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रामायण - भाग 2

आज से कई वर्षों पहले की बात है। जब धरती पर दैत्यों, दानवों, असुरों और राक्षसों के राजा रावन का आतंक और अत्याचार इतना बढ़ गया था कि चारों ओर सिर्फ हाहाकार ही हाहाकार मचा हुआ था।

सारे ऋषि, मुनि और देवतागण भी इस आतंक और अत्याचार से तंग आ गये थे। राक्षसों के राजा रावन के इस आतंक और अत्याचार से बचने के लिए कोई ना कोई उपाय ढूँढ रहे थे। लेकिन उन सबके हाथों सिर्फ निराशा ही निराशा लग रही थी।

यहां तक कि स्वंय देवताओं के पास भी दैत्यों के राजा रावन से मुकाबला करने का साहस नहीं था। क्योंकि रावन को ये वरदान प्राप्त था कि देव, दानव,नाग, किन्नर और गंधर्व इनमें से किसी के हाथों मारा नहीं जायेगा इसलिए राक्षसों के राजा रावन का आतंक और अत्याचार दिन ब दिन बढ़ता ही जा रहा था।


जब सारे ऋषि, मुनि और देवतागण हार गये। तब इंद्र देव ने सारे ऋषि, मुनि और देवतागण से कहा - " हमलोगों को निराश नहीं होना चाहिए। हमलोगों को स्वयं ब्रह्म देव के पास जाकर उन्हीं से इस समस्या का समाधान पूछना चाहिए। शायद ब्रह्म देव के पास इसका कोई तोड़ हो।"

सारे ऋषि, मुनि और देवतागण ने इस बात को स्वीकार किया। और फिर सारे ऋषि, मुनि और देवतागण ब्रह्म देव के पास पहुंचे । सभी ने सिर झुकाकर ब्रह्म देव को प्रणाम किया। फिर इस समस्या के समाधान के बारे में पूछते हुए इंद्र देव ब्रह्म देव से बोले - " हे ब्रह्म देव! आप हमे राक्षसों के राजा रावन के बढ़ते हुए इस आतंक और अत्याचार से बचने का कोई मार्ग बताए प्रभु! मार्ग बताए।"

सारे लोग इंद्र देव के पीछे-पीछे बोलने लगे - "मार्ग बताए प्रभु! मार्ग बताए।"


उन सभी की बातों को ध्यान से सुनने के बाद ब्रह्म देव बोले - " ऋषिगण, मुनिवर और देवतागण! हम आप सबों की समस्याएं से भली-भांति परिचित हैं। लेकिन इस समस्या का समाधान तो स्वयं मेरे पास भी नहीं है।"

फिर सारे लोग एक साथ बोले - " प्रभु! अगर आपके पास इस समस्या का समाधान नहीं है, तो फिर इस समस्याओं का समाधान किनके पास है।"


इतना कहा ही था कि देवतागण बोल पड़े -" प्रभु ! क्या हम इन समस्याओं का समाधान नहीं कर पाएंगे? क्या हम इसी तरह से रावन के बढ़ते अत्याचारों को सहन करते रहेंगे । "


ब्रह्म देव ने कहा- " इन समस्याओं का समाधान तो इस सृष्टि के पालनकर्ता प्रभु नारायण! ही कर सकते हैं। जो हम सबों के पालनहार हैं। जो इस सृष्टि के स्वामी हैं। हमे उन्हीं के पास जाना चाहिए। "



फिर सारे ऋषि, मुनि और देवतागण ब्रह्म देव के पीछे-पीछे भगवान विष्णु के पास जाने लगे।


उधर दूसरी ओर भगवान विष्णु अपनी शेषनाग पर शयन कर रहे थे। उनकी दोनों नेत्र बंद थे। बगल में ही लक्ष्मी माता बैठी हुई थी और स्वयं उनकी पैर दबा रही थी। तभी वहां ब्रह्म देव के साथ साथ सारे ऋषि, मुनि और देवतागण पहुंच जाते हैं।


जब भगवान विष्णु अपनी आँखे खोलते हैं तो देखते हैं कि ब्रह्म देव के साथ साथ सारे ऋषि, मुनि और देवतागण भी आए हुए हैं। सभी भगवान विष्णु को सिर झुकाकर और हाथ जोड़ कर प्रणाम करते हैं।


भगवान विष्णु ब्रह्म देव को देखते हुए बोलते हैं - "जय ब्रह्म देव!"


