Gyarah Amavas - 6 books and stories free download online pdf in Hindi

ग्यारह अमावस - 6



(6)

दोनों पति पत्नी अभी कुछ समय पहले मिली दुखद खबर को सह नहीं पा रहे थे। गुरुनूर ने सब इंस्पेक्टर आकाश दुबे की तरफ देखा। वह भी समझ नहीं पा रहा था कि क्या किया जाए। वह उठकर अजय के पास गया। उन्हें तसल्ली देते हुए बोला,
"हम आपके दुख को समझ रहे हैं। पर हमें आपसे सवाल करने पड़ेंगे तभी हम उस व्यक्ति तक पहुंँच पाएंगे जिसने अमन का कत्ल किया है।"
गुरुनूर ने कहा,
"आपके बेटे की लाश बसरपुर के पहाड़ी जंगल में मिली है। उसका सर कटा हुआ था। उसके पैर में लगी मैटल प्लेट से हम पता कर पाए हैं कि वह अमन था। बसरपुर के जंगलों में ऐसी तीन और लाशें मिली हैं। जिनके बारे में कुछ पता नहीं चला। कातिल तक पहुँचने के लिए उस व्यक्ति तक पहुँचना ज़रूरी है जिसने अमन को अगवा किया था।"
सब सुनकर अजय ने कहा,
"मेरा बेटा तो अब वापस नहीं आ सकता है। हमें ज़िंदगी भर हमारी इकलौती संतान के दुख में जीना पड़ेगा।"
सब इंस्पेक्टर आकाश दुबे ने कहा,
"आपकी बात सच है। पर वहाँ जितनी भी लाशें मिली हैं सब किशोरवय के लड़कों की थीं। कोई है जो माता पिता से उनकी संतानों को छीन रहा है। अगर उसे पकड़ा ना गया तो ना जाने कितने माता पिता को यह दुख झेलना पड़ेगा।"
सब इंस्पेक्टर आकाश दुबे की इस बात ने असर किया। अजय ने कहा,
"आप लोग जो पूछना चाहते हैं पूछिए।"
गुरुनूर ने कहा,
"अमन से आपने कोई संपर्क करने की कोशिश नहीं की थी। मेरा मतलब है उसे फोन नहीं किया।"
अजय ने जवाब दिया,
"स्कूल वालों की सख्त हिदायत थी कि कोई बच्चा फोन लेकर स्कूल नहीं आएगा। जब एक्सीडेंट के बाद अमन ने स्कूल जाना शुरू किया था तब मैं प्रिंसिपल से मिला था कि कुछ दिनों के लिए उसे फोन रखने की इजाज़त दें। जिससे हम उसके हालचाल ले सकें। प्रिंसिपल ने सिर्फ एक हफ्ते की इजाज़त दी थी। उसके बाद यह कहकर मना कर दिया कि अगर अमन को फोन लाने की इजाज़त मिलेगी तो फिर बाकी के बच्चे भी फोन लाने की इजाज़त मांगेंगे।"
गुरुनूर ने कहा,
"आपने स्कूल में और उसके दोस्तों से बात की थी।"
ज्योत्स्ना ने कहा,
"जब वह कहीं नहीं दिखा तो मैं प्रिंसिपल से मिली। उन्हें पूरी बात बताई। उन्होंने कहा कि हो सकता है कि अमन अपने किसी दोस्त के साथ चला गया हो। आप उसके दोस्तों से बात करिए। मैं वहाँ से पहले घर आई कि शायद अमन आ गया हो। वह घर नहीं आया था। मैंने अजय को फोन करके सब बताया। फिर अमन के सबसे अच्छे दोस्त तन्मय के घर गई। उसने कहा कि अमन रोज़ की तरह स्कूल के बाहर खड़े होकर वैन का इंतज़ार कर रहा था। वह उससे मिलकर अपने घर चला आया। तन्मय के साथ मैं अमन के कुछ और दोस्तों से भी मिलने गई। सबने यही कहा कि अमन रोज़ की तरह स्कूल के बाहर वैन का इंतज़ार कर रहा था।"
यह कहकर ज्योत्स्ना की आँखें भर आईं। अजय ने कहा,
"ज्योत्स्ना का फोन मिलते ही मैं ऑफिस से निकल गया। ज्योत्स्ना ने सब तरफ पता करने के बाद मुझे फोन करके कहा कि वह पुलिस स्टेशन जा रही है। मैं भी पुलिस स्टेशन पहुँच गया। पुलिस को सारी बात बताकर रिपोर्ट दर्ज़ कराई।"
ज्योत्स्ना रो रही थी। अजय ने उसके कंधे पर हाथ रखा। भर्राइ आवाज़ में बोले,
"पुलिस ने अपनी कोशिश की पर कुछ पता नहीं चला। जिस जगह अमन खड़ा होता था वहाँ आसपास कोई सीसीटीवी कैमरा नहीं था। स्कूल के सामने एक बिल्डिंग की चाहर दीवारी है। उसके पास कुछ खोमचे वाले खड़े होते हैं। उन्होंने कहा कि छुट्टी के समय बच्चों का झुंड आकर जमा हो जाता है। इसलिए उन्होंने कुछ नहीं देखा।"
यह कहकर अजय चुप हो गए। ज्योत्स्ना ने कहा,
"हम दोनों लगभग रोज़ ही पुलिस स्टेशन जाकर पूछते थे कि अमन का कोई पता चला। उनका एक ही जवाब होता था कि अगर कुछ भी पता चला तो आप लोगों को ज़रूर बताएंगे। हम सूचना का इंतज़ार कर रहे थे। आप लोग यह सूचना ले आए।"
गुरुनूर उठकर ज्योत्स्ना के पास गई। उन्हें गले लगाकर बोली,
"यह खबर सुनाकर हमें भी दुख हो रहा है। पर आपको सूचना देना हमारा कर्तव्य था। अमन तो वापस नहीं आ सकता है पर उसके कातिल को सज़ा दिलवाकर रहूँगी।"
अजय ने कहा,
"कम से कम अंतिम संस्कार के लिए लाश तो मिल सकती है।"
सब इंस्पेक्टर आकाश दुबे ने कहा,
"लाश की हालत बहुत खराब है। फिर भी क्योंकी उसकी पहचान हो सकने की संभावना थी इसलिए और लाशों की तरह उसका अंतिम संस्कार नहीं हुआ है।"
गुरुनूर ने कहा,
"आप हमारे साथ यहाँ के पुलिस स्टेशन चलिए। हम उन्हें सारी सूचना दे देते हैं। उनकी सहायता से आप अमन का अंतिम संस्कार कर पाएंगे।"
गुरुनूर अपने साथियों के साथ अजय को लेकर लोकल पुलिस स्टेशन गई। उन्हें अमन के केस की सारी सूचना दी।

