मुख़बिर - 10

मुख़बिर

राजनारायण बोहरे

(10)

एक एक कौर

सौ, पचास, दस और पांच-पांच के नांटों की अलग-अलग गड्डी बनाके मैंने और लल्ला ने रूपये गिनना शुरू कर दिया । जब तक सब्जी बनी, तब तक नोट गिने जा चुके थे । मैं बोला-‘‘ मुखिया, जे नोट तो पन्द्रह हजार चार सौ अस्सी है, माने साड़े पन्द्रह हजार रूपया ।‘‘

‘‘मुखिया पुरी काहे में काड़ेंगे ?‘‘ रसोई बनाने का काम संभाल रहे लम्बे से ठाकुर ने सहसा उपस्थित होकर विनम्र और मीठी सी आवाज में पूछा तो जाने क्यो कृपाराम तिलिमिला उठा ।

‘‘मादरचो…, हिना का कडा़ई दीख रही है तो खों । जा अपनी मइयो की …. में काढ़ ले ! जा भगोनी नाय दीख रही तोखेां ?‘‘

कृपाराम आज की लूट की राशि से संतुष्ट नजर आया, जबकि श्यामबाबू नाराज दिख रहा था । वह बोला-‘‘ दादा तिहारी मुखिया गिरी में सबसे बड़ो झंझट एकही है कि तुम लुगाइयों को उनकी मरजी पे छोड़ देतु हों ! आज हम खुद लुगाइयन से जेवर उतरवा लेते तो बीस तोला सोना मिल जातो कम से कम । लुगाइयें चांदी तो बिलकुल छिपाय गयीं, वे इतनी चांदी पहने हतीं कि कम से कम पांच सेर चांदी मिल जाती !‘‘

कृपाराम हंसा -‘‘ तैं बड़ों लालची है श्याम बाबू ! अरे पगला जे पकड़ तो देख ! जे है असली माल । बीस लाख से ऊपर की गांरटी है ।‘‘

कृपाराम की यह बात पूरी होते ही सारे के सारे बागी हमे देखकर खौफनाक ढंग से हंस पड़े थे । जबकि हम छहों अपहृत व्यक्ति भीतर ही भीतर कांप उठे थे-बागियों की नजर में हममें से हरेक की कीमत साड़े तीऩ लाख है !‘‘

सबसे पहले उन दोनों ठाकुरों को हर चीज मिला कर एक एक कौर दिया गया, जो खाना बना रहे थे, फिर मुझे और लल्ला पंडित को दिया गया । हम चारों ने ही तो मिल के खाना बनाया था न, सो हमको चखा के खाने की जांच जरूरी थी । आखिर में डकैतो ने भकोसना शुरू किया तो जिजमानी में पन्द्रह पूड़ी खाकर वीर बनने वाले लल्ला पंडित ने दांतो तले अंगुली दबा ली । बागी तो दानवों की तरह चबर-चबर करके पूड़ी पर पूड़ी निगलते जा रहे थे । हमने अंदाज लगाया - एक-एक बागी ने पच्चीस-पच्चीस पूड़ी तो जरूर सटकाई होंगी ।

जब हम सब खाना खा रहे थे, कृपाराम हम सबको लज्जित करता सुना रहा था-‘‘ रोज- रोज ऐसी पंगत नही होने वाली हरामियो ! हो सकता है कई दिन तो सिर्फ पानी के सहारे काटना पड़ें । बागियों की जिन्दगी में ऐसे दिन हमेशा नहीं आने वाले, यहां तुम सबका बाप नहीं बैठा हम सबको रोज खाना देने वाला ।

हम सबको बड़ा बुरा लगा और इसके बाद हमे हर कौर में से कृपाराम के शरीर में से आने वाली असहय बदबू आती महसूस हुई । मन मार के हम ने आधा-अधूरा खाना खाया, वैसे भी खाना केवल इतना-सा ही बचा था कि हम आधा पेट ही खा सकते थे ।

मैं सोच रहा था कि क्या सचमुच ऐसे दिन भी आयेंगे कि हमको दिन-दिन भर खाना न मिले ! .... अब तक जैसी बीती है, उससे तो यही अंदाज लग रहा था कि कृपाराम सही बोल रहा है । यहां आते वक्त.का दृष्य याद आया मुझे........सारे बागी रास्ते में हर आहट पर घबरा जाते और जमीन में लेट जाते थे और फिर चारों ओर देखते डरते-कांपते चल पड़ते थे । ऊपर से जालिम दीखते ये लोग भीतर से कितने डरपोक हैं, यह जान कर मुझे अजीब लगा था तब।

