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पुनः मिआप..

बचाओ....बचाओ...कोई है?
किसी युवती का ऐसा दीर्घ स्वर सुनकर उदितराज उस ओर भागा,कुछ ही समय में वो वहाँ पहुँचा गया तो उसने देखा कि कोई युवती सरोवर में डूब रही है,उस युवती ने जल में उत्प्लावित किसी वल्लरी को पकड़ रखा एवं उसी के सहारे वो अभी तक पूर्णतः नहीं डूब पाई थी,उदितराज वहाँ पहुँचा एवं उस सरोवर में कूद पड़ा,इसके पश्चात वो शीघ्रता से उस युवती को उस सरोवर से बचाकर ले आया....
अन्ततः उदितराज ने उस युवती से पूछा...
"आप ठीक तो हैं देवी!"
"जी!आपका बहुत बहुत धन्यवाद!,यदि आप समय पर यहाँ ना आते तो आज तो मेरे प्राण चले ही गए थे",वो युवती बोली...
"ये सब तो ईश्वर की कृपा है,आपके प्राण बचने थे इसलिए उन्होंने मुझे यहाँ भेज दिया",उदितराज बोला...
"कुछ भी हो किन्तु आभार तो मैं आपको ही प्रकट करना चाहूँगी,क्योंकि आपने ही मेरे प्राण बचाएं हैं",युवती बोली...
"ये तो आपकी महानता है देवी!",उदितराज बोला...
"कुछ व्यक्ति स्वाभाव के अत्यधिक उदार होते हैं,किसी की भलाई करके भी वें उसका श्रेय स्वयं को नहीं देते",युवती बोली...
युवती की बात सुनकर उदितराज हँस पड़ा और युवती से बोला....
"मैं उदितराज!एवं आपका परिचय देवी"?
"मैं संघमित्र राज्य की राजकुमारी नीलांजना हूँ",युवती बोली...
"राजकुमारी होकर आप वन में अकेली क्या कर रहीं थीं देवी?",उदितराज ने पूछा...
तब नीलान्जना बोली....
"जी!मैं यहाँ अपनी सखियों संग वनविहार करने आई थीं,यहाँ मैं किसी शशक के पीछे भागते भागते अपने सखियों से बिछड़ गई,बहुत समय तक मैं यहाँ वहाँ भटकती रही किन्तु मुझे वन से बाहर जाने का ना कोई मार्ग मिला और ना ही यहाँ कोई व्यक्ति मिला जिससे मैं मार्ग पूछ लेती,इसके पश्चात एक विषैला सर्प मेरे पीछे पीछे आने लगा एवं मैं उससे भयभीत होकर भागी,आगें देख ना पाई और इस सरोवर में आकर गिर पड़ी"
"ओह...तो ये बात है,भयभीत होने की कोई आवश्यकता नहीं है,चलिए मैं आपको राजमहल तक छोड़ दूँ"
और इतना कहकर उदितराज नीलान्जना के साथ वहाँ पहुँचा जहाँ उसका अश्व बँधा था,अन्ततः उसने नीलान्जना को अपने पीछे अश्व पर बैठाया और राजमहल की ओर चल पड़ा,दोनों राजमहल पहुँचे तो नीलान्जना ने अपने पिताश्री महाराज चन्द्रसेन से पूर्ण घटना का विवर्णन किया तो राजा चन्द्रसेन ने उदितराज से उसके कार्य के विषय में पूछा तो वो बोला....
"महाराज !मैं कार्य खोजने ही इस ओर आया था,मैं पहले पड़ोसी राज्य के राजा के यहाँ सैनिक था,किन्तु वहाँ के महाराज एक आक्रमण में वीरगति को प्राप्त हो गए,मैं नए राजा के संग कार्य नहीं करना चाहता, वहाँ कार्य करने से मेरा स्वाभिमान मुझे रोक रहा था इसलिए मैनें वो राज्य त्याग दिया एवं इधर चला आया,"
उदितराज की बात सुनकर महाराज चन्द्रसेन ने उदितराज से अपने राज्य का सेनापति बनने को कहा और उदितराज ने महाराज चन्द्रसेन का आमन्त्रण स्वीकार कर लिया,अब उदितराज संघमित्र राज्य का सेनापति था,वो अत्यधिक बलशाली था एवं अपना कार्य बड़ी ही सत्यनिष्ठा के साथ कर रहा था,उसकी कर्तव्यनिष्ठा देखकर राजकुमारी नीलान्जना उस पर मोहित होकर उसे चाहने लगी,ऐसे कई मास गुजरे और नीलान्जना ने अपने मन की बात उदितराज को बताने की सोची और वो एक दिन अपनी वाटिका में विचरण कर रही थी और उसने अपनी दासी को आदेश दिया कि वो सेनापति उदितराज को यहाँ बुलवाएं,उनसे कुछ आवश्यक बातें करनी हैं और नीलान्जना के कहे अनुसार उदितराज वहाँ उपस्थित हुआ,राजकुमारी नीलान्जना ने वाटिका में विचरण करते हुए उदितराज से कहा....
