सेंधा नमक - 1

सेंधा नमक

सुधा त्रिवेदी

(1)

यह पहला ही मौका था वन्या के लिए जब किसी इतने बडे कार्यक्रम में जाने का उसे मौका मिल रहा था । फिल्मी स्टार, नामी राजनयिक - सभी आनेवाले थे इसमें । आमंत्रण बहुत मशहूर समाजसेविका डॉ.राजबाला की ओर से मिला था। वन्या कार्यक्रम में जाने के लिए बडी उत्सुक थी। यह वही राजबाला जी थीं, जिन्हें वह अकसर टी.वी कार्यक्रमों की बहसों में देखती सुनती आई थी । स्त्री हितों के लिए लडनेवाली स्त्रियों में उनका नाम एक मिसाल के तौर पर पेश किया जाता था। आज उन्हीं के आमंत्रण को देखकर वह अति उत्साह में उछल पडी। कोई जाए न जाए, वह तो इस कार्यक्रम में जरूर जाएगी।

वन्या को इस नए शहर में आए कुछ ही दिन हुए थे और उसे रास्तों का बिल्कुल पता न था । मगर जाने की उतावली मे उसे यह बाधा कोई बडी बाधा नजर न आई। उसने झटपट जाकर अपने फलोर मैनेजर श्रुति को आमंत्रण पत्र दिखाया और जाने की स्वीकृति मांगी। आमंत्रण आया है, तो ऑफिस से किसी न किसी को तो जाना ही पडता। और कोई नहीं जाएगा तो निमंत्रण का मान रखने के लिए हारकर अंत में श्रुति को ही जाना पडता। क्योंकि बाकी स्टाफ ऐसे कार्यक्रमों में जाने से कतराते थे । उनके लिए यह सब सामाजिक कार्यों के लिए किए जानेवाले कार्यक्रम -जिनमें केवल भाषणबाजी हो, बोर काम थे। हां फिल्म स्टार आ रहे हों तो सब कूदकर जाने को तैयार हो जाते थे। ऐसे में वन्या का जाने के लिए उत्साह दिखाना श्रुति को वरदान ही लगा। वैसे भी श्रुति, वन्या के कामकाज, कौशल, उसकी कर्मनिष्ठा और ईमानदारी के कारण उससे काफी प्रभावित रहती थी । कुछ ही दिनों में दोनों में काफी घनिष्ठता भी हो गई थी।

श्रुति ने तुरंत ही हां कर दी और पूछा –“जाओगी कैसे ? क्या तुम्हें पता है कि यह रशियन कल्चर सेंटर कहां है ?”

वन्या ने ‘न’ में सिर हिलाया तो वह मुस्कुरा दी और घंटी बजाकर चपरासी सुरेश को बुलाकर टीम लीडर रजिल के पास जाकर पूछकर आने को कहा कि क्या वे भी आज की शाम के फंक्शन में रशियन कल्चर सेंटर जा रहे हैं ?

और फिर वन्या की तरफ मुखातिब होती हुई बोलीं – “मैं समझती हूं कि हमारे रजिल भी आज के उस समारोह में जाएंगे । हमारी कंपनी ही इस कार्यक्रम की प्रायोजक है और रजिल, डॉ.राजबाला के बहुत अच्छे मित्र भी हैं । अगर वे गए तो तुम उन्हीं के साथ चली जाना । मैं उन्हें बता देती हूं।”

वन्या को इस बात पर थोडी हिचक जरूर हुई । रजिल को वह अब तक दूर से ही देखती आई थी और उसके साथ उसकी सेल्फ ड्रिवेन कार में, बगल में बैठकर जाने में वन्या की पारंपरिक परवरिश आडे आ रही थी। मगर अनजान रास्तों में भटकने की बजाय उसने यह साहस करना ज्यादा बेहतर समझा। रजिल तीन बजे निकलेंगे, इतनी देर में वह घर जाकर रशियन कल्चर सेंटर नाम के अनुरूप तैयार होकर आ सकती है!

