Phool bana Hathiyar - 18 in Hindi Fiction Stories by S Bhagyam Sharma books and stories PDF | फूल बना हथियार - 18

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फूल बना हथियार - 18

अध्याय 18

एक नया नंबर।

"अप्पा! ऐसा लगता है शायद यह वही होगा। नया सिम कार्ड डाला है लगता है..."

"उठाकर बात करो... स्पीकर को ऑन करो!"

अक्षय ने फोन ऑन करके धीरे से 'हेलो' बोला।

दूसरी तरफ से खर-खर की वही आवाज आई।

"क्यों अक्षय! डेविट चर्च को जाकर देखकर आ गये लगता है..…?"

कमरे के अंदर शांति रहते हुए भी अक्षय, परशुराम, कोदण्डन, डॉ उत्तम रामन, चारों के निगाहों में डर समाया हुआ था वह एक दूसरे को देख रहे थे। मोबाइल के दूसरी तरफ से वह बात करने लगा। स्पीकर से उसकी आवाज बिखर रही थी।

"क्या बात है अक्षय! बोल नहीं रहे हो.... तुम डेविल चर्च में क्या करने आए हो मुझे कैसे पता चला यह सोच रहे हो क्या...? यह बहुत बड़ा बिजनेस डील है। तुम्हारे जैसे पैसे वाले मगरमच्छों के पास जाते समय मुझे सचेत होकर चेतावनियों के साथ ही एक-एक कदम उठाना पड़ता है...."

अक्षय ने अपनी आवाज को तेज किया ।

"यह देखो....! तुमको जो चाहिए वह रुपए हैं। हमारी जरूरत यामिनी और वह लड़कियां उसका सौदा करके खत्म कर। डेविल चर्च.... सब नहीं चाहिए। हम इतनी दूर नहीं आ सकते...."

"क्या है.... आ नहीं सकते....? यह देखो अक्षय....तुम जो कह रहे हो उसको सुनने की स्थिति में मैं नहीं हूं। मैं जो कह रहा हूं उसी को सुनना पड़ेगा..... तुम्हारे अप्पा कोदण्डन भी दिल्ली से आ गए हैं मुझे पता चला। उनको भी आज रात को स्पॉट पर लेकर आओ....! मैं जो बोल रहा हूं याद रखना। ठीक 11:00 बजे बातचीत शुरू होगी। 11:05 पर बातचीत खत्म होगी, मैं जो रकम बोलूंगा तुम चारों को सिर हिलाना पड़ेगा!"

कोदण्डन अब अपनी सहनशक्ति खोकर चिल्लाए।

"कौन है... रे.… तू...?"

"ओ... बड़ऊ! वानक्कम बड़ऊ...! दिल्ली जाकर कई करोड़ रुपयों का दूसरे व्यापारी से एक बिजनेस के बारे में बात करके आ गया लगता है?"

"यह सब तुम्हारी जरूरत का विषय नहीं है। मैं कौन हूं मेरी शक्ति कितनी है यह मालूम हुए बिना बात कर रहे हो..... चुपचाप सम्मान के साथ उन लड़कियों को हमारे सुपुर्द कर अपने डिमांड के राशी को लेकर जा.... तुम्हारा रेट क्या है एक करोड़ या दो करोड़.... बोलो...!"

"अरे...! बिजनेस बहुत बड़े पैमाने में है लगता है! मैं सौदे को दस लाख से शुरू करूं सोच रहा था। बढ़ऊ! तू तो.. करोड़ दो करोड़ स्टार्ट करके बिजनेस को कहीं का कहीं ले जाकर रोक दिया.... रात को 11:00 बजे डेविल चर्च में आ जाओ.... फिर बात करेंगे। आते समय किसी के पास कोई शस्त्र नहीं होना चाहिए।"

दूसरी तरफ से जल्दी से बात काट दिया गया।

अक्षय ने गुस्से से कोदंडन को देखा।

"अप्पा आप क्यों इमोशनल होकर बीच में बोल रहे थे ? उसने कैसे रेट बढ़ा दिया देखा ?"

"हम डर रहे हैं ऐसा नहीं दिखाना चाहिए अक्षय...."

"वह ठीक है! परंतु रेट को भी बढ़ा दिया? वह एकदम से 10 करोड़ मांग लेगा।"

"20 करोड़ मांगने दो.... हम देंगे तब ना?"

"क्या बात कर रहे हो अप्पा.. यामिनी और वह लड़की हमारे हाथ में नहीं आना चाहिए क्या?"

"अक्षय! हम लोगों को रुपए कमाने की ही आदत है। किसी को भी उठा कर देने की आदत नहीं है। यामिनी को और उसके साथ के दो लड़कियों को एक रुपये भी दिए बिना कैसे रिहा करेंगे यह विद्या मुझे आती है!"

परशुराम घबराकर कांपने लगे।

"कोदंडन यह कोई खेल की बात नहीं है... इसको हमें बड़े ध्यान से हैंडल करना है, वरना हम चारों को पुलिस लॉकअप में जाना पड़ जाएगा।"

"मुझे वह डर नहीं है क्या?"

