Manas Ke Ram - 26 in Hindi Fiction Stories by Ashish Kumar Trivedi books and stories PDF | मानस के राम (रामकथा) - 26

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मानस के राम (रामकथा) - 26







मानस के राम
भाग 26



संपाती से भेंट


कुछ ही दूर एक पहाड़ी पर बैठा संपाती नामक गिद्धों का राजा यह सब देख रहा था। संपाती अपने पंख खो चुका था। अतः वह शिकार करने के लिए दूर नहीं जा सकता था। आस पास जो मिलता था वही खा लेता था। सही भोजन ना मिल पाने के कारण वह दुर्बल हो गया था। जब उसने इतने सारे वानरों को प्राण त्यागने के संकल्प से बैठे देखा तो उसे प्रसन्नता हुई कि अब उसे प्रचुर मात्रा में भोजन मिलेगा।
प्राण त्यागने के इरादे से बैठे वानर तेज स्वर में आपस में बातचीत कर इस बात का पश्चाताप कर रहे थे कि वह सीता की खोज में असमर्थ रहे थे। वह कह रहे थे कि कैकेई कितनी निष्ठुर थी। यदि उसने वचन की आड़ लेकर राम के लिए वनवास ना मांगा होता तो वह अपनी पत्नी व अनुज लक्ष्मण के साथ वन में ना आते। ऐसा होता तो रावण सीता का हरण कर ना ले जाता। राम अपनी पत्नी सीता के वियोग में तड़प रहे हैं। हम उनकी तनिक भी सहायता नहीं कर सके। ऐसे जीवन को समाप्त कर देना ही अच्छा है। हमसे अच्छा तो गिद्ध जटायू था जिसने सीता की रक्षा में अपने प्राण त्याग दिए।
संपाती जटायू का बड़ा भाई था। वानरों के मुख से जटायू की मृत्यु के बारे में सुन कर उसे बहुत दुख हुआ। संपाती और जटायू अरुण के पुत्र थे। अरुण सूयर्यदेव के सारथी तथा भगवान विष्णु के वाहन गरुड़ के भाई थे। अपनी युवावस्था में एक बार संपाती तथा जटायू में एक प्रतिस्पर्धा हुई कि कौन अधिक ऊँचाई तक उड़ कर जा सकता है। दोनों जोश में भर कर आकाश में ऊँचा उड़ने लगे। उड़ते हुए दोनो सूर्य के समीप पहुँच गए। सूर्य के तेज से उनके पंख झुलसने लगे। संपाती ने जटायू की रक्षा करने के लिए उसे अपने पंखों से ढक लिया। संपाती के पंख जल गए और वह इस पहाड़ी पर गिर पड़ा।
अब अपने उसी छोटे भाई जटायू की मृत्यु का समाचार सुन कर संपाती का ह्रदय दुख से फटने लगा। वह रोते हुए बोला,
"तुम लोग कौन हो ? मेरे अनुज जटायू की मृत्यु के बारे में मुझे विस्तार से बताओ।"
वानरों ने जब जब संपाती का रुदन सुना तो कुछ वानर उसके पास पहुँचे। वह सावधानी से उसे पहाड़ी से उतार कर नीचे लाए जहाँ अंगद समेत अन्य वानर थे। उन्होंने संपाती को सारी कथा सुनाते हुए अपने वहाँ होने का कारण बताया। सारी बात जान कर संपाती बोला,
