Varjit vyom me udati Stree - 1 in Hindi Novel Episodes by Ranjana Jaiswal books and stories PDF | वर्जित व्योम में उड़ती स्त्री - 1

वर्जित व्योम में उड़ती स्त्री - 1

यह उपन्यास डायरी विधा में लिखित एक स्त्री की दास्तान है। समाज ने स्त्रियों के लिए कुछ साँचे बना रखे हैं जैसे अच्छी माँ ....सुगढ़ गृहणी और फरमावदार बीबी, जो इन साँचों में फिट हो जाती है उसकी जिंदगी की गाड़ी आराम से चलती रहती है पर कुछ ऐसी भी होती हैं जो सिर्फ फिट होने को तैयार नहीं होतीं –वे अपने लिए अधिकार के साथ जगह चाहती हैं, उनकी दुर्दशा होती है । 

भाग एक –

जब भी मैं अपने जीवन के विषय में सोचती हूँ तो सारा अतीत दृष्टि के समक्ष प्रतिबिम्बित हो जाता है | कितनी बड़ी कीमत देनी पड़ी है मुझे आजादी की !बचपन में तो सोचा भी न था कि यह स्वतन्त्रता क्या चीज है? ये जरूर था कि कभी-कभी झुंझलाहट होती थी, जब घर से बाहर निकलने पर प्रतिबंध लगाया जाता था | जब माँ छोटे भाई या बहन को मेरी नन्ही पीठ पर लादकर मुझे बड़ी बना देती | उम्र बढ़ते ही स्कूल से घर तक की सीमा बना दी गयी और कूप- मंडूक की तरह ही मैंने उन्हीं आदर्शों को जीवन का मूल्य मान लिया, जो हमारी दादियाँ और नानियाँ मानती रही हैं | अल्पवयस में मस्तिष्क भी अपरिपक्व होता है, अपने कुछ विचार बन ही नहीं पाए, सब उधार लिया हुआ ही था | पतिव्रत, ई श्वर-पूजा, सहनशीलता और त्याग के उपदेश ज़ेहन पर इस तरह छाए हुए थे कि आँखों के समक्ष कोई रंग टिका ही नहीं | सच कहे तो मौका ही नहीं मिला और जब चिड़िया के पर निकलने ही लगे कि आदर्श और धर्म की दुहाई देकर उसे पिंजरे में बंद कर दिया गया । मुझे स्वतन्त्रता के बोध से पहले ही जंजीरों से जकड़ दिया गया और मैं इस जकड़न को आदर्श मानकर दूसरे के विचारों के अनुसार जीवन चलाती रही | पर एक दिन ये भ्रम टूट गया ...उफ, यह भी कोई जीवन है!मादा पशु की तरह ही स्त्री- जीवन है क्या ? मालिक के लिए जी-तोड़ मेहनत करो, तो मालिक खुश | शरीर सहलाएगा ...दाना-पानी देगा ...गहनों से सजाएगा भी और अगर कभी भले अस्वस्थता के कारण ही सही उसने मालिक की बात नहीं मानी तो चाबुक बरसाएगा ...चाबुक ...उफ!

मन में सोई स्वतन्त्रता की चाह जाग उठी | पछियों की चहचाहट...नीला आकाश...मंद-मदिर पवन मुझे पिंजरे की दीवारों को तोड़ने के लिए उकसाने लगे | अजीब कशमकश था -एक तरफ रक्त में बसे  संस्कार थे, दूसरी तरफ खुली हवा में सांस लेने की सुखद कल्पना | बहुतों को ये दोनों सुख एक साथ मिल जाते हैं पर मुझे तो एक मिलना था-एक ही चुनना था -और मैंने चुनी-स्वतन्त्रता!
पर यह कहाँ सोचा था कि मुझे स्वतन्त्रता की इतनी बड़ी कीमत देनी पड़ेगी | पिंजरे में एक मालिक के अत्याचारों से त्रस्त चिड़िया आकाश में चारों तरफ से एक चक्रव्यूह में फंस जाएगी | उसे नाना प्रलोभनों ...भुलावों ...उलझनों  और खतरों का सामना करना पड़ेगा | पग-पग पर अपमान, अवहेलना और घृणास्पद उपाधियों से अलंकृत होना पड़ेगा | स्वतन्त्रता को स्वच्छन्दता मानने वाले लोगों की भीड़ उसके इर्द-गिर्द चक्कर लगाएगी और उसके तिरस्कार से उसे बदनाम करेगी | सोचती हूँ क्या मालिक का कहना ही सत्य था कि वह उसे दाना-पानी और सुरक्षा देता है और खुले आकाश में यह सुरक्षा नहीं मिलेगी, जीना दूभर हो जाएगा, पर मन उसकी बातों से सहमत कहाँ होता था ! आज भी मैं अपनी उस पुरानी स्थिति में लौटना नहीं चाहूँगी क्योंकि सारे खतरों के बाद भी आजादी का अपना स्वाद है ...सुख है ...| दिन-भर की घुटन के बाद सायंकालीन शुद्ध हवा जीवन में उमंग भर देती है | मैं आजादी के समक्ष सारे सुखों को हेय समझती हूँ ।  ये आजादी....स्वछंदता नहीं है ऐसा मानने वालों का भरम शीघ्र टूट जाएगा क्योंकि स्वछंद तो सिर्फ पशु हो सकता है और मैं पशुवत जीवन से घृणा करती हूँ | 

