Mujahida - Hakk ki Jung - 32 in Hindi Moral Stories by Chaya Agarwal books and stories PDF | मुजाहिदा - ह़क की जंग - भाग 32

Featured Books
Share

मुजाहिदा - ह़क की जंग - भाग 32

भाग 32

फिज़ा के मुहँ पर तो जैसे ताला लग गया था। जो हिम्मत और विश्वास उसने जुटाया था सब टूटने लगा। उसके पैर भी काँप रहे थे। शबीना भी गुस्से से आग बबूला हो गयी। उसने फिज़ा को वहाँ से हटा दिया और अन्दर वाले कमरें में धकेल दिया था और खुद उसके सामने आकर खड़ी हो गई थी- "मुझे बताओ क्या कहना है तुम्हे? क्या कर लोगे तुम हमारा? आरिज़ तुम बड़े ही गलीच और ऐयाश किस्म के इन्सान हो ये तो हम समझ चुके थे लेकिन हैवान भी हो ये आज जान लिया। तुमने तो अपनी सारी हदें पार कर दी हैं। पर इतना याद रखना ऊपर वाले के घर में देर है अन्धेर नही है। जल्दी ही तुम्हे ऊपर वाला तुम्हारे किये की सजा जरुर देगा।" शबीना एक साँस में बोलती चली गयी।
बोलने को तो वह बोल गयी थी मगर इससे पहले उसने किसी से भी इस लहज़े में बात नही की थी तो उसे खुद पर ही शर्मिंदगी भी महसूस कर रही थी। वह थोड़ा सा नमुतमईन हो गयी थी। दूसरे, घर में कोई मर्द भी नही था। खान साहब अभी कुछ देर पहले ही मग़रिब की नमाज़ के लिये घर से निकले थे। चूंकि वह पाँचों वक्त के नमाज़ी थे और करीब ही मस्जिद थी वहाँ रोज जरुर जाते थे।
अन्दर वाले कमरें में जाकर फिज़ा ने खान साहब को फोन किया कर दिया था मगर वह उस वक्त नम़ाज में होगें इसलिये फोन नही उठा।
आरिज़ चिकने घड़े के माफिक शबीना की सब बात सुनता रहा और बेशर्मी की सारी हदें पार कर गया। जाते-जाते वह फिज़ा को धमकी देकर गया था। उसने बड़े ही डरावने तास्सुरात से कहा था- "अगर अपना मुकदमा वापस नही लिया तो चेहरा बिगड़ जायेगा तुम्हारा। पहचान भी नही पाओगी खुद को और सारी जिन्दगी लोग तुम्हें देख कर डरते रहेंगे। तुम मरने के लिये हर रोज तड़पोगी।"
उसने इतनी आसानी से सब कह दिया था। जो एक आम आदमी के लिये बहुत मुश्किल था। ऐसे तो वही बात कर सकता था जिसके अन्दर की आदमियत मर गयी हो या फिर पेशेवर मुजरिम हो। बेशक उसके कई चेहरे देखे थे फिज़ा ने, लेकिन ये चेहरा उसने आज ही देखा था।
शबीना ने भी उससे मुकाबला तो खूब कर लिया था मगर उस वक्त अन्दर ही अन्दर वह भी तर्स खा गयी थी। शरीफ आदमी के लिये धमकियाँ सुनना आसान नही होता।
वह दो लड़को को साथ लेकर आया था जो नीचे ही खड़े थे। शायद उनसे कहा गया था कि जब बुलाया जाये तभी ऊपर आयें। शायद उसके इरादें और भी खतरनाक थे इसलिये वह पूरी तैयारी से आया था। या फिर उसका इरादा उन्हें डराने का था।
धमकी देकर आरिज़ निकल गया था।
उसके जाने के बाद घबरा कर फिज़ा शबीना से लिपट गयी। शबीना ने उसे कस कर चिपटा लिया था। उसके अब्सार से लगातार आँसू बह रहे थे। वह बस रोती जा रही थी। शबीना बार-बार अपने दुपट्टे से उसके आँसू पोछ रही थी।
खान साहब ने घर में कदम रखते ही भाँप लिया कुछ गड़बड़ है। उन्होनें जल्दी से चप्पलों को बाहर दालान के पास रखी शू रैग में उतारा और अन्दर गये। उन्हे देखते ही फिज़ा उनसे लिपट गयी- "अब्बू जान, आरिज़ आया था अभी..." बस इतना कह कर सिसकने लगी वो।
फिज़ा के सिर पर हाथ फेरते हुये खान साहब ने उसे तसल्ली दी। शबीना ने पूरी बात निहायत ही घबराये हुये लहजे में कही थी। जिसे सुन कर उनका खून खौलने लगा- "लाहोलबकूबत, इतनी हिम्मत हो गयी उस नामुराद की हमारे घर तक चला आया?" और तेजाब फेंकने की धमकी देकर गया है? देखतें हैं वो क्या कर लेगा हमारा?" एक बेटी के बाप होने के नाते वह थोड़ा डरे भी थे लेकिन फिर जल्दी ही संभल गये।
उन्होने तय किया, अब पुलिस की मदद लेनी ही पड़ेगी। पानी सिर से ऊपर हो गया है।
थानें में खान साहब अकेले ही गये थे। उन्होनें सारी बात थाना इंजार्ज को बताई और एफ. आई. आर. लिखने को कहा। उसने एफ. आई. आर. लिखने के बजाय टाला मटोली शुरू कर दी। जिससे वह बहुत खफा हो गये। बहुत हील हुज्जत के बाद रिपोर्ट लिखी गयी थी। वो भी तब, जब उन्होनें अपने कुछ ऊँची पहचान वालों का हवाला दिया था। इसके बावजूद बस इतना हुआ, दो सिपाई आये और माहौल का जायजा लेकर चले गये। फिज़ा की हिफ़ाजत का कोई भी इन्तजाम नही हुआ था।