" हे सच्चिदानंद! हे सृष्टि पालक! पापी रावन के अत्याचारों से पीड़ित हो कर। ये पृथ्वी, ऋषि, मुनि, देवता, गंधर्व सब आपके शरण में आए हैं। इनकी रक्षा कीजिए भागवन।" ब्रह्म देव ने कहा।


फिर पृथ्वी, ऋषि, मुनि, देवता, गंधर्व सभी ने नारा लगाने शुरू कर दिये - "रक्षा कीजिए भागवन! रक्षा कीजिए "


फिर युवराज इंद्र कहना शुरू कर दिया - " पृथ्वी पर धर्म और सत्य का नाश हो रहा है प्रभु। पाप की शक्तियाँ बढ़ रही हैं। राक्षसों के राजा रावन अहंकार के मद में चूर हो कर तीनोंलोकों को अपने पांव तले रोंदने को तैयार है। देव, दानव, मनुष्य कोई उसका सामना करने की हिम्मत नहीं करता क्योंकि स्वयं ब्रह्म और महादेव ने उसे वरदान दिया है। देव, दानव,नाग, किन्नर, गंधर्व किसी के हाथों से वो मारा नहीं जायेगा।"

भगवान विष्णु बड़े ही ध्यान से उन सब की बातों को सुन रहे थे।

इसके बाद फिर धरती माँ अपनी व्यथा कहना शुरू किए - " प्रभु! आपकी सृष्टि का भार धारण करना मेरा धर्म है। परंतु जब धर्म की जगह अधर्म का राज होता है। तो अधर्म से अनाचार, अनाचार से भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचार से अत्याचार की ज्वाला भड़क उठती है। जब अत्याचार इतने बढ़ जाते हैं। तो देखिए, पाप की ज्वाला में मेरा शरीर जलने लगता है। प्रभु! मेरी रक्षा कीजिए। "


" पृथ्वी त्राहि-त्राहि कर रही है करुणा निधान!। जब वो अभिमानी चलता है तो ऐसा प्रतीत होता है, मानो धरती को अपने पैरों तले कुचल रहा हो। असुरों के आतंक से धर्मशील जनता चीत्कार कर रही है। उसके सैनिक लोगों को तरास दे रहे हैं। राक्षस, साधुजनों का खून पी रहे हैं प्रभु। आज अबलाओं की लाज और मानव की मानवता को बचाने वाला कोई नहीं रहा। आज वो अवस्था आ गई है। यदि कोई धर्म और सत्य के रास्ते पर चलने की कोशिश करे तो वो जिवित नहीं रह सकता। आज हर प्राणी पाप और भ्रष्टाचार के रास्ते पर चलने को विवश किया जा रहा है। " अभी इंद्र देव इतना कहा ही था कि वहाँ एक आवाज सुनाई देती है।


" जब ऐसी अवस्था आ जाए तो सत्य की रक्षा के लिए किसी महान शक्ति का अवतार लेना आवश्यक हो जाता है। सच्चिदानंद! "

सभी लोग इस आवाज की ओर देखने लगते हैं। तभी आवाज की दिशा में महादेव दिखाई देते हैं। ये आवाज उन्हीं की थी।


" देवो आदि देव! प्रणाम " - भगवान विष्णु महादेव को हाथ जोड़कर नमस्कार करते हुए कहते हैं। फिर उसके बाद सभी महादेव को प्रणाम करते हैं।



फिर महादेव कहना शुरू करते हैं - " हे सर्वेश्वर! आपने जो कर्म का विधान बनाया है। उसके अनुसार जो भी श्रम करेगा, परिश्रम करेगा, तपस्या करेगा। तो उसे शक्ति आवश्य प्राप्त होगी। उसी विधान को निभाना। आपक कर्तव्य है प्रभु!"