वन्या श्रुति से अनुमति लेकर झटपट घर गई और राजस्थानी पैच वर्क का लंबा लाहौरी कुर्ता और पलाजो पहनकर आ गई । कानों में उसी से मैच करती लंबी लटकनें और गले में भी राजस्थानी डिजाइन की तीन लडोंवाली मनकों की माला। वन्या हाई हील पहनकर अपने को ज्यादा ‘ग्रेसफुल’ महसूस करती थी,इसीलिए अभी उसने मुंबई वाली भाभी द्वारा खरीदकर दी गई उंची एडी की सैंडलें पहन लीं और स्माइल सेंट की लगभग आधी बोतल अपने उपर स्प्रे करती हुई वह पांडिचेरी लघु उद्योग की प्रदर्शनी से खरीदा गया बडा हैंडबैग झुलाती, पैचवर्क का भारी दुपट्टा संभालती भागी कि कहीं देर न हो जाए।

वन्या का कलीग हर्षित उसे देखते ही अपने नाम को चरितार्थ करता हुआ चहका- अरे ये कपडे की दुकान कहां से चली आ रही है ? कोई फैंसी ड्रेस प्रतियोगिता हो रही है क्या ऑफिस में आज ?

वन्या ने अपने हैंडबैग को घुमाकर उसकी पीठ पर जडते हुए कहा - आ हा हा, फैंसी ड्रेस, तू क्या उसमें बैंकरप्ट का रोल करेगा ? झल्ला कहीं का !

उस समय ऑफिस की छुट्टी हो रही थी और वन्या की सहयोगिणियां बाहर आ रही थीं। उन्होंने जब वन्या को इतनी सुंदर ड्रेस में सजे-धजे देखा तो सब की सब उसके आस पास सिमट आईं । माधुरी, जो सासु मां के कहने से केवल साडियां पहनकर आती थी और इस परिधान से ऊबी हुई रहती थी, उसने कहा – “ओह हाउ ब्यूटीफुल। ए ! व्हेयर डिड यू बाय सच लवली ड्रेसेज ?”

वन्या ने कहा – “मैं पिछली छुट्टियों में जयपुर गई थी न, अपने मामाजी के पास, तो वहीं मामी ने दिलाई।”

प्रीता अपनी सासु मां को मामी कहती थी और उनकी बुराई के मौके ढूंढा करती थी । उस ने टोक लगाई- “सच अ स्वीट मामी यू हैव । माय मामी नेवर गिव्स एनीथिंग, शी ओनली डिमांड्स !”

दिशा रमाणी उन सबमें उम्र में बडी थी और हमेशा उन्हें व्यावहारिकता के ज्ञान देती रहती थी । उसने जरा टोन से कहा – “ओह कम ऑन, शी हैज गिवेन यू हर सन नो । स्टॉप कंप्लेनिंग !”

जरीना को नकली गहनों का बेहद शौक था – वह वन्या की लंबी लडों को हाथ से छूती हुई कहने लगी – “ये कित्ते का होगा ? ए ! नेक्स्ट टाईम व्हेन यू गो टू योर नेटिव प्लेस, प्लीज गेट वन फॉर मी ऑल्सो !”

“एंड गेट अ वेरी गुड हस्बैंड सेम लाइक यू ऑल्सो” -बीबी मलिका ने कहा तो सभी ठहाके लगाने लगीं।

तभी सुरेश दौडा दौडा आया और ऊंची आवाज में बोला –“रजिल सर बुला रहे हैं वन्या मैम को !”

“रजिल बुला रहें हैं ? क्यों ?” दिशा रमाणी ने पूछा ।

सुरेश-“वन्या मैम को उन्हीं की कार में तो जाना है फंक्शन में !”

“ओ .....” -सबने एक स्वर में कहा और जरीना ने आंखें चमकाईं- “तभी ये इश्टाइल था ! परफ्यूम की पूरी बॉटल उडेल ली क्या रे ?

वन्या किसी की सुने बिना भागी और बाहर जाकर कार के पास खडी हो गई। रजिल श्रुति से बातें करते हुए बाहर ही धीरे कदमों से टहल रहे थे । वन्या को आते देखा तो कार स्टार्ट करने लगे और बाईं ओर का दरवाजा खोलकर स्नेह से वन्या को अपने बगल की सीट ऑफर की । वन्या सिकुडकर बैठ गई।