"मैं तुम लोगों की सहायता कर सकता हूँ। मैं उड़ तो नहीं सकता हूँ किंतु मुझे दिव्य दृष्टि प्राप्त है। जिसकी सहायता से मैं कई सौ योजन दूर तक आसानी से देख सकता हूँ।"
उसकी बात सुन कर वानर बहुत खुश हुए। उन्होंने संपाती से प्रार्थना की कि वह अपनी दिव्य दृष्टि से सीता का पता लगाने का प्रयास करे। संपाती ने अपनी दृष्टि दक्षिण दिशा में समुद्र के पार स्थिर की। उसे सीता एक वाटिका में राक्षसियों के बीच घिरी हुई दिखाई दीं। उसने वानरों को बताया कि सीता रावण की लंका नगरी में बंदी हैं।
संपाती को दिव्य दृष्टि के वरदान के साथ यह भी वरदान मिला था कि जब वह उसका प्रयोग कर राम की सहायता करेगा तो उसके पंख दोबारा उग आएंगे। सीता की सूचना देते ही संपाती के पंख पुनः वापस आ गए।
संपाती से सीता के विषय में जानकारी तो मिल गई थी किंतु वानर स्वयं लंका जाकर इस बात को पक्का करना चाहते थे। अन्यथा सुग्रीव को उनकी बात पर विश्वास ना होता। किंतु समस्या यह थी कि लंका जाने के लिए उन्हें विशाल समुद्र को पार करना था। कोई भी उस विशाल समुद्र को पार करने की हिम्मत नहीं दिखा पा रहा था। सब अपनी अपनी क्षमता का अनुमान लगा रहे थे। किंतु कोई भी समुद्र को पार करने की संपूर्ण क्षमता नहीं रखता था।
सभी वानर अपनी समुद्र लांघ सकने की क्षमता के बारे में अंगद को बता रहे थे। गज नामक एक वानर बोला कि मैं एक छलांग में दस योजन की दूरी पार कर सकता हूँ। एक अन्य वानर गवाक्ष ने कहा कि वह बीस योजन की छलांग लगा सकता है। इसके बाद अन्य और वानर आए और दूरी को थोड़ा थोड़ा बढ़ाते रहे। अंत में जांबवंत आगे आकर बोले,
"अब मैं वृद्ध हो गया हूँ। अपनी युवावस्था में मैं आसानी से इस समुद्र को लांघ जाता। किंतु वर्तमान में मैं नब्बे योजन से अधिक दूर एक छलांग में नहीं जा सकता हूँ। किंतु वह अपर्याप्त है।"
अंत में युवराज अंगद आगे आकर बोला,
"मैं एक छलांग में सौ योजन लांघ कर लंका पहुँच सकता हूँ। किंतु यह नहीं कह सकता हूँ कि वापस आने की शक्ति मुझमें बचेगी कि नहीं।"
अंगद की बात सुन कर जांबवंत ने कहा,
"युवराज आपकी सामर्थ्य पर मुझे कोई आशंका नहीं है। किंतु यह राजनैतिक दृष्टि से उचित नहीं है कि सेना के रहते युवराज किसी अभियान पर जाए। आपकी रक्षा करना हमारा प्रथम कर्तव्य है।"