"सेनापति!मैं विवाह करना चाहती हूँ"
"आपको विवाह करना है तो कर लीजिए,किन्तु ये बात आप मुझे ना बताकर अपने पिताश्री जी कहेगीं तो ही कोई लाभ होगा,मैं भला इसमें क्या कर सकता हूँ?",उदितराज बोला...
"इस कार्य में आपकी अनुमति तो अत्यधिक आवश्यक है",नीलान्जना बोली...
"किन्तु क्यों?अनुमति तो अभिभावकों से ली जाती है,मैं आपका मित्र भी नहीं,अभिभावक भी नहीं तो मुझसे अनुमति भला क्यों?,उदितराज बोला...
"वो इसलिए कि मैं आपसे ही विवाह करना चाहती हूँ",नीलान्जना बोली...
"ये सम्भव नहीं है राजकुमारी"!,उदितराज बोला...
"किन्तु!क्यों?,मैं आपसे प्रेम करने लगी हूँ,इसलिए आपसे विवाह करना चाहती हूँ,",नीलान्जना बोली...
"आप आज सायंकाल मेरे निवासस्थान पर आइए तब मैं आपको इसका कारण बताऊँगा",
उदितराज यह कहकर वहाँ से चला गया ...
सायंकाल राजकुमारी नीलान्जना अपनी एक दासी संग सेनापति उदितराज के निवासस्थान पहुँची,जो कि राज्य से अत्यधिक दूर था,वो साधारण वेष में गई थी ताकि उदितराज का कुटुंब उसे साधारण युवती ही समझे कोई राजकुमारी नहीं,वो द्वार पर पहुँची और दासी ने किवाड़ो पर लगी साँकल खड़काई, कुछ समय पश्चात एक वृद्ध स्त्री ने किवाड़ खोलें एवं उसके हाथों में एक शिशु भी था,राजकुमारी नीलान्जना वृद्ध स्त्री से बोली....
"हम दोनों राजमहल से आएं है हमें सेनापति जी ने बुलाया था"
"हाँ...हाँ....भीतर आओ पुत्री!आसन ग्रहण करो मैं अभी उदित को बुलाकर लाती हूँ"
और उस वृद्ध स्त्री ने उन दोनों को अतिथिगृह में बैठाया और उदितराज को बुलाने भीतर चली गई,कुछ ही देर में अतिथिगृह में उदितराज उपस्थित हुआ एवं वृद्ध स्त्री भी उन दोनों के लिए की जलपान लेकर उपस्थित हुई तब उदितराज ने उस वृद्ध स्त्री की ओर संकेत करते हुए राजकुमारी नीलान्जना से कहा...
"ये मेरी माता हैं"
नीलान्जना ने उन्हें प्रणाम किया तो उदितराज बोला....
"चलिए मैं आपका परिचय किसी और से भी करवाता हूँ" और नीलान्जना अपनी दासी संग उदितराज के पीछे पीछे पीछे चल पड़ी,उदितराज एक कक्ष में पहुँचा जहाँ बिछौने पर एक स्त्री लेटी थी,जो कदाचित रोगिणी थीं,उदितराज ने नीलान्जना से कहा...
"इनसे मिलो,ये मेरी धर्मपत्नी सावित्री है जो पिछले एक वर्ष से कटिभाग(कमर) के नीचे के भाग से लकवाग्रस्त है, मेरा दो वर्ष का शिशु भी है,आशा है आप मेरी विवशता समझ गईं होगीं"
उदितराज की बात सुनकर नीलान्जना का मस्तिष्क शून्य हो चला था,परन्तु उसने कुछ नहीं कहा,वो सहृदय सावित्री और उसके शिशु से मिलकर राजमहल लौट आई एवं दूसरे दिन उसने पुनः उदितराज को बुलवाया और उससे बोली...
"मैं अब आपसे विवाह करने को अब भी तत्पर हूँ,मैं आपकी पत्नी को अपनी बड़ी बहन मानकर सदैव उनकी सेवा करूँगी एवं आपके शिशु को अपना पुत्र मानकर पालूँगी,कृपया मुझे अपने जीवन में स्थान दे दीजिए"
तब उदितराज बोला...
