Mai bhi fouji - 1 in Hindi Motivational Stories by Pooja Singh books and stories PDF | मैं भी फौजी (देश प्रेम की अनोखी दास्तां) - 1

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मैं भी फौजी (देश प्रेम की अनोखी दास्तां) - 1

कभी सोचा नहीं था ...मैं सेना में भर्ती हो पाऊंगा बस मन में उमंग और दिल में जज्बा था कुछ कर दिखाने का ...
मैं भी भारत माता के लिए कुछ कर दिखााना चाहता हूं...
..... दु:ख होता है ..😭अपने बीते हुऐ उन दिनोंं को सोचकर क्यूं होते है देश में गद्दार......
*******कहानी शुरू होती है मेरे गांव मीरपूर से ******
मैं अपने परिवार के साथ रहता था... मैं.. मेरे पापा ..मां और मेरी प्यारी छोटी बहन सोना ...हम बहुत खुश रहते थे आखिर क्यूं न रहे ...सब कुछ था हमारे पास ...शांति , सुकून और सबसे फक्र की बात थी , अपने फौजी भाई को देखना ,जो दिन रात हमारी सुरक्षा के लिए अपना घर बार छोड़कर सरहद पर निर्डरता के साथ डटे हुऐ हैं ......
मेरा तो बस यही काम था, जब भी मैं स्कूल जाया करता ..अपने फौजी भाईयों को देखकर सेल्युट कर देता था...
ये ही मेरा रोज काम था, और मां उन्हें जितना संभव हो सकता था गर्म पेय पिला आती थी... उनके दिल को भी सुकून जब ही मिलता था जब वो अपना ये नियम पूरा कर लेती थी......
.....आज रविवार था स्कूल की छुट्टी थी ...मैंने सोचा आज मां के साथ चलकर फौजी भाईयों को चाय वगैरह देने जाऊंगा... मैने मां से बहुत जिद्द करी आखिर में मां मान ही गयी और मैं भी मां के साथ चला गया.... वहां पहुंचते ही कैप्टन मान सिंह मुझे देखकर मुस्कुरा दिये और कहा : -"धरा ..! आज आप अपने बेटे को भी ले आई बहुत अच्छा हैं तुम्हारा बेटा ...."
उन्होंने मुझे गोद में उठा लिया ....मैं भी कुछ शैतान था ,उनकी कैप उतारकर खुद पहनकर बस चिल्लाने लगा..
"...सावधान...! दुश्मनों मैं हूं भारत माता का लाल ...मैं मिटा दुंगा तुम्हारा नामोनिशान..." हाथों की बंदूक बनाकर मैं भी इठलाकर चलने लगा....
सब मेरी बात सुनकर और मेरी चाल को देखकर हंसने लगे
..तब कैप्टन अंकल ने मुझसे पूछा "...बड़े होकर क्या बनोगे ..."
मैने भी शान से कहा "...भारत मां का लाल हूं ,फौजी ही बनूंगा... आप की तरह कैप्टन अंकल..."
मेरी बात सुनकर मानो उन्हें गर्व हुआ होगा ,उन्होंने मेरे सिर पर हाथ फेरते हुए कहा " हां ,,जरूर... तुम जरुर बनोगे... "
तभी मां ने चलने का इशारा किया मन तो नही था जाने का पर जाना पड़ा...!
.........समय बितता गया मैं बाल से किशोर हो गया .....
पर मेरा नियम नहीं बदला जो नियम मैने ले रखा था ,उसे जारी रखा ....अब तो सब मुझे अच्छे से जानते थे ....मेरा आधा समय उनके पास ही बितता था ..वो मुझे अपने युद्ध से जुड़ें किस्से सुनाते थे और मैं उनकी बात बड़े ध्यान से सुनता था .....मुझे भी उनकी बहादुरी के किस्से सुनने में बड़ा मज़ा आता था .....ऐसे ही समय बितता रहा ...
...एक दिन अचानक पापा के सबसे जिगरी दोस्त रूस्तम सेठ आये बहुत ही अच्छी खासी व्यापारिक स्थिति थी उनकी .....हमारी आर्थिक स्थिति इतनी अच्छी नहीं थी इसलिए उन्होंने पापा से कहा "...तुम्हारा बेटा तो अब चौदह साल का हो गया हैं न और ईमानदार भी हैं क्यूं न इसे मेरे साथ भेज दो ....व्यापार भी सिख लेगा और तुम्हारी आर्थिक स्थिति भी सुधर जाएगी...."
चौदह साल कोई उम्र नही थी काम करने की पर पापा के जिद्द के आगे मेरी एक न चली ,मेरी पढ़ाई बीच में ही छुट गयी ...दिल में उमंग थी सेना में जाने की पर मेरी इस इच्छा को कोई खास न समझकर रुस्तम सेठ के साथ भेज दिया गया .....
......क्रमशः....
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ये फौजी कैसे बनेगा ......
.....जल्द ही पता चलेगा.....
....अगला भाग जल्द ही आप तक पहुंचेगा ..
.कहानी के साथ बने रहिए..