किसी पुरूष से मेरी मित्रता घनिष्ठ रूप में नहीं हो पाती है | कारण, वही पुरुष का स्वार्थ ....मैं उनकी आँखों में वही भाव देखती हूँ जो मालिक की आँखों में होता था | ज्यादातर पुरूषों को स्त्री का कामिनी ....रमणी रूप ही भाता है । जो स्त्री को शोषित मानकर बड़े-बड़े भाषण देते हैं वे भी सुंदर स्त्री को मात्र भोग्या मानते हैं | मेरी स्वतन्त्रता स्त्री के कामिनी, रमणी, भोग्या ....इन संबोधनों से पृथक पहचान बनानी है ...पर इसकी कीमत देने की सामर्थ्य क्या हमेशा मेरे भीतर रहेगी ? क्या मेरी विजय हार मान लेने में है ? किसी बेरहम मालिक के पिंजरे में बंद होकर उसकी इच्छानुसार गीत गाने में है ? 

अक्सर लगता है मेरे लिए जीवन में कुछ शेष बचा ही नहीं | सब कुछ खाली-खाली सा लगता है | हर व्यक्ति स्वार्थी और चालाक लगता है | सबका प्यार दिखावटी लगता है | जिंदगी में इतना कुछ झेल चुकी हूँ कि लगता है कि अब कुछ अच्छा नहीं होगा| सम्बन्धों को इतने करीब से देखा है कि अब उनसे वितृष्णा होने लगी है | खुद को भुलाकर आस-पास के बच्चों के बीच बच्ची बनकर कुछ पल राहत पा लेती हूँ | कभी –कभी मुझे बच्ची कहकर कोई ‘बड़ा’ भी मुझसे प्यार कर बैठता है पर बदले में जब वह मुझमें स्त्री देखना शुरू करता है और मुझसे बड़ी-बड़ी अपेक्षाएँ रखने लगता है तो मैं उससे छिटक कर दूर जा खड़ी होती हूँ | फिर तो वह जरूरत से ज्यादा तनाव देता है | वह भूल जाता है कि मैंने उसे आमन्त्रित नहीं किया था | 

आखिर मैं कितना संभालूँ खुद को ...हर कदम पर ठोकर खाकर मैं टूट चुकी हूँ | कैसी है ये जिंदगी, जिसमें या तो व्यक्ति की आँखों में धूल झोंकी जाती है या वह व्यक्ति ही दूसरों की आँखों में धूल झोंकता है | 

धार्मिक पुस्तकें नसीहत देती हैं कि ‘लोग दुख-मुसीबतें नहीं देते| वे तो साधन -मात्र होते हैं | दुख –मुसीबत तो ईश्वर देता है | यदि तुम्हें यह लगता है कि कोई तुम्हारे सम्मुख दोषी है, तो तुम यह भूल जाओ और उसे क्षमा कर दो | हमें दंड देने का अधिकार नहीं है और तब तुम क्षमा करने के सुख को समझ जाओगी | ’

इस नसीहत पर कई बार अमल किया, पर शांति नहीं मिली| लगा ये सूक्तियाँ भी वे ही गढ़ते हैं जो खुद सुखी और हर दृष्टि से सम्पन्न हैं | 