श्रुति अपनी टीम की लडकियों के अटपटे कपडों से परेशान रहती थी । वे हमेशा झल्ली सी जींस और रंग उखडे कुरतों में आतीं और बालों को बेतरतीबी से सिर के उपर जोगियों की शक्ल का जूडा बनाए रखतीं । न हार, न श्रृंगार। शनिवार या रविवार को कभी ऑफिस आना पडे तब तो ये लडकियां कैप्री और ढकढोल टीशर्ट्स के सिवा और कुछ पहनती ही न थीं। सलवार कुरता तो उनके लिए फेस्टिव ड्रेस थी। श्रुति के मन में बारहा ये सवाल आता कि पता नहीं ये फिर इतनी शॉपिंग किस बात की करने जाती हैं ! बाहर खाने और टैबलेट-कम्प्यूटर पर चैट करते रहने के सिवा जिन हाइली क्वालिफाइड लडकियों के कोई शौक ही नहीं दिखते थे । वे दीवाली होली पर ही शायद ढंग से पहनती ओढती थीं । श्रुति उनको हमेशा अच्छे से पहने ओढे देखकर प्रसन्न हुआ करती थी। इसीलिए सुंदर वन्या को अभी और सुंदर देखकर प्रसन्न होकर उसने हाथ हिलाकर उसे विदा किया।

जब वन्या और रजिल हॉल में पहुंचे तो कार्यक्रम की शुरूआत हो चुकी थी। मुख्य अतिथि दीप प्रज्वलन कर चुके थे। उन्हीं के पास डॉ.राजबाला खडी थीं । मैगजीन्स में और टीवी पर वन्या ने उन्हें देख ही रखा था, इसी लिए तुरंत पहचान गई। अपनी साज- सज्जा और सुंदरता से राजबाला जी सबसे अलग ही दिख रही थीं –भव्य ! हॉल में सफेद मेजपोशों से ढंकी टेबलों के चारों ओर लगी सफेद कवर से करीने से ढंकी गद्देदार कुर्सियों पर लोग बैठे थे और बैरे कार्यक्रम के बीच में भी उन्हें तरह तरह के व्यंजन और पेय परोस रहे थे। वन्या सकुचाई -रजिल के पास वाली एक कुर्सी पर बैठ गई और कार्यक्रम के अंत तक अटेंशन में बैठी रही - एकटक डॉ.राजबाला को देखती हुई, उनके हाव भाव, उठने-बैठने, हंसने- बोलने के ढंग और भाषण देने के तरीके को सराहती हुई !

बाकी लोगों को कार्यक्रम में रुचि हो, ऐसा बिल्कुल नहीं लग रहा था। वे धीमी आवाज में लगातार आपस में बातें किए जा रहे थे, खा-पी रहे थे और इधर उधर की टेबलों के आस पास परिचितों को गर्दन घुमा-घुमाकर ढूंढकर आवाज न कर सकने के कारण तरह तरह से मुंह फाडकर और गोपनीयता से हाथ हिला-हिलाकर सांकेतिक अभिवादन कर उकताहट भगा रहे थे। औरतें, अभिवादन के साथ ही एक दूसरी के कपडों-गहनों को भी ध्यान से देख रही थीं और जो कुछ भी अच्छा दिख जाता उसके बारे में खरीदी करने पर भी मन ही मन विचार करने लग जा रही थीं। कुछ महिलाएं,जो कार्यक्रम में अपने पति के साथ आई थीं, वे केवल यह भांपने की कोशिश कर रही थीं कि जो औरतें आजाद हैं (कम से कम उनके ख्याल में)वे और पुरुषों की तरफ किस निगाह से देख रही हैं !

जैसे ही कार्यक्रम की समाप्ति की घोषणा की गई, लोग ऐसे उठकर एक दूसरे से मिलने-जुलने लगे,जैसे कैदी जेल से छूटकर अपने परिजनों से मिलते हैं। कई लोग एक सुंदर अजनबी लडकी को रजिल के साथ देखकर प्रश्नवाची नजरों से वन्या की ओर निहारने लगे । रजिल ने अपने स्थायी स्नेहयुक्तिभाव से सबसे उसका परिचय कराया । मगर वन्या किसी से मिलने में रुचि नहीं ले रही थी । उसे तो केवल डॉ.राजबाला से ही मिलना था। उसने डॉ.राजबाला की ओर इशारा करते हुए रजिल से कहा – “मैं तो उनसे मिलने आई थी !”

