Mai bhi fouji - 4 in Hindi Motivational Stories by Pooja Singh books and stories PDF | मैं भी फौजी (देश प्रेम की अनोखी दास्तां) - 4

मैं भी फौजी (देश प्रेम की अनोखी दास्तां) - 4

उनकी ये योजना मुझे दिन रात बैचेन कर रही थी , आखिर मुझे भागने का मौका मिल ही गया ..उस दिन मैं यहां से भागने में कामयाब हो गया , जिस दिन उस कारखाने की मालगाड़ी आई थी …....
अब मैं सीधे अपने घर न जाकर कैप्टन मान सिंह के पास पहुंचा , कैप्टन मान सिंह जोकि अब मेजर जनरल बन चुके थे मुझे देखकर बहुत खुश हुए...... पहले तो वो मुझे पहचान नहीं पाये लेकिन जब मैंने उन्हें बचपन का किस्सा सुनाया तब वो तुरंत बोले " तुम धरा के बेटे हो ".....
" हां "
" अरे तुम कहां चले गए थे पूरे छ: साल बाद तुम्हें देखकर अच्छा लगा...आओ बैठो..."
मैंने उन्हें बताया " अंकल बहुत जरूरी खबर आपको बतानी है"
" हां... बताना यहां बैठो पहले..."
" अंकल अब आराम से बैठने का समय नहीं है.... आतंकवादी अपने काम को अंजाम देने वाले हैं.....वो 9 अगस्त को एक आडिटोरियम में धमाका करने वाले हैं.. जल्दी करिए उन्हें पकड़ लिजिए.."
उन्हें लगा मैं अब भी बचपन में ही हूं इसलिए उन्होंने मेरी बात को ज्यादा गौर न देते हुए कहा " तुम बहुत दिनों तक अपने गांव से दूर रहें हो इसलिए तुम्हें ऐसा लग रहा है .. यहां सब ठीक है और नौ तारिख तो कल ही है...हर जगह सुरक्षा कड़ी है कोई कुछ नहीं कर पाएगा.."
मैंने उन्हें बहुत समझाया पर उन्होंने मुझे घर भिजवा दिया..भारी मन से घर आ तो गया पर मन में बैचेनी बनी हुई थी... तभी मुझे एक चतुराई सुझी और उसी रात मैं आडिटोरियम में पहुंचा .... वहां पर स्वतंत्रता दिवस के लिए कार्यक्रम किये जा रहे थे.... मैं वहां पहुंचकर नोटिस बोर्ड पर कुछ लिख आया. ...!
अगली सुबह मुझे तसल्ली हुई वहां कोई स्टूडेंट नहीं था.. चौकीदार भी हैरान था आखिर सब नोटिस बोर्ड को देखकर भागे क्यूं जा रहे हैं... ऐसा क्या लिखा है नोटिस बोर्ड पर ...जब उसने पढ़ा तो वो भु सिर पकड़कर बैठ गया...!
क्या करें किसी की शरारत है या सच सब ....
बस भागने जब लगे जब चौकीदार ने कुछ अनजान लोगों को पीछे के दरवाजे से भागते हुए देखा... उसने शोर मचाना शुरू किया.... बच्चे तो कोई था नहीं पर उसने कार्यकर्ता , आयोजकों को बाहर बुलाने के लिए चिल्लाया ."....बम है..बम है....सब बाहर आओ ...."
कुछ घंटों में सब बाहर निकल आए...कुछ घंटों तक तो सबकुछ ठीक था इसलिए सबको चौकीदार पर बहुत गुस्सा आ रहा था.... पुलिस भी वहां पहुंच चुकी थी.... पुलिस गुस्से भरी निगाहों से चौकीदार को देख रही थी मानो इस मजाक के लिए चौकीदार को बहुत बड़ी सजा देगी .... चौकीदार बेचारा कह रहा था " सर मैंने तो सिर्फ नोटिस बोर्ड पर पढ़ा था और कुछ अजनबी लोगों को पीछे के दरवाजे से भागते हुए देखा.. उसकी बात पूरी भी हुई थी तभी चंद सैकेंडो में एक धमाके की आवाज हुई और पूरा आडिटोरियम आग के हवाले हो गया...
जो सब अभी तक चौकीदार को घूर रहे थे ...अब अपने को खुशकिस्मत मान रहे थे कि हम सुरक्षित बच गए.. मैं ये सब छुपकर देख रहा था......
जब ये खबर मेजर अंकल को पता चली तो वो भी मौके पर पहुंचे और किसी के भी मौत की खबर न‌ सुनकर खुश हो गए पर ऐसा कैसे हो गया.....?
उनके दिमाग में यही सवाल था.....?

Rate & Review

Be the first to write a Review!