बसरपुर लौटने में देर हो गई थी। सब इंस्पेक्टर आकाश दुबे ने गुरुनूर से कहा कि उसका आवास पहले पड़ेगा। इसलिए वह वहीं उतर जाए। वह और हेड कांस्टेबल ललित थाना पहुँच कर वहाँ से अपने घर चले जाएंगे। जीप गुरुनूर के आवास की तरफ बढ़ रही थी तभी उन्हें एक कार रास्ते के किनारे खड़ी दिखाई पड़ी। गुरुनूर ने जीप रुकवाई। हेड कांस्टेबल ललित उतर कर देखने गया। कुछ ही क्षणों में एक आदमी उसके साथ आया। गुरुनूर ने देखा कि वह शुबेंदु था। शुबेंदु ने बताया कि वह और दीपांकर दास कहीं से लौट रहे थे। अचानक गाड़ी खराब हो गई। वह उसे ठीक करने की कोशिश कर रहा था पर उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था। वह यह बता रहा था तभी दीपांकर दास भी वहाँ आ गया था। उसने कहा,
"आप लोगों की मदद मिल जाती तो अच्छा होता। इस वक्त कोई मैकेनिक भी नहीं मिलेगा।"
गुरुनूर का आवास कुछ ही दूर पर था। उसने कहा,
"ठीक है आप दोनों जीप में एडजस्ट हो जाइए। मैं कुछ आगे ही उतर जाऊँगी। ड्राइवर आपको शांति कुटीर तक पहुंँचा देगा। लेकिन अपनी कार सही से पार्क कर दीजिए।"
शुबेंदु और दीपांकर दास ने अपनी कार थोड़ा और किनारे करके इमरजेंसी लाइट्स जला दीं। कार लॉक करके जीप में जाकर बैठ गए। गुरुनूर ने दीपांकर दास से कहा,
"कस्बे में तो लोग अंधेरा होने के बाद निकलने से डरते हैं। आपको डर नहीं लगता।"
दीपांकर दास ने कहा,
"उस दिन मैंने आपको बताया था कि अगर कोई मन को काबू करना सीख जाए तो वह किसी भी शक्ति पर काबू कर सकता है। फिर डरने की क्या ज़रूरत है।"
गुरुनूर को दीपांकर दास कुछ रहस्यमई लगा। कुछ देर में ही उसका आवास आ गया। वह उतर गई। जीप बाकी सबको लेकर आगे बढ़ गई।

