BANDHAN PYAR KA in Hindi Love Stories by निरंजन कुमार मुंना books and stories PDF | बंधन प्यार का

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बंधन प्यार का

बंधन प्यार का

भाग - 1
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सुरभि क्लास के पहली बेंच पर नंदिता के साथ बैठी हुई, बातें कर रहीं थी। उस दिन मात्र दो ही छात्रा अपने वर्ग में उपस्थित हुए थें, बाकी सभी लड़के थें।
दोनों सहेलियों में क्या बातें चल रही थी इसमें किसी को भी कोई विशेष रूचि नहीं थी। सभी लड़के अपने-अपने दूनिया में मस्त थें, बस एक निकेश ही था वहाँ पर, जो सुरभि के पीछे बैठा हुआ, कान लगाये हुए था, सुरभि के बातों पर, कि आखिर में यें दोनों कौन सी बातें कर रहें हैं।

निकेश, विगत एक साल पहले ही संत क्राइस्ट पब्लिक स्कूल में आया था। इससे पहले वो किसी बड़े शहर में पढ़ाई किया करता था। लेकिन लाॅक डाउन लगने के कारण जब से वह शहर से अपना गाँव वापस आया है तब से वह पुनः शहर वापस नहीं लौटा । ऐसा माना जाता है कि निकेश यहीं से फाइनल परीक्षा पास करने के उपरांत ही जायेगा।

जहाँ तक सुरभि का सवाल है तो वह यहाँ के पुराने विद्यार्थियों में से एक है। वह देखने में जितनी खुबसूरत है, पढा़ई में भी उतना ही वह होशियार भी है। नाटे कद-काठी के सुरभि किसी परी से कम नहीं है। उसकी खनकती सी आवज रह - रहकर पुरे क्लास रूम को आंदोलित कर दिया करती है। वो अपने भाव को छूपाकर रखना नहीं जानती ।जो उसके मन में चलते रहता है, वह अक्सर बोल दिया करती है।

लेकिन उसको यह नहीं पता कि यह संसार कैसा है। यहां एक मिनट में बहुत कुछ हो सकता है। हमारे चारों ओर ऐसे लोग जमावड़ा लगायें रहतें हैं, जो बस उनको इंतजार होता है अपने पारी का। कब मेरा वक्त आये, और कब मेरी दाल गले।
ऐसा ही कुछ निकेश में भी था।

निकेश जब पहली बार यहाँ आया था तो देखने में ऐसा नहीं लगता था कि उसके मन में लड़कियों के प्रति कुछ चल भी सकता है।
लेकिन नहीं, ऐसा कुछ भी नहीं था। निकेश का नजर सुरभि पर जम गई थी। वह सुरभि के हरेक कामों पर नजर रखने लगा था, और जब भी उसे मौका मिलता पीछे से बोले बिना नहीं रहता वह। जब-जब सुरभि कुछ भी अपने क्लास में बोलती, बस निकेश मौका देखतें ही बोल पड़ता।
और निकेश के इस हरकत पर सुरभि भी मुस्करा उठती थी।

और मुस्कुराती हुई, वह नंदिता के कानों में कुछ बोल जाती।
ऐसे भी लड़कियों में यह एक खास विशेषता होती है, अपनी सहेलियों के कानों में कुछ न कुछ बोल जाने की ।

सुरभि जब नंदिता के कानों में कुछ बोलती तब नंदिता भी धीरे से सुरभि के बातों पर मुस्कुरा उठती और फिर मुस्कुराहट भरे अंदाज में शिक्षक के द्वारा दी जाने वाली लेक्चर को सुनने लगती।

लेकिन सेशांक सर ऐसा नहीं थें। जो किसी को मुस्कुराते देख वो शांत रह जायें।

सेशांक सर !?
जितना वर्णन किया जाय, कम ही पड़ेगा। गिरगिट की तरह रंग बदलने में माहिर हैं सेशांक सर। कब किस पर बरसने लगे कोई नहीं जानता। विद्यार्थियों को मानना है कि गुस्सा उनके नाक पर रहता है। लेकिन वो जितना देखने में कड़क हैं, सच बोला जाय तो वो अंदर से उतना ही नर्मदिल इंसान भी हैं।
परंतु नर्मदिल इंसान होना कभी-कभी उनके लिए समस्या बन जाती है। इस बात को सुरभि अच्छी तरह से जानती है।
सुरभि एक ऐसी लड़की है, जो सेशांक के बारे में बहुत कुछ जानती है। क्यों जानती है ये तो सुरभि और सेशांक हीं जानें।

