Prem Gali ati Sankari - 10 in Hindi Love Stories by Pranava Bharti books and stories PDF | प्रेम गली अति साँकरी - 10

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प्रेम गली अति साँकरी - 10

10

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रतनी को जिस स्थिति में ब्याहकर लाया गया था, वह कितनी भयावह रही होगी उसके लिए जिसके प्यार को छीनकर उसको एक शराबी के पल्ले बाँध दिया गया था लेकिन उसमें शीला दीदी की भी इतनी गलती नहीं थी क्योंकि उन्हें पता ही नहीं था रतनी की ज़िंदगी के बारे में, केवल इसके कि वह अपने माता-पिता के बाद भाइयों के रहम पर पल रही थी| उसके भाई ही तो अपनी बहन का रिश्ता लेकर आए थे और शीला ने उन्हें अपने भाई की हरकतों के बारे में स्पष्ट रूप से बताया था| 

“बहन जी, हमें तो आपके ऊपर विश्वास है कि आप हमारी बहन को संभालकर रखेंगी| आदमी तो गलती करते ही रहते हैं, उन्हें संभालती भी एक औरत ही है | कमाल ही है न !आदमी कुछ भी कर ले वह क्षम्य हो जाता है यदि स्त्री कुछ करे तो वह चरित्रहीन है, अक्षम्य है | क्या दोनों का जन्म किसी अलग क्रिया से होता है ? बहुत खीज आती थी मुझे ये सब बातें सुनकर !यह भी नहीं कि इस वर्ग के लोगों की ही ऐसी सोच थी, मैं तो अपने पॉश इलाके के लोगों के चेहरों के नकाब भी उलटते हुए देख चुकी थी | इसलिए इन सब बातों को किसी जाति, वर्ग के खाँचे में फ़िट करना मुझे कभी समझ नहीनन आया था | 

रतनी के भाइयों को पता तो था ही कि रतनी किसी के प्यार में है | वे खुद तो कुछ भी कर सकते थे, बस उनके घर की बहन-बेटी यदि कुछ भी कर लें तो आफ़त होने वाली बात थी, उनकी नाक कटने वाली बात थी | उन्होंने कई बार रतनी को उसके प्रेमी के साथ देख लिया था, उसे कितना पीटा था, उसके शरीर पर कितने धाव हो गए थे और मन के घाव तो सदा के लिए कि रतनी कई दिनों तक अपना शरीर और मुँह लपेटे पड़ी रही थी लेकिन घर का काम तो उसे करना ही था, भाभियों को आराम देने का काम तो उसका ही था न !

ज़िंदगी की उधेड़बुन में फँसी रतनी का प्रेम उसे भीतर से खोखला कर रहा था| उसका मन करता कि वह वहाँ से भाग जाए जहाँ न उसको प्यार मिला था, न ही मान और न ही सम्मान लेकिन मजबूरी की रस्सियाँ उसे जकड़े हुए थीं| समाज की बंदिशें उसके लिए ही अधिक होती हैं जो उससे बचने के लिए अपने आपको छिपाता रहता है | कितनी मज़बूरी में रहना पड़ रहा था उसको वहाँ ! लेकिन न रहती तो कहाँ जाती ? इसलिए जैसे ही उसके ब्याह की बात हुई, बिना किसी न-नुकर के वह चुपचाप जगन के साथ चल पड़ी | जहाँ उसके मायके में उसकी कोई सुनने वाला नहीं था, यहाँ कम से कम शीला दीदी तो थीं | और कुछ नहीं तो उनसे प्यार दुलार, परवाह तो मिला ही था रतनी को, जो कभी भी किसी से नहीं मिल सका था| 

बेशक बच्चे उसके साथ ज़बरदस्ती के शारीरिक संबंध से हुए लेकिन गर्भ में तो उसके ही पले थे, उनको जन्मने का आनंद और पीड़ा तो उसने ही सहन की थी| औरत जब माँ बन जाती है, उसकी सारी पीड़ाएँ न जाने कहाँ जा छिपती हैं| बच्चों की सूरत देखते ही वह सारी पीड़ा भूल जाती है, उसे याद रहता है केवल अपना माँ का ममत्व!कितने प्यारे बच्चे और कैसा कसाई पति !जिसे बच्चों का मोह, माया, ममता भी बदल नहीं सके थे| 

