Param Hans Sant Gaori Shankar Charit Mal - 2 in Hindi Spiritual Stories by ramgopal bhavuk books and stories PDF | परमहंस संत गौरीशंकर चरित माल - 2

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परमहंस संत गौरीशंकर चरित माल - 2

परमहंस संत गौरीशंकर चरित माल 2

 

गणपति नमन

गज वदन सुख सदन, दुख दमन मम नमन।

हित परम नित करन, भव तरन तब शरन।।

शुचि सुमुख इक रदन, भुज चतुर बृक उदर।

श्रुति लिपिक गति प्रखर, अति प्रवर मति सुघर।।

कर मधुर वर वरद, नित विजय जित समर।

शुभ शकुन तव दरस, तुम प्रथम सब अमर।।

तन तरुन दृग अरुन, अति विमल मख कमल।

पग धरत कर निरत, ढप वजत अति मृदुल।।

रिधि सजन निधि वरन, गृह भरन सब रतन।

गह चरन भर हरन, धर हृदय यह वचन।।

यह जगत नित मिटत, तज कुमत कत भ्रमत।

तम हरत मन निरत, रह रटत धर सुरत।।

गज वदन सुख सदन, दुख दमन मम नमन।

हित परम नित करन, भव तरन तब शरन।।

 

टीप :- धन्‍द: योगकल्‍प, मात्रा 20 (10,10)

विशेष :- सम्‍पूर्ण रचना हृस्‍व वर्णों में की गई है तथा वर्णो की आवृति 2,3 2,3 के क्रम से है।

                                                      ‘शून्‍य’

