Saral Nahi tha Yah Kam - 2 in Hindi Poems by डॉ स्वतन्त्र कुमार सक्सैना books and stories PDF | सरल नहीं था यह काम - 2

सरल नहीं था यह काम - 2

सरल नहीं था यह काम 2

काव्‍य संग्रह

स्‍वतंत्र कुमार सक्‍सेना

11 अम्बेडकर

दलितों में बनके रोशनी आया अम्‍बेडकर

गौतम ही उतरे जैसे लगता नया वेश ध्‍र

नफरत थी उपेक्षा थी थे अपमान भरे दंश

लड़ता अकेला भीम था थे हर तरफ विषधर

सपने में जो न सोचा था सच करके दिखाया

हम सबको चलाया है उसने नई राह पर

ये कारवॉं जो चल पड़ा रोका न जाएगा

नई मंजिलों की ओर है मंजिल को पारकर

हर जुल्‍म पर हर जब पर सदियों से है भारी

गौतम का है पैगाम ये रखना सहेज कर

मनु को पलट कर तू ने दी एक नई व्‍यवस्‍था

शोषित को न देखें कोई ऑंखें तरेर कर

भारत का कोहिनूर तू गुदड़ी का लाल है।

समता का उगा सूर्य अंधेरे की बेधकर

12 झरोखे पर

बाल खोले झरोखे पर देखा तुम्‍हें

चांदनी रात होने का भ्रम हो गया

मस्‍त नजरें तुम्‍हारी जो क्षण को मिलीं

जाम पर जाम लगता था कई पी गया

बहके मेरे कदम भूल मंजिल गई

ऑंखें मुँद सी गईं सांस थम सी गईं

शब्‍द विस्‍मृत हुए वाणी थम सी गई

तुम ही तुम रह गए और मैं खो गया

धड़कने दिल की न मेरे बस में रहीं

चेतना ही न जाने कहॉं खो गई

ऑंखों ने ऑंखों से कितनी बातें कहीं

भूले सपनों का फिर से जनम हो गया

चॉंदनी रात ...................

दूर धरती कहीं पर गगन से मिले ,

गंध कोई बासंती पवन में घुले

रंग जैसे ऊषा की किरण में खिले

नेह का आस्‍था से मिलन हो गया

चाँदनी रात .............

जेठ में उमड़ी कोई घटा हो घिरी

तप्‍त धरती पर अमृत की बूँदे गिरी

आँखें जैसी मेरी बन गई अंजुरी

सारी तृष्‍णा का ही तो शमन हो गया

चॉंदनी रात होने का ...............

