Garbha Sanskar - 8 in Hindi Women Focused by Praveen Kumrawat books and stories PDF | गर्भ संस्कार - भाग 8 - एक्टिविटीज–07

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गर्भ संस्कार - भाग 8 - एक्टिविटीज–07

प्रार्थना:
शान्ताकारं भुजंगशयनं पद्मनाभं सुरेशं 
विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम् । 
लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं। 
वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम् ॥

अर्थ: मैं ऐसे सर्वव्यापी भगवान विष्णु को प्रणाम करता हूं जिनका स्वरूप शांत है। जो शेषनाग पर विश्राम करते हैं, जिनकी नाभि पर कमल खिला है और जो सभी देवताओं के स्वामी हैं।
जो ब्रह्मांड को धारण करते हैं, जो आकाश की तरह अनंत और असीम हैं, जिनका रंग नीला है और जिनका शरीर अत्यंत सुंदर है।
जो धन की देवी लक्ष्मी के पति हैं और जिनकी आंखें कमल के समान हैं। जो ध्यान के जरिए योगियों के लिए उपलब्ध हैं।
ऐसे श्रीहरि विष्णु को नमस्कार है जो सांसारिक भय को दूर करते हैं और सभी लोगों के स्वामी हैं।

मंत्र:
ॐ भूर्भुवः स्वः। 
तत्सवितुर्वरेण्यं। 
भर्गो देवस्य धीमहि। 
धियो यो नः प्रचोदयात्॥

अर्थ– हे परमात्मा! आप सब कुछ हैं— जीवन, प्रकाश और प्रेम। हम आपके दिव्य तेज का ध्यान करते हैं। आप हमारी बुद्धि को सन्मार्ग में प्रेरित करें।

गर्भ संवाद 
“मेरे बच्चे, मेहनत से बड़ा कोई गुरु नहीं होता। तुम जितना मेहनत करोगे, उतनी ही सफलता तुम्हारे पास आएगी। जीवन में कोई भी काम छोटा या बड़ा नहीं होता, अगर तुम उसे मेहनत और समर्पण से करो। मैं चाहती हूं कि तुम कभी भी मेहनत से भागो नहीं, क्योंकि यही तुम्हारा सबसे बड़ा हथियार होगा। मेहनत से तुम अपनी जिंदगी को नई ऊंचाइयों तक ले जा सकते हो।”

पहली:
वो कौन सी भारतीय नारी है, जो सबसे पहले हवाई रास्ते से भारत से बाहर गयी।

कहानी: सूरज की किरणें
प्रकृति के सबसे बड़े रहस्यों में से एक है सूरज की किरणें। इन किरणों का न सिर्फ भौतिक बल्कि मानसिक और आध्यात्मिक स्तर पर भी गहरा प्रभाव होता है। सूरज की किरणें जब हमारी त्वचा से टकराती हैं, तो हमारे शरीर को जीवनदायिनी ऊर्जा प्रदान करती हैं। लेकिन सूरज की ये किरणें केवल शारीरिक स्तर पर ही नहीं, बल्कि हमारी मानसिक स्थिति और आत्मा की शांति के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण होती हैं।

यह कहानी एक छोटे से गांव के एक लड़के अर्जुन की है, जो अपनी दादी के साथ जंगल के किनारे एक छोटे से घर में रहता था। अर्जुन का जीवन बेहद साधारण था, लेकिन उसे हमेशा कुछ अनकहा सा महसूस होता था। हर सुबह सूरज की किरणें उसके छोटे से घर के आंगन में आकर झांकतीं, और अर्जुन उन्हें देखता, लेकिन वह कभी पूरी तरह से समझ नहीं पाया कि ये किरणें उसके जीवन में किस उद्देश्य से आती हैं।

एक दिन, अर्जुन ने अपनी दादी से पूछा, “दादी, सूरज की किरणें हमेशा हमारे घर में क्यों आती हैं? क्या ये हमें कुछ सिखाना चाहती हैं?”

