Musafir Jayega kaha? - 6 in Hindi Thriller by Saroj Verma books and stories PDF | मुसाफ़िर जाएगा कहाँ?--भाग(६)

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मुसाफ़िर जाएगा कहाँ?--भाग(६)

कृष्णराय जी ने देखा कि उनके सामने एक नवयुवक और एक नवयुवती खड़े हैं और दरवाजा खुलते ही दोनों कमरें के भीतर घुसते चले आएं,तब कृष्णराय जी बोले....
अरे....अरे...कौन हो तुम लोग और भीतर क्यों घुसते चले आ रहे हो?
तब नवयुवक कमरें के दरवाजे की कुण्डी लगाते हुए बोला.....
साहब!मैं बंसी का बेटा रमेश हूँ....
तब कृष्णराय जी ने नवयुवती की ओर इशारा करते हुए पूछा....
और ये कौन है?
तब रमेश बोला ....
साहब!यहाँ से पाँच कोस दूर फूलपुर गाँव है,ये उसी गाँव के सरपंच की बेटी है धानी!ये मुझसे मिलने आई थी,तभी हमें किसी ने देख लिया और हम इधर चले आएं.....
ये अच्छी बात नहीं है रमेश!किसी जवान लड़की को इतनी रात गए,किसी अन्जान के कमरें में रखना इस लड़की के लिए मुसीबत बन सकता है,बेचारी की बदनामी भी हो सकती है,कृष्णराय जी बोलें....
मैं जानता हूँ साहब! बदनामी से बचाने के लिए तो इसे यहाँ ले आया और बापू बोले थे कि आप बहुत अच्छे इन्सान हैं,इसलिए बिना संकोच के इसे बचाने के लिए आपके कमरें में ले आया,रमेश बोला.....
रमेश के इतना बोलते ही किसी ने दरवाजे पर दस्तक दी और बोला....
दरवाजा खोलो.....जल्दी दरवाजा खोलो....
तब धानी ने कृष्णराय जी से इशारे में विनती करते हुए कहा कि दरवाजा मत खोलिएगा और फिर धानी की बात मानते हुए कृष्णराय ने बाहर खड़े व्यक्ति से पूछा....
कौन हो तुम?
मैं रामजस हूँ,मुझे पता है कि फूलपुर गाँव के सरपंच की बेटी धानी इसी कमरें में हैं,रामजस बोला....
कौन धानी?मैं किसी धानी को नहीं जानता और मैं किसी अन्जान के लिए दरवाजा नहीं खोलूँगा,कृष्णराय जी बोलें....
और तुम कौन हो?रामजस ने दरवाजों के पीछे से कृष्णराय जी से पूछा....
मैं फोरेस्ट आँफिसर रामविलास चौरिहा जी का मेहमान हूँ,उन्होंने ही मुझे यहाँ ठहराया है,कृष्णराय जी बोलें...
तब ठीक है,मैं यहाँ से जाता हूँ और इतना कहकर दरवाजों के पीछे खड़ा रामजस वहाँ से चला गया....
रामजस के जाते ही धानी ने कृष्णराय जी से कहा....
धन्यवाद!शहरी बाबू!आज आपने मुझे बचा लिया,नहीं तो मेरे बाबा को पता चल जाता कि मैं यहाँ रमेश से मिलने आई थी तो मेरी चटनी बना देतें,आप बहुत अच्छे हैं शहरी बाबू!
लेकिन ये तो गलत है क्योंकि जवान बेटी का किसी पराएं लड़के से इस वक्त मिलना तो किसी पिता को भी अच्छा नहीं लगेगा,मैं भी तुम्हारे पिता की जगह होता तो मुझे भी गुस्सा आता,कृष्णराय जी बोले....
मैं समझती हूँ शहरी बाबू!लेकिन मैं रमेश को चाहती हूँ और मेरे बाबा रमेश को पसंद नहीं करते,इसलिए मुझे रमेश से मिलने इस वक्त आना पड़ता है,धानी बोली....
लेकिन ये ठीक नहीं है,लोंग बदनामी भी तो कर सकते हैं,कृष्णराय जी बोलें....
हाँ!साहब!मैं भी तो इससे यही कहता हूँ लेकिन ये मानती ही नहीं,रमेश बोला...
झूठ क्यों बोलता है?तू भी तो मुझसे मिले बिना नहीं रह सकता,धानी रमेश पर चिल्लाई....
देखिए ना!साहब!कैसें चीखती है मुझ पर और कहती है कि मुझे चाहती है,रमेश बोला....
जैसे तू तो कभी मुझ पर चीखता ही नहीं,धानी बोली....
देखिए ना साहब!ऐसे ही हर वक्त मुझे लड़ा करती है,ना जाने शादी के बाद मेरा क्या हाल करेगी?रमेश बोला....
तुझे लगता है कि हमारा ब्याह होगा,क्या मेरे बाबा हम दोनों का ब्याह होने देगें?ये कहते कहते धानी की आँखों में आँसू भर आएं....
रोती है पगली!हमारा ब्याह होगा और जरूर होगा,होगा ना साहब हम दोनों का ब्याह,रमेश ने कृष्णराय जी से कहा.....
दोनों का प्रगाढ़ प्रेम देखकर और धानी की आँखों के आँसू देखकर कृष्णराय जी का मन द्रवित सा हो गया और वें धानी के सिर पर हाथ रखते हुए बोलें....
धानी!रोती क्यों है पगली?सच्चा प्यार करने वालों को कोई अलग नहीं कर सकता,तुम दोनों का ब्याह जरूर होगा,