"राजकुमारी!ये प्रेम नहीं,क्षणिक मात्र का आकर्षण हैं,जब आप मेरी पत्नी बनकर उस घर में रहने लगेगी ना तो आपको सिवाय पछतावें कुछ ना मिलेगा,मैं अपनी पत्नी की उपेक्षा आपको स्वीकार नहीं कर सकता,मैं आपके प्रेम के आगें अपना कर्तव्य भला कैसे भूल सकता हूँ"?
"तो ठीक है सेनापति! अभी आप मुझसे विवाह करने में असमर्थ हैं तो क्या हुआ?किन्तु मैं उस क्षण तक आपकी प्रतीक्षा करूँगी,जब तक मेरे जीवन की अन्तिम साँस एवं मेरे हृदय की एक भी धड़कन शेष रहेगी",नीलान्जना बोली....
"ये अनर्थ मत कीजिए,मेरे पीछे अपना जीवन मत नष्ट कीजिए",उदितराज बोला...
"आप अपना कर्तव्य निभाइए और मैं अपना प्रेम निभाऊँगी",नीलान्जना बोली....
और उस दिन के पश्चात नीलान्जना अपने पिता से आज्ञा लेकर राजमहल एवं धन-वैभव छोड़कर वनाश्रित हो गई, उसने अपने संग केवल एक दासी को रखा और वहीं कुटिया बनाकर माता के मंदिर के समीप भजन कीर्तन करके उदितराज की प्रतीक्षा में अपने दिन बिताने लगी,वो दिन रात उदित की याद में रोती और प्रभु की भक्ति करके अपने हृदय को सान्त्वना देती,मन में सोचती कि यदि उसका प्रेम सच्चा हुआ तो एक ना एक दिन उदित उसके पास अवश्य लौटेगें,दिवस बीते,मास बीते एवं ऐसे ऐसे करके बीस वर्ष बीत गए परन्तु उदितराज नीलान्जना के पास ना लौटा....
इधर नीलान्जना ने उदितराज के प्रेम में इतने अश्रु बहाए कि वो दृष्टिहीन हो गई एवं प्रातःकाल भोर के समय उठकर,स्नानादि से निवृत्त होकर पूजा-अर्चना में लग जाती,उसने बीस वर्षों से ना तो कौशेय(रेशमी) वस्त्रो को हाथ लगाया ,ना ही आभूषणों को और ना ही अन्न को ,वो केवल फलाहार ग्रहण करके ही अपना जीवनयापन कर रही थीं,अब उसकी फूल सी काया कुम्हला गई थी,कुछ केशों का रंग भी श्वेत हो चला था,किन्तु प्रेममयी कान्ति अब भी उसके मुख पर दमक रही थी,जब कोई प्राणी प्रेम में होता है ना तो उसके मुँख पर एक विशेष ही प्रकार का सौन्दर्यबोध होता है,एक विशेष प्रकार की संतुष्टि होती है जिससे उसके सौन्दर्य में वृद्धि हो जाती है,यही नीलान्जना के संग हो रहा था,प्रेम,ब्रह्मचर्य,भक्ति एवं प्रतीक्षा ने उसे सहनशीलता प्रदान की थी,जिससे उसके भीतर बहुत से गुण उत्पन्न हो गए थे जिसमें एक गुण क्षमा भी था,इसी गुण के रहते उसने उदितराज को क्षमा कर दिया था,बस एक ही आशा शेष थी कि एक बार अपनी मृत्यु के पूर्व अपने प्रेम के दर्शन हो जाएं...
और उधर उदितराज के निवासस्थान पर सावित्री ने बिछौने पर लेटे लेटे उदितराज से कहा...
"स्वामी!ऐसा प्रतीत होता है कि मेरी अन्तिम घड़ी आन पड़ी है,आपने जो मेरी इतने वर्षों सेवा की,मेरा हर क्षण ध्यान रखा,उसके लिए मैं आपकी सदैव कृतज्ञ रहूँगी,बड़े भाग्य से ऐसा स्वामी मिलता है,मैं अत्यधिक भाग्यशाली हूँ जो आप मुझे मिले यहाँ तक कि आपने मेरे लिए अपने प्रेम को भी त्याग दिया एवं उस राज्य को भी त्यागकर यहाँ आ गए जहाँ नीलान्जना की स्मृतियाँ बसीं थीं"
"सावित्री!तुम्हें इस विषय में ज्ञात था",उदितराज ने पूछा..
"हाँ!मुझे माता ने बताया था,अब वें इस संसार में नहीं है इसलिए ये रहस्य मैं आपके समक्ष प्रकट कर रही हूँ,क्योंकि वें नहीं चाहतीं थीं कि मैं कुछ भी आपसे इस विषय पर कहूँ",सावित्री बोली...