दादी हंसते हुए बोलीं, “बेटा, सूरज की किरणें केवल हमारे घर तक नहीं आतीं, वे सभी जगह जाती हैं। उनका उद्देश्य केवल रोशनी देना नहीं, बल्कि जीवन के हर पहलू को उजागर करना है। सूरज की किरणों में बहुत बड़ी शक्ति है। वे न सिर्फ शारीरिक रूप से हमें ताजगी और ऊर्जा देती हैं, बल्कि वे हमारे अंदर की मानसिक शक्ति और आत्मविश्वास को भी जागृत करती हैं।”

अर्जुन ने दादी की बातों को समझने की कोशिश की, लेकिन उसे यह सब बहुत गहरा महसूस हुआ।

उसने सोच लिया कि वह सूरज की इन किरणों को पूरी तरह से समझेगा। अगले दिन, उसने सूर्योदय के समय अपनी दादी से पूछा, “दादी, क्या आप मुझे सूरज की किरणों का असली मतलब समझा सकती हैं?”

दादी मुस्कराई और कहा, “ठीक है, बेटा, आज हम सूरज की किरणों के बारे में और गहराई से समझेंगे। यह सूरज हमें जीवन के तीन महत्वपूर्ण पहलुओं की याद दिलाता है — प्रकाश, ऊर्जा और आशा।”

“प्रकाश” दादी ने आगे कहा, “यह हमारे जीवन में ज्ञान और समझ का प्रतीक है। जैसे सूरज के बिना अंधेरा छा जाता है, वैसे ही ज्ञान के बिना जीवन का मार्ग अंधकारमय हो जाता है। सूरज की किरणें हमें याद दिलाती हैं कि हमें हमेशा अपनी राह पर आगे बढ़ने के लिए ज्ञान की आवश्यकता है।"”

“दूसरी बात” दादी ने कहा, “सूरज की किरणें ऊर्जा का प्रतीक हैं। ये हमें शारीरिक और मानसिक ऊर्जा प्रदान करती हैं। जैसे सूरज के बिना जीवन संभव नहीं है, वैसे ही आत्मविश्वास और धैर्य के बिना किसी भी कार्य को पूरा नहीं किया जा सकता। सूरज की किरणें हमें यह सिखाती हैं कि हमें जीवन में पूरी ताकत और ऊर्जा के साथ काम करना चाहिए, क्योंकि केवल हमारी मेहनत और समर्पण से ही हम सफलता प्राप्त कर सकते हैं।”

“और तीसरी बात” दादी ने कहा, “सूरज की किरणें आशा का प्रतीक हैं। सूरज जब हर सुबह उगता है, तो यह हमें बताता है कि हर रात के बाद एक नई सुबह आती है। हमारे जीवन में भी अंधेरा समय आता हैं, लेकिन हमें यह याद रखना चाहिए कि हर कठिनाई के बाद एक नई शुरुआत होती है। सूरज की किरणों में छुपी होती है आशा, जो हमें कभी भी हार मानने से रोकती है।”

अर्जुन दादी की बातें ध्यान से सुन रहा था। उसे अब समझ में आ गया था कि सूरज की किरणें केवल एक प्राकृतिक घटना नहीं, बल्कि एक गहरी शिक्षा का प्रतीक हैं। वह अब जान गया था कि सूरज की किरणें हमें जीवन के तीन महत्वपूर्ण पहलुओं—ज्ञान, ऊर्जा और आशा की याद दिलाती हैं।

कुछ दिन बाद, अर्जुन ने देखा कि सूरज की किरणों में वह शक्ति है, जो उसे हर दिन नए उत्साह और ऊर्जा से भर देती है।

उसने समझा कि जैसे सूरज की किरणें बिना थके बिना रुके हर सुबह आती हैं, वैसे ही उसे भी अपनी मेहनत और दृढ़ता से जीवन के हर क्षेत्र में आगे बढ़ना चाहिए। वह अब अपने दिन की शुरुआत सूरज की किरणों के साथ करता और हर नई सुबह को एक नई उम्मीद और ऊर्जा के साथ स्वीकार करता।