"फिर क्यों ज़िद....? वह जो रुपए मांग रहा है देकर समस्या को खत्म करो!"

"रुपए से यह समस्या सॉल्व नहीं हो सकती परशुराम। रुपए दे दें तो समस्या बड़ी हो जाएगी... हमें शांति से सांस लेनी है तो उसे जिंदा नहीं रहना चाहिए!"

"अंकल! अप्पा सही बोल रहे हैं.... उसके मुंह को बंद करें तभी हम खुशी से सांस ले सकते हैं...."

"वह मेरे मन को सही नहीं लग रहा..... डॉक्टर! आप क्या कह रहे हो....?" परशुराम डॉक्टर उत्तम रामन से पूछा।

उत्तम रामन उसे सही कहते हुए सिर हिलाया। "एक घर में सांप है पता चलने के बाद, उस घर में शांति से सो सकते है? आज रात को पहली बार मिलने वाले हैं। वही उसके लिए आखिरी रात ही होनी चाहिए...."

"उसने तो कोई हथियार वगैरह लाना नहीं चाहिए बोला है ना?"

"उसको पता चले ऐसे ले जाएंगे क्या?"

कोदंडन की आवाज में गुस्सा देखकर परशुराम के चेहरे पर कालिख पुती जैसे हो गया।

तिल्लैय गंगानगर सीमा के अंदर कार प्रवेश करते समय रात के 10:45, उस समय करीब-करीब सभी घर अंधेरे में डूबे हुए थे। अक्षय कार को चला रहा था। पास में कोदण्डन। पीछे के सीट पर डॉक्टर उत्तम रामन और परशुराम बैठे थे।

अगले 5 मिनट के यात्रा में घर सब गायब हो गए। छोटे-बड़े पेड़ खाली जमीन यही सब कुछ दिखाई दे रहा था। कोदण्डन ने पूछा।

"वह डेविड चर्च के लिए और कितनी दूर जाना है अक्षय?"

"और एक किलोमीटर जाना है अप्पा...."

"बहुत बेकार एरिया है ऐसा लग रहा है?"

"यहां तक तो रोड ठीक है..… इसके बाद सिर्फ लाल रोडियों की सड़क ही है।" अक्षय बोला तभी सड़क की एक तरफ आड़ी तिरछी पेड़ की डंगालें नक्षत्र के रोशनी में दिखाई दे रहीं थीं। वे तुरंत छुप गए। अब कार की रफ्तार कम होकर वह कूदने लगी। चारों तरफ कोई रोशनी नहीं। कार के हेडलाइट के प्रकाश सिर्फ अपने पहले अंधेरे को पोछते हुए रास्ता दिखा रहा था।

बहुत सकड़े रास्ते से पाँच मिनट जाने के बाद कार एक पुराने कंपाउंड के दीवार के पीछे की तरफ जाकर खड़ी हुई। अक्षय कार के इंजन को बंद करके बोला।

"यह चर्च के कंपाउंड का गेट है.... इसके आगे जाने का रास्ता नहीं है। उतर कर चलना पड़ेगा!"

सब लोग उतर गए।

"टाइम कितना हुआ?"

10:55

"हम... उसके बोले समय पर आ गए। वह कहां हैं पता नहीं चल रहा....?" कोदण्डन के कहते समय ही अक्षय का फोन बजा।

"वही है!"

"बात करो"

मोबाइल के स्पीकर को ऑन कर "हेलो" अक्षय बोला।

"सब लोग रवाना होकर आ गए लगता है..." दूसरी तरफ से आवाज सुनाई दी।

"तुम बोले हम उसी जगह पर है उसी समय पर आ गए। तुम कहां हो?"

"चर्च के अंदर! चारों जने कंपाउंड के दीवार से चिपकी हुई जो पगडंडी है उससे अंदर आ जाओ.. मोबाइल में टॉर्च लाइट है क्या?"

"है....!"

"उसका उपयोग करके उसकी रोशनी में चल कर आओ.... इस चर्च के चारों तरफ सांपों का आना अधिक है.... अंधेरे में कहीं उस पर पैर ना पड़ जाए?" चारों लोग मोबाइल के टॉर्च को चालू कर लो। कंपाउंड के दीवार के साथ एक पगडंडी मिलेगी।"

चारों लोग देखते हुए धीरे-धीरे चल रहे थे। मोबाइल से दूसरी तरफ से उसने बात की।

"और 5 मिनट बाद चारों को चर्च के अंदर रहना है। ठीक 11:00 बजे बातचीत शुरू होगी। जल्दी आ जाओ... मोबाइल को अभी रखो.... तभी आप मैं चर्च में कहां हूं मालूम कर सकते हो!"

