sachmuch tum ishwar ho in Hindi Poems by ramgopal bhavuk books and stories PDF | सचमुच तुम ईश्वर हो ! 10 - अंन्त

सचमुच तुम ईश्वर हो ! 10 - अंन्त

काव्य संकलन

सचमुच तुम ईश्वर हो ! 10

रामगोपाल भावुक

पता- कमलेश्वर कालोनी (डबरा)

भवभूति नगर, जिला ग्वालियर म.प्र. 475110

मो0 09425715707

व्यंग्य ही क्यों

व्यंग्य ऐसी विधा है जो महाभारत के युद्ध का कारक बनी- द्रोपदी का यह कहना कि अन्धे के अन्धे होते हैं, इस बात ने इतना भीषण नर संहार करा दिया कि आज तक हम उस युद्ध को भूल नहीं पाये हैं।

इससे यह निश्चिय हो जाता है कि व्यंग्य ही एक ऐसी विधा है जो आदमी को सोचने क लिए विवश कर देती है। उसके प्रहार से आदमी ऊपर की हॅँसी मे तो हॅँसने लगता है, किन्तु अंदर ही अंदर उसकी आत्मग्लानी उसे सोचने को मजबूर कर देती है।

व्यंग्य की तेजधर उच्छंखल समाज की शल्य-क्रिया करने में समर्थ होती है। आज के दूषित वातावरण में यहाँ संवेदना मृत प्रायः हो रही है। केवल व्यंग्य पर ही मेरा विश्वास टिक पा रहा है कि कहीं कुछ परिवर्तन आ सकता है तो केवल व्यंग्य ही समाज को संतुलित रख सकता है।

सचमुच तुम ईश्वर हो! काव्य संकलन में कुछ रचनायें चिन्तन परक एवं विरारोत्तेजक भी हैं। उनमें भी व्यग्य की आभा महसूस होगी।

दिनांक-19.02.2021 रामगोपाल भावुक

अपने तरह की इबारत

समुद्र में उतरना

उसकी थाह मापने के लिये,

नीचे और नीचे

उस तह तक पहुँचना।

जहाँ बुद्धि जीवी सा

मोती छिपा बैठा है।।

उसे पकड़कर लाना है।

उसे कटघरे में खड़ा करना है।

जहाँ उसे पहचाना जा सके।

यों पहचान तो सभी को

अपने आप बनाना पड़ती है।

कुछ ही होते हैं,

जिनकी पहचान

अपने आप बनती चली जाती है।

आदि से अंत तक

सोच की कसौटी बदली है।

बदलती चली जायेगी।

आज जो चिर है,

सत्य सनातन है।

वह जब देषकाल के अनुसार

न चल पायेगा

तो उसकी भी होली,

उसी तरह जला दी जायेगी।

जैसे प्रहलाद के जलाने के प्रयास में,

युगों- युगों से

होलिका ही जलती चली आई है।

और वह तो

सूर्य बनकर,

अंधेरे को हरता रहेगा।

सारे ग्रहों को प्रकाषित करता रहेगा।

दुःख और सुखों के अस्त्रों से

उसे ज्यांे-ज्यों तराषा जायेगा।

वह मणि- माणिक्या सा

निखरकर

हर मुक्तबोध

अपने ब्रह्मराक्षस से

अपने तरह की

इवारत लिखायेगा।

000

संवेदना का व्याकरण

षायद तुम सोच रहे हो-

तुम्हारी प्रतीक्षा में

अपने मदमाते बसंत को

उसने सँभालकर रखा होगा।

किसी की उस पर

दृष्टि नहीं पड़ी होगी।

और वे थे कि हर बरसात में

मिट्टी की सौधी-सौधी सुगंध को

ग्रहण करते रहे।

फिर तुम सोचते हो-

वह किसी बरसात में

भीगी नहीं होगी।

मादक बसंत के आगमन ने

उसका स्पर्ष नहीं किया होगा।

सच तो यह है-

जब हवा चलती है,

सुर्य तपता है।

उसका असर भी

संपूर्ण जड़ चेतन पर होता है।

फिर तुम को वह क्यों?