"तुम्हें तनिक भी ईर्ष्या नहीं हुई इस बात से और ना ही नीलान्जना से",उदितराज ने पूछा....
"उस दिन मैनें माता और आपके मध्य हो रहे वार्तालाप को सुन लिया था ,आपको लगा की मैं गहरी निंद्रा में हूँ किन्तु ऐसा नहीं था,जब आप माता से कह रहे थे कि आप भी नीलान्जना से प्रेम करते हैं,किन्तु अपने कर्तव्य के रहते आपने उसका प्रेम स्वीकार नहीं किया,आपकी आँखों में पाश्चाताप के अश्रु थे ,आपके हृदय में नीलान्जना के प्रति अपार प्रेम था जिसे आप कभी प्रकट नहीं कर पाएं,बस एकान्त में जाकर विचलित होते रहे,किन्तु अब आप मुझे वचन दीजिए कि मेरी मृत्यु के पश्चात आप अपने जीवन में नीलान्जना को स्थान देकर उसके प्रेम को स्वीकार कर लेगें"
और इतना कहते ही सावित्री के प्राणपखेरू उड़ गए,दोनों पिता और पुत्र ने सावित्री का अन्तिम संस्कार किया,इसके पश्चात उदितराज के पुत्र पीताम्बर ने नीलान्जना की खोज करनी प्रारम्भ की,कुछ समय पश्चात ज्ञात हुआ कि नीलान्जना शीलवन में किसी वृक्ष के तले स्थित माता के मंदिर के समीप किसी कुटिया में वास करती है,जो कि अत्यधिक दूर है,यात्रा करने में लगभग पन्द्रह दिन लग सकते थे और दोनों पिता पुत्र नीलान्जना को खोजने चल पड़े....
और उधर नीलान्जना ने नवरात्रि का निर्जला व्रत रखा था,इस कारण पंचमी के दिन से ही उसका स्वास्थ्य बिगड़ने लगा,दासी उसे फलाहार ग्रहण करने एवं जल पीने को कहती किन्तु नीलान्जना ने अपना व्रत नहीं तोड़ा,इस कारण अब उसका स्वास्थ्य दिनो दिन बिगड़ने लगा,अष्टमी वाले दिन नीलान्जना की दशा अत्यधिक बिगड़ गई,इतनी बिगड़ गई कि उसमें उठने बैठने का सामर्थ्य ना रहा,नवमी वाले दिन उसके नेत्र ही नहीं खुल रहे थे किन्तु उसने तब भी जल ग्रहण ना किया और उसी अवस्था में दासी से बोली.....
"फूलमती!ना जाने मैनें ऐसा कौन सा पाप किया था जो जीवन के अन्तिम क्षणों में उनके दर्शन भी ना हो पाएं,मैं कितनी अभागन हूँ"
और इतना कहते ही नीलान्जना ने प्राण त्याग दिए,जैसे ही नीलान्जना ने प्राण त्यागे वैसे ही उदितराज ने उसे कुटिया के बाहर से पुकारा....
"नीला....नीला....देखो मैं आ गया" और ये कहते कहते उदितराज भीतर पहुँचा तो दासी रोते हुए बोली....
"महाशय!आपने अत्यधिक बिलम्ब कर दिया,आपकी प्रतीक्षा करते करते इन्होंने प्राण त्याग दिए"
ये सुनकर उदितराज रो पड़ा और उसने नीला के शरीर को अपनी गोद में उठाया और कुटिया के बगल में स्थित माता के मंदिर के समक्ष रखकर बोला....
"नहीं!माता!आप ऐसा नहीं कर सकतीं,उसने कोई अपराध नहीं किया था उसने तो केवल मुझसे प्रेम किया था ,उसके प्रेम का आप ऐसा दण्ड नहीं दे सकतीं उसे"
ऐसा कहकर उदितराज फूट फूटकर रो पड़ा,उसके अश्रु टप-टप करके नीलान्जना पर गिरने लगें,वें अश्रु जैसे ही नीलान्जना के शरीर पर गिरें तो उनकी ऊष्मा से नीलान्जना के शरीर में कम्पन हुआ, उसमें चेतना का संचार प्रारम्भ हो गया और वो जीवित हो उठी, नीलान्जना को जीवित देखकर उदितराज ने नीलान्जना को प्रसन्नतापूर्वक अपने हृदय से लगा लिया,आज उनके पुनः मिलाप पर धरती प्रसन्न थी एवं आकाश मुस्कुरा रहा था.....

समाप्त....
सरोज वर्मा....