जांबवंत द्वारा हनुमान को प्रेरित करना

इस सारी बातचीत के बीच हनुमान सबसे अलग शांत बैठे थे। जांबवंत की दृष्टि उन पर पड़ी। वह हनुमान के पास जाकर बोले,
"हे पवन पुत्र ज्ञान की सभी शाखाओं में पारंगत तथा परमवीर आप सबसे अलग इस प्रकार शांत क्यों बैठे हैं ?"
जांबवंत के प्रश्न पर हनुमान बोले,
"हे जांबवंत जी मैं शांत हूँ क्योंकी मैं भी इस विशाल समुद्र को लांघने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा हूँ।"
हनुमान की बात सुनकर जांबवंत ने कहा,
"पर अंजनि पुत्र तुम ही हो जो इस कार्य को संपन्न कर सकते हो। तुम रुद्रावतार हो। वायु देव ने तुम्हारी माता अंजनि के गर्भ में शिव के अंश को स्थापित कर दिया था। उसी अंश के कारण तुम्हारा जन्म हुआ। यही कारण है कि महाराज केसरी के साथ वायु देव भी तुम्हारे पिता कहे जाते हैं। तुम्हारे भीतर अतुलित असीमित बल समाया है। अपनी शक्ति को पहचानो।"
हनुमान आश्चर्य से जांबवंत की बात सुन रहे थे। जांबवंत ने आगे कहा,
"तुम एक बार जो ठान लो वह करके ही रहते हो। याद करो अपने बाल्यकाल में तुमने उदित होते सूर्य को फल समझा और उसे खाने का मन बनाया। तुम निर्भीकता पूर्वक सूर्य को निगलने के लिए उसकी तरफ उड़ चले। सूर्य सृष्टि का आधार हैं। यदि सूर्य ना रहे तो सृष्टि मे अंधकार छा जाएगा। धरती पर जीवन संकट में पड़ जाएगा। यह सोंच कर इंद्र देव ने सूर्य की रक्षा के लिए अपने वज्र से तुम पर प्रहार किया। तुम मूर्छित होकर धरती पर गिर पड़े। इससे कुपित होकर वायु देव ने पवन का संचार रोक दिया। जिससे सृष्टि में त्राहि त्राहि मच गई। तब ब्रह्मा तथा इंद्र देव ने तुम्हें अजर अमर होने का वरदान दिया।"
हनुमान बड़े ध्यान से जांबवंत की बातें सुन रहे थे। कुछ समय के लिए रुकने के बाद जांबवंत बोले,
"बाल्यकाल में तुम बहुत चपल थे। अपनी चंचलता के कारण उत्पात करते रहते थे। जिससे ऋषि मुनियों को परेशानी होती थी। तब एक ऋषि ने तुम्हें श्राप दिया कि जब तक आवश्यक्ता ना पड़े तुम अपनी शक्ति को भूले रहोगे। इसी कारण तुम इस प्रकार शांत बैठे हो। किंतु तुम्हारे अतिरिक्त यहाँ किसी में भी सामर्थ्य नहीं है कि इस समुद्र को लांघ कर लंका जा सके। इसलिए अपने भीतर की शक्ति को पहचानो। उठो और एक छलांग में यह समुद्र पार कर जाओ।"
जांबवंत द्वारा प्रोत्साहित किए जाने पर हनुमान को अपनी शक्ति का स्मरण हो गया। उनका ह्रदय उत्साह से भर गया। वह तुरंत सीता की खोज में लंका जाने के लिए तत्पर हो गए। उनका चेहरा एक अनोखी कांति से दमक उठा। सभी वानर उनके इस तेज को देख कर दंग रह गए। उन्होंने अपने शरीर का आकार बढ़ा लिया। वह ऊँची छलांग लगा सकें इसलिए वह महेंद्र पर्वत पर चढ़ गए। उन्होंने लंका की तरफ देख कर अपना सारा ध्यान अपनी शक्तियों पर केंद्रित किया। उसके बाद वह कुछ कदम पीछे गए। एक हुंकार भर कर उन्होंने छलांग लगा दी।


