Such Was My Bauji - (Last Part) in Hindi Social Stories by Saroj Verma books and stories PDF | ऐसे थे मेरे बाऊजी - (अन्तिम भाग)

ऐसे थे मेरे बाऊजी - (अन्तिम भाग)

इधर ब्याह की तैयारियाँ हो रही थीं और उधर दुर्गेश की आत्मा प्रयागी के लिए तड़प रही थी,ज्यों ज्यों ब्याह की तिथि नजदीक आती जा रही थी दुर्गेशप्रताप का दिल डूबता जा रहा था,आखिरकार ब्याह का दिन आ ही पहुँचा और उसने गैर मन से हल्दी और तेल चढ़वाया मण्डप वाले दिन,मायने वाले दिन भोज हुआ और फिर तीसरे दिन बारात चल पड़ी अपनी अपनी बैलगाड़ियों में और ट्रैक्टरों में क्योकिं लड़की नजदीक के गाँव की थी उसका गाँव यही कोई सोलह सत्रह किलोमीटर ही दूर था उसके गाँव से ....
बुझे मन से दुर्गेश ने फेरे पड़वाएं,सब नेगचार के बाद बारात भी विदा होकर बहु को लेकर द्वार पर आ पहुँची,दुर्गेश के मन मे कोई उत्साह ही नहीं था ब्याह का, इसलिए उसने फेरों के वक्त दुल्हन का मुखड़ा भी देखने की कोशिश ना की,बस मुँह लटकाए बैठा रहा पूरे ब्याह भर।
दुल्हन का निहारन हुआ,द्वार पर हल्दी की हथेलियाँ लगवाई गई बहु से और दुर्गेश से,फिर बहु को अन्दर ले जाकर और भी नेगचार पूरे किए जाने लगे और उधर दुर्गेश मुँह बनाकर बैठा रहा,फिर दुर्गेश की मधुचन्द्ररात्रि की बेला आ पहुँची,दुल्हन को सजा-धजा कर सेज पर बैठा दिया।।
मुहल्ले की भाभियाँ दुर्गेशप्रताप को भीतर लें गई और द्वार बंद कर दिए,दुल्हन ऐसे ही सेज पर बैठी रही,दुर्गेश उसके पास पहुँचा तो दुल्हन ने उसके चरणस्पर्श कर लिए,दुर्गेशप्रताप बोला.....
रहने दो...रहने दो ये सब मत करो।।
क्यों ना करूँ? आप मेरे पति जो हैं,दुल्हन बोली।।
मैं तुमसे कुछ कहना चाहता हूँ,दुर्गेशप्रताप बोला।।
जी कहिए,दुल्हन बोली,
मैं किसी और को चाहता हूँ,ये ब्याह मेरी पसंद से नहीं हुआ,मुझे माँफ कर देना,दुर्गेश दुल्हन की ओर पीठ करके बोला।।
तो आप किसे चाहते हैं ? वो सिंघाड़पाव वाली को,दुल्हन ने अपना घूँघट उठाते हुए कहा....
तुम कैसे जानती हो उसे?इतना कहकर दुर्गेश ने पलटकर दुल्हन का चेहरा देखा तो बस देखता ही रह गया और खुशी से उछलते हुए बोला...
प्रयागी तुम! मेरा शादी करने का मन नहीं था तो मैने किसी से तुम्हारा नाम तक जानने की कोशिश नहीं की,नहीं तो मुझे पहले ही पता चल जाता,
मै ने ब्याह के समय तुम्हारा चेहरा देखा तो निहाल हो गई,फिर वो बोली...
हाँ! हमारे कार्ड भी तो नहीं छपे जो तुम्हारा नाम पता चल जाता,
हाँ! मेरे बाबूजी कहते हैं कि ये तो नया चलन है,सब ढ़ोग-धतूरे हैं,निमंत्रण तो हल्दी चावल का ही माना जाता है,दुर्गेश बोला।।
और मेरे यहाँ भी यही चलता है,प्रयागी बोली।।
बहुत तरसाया तुमने,कहाँ कहाँ नहीं ढूढ़ा तुम्हें,मेरा प्यार सच्चा था इसलिए तुम खुदबखुद मेरी झोली में आ गिरी,दुर्गेश बोला।।
तुम्हारा बस नहीं ,हमारा प्यार बोलो,प्रयागी बोली।।
तो क्या तुम भी ....दुर्गेश ने पूछा।।
हाँ ! उसी दिन से,प्रयागी बोली।।
तो फिर दूर क्यों खड़ी हो,कब तक तरसाओगी? दुर्गेश बोला।।
और प्रयागी फौरन ही दुर्गेश के गले लग गई....