शिक्षा
सूरज की किरणें हमें जीवन के तीन महत्वपूर्ण सिद्धांतों की शिक्षा देती हैं — ज्ञान, ऊर्जा और आशा। हमें अपने जीवन में इन सिद्धांतों को अपनाकर हर कठिनाई का सामना करना चाहिए। सूरज की किरणों की तरह हमें भी हर दिन नए उत्साह और समर्पण के साथ अपने कार्यों में लगना चाहिए। यदि हम अपनी मेहनत, समझ और विश्वास को मजबूत रखें, तो कोई भी चुनौती हमें हरा नहीं सकती। जीवन में चाहे जितनी भी कठिनाइयाँ आएं, हमें कभी भी हार मानने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि सूरज की किरणों की तरह हर रात के बाद एक नई सुबह आती है, और हर कठिनाई के बाद एक नया अवसर मिलता है।

पहेली का उत्तर : माता सीता (लंका गयी थी)
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प्रार्थना:
रक्ष रक्ष गणाध्यक्षः रक्ष त्रैलोक्य नायकः। 
भक्त नाभयं कर्ता त्राताभव भवार्णवात्

अर्थ: हे गणाध्यक्ष रक्षा कीजिए, रक्षा कीजिये। हे तीनों लोकों के रक्षक रक्षा कीजिए; आप भक्तों को अभय प्रदान करने वाले हैं, भवसागर से मेरी रक्षा कीजिये।

मंत्र:
ॐ आदित्याय च सोमाय मंगळाय बुधाय च। 
गुरु शुक्र शनिभ्यश्च राहवे केतवे नमः॥

अर्थः सूर्य, चंद्रमा, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहु और केतु ग्रहों की कृपा से हमारा जीवन मंगलमय हो।

गर्भ संवाद
“मेरे बच्चे! तुम्हारे जीवन में ईमानदारी सबसे महत्वपूर्ण संपत्ति होनी चाहिए। ईमानदारी से कभी भी समझौता मत करना, क्योंकि यही तुम्हारा सबसे बड़ा धन है। ईमानदारी से न केवल तुम्हें दूसरों का विश्वास मिलेगा, बल्कि तुम्हारे दिल में भी सुकून रहेगा। जब तुम सच्चाई और ईमानदारी से अपना काम करते हो, तो तुम्हारा हर कदम सफलता की ओर बढ़ता है।”

पहेली:
घूस घुमेला लहँगा पहिने, एक पाँव से रहे खडी । 
आठ हाथ हैं उस नारी के, सूरत उसकी लगे परी । 
सब कोई उसकी चाह करे, मुसलमान, हिंदू छतरी । 
खुसरो ने यही कही पहेली, दिल में अपने सोच जरी ।

कहानी: चांद और नदी की बात
एक बार की बात है, एक शांत और सुकून भरी रात में, जब आकाश में चांद अपनी चांदनी बिखेर रहा था और चारों ओर रात का सन्नाटा था, एक नदी अपने शांत प्रवाह में बह रही थी। चांद ने नदी को देखा और धीरे-धीरे अपनी चमकदार रौशनी से नदी को नहलाया। चांद की रौशनी में नदी का पानी और भी सुंदर लग रहा था। नदी ने चांद से कहा, “तुम बहुत खूबसूरत हो, तुम हमेशा आकाश में चमकते रहते हो और अपनी रौशनी से सबको रोशन करते हो। मुझे तुमसे बहुत कुछ सीखने को मिलता है।”

चांद हंसते हुए बोला, “तुम भी तो बहुत अद्भुत हो नदी! तुम हमेशा बहती रहती हो, चाहे रास्ते में कितनी भी रुकावटें क्यों न हों। तुम्हारी निरंतरता और स्थिरता से मुझे बहुत कुछ सीखने को मिलता है।”

नदी चुपचाप बहते हुए कहने लगी, “लेकिन चांद, क्या तुम कभी खुद को महसूस कर पाते हो? तुम्हारी चमक केवल आकाश से आती है और तुम्हें कभी थकावट महसूस नहीं होती लेकिन मैं नदी, कभी खत्म नहीं होती, कभी रुकती नहीं लेकिन कभी अपनी पूरी यात्रा का उद्देश्य नहीं समझ पाती।”

चांद ने नदी की बातों को ध्यान से सुना और फिर धीरे से बोला “नदी, तुम्हें अपनी यात्रा के उद्देश्य को समझने की जरूरत नहीं है।”

तुम्हारी यात्रा ही तुम्हारा उद्देश्य है। तुम जितना चलोगी, उतना ही अपनी मंजिल को हासिल करोगी। हर एक मोड़ पर तुम्हें एक नया दृश्य मिलता है और तुम उस दृश्य को अपने साथ लेकर आगे बढ़ती हो। तुम्हारी यात्रा ही तुम्हारा असली उद्देश्य है। तुम्हारी स्थिरता और निरंतरता ही तुम्हारा सबसे बड़ा सौंदर्य है।”

नदी ने कुछ देर सोचा और फिर चांद से कहा, “लेकिन चांद, तुम तो हर रात आकाश में चमकते हो, क्या तुम कभी थकते नहीं हो?”