हनुमान का लंका की तरफ कूच करना

हनुमान लंका की तरफ उड़ने लगे। उड़ते हुए वह इस प्रकार लंका की तरफ बढ़ रहे थे जैसे राम के धनुष से निकला हुआ तीर अपने लक्ष्य की तरफ बढ़ रहा हो। हनुमान की विशाल काया उड़ते हुए इस प्रकार लग रही थी जैसे कि आकाश में कोई धूमकेतु उड़ रहा हो। ऊपर उड़ते हनुमान की छाया समुद्र में ऐसी प्रतीत हो रही थी जैसे कि कोई विशाल जलयान तेजी से आगे बढ़ रहा हो।
पवन पुत्र वेग से उड़ते हुए चले जा रहे थे। मार्ग में आने वाली बाधाओं को वह आसानी से समाप्त कर देते थे। हनुमान का ध्यान सिर्फ अपने लक्ष्य पर था। वह उसी लक्ष्य की तरफ बढ़ रहे थे। तभी अचानक समुद्र से निकल कर एक पर्वत ऊपर उठा। हनुमान ने अपनी छाती से उस पर प्रहार किया। वह पर्वत हाथ जोड़ कर बोला,
"हे वीर हनुमान मेरा नाम मैयनाक है। मेरे स्वामी समुद्र ने मुझे भेजा है। राम के वंशज सगर मेरे स्वामी के मित्र थे। अतः मेरे स्वामी चाहते हैं कि आप मुझ पर कुछ देर रुक कर विश्राम करें। जिससे आप तरोताज़ा होकर राम के कार्य को सही प्रकार पूर्ण कर सकें।"
मैयनाक की बात सुन कर हनुमान ने कहा,
"आपके इस प्रस्ताव के लिए धन्यवाद किंतु जब तक मैं अपने कार्य को पूरा ना कर लूँ विश्राम नहीं करूँगा।"
यह कह कर हनुमान अपने हाथ से पर्वत को नीचे धकेला और अपने लक्ष्य की तरफ बढ़ गए। हनुमान ने तय कर लिया था कि जब तक वह लंका पहुँच कर सीता का पता नहीं लगा लेते हैं तब तक एक क्षण को भी रुकेंगे नहीं। अपने संकल्प के साथ वह आगे बढ़ रहे थे।
समुद्र में सुरसा नाम की एक राक्षसी थी। हनुमान को ऊपर आसमान में उड़ते देख कर उसने अपना आकार बढ़ा कर उनका रास्ता रोका। वह बोली,
"मैं कई दिनों से भूखी हूँ। आज तुम्हारे रूप में देवताओं ने मुझे आहार दिया है। तुम चुपचाप मेरे मुख में प्रवेश कर जाओ।"
यह कह कर वह अपना मुख खोल कर खड़ी हो गई। हनुमान बहुत चतुर थे। उन्होंने अपना आकार और अधिक बढ़ा लिया। इस पर सुरसा ने अपना मुख और अधिक खोल दिया। जैसे जैसे सुरसा अपने मुख का आकार बढ़ाती जाती वैसे वैसे हनुमान अपना आकार उससे भी अधिक कर लेते। बढ़ाते बढ़ाते सुरसा का मुख सौ योजन का हो गया। चतुर हनुमान ने तुरंत अपना आकार एक छोटे से कीट के बराबर कर लिया। वह उसके मुख में घुस कर निकल आए। हाथ जोड़ कर बोले,
"मैंने आपकी इच्छा पूरी कर दी। अब मैं अपने कार्य के लिए आगे बढ़ता हूँ।"
हनुमान की चतुराई पर सुरसा बहुत प्रसन्न हुई,
"मुझे देवताओं ने तुम्हारी परीक्षा लेने के लिए भेजा था। तुम बहुत बुद्धिमान हो। मैं तुम्हें आशीष देती हूँ कि तुम अपने काम में सफल हो।"
सुरसा से आशीर्वाद लेकर हनुमान पुनः लंका की तरफ उड़ने लगे। लेकिन उड़ते हुए अचानक उन्हें अनुभव हुआ कि कोई उनकी गति को रोक रहा है। उन्होंने इधर उधर देखा किंतु उन्हें कोई कारण नज़र नहीं आया। उन्हें ऐसा लग रहा था कि कोई अदृश्य शक्ति उन्हें अपनी ओर खींच रही है। उन्होंने नीचे समुद्र में देखा तो उन्हें इसका कारण समझ आ गया। समुद्र में एक राक्षसी थी जिसने उनकी परछांई को पकड़ रखा था। उस राक्षसी ने उन्हें खाने का प्रयास किया। हनुमान उसके मुख में घुस कर उसके नथुनों को फाड़ते हुए बाहर आ गए।
एक बार फिर वह अपने गंतव्य की ओर बढ़ने लगे। मार्ग में इसके बाद भी कुछ बाधांएं आईं। किंतु कोई भी उनके संकल्प को डिगा ना सकी।