Paani re Paani tera rang kaisa - 7 books and stories free download online pdf in Hindi

पानी रे पानी तेरा रंग कैसा - 7

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29.8.2021

सहसा बीच में सोए छोटू पर ऊपर से लाइट का बीम आया।

"है कोई…" ऊपर से लंबी सी आवाज़ आई। हमारी आवाज़ ऊपर तक पहुंचती नहीं थी अतः वह परत जाने वाला ही था तब छोटू ने हथेली पर दो हाथ रखे अपनी चीख़ती आवाज़ में कहा "ए हो.. हम यहाँ है...।"

फिरसे, अब तेज़ लाईट आई। सम्पूर्ण अशक्त हालात में भी तोरल और मनन ने वह मेटल की थाली बजाई। हो सके इतने जोर से। तोरल ने एक पत्थर से थाली टकराई। आवाज़ की गूंज दूर तक गई। आखिर ऊपर तक गई।

"हम आ गए है रिस्क्यु के लिए। आप सब बहादुरों एक, दो गिनकर अपनी हाजिरी गिनाओ।" अब मेगाफोन से आवाज़ आई।

तनु और जग्गू ने "ओ.. सब सलामत है जी.." आवाज़ दी। उनकी आवाज़ सब से बड़ी और तीख़ी थी। कुछ गीतों में ऊंचा खींचने हम उनको ही आगे करते थे।

एक के बाद एक सबने 'एक - दो - तीन' ऐसे गिनती की। मैंने 'तेरह' शोर लगाया।

तोरल अपनी रेल की सीटी जैसी प्रचंड आवाज़ खींचती, चीखती हुई चिल्लाई - "लाईट इस ओर.."

अब सर्चलाईट का फोकस दूर से हमारे ऊपर पड़ा।

दूर से जग्गा के बाप की जैसे पहाड़ तोड़ती हो ऐसी आवाज़ गुंजी "बेटे, हिम्मत रखना। हम आ गए है.."

यहां वह कैसे आएगा?

दिशा की माँ की आवाज़ "बेटी दिशा, मैं आ गई हूँ। चिंता मत कर।" वह क्या कर लेगी?

एक के बाद एक माँ बाप बच्चों की खैरियत पूछने लगे।

उनकी आवाज़ हम तक आती थी लेकिन हमारी इन्हें नहीं सुनाई देती थी।

मैंने साहस करने की हिम्मत की। छोटू सामने कूद कर लांघ सकता था लेकिन मैं उसे यह जोखिम लेने देने को तैयार नही था। सामने के खड़क पर जाना बेहद झरूरी था। मैंने 'जय बजरंग बली' पुकारते हाथ में उस ड़ाली लिए एक कूद लगाई। हाश! मैं सामने के खड़क पर उस ओपनिंग के बिल्कुल नीचे पहुंच गया। अब उन लोगो से संपर्क हो सकता था।

अब उस ओपनिंग के बिल्कुल नीचे जाने के लिए दो कालमींढ़ नुकीली चट्टानों के बीच में से अत्यंत फिसलिदा और संकरी जगह में से चार पैर पर रेंगते हुए मुझे गुजरना पड़ा। अब मै प्रकाश के नीचे लेकिन बच्चों की विरुद्ध जगह पर था।

उन बच्चों को कैसे इस ओर लाया जाए?

ऊपर से किसीने मेगाफोन से आवाज़ लगाते कहा - "हम यह गुफ़ा का ओपनिंग चौड़ा करके ऑक्सीजन सिलिंडर भेजते हैं। एक मजबूत रस्सी के साथ। इसे सामने बच्चों की ओर भेजें।

रस्सी दो बार आई। मैने सामने धक्का लगाया। वैसे तो बीस पचीस फीट ही अंतर होगा पर बड़े वेग से आती रस्सी, वह भी ऑक्सीजन सिलिंडर के साथ, मैं पकड़ न सका।

आखिर में मैने तोरल को सामने की ओर से रस्सी के साथ सिलिंडर पकड़ने को कहा। वह खड़क की धार पर खड़ी रही और नीचे आते सिलिंडर को मैने धक्का दिया। उसने पकड़ा लेकिन सिलिंडर और रस्सी के साथ खुद खींच गई। उसने सर्कस की खिलाड़ी की तरह एक बड़ा झूला खाया और सामने मैने उसकी टांगें पकड़ ली। यह बल से हम दोनों गिर पड़े। थोड़ी देर वह मेरी ऊपर ही पड़ी रही। अब किसी वजनदार चीज से सामने से सब को एक एक कर ऐसे लटकाते हुए लाना पड़ेगा क्या?

एक बचाव सैनिक पीठ पर सिलिंडर और हाथ में सीढ़ी के साथ उतरने लगा। आहिस्ता आहिस्ता सरकता वह नीचे आया।

मैने रस्सी के साथ एक पत्थर बाँध कर हिलाया। सामने से एक ओर सिलिंडर आया। वह बचाव सैनिक सीढ़ी सामने की ओर फेंक कर रेंगते उसके ऊपर से सामने बच्चों को लेने जाने लगा।

पहले छोटू को और दिशा को ले कर आया।

दूसरी रस्सी आई। उसके साथ यह दो बच्चों को बाहर निकाला गया। ऊपर से तालियों की आवाज़ इतनी गुंजी की नीचे तक सुनाई दी।

तब फिर बारिश शुरू हो गई और पानी भरने लगा। रात भी हो गई थी। अंधेरा और बारिश की वजह से बचाव कार्य स्थगित करना ही पड़ा।

दूसरे बच्चों का अब क्या होगा? मैं अत्यंत चिंतित होते सोचने लगा।