badri vishal sabke hain - 9 in Hindi Novel Episodes by डॉ स्वतन्त्र कुमार सक्सैना books and stories PDF | बद्री विशाल सबके हैं - 9

बद्री विशाल सबके हैं - 9

बद्री विशाल सबके हैं9

स्‍वतंत्र कुमार सक्‍सेना

आज कम्‍पाउंडर पाठक जी के यहां पंडा जी का न्‍योता था । सही समय पर पंडा जी, धीरू ,बिब्‍बो निखिल, और भी कई आमंत्रित लोग पहुंच गए यह आयोजन असल में डा. अहमद साहब की तरफ से था ।नईमा की नानी की इच्‍छा थी पंडा जी आए हैं तो उनका भोजन हम करवाएं । सारा खर्चा उन्‍हीं ने किया ।भोजन के उपरांत अहमद साहब आ गए। वे दूर खड़े रहे ,जब पता लगा भोजन हो गया सब ने हाथ धो लिए कुल्‍ला कर लिया तब पास आए वे इलायची एक प्‍लेट में रख कर दे रहे थे। सब ब्राम्‍हणों को दक्षिणा पाठक जी के बताए अनुसार देने लगे ।जब वे पंडा जी को देने आगे बढ़े तो पंडा जी ने रोक कर कहा-‘ डाक्‍टर साहब! ऐसा रिवाज है कि दक्षिणा में कुछ मांगा भी जा सकता है ।’

डाक्‍टर साहब एकदम सकपका गए बोले –‘हां हां मांगें मैं दे सका तो दूंगा ।’

वहीं पर नईमा ,डाक्‍टर श्रीमती शैलजा अहमद, उनकी नानी भी थीं पटेल साहब, धीरू ,बिब्‍बो,निखिल , और बहुत से आमत्रित थे । पंडा जी बोले –‘ आप दे सकते हैं ,मैं आपसे कन्‍या मांगता हूं, निखिल के लिए नईमा का हाथ, कोई जबर दस्‍ती नहीं ,कोई दबाव नहीं, सोच लें विचार कर लें, तब जबाव दें।’ नईमा की ओर देख कर बोले –‘ नईमा बेटे! हमने आप की शर्त पूरी कर दी आप की हर बात मजूंर।‘

पटेल साहब बोले –‘ निखिल ने आप से बात कर ली? पंडा जी –‘ निखिल की क्‍या हिम्‍मत मुझसे इस बारे में बात करे वो तो महीने भर धीरू लगा रहता था अपनी नईमा बाजी की बात करने वो इतनी अच्‍छी है यह गुण है वह गुण है मैं समझ गया। उसने मुझे आपके चुनाव कार्यालय में बढि़या कमरा दिलाया फाइव स्‍टा र होटल जैसी व्‍यवस्‍था थी दिन को तो जगह जगह खाता था रात्रि भोजन का जिम्‍मा धीरू का था नहाने कपड़े धोने प्रेस सबकी व्‍यवस्‍था थी रोज वही निखिल का निवेदन करता रहता था ।’शास्‍त्र का वचन है कि अनचाही लड़की से शादी जीवन को नरक बना देती है ।सारे जीवन जिससे विवाह नहीं कर पाते टीस सी उठती रहती है ।तो निखिल जिससे चाहता है उससे करे। मैं तैयार ,आप सोच लें ,जो परेशानी आएगी निपटेंगे, बाप बेटे दोनों।’

वे मुस्‍कराए पटेल साहब व साजिद भाई ठठा कर हंस पड़े । -‘मेरे पर ये बात न आए पिता जी ने नहीं होने दी ।’

भगवान बद्रीनाथ जी की कृपा है शादी में कोई मांग नहीं शादी धूमधाम से हो इस रिवाज से हो व उस रिवाज से हो ऐसी बारात आएगी वैसी बारात होगी ऐसी कोई शर्त नहीं।हां बिना डाक्‍टर साहब, डॉक्‍टर साहिबा, नानी जी, साजिद वकील साहब की परमीशन के शादी नहीं होगी । सारे मंत्र मैं पढ़ लेता हूं उनका अर्थ कंठस्‍थ है ।’मेरे लिये कन्‍या ही लक्ष्‍मी है ।‘

