Likhi Hui Ibarat - 3 books and stories free download online pdf in Hindi

लिखी हुई इबारत - 3

मुफ़्त शिविर


छोटे-छोटे बच्चे,दो वक़्त की रोटी जुटाने की मशक्कत,और बिटिया की जान पर मंडराता खतरा देखकर परमेसर सिहर उठा। अंततः उसने अपनी एक किडनी देकर बेटी के जीवन को बचाने का संकल्प कर लिया।

" तुम तो पहले ही अपनी एक किडनी निकलवा चुके हो,तो अब क्या मजाक करने आये हो यहाँ ?" डॉक्टर ने रुष्ट होकर कहा।

" जे का बोल रै हैं डागदर साब,हम भला काहे अपनी किटनी निकलवाएंगे। ऊ तो हमार बिटिया की जान पर बन आई है।छोटे-छोटे लरिका हैं ऊ के सो हमन नै सोची की एक किटनी उका दे दै।"

" पर तुम्हारी तो अब एक ही किडनी है, ये देखो ऑपरेशन के निशान भी हैं "

" अरे ऊ कौनौ किटनी न निकलवाई हमने।ऊ तो मुला नसबन्दी का आपरेसन हुआ था।" वह डॉक्टर की मूर्खता पर ठठाकर हँस पड़ा ।

" ऊ जा साल सूखा पड़ा था, तबहीं एक सिविर लगा था। सबका मुफत में नसबन्दी का आपरेसन करके हज्जार रुपैया ,एक कम्बल ,अउर इशट्टील का खाने का डब्बा दै रै थे। तबहिं हमन नै आपरेसन करवा के हज्जार रुपैय्या अपनी अन्टी में ....." कहते कहते वह रुक गया। और उसकी आँखें भय से फैल गईं।


किस ओर ?


"हम बालको को इस्कूल पढ़ने भेजे हैं या बेमतलब के काम के लिए। जब देखो मैडमजी नई नई चीजें मंगाती रहवे हैं । "

"अम्मा अगर आज शीशे और फेविकोल नही ले गया तो मैडम जी मारेंगी। "

"हमाए पास नही है पैसे, किसी तरह पेट काटकर फीस के पैसों की जुगाड़ करो तो रोज इस्कूल से नई फरमाइस। जीना मुसकिल कर दिया है इन मास्टरनियों ने।"

"अम्मा ..."

"चुपकर छोरा, दो झापड़ खा लेगा तो तेरा कछु न बिगड़ जाएगो।"

राजू बस्ता टाँगकर मुँह लटकाए हुए विद्यालय चल दिया। पर पिटाई के भय ने उसकी गति को बहुत धीमा कर दिया था। कल ही तो मैडम ने सजावटी सामान न ले जाने पर उसे खूब भला बुरा कहा था और दो चांटे भी लगाए थे। सबके सामने हुए अपमान ने उसके कोमल मन को बहुत आहत किया था। सुस्त चाल से चलता हुआ जा रहा था कि रेलवे लाइन के पास कुछ किशोर लड़कों के समूह ने उसका ध्यान आकर्षित किया। वह उत्सुकता से उस ओर चल पड़ा।

वहाँ कुछ किशोर बच्चे जुआ खेलने में मगन थे। एक दो बच्चों के हाथ मे सुलगते हुए बीड़ी के ठूँठ भी फँसे हुए थे। उसे देखकर उन सबका ध्यान उसकी ओर आकर्षित हुआ।

"आ जा, खेलेगा क्या ?"

वह मौन रहा, उसे समझ न आया कि क्या जवाब दे।

" बोल न, खेलना है तो बैठ जा। " एक ने फिर पूछा।

" मेरे पास कुछ नही। " उसने विवशता बताई।

पूछने वाले ने उसका जायजा लिया और फिर उसकी निगाह राजू के बस्ते और उसमें रखी किताबों पर जम गई। उसकी आँखों मे एक चमक उभरी।

"ये है तो इतना माल।"

उसकी निगाह का पीछा करते हुए राजू की दृष्टि भी बैग पर जम गई और चेहरे पर कुछ असमंजस के भाव उभर आये।

" लेकिन ये तो पढ़ने के लिये ... "

" अब तक क्या मिल गया पढ़कर? एक बार दाँव लगाकर देख। अगर जीत गया तो ये सब माल तेरा " राजू की दृष्टि एक, दो और पाँच के नोटों के ढेर पर पड़ी । उसके हाथ बस्ते पर कस गए और चेहरे पर कशमकश उभर आई, और फिर बस्ता धीरे धीरे कंधे पर से नीचे सरकने लगा।

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