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सलाह - न फेरे दूरी अच्छी - 2

"बड़ी हो तो,"रश्मि बोली।
""तुमसे ज्यादा मैंने दुनिया देखी है।लोगो को ज्यादा जानती हूँ।इसीलिए मैं तुम्हे समझा रही हूँ।तुम जवान हो,सुंदर हो,"सरोज,रश्मि को समझाते हुए बोली,"अगर तुम अपने बॉय फ्रेंड को चाहती हो।उससे प्यार करती हो।वह भी तुम्हे चाहता है।तुमसे प्यार करता है।तो तुम उसके साथ घर क्यो नही बसा लेती।अगर तुम शादी कर लोगी तो तुम्हे होस्टल की जिंदगी से भी छुटकारा मिल जाएगा।तुम्हारा अपना घर होगा।"
"शादी की अभी जल्दी क्या है?अभी कौनसी मेरी उम्र निकली जा रही है।रमेश मुझे चाहता है।मुझसे प्यार करता है।और मुझे अपनी जीवन संगनी बनाने का वह वचन दे चुका है।अभी हम मौज मस्ती कर रहे है।जब हम चाहेंगे शादी कर लेंगे।"
"मर्द की जुबान पर औरत को कभी भरोसा नही करना चाहिए।मर्द बड़े चालू होते है।औरत को बड़े बड़े सब्जबाग दिखाते है।आसमान से तारे तोड़ लाने की बात करते है।मर्द के लिए औरत खिलोना हैं।मन करे तब तक औरत के तन से खेलते हैं, मन भर जाता हैं,तो उसे अपनी जिनदगी से निकाल कर दूर कर देते है।
"तुम्हारी जिंदगी में कोई मर्द नही आया।इसलिए तुम मर्दों को कोस रही हो।उन्हें धोखेबाज और चालू बता रही हो,"सरोज की बात सुनकर रश्मि बोली,"या फिर तुम्हे मेरे प्यार से जलन हो रही है।"
"तुम्हे मेरी बात गलत लग रही है।तुम मुझे गलत समझ रही हो।मैं तुम्हारी दुश्मन नही हूँ।तुम्हारी शुभ चिंतक हूँ।मैं तुम्हे अपनी बहन समझती हूँ।अपनी छोटी बहन।इसीलिए तुम्हे अपने अनुभव की बात बता रही हूँ।,"सरोज बोली,"तुम्हारा सोचना गलत है कि मेरी जिंदगी में कोई मर्द नही आया।इसलिए मैं ऐसी बात कर रही हूँ।मेरी जिंदगी में भी मर्द आया था।"
"क्या?तुम्हारी जिंदगी में मर्द?"
"हा मेरी जिंदगी में मर्द।मेरी जिंदगी में भी मर्द आया था।मैंने भी किसी मर्द से प्यार किया था।उस पर विश्वास किया था और उसके विश्वास में ही तबाह हो गयी।"
",यह तुम क्या कह रही हो,"रश्मि ने कभी सरोज को प्यार की बात करते हुए नही सुना था।उसे मर्दों से चिढ़ थी।कभी रोमांस,प्रेम के शब्द उसकी जुबान पर नही आते थे।रश्मि की नजर में सरोज एक ठंडी औरत थी।लेकिन आज सरोज के होठो पर प्यार का नाम सुनकर रश्मि चौकी थी।
"शायद तुम्हे मेरी बात पर यकीन नही हो रहा होगा।लेकिन मैं झूठ नही बोल रही।सच कह रहीहूँ।मेरी जिंदगी में भी कभी कोई मर्द आया था।"
"सच मे?"रश्मि अपने पलंग पर उठकर बैठ गयी थी,"कौन था वह?"
"रोहित,"सरोज के होठो पर एक नाम उभरा था।होठो पर नाम आते ही उसका चेहरा लाल हो गया।नारी सुलभ लज्जा से वह लजा गयी। लेकिन कुछ क्षणों बाद ही उसके चेहरे पर उभर आई प्रसन्नता न जाने कहा गायब हो गयी।और प्रसन्नता का स्थान पर अवसाद झलकने लगा।उसके चेहरे पर वेदना झलकने लगी।मानो इस नाम ने उसके होठो पर आकर उसकी दुखती रग पर हाथ रख दिया हो।उसके दर्द को जो वर्षों से दबा हुआ था।बाहर ला दिया हो।
रश्मि,सरोज के चेहरे पर उभर रहे भावों को पढ़ने का प्रयास कर रही थी।वह बोली,"अभी तुमने कहा था,मुझे अपनी बहन समझती हो।"
"हा।"
"तो अपनी बहन को रोहित के बारे में नही बताओगी?"
और रश्मि के आग्रह पर उसे अपबे अतीत के पन्ने रश्मि के सामने खोलने पड़े।
वह अपने बारे में बताने लगी।
मेरा जन्म कर्मकांडी ब्राह्मण परिवार में हुआ था