जैसे ही सेशांक कक्षा में उपस्थित होतें हैं, सेशांक को देखकर सुरभि के होठों पर एक साथ कई मुस्कुराहट भरी रेखाएं खिच आती है, और मुस्कुराहट के साथ - साथ उसकी आँखों में एक अलग ही चमक दिखाई देने लगती है।
ऐसा नहीं है कि सुरभि सिर्फ सेशांक सर को हीं देखकर खुश होती है, वह हर शिक्षक को देखकर मुस्कुराती हुई शुभ - प्रभात बोलती है, लेकिन सेशांक के लिए उसकी आँखों में जो चमक दिखाई देती है न, वैसी चमक शायद ही किसी और इंसान के लिए उसके आँखों में दिखाई नहीं देती होगी।
और सुरभि को यही अदा निकेश को परेशान कर दे रहा था ।
निकेश नहीं चाहता था कि सुरभि, सेशांक सर को देखकर जो इतनी खुशी से झूम उठती है न, वह ऐसा न करे।
कभी-कभी तो वह ऐसा न करने के लिए इशारा भी किया करता था।
परंतु सुरभि तो सुरभि थी।
वह कहाँ निकेश की बात सुनने वाली थी।

जो सुरभि का मन में आता, बोल जाती। जो मन करता कर जाती। उसको अपने न मन पर कोई नियंत्रण थी, और नहीं अपनी जुबान पर।
इसलिए वह कभी-कभी सेशांक सर से डाॅट भी सुन लिया करती थी। सेशांक सर कभी-कभी सुरभि कि नादानियाँ देखकर झल्लाहट भरे अंदाज में बोल उठतें थे, - "पागल हो क्या?"
इसपर सुरभि सिर्फ मुस्कुराहट भरें अंदाज में अपने दायें - बायें देखने लगती, वह कुछ बोलती नहीं ।
और सुशांत सर उसको एक नजर देखने के बाद चुपचाप अपनी नजरें फेर लिया करतें , और पुनः क्लास में लेक्चर देना शुरू हो जातें।
-"हाँ जी बोलों मैं कहाँ था.... ।"

सेशांक सर का लेक्चर का पहला वाक्य यही होता था, हाँ जी बोलो हम सब कहाँ थें। और उसके बाद वो शुरू हो जातें थें अपने मूल विषय पर।
लेकिन निकेश को सेशांक सर का लेक्चर में रुचि कम, और सुरभि में ज्यादा रहता। जो सेशांक सर से छूपा हुआ नहीं था । सेशांक सर को मानना था कि मैं भी अपने स्कूल लाइफ में आज के लड़को जैसा हीं था।

और काॅलेज लाइफ की बात हीं कुछ अलग थी।
आज भी वो दिन सेशांक सर को अच्छी तरह से याद है। जब सेशांक सर शहर के एक नामी-गिरामी कॉलेज का छात्र हुआ करतें थें। उनकी जिंदगी में पढ़ाई के सिवा कुछ और भी था, तो वह थी प्रियतमा। प्रियतमा के चेहरा बहुत कुछ सुरभि से मिलता - जुलता था।
सेशांक को ऐसा लगता था कि ईश्वर ने प्रियतमा का चेहरा पर सुरभि का चेहरा चिपका दियें हैं।
लेकिन सेशांक को पता था, ऐसा होना आम बात है। एक जैसे चेहरा होना प्रकृति में आम बात होती है। इसलिए वो चुपचाप अपना कर्तव्य पर ध्यान देतें थें। और ऐसे भी सेशांक और सुरभि के उम्र में आकाश- पताल का अंतर था।
फिर भी सुरभि को देखतें ही सेशांक को प्रियतमा का ख्याल मन में आने लगता था। वो प्रियतमा जो आज से तकरीबन उन्नीस साल पहले एक कार एक्सिडेंट में मौत को गले लगा ली थी।


भाग - 2
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वह प्रियतमा जो सेशांक के लिए घड़कन से कम नहीं थी। सुनने में ऐसा भी आता है कि सेशांक और प्रियतमा दो शरीर और एक आत्मा जैसे थें।
प्रियतमा बड़ी घर से ताल्लुक रखती थी, फिर उसके मन में तनिक भी घमंड नहीं था। लेकिन उस प्रियतमा को ज्यादा दिनों तक सेशांक की जिन्दगी में रहना मंजूर नहीं था। विधाता को कुछ और हीं मंजूर था।
एक दिन सेशांक प्रियतमा के ही कार से शहर के हाइवे से गुजर रहा था, उसे उस दिन छूट्टी मनाने शहर के पास हीं एक पहाड़ी पर जाना था । उस कार में संयोग से सेशांक के साथ प्रियतमा भी बैठी हुई थी। दोनों बहुत खुश थें, और प्रियतमा मुस्कुराती हुई सेशांक से बातें कर रही थी, - "यार ये हाइवे जरा खतरनाक है तू ड्राइव जरा सोच समझ कर करो न.... ।"

