दूसरा इंतज़ार(अंतिम भाग) in Hindi Love Stories by किशनलाल शर्मा books and stories Free | दूसरा इंतज़ार(अंतिम भाग)

दूसरा इंतज़ार(अंतिम भाग)

अगर उसके पिता की अचानक तबियत खराब न होती,तो शायद वह मुम्बई से न लौटता।उसने पिता का बहुत इलाज कराया।लेकिन बचाया नही जा सका।वह वापस नही लौट सका उसे अपने पिता के धंधे को सम्हालना पड़ा।
"तुम दोनों बैठकर बाते करो।मै अभी आयी।"मौसी की आवाज सुनकर वह अतीत से वर्तमान में लौट आया था।
"मौसी बता रही थी।तुम्हारी शादी हो गई।"माया ने दामोदर से पूछा था।
"तीन महीने हो गए"।
"गुपचुप शादी कर ली।मुझे खबर भी नही की।भूल गए मुझे।क्यो बुलाते?मै लगती कौन हू, तुम्हारी।बुलाया उसे जाता है,जिससे कोई सम्बन्ध हो",माया, दामोदर को उल्हाना देते हुए बोली,"शायद अपशकुन के डर से नही बुलाया होगा।मुझ अभागिन के आ जाने से शायद कोई अनिष्ठ हो जाता।"
"अगर तुम्हें मनहूस मानता, तो तुमसे शादी का प्रस्ताव ही क्यो रखता।मैंने तुम्हारा बहुत इंतज़ार किया,लेकिन तुम दूसरी शादी का निर्णय नही कर पाई।अब मुझे दोष दे रही हो।"दामोदर,माया की बेस्ट सुनकर बोला।
"मेरे कहने का यह मतलब नही है।मै सिर्फ शादी मे न बुलाने की बात कर रही हूँ।"
चन्दरकान्ता चाय ले आयी थी।
"दिनेश का पता चला?"दामोदर ,माया के बारे में जानने के लिए उत्सुक था।
"अब क्या पता चलेगा?"दामोदर की बात का जवाब चन्द्रकान्ता ने दिया था।
दिनेश का जिक्र आने पर माया गम्भीर हो गई।दामोदर काफी देर से उसके साथ था।लेकिन पहली बार उसका ध्यान माया के बदले रूप पर गया था।सुना सपाट चेहरा,सुनी मांग और उदास आंखे।दिनेश का जिक्र होने पर उसका चेहरा मुरझा गया।उसे देखकर ऐसा लग रहा था।मानो बहुत दुखी हो।
दामोदर ने कई वर्ष पहले माया को सुहागिन के वेश में देखा था।आज वह उसे विधवा के रूप में देख रहा था।क्या उसे दिनेश के न लौटने का विश्वास हो चुका है?उसे अपने सुहाग के उजड़ जाने का विश्वास हो गया है?क्या वह मन चुकी है कि वह अब सधवा नही विधवा है?क्या पति के जिंदा लौटने का जो सपना देख रही थी।वो टूट चुका है।इन प्रश्नों का उत्तर जानने के लिए उसने माया से पूछा था।
"माया बुरा न मानो तो तुमसे एक बात पुछू?"
"बुरा क्यों मानूंगी।पूछो क्या पूछना है।"
"क्या तुम्हें अब भी विश्वास है कि तुम्हारा पति लौट आएगा।"?
"अब मुझे भी यकीन सा हो गया है,दिनेश नही लौटेगा।"
"माया अभी तुम जवान हो।पहाड़ सी लम्बी जिंदगी तुमहारे सामने पड़ी है।जिंदगी के लंबे सफर के लिए साथी की ज़रूरत होती है।तुम भी साथी की तलाश कर लो।"दामोदर,माया को समझाते हुए बोला था।
"इसीलिए तो मैं तुम्हारे पास आयी थी।"उसने दिल की बात बता दी थी।
"माया तुमने आने में बहुत देर कर दी,"माया के आने का कारण पता चलने पर दामोदर बोला,"तुमने निर्णय लेने में बहुत देर कर दी।अगर तुमने जरा भी इशारा पहले कर दिया होता,तो मे स्वंय तुमहारे पास चला आता।"
"शायद ईश्वर को हमारा साथ मंज़ूर नहीं था।"माया आह भरते हुए बोली।
"माया, तुमने मुझे अपना बनाने का निर्णय लिया लेकिन ऐसा हो नही पाया।फिर भी मैं तुम्हे सलाह जरूर दूंगा।"
"क्या?"
"तुम शादी ज़रूर कर लेना।"
"पहले मुझे विश्वास था।जहां भी है।मेरा सुहाग सलामत है।और इसी विश्वास मे मैं उसके लौट आने का  इंतज़ार कर रही थी।लेकिन मेरा विश्वास अब टूट चुका है।"माया बोली,"अब मुझे  दिनेश का नही दूसरा इंतज़ार है।"
"दूसरा इंतज़ार।मैं समझा नही।"दामोदर को माया की बात का आशय समझ मे नही आया था।
"किसी उपयुक्त जीवन साथी का।पता नही मेरा इंतज़ार पूरा होगा या नही?"