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सनकादि कुमार

‘अनेक जन्मो के किये हुए पुण्यो से जब जीव के सौभाग्य का उदय होता है और वह सत्पुरुषो का सङ्ग प्राप्त करता है, तब अज्ञान के मुख्य कारणरूप मोह एव मद के अन्धकार को नाश करके उसके चित्त मे विवेक के प्रकाश का उदय होता है।’ –( श्रीमद्भा० माहात्म्य०। ७६ )

सृष्टि के प्रारंभ में ब्रह्मा जी ने जैसे ही रचना का प्रारंभ करना चाहा उनके संकल्प करते ही उनसे चार कुमार उत्पन्न हुए सनक, सनंदन, सनातन एवं सनत्कुमार ब्रह्मा जी ने सहस्त्र दिव्य वर्षों तक तप करके हृदय में भगवान शेषशायी का दर्शन पाया था। भगवान ने ब्रह्मा जी को भागवत का
मूल-ज्ञान दिया था इसके पश्चात ही ब्रह्मा जी मानसिक सृष्टि में लगे थे। ब्रह्मा जी का चित अत्यंत पवित्र एवं भगवान में लगा हुआ था। उस समय सृष्टिकर्ता के अंतः करण में शुद्ध सत्वगुण ही था फलतः उस समय जो चारों कुमार प्रकट हुए, वे शुद्ध सत्वगुण के स्वरूप हुए। उनमे रजोगुण तथा तमोगुण था ही नहीं। न तो उनमे प्रमाद, निद्रा, आलस्य आदि थे और न सृष्टि के कार्य मे उनकी प्रवृत्ति थी। ब्रह्माजी ने उन्हें सृष्टि करने को कहा तो उन्होने सृष्टिकर्ता की यह आजा स्वीकार नहीं की। विश्व मे ज्ञान की परम्परा को बनाये रखने के लिये भगवान्ने ही इन चारो कुमारो के रूप मे स्वयं अवतार धारण किया था। कुमारो की जन्मजात रुचि भगवान् के नाम तथा गुण का कीर्तन करने, भगवान् की लीलाओ का वर्णन करने एवं उन पावन लीलाओ को सुननेमे थी। भगवान् को छोडकर एक क्षण के लिये भी उनका चित्त संसार के किसी विषय की ओर जाता ही नहीं। ऐसे सहज स्वभावसिद्ध विरक्त भला कैसे सृष्टिकार्य मे कब लग सकते थे ?

उनके मुख से निरन्तर ‘हरि शरणम्’ यह मङ्गलमय मन्त्र निकलता रहता है। वाणी इसके जप से कभी विराम लेती ही नहीं। चित्त सदा श्रीहरि मे लगा रहता है। इसका फल है कि चारों कुमारो पर काल का कभी कोई प्रभाव नही पडता। वे सदा पाँच वर्ष की अवस्था के ही बने रहते है। भूख प्यास, सर्दी-गरमी, निद्रा-आलस्य कोई भी माया का विकार उनको स्पर्श तक नही कर पाता। वैसे तो कुमारो का अधिक निवासधाम जनलोक है—जहाँ विरक्त, मुक्त, भगवद्भक्त तपस्वी जन ही निवास करते हैं। उस लोकमे सभी नित्यमुक्त है। परंतु वहाँ सब-के-सब भगवान् के दिव्य गुण एव मंगलमय चरित सुनने के लिये सदा उत्कण्ठित रहते है। वहाँ सदा सर्वदा अखण्ड सत्संग चलता ही रहता है। किसी को भी वक्ता बनाकर वहाँ के शेष लोग बडी श्रद्धा से उसकी सेवा करके नम्रतापूर्वक उससे भगवान् का दिव्य चरित सुनते ही रहते हैं। परन्तु सनकादि कुमारो का तो जीवन ही सत्संग है। वे तो सत्संग के बिना एक क्षण रह नहीं सकते। मुख से भगवन्नाम का जप, हृदय मे भगवान् का ध्यान, बुद्धि मे व्यापक भगवत्तत्त्व की स्थिति और श्रवणो मे भगवद्गुणानुवाद —बस, यही उनकी सर्वदा की दिनचर्या है।

चारो कुमारो की गति सभी लोकोमे अबाध है। वे नित्य पञ्चवर्षीय दिगम्बर कुमार इच्छानुसार विचरण करते रहते है। पाताल मे भगवान् शेष के समीप और कैलास पर भगवान् शङ्कर के समीप वे बहुत अधिक रहते है। भगवान् शेष एव शङ्करजी के मुख से भगवान् के गुण एवं चरित सुनते रहने मे उनकी कभी तृति ही नहीं होती। जनलोक मे अपने मे से ही किसी को वक्ता बनाकर भी वे श्रवण करते है। कभी-कभी किसी परम अधिकारी भगवद्भक्त पर कृपा करने के लिये वे पृथ्वी पर भी पधारते है। महाराज पृथु को उन्होंने ही तत्त्वज्ञान का उपदेश किया। देवर्षि नारदजी ने भी कुमारो से श्रीमद्भागवत का श्रवण किया। अन्य भी अनेक महाभाग कुमारो के दर्शन से एवं उनके उपदेशामृत से कृतार्थ हुए हैं। भगवान् विष्णुके द्वार रक्षक जय विजय कुमारो का अपमान करने के कारण बैकुण्ठ से भी च्युत हुए और तीन जन्मो तक उन्हें आसुरी योनि मिलती रही।

सत्संगति मुद मंगल मूला। सोई फल सिद्धि सब साधन फूला।

सनकादि चारो कुमार भक्तिमार्ग के मुख्य आचार्य है। सत्संग के वे मुख्य आराधक है। श्रवण मे उनकी गाढतम निष्ठा है। ज्ञान, वैराग्य, नाम जप एवं भगवच्चरित्र सुनने की अबाध उत्कण्ठा का आदर्श ही उनका स्वरूप है।