प्यार भी इंकार भी (अंतिम भाग) in Hindi Adventure Stories by किशनलाल शर्मा books and stories Free | प्यार भी इंकार भी (अंतिम भाग)

प्यार भी इंकार भी (अंतिम भाग)

"क्या प्यार का मतलब सिर्फ शादी ही है?"चारुलता ने प्रश्न किया था।
"प्यार को सामाजिक सम्मान प्रदान करने के लिए शादी का प्रावधान है।विवाह मर्द और औरत को प्यार करने की स्वतंत्रता प्रदान करता है।"देवेन बोला था।
"देवेन मै तुम्हारी बात से सहमत नही हूँ,"चारुलता बोली,"मै तुम्हे तहेदिल से प्यार करती हूं।मन से ही नही तन से भी तुम्हारी हो चुकी हूँ।अगर तुम अकेले रहना नही चाहते टी मै तुम्हारे साथ रहने के लिए भी तैयार हूँ।पर मै तुम्हारे साथ शादी के बंधन मे नही बंध सकती।"
"क्यो?"चारुलता की बात सुनकर देवेन आश्चर्य से बोला,"जब तुम मेरे साथ रहने के लिए तैयार हो,टी फिर मेरे से शादी से क्यो इनकार कर रही हो?"
"मै फिर से राघवन के पास लौट जाना चाहती हूँ।"उसके चेहरे पर ऐसे भाव थे मानो वह उसे  याद कर रही हो और उसकी आँखों मे उसे पा लेने की व्याकुलता हो।
साथ रहते रहते चारूलता देवेन को खुली किताब सी लगने लगी थी।पर आज फिर उसकी बातें सुनकर वह उसे रहस्यमयी औरत लगने लगी थी।उसकी बातें सुनकर देवेन बोला,"तुम राघवन को तलाक दे चुकी हो।तो फिर से उसके प्रति प्रेम क्यों?"
"मैने राघवन को तलाक दे दिया था।पर आज सोचती हूँ।मैने जल्दबाजी में ऐसा कदम उठाया था।तलाक के बाद न कभी मे उससे मिली हूँ।ना ही कभी फोन पर बात हुई।पर मै उसे भूली नही हूं।हमेशा मन ही मन मे मै भगवान से प्रार्थना करती हूं।कभी भी किसी औरत को शराबी पति मत देना।दोष राघवन का नही था।शराब का था,"चारुलता पुरानी यादों में डूबी हुई सी बोली,"राघवन अब बिल्कुल अकेला होगा।ऐसे मे उसे कौन सहारा देता होगा।कौन उसके कपड़े बदलता होगा?कौन उसे खाना खिलता होगा?कौन उसे समझाता होगा?एक ने एक दिन हर आदमी को अपनी गलती का ऐहसास जरूर होता है।उसे भी एक दिन अपने किये पर पछतावा जरूर होगा।तब उसे मेरी याद आएगी।और वह मुझे यहां वहां ढूंढता हुआ एक ने एक दिन मेरे पास जरूर आएगा।मुझसे माफी मांगेगा और मुझसे साथ चलने के लिए कहेगा।तब मैं क्या करूँगी?"
चारुलता के चेहरे पर अवसाद औऱ ख़ुशी के मिले जुले भाव उभर आये थे।नारी के त्याग और प्रेम के बारे मे बहुत सुना और पढ़ा था।पर आज साक्षात त्याग और प्रेम की मूर्ति उसके सामने बैठी थी।
देवेन, चारुलता की बात पर प्रतिकिर्या देना चाहता था।पर वह उसे रोकते हुए बोली,"देवेन तुम मुझे अपने इरादे से भटकाने का प्रयास मत करो।इस जन्म में मैं तुम्हारे साथ शादी नही कर सकती।लेकिन मैं तुमसे वादा करती हूँ अगले जन्म में तुम्हारे साथ ही सात फेरे लुंगी।राघवन के पास मे स्वंय नही जाऊंगी।राघवन आएगा ।मुझ से माफी मांगेगा तभी उसके साथ जाऊंगी।जब तक राघवन मेरे पास नही आता।तब तक बिना साथ फेरे लिए तुम्हारे साथ तुम्हारी पत्नी बनकर रहने के लिए तैयार हूँ।राघवन नही आता तब तक तुम मुझे अपनी पत्नी समझो।"
चारुलता का प्यार दो तरफ बंटा हुआ था।वह अतीत को भूलना नही चाहती थी और वर्तमान को भी अपने हाथ से फिसलने नही देना चाहती थी।वह देवेन को भी अपना बनाये रखना चाहती थी।और राघवन को भी भूलना नही चाहती थी।।
चारूलता की पीठ के पीछे अथाह जलराशि थी।समुद्र से गहरी उसकी काली कजरारी आंखे नज़र आ रही थी।
दोनो के बीच मौन छाया था।शायद बोलने के लिए अब कुछ शेष भी नही रहा था।

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