फिर देवगुरू वृहस्पत कहने लगते हैं - " धरती पर जब भी कोई जालिम। प्राणी मात्र को अपने चरणों में झुकने को मजबूर कर देता है, तो एक सच्चा इंसान उसके सामने झुकने से इनकार कर देता है। क्योंकि उसे विश्वास होता है कि ऊपर कोई शक्ति है, जो उसके साथ न्याय करेगी, उसकी रक्षा करेगी। जिस दिन ये विश्वास टूट जायेगा कि अंत में सच्चाई की जीत होती है। उस दिन कोई भी धर्म के रास्ते पे नहीं चलेगा। समाज बिखर जायेगा। धरती, सूर्य, चंद्रमा अपना-अपना रास्ता बदल देंगे। सृष्टि का सारा करम अस्त व्यस्त हो जायेगा।


फिर महादेव, देवगुरू वृहस्पत के बातों को समर्थन करते हुए सच्चिदानंद से कहते हैं - " देवगुरू वृहस्पत, ठीक कहते हैं प्रभु!" फिर आगे कहते हैं - " यहि वो समय है। जब ईश्वर का अवतार लेना आवश्यक होता है।"


तभी भगवान विष्णु महादेव से कहते हैं - " त्रिपुरारि! पापी के पाप में ही उसका नाश का बीज छुपा हुआ रहता है। जो रावन यह समझता है कि उससे बढ़कर कोई शक्ति नहीं रही। उसका नाश भी उसी अहंकार में छुपा हुआ है। उस अहंकार के कारण उसने वर माँगते समय मनुष्य और बानर के हाथों न मरने का वरदान नहीं माँगा था। जिस मानव को वह कीड़े-मकोड़ों की तरह तुच्छ समझता है। उसी समान्य मानव के रूप में, मैं अवतार लेकर उसका मान भंग करूंगा। हम अपनी कलाओं सहित अयोध्या नरेश दशरथ के घर जन्म लेंगे और असुरों के अत्याचारों से पृथ्वी की रक्षा करेंगे। ताकि धरती पर जहां भी लोग सत्य और धर्म का साथ दे वहां उन्हें एक ही विश्वास होगी। अंत में सच्चाई की जय होगी। सारी सृष्टि में एक ही जय घोष गूंजेगा - सत्यमेव जयते! सत्यमेव जयते! सत्यमेव जयते! सत्यमेव जयते! "


फिर पूरी सृष्टि में चारों ओर एक ही आवाज गूंज उठती है - सत्यमेव जयते! सत्यमेव जयते! सत्यमेव जयते! सत्यमेव जयते!




वहीं दूसरी ओर राजा दशरथ अपने तीनों पत्नि और महर्षि वशिष्ठ के साथ अपने कुल देवता सूर्य देव की पूजा कर रहे थे। जब पूजा समाप्त हो जाती है तो महर्षि वशिष्ठ राजा दशरथ से बोलते हैं - " महाराज दशरथ! आज सूर्य देवता उत्तरायण में प्रवेश कर रहें हैं। ये बड़ा ही पुनीत मुहूर्त है। इस शुभ मुहूर्त में अपने कुल देवता से जो प्रार्थना करोगे। वो आवश्य सफल होगा।"


" गुरूदेव! आपकी आशीर्वाद से अपार वैभव, सुख, समृद्धि, कृति सब कुछ है। परंतु एक ही कमी है। जो हमे व्याकुल किये रहती है। जिस सूर्यवंश में महाराज इक्ष्वाकु , दिलीप, भगीरथ, रघु, हरिश्चंद्र जैसे परम प्रतापी यशस्वी राजा हुए हैं। क्या! क्या वो रघुकुल दशरथ के साथ ये समाप्त हो जाएगा? क्या हमारे बाद पितरों को पानी देने वाला कोई नहीं होगा? "

