Band hai simsim - 11 books and stories free download online pdf in Hindi

बंद है सिमसिम - 11 - प्रेत-बाधा का सच

बाले मियां की दुआ मुझे नहीं लगी तो माँ चिंतित हो गई। किसी ने उन्हें एक पंडित जी के बारे में बताया।रेलवे में अच्छे पद पर काम करने वाले उन पंडित जी को देवी की सिद्धि प्राप्त थी।वे बड़ी मुश्किल से किसी के घर पूजा -पाठ करने आते थे।जिसके भी घर वे पूजा-पाठ कर देते, उस घर से सारी बुरी शक्तियां भाग जातीं हैं--ऐसी मान्यता थी।पूजा- पाठ करने के लिए वे खासी रकम भी लेते थे।
पिता जी के एक मित्र से पंडित जी की काफी घनिष्ठता थी।उन्हीं के सौजन्य से पंडित जी मेरे घर आने को तैयार हो गए।वे मेरे घर आए तो माँ ने मुझे बुलाया।मैं उनके पास नहीं आना चाहती थी।इधर मैंने कुछ अच्छी किताबें पढ़ी थीं और मुझे भूत -प्रेत के लिए पूजा -पाठ करना ढोंग लगने लगा था।ऐसा भी होता है क्या कि कोई मरने के बाद भी सताने आ जाए।एक और बात भी इधर हुई थी।मेरे घर किराएदार के रूप में हीरा भैया आए थे।वे काफी पढ़े -लिखे और नास्तिक थे।भूत -प्रेत क्या वे तो देवी -देवता को भी नहीं मानते थे।हालांकि उनकी बात नेरे घर में कोई नहीं मानता था,पर उनके तर्क को कोई काट भी नहीं पाता था।
उन्होंने जब मेरे ऊपर के भूत को भगाने के लिए पंडित जी द्वारा पूजा -पाठ कराए जाने की बात सुनी थी तो हो हो करके हँस पड़े थे।
उन्होंने माँ को समझाया था कि ये पुजारी -पंडित सब ढोंगी होते हैं।पूजा -पाठ सब उनके लिए एक धंधा होता है।
उनकी बातें मुझे काफी सही लगी थीं पर पिताजी पुरानी विचारधारा के थे।उन्होंने पंडित जी को बातचीतके लिए बुला लिया था।
मैं पंडित जी के सामने आकर खड़ी हो गई और उन्हें झुककर प्रणाम किया।पंडित जी ने बड़े गौर से मुझे देखा और अपनी जगह पर झटके से उठ खड़े हुए जैसे कोई भूत देख लिया हो।उन्होंने मुझसे वापस जाने को कहा।मेरे जाते ही उन्होंने मेरे माता- पिता से कुछ बातें की और वापस चले गए।शुक्रवार के दिन पूजा रखी गई थी।नियत दिन घर में सुबह से ही तैयारियां शुरू हो गईं थीं।पूरे घर को स्वच्छ किया गया।देवी की पूजा के लिए सामग्रियां जुटाई गईं।परिवार के गिने -चुने लोगों को ही पूजा वाले कमरे में रहना था।बाहर के लोगों को इस बारे में कोई खबर नहीं देनी थी।आखिर मैं लड़की थी और मुझ पर भूत होने की ख़बर्की अफवाहों को जन्म दे सकती थी जिससे भविष्य में मेरी शादी में रूकावट आ सकती थी। छोटी मासी वाली गलती मेरे घरवाले नहीं दुहराना चाहते थे।
नियत समय पर पंडित जी आए और पूजा -पाठ की शुरूवात हुई।उन्होंने देवी की पूजा की और उनकी आरती हवन के बाद मुझे बुलाया गया और ठीक पंडित जी के सामने बिठा दिया गया।मेरे सामने पंडित जी बैठे थे उन पीछे एक जंगला था।जंगले के बाहर हीरा भैया खड़े थे ।मेरी नजरें पंडित जी के सर से ऊपर से होकर हीरा भैया की नजरों से मिल जाती थीं।उन्होंने कमरे में आने से पहले ही मुझे कुछ समझा दिया था और अब इशारा करके मुझे डांवाडोल होने से रोक रहे थे।पंडित जी नहीं समझ पा रहे थे कि जंगले पर कोई खड़ा है जो उनके सिर को घुमाते ही नीचे बैठ जाता है।
पंडित जी मेरे ऊपर मंत्रित जल फेंक रहे थे और जोर -जोर से मंत्र पढ़ रहे थे।साथ ही हवन में कुछ ऐसी सामग्री डालते जा रहे थे,जिसकी गन्ध से मेरा माथा चकरा रहा था।मेरा जी चाह रहा था कि मैं जोर -जोर से झूमूँ।कुछ अंट- शंट बोलूं।पर हीरा भैया बार -बार मुट्ठी बांधकर खुद को कंट्रोल करने की हिदायत दे रहे थे।मुझ पर कोई असर न होते देख पंडित जी क्रोध में भरकर और जोर -जोर से मंत्र पढ़ने लगे।उनका क्रोध देखकर मैं मुस्कुराने लगी।अब तो पंडित जी का गुस्सा सातवें आसमान पर जा पहुंचा।मेरे माता -पिता ,दीदी और नानी जो भी वहाँ बैठे थे।मेरी धृष्टता से भयभीत हो गए थे।उन्हें डर हो रहा था कि पंडित जी भूत निकलने की जगह दो चार और भूत न मुझ पर छोड़ दें।
आखिरकार मेरी जगह पंडित जी ही झूमने लगे ।उन पर देवी आ गईं थीं।वे जोर-जोर से दहाड़ रहे थे।
--ये लड़की कुल का नाम डुबोयेगी।यह बड़ी जिद्दी और ढीठ है।इसे मेरे सामने से हटाओ।
ॐ जयन्ती मंगला काली भद्रकाली कपालिनी। दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तुते।। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।
मुझे वहां से हटने का निर्देश देकर मेरे घर वाले पंडित जी पर आई देवी को शांत कराने की कोशिश में लग गए थे ।वे उनसे क्षमा मांग रहे थे।बड़ी मुश्किल से बड़े -बड़े झटके देकर देवी वहाँ से गईं और पंडित जी बेसुध होकर गिर पड़े।
जब उनके मुंह पर पानी के छींटे मारे गए तब उन्हें होश आया।मैं और हीरा भैया जंगले के बाहर से भीतर का दृश्य देखकर मुँह दबाए हँस रहे थे। अच्छी विदाई लेकर पंडित जी जब वापस जाने के लिए बाहर निकले तो मैंने उन्हें प्रणाम किया।उन्होंने मुझे खा जाने वाली नजरों से देखते हुए मेरे माता- पिता से कहा इसके ऊपर जिद्दी,शक्तिशाली और जबर्दस्त जिन्न का साया है।इसे मेरे गुरुदेव को दिखाइए।
वे चले गए तो मुझपर डांट पड़ने लगी कि कहीं पंडित ने नाराज़ होकर जिन्न तो नहीं छोड़ दिया।ऐसे लोगों के पास बहुत सारी रूहानी ताकतें रहती हैं जो इनके इशारे पर काम करती हैं।
जब हीरा भैया ने मेरा पक्ष लिया तो उन्हें भी डांट पड़ गई।
दूसरे दिन मेरी तबियत और ज्यादा खराब हो गई।जाड़ा देकर बुखार आया।तीन -तीन रजाई ओढ़ने के बाद भी मेरी कंपकपी दूर नहीं हो रही थी।अब तो मेरे माता- पिता को पंडित जी की बात सच्ची लगने लगी।उन्होंने किसी मुस्लिम जानकार को मुझे देखने के लिए बुलाया।वे आए और मेरे ऊपर झुककर मुझे देखने लगे।मैंने बुखार में तप्त अपनी आंखें उठाईं।वे उल्टे पांव भागे कि जबर्दस्त जिन्न है।यह मेरे वश में नहीं आ पाएगा।उन्होंने पिताजी को अपने उस्ताद का पता दिया जो पास के गांव में रहते थे और उन्हें ऐसे जिन्न पर काबू पाने का अभ्यास है।