चांद ने मुस्कुराते हुए कहा, “नहीं, नदी। मुझे कभी थकावट महसूस नहीं होती। मैं हर रात अपनी रौशनी से आकाश को रोशन करता हूं क्योंकि मैं जानता हूं कि मेरी रौशनी किसी को किसी न किसी रूप में मदद करती है। अगर मैं थक जाऊं, तो मेरा उद्देश्य पूरा नहीं होगा। मुझे अपनी चमक से ही संतुष्टि मिलती है, क्योंकि मैं जानता हूं कि मेरी रौशनी से किसी का रास्ता उजागर होता है, किसी की रात रोशन होती है। यही मेरी शक्ति है।”

नदी को चांद की बातें समझ आ गई। उसने महसूस किया कि उसकी यात्रा में ही उसका असली उद्देश्य छिपा है। उसकी निरंतरता ही उसे महान बनाती है। उसे अब यह समझ में आ गया कि कभी भी अपने मार्ग से न भटकना और बिना थके लगातार चलते रहना, यही सफलता की कुंजी है।

कुछ देर बाद, नदी चांद को धन्यवाद देती हुई कहने लगी, “अब मुझे समझ में आ गया है कि मेरी यात्रा में ही मेरी असली शक्ति है। मैं अपने मार्ग पर निरंतर चलने का वचन लेती हूं, जैसे तुम अपनी रौशनी से आकाश में चमकते हो, वैसे ही मैं अपनी यात्रा से दुनिया को न केवल अपने अस्तित्व का अहसास कराऊंगी, बल्कि मैं भी हर दिन कुछ नया हासिल करूंगी।”

चांद ने मुस्कुराते हुए नदी को आशीर्वाद दिया और कहा, “तुम्हारी यात्रा हमेशा सुखमय हो, और तुम हमेशा अपने मार्ग पर स्थिर और निरंतर बनी रहो।”

शिक्षा
चांद और नदी की बातचीत हमें यह सिखाती है कि जीवन की यात्रा कभी खत्म नहीं होती और हर पल नई शुरुआत होती है। सफलता और संतोष का मतलब सिर्फ मंजिल तक पहुंचना नहीं है, बल्कि हर कदम में अपने उद्देश्य को महसूस करना है। नदी की तरह हमें भी अपनी यात्रा में स्थिर और निरंतर बने रहना चाहिए और चांद की तरह हमें अपनी क्षमता का इस्तेमाल दूसरों की मदद करने के लिए करना चाहिए। अगर हम अपने जीवन के उद्देश्य को समझें और हर दिन उसमें अपने योगदान को महसूस करें तो हमारी यात्रा ही हमारी असली सफलता बन जाती है।

पहेली का उत्तर : छतरी
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प्रार्थना:
ॐ सह नाववतु। 
सह नौ भुनक्तु। 
सह वीर्यं करवावहै। 
तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै ॥
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥

मंत्र:
ॐ अद्य लक्ष्मी महालक्ष्मी लक्ष्मी श्रीं नमोस्तुते।
विध्या लक्ष्मी प्रसन्न लक्ष्मी लक्ष्मी श्रीं नमोस्तुते।।

अर्थः अष्टलक्ष्मी! आप हमें धन, शिक्षा और समृद्धि प्रदान करें।

गर्भ संवाद
“मेरे बच्चे, समय सबसे कीमती चीज है, जो कभी वापस नहीं आता। इसे सही तरीके से उपयोग करो और कभी भी समय को व्यर्थ न जाने दो। जब तुम अपने समय का सही उपयोग करते हो, तो हर दिन तुम्हारे लिए एक नई शुरुआत बन जाता है। जीवन में सफलता पाने के लिए समय का प्रबंधन सबसे महत्वपूर्ण है। इसलिए, हर दिन को पूरी तरह से जीने की कोशिश करो और उसे अपनी सफलता की ओर ले जाओ।”