" महर्षि वशिष्ठ! कुल देवता सूर्य भगवान से हमारी यही प्रार्थना है। यही पुकार है। सूर्यवंश का सूर्य दशरथ के साथ ही अस्त ना हो जाय। " - महाराज दशरथ बोले।


वहाँ पर सभी के मुख पर उदासी के भाव आ जाते हैं।


फिर उदासी भाव से महारानी कौशल्या बोली -" आप तो जानते हैं गुरूदेव! कि कोई माँ कहने वाला नहीं हो तो स्त्री अपने आपको पूर्ण नहीं समझती।"

फिर महारानी कैकेयी बोली -" एक माँ के ह्रदय का आंगन जबतक सूना रहेगा गुरुदेव! तबतक संसार के सारे सुख, वैभव इन महलों के खालीपन को कभी नहीं भर सकते।"


फिर महारानी सुमित्रा बोली -" आप तो त्रिकालदर्शी हैं गुरुदेव! हमारे मन की व्यथा तो आप जानते ही हैं। "


" महारानी कौशल्या, देवी कैकेयी, देवी सुमित्रा! आप निराश ना हो। सूर्य भगवान आपकी मनोकामना आवश्य पूरी करेंगे। परंतु उसके लिए पुत्रकामेष्टि यज्ञ करना होगा।" - महर्षि वशिष्ठ बोले ।


तभी महारानी कौशल्या बोली -" तो फिर गुरुदेव उसमे देरी क्यों? आप यज्ञ का आयोजन कीजिये। "


महारानी कौशल्या इतना बोली ही थी कि महर्षि वशिष्ठ बोले -" परंतु देवी! हम वो यज्ञ नहीं करा सकते। "


फिर महारानी कैकेयी गुरुदेव से पूछते हुए बोली - "आप नहीं करायेंगे तो और कौन करायेगा।"


" अथर्ववेद के पूर्ण ज्ञाता ऋष्यशृंग मुनि इसके विशेषज्ञ हैं। ये यज्ञ उन्हीं के द्वारा संपन्न होना चाहिए।" - महर्षि वशिष्ठ बोले ।



" तो फिर उन्हें बुलवाईये गुरूदेव और यज्ञ का अनुष्ठान कीजिए।"- कैकेयी बोली।

"नहीं देवी कैकेयी! उसके लिए तो महाराज को स्वयं उनके पास जाकर प्रार्थना करनी चाहिए। "- महर्षि वशिष्ठ ।


फिर महाराज दशरथ बोले -" गुरूदेव! मैं आज ही उनके पास जाने के लिए तैयार हूँ।"

तभी महारानी कैकेयी खुश होते हुए बोली -" मैं अभी आर्य सुमंत्र को बुलाकर कहती हूँ कि वो सेनापति को आदेश दे कि महाराज के साथ जाने के लिए रथ, हाथी, घोड़े और पैदल सेना तुरंत तैयार किया जाय।महाराज आज ही प्रस्थान करेंगे। "


तभी तुरंत कैकेयी को बताते हुए महर्षि वशिष्ठ बोले - " नहीं देवी कैकेयी! वहां रथ, हाथी, घोड़ों, सेना कि कोई आवश्यता नहीं है। महराज एक योगी के पास कुछ मांगने जा रहे हैं। अपना ऐश्वर्या और पराक्रम दिखाने नहीं जा रहे हैं। देवी! भिक्षा खाली झोली में ही डाली जाती है। एक महात्मा के पास अपना वैभव दिखाने जाओगे तो सोने चांदी के चमक दमक और अहंकार ही लेकर आओगे। "


" आपने सत्य कहा गुरुदेव! ऋषि ऋष्यशृंग मुनि के द्वार पर राजा दशरथ नहीं, भिक्षुक दशरथ नंगे पांव जाएगा। आशीर्वाद दीजिए! " राजा दशरथ बोले।