प्रियतमा की इस बात पर सेशांक मुस्कुराहट भरे अंदाज में बोला था, - "कुछ भी नहीं होगी जानू.... मैं हूँ न, और ऐसे भी तू अकेली कहीं नहीं जा सकती.... अगर तुझे कुछ हुआ न.... तो मैं भी तेरे पीछे - पीछे...। "

" चुप भी रहिए... ये सब बातें मत कीजिए, मुझे डर लगता है।" - सेशांक की बात काटती हुई प्रियतमा बोल पड़ी थी।

जिसपर सेशांक हँसने लगा था।

" जानते हो सेशांक... अब हम पहाड़ी से कितना दूरी पर हैं? "
" हाँ क्यों नहीं, जानतें हैं। सामने ही तो दिखाई दे रही है। "
" अरे बाबा सामने दिखाई देने से दूरी को पता ठोड़ी लग रही है। "
" महज पाँच किलोमीटर की दूरी अभी बाकी है।".
"कैसे बतला रहे हो....?"

प्रियतमा के इस सवाल पर सेशांक ने हँसतें हुए बोला था, -" अरे यार, तुझे क्या लग रहा है कि सिर्फ मैं गाड़ी ही चला रहां हूँ, और गाड़ी चलाते हुए गपशप कर रहां हूँ। लेकिन ऐसी बात नहीं है प्रियतमा.... मैं सड़क के किनारे लगे हुए उन माइल स्टोन और साइनबोर्ड को भी पढ़ते आ रहा हूँ.... ।"

"अच्छा जी, पढ़ने की आदत नहीं गयी है न... ।".
"कैसे जायेगी... आजतक मेरे पास दो ही नशा है प्रियतमा, एक पढ़ाई और दूसरी... ।"
सेशांक इससे आगे कुछ और बोलता, प्रियतमा मुस्कुराहट भरी अंदाज में बोल पड़ी, -" दूसरा प्रियतमा है , है न ? "
इतना बोलकर प्रियतमा हँसने लगी। तभी सेशांक की नजर कुछ पल के लिए हँसती हुई प्रियतमा की ओर घूम पड़ी, और यही नजर घूमना सेशांक के जीवन में तूफ़ान ला दिया।

सेशांक को पता नहीं था कि आगे एकाएक ट्रक आ जायेगा।
जबतक सेशांक ट्रक को देखता, देर हो चुकी थी।
उसने तेजी से कार को बचाने के चक्कर में गाड़ी को बांये की ओर काटी, और गाड़ी सीधे हाइवे से नीचे।
कार फूल स्पीड में थी....
सेशांक और प्रियतमा को संभलने का मौका भी नहीं दिया ।
एक जोरदार आवाज के साथ गाड़ी हाइवे के नीचे लगे वृक्षों से टकराती हुई एक पत्थर से जा टकराई।

इस हादसे में सेशांक को जबरदस्त चोट लगी, थी और प्रियतमा....!
प्रियतमा हमेशा - हमेशा के लिए इस संसार को अलविदा कह गयी।

जीवन और मृत्यु दोनों निश्चिंत है इस संसार में , लेकिन जब यह समय पर आती है न , तो अपनो को दर्द उतना नहीं देता।
लेकिन जब असमय आती है तब ? अपनो को दर्द के साथ - साथ जीवन भर का एक खालीपन भी दे जाती है।

प्रियतमा ने जाते - जाते अपनो को तो दर्द दें हीं गई थी, लेकिन सेशांक के जीवन में दर्द के साथ-साथ एक खालीपन भी दे गई थी। एक ऐसी खालीपन, जो कभी नहीं भरने वाली थी।

सेशांक इसी खालीपन के साथ-साथ , मन में एक अनछुए दर्द को बसाये हुए , अपनी जिंदगी के सफर पर चलतें हुए तकरीबन उन्नीस साल गुजार दियें थें।
परंतु जब उसके सामने सुरभि आयी तो एकाएक सेशांक को झकझोर कर रख दी।