रजिल उसकी इस अव्यावहारिकता पर जरा भी नहीं खीझे। उन्हें पता था कि वन्या को इस दिखावटी दुनिया के अनुसार व्यवहार करना सीखने में अभी समय लगेगा। बाकी लोगों को ‘एक्स्क्यूज मी’ कहकर वे भारी हंसी के साथ उसे राजबाला जी के पास ले जाकर परिचय कराते हुए बोले – “मीट यूअर फंटैस्टिक फैन ! वेरी ईगर टु मीट यू !ंबेताब हैं आपसे मिलने को । वन्या, आवर न्यू ट्रेनी स्टाफ ! हमारे ऑफिस में नयी ज्वायन हुई हैं !”

राजबाला जी ने ऊपर से नीचे तक उसे देखते हुए उसे गले लगाया और कहा –

“ओ,वन्या ! व्हाट अ बीईयूटीफुल नेम ! वेलकम ! आओ डियर । तुम्हारे जैसे डायनेमिक लोगों की ही तो हमें जरूरत है। हमें अपनी उन बहनों के लिए ढेरों काम करने हैं जो झुग्गी झोंपडियों में रहती हैं, गांवों में रहती हैं, बरसों से पुरुषवादी संस्कृति से दबी हुई, कुचली हुई । हमें अपनी उन बहनों के लिए बहुत काम करना है। बेटे । सर, ज्वायन कराइए इन्हें मेरा एनजीओ ! विद्या !एक फॉर्म दो इन्हें । ले बेटा । इसे भरकर लेकर कल मुझे मेरे ऑफिस में मिलना ।”

एक ओवर स्टाइलिश, पर औसत सुंदरी लडकी विद्या आई और वन्या को हाय बोलकर गले लगाते हुए उसे फॉर्म देकर चली गई। लोग खाने-पीने पर जुटे पड रहे थे और एक दूसरे से बातें किए जा रहे थे। लगता था कि वे अकसर इस तरह के समारोहों में मिलते रहते थे और इसी लिए आपस में ज्यादातर बातें इस तरह हो रही थीं- “ओ हाय, डिडन्ट सी यू इन होटेल सवेरा मिसेज विनी के कार्यक्रम में ?”

“या आय वाजंट वेल दैट डे !”

“ओ हू इज दिस ब्यूटी विद यू मि.खंडेलवाल ?”

चहककर किसी ने पूछा तो डॉ.राजबाला ने आगे बढकर उत्तर दिया- शी इज वन्या, वन्या साहु । वेरी चार्मिंग नो ?”

राजबाला जी के मुंह से अपनी तारीफ सुनकर वन्या फूले न समाई । उसे आज अपने आप पर ही गर्व हो रहा था। पार्टी से लौटते समय राजबाला जी ने जब उसे अपने घर निमंत्रित किया तो उसने स्वीकार करने में जरा भी देर न की। कुछ ही दिनों बाद उसे बहाना भी मिल गया । रजिल खंडेलवाल की एक किताब छपकर आई थी । उसे लेकर राजबाला जी को देने जाने का जिम्मा वन्या को ही सौंपा गया ।

राजबाला जी का बंगला देखकर वह बडी प्रभावित हुई। कितना सुंदर बंगला और कितना रखरखाव । ड्रॉइंग रूम की सज्जा तो और भी भव्य थी। एक तरफ राजबाला जी के पति बैठे थे। बडे सौम्य-सज्जन ! वन्या को ऐसे रिसीव किया जैसे अपनी बेटी घर आई हो। तुरंत नौकर को बोलकर उसके लिए जूस मंगवाया और खाने के बहुत सारे सामान। वन्या संकोच से सिकुडकर सोफे के एक ओर बैठी थी। राजबाला जी और उनके पति ने उसे बार- बार आराम से बैठने का आग्रह किया। उससे बडी आत्मीयता से पेश आए । उनके पति मि. सतीश ने मुस्कुराकर कहा -

“वन्या, इसे अपना ही घर समझो। आज से यह तुम्हारा घर है और मैं तुम्हारा पिता । अब से तुम मुझे पापा कहकर बुलाओगी, समझी ?”

डॉ.राजबाला – “हां बेटा, बिल्कुल ! यह तुम्हारा ही घर है। हम भी पंजाब से ही तो हैं । इस नाते तुम हमारी बेटी ही तो हुईं ?”

वन्या बोली कुछ नहीं, केवल अपनी बडी आंखें उठाकर मि.सतीश की ओर देखा । उनके चेहरे पर वात्सल्य था ! फिर भी पहली ही मुलाकात में पापा पुकारनेवाली बात उसे अटपटी ही लगी। मि.सतीश से उसका यह असमंजस छिप न सका । उन्होंने स्नेह से उसकी ओर मठरी की प्लेट बढाते हुए कहा- “लो, ये लो । कल ही कोई अमृतसर से आया है लेकर । एकदम घर की बनी मठरियां हैं । खाओ । तुम्हारे पति भी आए हैं साथ में ?”

वन्या-“जी नहीं, साहिल तो ऑफिस के काम से दो तीन दिन के लिए मुंबई गए हैं ।”

कहते हुए उसे साहिल की हिदायत याद आई कि सबसे कहती मत फिरना कि तुम्हारे पति शहर से बाहर गए हुए हैं और तुम घर में अकेली हो। मगर फिर मि.सतीश के पिता के समान वात्सल्य के सामने उसे इस हिदायत का उल्लंघन करने पर कोई अफसोस न हुआ।

मि.सतीश ने थोडा विस्मय से पूछा- “ओह ! तो तुम्हारे पति को ऑफिस के काम से अकसर शहर से बाहर रहना पडता है ? देन डोंट बी अलोन ऐट होम डियर । इट्स नॉट सेफ ! जब कभी तुम्हारे पति बाहर चले जाते हैं, तुम हमारे यहां आ जाया करो। वंदना का कमरा वैसे भी उसके यूएस जाने के बाद से खाली ही रहता है।”

राजबाला जी भी इतने में चाय के बडे बडे मग नौकर से उठवाए किचन से आ गई थीं। करीने से चाय लगवाते हुए उन्होंने कहा – “येस्स। इट्स अ ग्रेट आइडिया ! तुम रहोगी तो लगेगा जैसे हमारी वंदना ही हमारे साथ है।”

और फिर दोनों पति पत्नी आग्रह कर कर के उसे खिलाने-पिलाने लगे।

वन्या को अपने शहर से दूर, इस अनजान शहर में उनलोगों की आत्मीयता ने मोह लिया। उसने सुन रखा था कि महानगरों में लोग एक दूसरे की कतई परवाह नहीं करते। ऐसे में राजबाला जी और उनके पति के वयवहार ने उस बडा प्रभाव डाला । उसे लगा कि जैसे उसे इस नए शहर में एक नए माता पिता ही मिल गए हों। अब जब कभी उसके पति शहर से बाहर होते, वह राजबाला जी के घर का एकाध चक्कर तो लगा ही आती। वन्या के पति साहिल की भी उस घर में दामाद से कम खातिर न की जाती थी, इसीलिए उसे भी वन्या के राजबाला जी के घर जाने आने में कोई ऐतराज न था । हां, देश दुनिया घूम चुके साहिल ने रात में वन्या को कहीं बाहर ठहरने की इजाजत नहीं दी।

एक सुबह वन्या ऑफिस जाने के लिए हडबडी में तैयार हो रही थी। उसने ब्ल्यू मक्खन की जीन डाली थी और उसे कोई मैचिंग टॉप जंच नहीं रहा था । इसी उधेडबुन में वह अलमारी खोले उलट पुलट रही थी कि फोन की घंटी बजी ।

“साहिल, फोन उठाओ !”

वन्या ने आवाज लगाई, पर साहिल को खुद भी ऑफिस जाने की हडबडी थी और उसने बाथरूम से ही झल्लाते हुए जवाब दिया -

“तुम उठा लो न ! देखती नहीं, मैं नहा रहा हूं ?”भुनभुनाते हुए वन्या ने फोन उठाया ! उधर उसकी सासरानी थीं ! उनकी आवाज सुनते ही वन्या की तल्ख आवाज नत हो गई और उसने प्रणाम करते हुए कहा – “आप कैसी हैं ?”

वन्या का प्रेम विवाह था । साहिल से उसकी दोस्ती फेसबुक के माध्यम से हुई थी। छह महीनों का यह फेसबुकिया प्यार परवान चढा और छह महीने एक दूसरे को डेट करने के बाद उन्होंने कोर्ट में शादी रचा ली । जैन परिवार के साहिल की मां को पंजाबी लडकी से अपने लडके का विवाह करना सख्त नागवार गुजरा था ! वे कभी वन्या से सीधे मुंह बात नहीं करती थीं। यहां तक कि वे भगवान से प्रार्थनाएं किया करती थीं कि यह लडकी कब उनके बेटे का पीछा छोड देवे और वे अपने लडके का ब्याह किसी दबी-ढंकी जैन लडकी से कर दें। नौकरी करनेवाली लडकियों को वह परिवार की प्रतिष्ठा के लिए धब्बा ही मानती थीं। इसीलिए उन्होने तेज आवाज में जवाब दिया – “मैं ठीक हूं,साहिल नहीं है क्या ?”