महर्षि वशिष्ठ आशीर्वाद देते हुए बोले -" तुम्हारी मनोकामना सफल होगी राजन! "


फिर राजा दशरथ महर्षि वशिष्ठ का आशीर्वाद लेकर वहां से नंगे पांव ऋष्यशृंग मुनि के कुटिया कि ओर चल दिये। नंगे पांव जंगलों से होते हुए राजा दशरथ एक जोगी को मनाने निकल जाते हैं।

जब राजा दशरथ ऋष्यशृंग मुनि के आश्रम पहुंचे तो उस समय ऋष्यशृंग मुनि अपने ही कुटिया में बैठे हुए थे। राजा दशरथ ऋष्यशृंग मुनि के कुटिया में प्रवेश करते हैं और अपना मुकुट उतर कर ऋष्यशृंग मुनि के सामने नीचे रख देते हैं। और ऋष्यशृंग मुनि को पैर छूकर प्रणाम करते हैं। राजा दशरथ अपने आंसू से ऋष्यशृंग मुनि के पग धोए। हर भाँति मनाने कि कोशिश करते हैं। ये सब देखकर ऋष्यशृंग मुनि बहुत प्रसन्न हुए और वे मान गए। उन्होंने राजा दशरथ को तथास्तु कहा।


फिर पुत्रकामेष्टि यज्ञ कर्म शुरू हुआ। इस यज्ञ से प्रसन्न होकर अग्नि देवता प्रकट हुए। उनके हाथों में एक कटोरे का पात्र था जिनमें खीर था। राजा दशरथ खुश होते हुए अग्नि देवता को प्रणाम करते हैं। फिर अग्नि देवता खीर का पात्र राजा दशरथ को देते हुए कहा - " ये खीर अपनी पत्नि को खिला देना और तुम्हारी जो भी कामना है। वो पूरी हो जाएगी।" इतना कहकर अग्नि देवता अन्तर्धान हो गए। इस तरह से पुत्रकामेष्टि यज्ञ सफल हुआ।



फिर राजा दशरथ खीर का पात्र लेकर अपने कुल देवता के कक्ष में प्रवेश करते हैं जहां पर उनके तीनों रानियाँ उपस्थित थीं। खीर का पहला भाग राजा ने कौशल्या को दिया। दूसरा भाग प्रियतमा कैकेयी ने हँसकर लिया। फिर दोनों रानियों ने अपना एक एक भाग निकला और रानी सुमित्रा को दोनों ने एक एक दिया निवाला। इस तरह तीनों रानियाँ खीर ग्रहण करते हैं। राजा दशरथ ये सब देखकर बहुत प्रसन्न होते हैं।


वहीं दूसरी ओर ब्रह्म देव युवराज इंद्र से कहते हैं - " युवराज इंद्र, श्रीमन नारायण! ने पृथ्वी पर अवतार लेने का संकल्प लें लिया। अब आप देवताओं को भी आदेश दीजिए। पृथ्वी पर जाकर वानर कुल में जन्म लेकर प्रभु की सेवा करें।" फिर युवराज इंद्र, ब्रह्म देव को प्रणाम करके वहाँ से चले जाते हैं।





वहीं दूसरी ओर पृथ्वी पर पुत्रकामेष्टि यज्ञ के बाद से राजा दशरथ के लिए एक एक दिन बिताना बड़ा कठिन हो गया था। वो अपने संतान को देखने के लिए बहुत अधीर हो रहा था। एक एक महीने कई वर्षों के जैसा लग रहा था। जैसे जैसे महीने बीत रहे थे वैसे वैसे महाराज की अधीरता और भी बढ़ता ही जा रहा था।


पहला महीना.. दूसरा महीना.. फिर तीसरा महीना.. इस तरह से धीरे-धीरे पूरे नौ महीने बीत गए।