गगन अपना सारा काम निपटा कर अपने मालिक के पास जाकर खड़ा हो गया। मालिक ने कहा,
"कल समय पर आ जाना।"
गगन ने कहा,
"कल मुझे छुट्टी चाहिए।"
मालिक ने उसे घूरकर देखा। वह बोला,
"एकदम से छुट्टी के लिए कह रहे हो। अब कल तुम्हारी जगह कौन काम करेगा। पहले से बताना चाहिए था।"
गगन ने कहा,
"मेरे चचेरे भाई की तबीयत खराब हो गई है। उसका फोन आया था। कल डॉक्टर को दिखाने ले जाना है।"
मालिक बड़बड़ाने लगा। गगन ने उस पर ध्यान नहीं दिया। चुपचाप वहाँ से चला गया।
गगन पालमगढ़ में ही रहता था। यहाँ एक रेस्टोरेंट में काम करता था। वह अपने कमरे में पहुँचा। कपड़े बदलकर अपने बिस्तर पर लेट गया। उसने अपने फोन पर वाट्सएप खोला। उसके ग्रुप 'ब्लैक नाइट' पर आए मैसेज को दोबारा पढ़ा।‌
'आज रात सभी बिल्लियों को अपने घर पर इकठ्ठा होना है'
यह मैसेज मिलने के बाद ही उसने कल के लिए छुट्टी मांगी थी। उसे इसी समय बसरपुर के लिए निकलना था। कुछ देर आराम करने के बाद उसने कुछ सामान एक छोटे से बैग में डाला। वह बाहर आया। अपनी बाइक स्टार्ट करके बसरपुर के लिए निकल गया।

गगन ने दक्षिणी पहाड़ के जंगल में झाड़ियों के पीछे अपनी बाइक खड़ी कर दी। यहाँ से उसे पैदल ही जाना था। अपनी टॉर्च जलाकर वह धुंध में अपना रास्ता देख रहा था। वह उसी खंडहर की तरफ बढ़ रहा था जहाँ गुरुनूर गई थी। तेज़ कदमों से चलता हुआ वह उस खंडहर पर पहुँचा। बाहर एक आदमी खड़ा था। उसने आगे बढ़कर कहा,
"तुम सबसे आखिर में आए हो। तुम्हारा इंतज़ार हो रहा है।"
गगन ने कहा,
"अचानक इकठ्ठा होने का मैसेज भेज दिया। काबूर पता है ना मैं पालमगढ़ में नौकरी करता हूँ। मैसेज मिला तो बाइक लेकर आया हूँ। कोई खास बात है।"
काबूर ने कहा,
"अंदर चलो सब पता चल जाएगा।"
गगन काबूर के साथ खंडहर के अंदर चला गया। काबूर उसे खंडहर के एक कमरे में ले गया। वहाँ एक कोने में नीचे से रौशनी आ रही थी। काबूर गगन को लेकर उस तरफ बढ़ गया। जहाँ से रौशनी आ रही थी। वहाँ नीचे जाने की सीढ़ियां थीं। पहले गगन नीचे उतरा। उसके पीछे से काबूर नीचे चला गया। कुछ देर बाद एक पत्थर ने उस जगह को ढक दिया।
यह एक तहखाना था। इसमें मशालें जलाकर रौशनी की गई थी। वहाँ गगन को मिलाकर ग्यारह नौजवान थे। उनकी उम्र पच्चीस से तीस वर्ष के बीच थी। सभी फर्श पर बैठे थे। सामने एक चबूतरा बना था। उस पर एक व्यक्ति बैठा था। उसने काले रंग का चोंगा पहना हुआ था। काबूर ने उसके पास जाकर कहा,
"जांबूर सभी आ गए हैं। अब आप आज की सभा शुरू कीजिए।"
जांबूर के चेहरे पर शैतान वाला मुखौटा था। उस मुखौटे में आँखों की जगह दो छेद थे। उन छेदों से दिखाई पड़ती दोनों आँखों में गहराई थी। वहाँ मौजूद सभी नौजवान ध्यान से उसकी तरफ देख रहे थे।