Mujahida - Hakk ki Jung - 26 in Hindi Moral Stories by Chaya Agarwal books and stories PDF | मुजाहिदा - ह़क की जंग - भाग 26

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मुजाहिदा - ह़क की जंग - भाग 26

भाग 26
देर रात आरिज़ कमरें में नही आये थे। शायद वह घर में ही नही थे। फिज़ा ने बाहर जाकर अम्मी जान से पूछा- "अम्मी जान! बारह बज गया है अभी तक आरिज़ नही आये हैं। क्या बात है?"
वह अभी जाग रही थीं और अब्बू जान मेहमान खाने में ही थे। वहाँ तो आधी-आधी रात तक जगार होती ही रहती थी।
आरिज़ की अम्मी ने फिज़ा को घूर कर देखा- "फिज़ा दुल्हन, क्या आप अपने शौहर की तहकीकात कर रही हैं?" उन्होंने ऐसा उलटा सवाल किया जिससे फिज़ा बगैर किसी गलती के उजलत में आ गई।
"नही नही अम्मी जान, हम तहकीकात क्यों करेंगे? बस आज दिल अच्छा नही हो रहा था। कुछ भी खाने को जी नही कर रहा। बार-बार लगता है उबकाई आयेगी। और सिर भी चकरा रहा है।"
"आप तो हामिला लगतीं हैं दुल्हन, ये परेशान होने की बात नही है। जाइये अपने कमरें में आराम कीजिये। आरिज़ हैदराबाद गया है अफ़साना को उसके मायके छोड़ने।" उन्होनें मुतमईन होकर कहा था। उन्हें कोई खुशी नही हुई थी। न ही उन्होनें ऐसा फिज़ा को लगा था।
"अम्मी जान, आरिज़ हैदराबाद गये हैं और उन्होने बताया भी नही?" फिज़ा ने थोड़ा अफ़सुर्दा होकर कहा।
"तो क्या उसे जाने से पहले आपकी इजाज़त लेनी होगी? आप अपने काम से काम रखिये। वो कल शाम तक आ जायेगा। और एक बात सुन लीजिये, इस घर की दुल्हन हैं आप और वही बनके रहिये। यहाँ किसी को भी सवाल करने की इजाजत नही है।"
" जी अम्मी जान," फिज़ा अपने कमरें में आ गयी। अफसाना भाभी जान के चले जाने से वह अकेलापन महसूस कर रही थी। हलाकिं उनसे उसकी बात ज्यादा नही होती थी, फिर भी उनके रहने का भरम ही काफी था। वह सोच रही थी कि अफसाना भाभी साहब ने उससे अपने जाने का जिक्र क्यों नही किया? जब कि उन लोगों की रोज सुबह चाय के वक्त मुलाकात होती ही है।
फरहा भाभी जान तो सारा दिन इठलाती रहती थीं। उन्हे अम्मी जान की पूरी शय मिली हुई थी। फिज़ा से वह जब भी बात करती थी तो खुद को कहीँ की शहजादी समझती थीं। जब की खूबसूरती में वह फिज़ा के सामने कहीँ नही टिकती थीं।
आज वह कुछ ज्यादा ही इतरा रही थीं।
वह फिज़ा को देखते ही मुस्कुरा दीं। फिज़ा को उनका हँसना कुछ अजीब सा लगा। फिर भी न जाने क्यों उसे किसी से कुछ बोलनें का मौका मिला था इसलिये वह थोड़ा सा खुश भी हो गयी थी।
लेकिन आज फरहा की मुस्कुराट में कोई भी छल नही था। फरहा ने खुद उसके पास आकर कहा- " फिज़ा आप सोई नही अभी तक?"
"भाभी जान तबियत कुछ नासाज़ है और आरिज़ भी नही हैं। कमरें में अकेलापन महसूस हो रहा था इसीलिए बाहर आ गयी थी।"
"क्यों क्या हुआ तबियत को?" उसने तास्सुरात को बदलते हुये कहा।
फिज़ा ने सब बताया तो वह भी वही कहने लगी- "आप कहीँ हामिला तो नहीं? ऐसा ही होता है इस वक्त में। आरिज़ तो कल शाम तक आयेंगें, आप जाकर आराम कीजिये।" कह कर उसने भी कुछ अलग तरह से देखा था। फिज़ा अपने कमरें की तरफ जाने लगी तो फरहा ने पीछे से आवाज़ लगाई- "सुनो फिज़ा, मुझे तुमसे कुछ कहना है।"
"हाँ जी कहें भाभी जान"
"तुम अफसाना भाभी साहब को अपना समझती हो न?" इस बात पर फिज़ा झेप गयी। चूंकि सच्चाई भी यही थी। उसके और फरहा के बीच दूरियाँ काफी थीं। इस समय बेसाख़्ता उनका ये पूछ लेना फिज़ा के लिये शर्मिंदगी भरा था। उसने बात को संभालते हुये कहा-
"वो क्या है न भाभी जान....." फिज़ा जैसे हकला सी गयी। जैसे किसी ने उसकी चोरी पकड़ ली हो।
"जाने दो, ख़जालत महसूस मत करो। मैं जैसी दिखती हूँ वैसी ही अन्दर से भी हूँ। किसी के पीठ में छुरा नही भोकती।"
"भाभी जान, ये क्या कह रहीं हैं आप? हम कुछ समझे नही?"
