Phit Milenge in Hindi Love Stories by Tarika Singh books and stories PDF | फिर मिलेंगे

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फिर मिलेंगे


दिल की कभी मत सुनना, दिल बड़ा बेईमान होता है ।आप लाख समझाएं उसे मगर एक बार यह किसी पर आ जाए तो उसे पाने को मचलता ही रहता है । यह जानते हुए भी कि जो दिल में आकर चुपके से बैठ गया है ,वह अजनबी है और उसे तो शायद इस बात की खबर ही नहीं कि उसकी खुशबू से किसी का दिल हर-पल महक रहा है।
कहते हैं ना कि पहली नजर का प्रेम बस शारीरिक आकर्षण ही होता है , मगर मेरा मन इसे झुठलाना चाहता था । वह तो उस अजनबी के साथ वहां तक जाना चाहता था जहां तक सावन की हवा के झोंके जाया करते हैअपनी ताजगी लिए हुए ....
कॉलेज का अंतिम वर्ष था और अब सभी सहपाठियों के बिछड़ने का समय भी। लेकिन दूर जाने से पहले एक बार हम साथ-साथ ट्रिप पर जाना चाहते थे । तय हुआ कि सप्ताहांत मे हमलोग उदयपुर जाएंगे । नियत समय पर सभी स्टेशन पर आ गए । रात करीब 11:00 बजे ट्रेन नई दिल्ली स्टेशन से उदयपुर के लिए चल पड़ी। दोस्तों ने खूब सारी बातें कर , धमाचौकड़ी मचाकर और गाने गाकर समा बांध रखा था।
अगले दिन सवेरे उदयपुर स्टेशन पर उतरकर पूर्व आरक्षित होटल में चले गए। नहा धोकर ,फ्रेश होकर सभी घूमने निकलना चाहते थे । चारों तरफ पहाड़ियों से घिरे होटल से उदयपुर की छटा देखने लायक थी। बाकी कुछ दोस्त तैयार होने में लगे थे कि मैं बाहर उस जगह की खूबसूरती को निहारने निकली । वहीं मेरी मुलाकात अनिरुद्ध से हुई जो एक सेमिनार में भाग लेने उदयपुर आए थे और सेमिनार के आयोजकों द्वारा उसी होटल में ठहराया गए थे। पहली मुलाकात में कुछ औपचारिक बातें हुई और उदयपुर के मुख्य दर्शनीय स्थल के बारे में थोड़ी चर्चा भी। यहां वहां की बातें करके हम अपनी अपनी राह चल दिए।
दिनभर तमाम जगहों को घूमने के बाद शाम सिटी पैलेस के प्रांगण में राजस्थानी कालबेलिया नृत्य का शो देखने पहुंचे जहां अनिरुद्ध आगे की पंक्ति में बैठे दिखे। हाथ हिलाकर पास आने का इशारा किया ।अब तक वे हमारे दोस्तों से भी घुल मिल चुके थे। अनिरुद्ध नृत्य संबंधी जानकारी देते जा रहे थे ।शो खत्म होने पर उन्होंने साथ वापस लौटने की पेशकश की और कब हम बातें करते होटल तक पहुंच गए पता ही नहीं चला। ना जाने क्यों अनिरुद्ध की बातें अच्छी लग रही थी। अगले 5 दिनों तक लगातार विभिन्न जगहों पर मिलते रहे।
आखिरकार वापसी का दिन भी आ ही गया और हमने भारी मन से एक दूसरे से विदा ली। विदा लेते हुए अनिरुद्ध की आंखों मे आंखें डालकर मैंने पूछा कि " फिर कब मिलेंगे"?