फिर चैत्र मास की नवमी तिथि आई। शुक्ल पक्ष का समय था। उस समय नक्षत्र पुनर्वसु नक्षत्र में थे और ग्रह अपने अपने उच्च स्थान पर थे। मध्यरात्रि का समय था। मध्यरात्रि का समय कटने का नाम ही नहीं ले रहा था। राजा दशरथ अपने कक्ष के बाहर ही थोड़े बेचैनी भाव से टहल रहे थे। वो अधीर हो रहे थे। उनका हृदय जोरों से धड़क रहा था। अभी महाराज टहल ही रहे थे कि तभी उन्हें शंखनाद की ध्वनि सुनाई देती है। इस ध्वनि को सुनकर अब महाराज का हृदय और भी जोरों से धड़कना शुरू हो गया।


तभी दो सेविका महाराज के पास दौड़ी दौड़ी आई और महाराज से बोली - "बधाई हो! , बधाई हो! महाराज , बधाई हो!"

" महाराज! महारानी कौशल्या ने एक पुत्र को जन्म दिया है। बधाई हो! महाराज।"

इस बात को सुनकर महाराज बहुत खुश हुए। और फिर महाराज प्रसन्न होते हुए उन दोनों सेविका को अपने हाथों से सोने चांदी से बने जेवरात भेंट स्वरूप दे दिए।
भेंट लेकर दोनों सेविका वहाँ से चली गई।

[ इस तरह से भगवान विष्णु मनुष्य के रूप में धरती पर राजा दशरथ के घर राम के रूप में जन्म लिया। ]



फिर थोड़ी ही देर के बाद महाराज के पास कैकेयी की दासी मंथरा आई और महाराज से बोली - " बधाई! , राजराजेश्वर बधाई! कैकेयी माँ बन गई। देवी कैकेयी रानी ने पुत्र को जन्म दिया। वो माँ बन गई। उसका मान बढ़ गया। हा हा हा.. हा हा हा.. जय जयकार! "


फिर महाराज मंथरा को भेंट देते हुए बोले - " मंथरा! रानी कैकेयी से हमारा अभिनंदन कहो।"


" महाराज का जय जयकार! मेरी कैकेयी रानी का जय जयकार! मेरी कैकेयी रानी को जय जयकार हो। " - मंथरा महाराज से भेंट लेकर। वहाँ से ये कहते हुए। वहाँ से चली जाती है।



फिर थोड़ी देर के बाद वहाँ पर एक सेविका आई और महाराज से बोली - " महाराज! देवी सुमित्रा को पुत्र हुआ। "

अभी इतना कहा ही था कि वहाँ दूसरी सेविका भी आ पहुंची और महाराज से बोली -" नहीं महाराज! एक नहीं, दो दो पुत्र हुए।"


इस बात को सुनकर महाराज हाथ जोड़कर ऊपर देखते हुए बोले - " कृपा! कृपा सूर्य भगवान! "

इस तरह से राजा दशरथ के तीनों रानियों ने चार राजकुमारों को जन्म दिया।


सुबह-सुबह अयोध्या में चारों ओर ये बातें आग की तरह फैल गई कि महारानी ने चार राजकुमारों को जन्म दिया है। सारे अयोध्यावासी राजकुमारों के जन्म से बहुत खुश थे। महाराज ने राजकुमारों के जन्म दिवस पर उत्सव रखा। पूरे अयोध्या में खुशियाँ का माहौल छा गया। कोई ढ़ोल बजा रहा था तो कोई नाच गा रहा था। महाराज भी अयोध्या में चारों ओर छाई खुशियों के माहौल से बड़े प्रसन्न थे। नाच गान करने वाले लोगों को महाराज भेंट भी दे रहे थे।

महाराज और तीनों महारानी भी बहुत खुश नजर आ रहे थे। सारे अयोध्यावासी के मुख पर अलग ही खुशी का भाव था। सारे लोग नाच झूम रहे थे। वहाँ के वातावरण में भी एक अलग ही खुशियों का माहौल था। सारे लोग खुशियों के माहौल में मग्न थे।


क्रमश : ________