इसी तरह दोनों की गृहस्थी की गाड़ी चल पड़ी,समय अपनी गति से बढ़ रहा था और साथ साथ सबकी जिन्दगियाँ भी तभी एक रोज खबर आई कि दुर्गेश की सबसे छोटी बहन कुसुम के पति नहीं रहें,उन्हें साँप ने डस लिया था।।
जवान लड़की के विधवा हो जाने से तो जैसे पूरे घर पर पहाड़ सा टूट पड़ा,माँ की छाती फट गई और बाप की रातों की नींद उड़ गई,इसी ग़म में अष्टभुजा सिंह बीमार रहने लगें,उन्हें बेटी का सोच खाएं जाता,तब दुर्गेश ने निर्णय लिया कि कुसुम जीजी हमारे पास आकर रहेगी,वहाँ ससुराल में किसी की नौकरानी बनकर नहीं रहेगी...
पागल हो गया है क्या तू? ये कैसा अनर्थ करने जा रहा है तू,शादी के बाद ससुराल ही बेटी का घर होता है,अष्टभुजा सिंह बोले।।
ये किस जमाने की बात कर रहे हैं आप बाबूजी! वो वहाँ हरगिज़ नहीं रहेगी,मैं उसे वहाँ घुट घुटकर मरने नहीं दूँगा,यहाँ लाकर रहूँगा,जिससे जो बनता है सो कर के दिखाएं,दुर्गेश बोला।।
ये सही नहीं कर रहा है तू,फिर से अष्टभुजा सिंह दहाड़े।।
मैं करके रहूँगा,दुर्गेश बोला।।
मैं ये होने नहीं दूँगा,चाहे मुझे जान ही क्यों ना देनी पड़े?अष्टभुजा सिंह बोले।।
अरे,छोड़ो भी ना! क्यो उलझते हो जवान बच्चे से,चन्द्रकला बोली।।
ये बच्चा है! इसे तुम बच्चा कहती हो,देखो कैसे मुँह लग रहा है मेरे,बड़ों का कोई लिहाज नहीं है इसे,मेरे खिलाफ जाने की कोशिश कर रहा है,अष्टभुजा सिंह बोले...
तो क्या करूँ? सब सह लूँ,कुसुम जीजी को मरने के लिए छोड़ दूँ,ये इतना बड़ा घर ,रूपया पैसा सबकुछ मेरे बस का नही है उन सब बहनों का भी इन पर अधिकार है,आपने केवल मुझे बस जन्म नहीं दिया उन्हें भी दिया है,दुर्गेश बोला।।
जा !जो करना है कर,कुछ हो गया तो फिर मुझे मत कहना, अष्टभुजा सिंह जी बोले।।
बेटा चार लोंग क्या कहेगें? कुछ तो सोच,चन्द्रकला बोली।।
तो फिर उन चार लोगों से कह दीजिए कि मेरे जीजा को जिन्दा कर दें तो मान लूँगा उन चार लोंगों की बात,दुर्गेश बोला।।
क्यों समझा रही हो इस मूरख को? कुछ नहीं समझने वाला ये,अष्टभुजा सिंह बोले।।
क्यों समझूँ? मेरी बहन की जिन्दगी का सवाल है,दुर्गेश बोला।।
और फिर दुर्गेश ने किसी की नहीं सुनी,केवल उसका साथ प्रयागी ने दिया,कुसुम को वो ससुराल से ले आया और शहर ले जाकर एक विदुर मास्टर से उसका ब्याह करा दिया,उसकी पत्नी भी बच्चे को जन्म देते समय इस दुनिया से चल बसी थी,उसके पास बेटा था और कुसुम के पास बेटी,परिवार पूरा हो चुका था।।।
गाँव के लोगों ने दो चार दिन बातें की फिर सब भूल गए।।
दुर्गेश ने स्नातक किया फिर आगें की पढ़ाई छोड़ दी क्योंकि अब अष्टभुजा सिंह जी की उम्र हो चुकी थी इसलिए खेतों के काम सम्भालने में उन्हें दिक्कत होने लगी थी,उनका साथ देने के लिए दुर्गेश ने पढ़ाई छोड़ दी...