जिंदगी को गौर से देख रही हूँ | यह मेरे बस में नहीं है | मेरी डोर उसके हाथ में है | जिधर चाहती है मुझे लेकर निकल जाती है | जो चाहे दिखा देती है, जो चाहे करवा लेती है | मेरे अपने ही गढ़े हुए आदर्श टूटते गए हैं | मेरी सारी अकड़ गायब हो गयी है | सोचती हूँ क्या ये वे ही आदर्श हैं, जिनके लिए मैं जीवन भर लड़ती रही | कितना कुछ खोया और अब अपने ही हाथों से उन्हें तोड़ रही हूँ या फिर टूटते देख रही हूँ | सही-गलत, पाप-पुण्य, नैतिकता-अनैतिकता सब घालमेल हो गए हैं | मन थिर नहीं होता, भटकता ही रहता है| जाने क्या चाहती हूँ ..? जाने क्या पाकर पूरी होऊँगी ? बार-बार रिश्तों को टटोलती हूँ कि कहीं कुछ है या नहीं | उत्तर सिर्फ शून्य !जाने क्यों लगता है कि मुझे कोई नहीं चाहता | अगर चाहता तो मैं खुद को इस कदर अकेली क्यों महसूस करती हूँ ? मित्रों से अक्सर पूछ बैठती हूँ कि वे मुझसे कितना प्रेम करते हैं ? प्रेम शब्द पर वे हँस देते हैं | उनकी हँसी साफ-साफ बता देती है कि उनका प्रेम अन्यत्र है | रात को कहीं जाने की अनिवार्यता होती है तो वे साथ चलने में आनाकानी करते हैं | मेरे साथ जाने में उन्हें सामाजिक भय लगता है | लगना भी चाहिए आखिर सबका अपना घर-परिवार है, समाज-संसार है | वे मेरी मित्रता के लिए सब कुछ तो छोड़ नहीं सकते ....जैसे मैं छोड़ देती हूँ | बड़ी ही खूबसूरती से लोग भीतर व बाहर के रिश्ते निभा लेते हैं और मैं पगली दुहरा जीवन नहीं जी पाती हूँ | अकेली अभिशप्त जीवन जी रही हूँ कोई तो नहीं है मेरे पास | अपनी मर्जी और सुविधा के अनुसार मित्र कभी -कभार मेरा अकेलापन बाँट लेते हैं, पर फिर वही सन्नाटा ...!वही चुभते अहसास !

इधर कुछ वर्षों से मेरे जीवन में क्रांति मची हुई है | सब कुछ उलट-पलट गया है | जिस चीज के लिए सर्वस्व दांव पर लगाती हूँ ...उसी को छोड़कर आगे बढ़ जाती हूँ । खुद ही...अपने आप ....| यह और बात है कि किसी भी रिश्ते की शुरूवात मैं नहीं करती, पर सब कुछ छोड़कर आगे बढ़ जाने का काम मैं ही करती हूँ और इसकी वजह यह है कि मैं खुद को इस्तेमाल होते नहीं देख सकती | प्रेम को कमजोरी मानकर लाभ लेने की कोशिश में लगे व्यक्ति के साथ मैं नहीं निभा सकती | 
पर किसी का जिंदगी से जाना मुझे भीतर ही भीतर तोड़ता भी है | इसीलिए मैं पूरी ताकत से किसी को अपने मन-संसार में आने से रोकती हूँ पर जब कोई आ जाता है तो पूरी कोशिश करती हूँ कि वह मेरा हो जाए, पर लाख कोशिशों के बाद भी मेरा कोई नहीं हो पाता | एक दिन ऐसा आता कि सब जाने की सोचने लगते हैं | मैं फिर कोशिश करती हूँ कि वे न जाएं, पर जब यह लगता है कि वे नहीं रूकेंगे तो खुद उन्हें बाहर का रास्ता दिखाकर मन के दरवाजे बंद कर लेती हूँ | पर बंद दरवाजे के भीतर घुटता मन ज्यों ही खुली हवा में सांस लेता है फिर किसी नए की दस्तक होती है ...और फिर वही सब कुछ एक बार फिर ....| कभी-कभी मन कसक उठता है यह सब बेहयाई लगता है, जिंदगी की जरूरत नहीं | 

मैं तो हमेशा से किसी एक की होकर जीना चाहती थी, किसी एक का सम्पूर्ण प्यार चाहती थी पर मुझे टुकड़े-टुकड़े में ही प्यार मिला| क्या यही मेरी नियति है ? तो क्या टुकड़े-टुकड़े जोड़कर पूर्ण होना गलत है ? जो मिल रहा है उसे अपनाना पाप है? मैं एकनिष्ठ आदर्श जीवन कैसे जी सकती थी ? क्या मैंने कोशिश नहीं की, पर पराजय और धोखे के सिवा क्या मिला ? 