बस इतना जान लो अफ़साना भाभी साहब आपको धोखा दे रही हैं।" उसने निहायत ही दबे लब्जों में कहा, और किसी को न बताने की हिदायत भी दी।
"कैसा धोखा भाभी जान?" बोलते-बोलते फिज़ा के लब्ज़ो के साथ-साथ उसके पैर भी लड़खड़ाने लगे। हिम्मत बटोर कर उसने कहा था। न जाने कैसे-कैसे बुरे ख्याल उसके दिल में आने लगे थे। उसको लगा भाभी को झझोड़ कर पूछ ले, कैसा धोखा भाभी जल्दी बताओ, नही तो मुझे कुछ हो जायेगा। मगर उससे पहले ही फरहा बोल पड़ी थी।
"ध्यान से सुनो, एक लड़की है, जिसका नाम है रानी। वह हैदराबाद में ही रहती है। अफ़साना भाभी साहब की दूर की रिश्तेदार है। उसका रिश्ता आया था आरिज़ के लिये। उसी को देखने गये हैं दोनों। क्या आप जानती हैं? आरिज मियाँ दूसरा निकाह करने जा रहे हैं।"
ये लब्ज़ नही थे। नश्तर था जो जाकर सीधे उसके सीने में घुस गया था। सोचने-समझने का मौका ही नही मिला था और उसकी दोनों टाँगें बुरी तरह काँपने लगी थीं।
"भाभी जान ये आप कैसी बातें कर रही हैं? आरिज़ भला दूसरा निकाह क्यों करने लगे? खुदा के वास्ते चुप हो जाइये। आप हमसे कौन सी ऱजिश निकाल रहीं हैं? हमने क्या बिगाड़ा है आपका?" फिज़ा एक साँस में बोलती चली गई। फिर उसके बोलने की ताकत यकायक धीमी पड़ गयी थी।
" ये कयास नही है फिज़ा सच है। अगर आपको यकीन न हो तो अम्मी जान से पूछ लो मगर हमारा नाम मत लेना। सब दूध का दूध और पानी का पानी हो जायेगा।"
फिज़ा काफी देर यूँ ही निढ़ाल खड़ी रही। वो किधर जाये? सारे रास्ते जैसे एक-एक कर बंद होने लगे थे। वह सवालों के सिरे तलाशने लगी।
फरहा भाभी तो चिँगारी लगा कर चलीं गयीं थीं। जिसमें आग में वह धू धूँ कर जल उठी थी।
अम्मी जान के कमरें का दरवाजा बंद हो चुका था। कैसे खटखटाये वो दरवाजा? अब जाना शायद अच्छा न रहे। मगर सुबह तक तो वह मर ही जायेगी। फिज़ा कुंतल भर कदमों से अपने कमरें में आकर चुपचाप लेट गयी और रात भर चटखती रही। उसके जहन में तूफान उठ रहा था और ये कमरा उसे अपनी कब्रगाह लगने लगा था। जहाँ वह दफन हो गयी थी उसने कब्र के अन्दर की घुटन को महसूस करने की कोशिश की और उस घुटन से उसकी साँस उखड़ने लगी।
अफ़साना भाभी साहब उससे ये बात क्यों छुपायेंगी? वह तो हमेशा उसकी हमदर्द रहीं हैं। और फरहा भाभी जान? वो झूठ तो नही बोल रही थीं। आज तो उनकी आँखों में भी सच्चाई झलक रही थी। क्या होगा सच? क्यों ये खेल खेला जा रहा है हमारे साथ? आखिर हमारी गलती क्या है? क्या आरिज़ मियां इतना बड़ा धोखा दे सकते हैं हमे? किस मियां बीवी के बीच झगड़े नही होते? मगर इसका मतलब ये तो नही..........बस यही सोच कर न चाहते हुये भी उसके अब्सार से आँसू बह निकले।
क्रमश: