Aabhas - 1 in Hindi Human Science by Priya Saini books and stories PDF | आभास - 1

आभास - 1

न जाने कितनी बार मुझे ये आभास होता है कि यह घटना पहले भी घटित हो चुकी है। जबकि ये संभव ही नहीं है कि कोई भी घटना या उसके पात्र उसी रूप-रेखा के समान फिर से वही सब करें जो पहले घटित हो चुका है। शायद यह एहसास आपको भी कभी न कभी होता होगा। अब मेरे लिए यह सामान्य सा हो गया है चूंकि यह मेरे साथ कुछ दिनों के अंतराल पर हो ही जाता है। अब मैं इसकी आदी हो गई हूँ पर जब यह मेरे साथ पहली बार हुआ था वो एहसास वो लम्हें बहुत कुछ कह रहे थे। समझ ही नहीं आ रहा था ये क्या हो रहा है। मन में बहुत सारे सवाल उठ रहे थे जैसे,"ये मेरे साथ क्या हो रहा है?","मेरे साथ ही क्यों हो रहा है?","किसी को कहूँगी तो कोई यकीन भी नही करेगा","आगे क्या करूँ?" इत्यादि। अब उस बात को सालों बीत गए हैं लेकिन मेरे मन में आज भी इस तरह जागृत है जैसे कल ही की बात हो।

बात है जब मैं कक्षा 5 में पढ़ती थी। 15 अगस्त आने वाला था। स्कूल में 15 अगस्त को होने वाले प्रोग्राम की तैयारी चल रही थी। स्कूल के एक नाटक में मैनें भी भाग लिया। उस नाटक में केवल हमारी ही कक्षा के कुछ विद्यार्थी थे। हमें स्कूल के समय के अनुसार ही नाटक की रिहर्सल करनी पड़ती थी जिससे पूरी तरह से हम अपने नाटक पर ध्यान नहीं दे पा रहे थे। फिर हम 3 दोस्तों ने निर्णय लिया कि हम किसी एक के घर जाकर अपने-अपने डायलॉग का रिहर्सल साथ में कर लेते हैं।

अब हमें ऐसा घर चुनना था जिसमें हम आसानी से रिहर्सल कर सकें और आसानी से पहुँच भी जाये क्योंकि हम उससे पहले कभी किसी दोस्त के घर नहीं गए थे। पहली बार हमारा स्कूल के सिवा कहीं और मिलना हो रहा था।
मेरा घर स्कूल से बहुत दूर था तो मेरे घर आने को कोई राजी नहीं हुआ। मेरे स्कूल से घर के रास्ते में स्वेता और रानी दोनों के घर पड़ते थे। रानी और स्वेता के घर ज़्यादा दूरी पर भी नहीं थे। अंत में हमनें रानी का घर चुना, स्वेता भी तैयार थी रानी के घर आने को। मिलने के लिए रविवार का दिन निश्चित हुआ।

रविवार का दिन आ गया। मैं बहुत उत्साहित थी, आख़िर पहली बार जो अपनी किसी दोस्त के घर जा रही थी अन्यथा हम बस स्कूल में मिलते थे। दोपहर 12 बजे के बाद मैं पता पूछते हुए अपने बड़े भाई के साथ रानी के घर पहुँच गई। मेरे भाई मुझे रानी के घर छोड़ कर 2 घंटे बाद आने का कहकर वहाँ से चले गए।

रानी मुझे अपने घर अंदर लेकर गई। अपने माता पिता से मिलवाया। रानी के पिता डॉक्टर थे और माता गृहणी थीं। उसके माता पिता ने मुझसे हाल चाल पूछा और फिर हम दोनों एक अलग कमरे में जाकर बैठ गए। अब तक स्वेता नहीं आई थी। हम रिहर्सल के लिए उसकी प्रतीक्षा कर रहे थे। थोड़ी देर में रानी की मम्मी मेरे लिए नाश्ता ले आईं। हम दोनों नाश्ता करतें हुए बातें करने लगे।

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