पहेली:
आदि कटे से सबको पारे। मध्य कटे से सबको मारे। 
अन्त कटे से सबको मीठा। खुसरो वाको आँखो दीठा॥

कहानी: सत्य की खोज
बहुत समय पहले की बात है, एक छोटे से गांव में एक युवक, रवि, रहता था। रवि का जीवन साधारण था, लेकिन उसके मन में एक गहरी लालसा थी। वह हमेशा सोचता रहता था कि सत्य क्या है? क्या जीवन में कोई ऐसा सत्य है, जो सभी के लिए समान हो? क्या हम कभी सत्य को पूरी तरह समझ सकते हैं? ये सवाल उसके मन में लगातार घूमते रहते थे।

रवि के माता-पिता उसे अच्छे संस्कार और शिक्षा देते थे, लेकिन उसे कभी संतुष्टि नहीं मिलती थी। वह चाहता था कि वह किसी गुरु से सत्य की सच्ची समझ प्राप्त करे। एक दिन उसने सोचा कि वह सत्य की खोज में निकलेगा। उसने अपनी माता-पिता से आशीर्वाद लिया और गांव से दूर एक प्रसिद्ध आश्रम की ओर चल पड़ा, जहां उसे लगता था कि उसे अपनी तलाश का उत्तर मिलेगा।

वह आश्रम एक पहाड़ी के ऊपर स्थित था, और वहां पहुंचने में उसे कई दिनों की यात्रा करनी पड़ी। रास्ते में रवि को कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। तेज धूप, ठंडी हवा, और ऊबड़-खाबड़ रास्ते उसे परेशान करते रहे, लेकिन उसने कभी हार नहीं मानी। आखिरकार, वह उस आश्रम तक पहुंच ही गया।

आश्रम में प्रवेश करते ही रवि ने वहां के गुरु से मुलाकात की। गुरु ने उसकी परेशानियाँ सुनी और पूछा, “क्या तुम सत्य की खोज में आए हो?” रवि ने सिर झुकाकर उत्तर दिया, “जी हां गुरुजी मैं सत्य को जानने के लिए यहां आया हूँ। कृपया मुझे सत्य का मार्ग दिखाएं।”

गुरु ने उससे एक साधारण सा प्रश्न पूछा, “तुम सत्य को कहां ढूंढोगे? क्या तुम्हें लगता है कि वह कहीं बाहर मिलेगा?” रवि चौंका। उसने सोचा, “क्या सत्य बाहर कहीं होता है?” लेकिन उसने गुरुजी की बातों को ध्यान से सुना और उत्तर दिया, “गुरुजी, मैं नहीं जानता। शायद सत्य कहीं दूर है, शायद मुझे उसे ढूंढने के लिए बहुत यात्रा करनी होगी।”

गुरु हंसते हुए बोले, “तुम सत्य को कहीं बाहर नहीं ढूंढोगे। सत्य तुम्हारे अंदर ही है। तुम्हें बस उसे जानने की आवश्यकता है। तुम्हारी यात्रा खुद तुम्हारे भीतर शुरू होती है।”

रवि ने गुरु की बातों को ध्यान से सुना, लेकिन वह अब भी पूरी तरह से समझ नहीं पा रहा था। गुरु ने कहा, “मैं तुम्हें एक साधन दूंगा। तुम्हें तीन दिन तक चुपचाप बैठकर ध्यान लगाना होगा। हर दिन सुबह सूर्योदय से पहले उठो, और रात के समय चाँदनी में ध्यान करो। जब तुम अपने अंदर की शांति को महसूस कर सको, तभी तुम सत्य को पहचान पाओगे।”

रवि ने गुरु की बात मानी और वह तीन दिन तक ध्यान करने में लगा रहा। पहले दिन, उसके मन में बिखरे विचारों और चिंता के कारण वह सही तरीके से ध्यान नहीं लगा पाया। 

दूसरे दिन, वह थोड़ी देर के लिए शांत हुआ, लेकिन फिर भी वह पूरी तरह से अपनी सोच को नियंत्रित नहीं कर सका। तीसरे दिन, जब सूरज की पहली किरण उसके चेहरे पर पड़ी, तो रवि ने एक गहरी शांति का अनुभव किया। वह अपने भीतर कुछ ऐसा महसूस करने लगा, जो पहले कभी नहीं हुआ था।

उस दिन, जब वह ध्यान से उठकर नदी के किनारे बैठा, तो उसे अपने भीतर की आवाज़ सुनाई दी। वह आवाज़ उसे कह रही थी, “सत्य न बाहर है, न कहीं दूर। सत्य हमेशा तुम्हारे भीतर है। जब तुम अपने विचारों और इच्छाओं से मुक्त हो जाते हो, तब तुम सत्य को महसूस कर सकते हो। सत्य कभी बदलता नहीं है, वह स्थिर और अचल होता है। तुम्हारे भीतर जो शांति और संतुलन है, वही सत्य है।”

रवि को अब समझ में आ गया था कि सत्य को खोजने की कोई आवश्यकता नहीं थी, क्योंकि वह पहले से ही उसके भीतर था। उसे बस खुद को जानने की जरूरत थी, अपनी इच्छाओं, अपने डर और संदेह से मुक्त होने की जरूरत थी। जैसे ही उसने यह समझा, उसकी मानसिक स्थिति बदल गई। वह हल्का और शांत महसूस करने लगा।

वह गुरु के पास वापस लौटा और कहा, “गुरुजी, मैंने सत्य को पहचान लिया है। वह बाहर कहीं नहीं था, बल्कि मेरे भीतर था। जब मैंने अपने भीतर की शांति को महसूस किया, तब मैंने सत्य को पाया।”

गुरु ने हंसते हुए कहा, “तुमने जो पाया वही सच्चा सत्य है। सत्य कभी किसी किताब में, किसी व्यक्ति के शब्दों में या किसी स्थान पर नहीं मिलता। सत्य केवल अपने भीतर की गहरी समझ और शांति में पाया जाता है।”

शिक्षा
इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि सत्य की खोज हमें बाहर नहीं, बल्कि भीतर करनी होती है। जब हम अपने विचारों, इच्छाओं और बाहरी प्रभावों से मुक्त होते हैं, तब हम अपने वास्तविक स्वभाव और सत्य को समझ पाते हैं। सत्य कभी बदलता नहीं है, वह स्थिर और निरंतर रहता है। हमें केवल उसे पहचानने की आवश्यकता होती है

पहेली का उत्तर : काजल
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प्रार्थना:
हे बुद्धिदाता श्रीगणेश, मुझे सदा सद्बुद्धि प्रदान कीजिए। हे विघ्नहर्ता, अपने पाश से मेरे सर्व ओर सुरक्षा कवच निर्मित कीजिए और मेरे जीवन में आने वाले सर्व संकटों का निवारण कीजिए।

हे मर्यादापुरुषोत्तम श्रीराम, मेरा जीवन भी आप ही की भांति आदर्श बने, इस हेतु आप ही मुझ पर कृपा कीजिए।

हे बजरंग बली, आपकी कृपा से निर्भयता, अखंड सावधानता, दास्यभाव आदि आपके गुण मुझमें भी आने दीजिए।

हे महादेव, आपकी ही भांति मुझमें भी वैराग्यभाव निर्मित होने दीजिए।

हे जगदंबे माता, मां की ममता देकर आप मुझे संभालिए। आपकी कृपादृष्टि मुझ पर निरंतर बनी रहे और आप मेरी सदैव रक्षा कीजिए।

मंत्र:
श्री राम राम रामेति रमे रामे मनोरमा, सहस्रनाम तत्तुल्यं राम नाम वरानने

अर्थ: श्री राम के नाम का ध्यान करने से व्यक्ति परम शक्ति की दिव्य, स्वर्गीय कृपा को प्राप्त कर सकता है और श्री राम का नाम भगवान विष्णु के हजार नामों के समान महान है।