दूसरे दिन पिताजी अपने दो मित्रों के साथ उस गांव में गए। उस्ताद के दरवाजे पर बड़ी भीड़ थी।घण्टों इंतजार के बाद उनका नम्बर आया।पिताजी ने उनसे अपनी सारी व्यथा बताई।वे शांतिपूर्वक उनकी बात सुनते रहे फिर उन्होंने कहा कि सामने की दूकान पर जाकर एक सादा सफेद पन्ना लेकर आओ।पिताजी दूकान पर जाकर सफेद कागज का पन्ना खरीद लाए और उन्हें दे दिया।उस्ताद जी ने कागज के दो टुकड़े कर दिए। आए बारी -बारी से दोनों कागजों पर कुछ बुदबुदाने लगे।थोड़ी देर बाद उन्होंने पिताजी को वो दोनों कागज़ देते हुए कहा कि रात को इनमें से एक कागज को लड़की के तकिए के नीचे रख देना और दूसरा कहीं और रख सकते हो।सुबह अगर तकिए के नीचे रखे कागज में कुछ लिख जाएगा।उसे संभालकर रखना।मैं दुपहर को तुम्हारे घर आऊंगा ,फिर देखूँगा।यह ध्यान रखना कि लड़की कमरे में अकेली सोए।उसके कमरे में और कोई न जाए।
मेरे पिताजी ने रात को जब वह कागज मेरे तकिए के नीचे रखा तो मुझे डर लगने लगा,उस पर कमरे में अकेले सोना तो और भी भयकारी था। माँ ने आश्वस्त किया कि वे कमरे के बाहर वाले बरांडे में ही सोएंगी।उसे जब भी डर लगे आवाज़ दे दे।रात भर मुझे नींद नही आई।पलकें झपकती तो लगता कि तकिए के नीचे कोई हलचल हो रही है। सुबह होने से कुछ पहले मेरी आँख लग गई। एकाएक पिताजी और उनके मित्र मेरे कमरे में आ गए और मेरे तकिए के नीचे से वह कागज़ निकाला और यह देखकर सब आश्चर्य में पड़ गए कि सचमुच उस कागज पर उर्दू में कुछ लिखा था।
दूसरा कागज़ ज्यों का त्यों था।मेरा दिल जोर जोर से धड़क रहा था कि आखिर उस कागज़ में क्या लिखा है?और कैसे लिख गया उसमें ?कौन लिख गया?क्या सच ही मेरे ऊपर जिन्न है?हे हनुमान जी ,मैं तो हमेशा आपकी पूजा करती थी, फिर मेरे साथ ऐसा कैसे हो गया!
बचपन से ही मैं हनुमान की पुजारी रही हूँ।हर मंगलवार को व्रत रखती।लाल कपड़े ही पहनती।हनुमान जी के मन्दिर जाकर उन्हें तेल- सिंदूर लगाती।उन्हें लाल फूल- फल चढ़ाती और उनकी पूजा करती। एक साल पहले अचानक हनुमान जी की पूजा छोड़ दी थी।हुआ यह था कि एक दिन मैं हनुमान मंदिर से पूजा करके बाहर आ रही थी कि एक दाढ़ी वाले बाबा आकर सामने खड़े हो गए।--'तुमने लड़की होकर हनुमान जी को छुआ।जानती नहीं कि वे ब्रह्मचारी हैं।तुम्हारी विद्या -बुद्धि -शक्ति सब नष्ट हो जाएगी।'
मैं डर गई और फिर कभी हनुमान मंदिर नहीं गई।बाद में जब हमारे घर के पुजारी बाबा ने पूछा कि अब मंदिर क्यों नहीं जाती?मैंने सारी बात उन्हें बता दी। तब वे बोले कि वह दाढ़ी वाला शैतान था ..पाप था। तुम्हें धर्म से विमुख करने आया था।भगवान सिर्फ भक्ति देखते हैं लड़का- लड़की , स्त्री -पुरूष नहीं।
पर एक बार पूजा- पाठ छूटा तो फिर मेरा मन उचट गया।और तभी से मुझेे तमाम परेशानियां भी होने लगी थीं।पर मैंने पूजा- पाठ छोड़ा है नास्तिक थोड़े हुई हूँ।जब भी मुझे डर लगता है,हनुमान चालीसा ही तो पढ़ती हूँ।

दुपहर को उस्ताद जी आए।उन्होंने उस उर्दू लिखे कागज की बात सबको बताई।कागज़ में साफ़ -साफ़ लिखा था कि लड़की को कोई ऊपरी बाधा यानी भूत -प्रेत या जिन्न- जिन्नाद आदि नहीं है।वह बीमार है उसे किसी अच्छे डॉक्टर को दिखाओ।
मैं उस उस्ताद की ईमानदारी के आगे नतमस्तक हो गई।