सुरभि का हावभाव और चेहरा प्रियतमा से काफी मिलता-जुलता था।
लेकिन सेशांक इसे एक संयोग मानकर अपने आप को सिर्फ कर्तव्य पालन कि ओर लगायें रहतें ।
परंतु ये मन को क्या करता वों ...? कभी-कभी लेक्चर के दौरान सेशांक सर की आँखें सुरभि से जा मिलने पर वह कुछ विचलित सा हो जातें ।

इधर सुरभि के मन में भी कुछ ऐसा ही चल रहा था। वह सेशांक सर को बारें में बहुत कुछ जानने के लिए बेचैन सी रहती थी।

सोशल मीडिया पर सेशांक सर का हर पोस्ट को बड़े ही ध्यान से पढ़ती, और अपनी सहेलियों से इस पर खुब बातें किया करतीं। लेकिन जब सहेलियाँ हँसतें हुए बोलती कि वह कौन है, तब सुरभि हँसकर सहेलियों की बातें टाल देती।

परंतु सुरभि का मन इतना परिपक्व नहीं था कि वह कुछ बोल सके या लिख सके। सिर्फ उसके हिसाब से सेशांक का पोस्ट के प्रति एक लगाव सा हो गया था, जो उसे पढ़ने और देखने में अच्छा सा लगता था।

वह समझ नहीं पा रही थी इस प्रकृति के रहस्यों को, और नहीं इसके इशारे को । क्यों मेरा मन सेशांक की ओर खिंचता है।

और..
इधर निकेश भी धीरे-धीरे कर के सुरभि का दिवाना होते जा रहा था। वह जब भी मौका देखता, सुरभि से बातचीत करने से पीछे नहीं हटता था।
और सुरभि को भी निकेश से बातें करना कुछ-कुछ अच्छा सा लगने लगा था, इसलिए दोनों ने एक-दूसरे को whatsapp नम्बर भी आपस में सेयर कर लिए थें ।

दोनों रात में दस - पंद्रह मिनट तक चैट किया करतें। जो सुरभि के माता-पिता को पता नहीं था।
सुरभि पढ़ाई करने का बहाना बनाकर, और नंदिता से बात करने को लिए बोलकर, मोबाइल अपने माँ से ले लिया करती , और निकेश के मैसेज को जवाब देने लगती।

निकेश अपने प्रोफाइल पर कोई भी तस्वीर नहीं रखता था, जिसके कारण सुरभि के घर में किसी को कोई परेशानी नहीं होती। घर में रह - रहे सदस्यों को यही पता था कि सुरभि, नंदिता से बातें कर रही है ।
दोनों आपस में चैट करतें जातें, और कुछ ही मिनटों के अंदर उसे डिलिट भी करतें जातें ताकि किसी को कुछ भी समझ में न आ सके।
परंतु यही बात धीरे-धीरे निकेश का सिर चढ़कर बोलना शुरू किया।
सुरभि का सारा चैट को वह डिलिट होने से पूर्व स्क्रीन रिकार्डिंग चालू करके विडियो बना लिया करता था, जो सुरभि को पता ही नहीं था।
सुरभि को तनिक भी ऐहसास नहीं था कि निकेश चैटिंग के दौरान स्क्रीन रिकार्डिंग चालू रखता है।



भाग - 3
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यह पता तब चला सुरभि को जब उसे लोग निकेश के साथ जोड़कर स्कूल में लोग बातें करने लगे।
सुरभि को अच्छी तरह से पता था कि निकेश को छोड़कर कोई और इस बारे में नहीं जानता। इतना तक कि अगर बात कि जाय नंदिता को तो नंदिता भी कुछ नहीं जानती थी निकेश के बारे में कि मैं निकेश से बातें करतीं हूँ।
फिर यह पुरा स्कूल कैसे जान गया?
यह बात सुरभि को खाये जा रही थी। अगर घर में मम्मी-पापा जान गयें तो मुझे खैर नहीं।वों तो सीधे स्कूल से हटाकर घर बैठा देंगे।
अब क्या करें क्या नहीं। उसकी समझ में कुछ भी नहीं आ रही थी। कोई मुँह पर तो सीधे-सीधे कुछ नहीं बोल रहा था , परंतु पीठ पीछे सुरभि को मजाक बनाया जाने लगा था।

उसने नंदिता से मदद की उम्मीद की, लेकिन नहीं, क्यों न यह बात निकेश से हीं पुछ लूं मैं ।
यह सोचकर वह चुपचाप क्लास रूम में बैठी रही।
कुछ ही मिनटों में सरोजनी मैंम की घंटी समाप्त होने वाली थी।
अब जो आने वाले थें अगली घंटी में, वो थे सेशांक सर।

क्या सेशांक सर से अकेले में मिलूं ?
सुरभि को दिमाग में यह विचार बिजली की तरह आयी, और चली गयी।

शायद सुशांत सर...!
क्या मदद करेंगें मुझको?
ऐसे तो मानते मुझको बहुत हैं, लेकिन कभी उनसे सीधे मुँह मैने कभी बात नहीं की है । जब-जब उनको सामने मैं आने की कोशिश की हूँ, तबतब वो मुस्कुराते हुए मेरे सामने से हट गयें हैं। ऐसी बात नहीं है कि वो मुझको मदद नहीं कियें हैं। एक-दो बार मदद भी कियें हैं, लेकिन जब मैं उन्हें थैंक्स बोलना चाहा तो वो मेरे सामने कभी आ ही नहीं पायें।

कुछ अनहोनी होने का डर क्यों लगता है।
बहुत से बच्चे उनके काफी नजदीक हैं। सभी से हँसतें हुए बातें करतें हैं। कभी-कभी गुस्सा भी होतें हैं लेकिन..... ।

सुरभि यह सब सोच हीं रहीं थी कि घंटी लग गई।
घंटी लगतें हीं सरोजनी मैंम चलती बनी। वो जब भी बाहर निकलती है तो बच्चों को ऐक्शन देखने लायक होता है।

खैर छोड़ों, जिसको जो करना है वो करते रहे। कुछ ही मिनटों के अंदर चपरासी नंदकुमार आता है, और उसके ठीक पीछे सेशांक सर का आगमन हो जाता है।

सेशांक सर का चहरा पर कुछ खामोशी की लकीरें दिखाई दें रही थी आज ।
सुरभि को अब कुछ भी समझ में नही आ रही थी कि वो करे तो क्या करें, किससे बोलें।
खैर उसे अब शांत ही रहने में अभी भलाई थी, इसलिए चुपचाप सेशांक सर को लेक्चर सुनती रही।

लेकिन उपर से देखने वाली शांत सुरभि का मन अंदर से शांत नहीं था।

"क्या बात है सुरभि तुम्हारी ध्यान कहा़ँ हैं?" - सेशांक सर की आवाज क्लास रूम में गुंज उठी।

"स स नहीं सर कहीं नहीं।"
"ओके!".
इतना बोलकर सेशांक सर अपना लेक्चर देने लगे।
लेकिन सुरभि के ठीक पीछे बेठा निकेश को कुछ और हीं दिमाग में चल रहा था, परंतु सुरभि को बदले हुए तेवर देखकर, कुछ भी वह पीछे से नहीं बोल पा रहा था।

इधर किसी - किसी प्रकार सेशांक सर का लेक्चर सुरभि सुन पा रही थी ।

उसके मन से बार - बार आवाज आ रही थी कि सुरभि तुझे किसी से न तो किसी से मदद लेनी ही पड़ेगी। तू तो अपनी बात घर पर भी नहीं न बोल सकती न , और नहीं तू यहाँ किसी और को बतला सकती हो।

कुछ देर के बाद चपारासी सेशांक सर के क्लास में आता है, और आतें ही बोल पड़ता, - "सर जी, आपको आफिस में प्रिंसिपल सर जी बुला रहें हैं।"

"ओके चलिए।"
- इतना बोलकर सेशांक सर क्लास से बाहर निकल गयें, ये बोलतें हुए कि एक मिनट ठहरो मैं आता हूँ।

सेशांक सर को जातें हीं निकेश को कुछ बोलने का मौका मिल गया।
"क्या हुआ, क्यों मुँह फुलाये बैठी हो...? "

निकेश के इस सवाल पर सुरभि कुछ भी नहीं बोलती। जिसपर निकेश अंदर हीं अंदर तिलमिला कर रह जाता है। और सोचने लगता है, इसकी जरा अकड़ तो देखो... पता नहीं इसको क्या हो गई है आज मुँह लटकाये बैठी हुई है। कल तक तो अच्छी - भली थी।
यह बात सोचते हुए निकेश बोल पड़ा, - "ठीक है मत बोलो आज शाम को अॉनलाइन आओगी न....? "
इस सवाल पर सुरभि सिर्फ हाँ में अपना सिर हिला दी।यह सोचते हुए कि आज तेरे लिए शाम को तुमसे आखिरी चैटिंग होगी।


भाग-4
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रात्रि का लगभग 9 बजे होंगे।
नौ बजतें ही सुरभि आॅनलाईन हो चुकी थी, बस इंतजार था कि निकेश कब अॉनलाइन आता है।

उसके मन में कई प्रकार की बातें चल रही थी, कि आखिर ये बात फैलाया तो कौन फैलाया...?
मन इतना विचलित था कि स्कूल से आने के बाद भी सुरभि को कोई भी काम करने में मन नहीं लग रहा था। बार - बार सुरभि के मन में यह सवाल आ रहें थे कि अगर इस बात को मेरे मम्मी - पापा जाने तो क्या होगा?
वो बार - बार मोबाइल स्क्रीन पर अपनी नजरें दौड़ा रही थी, तभी निकेश का मैसेज आया, - "Hi"

सुरभि का मन पहले जैसा रियेक्ट नहीं किया था निकेश का मैसेज देखकर, जैसा कि पहले किया करता था।

जब निकेश ने पहली बार सुरभि को मैसेज भेजा था, तब सुरभि के दिल एकबार जोर से धड़का था, और सुरभि कंपकंपाती हाथों से मैसेज का जवाब देने के लिए मोबाइल के कि-बोर्ड पर अपनी अंगुलियाँ चलाने लगी थी।
परंतु आज....
आज कुछ भी ऐसा नहीं हुआ था।

"तुने तो मुझे कहीं को नहीं छोड़ा....।"
सुरभि ने कंपकंपाती अंगुलियों से मैसेज को कि-बोर्ड से टाइप कर निकेश को सेंड कर दी।

"क्या हुआ?"
"स्कूल में सब कैसे जान गयें?"
"मतलब?"
"मतलब यही की हम दोनों आपस में बातें किया करतें हैं, इसकी चर्चा स्कूल में...!? "

"तो क्या हुआ....? करतें हैं तो करतें हैं।" - निकेश ने सुरभी को जवाब दिया ही था कि सुरभि आॅफलाईन हो गई।

सुरभि का मन अंदर हीं अंदर गुस्सा से काप उठा था।
पता नहीं वो पागल निकेश किसको - किसको चैट दिखाया होगा?

उसको तो यह सब करने में बड़ा मजा आया होगा न....?
लेकिन मेरा क्या, मुझको बारे में लोग तरह - तरह की बातें बनाएंगे.... मेरा कैरेक्टर पर लोग अंगूली उठायेंगे।

कुछ मिनटों तक सुरभि यूं ही शांत होकर सोचती रही और फिर उसके बाद, कुछ सोचते हुए पुनः आॅनलाईन हो गई ।

उसने अॉनलाइन होतें हीं देखी....
निकेश ने मैसेज की झड़ी लगा दिया था। कुछ प्यार भरे शब्द थे उसके मैसेज में तो कुछ नफरत भरे धमकी भी।

निकेश ने अंतिम मैसेज में लिखा था, अगर तू मेरी बात को नहीं मानी तो इसका परिणाम बहुत गलत होगा।

यह अंतिम वाक्य सुरभि के मन में चूभ सी गई। उसको इस बात का तनिक भी अनुमान नहीं था कि निकेश मेरे साथ ऐसा भी करेगा।

बस, अगले पल ही....
अगल पल वह तुरंत निकेश का नम्बर को ब्लाॅक कर दी... इस संकल्प के साथ की तुझे जो भी करना है कर... ।

परंतु नम्बर ब्लाॅक करने के उपरांत भी सुरभि का मन शांत नहीं हुआ था। वह कुछ देर तक यूं हीं सोचती रही, और फिर उसको बाद वह मोबाइल फोन को अलग रख अपने काम में लग गई, ताकि निकेश के बारे में वह सोचना बंद कर दे।

फिर भी,
काम करते हुए भी वह निकेश के बारे में सोचती ही जा रही थी कि आखिर उसने मेरे साथ ऐसा क्यों किया।

भाग-5
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रात्रि में देर तक जागने के कारण सुरभि को नींद देर से आयी थी। वह रात्रि में बहुत देर तक निकेश के ही बारे में ही सोच रहीं थीं। क्योंकि उसको अच्छी तरह से ज्ञात था कि अगर ये बात मेरे माता-पिता को पता चल गया तो मेरे घर में तूफान आ जायेगा। खासकर मेरे पिताजी, वो मुझे अक्सर हिदायत दिया करतें हैं कि लड़कों से विशेष लगाव न रखना ।

सुरभि यह सब सोच हीं रहीं थीं तभी सुरभि की माँ, सुरभि का कमरा के गेट पर दस्तक देते हुए बोल पड़ती है , - "क्या स्कूल नहीं जानें को हैं क्या?"

वह माँ की आवाज सुनकर अनमने ढंग से बिछावन पर से उठी , और कमरा से बाहर निकल पड़ी , फिर टॉयलेटरूम कि तरफ बढ़ चली। वह भी माँ से बिना कुछ बोले।

सुरभि इस समय स्वयं को लेकर अजीब सी अनुभव कर रही थी। एक घूटन सी भरी हुई अजीब सी डर उसके मन में घेरा डालतें जा रहा था।
फिर भी वह सोच रही थी.... ।
आज तो वह स्कूल जायेगी हीं, क्योंकि अगर वह नहीं गयी तो लोग हजारों सवाल करेंगे।

लेकिन...!
जब निकेश सामने आयेगा तब....?
वह मुझे देखकर अपना चेहरा पर पर एक ज़हरिली मुस्कुराहट जरूर लायेगा?
और मैं उसको देखतें ही अंदर ही अंदर जल उठूंगी।

क्यों न आज कोई बहाना बना दूं.... नहीं - नहीं, यह नहीं हो सकता, कुछ दिन पहले जब बहाना बनाया था .....।

खैर किसी प्रकार मुझे उसका मोबाइल फोन हाथ लग जाय तो ज्यादा अच्छा होता।
लेकिन, यह नहीं हो पायेगा.... अब तो मैं उसे ब्लाॅक कर दिया हूँ।
सुरभि यह सब सोच हीं रहीं थी, तभी बाहर से पूनः माँ की आवाज सुरभि के कानों से टकराई। और सुरभि जल्दीबाजी में स्वयं पर नियंत्रण करतें हुए टॉयलेट रूम से बाहर निकल पड़ी।

सामने दीवार पर लगी हुई घड़ी में, समय स्कूल बस आने की ओर इशारा कर रहीं थी। मात्र, स्कूलबस आने में कुछ ही मिनट बाकी थी।

सुरभि जल्दी - जल्दी स्कूल जाने के लिए तैयार होने लगी। वह तैयार होते जा रही थी, और निकेश के बारे में सोचती जा रही थी।
लगभग आधे घंटे में वह तैयार होकर स्कूल जाने के लिए बाहर सड़क पर निकली।

परंतु....?
परंतु अभी तक स्कूलबस नहीं आयी थी। स्कूलबस तो अपने समय पर प्रतिदिन आ जाया करती है, आज उसे क्या हो गया?
कहीं पहले ही तो वह नहीं चली गयी?

लगभग बीस मिनटों तक इसी प्रकार सोचते हुए, सुरभि सड़क के किनारे बस के इंतजार में खड़ी रही लेकिन बस नहीं आयी।

अब वह हारकर अपना घर वापस लौटना चाह रही थी। क्योंकि वह कोई अॉटो इत्यादि से स्कूल जाना नहीं चाह रही थी। ऐसे भी आज, उसको अंदर से मन नहीं कर रहा था स्कूल जाने के लिए, और दूसरे में स्कूलबस भी अभी तक नहीं आयी थी।

परंतु, जैसे ही वापस अपने घर जाने के लिए सुरभि मुड़कर देखी, कुछ ही दूरी पर एक जानापहचाना चेहरा बाइक से आते हुए सुरभि को नजर पड़ गई ।
वह बाइक पर बैठा हुआ नवयुवक , कुछ ही सेकेंड में सुरभि के सामने था ।

"सेशांक सर...?"
- सामने आतें ही, जैसे ही बाइक पर बैठा हुआ नवयुवक अपना हैमलेट सिर पर से हटाया, वौसे ही सुरभि के होठों पर यह शब्द फूट पड़े।

और इधर...
सुरभि को देखतें हीं सेशांक सर का चेहरा पर एक साथ कई मुस्कुराहट की लकीरें भी खिच आयी ।

"यहाँ पर क्या कर रही हो अभी तक?" - सेशांक सर ने सुरभि को सड़क पर अकेली खड़े होते देख सवाल कियें।

तभी सुरभि बोल पड़ी, - "सर मेरी गाड़ी निकल गयी है शायद!"