वन्या जितना ही उनके सामने विनम्र होने का प्रयास करती है, सासरानी उतनी ही उखडती हैं। सहमकर वन्या ने फोन साहिल को पकडा दिया । साहिल को वन्या के प्रणाम करते ही समझ में आ गया था कि फोन उसकी माताजी का है । वह झटपट तौलिया बांधकर बाथरूम से बाहर निकल आया था । वन्या का उतरा चेहरा देखकर साहिल बाएं हाथ से उसे घेरकर उसका सिर सहलाते हुए अपनी मां से बातें करने लगा -

“हां, अच्छा हूं ! ... नहीं नहा रहा था, खाना तो वन्या ही बनाती है, उसने बना भी लिया और टिफिन पैक भी कर दिया। बहुत फुर्ती से काम करती है - एकदम तुम्हारी तरह !”

“हूं, बडा काम करती है ! तुझे तो बकरा बना दिया है उस सरदारनी ने, हमेशा उसी का पक्ष लेता है। अच्छा सुन । मेरी आंखों का ऑपरेशन बताया है डॉक्टर ने, कैटेरैक्ट है । कहते हैं मद्रास में कोई नेत्रालय है बहुत बढिया, सभी वहीं ऑपरेशन करने की सलाह दे रहे हैं।”

साहिल- “यह तो बहुत अच्छा है, आ जाओ !”

वन्या ने हंसकर उसे टहोका दिया तब उसे अपनी गलती का अहसास हुआ और उसकी भी हंसी छूट गई। बात को संभालकर उसने कहा – “मतलब इसी बहाने आप यहां आएंगी -यह अच्छा है। मैं टिकट देखकर आज बताता हूं ।”

मां – “ठीक है। मैं अकेली ही आउंगी । तेरे बाबूजी नहीं आ पाएंगे, क्योंकि हर्षित के चले जाने पर बहू अकेली रह जाती है छोटे बच्चे के साथ घर में । उसे अकेले कैसे छोड सकते हैं ?”

साहिल – “ठीक है। मैं टिकिट करवा देता हूं । भइया वहां आपको बिठा देंगे गाडी में, मैं यहां आपको लेने आ जाउंगा ।”

मां – “उस सरदारनी को कहना ढंग से रहे जब मैं आउं । मेरे सामने यों नंगी बुच्ची, आधे कपडे पहनकर न रहा करे। और उसे थोडा खाना बनाना भी सिखा देना । और मुझसे लडे नहीं। सुना है ये कमानेवालियां सास ननद को कुछ लगाती नहीं हैं।”

साहिल थोडा तल्ख होकर बोला – “मां, ऐसा कुच्छ नहीं है। मैं आपसे शाम में बात करता हूं।”

वन्या इस बीच जो टॉप मिला था पहनकर तैयार हो गई थी, और आईने के सामने खडी होकर लिपस्टिक लगा रही थी । वह कंघी करे या न करे, लिपस्टिक जरूर लगा लेती थी। यही एकमात्र मेकअप वह करती थी। बिना लिपस्टिक के उसे तैयार होने का भाव नहीं आता था और इससे उसमें एक तरह का आत्म विश्वास का भाव भी आता था। साहिल ने पीछे से आकर उसे शीशे में प्यार से निहारते हुए स्नेह से कहा – “मां आ रही हैं। आंखों का ऑपरेशन कराना है।”

वन्या-“चलो, उन्होने कम से कम आने की सोची तो ! पर तुम ट्रेन की टिकिट क्यों करवा रहे हो ? अकेले दो दिनों की यात्रा करना आसान है क्या ? फलाइट की करवाओ, जल्दी से टिकिट करवा लिया तो एक डेढ हजार से ज्यादा का अंतर नहीं पडेगा ।”

साहिल ने आगे बढकर वन्या का माथा चूम लिया ।

क्रमश..