मैंने रघुवंशी को अपना कौतूहल बताया तो उसने मेरा समर्थन ही किया-‘‘ वे साले हर वक्त अपनी मौत को लेकर डरते रहते हैं, हर आदमी पर अविश्वास करते हैं, और इसी डर से बैचेन होकर हर पल और हमेशा वे पागल कुत्ते की तरह बदहवास होकर भागते रहते है-यहां से वहां । ऐसी खुशियाली भरी नहीं है उनकी जिन्दगी ! वे तो खुद अपनी उस मौत से बचते भागते रहते हैं, जो पता नहीं कितने रूपों में उनके पीछे-पीछे दौड़ती रहती है ।‘‘

खाने के बर्तन हम सबने ही धोये ।

उसी खुले मैंदान में हम सबके सोने की तैयारी हुयी । अगल-बगल के कोने में दो बागी सोये, फिर बीच में खिरक वाले मारवाड़ी और एक ही जंजीर से बंधे हम सब अपहृत व्यक्ति लेटे ।

बागी तो कुछ ही देर में चरखा की तरह घरर-घरर के स्वर में अपनी नाक बजाने लगे, लेकिन हम अपहृत लोगों की आंखों में भला नीद कहां से आती ! हरेक की आंखों के आगें अपने घर में व्याप्त शोक का आलम दीख रहा था ।

मुझे सूझ नहीं रहा था कि मेरे घर वालों को मेरी पकड़ का कैसे पता लगा होगा ? सोचता हूं शायद पुलिस ने खबर भेजी होगी, या फिर यह भी हो सकता है कि कहीं सुन कर गांव वाले किसी आदमी ने आकर मेरे घर बताया हो ।

यह भी हो सकता है कि अब तक खबर ही न मिली हो । आज बस में सवार यात्रियों में से ऐसा कोई भी तो नहीं दिख रहा था, जो मुझसे से परिचित होता और मेरे घर खबर भेजता । मेरे पिता साठ साल के हैं, बचपन से ही संघर्ष किया है उनने, और वे जमाना देख चुके है। इसलिए विपत्ति की इस घड़ी में इस वक्त घर में शायद वे ही मेरी मां, युवा बहन मुन्नी और पत्नी विशाखा को धैर्य बंधा रहे होंगे । बड़े भाई शिवराज तो अपनी नौकरी वाली जगह जिला मुकाम पर होंगे, और जब खबर मिलेगी, तब घर आयेंगे ।

मेरी बड़ी बेटी बारह साल की है, और बेटा आठ साल का । मेरा बेटा सारा समय अपने बब्बा के साथ गुजारता है और उनके मुंह लग गया है । सो दोनों बच्चों को शायद पिता की याद नहीं आ रही होगी, पर पत्नी विशाखा को जरूर गहरा सदमा लगा होगा । आज तो घर में चूल्हा भी नहीं जला होगा । पढ़ौस में से किसी ने ही शायद बच्चों को कुछ खिला-पिला दिया होगा । घर के बाकी सब लोग दिन भर से भूखे होंगे । पुलिस पता नहीं कैसे कैसे सवाल पूछ रही होगी, उन सबसे !

कितनी सारी आशंकायें हो रही होंगी हरेक के मन में। और वे आशंकायें गलत कहां है ? हमको भी तो लगता है कि पता नहीं कल क्या होगा ?परसों क्या ? और आगे क्या होगा ! बागियों का कोई भरोसा थोड़ी है, पता नहीं किससे रिसा जायें औेर क्या दण्ड दे बैठें ।

चूल्हा तो शायद लल्ला पंडित, के यहां भी न जला होगा । उनके घर तो मां-बाप भी नहीं है, उनके भाई दूर राजस्थान में पडिताई करते है । घर पर अकेली पत्नी होगी, और वो बिचारी इस आपदा से स्तब्ध हो कर आपा खो बैठी होगी, क्योंकि हद दरजे की सीधी है वह, निरक्षर तो है ही बेचारी ।

उस दिन की याद में डूबे चुप लेटे देख कर रघुवंशी को मेरी कथा का आज का अध्याय पूरा होता अनुभव हो गया था शायद, इसलिये वह बोला-‘‘अब सो जाओ भैया, कल सुनाना आगे का किस्सा !‘‘

