़ के साथ-साथ उन्हें नेताजी का चेहरा भी धीरे-धीरे भेड़िये की शक्ल में बदलता महसूस हो रहा था- खूँखार, खूनी भेड़िया जिसे खून चाहिए सिर्फ खून ...एक विशेष सम्प्रदाय का खून...सिक्खों का खून। नेताजी की बातें सुन कर तन्मयता से पकौड़े उठा-उठा कर खाते हरीष बाबू और गोपाल चौधरी के चेहरों पर सुखद भाव उभर आये। नेताजी की बातें सुन कर मानों उन्हें मुँह मांगी मुराद मिल गई थी।

उस वक्त हरीष बाबू का ध्यान हरनाम सिंह की तरफ लगा हुआ था, जिन्होंने अमृतसर से यहाँ आकर अब तक काफी दौलत कमा ली थी। जबकि उनके हमउम्र होने के बावजूद हरीष बाबू उनसे आधी दौलत भी नहीं कमा सके थे। हरनाम सिंह की दौलत और उनके बेटे की अच्छी-खासी चलती दुकान ...सब कुछ ...अचानक ही हरीष बाबू की आँखों में चुभने लगा था।

यह बात और है हरनाम सिंह की समृद्धि के पीछे उनकी वर्षों की मेहनत थी। उन्होंने अपने खाली समय का उपयोग भी कड़ी मेहनत करने में किया था। दूसरी तरफ हरीष बाबू का सारा समय नेताजी की चमचागिरी में ही कटा था।

जिस प्रकार नेताजी केन्द्रीय नेतृत्व की आँखों में आना चाह रहे थे, उसी प्रकार हरीष बाबू नेताजी की नज़रों में उनका दाहिना हाथ बन कर मजबूती से उभरना चाहते थे।

वहां पर हुई बहस के बाद रमण शंडिल्य उन लोगों की मंशा जान चुके थे। वह मंशा बिल्कुल गलत थी। वे चाहते थे कि उन्हें रोकें, लेकिन ऐसा करना उन्हें असंभव प्रतीत हो रहा था। उन सबकी बातों से उन्हें अपना दम घुटता-सा महसूस हुआ। वे अब वहां से हट जाना चाहते थे।

‘‘नेताजी, अब मुझे आज्ञा दीजिए। आफिस का काम पेंडिंग पड़ा हुआ है। अच्छा, नमस्कार !’’ कह कर वे उठ खड़े हुए। उनकी उड़ती-सी दृष्टि टी.वी. पर पड़ी। कैमरा फिर से उसी भीड़ पर टिका हुआ था। जो भीड़ चीखे जा रही थी-

‘‘खून का बदला खून से लेंगे।’’

***

कैमरा फिर से उसी भीड़ पर टिका हुआ था। जो भीड़ चीखे जा रही थी-

‘‘खून का बदला खून से लेंगे।’’

रमण बाबू का मुँह कसैला हो गया। वे झटके से बाहर निकल गए। हरीष बाबू, गोपाल चौधरी आदि ने राहत की साँस ली, जैसे कि एक अवाँछनीय व्यक्ति वहाँ से टल गया हो।

‘‘अच्छा हुआ रमण बाबू चले गये, वर्ना मेरी योजनाएँ सुनकर वे यहीं बेहोश हो जाते।’’ नेताजी ने हो... हो... हँसते हुए कहा।

उनकी हँसी में साथ देते, उपस्थित लोगों के कान खड़े हो गये, ‘क्या है नेताजी की योजनाएँ ?’

‘‘हरीष और गोपाल बाबू, मुझे आप लोगों से बड़ी उम्मीदें हैं।’’ नेताजी उनकी ओर मुखातिब हुए, ‘‘आपने तो केन्द्रीय नेता का निर्देष सुना ही होगा, पार्टी इकाई के हर अध्यक्ष को अपने कार्यक्षेत्र में ही रहना है। इस कारण मैं चाह कर भी दिल्ली नहीं जा सकता। यहाँ मुझे बड़े काम निपटाने हैं क्योंकि आगामी चुनावों में टिकट मिलना उन्हीं कामों पर निर्भर करेगा। मुझे पूरा विश्वास है, यहाँ से पार्टी का टिकट मुझे ही मिले इसके लिए आप दोनों कोई कोर-कसर नहीं उठा रखेंगे।’’

नेताजी ज़रा रुक कर अपने शब्दों का प्रभाव उन दोनों के चेहरों पर देखने लगे।

‘‘आप हुक्म करें नेताजी, आपके लिए हम कुछ भी कर गुजरेंगे।’’ हरीष बाबू और गोपाल चौधरी दोनों एक साथ बोल पड़े।

नेताजी ने ज़रा आगे को झुकते हुए अपने स्वर को रहस्यमय बनाते हुए कहा, ‘‘वर्तमान परिस्थितियों में तो एक ही काम करने को है। सिक्खों के खिलाफ बह रही भावनाओं को जम कर भड़काइए। तब एक ही तीर से दो शिकार होंगे। उन्हें लूट कर तात्कालिक लाभ तो अभी कमाइए और सहानुभूति का लाभ आगामी चुनावों में।’’ नेताजी की कुटिल मुस्कान और भी गहरी हो गई थी।

थोड़ी देर के सन्नाटे के बाद हरीष बाबू ने अपनी शंका प्रकट की, ‘‘बात तो आपकी सोलह आने ठीक है। मगर थाना-पुलिस का क्या होगा ?’’

‘‘अरे हरीष बाबू, पुलिस और प्रशासन उसी पार्टी का होता है जिस पार्टी का शासन होता है और केन्द्र में अभी हमारी पार्टी की ही सरकार है। थाना-पुलिस के लिए आप निश्चिंत रहिए।’’ नेताजी ने उनकी शंका का समाधान किया, ‘‘अगर हमारे होते आप लोगों का बाल भी बाँका हो गया तो फिर हमारी नेतागिरी कैसे चलेगी ? समझे कि नहीं ?’’

‘‘समझ गये नेताजी। सब समझ गए। अब आप बिल्कुल बेफिक्र रहिए। सब कुछ आपकी इच्छा के अनुसार ही होगा। अगले चुनाव में पार्टी टिकट आप ही को मिलेगा।’’ नेताजी वाली कुटिल मुस्कान अब हरीष बाबू और गोपाल चौधरी के चेहरों पर भी आकर ठहर गई थी।

***

कमल

Kamal8tata@gmail.com

***