दिन गुजरते रहें प्रयागी के पैर भारी हुए ,सबके मन में खुशी की लहर दौड़ गई,कुछ महीनों बाद प्रयागी ने प्यारी सी बेटी को जन्म दिया,सबके मुँह बन गए,ये सब देखकर प्रयागी रो पड़ी,लेकिन दुर्गेश बहुत खुश हुआ बोला....
मेरी नन्ही परी है,मैं तो बहुत खुश हूँ तेरे आने से,दुर्गेशप्रताप ने उसका नाम ओजस्विनी रखा,आखिरकार धीरे धीरे सबने ओजस्विनी को अपना ही लिया क्योंकि इस मामले में दुर्गेश जो सख्त हो गया था ,सबसे कहा कि मैं कुछ भी ना सुनूँ अपनी बेटी के बारें में,अगर कुछ सुनाई दिया तो बहुत बुरा होगा सबके लिए..
दिन बीते,महीने बीते फिर दो साल भी पंख लगाकर उड़ गए,ओजस्विनी अब दो साल की होने को आई थी तो प्रयागी ने एक बेटे को जन्म दिया और उसका नाम तेजप्रकाश रखा गया,तेजप्रकाश के जन्म के दो साल बाद प्रयागी ने फिर से एक बेटे को जन्म दिया ,उसका नाम वेदप्रकाश रख दिया गया।।
अब चन्द्रकला ज्यादातर बीमार रहने लगी थी और सबसे बोलती कि अब पोते का मुँह तो देख ही लिया है,अब कोई इच्छा बाकी नहीं रह गई है,ईश्वर अब उठा ले तो ग़म ना होगा।।
और यही हुआ लम्बी बीमारी के बाद चन्दद्रकला ने स्वर्ग की राह देख ली,अब अष्टभुजा जी अकेले रह गए,चन्द्रकला के बिना उन्हे सब सूना सूना सा लगता अब उनका दुख बाँटने वाला कोई ना रह गया था,कभी कभी चौपाल में जाकर लोंगों के साथ हुक्का गुड़गुडा़ आते।।
लेकिन वो अन्दर ही स्वयं को अकेला समझ रहे थे,उनकी जिन्दगी में चन्द्रकला के जाने से जो रिक्तता आई थी ,उसे शायद कोई भी नहीं भर सकता था और एक दिन रात को सोएं तो फिर सुबह उठ ना सकें।।
अब दुर्गेश भी स्वयं को अकेला समझ रहा था,उसके सिर से बाप और माँ दोनों का हाथ उठ गया था
अब खेत और घर की जिम्मेदारी उसके सिर पर आ चुकी थी,वो हालातों का सामना करने लगा,रात रात भर खेतों को ताकने के लिए वहीं पड़ा रहता,तेजप्रकाश अपने पिता को रात में खेतों में ही खाना पहुँचा आता।।
चैत्र माह चल रहा था,गेहूँ की फसल पककर सुनहरी हो रही थी,कहीं कहीं फसल हरी थी,इसलिए अभी दुर्गेश ने मजदूरों को फसल काटने का आदेश नहीं दिया था,लेकिन तभी एक रात उसके खेतों में कुछ लोगों ने आग लगा दी,चूँकि दुर्गेश हमेशा सच का साथ देता था इसलिए उसके कई दुश्मन पैदा हो गए थे,दुर्गेश जाग रहा था और जैसे ही उसने खेत में आग देखी तो उस ओर अपनी लाठी समेत भागा जोकि वो अपने पास हमेशा रखता था।।
उसने आग लगाने वालों को दूर से देखा और भागकर पकड़ लिया,वो इस उम्र मे भी पाँच सेर दूध पी जाता था,ढ़ाई सुबह और ढ़ाई शाम को,वे सात-आठ लठैत थे, दुर्गेश ने जो अपनी लाठी भाँजनी शुरु की तो सारे लठैत चित्त हो गए तब तक और लोंग भी आ पहुँचे कुछ ने उन्हें पकड़ा और कुछ वहीं खेतों पर बने कुएँ से पानी निकालकर आग में पानी डालकर आग बुझाने लगें आग पर कुछ देर में काबू पा लिया गया,नुकसान तो हुआ था लेकिन उतना नहीं हो पाया था।।
बस जिन्दगी ऐसे ही चल रही थी अब दुर्गेश के सभी बच्चे बड़े हो रहे थे,सबकी साथ साथ पढ़ाई भी चल रही थी,अब बड़ी बेटी अठारह की होने को आई थी,तब प्रयागी ने दुर्गेश से कहा कि ...