चुनाव की रैली निकल चुकी थी ।संध्‍या को सभा के द्धारा धन्‍यवाद ज्ञापित किया जा चुका था ।सारे कार्यकर्ताओं का धन्‍यवाद किया गया कुछ का मंच पर सम्‍मान किया गया अब बाहर से आए चुनाव के समर्थक कार्यकर्ता गण वापिस जा रहे थे। पंडा जी, बिब्‍बो, धीरू, सुजान ,निखिल और कई लोगों के साथ रेलवे प्‍लेटफॉर्म पर बैठे थे।इसी समय पाठक जी, डा.अहमद ,साजिद वकील साहब उनके अब्‍बा स्‍टेशन पर आए । वे सब सीधे पंडा जी के पास पहुंचे । अब्‍बा पंडा जी के करीब आकर उनसे बोले –‘मैं माफी ख्‍वार हूं ।‘ असल में डाक्‍टर आपके प्रस्‍ताव पर विचार नहीं कर पा रहा था। तब साजिद ने मेरे बड़े भाई से पूंछा-‘ बड़े भाई ने मेरे को हुक्‍म दिया जाओ जाकर बात करो , मैं आज सबेरे ही दौड़ा आया, असल में हमारे यहां गैर मुस्लिम बहुएं तो जमाने से हैं ,मेरी दादी खुद ब्राह्मण थीं वे एक बाल विधवा थीं दादा जान ने उन्‍हें निकाह में ले लिया ,अभी मेरे परिवार में दो तीन बहुएं गैर मुसलमान हैं, पर हमारे परिवार में कोई दमाद या बहिनोई गैर मुसलमान नहीं है ।इस पर रोक है ।मेरे बड़े भाई ने कहा-‘ इक तरफा रेल क्‍यों जाओ रिश्‍ता करो ।‘हां भाभी तो गरम हो रहीं थी-‘ कि पठानों में क्‍या सारे लड़के मर गए हैं, जो बाम्‍हनों में रिश्‍ता किया जा रहा है, लड़की पगला गई ,तो सारे मर्द ही पगला गए ?’

तो भाई जान के हुक्‍म पर मैं दौड़ा आया ।फिर हमें पता नहीं था रस्‍म में क्‍या करना है। जल्‍दी से पाठक जी को पकड़ा तो उन्‍होंने कहा-‘ सगाई तो नहीं हो सकती, लड़का पक्‍का कर सकते हैं ,तो मैं आ गया यहीं जल्‍दी से करे लेते हैं ,आप इजाजत दें तो ?’,

पंडा जी मुस्‍कराए –‘ हां आप कर सकते हैं ,वैसे तो आपकी स्‍वीकृति ही पर्याप्‍त है, पर आप करना चाहते हैं ,तो शुभ कर्म में रोड़ा नहीं बनूंगा ,अब वह आपका भी बच्‍चा है ।

पाठक जी ने मंत्र पढ़ते हुए अब्‍बा जी से कहा-‘ आप निखिल को हल्‍दी चावल लगा कर टीका करें ।‘

वे फूलों की माला लाए थे उसे डा.अहमद साहब ने पहिनाई । धीरू को बुलाया गया उन्‍होंने निखिल को पान खिलाया गले मिले । साजिद वकील साहब ने पंडा जी को सिल्‍क का कुर्ता का कपड़ा व धोती दी जो उन्‍हे पाठक जी ने दी थी निखिल को पेंट -शर्ट का कपड़ा दिया । पंडा जी को एक सिल्‍क की बंगाली साड़ी श्रीमती जी को देने को दी ।अब्‍बा जी ने पांच चांदी के विक्‍टोरिया के सिक्‍के दिए । डा. अहमद पंडा जी के पैर छूने को बढ़े तो उन्‍होने गले लगा लिया अब्‍बा जी साजिद भाई सभी गले लगे पटेल साहब दूर खड़े थे तो पंडा जी आगे बढ़ कर पटेल साहब से गले मिलना चाहा तो पटेल साहब ने झुक कर उनके चरण स्‍पर्श करना चाहे पर पंडा जी ने गले लगा लिया पर पाठक जी आगे बढ़ कर पंडा जी के पैर छू लिए आप हमारे पुरोहित हैं तीर्थ पुरोहित मैं तो पैर ही छूउंगा तब तक ट्रेन आ गई सबको ट्रेन में बिठाया गया ट्रेन चली तो पूरे प्‍लेट फॉर्म पर जोर से जयकारा गूंजा

भगवान बद्री विशाल की जय

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