उस दिन तो हद हो गई, जब कभी दिव्य अपने मूड में होता आँखें मूंदकर गायन में लीन हो जाता | केवल कुछ दिन वह पिता से छिपकर कला-संस्थान में आया था और मैं उसके सुरों में भीग चली थी | कितना सरल, सहज था वह ! पंडित जी के पास चुपचाप बैठा रहता, कोशिश करता कुछ समझने की | अभी उसके पास कोई बड़ी ट्रेनिंग नहीं थी, वह न ही कोई उत्कृष्ट मार्गदर्शन!फिर भी वह मोबाइल के सहारे न जाने कितने राग समझता था, सीखता था | वह इनवॉल्व हो जाता था उसमें, खो जाता कहीं | उसे होश न रहता । माँ शारदा उसकी वाणी और कंठ में आकर ऐसे घुल मिल जातीं जैसे पवन में चंदन की सुगंध!वह सुगंध उसे अपने भीतर कहीं उतरती महसूस होती रहती और वह जैसे जोगी बन जाता, एक फकीरी स्वभाव बनता जा रहा था उसका| जैसे एक सूफ़ी, संत !

यह अलौकिक भाव होता जो उसे भौतिक से आध्यात्म की यात्रा की ओर ले चलता | उसके मन की प्रीत में न जाने क्या घुला होता कि वह अपना आपा खो देता| वह पंद्रह वर्ष का हो चुका था और उसके मन में रात की रानी का सुगंधित झौंका सा लहलहाता| अम्मा से पूछकर मैंने ही शीला दीदी को वह तानपुरा दिया था कि वे दिव्य को दे दें | उस दिन वह अपने में लीन हो इसी संगीत की दुनिया में खोया हुआ था कि अचानक‘सटाक’ से वह बिलबिला गया जैसे किसी संत की ध्यान-साधना भंग हो गई थी | उसे जगन के आने का पता ही नहीं चला | घर के पीछे की बॉलकनी में छोटी सी दरी बिछाए वह उस तानपुरे को छेड़कर स्वर-साधना करने का प्रयास रहा था जो अभी दो दिन पहले उसकी शीला बुआ चुपके से उसके लिए छिपाकर ले आई थी और फिर सबसे छिपाकर उसकी माँ रतनी उस तानपुरे को बिस्तरों के गट्ठर ले पीछे छिपाकर रख देती थी| 

जगन रात के बारह/एक से पहले कहाँ घर में घुसता था? उस दिन तो शाम के सात ही बजे थे जब दिव्य तानपुरे के तारों से अपने सुर मिलाने की कोशिश कर रहा था कि अचानक उसके पीछे पीठ पर एक ज़ोरदार डंडा पड़ा जो कुत्ते को मारने के लिए घर के मुख्य दरवाज़े के पीछे हमेशा रखा ही रहता था | गली के आवारा कुत्ते उनके घर की छोटी सी दीवार से उछलकर अंदर आ जाते और वहाँ रखे हुए जूतों, चप्पलों को काट डालते| उन्हें भगाने के लिए वह डंडा हमेशा वहीं रखा रहता था | अचानक उसकी पीठ पर डंडे का वह प्रहार पड़ा और वह जैसे सपन-लोक से गड्ढों वाली खुरदुरी जमीन पर आ पड़ा बल्कि जैसे किसी गड्ढे में घुस गया| वह अपने भावों में इतना तल्लीन था कि उसे समझ ही नहीं आया कि यह उसके साथ हुआ क्या है? जब उसके हाथ से एक झटके से तानपुरा छीनकर फेंक दिया गया, तब उसे होश आया | उसके सामने रौद्र रूप में जैसे साक्षात यमराज यानि जगन खड़ा था |