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रामायण - भाग 1

गोस्वामी तुलसीदास ने जब रामायण अपनी प्रादेशिक भाषा अवधी मे लिखी, तो उसपर बहुत विवाद हुआ। परंतु गोस्वामी जी ने अपना फैसला नहीं बदला क्योंकि उन्हें इस का विश्वास था कि रामायण की कहानी आम इंसानों तक पहुंँचनी चाहिए । ताकि उसमे जो कर्तव्य, त्याग और प्रेम के आदर्श दिखाए गए हैं। जो Human behaviour के ideals हैं। उनसे एक आम इंसान भी अपने जीवन का मार्गदर्शन पा सके। उसे जिंदगी का सही रास्ता मिल सके।


रामायण एक धार्मिक ग्रंथ होने के अलावा एक संस्कृति दस्तावेज है। एक ऐसा कल्चरल डॉक्यूमेंट है जो रंग, नस्ल और जाति के सीमाओं को पार कर के आम इंसानों के दिल पर इतना गहरा असर डालती है कि हर आदमी अपनी रोज़मर्रा की जिंदगी में उसकी शिक्षा और तालीम से फायदा उठा सकता है।


यही कारण है कि संसार की करीब-करीब हर भाषा में इसका अनुवाद हो चुका है। जर्मनी, फ्रांस, इंग्लैंड, रूस, चीन, ईरान, थाईलैंड, इंडोनेशिया आदि देशों में रामायण को उतने आदर मिला है, जितना भारत में।


रूस में पिछले कई सालों से रामायण का नाटक स्टेज पर खेला जा रहा है।

उधर इंडोनेशिया में, रामायण वहाँ की एक लोक कथा, वहाँ के folk art का ek important subject है बल्कि प्रमुख विषय है। उसका कारण है कि भारत ने दूसरों की धरती पर कब्जा करने के लिए कभी सेनाएँ नहीं दी, कभी फौजें नहीं भेजी। हमेशा भारत से गए शांति और दोस्ती का दूत - Messenger of Peace and Love | जिन्होंने उनके धरती पे नहीं बल्कि उनके दिलों पर कब्जा कर लिया। उन दूतों के साथ गई, भारत के वीरों की कहानियाँ। उनके epics - रामायण जैसे महाकाव्य।


उसका असर कितना गहरा था। इसका जिक्र करते हुए पंडित जवाहरलाल नेहरू ने अपनी पुस्तक में, फ्रांस के एक historian (एक इतिहासकार) मिसलेट की विचार। इस प्रकार उत्तर दिये -

जिसे जीवन की अनुभूतियों की प्यास हो, वो इस महाकाव्य रूपी सरोवर से अपनी प्यास बुझाए जो सागर से भी विशाल है। जिसमें सूर्य का प्रकाश है। जिसमें निरंतर शांति, एक अनंत मिठास है।


सबसे पहले महर्षि वाल्मीकि ने संस्कृत भाषा में रामायण की रचना की। उसके बाद जब संस्कृत बोलचाल की भाषा नहीं रही तो कवियों और संतों ने इसे बार बार अपने अपने समय और अपने अपने प्रदेश की भाषा में लिखा ।

दक्षिण की भाषाओं में रंगनाथ रामायण तेलगू में लिखी गई। उसी तरह महर्षि कंबर ने तमिल में, अरुतच्छन ने मलयालम में और नागचंद्र ने कन्नड में से।


पूर्व में महाकवि कृतिवास ने इसे बंगला भाषा में लिखा। और कृतिवासी रामायण उनके जीवनकाल में ही घर-घर में गाई जाने लगी। उसी प्रकार पश्चिमी तट के निकट महाराष्ट्र में संत एकनाथ ने ये गाथा बड़े भावपूर्ण अंदाज में गाई थी।


जैसा की मैंने पहले कहा था कि उत्तर में गोस्वामी तुलसीदास ने इसे अवधि में लिखा था।


रामायण की कहानी इंसान की दिल में इस विश्वास, इस यकीन, इस faith को मजबूत करती है कि जब कभी जुल्म की ताकतें यानि autocratic powers मानवता और इंसानियत को अपने पैरों तले कुचलने की कोशिश करती है तो उस वक्त अगर कोई ऐसी ताकत, कोई ऐसी विभूत इंसान के रूप में आती है जो जुल्म की ताकतों और उनके हथियारों का मुकाबला केवल अपनी सच्चाई, आत्मविश्वास और प्यार की भावनाओं से करता है।


रामायण की परंपरागत कथा इस बात पर आधारित है कि एक समय जब आततायी शक्तियाँ रावण के रूप में प्रकट होती है, जो अपनी ताकत के नशे में चूर धरती को अपने पैरों तले रौंदता चले जा रहा है। उस समय धरती, ऋषि, मुनि और देवतागण भगवान विष्णु के पास मदद के लिए जाते हैं और वो उनके पुकार से द्रवित हो कर उनकी सहायता के वचन देते हैं।


इस कथा से एक इंसान में सच्चाई के रास्ते पर चलने की हिम्मत आती है क्योंकि उसे विश्वास होता है कि आखिर में हमेशा सच्चाई की जीत होगी।


और सारे संसार में एक ही नारा गूंजता रहेगा ।
गूंजेगा - सत्यमेव जयते!, सत्यमेव जयते!, सत्यमेव जयते!