Trishana in Hindi Fiction Stories by neelu sinha books and stories PDF | Trishana

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Trishana

बस यही उलझने हैं मेरी। तुम बताओ मैं कहाँ गलत हूँ। कहाँ मेरे चरित्र में खोट है। सिर्फ इसलिए कि मैं खुश रहना चाहती हूँ मैं क्यों दुनिया के तानों का शिकार बनुँ।

मेरा मन यह सब स्वीकार करने को अब तैयार नहीं। आदमी के लिए तो यह सब बन्धन नहीं होते। चरित्रवान न होते हुए भी आराम से जीवन व्यतीत करता है। शादीशुदा होते हुए भी पर स्त्री को ध्यान में रखता है तो भी उस पर कोई उँगली नहीं उठाता। बीवी स्वर्ग सिधार गए तो साल भी निकलने नहीं देता और दूसरा ब्याह कर लेता है। तब भी वह चरित्रवान ही रहता है। सारे धर्म कर्म और सीमाएँ सिर्फ स्त्री ही क्यों स्वीकारे? मेरा अच्छा पहनना ओढ़ना या अपने जीवन के नियम खुद तय करना मेरे चरित्र के मुल्यांकन का आधार है तो मुझे अब यह सब मान्य नहीं है। मैं अपनी एक पहचान चाहती हूँ। कभी इस रिश्ते तो कभी उस रिश्ते के दया भाव पर जीवन नहीं गुजारना चाहती। पहले माता-पिता के अधीन थी तो सदा सुनती थी कि शादी के बाद अपनी स्वतन्त्रता का उपयोग करना। पति के अधीन हुई तो उन्होंने अपने तरीके से मेरे जीने के मानक तय किये। कल बच्चे बड़े होंगे तो उनकी और उनकी बीवियों की अधीनता स्वीकारूँ। और आज जब मैं किसे के अधीन नहीं हूँ तो सामाज की अधीनता स्वीकारूँ। आखिर क्यों?

अब तो तुमसे मेरे जीवन का कोई पहलू नहीं छिपा। यदि तुम एक संवेदनशील हृदय रखती हो तो मुझे जरूर बताना कि क्या मेरे यह सवाल गलत है? क्या मेरे जीने की राह गलत है? या फिर मेरा नजरिया गलत है?

लत्तिका दीदी की बाते सुनते-सुनते काफी समय हो गया था। अंधेरा होने से पहले मुझे घर लौटना था। हम दोनों ही शांत थे लेकिन शायद दोनों ही के दिल और दिमाग में उथल पुथल थी। मैंने दीदी से कहा:– लत्तिका दीदी आप कहीं गल्त नहीं है लेकिन हमारे पुरुष प्रधान समाज की रीत ही ऐसी है कि औरत हमेशा दबती आई है। जो हिम्मत करके अपनी बात रखने में सफल हुई उसे भी बहुत संघर्ष करने पड़े फिर भी देर सबेर उसने अपनी मंजिल पा ली। बाकी की जिन्दगी तो कब शुरू होती है और कब खत्म हो जाती है उसे भी नहीं पता चलता।

लेकिन दीदी आपके विचार मुझे कहीं गल्त नहीं लगते। थोड़ी दूर तक फिर चुपचाप चलने के बाद हमने आटो पकड़ा और दीदी को छोड़ते हुए मैं अपने घर चली गई।

माँ मेरी राह ही देख रही थी। माँ की चिन्ता देखकर लग रहा था कि मुझे काफी देर हो चुकी थी। ऑफिस वाले दिन तो देर हो ही जाती थी लेकिन छुट्टि वाले दिन मैं ज्यादा कहीं नहीं जाती थी वैसे तो मैं बताकर ही गयी थी लेकिन शायद लत्तिका दीदी से ज्यादा मिलना अब माँ को पसन्द नहीं आ रहा था। पिताजी घर पर ही थे।

‘‘माँ सब ठीक है’’ इतना कहकर मैं चुपचाप खाना खाने लगी। इससे ज्यादा अभी कुछ भी कहने का मेरा मन नहीं था। मेरे कानों में अब भी लत्तिका दीदी के शब्द गूंज रहे थे। न चाहकर भी मन उदास था।