सच!शहरी बाबू!हम दोनों का ब्याह होगा,धानी ने खुश होते हुए पूछा...
हाँ....हाँ...जरूर होगा,कृष्णराय जी बोले....
आप बहुत अच्छे हैं शहरी बाबू!धानी बोली....
सच!मैं अच्छा हूँ!कृष्णराय जी ने धानी से पूछा....
हाँ!शहरी बाबू!सच में आप बहुत अच्छे हैं,धानी बोली....
अब यहाँ से जल्दी चल ,कहीं कोई और आ गया तो आफत हो जाएगी,रमेश धानी से बोला...
मुझे क्या यहाँ आनन्द आ रहा है जो तू ऐसी बातें कर रहा है,धानी रमेश से बोली....
ठीक है....ठीक है....अब चल मेरी माँ !मैं तुझे अपनी साइकिल में बैठाकर तेरे घर की गली तक छोड़कर आता हूँ,रमेश बोला....
अच्छा!तो शहरी बाबू!अब मैं चलती हूँ,धानी जाते हुए बोलीं....
ठीक है....और ध्यान से जाना,फिर से ना तुम दोनों को कोई साथ में देख ले,कृष्णराय जी बोलें....
हाँ!हम दोनों ध्यान रखेगें अपना,रमेश बोला....
तब धानी कृष्णराय जी के पास आई और उनके पैर छूकर बोली....
आप बहुत अच्छे हैं शहरी बाबू!काश मेरे बाबा भी आपके जैसे होते....
अच्छा....अब जाओ,कृष्णराय जी धानी के सिर पर आशीर्वाद स्वरूप हाथ रखते हुए बोले...
फिर दोनों कमरें से बाहर निकल गए और कृष्णराय जी ने लैम्प की रोशनी कम की और फिर से अपने बिस्तर पर आकर लेट गए....
सुबह हुई कृष्णराय जी जागे और उन्होंने बंसी को आवाज दी.....
बंसी उनके पास दौड़ते हुए आया और बोला....
जी!साहब!कुछ चाहिए....
मैं ये कह रहा था कि नाश्ता जरा जल्दी तैयार कर देना,मैं सोच रहा था कि आज फूलपुर गाँव निकल जाऊँ,शायद साहूकार जी वापस आ गए हो,कृष्णराय जी बोलें....
आपको वहांँ जाने की कोई जरुरत नहीं साहब!मैं रमेश से पता करवा लूँगा कि साहूकार जी हरिद्वार से वापस आएं या नहीं,बंसी बोला....
यहाँ पड़े पड़े ऊब रहा हूँ,फूलपुर हो आऊँगा तो थोड़ा मन बहल जाएगा,कृष्णराय जी बोलें....
वहाँ पैदल ही जाना होगा,क्या आप पन्द्रह कोस पैदल चल पाऐगें?बंसी ने पूछा....
क्यों नहीं चल पाऊँगा?अभी भी मुझे पैदल चलने की आदत है,कृष्णराय जी बोलें....
जैसा आप ठीक समझें?बंसी बोला....
ठीक है तो मेरे नहाने का गरम पानी तैयार कर के स्नानघर में रख दो,कृष्णराय जी बोले....
जी!वो तो कब का तैयार है,मैनें सुबह ही अँगीठी पर पतीला चढ़ा दिया था,बंसी बोला....
बहुत अच्छे!तो फिर मैं तैयार हो जाता हूँ,कृष्णराय जी बिस्तर से उठते हुए बोलें....
साहब!नाश्ते में मैथी के पराँठे और टमाटर की चटनी चलेगी,बंसी ने पूछा...
क्यों नहीं?मैं ऐसा ही नाश्ता पसंद करता हूँ,कृष्णराय जी बोले....
तो आप नहाकर आइए, मैं तब तक आपके लिए चाय और नाश्ता तैयार कर देता हूँ और इतना कहकर बंसी रसोईघर में चला गया...
और तभी गेस्टहाउस के बाहर से आवाज आई....
अरे इन्जीनियर साहब!मैं आपके लिए एक खबर लाया हूँ....
कृष्णराय जी गेस्टहाउस के दरवाजे के पास आए तो उन्होंने देखा कि फाँरेस्ट आँफिसर रामविलास चौरिहा जी खड़े हैं और उनके पास अपनी साइकिल पर सवार होकर आएं हैं,उन्हें देखते ही कृष्णराय जी ने पूछा....
अरे!चौरिहा साहब आप!कहिए कैसे आना हुआ?
जी!फूलपुर गाँव के साहूकार रामस्वरूप अग्रवाल हरिद्वार से लौट आएं हैं,इसलिए आपको बताने चला आया और ये रही साइकिल,आप इससे ही जाइएगा,चौरिहा जी बोलें....
जी बहुत बहुत शुक्रिया आपका,कृष्णराय जी बोलें...
साइकिल चलानी तो आती है ना आपको, कहीं विदेश जाकर भूल तो नहीं गए,चौरिहा जी ने पूछा....
जी!आती है,ये सब चीजें कोई भूलनी की थोड़े ही होतीं हैं,कृष्णराय जी बोलें....
ठीक है तो आराम से जाइएगा,काहे से रास्ता बहुत ऊबड़ खाबड़ है,केवल कच्चा रास्ता ही है वहाँ तक का,चौरिहा जी बोलें...
जी!ठीक है,कृष्णराय जी बोलें....
जी!मैं अब चलूँगा,आज बहुत काम है जंगलों में,चौरिहा जी बोलें...
जी!ठीक है!एक बार फिर से धन्यवाद,कृष्णराय जी बोलें....
और फिर चौरिहा जी वापस चले गए और उनके जाते ही कृष्णराय जी तैयार होने स्नानघर की ओर चल पड़े....

क्रमशः....
सरोज वर्मा....