मैं सामान्य स्त्री–सा जीवन जीना चाहती थी, पर इस व्यवस्था में न यह संभव था... न होगा | इस समाज में किसी  पुरुष के साथ न रहने वाली और पुरूषों के बीच उठने-बैठने वाली स्त्री विश्वसनीय नहीं मानी जाती है । जबकि एक –दो प्रतिशत ही पुरुष होंगे, जो पर-स्त्री गमन नहीं करते या करना नहीं चाहते | घर में पत्नी के होते हुए भी पराई स्त्री के लिए उनकी लार टपकती रहती है | जबकि परिस्थितियाँ और प्रेम की चाह ही किसी स्त्री को परपुरूष के पास ले जाती है, भोगेच्छा नहीं | फिर भी स्त्री गलत है ...पतिता है | 

आखिर क्यों मुझे किसी का साथ चाहिए ? मैं खुद क्यों नहीं अपने साथ रहती | समुद्र होकर भी नदियों के लिए बेचैन उछाले लेना कहाँ की समझदारी है ? 

‘तुम तो फ्री बर्ड हो’ फिर क्या चिंता !स्कूल की सिस्टर के इस कथन को सुनकर मैंने गौर से उनका चेहरा देखा | इस कथन में प्रशंसा है कि व्यंग्य, मैं नहीं समझ पाई | अक्सर मुझे इस तरह के कथनों से दो-चार होना पड़ता है | लोग मुझे आश्चर्य से देखते हैं, विशेषकर स्त्रियाँ | शायद इसलिए कि इस समाज में अकेली स्त्री की परिकल्पना स्वाभाविक बात नहीं है | स्वतंत्र स्त्री समाज के लिए खतरे का सिंबल मानी जाती है, जबकि ऐसा होता नहीं है, वह खुद ही तमाम तरह के खतरे झेलती है | फिर फ्री बर्ड बनना शायद ही किसी स्त्री की चाहत हो | स्त्री की शारीरिक, मानसिक बनावट कुछ इस तरह की होती है कि उसे भावनात्मक सहारे की जरूरत हमेशा बनी रहती है और यही उसे आसानी से नहीं मिलता | मिलता भी है तो उसे इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ती है | जब कोई स्त्री यह कीमत चुकाने को तैयार नहीं होती तो धीरे-धीरे अकेली होती जाती है | इसे यूं भी कह सकते हैं कि सामाजिक साजिश के तहत वह अकेली कर दी जाती है | 

मुझे भी ऐसी ही साजिश का शिकार होना पड़ा है, पर मैं इस साजिश से डरी नहीं | उसे चुनौती की तरह लिया | जीवन भर लड़ती रही, पर लड़ने की भी शायद एक उम्र होती है | अब पचास पार करने के बाद मैं बीमार पड़ने लगी हूँ | बीमार होने पर मुझे महसूस होता है कि अकेला होना कितना कष्टप्रद है | मुझे वह चिड़िया याद आती है जो युवा परों के सहारे आकाश नापती फिरती है पर ज्यों ही उसके पर कमजोर पड़ते हैं वह धरती पर आ गिरती है | कारण भी है कि उसे ऊंचाई पर लगातार बने रहने के लिए अपने परों का ज्यादा इस्तेमाल करना पड़ता है | उसे पता होता है कि शिकारी पक्षियों के साथ ही शिकारी मनुष्यों की नजर भी उस पर बनी हुई है कि उसके पर किसी भी कारण जरा-सा भी ढीले पड़े तो उसका अस्तित्व तक मिटा डालें | एक नन्ही चिड़िया का इतना हौसला उन्हें फूटी आँखों भी नहीं भाता | 

तो क्या मेरे लिए भी लोगों की यही सोच है ? क्या लोग मुझे हारा हुआ और पराजित देखना चाहते हैं ? पर क्यों ? मैंने क्या अपराध किया है? मेरे अकेले होने से किसी का क्या बिगड़ा है ? फिर सिर्फ मैं ही तो दूसरों की ज़िम्मेदारी से मुक्त नहीं रही, दूसरे भी तो मेरी ज़िम्मेदारी उठाने से बच गए | तो क्या रूढ़ि से मुक्ति चाहना ही मेरा अपराध था ? 