कुछ सोचा है तुमने आगें के बारें में,बिटिया सयानी हो रही है,कहीं घर और वर ढूढ़ना शुरु कर दो.....
सोच तो मैं भी यही रहा था,दुर्गेश बोला।।
सोच रही हूँ कि कुछ पुराने जेवरों में से ओजस्विनी के लिए गहनें बनवा लूँ,एक साथ ब्याह की तैयारी करेंगें तो फिर नहीं हो पाएगा...
जैसा तुम ठीक समझो ,मैं हमेशा तुम्हारे साथ हूँ,दुर्गेश बोला...
दोनों पति-पत्नी के बीच इतना अच्छा तालमेल था कि बिना कुछ कहें वो एक-दूसरे के मन की बात समझ लेते थे और फिर एकाध साल बाद ओजस्विनी के लिए एक अच्छा रिश्ता मिल गया और उसका ब्याह कर दिया गया,दोनों पति पत्नी बेटी के लिए तड़पे और सबसे ज्यादा दुर्गेश.....
बेटी तो अपने घर की हो गई थी ,रह गए बेटे तो वें अभी बेटी से छोटे थे,इसलिए उनके ब्याह के बारे में दुर्गेश ने नहीं सोचा....
दिन ऐसे ही कट रहे थे कि मुहल्ले वालों की बीच खुसर-पुसर होने लगी,ये खबर जब प्रयागी को पता चली तो उसका कलेजा छलनी हो गया,उसे काटो तो खून नहीं,भगवान ने उसे कौन सा दिन दिखाया था? क्या यही दिन देखने के लिए वो जिन्दा थी,उसने बच्चों के सामने ही दुर्गेश से सवाल किया कि....
कौन है वो औरत जिसे तुमने खलिहान वाली कोठरी में पनाह दे रखी है और वो बच्चा कौन है उसके साथ?
ये सब सुनकर दुर्गेश रो पड़ा और बोला...
प्रयागी! मत पूछो कुछ,मैं जवाब नहीं दे पाऊँगा,भगवान के लिए मुझे दुविधा में मत डालो।।
इसका मतलब है कि तुम्हारे मन में खोट है,प्रयागी चीखी।।
नहीं...! ये झूठ है...प्रयागी! मुझे मेरे बच्चों की कसम ,मैं निर्दोष हूँ,दुर्गेश बोला।।
तुम धोखेबाज हो,मेरे बच्चों की झूठी कसम मत खाओ,अब मैं घड़ी भर भी तुम्हारे साथ नहीं रह सकती,अभी इसी वक्त मैं बच्चों के साथ घर छोड़कर जा रही हूँ,प्रयागी बोली।।
नहीं ..प्रयागी! तुम इस घर की लक्ष्मी हो ,तुम इस घर को छोड़कर मत जाओ,परेशानी की जड़ मैं हूँ तो मैं ही ये घर छोड़कर जा रहा हूँ और उस रात वो घर दुर्गेश ने छोड़ दिया,बेटों ने भी उस वक्त उसे ना रोका,उन्हें भी अपने बाप से नफरत सी हो गई थी।।
ये खबर सुनकर प्रयागी के पिता मानसिंह आएं,वें रो पड़े लेकिन बोले कुछ नहीं,प्रयागी को सान्त्वना देकर वापस चले गए।।
दुर्गेश अब खेतों में ही रहने लगा था ,वो उस औरत के साथ भी नहीं रहा लेकिन कभी कभी उससे मिलने जरूर जाता था और खर्चा- पानी देकर वापस आ जाता,वो खेतों में हीं चूल्हा सुलगाता, कभी आलू भूनता तो कभी बैंगन और रोटी सेंकता,फिर खा लेता ,वो अब स्वयं ही खाना बनाने लगा था,उसका बुढ़ापा ऐसे कटेगा ये किसी ना सोचा था,फसल आती तो उसे बेचने में जो दाम मिलते वो उसका कुछ ही भाग रखता,बाकी प्रयागी को भिजवा देता।।
दिन बीते प्रयागी ने उस दिन के बाद दुर्गेश की शकल नहीं देखी,दो तीन सालों के अन्तर में उसने दोनों बेटों का भी ब्याह रचा लिया लेकिन दुर्गेश को ना तो बच्चों ने शादी में बुलाया और ना ही प्रयागी ने,ऐसे ही गुजरते हुए दस साल बीत गए,तीनों बच्चे भी अब बच्चों वाले बन गए थे लेकिन दुर्गेश के लिए प्रयागी का दिल ना पसीजा और वो औरत अब भी उस खलिहान वाली कोठरी में रहती थी।।
फिर एक दिन आखिर दुर्गेश दुनिया को अलविदा कर ही गया वो भीतर से टूटने लगा था,जब कि अभी उसके मरने की उम्र ना थी,अपनो की जुदाई ने उसे तोड़कर रख दिया था, गाँव के सब लोंग इकट्ठे हुए सबने तेजप्रकाश से दुर्गेश का अन्तिम संस्कार करने को कहा.....