।। श्री गुरुवै नम: ।।

परमहंस संत गौरीशंकर चरित माल

मंगला चरण

गौरीशंकर के चरण, हिय धर शीश नवाय।

’’चरित माल’’ अर्पण करूं, श्रद्धा सुमन सजाय।।

सुमिर पृथम गणराज को, विघ्‍न हरण सुख धाम।

मातु सरस्‍वति को नमन, विनयावनत प्रणाम।।

पुनि श्री गुरु चरणन परूं, मन अखण्‍ड विश्‍वास।

परमहंस अशरन शरण, संत दयालू दास।।

जिन जाया इस जगत को, पालें, दें निवार्ण।

वन्‍दौं ते अज, विष्‍णु शिव, सहमम तन मन प्राण।।

तात मात सुमिरन करू, जिन यह दिया शरीर।

करहु कृपा मनसा फुरे, ‘शून्‍य’ अजान, अधीर।।

चरित माल

संत सरल चित परमहित अन हेतुकी कृपाल।

गौरी शंकर नाम गुण, थित चित हृदय विशाल।।

जिनकी भक्‍तीवश वने पुलिस सिपाही राम।

गौरीशंकर को करूं, कोटिन कोटि प्रणाम।।

सप्‍त सिन्‍धु वत संत की नाप सके को थाह।

भक्‍त बिन्‍दु बूढ़ै नहीं, कमल पत्र की राह।।

जिसने जाना एक को, गया सभी को जान।

गौरी शंकर ने दिया, एक सूत्र में ज्ञान।।

सूरज तो दिन में तपे, चन्‍दा चमके रैन।

जो निशि-दिन चमकै-तपै, गौरी शंकर एैन।।

जिन जाने जाने नहीं, अनजाने सब बूझ।

गौरीशंकर नयन बिन, हीरक परै न सूझ।।

जो मद को सेवन करे, मादकता कछु काल।

मस्‍तराम विन मद रहे, मस्‍त सदैव, कमाल।।

जाने से कछु और है, माने से कछु और।

गौरी शंकर जानकै, मानत पावै ठौर।।

‘शून्‍य‘ सदा ही रम रहें, मस्‍तराम मन मांह।

किसको ढूंढे पाय को, अन्‍धकार ज्‍यों छांह।।

तेरे मेरे ने किया, जग स्‍वारथ का ढेर।

मत भटकाओ और मन, सुनो संत की टेर।।

यह आकाश अनंत है, तारे अगिन अलेख।

गौरीशंकर इंन्‍दु इव, हिय नयनन अवरेख।।

अव्‍याहत गति संत की रोक सके को राह।

गौरीशंकर लोक त्रय, तीनों काल प्रवाह।।

तात, मात, तिय, भ्रात, सुत, जग की रीति निर्भाय।

लख चौरासी जाय तर, गह बाबा के पांय।।

प्रीत पुरानी मौत की, ज्‍यों बरगद की छांव।

तैसी बाबा की कुपा सुखद, सुशीतल ठांव।।

मात, पिता, गुरु शत्रुवत, जो न देंय यह ज्ञान।

संत चरन अशरन शरन, धर चित शब्‍द सुजान।।

ज्ञानी तौ पच पच मरें, हंस-हंस मरें विमूढ़।

बाबा के अटपट वचन, सार भरे अति गूढ़।।

लीला धारी ने किया लीला ही में वास।

जिन पर थी उनकी कृपा, हुआ उन्‍हैं आभास।।

युग युग तक भटका किया, मन दरशन की प्‍यास।

कस्‍तूरी मृग ज्‍यों भ्रमें, पर बाबा निज पास।।

परमहंस अवधूत या, कहो साधु रिषि संत।

मस्‍तराम के नाम का, नहीं आदि या अंत।।

योग सिद्ध योगी परम तज निज स्‍वर्ग निवास।

तर, तारे, हारे, हिरे, गौरी शंकर दास।।

‘शून्‍य‘ सभी जन धन्‍य हैं जो बाबा के दास।

चरण कमल का ध्‍यान धर करते मन विश्‍वास।।

गौरी शंकर नाम में वसें सन्‍त के प्रान।

तू भी निशि-दिन नाम जप, छांड़ सकल अभिमान।।

गौरी शंकर नाम के गाओ गीत सप्रीत।

लोक लाभ, परलोक सुख, अन्‍त जीत ही जीत।।

जीवन चरित्र

गीता का वादा किया कलियुग कान्‍हा पूर्ण।

गौरीशंकर रूप धर, पाप-शाप किय-चूर्ण।।

पावन डबरा क्षेत्र भू, धन्‍य बिलउआ ग्राम।

पग पग परम पवित्र रज, डग-डग तीरथ धाम।।

शुभ दिन शुभ रितु, शुभ अयन, अति शुभ वही समीर।

उन्निस सौ चौबीस सन् बाबा धरयौ शरीर।।

‘जगन्‍नाथ’ के पुत्र प्रिय ‘मौजी राम’ सुपौत्र।

’गौरीशंकर’ नाम शुभ, विप्र तिवारी’ गोत्र।।

दुबई वारी मातु की पुतरी आंखिन बीच।

’पावरती’ के प्राण प्रिय, प्रेम सलिल शुचि सींच।।

अंग्रेज जिनके नेम युत श्री बद्री सरशाद।

बांटा जिनने प्रेम नित, अब भी करते याद।।

अंग्रेज दूजे आपके, जग श्री लाल सुनाम।

शिक्षक बन सेवा करी, गुरु शुभकाम ललाम।।

रघुवर अंग्रज तीसरे, बाबा चोथे जान।

अति शुभ यह परिवार शुचि सतयुग सी पहिचान।।

प्रारम्भिक शिक्षा मिली, निज गृह अरु निज ग्राम।

सन चौंतिस मथुरा चले, कर पितु मातु प्रणाम।।

पढ़ी संस्‍कृत मधुपुरी, गुने ग्रन्‍थ गुन ग्राम।

भ्रमत जगत खोजत फिरें, जग आए केहि काम।।

पुनि अति शुभ बेला भई, बजे दमाममे धाम।

पारबती की पाणिगह, में प्रभु पूरन काम।।