fruit of honesty - 3 books and stories free download online pdf in Hindi

ईमानदारी का फल - 3

मनोहर अब दुकान पर बैठ कर अच्छे से दुकान को संभाल रहा था। पूरा दिन मनोहर ने अच्छे से दुकान को संभाला और बिल्कलभी बेईमानी नहीं की । अब जब रात होने को आई तो सेठ भी आ गया। उसने पूरा हिसाब किताब देखा तो सब कुछ बिलकुल सही था। उसने फिर मनोहर को दिनभर की दिहाड़ी दी । ओर फिर मनोहर खुशी खुशी घर गया। उसने रास्ते से ही खाने का सामान ले लिया ओर खुशी खुशी से घर गया। ओर उसने खाने का सामान बीवी को दिया और बच्चो के साथ खेलने लगा और फिर जब खाना बन गया तो सबने खाना खा लिया और फिर सब सो गए

जब फिर अगली सुबह हुई तब मनोहर उठ के त्यार हो कर फिर से दुकान के लिए निकल पड़ा। फिर दुकान पे जाके मनोहर ने अच्छे से दुकान को साफ किया और फिर अपने काम में लग गया । आज भी मनोहर ने पूरी ईमानदारी से काम किया।

कई दिन बीत गए सेठ ये देख रहा था की इतने दिन बीत गए मगर मनोहर ने बिल्कुल भी बेईमानी नही की है। और पूरी ईमानदारी के साथ काम किया और कोई लापरवाही भी नही की। ये सब देख कर सेठ बहुत खुश हुआ । और उसे अब मनोहर पर पूरा विश्वास हो गया था।

एक दिन सेठ ने मनोहर को अपने पास बैठाया और उसे बताया की देखो मुझे तुम्हारी ईमानदारी बहुत अच्छी लगी और में इससे बहुत परभावित भी हुआ हू। क्यूकि जिस तरह तुम्हारी जिंदगी गुजर रही थीं गरीबी में तुम्हारे पास खाने का कुछ भी नही था। तब मैने तुम्हे इतने बड़े दुकान की जिम्मेदारी दी। पर तुमने इतना सारा सामान देख कर ये नही सोचा की चलो मै कुछ सामान यहां से ले जाता हु।

इतना सारा सामान है सेठ को क्या फर्क पड़ेगा । मगर इससे मेरे बच्चो का पेट भर जाएगा। मगर तुमने मेरी दुकान से एक तिनका भी नही लिया। मेने जो दिया तुमने उसी में गुजारा कर लिया। मुझे तुम्हारी ये ईमानदारी बहुत ही अच्छी लगीं इसलिए अब मै तुम्हे दुगुना पैसा दूंगा और राशन भी। तकि तुम अच्छे से घर चला सको और बच्चो को भी पढ़ा सको।

ये सुनकर मनोहर बहुत खुश हुआ और खुशी खुशी मनोहर अपने घर गया। ओर उसने ये बाते अपनी बीवी को बताई । उसकी बीवी भी ये सुनकर बहुत खुश हुई। की अब हमारे बच्चे भी स्कूल जायेगे और अच्छा अच्छा खाना खायेंगे। फिर उसकी बीवी जल्दी जल्दी खाना बना के ओर खिला के जल्दी जल्दी सो गई।

फिर अगली सुबह हुई फिर करुणा ने जल्दी जल्दी खाना बनाया और सब को खिलाया ओर घर का काम जल्दी जल्दी करके बच्चो को स्कूल ले गई ताकि उनका एडमिशन करवा सके। फिर एक स्कूल में उसने तीनों बच्चो का एडमिशन करवाया । और उनकी ड्रेस और कॉपी किताब ली। और खुशी खुशी घर गई। अब मनोहर के बच्चे भी बहुत खुश थे की अब हम भी स्कूल जायेगे।

और मनोहर भी पूरी ईमानदारी से अपना काम कर रहा था। और अब मनोहर के बुरे दिन भी खत्म हो चुके थे उसकी जिंदगी भी अच्छी चल रहीं थी