"तो क्या करोगी यहाँ पर.... ऐसे मैं आज स्कूल नहीं आ रहा हूँ, लेकिन चलों मैं तुझे स्कूल छोड़े आता हूँ।"

"नहीं सर, आप चले जाइयें कहीं आप जरुरी काम से जा रहें हैं तो आपको लेट हो जायेगी न?"
"कोई बात नहीं... बैठो, चलो तुझे छोड़े आता हूँ ।"
आज सचमुच सुरभि को स्कूल जाने का कोई इरादा नहीं था। लेकिन वह चाहकर भी सेशांक सर को ना नहीं कर पायी, और उनके बाइक पर, उनके साथ पीछे बैठ गई।

कुछ हीं मिनटों के अंदर बाइक स्कूल जाने वाली सड़क पर थी।

सेशांक सर बाइक की चाल को बढ़ा दियें थें ताकि सुरभि को समय पर स्कूल छोड़ कर वो आपस अपने काम की ओर लौट सके।

लेकिन...
बाइक की चाल बढ़ जाने के कारण, सुरभि को कुछ अजीब सी महसूस होने लगी थी। उसे ऐसा लग रहा था कि उसके ह्रदय का धड़कन कुछ बढ़ सा गया है।
परंतु उसे यह सब कुछ भी समझ में नहीं आ रही थी कि आज उसे हो क्या गया है ? पहले तो ऐसा कभी नहीं हुआ करता था।

खैर यह सब सोचती हुई कि शायद रात्रि में मैंने सही से सोया नहीं हूँ इसीलिए ऐसा लग रहा है मुझे ; सेशांक सर के साथ बाइक पर बैठी रही सुरभि ।

परंतु होनी तो प्रबल होती है न?
जो होना होता है न , वह तो होकर हीं रहता है न। ऐसा माना जाता है कि प्रकृति वही करती है जो वह किसी से करवाना चाहती है।
आज कुछ सुरभि और सेशांक के साथ वो सब होना था, जो दोनों ने कल्पना तक नहीं कियें थें।

सुरभि के नजरों में....
बाइक कुछ इस तरह सेशांक सर चला रहें थें, कि मानो वह हवा से बातें कर रहें हों। इसीलिए सुरभि डर के मारे सेशांक सर को जोर से पकड़ ली थी।

तभी उसने देखी कि एक ट्रक तेजी से बाइक की ओर बढ़ते चला आ रहा है।

बस फिर क्या था....!
इतना देखतें हीं सुरभि के मन में जो डर था, वह और बढ़ गया, और डर के मारे उसका गला सुखने लगा , जिसके कारण वह जोर से चिल्ला उठी,-"नहीं सेशांक नहीं...।"

सुरभि की आवाज इतनी तेज थी कि सड़क पर खड़े लोग भी बाइक की ओर देखने लगे थें।


बाइक अब रूक चुकी थी।
"क्या हुआ...!? "
- सेशांक सर ने हड़बड़ाहट में बोलते हुए, बाइक को ब्रेक लगा दियें थें।
और सुरभि की ओर देखने लगे थें ।

सुरभि डर के मारे सेशांक सर को जोर से पकड़े हुए थी, और आँखें बंद किये हुए लगातार बोले जा रही थी, - "नहीं सेशांक नहीं...कार एक्सिडेंट कर जायेगी।"

कार एक्सिडेंट कर जायेगी ! ? सेशांक का दिमाग एक दम सन्न रह गया था सुरभि के द्वारा बोले गये इस वाक्य को सुनकर।

सुरभि का शरीर उस समय भय के मारे काँप रहा था।
सेशांक सर उस समय कुछ विशेष समझ पातें, तबतक सड़क पर खड़े लोग सेशांक के पाँस पहूँच गयें थें।
और आतें ही तरह - तरह के सवाल करना शुरू कर दियें थें ।
लेकिन सड़क किनारे खड़े लोग कुछ और समझ पातें, सुरभि को होष आ गई थी, और वो मुस्कुराहट भरें अंदाज में बोली, "मैं ठीक हूँ चलिए यहाँ से...।"

लेकिन सेशांक सर ठीक नहीं थें। पहले तो भ्रम था, लेकिन अब उनको यकीन हो चला था कि सुरभि कोई और नहीं प्रियतमा ही है। लेकिन चाहकर भी वो कुछ कर नहीं सकतें थें।

दो दिन के बाद सुरभि ने अपनी सारी बातें सेशांक सर को बता दी, जो निकेश और उसको बीच हुई थी। निकेश को उस हरकत के कारण बहुत डाँट पड़ी, और निकेश ने ऐसा न करने को प्रोमिस कर सुरभि से दूर हो गया।

बात आयी और चली गयी। तीन साल बाद जब-जब यह बात याद आती है सेशांक सर को, तब- तब वह मुस्कुराहट भरें अंदाज में स्वयं से बोल पड़तें हैं, "प्रियतमा तू बांध गयी मुझको एक अनजाने भय और अनछुए स्नेह से, खैर तू जहाँ भी रहो खुश रहो ।"




- :समाप्त :-