यह सुन मुझको राहत सी महसूस हुई, मुझे लगता था कि बड़े दरोगा को किस्से-कहानी सुनाना मेरी डयूटी है, किसी दिन यदि मैने इन्कार कर दिया तो जरूर ही दूसरों की तरह गालियां सुनने मिलेंगी मुझे भी। इच्छा हुई कि एक दिन इनसे कहूं-आप भी तो कोई किस्सा सुना दो साहब ! फिर देखो क्या-क्या सुनाते है। हालांकि उनके पास भी ढेर सारे किस्से होंगे सुनाने को । अब इतने दिन की नौकरी है तो जाने कितनी तरह के मामले आये होंगे, कैसे-कैसे प्रकरण निपटाना पड़ा होगा इन्हे । कितनी तरह के लोग मिले होंगे इन्हे । हरेक का अपना एक अलग किस्सा होगा । वैसे किस्सा सुनाना हरेक को आता भी कहां है ?

मैंने एक नजर अपने आस-पास के पुलिस सिपाहियों पर डाली तो अनुभव किया कि वे सब अपनी नजरों में बड़ा तंज लिये मुझे घूर रहे है।

मैं समझ नहीं पाता था कि पुलिस-महकमे का जितना छोटा कर्मचारी होता है, उतना बदतमीज क्यों होता है ?

बदतमीज तो होता है, सिविलियन के लिए, अपराधियों के लिये उतना ही डरपोक भी होता है पुलिस का छोटा कर्मचारी । मुझे पता है, आज भी हर थाने में हजारों ऐसे वारंट रखे है जिनमें बांछित अपराधी खुले आम थाने की नाक के नीचे घूमते रहते हैं और सिापाही उन्हे फरार बताते रहते है। मजे की बात तो ये भी है कि तमाम ऐसे जनप्रतिनिधियों के नाम वारंट जारी हैं, जो पहले गुण्डागर्दी करते थे और आज अपना मवालीपन छोड़कर नेता बन गये है, लेकिन वे सब भी पुलिस रिकॉर्ड में फरार कह दिये गये है।

कौन नहीं जानता कि हर पुलिस वाला आज थाने के बजाय विजिलेंस और आरटीओ विभाग में प्रतिनियुक्ति पर जाना चाहता है । विजिलेंस में सारे विभागों पर रूतबा तो रहता ही है, जब भी आफॅत का मारा कोई फंसता है, कर्मचारी ही होता है, जो न ऐठता है, न अकड़ता है । राजनीति और अखबारबाजी तो बेचारे कर्मचारी करेंगे कहां से । वहां तो जो फंस जाये अपनी मुक्ति चाहता है, इस मुक्ति के बदले में कौन क्या ले ले, इसका कोई अंदाज नहीं । .....और फिर कोई दे नहीं तो संपत्ति खोजने के नाम पर आप जो चाहें उसके साथ बर्ताव कर डालें, बाल उखाड़ लें, घंटने तोड़ दें, पसलियां चटका दें और आखिर में हिरासत में से भागने के नाम पर सीधा मर ही काहे न डा लें ।...कौन नही जानता कि भोपाल के एक प्रकरण में किन्ही जैन साहब को ऐसे ही तो यातनायें दे कर मार डाला विजिलेंस वालों ने ।

रहा सवाल आर टी ओ वालों का सो उनके यहां तो पौ बारह है सबकी।

कैसा ही वाहन काहे न हो, आपको एक बार तो आरटीओ के चक्कर में में फंसना ही पड़ेगा, और जो एक बार वहां फंस गया उसका राम ही रखवाला है । वहां समय, पैसा और सम्मान के लिए कोई कजगह नहीं है। सुना है कि आरंभ में पुलिस वाले ही जाया करते थे वहां, और आज भी पुलिस का ही एक हिस्सा है आर टी ओ । अंजान जगह बने नाकों और बीच रास्ते पर खड़ी उड़नदस्ता की जीपों के पास पिटते-बिलखते दूर जगह के ड्रायवर बिना कहे बहुत कुछ कह देते हैं पुलिस वालों के बारे में ।

एक कर्मचारी होने के कारण मुझे पता है कि सरकार के सारे विभागों के नियम बदल गये लेकिन पुलिस विभाग के नियम अंग्रेजों के जमाने के है जो तब से आज भी चले आ रहे है ।

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