कहते हैं दीवारों के भी कान होते हैं फिर यहाँ तो ये चर्चा हर किसी की जुवान पर थी। ऐसे में अखबारों ने भी इस खबर को खूब उछाला। तमाम तरीके से अगले पन्ने के हैडिंग बनाये गये थे। 'तीन तलाक के खिलाफ खड़ी हुई एक बड़े खानदान की बहू' 'उसके साथ मारपीट के भी संगीन आरोप ' 'मुसलिम समाज की एक मज़लूम लड़की' किसी ने कहा 'झाँसी की रानी' तो किसी ने कहा 'एक संस्था की संचालक खुद शोषण का शिकार' ऐसे तमाम वाक्यों से नवाजने लगे थे शहर के सभी अखबार। खूब बिकने लगे थे और खबरें भी पकने लगी थीं एकदम तेज आँच पर। चूकिं ये मसला छोटा -मोटा नही था। एक मज़लूम औरत ने एक रसूखे खानदानी से टक्कर ली थी, जिसका टक्कर लेना खबरों को, चर्चाओं को खौलाने के लिये काफी था।
लोगों को मसाला मिल रहा था। फुरसत मंद और ग़म्माज़ किस्म के लोगों का वक्त अच्छा कट रहा था।
फिज़ा का सड़क पर निकलना मुहाल हो गया था। लोग फितरे कस रहे थे। ज्यादातर मजाक बनाया जा रहा था। ये एक हैरत अंगेज बात थी कि पीडिता एक बार फिर से जफ़ा झेल रही थी और गुनाह गार उसी शानोशौकत से घूम रहा था। उनके खानदान के मुरीद उनकी चापलूसी में लगे थे। उन्हे फिज़ा के खिलाफ कुछ इस अन्दाज़ में भड़का रहे थे, जैसे औरत होना कोई गुनाह हो और अपने ह़क के लिये आव़ाज उठाना उससे भी बड़ा गुनाह।
ये बात फिज़ा जानती थी उसे उफ़्क तक पहुँचने की इक़्तिजा नही थी, बेशक वह यह नही चाहती थी, मगर जुल्म और अन्याय बर्दाश्त करना मुश्किल था। उसे खुद को बद अख़्तर कहलाना पसंद नही था। उसके लिये मजलूम लब्ज़ औरत की तौहीन था। बगैर इत्तिहाम के जब वह किसी औरत को सज़ा काटते देखती तो तड़प जाती थी। 'औरत की अपनी कोई रसाई नही होती', ऐसे अल्फा़ज मर्द को ताकत देते हैं और औरत की सारी हिम्मत को तोड़ देते हैं। उसके बाद एक वक्त ऐसा आता है जब उसे किसी भी जुल्म, नाइन्साफी या अपने ह़क के लिये आवाज़ उठाने या सोचने में ही शर्मिन्दगी होने लगती है। उसे लगने लगता है खुद के लिये जीना कोई गुनाह है और जिसे अल्लाह ताला कभी माफ नही करेंगे।
जिल्लत की जिन्दगी उसे नामंजूर थी। परिवार की खुशियों के लिये हालात से समझौता करना कोई बुरा नही है, मगर ये काम हर बार औरत के हिस्से में ही क्यों? क्यों मर्द के लिये परिवार की खुशियाँ मायने नही रखतीं? क्यों वो अपनी मर्दागंनी के आगे सब भूल जाता है? क्यों वह सिर्फ औरत का वक़्फ, उसकी कुर्बानी ही देखना चाहता है? उसकी आवाज़ सुनना नही चाहता? उसके फैसले को अपनी रजमंदी के बगैर अधूरा या ख़ाक के माफिक समझता है? और जब भी दिल चाहे पामाल करता हुआ निकल जाता है।
लेकिन इसमें पूरी गलती मर्द की नही है। छोटेपन से ही उसके दिमाग की बनाबट इस तरह से कर दी जाती है जहाँ से वह खुद को ज्यादा ताकतवर और ऊँचा समझने लगता है। उसे लगता है औरत कुर्बानी देने के लिये ही पैदा होती है। मर्द होना इक़बाल की बात है और औरत होना इत्तिहाम की। बस फिर वह खुद को उफ़्क पर बैठा हुआ देखने लगा और उसे औरत के वक़्फ की भूख बढ़ने लगी। उसने औरत के वक़ार को खुद तय किया और उससकी इक़्तिजा को उसकी उरियां समझने लगा।
मर्द ने हमेशा अपने कायदें कानून के हिसाब से उसका एक दायरा मुकररर कर दिया है। उसकी अहमियत, उसकी तशरीह वह खुद तय करता है। अगर वह उन मानकों पर खरी नही उतरी तो उसे औरत होने का कोई ह़क नही है। बस यही साबित करने में वह अपनी पूरी जिन्दगी लगा देती है कभी जुल्मों से तालमेल बिठाने में लगी रहती है और कभी खुद को सजा सवाॅर कर खूबसूरत दिखने के चक्कर में अपने मुस्तकबिल को बदसूरत बना लेती है। उसे अन्दाजा भी नही होता कि उसकी जिन्दगी का मकसद क्या है? उसकी अपनी भी कोई अहमियत है? कोई रसूख है? बस वह कुर्बानियों की जीती जागती मूर्ति बन कर रह जाती है। आहिस्ता-आहिस्ता वही उसे अच्छा लगने लगता है।
क्रमश: