GULKAND - 5 in Hindi Moral Stories by श्रुत कीर्ति अग्रवाल books and stories PDF | गुलकंद - पार्ट 5

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गुलकंद - पार्ट 5

गुलकंद

पार्ट - 5

इस तरह से एक विजातीय अंजान लड़की से उसका ब्याह करना अम्मा को जरा भी पसंद नहीं आया था। इतनी सुन्दर, सुशील और घर-गृहस्थी के सारे काम कुशलता से करने वाली सत्तो भौजी की भतीजी बीना को जाने कब से पसंद करती आई थीं वह! एक तरह से जुबान भी दे चुकी थीं वह तो, पर उनके सीधे-साधे बेटे को, इतनी दूर अकेला पाकर शहर की जाने किस जादूगरनी ने उसपर जादू-टोना करके अपने वश में कर लिया.. अपना कुत्ता बना लिया। उनकी किस्मत तो हमेशा से खराब ही रही है, एक बार फिर दगा दे गई कि आँखों में बसे सपने हमेशा के लिये टूट गये... कि जिस बेटे पर अपनी सारी आस लगाए बैठी थीं वह भी अपना नहीं रह गया। ऐसे बेटे के प्रति उनका मन इतना कसैला हो गया कि रिश्वत की तरह उस बार एक हजार रूपयों की जगह पर आए पाँच हजार के मनीआर्डर को उन्होंने उलट कर देखा भी नहीं, जैसे का तैसा लौटा दिया।

वीरेश ने सोचा था कि कुछ दिन अपनी भोली अम्मा का मान-मनुहार करने के लिये गाँव जाकर रहेगा और एक बार उनके खुश हो जाने के बाद अन्नी को ले जाकर उनकी गोद में डाल देगा। आखिर कितने दिन उससे नाखुश रह सकेंगी वह? पर ऐसा हो ही नहीं सका। अचानक आर्डर आ गये थे और उसका तबादला मुंबई हो गया। अकेले कैसे जाता? अन्नी का तबादला वहीं कराने की भाग-दौड़.. फिर इतने बड़े शहर में रिहाइश की जद्दोजहद... तबतक वह आश्चर्यचकित करती अन्नी की प्रैगनेंसी.. अम्मा का किसी भी स्थिति में शहर न आने का निर्णय... प्रांशु का जन्म... सब कुछ तो होता गया बस गाँव जाने का मुहूर्त ही नहीं निकल सका।

जो भी हो, जिंदगी खूबसूरत ही थी। अन्नी और वह साथ-साथ घर चलाते, बच्चा पालते। हम दो हमारे दो की तर्ज पर, नन्हे प्रांशु को गोद में लेकर मुस्कुराती हुई फोटो भी खिंचवा ली थी। हर घरेलू काम के लिये वह अन्नी की मदद करता.. छोटी-बड़ी हरेक समस्या का समाधान उसके साथ मिल-जुलकर करता। उसका मानना था कि महानगर में रहना था तो महानगरीय संस्कृति में ढलना ही पड़ेगा! वैसे भी अपने अतृप्त बचपन को कब भूल सका था वह? तय किया कि हर वह बात जो उसे पसंद नहीं थी, उसकी छाया भी अपनी अन्नी और प्रांशु पर नहीं पड़ने देगा। कटुता और तकलीफों को पीढ़ी दर पीढ़ी ढोते रहने का कोई औचित्य नहीं है और अगर इसके लिये कभी-कभी समझौता ही करना पड़े तो कर लेना चाहिए। घरेलू क्लेश, रिश्तों में आपसी अविश्वास वो घुन है जो ज्यादातर जिंदगियों को चुपचाप चाट जाता है, सारी खुशियों पर ग्रहण लगा देता है। पर कोई इसे गंभीरता से क्यों नहीं लेता? हर घर में इस तरह की समस्या होने के बावजूद, इसपर विजय पाने के लिये कदम उठाने के स्थान पर लोग एक-दूसरे की परेशानियों का मजा लेते, मजाक बनाते नजर आते क्यों दिखाई हैं? दूसरों के घर में हुई ऐसी सारी घटनाएँ उस इन्सान की अपनी नासमझी से, अपनी कमजोरी से हुई महसूस होती हैं पर वो समस्याएँ जो आपके अपने घर में आ गईं, उसकी जिम्मेदारी हमेशा दूसरों के कंधों पर रखकर उन्हें भला-बुरा कहा जाता है। समस्या की जड़ तक पँहुचने से ज्यादा अपने दामन को पाक साफ दिखाने पर सारा जोर लगा दिया जाता है। बड़ी से बड़ी गलती के लिये स्वयं को माफ कर देना जितना आसान है उतना ही मुश्किल होता है दूसरों की छोटी-छोटी गलतियों तक को मुआफ करना। एक बात और, उसने देखा है लोग अक्सर अपने साथ हुई नाइंसाफी और गलत व्यवहार को अपने से कमजोर इंसान पर दोहराकर प्रतिशोध लेते हैं, ज्यादा आनंदित होते हैं। छोटे-छोटे ईगो, कभी किसी से बेहतर दिखने की, लोगों को प्रभावित कर लेने की लालसा तो कभी किसी को क्षुद्र दिखा पाने का सुख... कब अपने जीवन से शांति चुरा ले जाती है, पता ही नहीं चलता।

क्रमशः

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श्रुत कीर्ति अग्रवाल
shrutipatna6@gmail.com