"यह... आ गए..!" अक्षय के बोलते ही कोदण्डन अपने कमर में छुपा के रखे हुए रिवाल्वर को छूकर देखा।

तीन फीट से ऊंचे बड़े हुए जंगली पौधों के बीच में से जंग लगे दो टुकड़ों में टूटे हुए गेट के पास जाकर वे खड़े हुए।

"हां अंदर आइए..!"

"सेलफोन से आर्डर करने पर वे लोग अंदर घुसे।"

"चर्च की सीढ़ियां दिख रही है...?"

"दिख रही है..."

"उन सीढ़ियों पर जाकर बैठो...."

फिसलने वाले मिट्टी से सना उस चर्च के अंदर बिल्ली जैसे चलकर वे लोग सीढ़ियों पर जा कर बैठे। कुछ देर मौन रहा फिर अक्षय नहीं पूछा।

"तुम कहां हो...? अभी 11:00 बज रहे हैं। तुम्हें जो बात करनी है कर लो...?"

सेल फोन में जोर की हंसी सुनाई दी।

"आज बातचीत नहीं होगी।"

"क्यों?"

"मैंने जैसे बोला वैसे तुम नहीं चले।"

"क्या नहीं किया....?"

"मुझे देखने आते समय कोई भी हथियार नहीं लेकर आना चाहिए मैंने बोला था। परंतु अभी तुम्हारे अप्पा के कमर में एक रिवाल्वर मुझे मारने के लिए छुपा के रखा है.... यह तुम्हारे बातचीत करने के आने का लक्षण है....?"

चारों लोग चुप रहे।

"क्यों.... बोल नहीं रहे हो?"

"सॉरी...! रक्षा के लिए अप्पा उस रिवाल्वर को लेकर आए।"

"यह देखो अक्षय! तुम चार लोगों के बारे में मुझे अच्छी तरह पता है। मैं भी एक खराब आदमी हूं। कानून विरोधी काम मुझे शक्कर पोंगल (विशेष डिश) खाये जैसे लगता है। चाहे काम कोई भी हो उसमें बेईमानी नहीं चलेगी। मैं सौदा सीधा-सादा करता हूं। तुम लोग इंटरनेशनल क्रिमिनल और मैं लोकल हूं। हम दोनों में से कोई भी पुलिस में फंसे तो, तुम्हारे ऊपर जो डालर की वर्षा हो रही है वह तुरंत बंद हो जाएगी। तुम्हें डॉलर नहीं मिलेगा तो मुझे नासिक करेंसी नहीं मिलेगी।"

चारों लोग उस अंधेरे में एक दूसरे को देखते हुए आघात लगे से मौन रहे।

सेलफोन की आवाज फिर आई।

"क्यों चारों लोगों को शौक लग गया ऐसा लग रहा है? यहां मैं लोकल रहा हूं तो भी कई देशों के बदमाशियों को मैं जानता हूं। उसमें एक भ्रष्ट प्रोजेक्ट तुम्हारा 'फूल से बना हथियार!' यू.एस.ए. में फॉर मेडिकल फ्यूचर साइंस यह गलत प्रोजेक्ट के लिए रुपयों को करोड़ों-करोड़ों देने को भी तैयार है.... आने वाले इतवार को यू.एस. से 'कॉल मैथ्यू' नामक एक अमेरिकन रिसर्च स्कॉलर तुम लोगों से बात करने आ रहे हैं। वह बातचीत तुम्हारे लिए 'यूज़फुल' नहीं होना चाहिए क्या...?"

अक्षय परेशान निगाहों से अपने अप्पा कोदण्डन देखा।

'इसे सब पता है! 'फूल से बना हथियार' की बात पता नहीं कैसे लीक होकर तीसरे आदमी के कानों में चली गई!'

अक्षय ने घबराहट को नहीं दिखाते हुए बात की।

'यह देखो! सांप का पैर सांप जानता है ऐसा कहते हैं। हम तुम्हारी कमजोरियों को बताने की नहीं सोच रहे..... बातचीत शुरू करते हैं। तुमको जो चाहिए वो रुपए हैं। हमको जो चाहिए व तीन लड़कियां हैं। तुम्हारा रेट क्या है बोलो!"

"सॉरी!"

"किसलिए सॉरी!"

"अब समय 11:05 हो गया। बातचीत खत्म हुई। दोबारा कब बात करेंगे ?, कहां करेंगे ? मैं मोबाइल से बता दूंगा। अब आप जा सकते हो..."

"कल आते समय बंदूक को घर पर रखिएगा !"

जल्दी-जल्दी बात खत्म कर दिया। अक्षय ने अपने माथे को पकड़ लिया।

"अप्पा! यह साधारण आदमी नहीं है। बहुत जिद्दी आदमी हैं। अब यहां वेट करने से कोई फायदा नहीं। चलते हैं!" अक्षय के बोलते ही इतने में कोदण्डन ने हाथ से उसे बैठने को कहकर अपनी आवाज को धीमी करके बोला।

"किसी को उठने की जरूरत नहीं। ऐसे ही बैठे रहिए। मैंने उसे देख लिया!"