13 अर्जुन तुम गांडीव उठाओं

अर्जुन तुम गांडीव उठाओं

तेरे तीर लक्ष्‍य बेधेंगे

जो सिंहासन थामे बैठे

वे क्षण में धरती सूघेंगे

रूचि ही जब विकृत हो जाए

अनाचार स्‍वीकृत हो जाए

पक्षपात ही न्‍याय बने जब

निंदा ही स्‍तुति हो जाए

है अधर्म तब मौन धरना

ऐसे में तुम शंख बजाओ

अर्जुन तुम गांडीव उठाओ

भारत के सब जन उत्‍पीडि़त

नव युवकों के मन हैं कुंठित

सच्‍चे जन सारे ही वंचित

भारत रह न जाए लुंचित

है अधर्म तब कदम रोकना

ऐसे में तुम शौर्य दिखाओ

अर्जुन तुम गांडीव उठाओ

निर्धन अब करते हैं क्रंदन

छाया ओं का भय प्रद नर्तन

मुक्ति मंत्र या दासता बंधन

जयकारा मिश्रित है चिंतन

है अधर्म शुभ शकुन सोचना

ऐसे में तुम भुजा उठाओं

अर्जुन तुम गांडीव उठाओ

14 देश की अस्मिता

देश की अस्मिता रख दी गई है गिरवी

हम पर थोप दी गई है

फिर एक बार गोरों की मर्जी

कब तक चलेगी ये व्‍यवस्‍था फर्जी

पतन के कहा जा रहा है उत्‍कर्ष

घृणित षणयंत्रों को कह रहे हैं संघर्ष

किसी को कोई भ्राँति नहीं है

ये और कुछ हो सकता है

क्रान्ति नहीं है

सेठों का धन

भ्रष्‍टाचारी मन

और गुंडों के बल पर

बटोरे वोट

बार बार करते हैं जनतंत्र पर चोट

तुम्‍हारी आस्‍था है प्रभुओं की भकित में

नहीं है विश्‍वास जनता की शक्ति में

बदलो अपना मन

छोड़ो यह झूठे भाषण

बहुत दे चुके आश्‍वासन

सिर्फ चमचों को ही नहीं

, हमें भी दिलवाओ रोजगार

जुगाड़ पाये शाम तक राशन

अब तो धैर्य खो रहे हैं।

भारत के जन

15 प्रिये ओठ खोले

तुमने अपने हैं जो बाल खोले प्रिये

नाव के जैसे हैं पाल खोले प्रिये

ओठ कितने जतन से भले सी रखो

नैनों ने मन के हैं हाल खोले प्रिये

बात इनकार से पहुंची स्‍वीकार तक

कंगनों ने मधुर ताल बोले प्रिये

गात में यू बासंती पुलक भर गई

मुस्‍करा कर मधुर बोल बोले प्रिये

साथ को क्षण मिला और सुधि खो गई

सांस की तेज पतवार होली प्रिये

कान में कोई रस आज घोले प्रिये

प्राण में कोई मधुमास डोले प्रिये

16 चक्रेश कह गये

लड़ते रहो थको नहीं चक्रेश कह गये

अड़ते रहो मुझको नहीं चक्रेष कह गये

उद्भूत अभावों से ही होने सृजन को भाव

शाश्‍वत रची चुको नहीं चक्रेश कह गये

अपमान उपेक्षा घृणा है सत्‍य के उपहार

दृढ़ रहो बिको नहीं चक्रेश कह गये

रूकना है मौत चलने को कहते हैं जिन्‍दगी

बढ़ते चलो रूको नहीं चक्रेश कह गये

घुटता है दम संडाघ के माहौल में जहॉं

आत हमें यकीं नहीं चक्रेश रह गये

17 हम हैं छोटे छोटे अफसर

हम हैं छोटे छोटे अफसर

इतनी कृपा करो हे प्रभुवर

वेतन चाहे हो जैसा भी

कम न हो रिश्‍वत के अवसर

काम नहीं कुछ हमको आता

कुछ काला पीला हो जाता

खूब दबाते हैं सब मिलकर

फिर भी घोटाला खुल जाता

चुप हो जावें सब ले दे कर

इतनी कृपा करो हे प्रभुवर

इनकम वाला मिले इलाका

मनचाहा हम डालें डांका

कोई लौट न पाए सूखा

लूटें हम जनता को जमकर

इतनी कृपा करो हे प्रभुवर

भारी रकम बजट की आए

गाड़ी अमला रूतबा छाए

पूंछताछ बिल्‍कुल न होवे

झुले सच्‍चे बिल बनवाकर

सारा साफ करें हम डटकर

मक्‍खन दम भर खूब लगाते

दारू से उसको नहलाते

तंदूरी मुर्गा बिछवाते

जो बतलाते वह सब करते

कैसा भी हो अडि्यल टट्टू

मक्‍खन हो जाए सा पिघलकर

हर चुनाव में देते चंदा

चमचों को करवातें धंधा

दुश्‍मन पर कस देते फंदा

घेरा ऐसा पक्‍का होवे

कोई बच न जाए निकलकर

18 रहना है गर गांव में सुख से

रहना है गर गॉंव में सुख से दाऊ का हुक्‍का भर

पंडित जी को पालागन कर अरे राम से डर

सोंमपान करके जब मालिक जूते दे सर पर

पूर्व जन्‍म के भोग भोग ले मन में धीरज धर

रिक्‍शा खींचे भरी दोपहरी डबल सवारी भर

जो दे दें चुपके से ले ले मत तू चख चख कर

धरती के देवता पंडित जी दाऊ खुद प्रभुवर

छोड़ मजूरी की चिंता तू उनकी सेवा कर

बच्‍चे तेरे नंगे घूमें उजड़ा हो छप्‍पर

धरती पर भूखा हो लेकिन स्‍वर्ग की चिंताकर

छोड़ सुरक्षित घरवाली को दाऊ के खेतों पर

चैन की वंशी बजा नदी पर भैंसें घेराकर

ऊंची ऊंची डिग्री पढ़कर फिर तेरा ये सर

धन की चिंता मत कर बन्‍दे प्रभु का सुमिरन कर

पुडि़या खा दारू पी नेताओं की संगत कर

सर फूटे पर धर्म बढ़े कुछ जुगत न भिड़ाया कर

सुबह भागवत शाम रामायण सुन तु सीखा कर

हाड़ तोड़ तू मेहनत कर मत फल की चिंता कर

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soham brahmbhatt

soham brahmbhatt Matrubharti Verified 10 months ago