लेकिन तेजप्रकाश ने अन्तिम संस्कार करने से मना कर दिया तब तक प्रयागी के पिता मानसिंह भी आ चुके थे,उन्होंने जब सुना कि बेटे पिता का अन्तिम संस्कार नहीं करना चाहते तो सबको भीतर लेकर गए और प्रयागी के सामने जो उन्होंने बोला उसे सुनकर प्रयागी के पैरों तले जमीन खिसक गई और तेजप्रकाश,वेदप्रकाश के साथ साथ दोनों बहुएँ भी हतप्रभ हो गई,वे बोले....
बेटी! तू मुझे सौ जूते मार लें,सब मेरी गलती है,मेरे पाप की सजा बेचारे दुर्गेश ने भुगती,उस औरत से मेरा सम्बन्ध था,वो बच्चा भी मेरा है,बेचारे दुर्गेश ने मेरे कर्मों की सजा भुगती है,मेरी गृहस्थी बचाने के लिए उसने ये कदम उठाया,मेरे पाप की आग ने तेरा घर जला दिया बिटिया!
मैनें उससे वादा लिया था कि ये बात कभी भी किसी को ना पता चले,इसलिए उसने ये बात तुझे भी नहीं बताई,मैं पापी हूँ,मैं नीच हूँ वो नहीं था,बेटी! उस देवता के मृत शरीर का यूँ तिरस्कार ना करो,उसने कभी भी कोई पाप नहीं किया,उसने तो मेरे पापों को अपनी अच्छाई का आवरण ओढ़ाया था।।
मुझे तो नरक में भी जगह नहीं मिलेगी,सड़ सड़ के मरूँगा मैं,मानसिंह बोले।।
ये सब सुनकर प्रयागी अपने पिता से बोली....
निकल जाइए मेरे घर से इसी वक्त,मैने ना जाने कौन से बुरे कर्म किए थे जो आप जैसा पिता मिला।।
ये सब सुनकर तेजप्रकाश और वेदप्रकाश भी रो पड़े थे और पिता के अन्तिम संस्कार के लिए निकल पड़े,दोनों ने मृत पिता के चरणस्पर्श करके माँफी भी माँगी और फिर उनका अन्तिम संस्कार भी किया.....
ओजस्विनी भी अपने पति और बच्चों के साथ दुर्गेश की तेहरवीं में आई,जब उसे पता चला कि उसके पिता निर्दोष थे तो वो फूट फूटकर रो पड़ी।।
प्रयागी के दिल को बहुत बड़ा धक्का लगा था कि उसका पति सच कहता रहा लेकिन वो नहीं मानी,संदेह की पट्टी जो उसने अपनी आँखों में बाँध रखी थी, माँफ करना प्रभु! बहुत बड़ा पाप हो गया मुझसे जो अपने देवता समान पति को पापी सम़झ बैठी,फिर प्रयागी ने भी पति के ग़म में उसके जाने के पन्द्रह दिन बाद ही अपना भी शरीर त्याग दिया।।
अब मैं तेजप्रकाश भी अपने बाऊजी की तरह ही सारे घर की जिम्मेदारी सम्भाल रहा हूँ,उन्हीं के पदचिन्हों पर चल रहा हूँ,लेकिन कभी कभी मन में टीस उठती है कि काश उनके अन्तिम समय में हम सब उनके साथ होते थे।।
इस तरह मेरे बाऊजी अपने किए हुए वादे पर अटल रहें,किसी की भी परवाह नहीं की ,यहाँ तक कि घर भी त्याग दिया तो ऐसे थे मेरे बाऊजी... ।।

समाप्त....
सरोज वर्मा...🙏🙏😊😊







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