अनिरुद्ध ने भी हंसते हुए जवाब दिया कि" फिर मिलेंगे "।
इन 5 दिनों में मुझे इतना तो एहसास हो गया कि अनिरुद्ध से मुझे प्यार हो गया है । मगर अपने दिल की बात कहती भी तो किससे? घर लौट कर मन बुझा सा रहा। अनिरुद्ध का प्यार उस फूल की खुशबू की तरह मेरे मन को सुगंधित और सम्मोहित कर रहा था जिसका कि उसे खुद भी एहसास नहीं था । यह प्यार सिर्फ मेरी तरफ से था यानी कि एकतरफा।
समय भला किसी के लिए रुका है ? दिन, महीने ,साल गुजरते चले गए ।आखिरकार वह दिन भी आ गया जब मेरी शादी की बातें होने लगीं । अनिरुद्ध का कहीं कोई अता पता नहीं था । धीरे-धीरे मैंने भी दिल को समझाना शुरू कर दिया और उसकी यादों की गठरी बांध कर दिल के किसी कोने में डाल दी।
वह कार्तिक का महीना था ,शादियों के मौसम का । वैसे तो यह महीना बड़ा मनभावन होता है। दिन अलसाया हुआ और रातें हरसिंगार के फूलों की तरह रोमानी होती है। अनिरुद्ध की याद एक कसक की तरह दिल में छुपी हुई रह गई थी । "अगर मेरी तरह उसे भी प्यार हुआ होता तो मुझसे संपर्क करने की कोशिश करते" ।उन दिनो मोबाइल सबके लिये सुलभ नही था। यह नब्बे के दशक का आखिरी महीना था, लोग मिलेनियम इयर मनाने की तैयारी में लगे थे और मेरा मन बिलकुल एकाकी। खुशी और दुख का जैसे कोई अहसास ही नही होता था। उप्फ ,सारी जिंदगी अब अफसोस सा ही रह जाएगा। "
इस बीच घर में दूर के चाचा के आकस्मिक निधन से शादी की शेष रस्म को संक्षिप्त कर दिया गया। कुछ एक रस्मो रिवाज के साथ शादी भी संपन्न हो गई। अनमने मन से घूंघट काढ भारी मन से ससुराल आ गई। सासू मां ने स्वागत के बाद मुझे मेरे कमरे में पहुंचा दिया । दिल की धड़कन और मन की स्थिति सामान्य नहीं थी। अचानक किसी जानी पहचानी सी आवाज को सुनकर जैसे तंद्रा भंग हुई हो
"क्या अब भी नहीं देखोगी मुझे ? आखिर तुम्हें पाने के लिए मैंने कितने पापड़ बेले "
"अरे आप " मेरे मुंह से बस इतना ही निकला।
" हां, ...वापसी वाले दिन ही मैंने तुम्हारी एक दोस्त से तुम्हारे घर का पता लिया था। फिर दो साल तक सारी जानकारी इकट्ठी करके अपने घरवालों को तुम्हारा हाथ मांगने भेजा। इस बीच जितनी भी रुकावटें आईं, उनको संभाला। तब जाकर तुम मिली हो मुझे "।
मुझे याद आया, माँ ने बताया था कि लडकेवालों की विशेष आग्रह है कि लड़की बस तीन कपड़ों के साथ ही विदा हो। एक मध्यवर्गीय परिवार के लिये शायद यही वह महत्वपूर्ण बात थी जिससे कि बात पक्की होने में ज्यादा अड़चने नहीं आईं।
मेरी आंखों से लगातार आंसू बहते जा रहे थे। आंसुओं को पोंछते हुए अनिरुद्ध ने इतना कहा कि जब तुमने उसदिन पूछा था ना कि "फिर कब मिलेंगे "? तभी मैंने कहा था कि "फिर मिलेंगे "। यह मेरा वादा था, आखिर मैं कैसे न निभाता "।
"हे ईश्वर, यह इकतरफा प्यार नहीं था".....
मेरे दोनों हाथ ईश्वर को धन्यवाद देने को जुड़ गए ।
तारिका सिंह 'तरु', लखनऊ, उत्तर प्रदेश।