इन उपवनों की सुगंध से

वंचित रखना चाहता है।

हम प्रकृति से जुड़े आलेखों में

उतना ही हस्तक्षरेप करें,

जितना स्वाभाविक हो।

सतीत्व और उसके सत्यापन की बातें।

युगों-युगों से सावित्री और सीता की तरह

यथावत सी तो लगती रही है।

किन्तु नारी और पुरुष की

संवेदना में अन्तर करना,

जैसे कचरे से घर भरना है।

फीकी स्हाई से पृष्ठ रंगना है।

इसके स्वाद की

अनुभूतियों में अन्तर

ना कोई कर पाया है।

और ना कर पायेगा।

मानवीय सेवेदना के

व्याकरण से इसका

कोई लेना देना नहीं है।

संवेदना का अपना

व्याकरण ही सही है।

000

व्ह है या नहीे है

आदमी की चेतना ने

जब से सेहरा बाँधा है।

तभी से आस्थायें,अनास्थायें,

उसकी प्रगति में बाधा हैं।

यह प्रष्न प्रष्न बनकर

जब से खड़ा हुआ है।

खड़ा ही है।

......और आदमी

इसी व्यथा में पड़ा ही है।

चलिए, इसी प्रष्न को लेकर

हल करने के लिए आगे आये।

चेतना की भूख मिटायें।

नास्तिक चेतना भी

यह स्वीकार करने में

संकोच नहीं करेगी।

कहीं कोई सत्ता तो है।

जो जड़ और चेतन का

बटबारा कर रही है।

जड़ को चेतन

और चेतन को जड़ में

वरण कर रही है।

मैं पत्थर की भूर्तियों को

भगवान नहीं मानता।

चेतना को ही सृष्टि का आधार जानता।

आस्थाओं और अनास्थाओं का द्वन्द्व

आदमी के ही हृदय में बनता है।

निरगुण- निराकार परब्रह्म

परमात्मा से षब्दों को गढ़ता है।

लेकिन वह जो है सो है।

यदि वह है

तो उसे नकार नहीं जा सकता।

यदि वह नहीं है तो

उसे लाया नहीं जा सकता।

इसके लिये गवाह बनाकर

खड़ा करता हूँ-वेदों को षस्त्रों को,

व्यास जी को, ऋषियों को

जे आस्थाओं का अपने अपने अनुसार

इतिहास गढ़ते रहे हैं।

स्याही से पृष्ठ रंगते रहे हैं।

कभी कभी लगता है।

यह सब गलत है,

ते अब कटघरे में खड़ा करता हूँ-

अपने आप को।

जो ईष्वर को नहीं मानता है।

भौतिक जगत के सत्य को स्वीकारता है।

उसे किसने देखा है,

उसे किसने जाना है,

तमाम प्रष्न आ आकर

मन पर आक्रमण करते रहते हैं।

नई- नई कहानी गढ़ते रहते हैं।

अब तो बस यही बात मन में आती है ।

हम स्वयं एक चित्त होकर बैठें।

उसके बारे में मनन करें।

वह है या नहीं है।

उसे कर सके तो स्वयं महसूस करें।

तभी जान पायेंगे-

वह है या नहीें है।

000

राजा बेटा

सुना है-

हमारे राजा बेटा ने

मातृभूमि के लिए

लड़ते-लड़ते

बन्दूक की गोलियाँ

अपने सीने पर झेलीं हैं।

भारत माता

आज उसके षहीद होने पर

सीना ताने गर्व से

कह रही है।

देखा, मेरा वीर लाड़ला

जिसने षत्रु के सभी वार

सीनें पर झेले हैं।

उसके आज जाने के बाद

अब मेरा क्या होगा?

कौन करेगा?

इस माँ की रखवाली।

है कोई राजा बेटा

जो षत्रु के सभी वार

सीने पर झेल सके।

मरते- मरते जय मातृभूमि कह सके।

आज मेरे घर ऐसे

राजा बेटा की अर्थी

आने वाली है।

कैसे स्वागत करूँ मैं उसका?

कैसे आँसुओं के प्रवाह को रोक पाऊँ।

उस पर क्या-क्या न्योछावर करदूँ?

कौनसा पात्र

उसके आचमन के लिए भर लूँ।

कौनसी समिधायें उसे अर्पित करूँ?

कौन से गीत उसके स्वागत में गाऊँ?

सब की सब चीजें,

राजा बेटा के स्वागत में

बौनी लग रहीं हैं।

अब तो बस एक ही बात

मन में आती है-

काष! ऐसा ही दूसरा

राजा बेटा होता तो

उसे भी उसके स्वागत में,

षहीद होने के लिये

अर्पित कर देती।

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अनुभव की गठरी

अनुभव की गठरी का

उम्र से हिसाब रे।

बैराग्य के दर्षन का

राग से रिसाव रे।।

कुंठाओं से अन्र्तमन की

दृष्टि का भाव रे।

ज्यों रोगी के रोग का

मृत्यु से अलगाव रे।।

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मन का नक्षा

मन

आषंकाओं से जुड़ा रहता है।

अकेली खुषी की भी बात

कभी नहीं कहता है।

षंका और समाधान

दुतरफी बातें।

मन का नक्षा है।

और सूनापन

मन का मदरसा है।

000

परिवर्तन

हम सभी

परिर्वतन चाहते हैं।

ऐसा परिवर्तन

जे अन्तः को बदल डाले।

रूप, रस, गंध की सुगन्ध

अपने अन्तः में पाले।।

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मेरी स्मृति

मेरी स्मृति आज भी

अतीत के पृष्ठों को पलटती है।

हर पल कुछ न कुछ

नया पन लेकर,

वही पुराने वही खाते।

नवीन औपन्यासिक

कहानी की तरह,

चित्त की वृतियों को

केन्द्रित किये रहती है।

मानो

अतीत को याद कर रही हो।

जिन्दगी के घड़ियाँ बिताने में मदद कर

अहसान कर रही है।

मेरी स्मृति।

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आनन्द

आनन्द-

लक्ष्य की साधना में ही

मिला करता है।

लक्ष्य हीन मानव

भ्रमित पथिक सा

भटका करता है।

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सलीब

मुझे

ईसा मसीह की तरह

सलीब पर मत टाँगो।

मेरे अंग प्रत्यांगों में

कीलें मत ठोको।

देखना

कहीं तुम्हें भी

उन दरिन्दों की तरह,

पष्चाताप न करना पड़े।।

000