मैं समझ नहीं पाती कि क्यों इक्कीसवी सदी का यह समाज भी स्त्री की इच्छा, भावना, कल्पना और कार्य- दक्षता के साथ ही उसकी जीवनेच्छा को स्वीकार नहीं कर पा रहा है ? क्यों उसके लिए आज भी पारंपरिक विवाह ही आदर्श बना हुआ है ? पारंपरिक विवाह यानि जाति और ज्योतिषीय गणनाओं के आधार पर हुआ विवाह| एक तरफ इतना आदर्श, दूसरी तरह इसी समाज में एक और समाज है जो स्त्री को पण्य- वस्तु मान रहा है जिसे खरीदा, भोगा तथा फेंका जा सकता है | दोनों समाजों में स्त्री मनुष्य की गरिमा से वंचित रह जाती है | मनुष्य की इसी गरिमा को पाने के लिए ही तो मैं संघर्ष करती रही हूँ | 

पर इस बात को कौन समझ पा रहा है ? मैं न परंपरा की देवी बन सकी, न आधुनिकता की वस्तु क्या इसलिए मैं अजूबा हूँ? 'फ्री बर्ड' कहकर जिसका उपहास किया जा सकता है | 
मुझे खाए-पिए और अघाए लोगों की क्रांतिकारी बौद्धिक जुगालियों में गहरा अविश्वास है | मैं नहीं समझ पाती कि मुश्किलों व संघर्षों से असंग लोग क्रांतिकारी कैसे हो सकते हैं ? मैं छलिया व्यवस्था द्वारा पोषित हर परंपरा, सभ्यता, सुरूचि, शालीनता और भद्रता की ऐसी-तैसी करने को आक्रामक रही हूँ शायद इसीलिए किसी के साथ मेरा घर न बन सका | 

भाई बहनों के घर में भी मुझे अपनेपन की गंध नहीं आती | 

आज कुछ कविताएँ लिखी मन को शांति मिली तो क्या यही मेरे दुखों से निजात का सही रास्ता है ? 
मैंने स्वतंत्र जीवन में एक दुर्बलता पाई थी जो मुझे सदैव आंदोलित करती रहती थी, सदैव अस्थिर रखती थी | मेरा मन जैसे कोई आश्रय खोजा करता था, जिसके बल पर टिक सके | अपने में मुझे वह शक्ति नहीं मिलती थी | रूप, बुद्धि और चरित्र की शक्ति देखकर मैं उसकी तरफ लालायित होकर जाती थी | पानी की भांति हर एक पात्र का रूप धारण कर लेती थी मेरा अपना कोई रूप ना था | 
जिसे भी चाहती थी उसका प्रेम और विश्वास पाने के लिए खुद को मिटा डालती थी पर अंत में शून्य ही हाथ आता था | मैं खुद को खोकर भी किसी को नहीं पा सकी | 

मेरी तकलीफ की वजह यह थी कि मैं चाहती थी कि मुझ पर विश्वास किया जाए पर यह कैसे संभव था ? मैं एक साधारण स्त्री तो थी नहीं, न मेरे जीवन की परिस्थितियाँ ही सामान्य थीं, फिर क्यों ये समाज मुझे सामान्य रूप में स्वीकारता या सम्मान देता ? मेरे भीतर कोई क्यों झांकता ? किसे समय था ? किसे प्रेम था मुझसे ? फिर मैं क्यों मरी जा रही थी ऐसी दुनिया के लिए ? ऐसे लोगों से ही क्यों प्रेम था मुझे, जिन्हें मेरी परवाह नहीं थी, जो मेरे जज्बों से खेलते थे | मेरी तकलीफ नहीं समझते थे | मेरा मनचाहा इस्तेमाल करना चाहते थे | मैंने उन्हें क्यों इतना अधिकार दे रखा था कि वे मेरे बारे में फैसला ले सकें ?   

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Suresh

Suresh 10 months ago