गर्भ संवाद
“मेरे प्यारे बच्चे, हमेशा दूसरों की मदद करने की कोशिश करो। जब तुम किसी की मदद करते हो, तो वह तुम्हारे दिल को शांति और खुशी देती है। दूसरों की मदद से ही सच्ची खुशी मिलती है, क्योंकि तुम जिस किसी की मदद करते हो, वह तुम्हें आशीर्वाद देता है। मैं चाहती हूं कि तुम हमेशा दूसरों के लिए एक प्रेरणा बनो, और जब भी मौका मिले, उनकी मदद करो।”

पहेली:
एक नार ने अचरज किया। साँप मार पिंजरे में दिया ।
ज्यों-ज्यों साँप ताल को खाए। सूखै ताल साँप मरि जाए ॥

कहानी: आत्म-साक्षात्कार
बहुत समय पहले की बात है, एक छोटे से गाँव में एक युवक, अर्जुन, अपने माता-पिता के साथ रहता था। अर्जुन का जीवन सरल था, लेकिन उसे हमेशा यह सवाल परेशान करता था कि वह कौन है और उसका जीवन किस दिशा में जा रहा है। वह खुद से पूछता, “मेरी असली पहचान क्या है? मैं किसलिए यहाँ हूँ?” हालांकि उसने बहुत से तात्त्विक और धार्मिक ग्रंथ पढ़े थे, लेकिन वह अब भी अपनी असली पहचान को समझने की कोशिश कर रहा था। 

अर्जुन के मन में आत्म-ज्ञान की एक गहरी लालसा थी। उसे लगता था कि दुनिया के सभी सुख और सफलता बाहरी चीजों में छिपे हैं, लेकिन कहीं न कहीं उसकी आत्मा में कुछ गहरे सवाल थे, जिनका जवाब वह नहीं ढूंढ पा रहा था। वह समझना चाहता था कि जीवन का असली उद्देश्य क्या है और उसकी आत्मा का वास्तविक स्वरूप क्या है।

एक दिन अर्जुन ने अपने जीवन की उलझनों को सुलझाने के लिए किसी महान योगी के पास जाने का निश्चय किया, जिनके बारे में सुन रखा था कि वह आत्मा और आत्म-साक्षात्कार के विषय में गहरी जानकारी रखते हैं। अर्जुन ने अपनी यात्रा शुरू की और कुछ दिनों बाद उस योगी के आश्रम तक पहुँच गया।

योगी ने अर्जुन को देखा और उसकी आँखों में गहरे सवालों का प्रतिबिंब देखा। उसने कहा, “तुम कुछ जानना चाहते हो अर्जुन, लेकिन वह ज्ञान सिर्फ किताबों और बाहरी शिक्षा से नहीं मिलेगा। तुम्हें अपने भीतर जाकर उस सत्य को पहचानना होगा, जो तुम्हारी आत्मा में छिपा है।”

अर्जुन ने कहा, “गुरुजी, मैं समझता हूँ कि आत्मा का वास्तविक रूप क्या है, लेकिन मुझे यह नहीं पता कि कैसे अपने भीतर झाँककर उसे पहचानूं। क्या आप मुझे इसका तरीका बता सकते हैं?”

योगी हंसते हुए बोले, “तुम्हे इसे जानने के लिए किसी विशेष मंत्र या तकनीक की आवश्यकता नहीं है। तुम्हें बस खुद से सच्चा प्रेम करना होगा और खुद को समझने की गहरी इच्छा होनी चाहिए। अपने भीतर के शोर और भ्रम को शांत करना होगा। जब तुम अपने भीतर की चुप्पी को सुन सको, तब तुम्हे आत्म-साक्षात्कार की प्राप्ति होगी।”

अर्जुन ने गुरु की बातों को ध्यान से सुना और वह पूरी निष्ठा के साथ ध्यान की विधि को समझने लगा। गुरु ने उसे एक साधारण ध्यान विधि सिखाई, जिसमें उसे रोज सुबह सूर्योदय से पहले और रात को चाँदनी रात में ध्यान लगाना था। “ध्यान का उद्देश्य सिर्फ अपनी बाहरी दुनिया को छोड़ना नहीं है बल्कि अपने भीतर की गहरी शांति और सच्चाई को महसूस करना है।”

अर्जुन ने गुरु के निर्देशों का पालन करते हुए ध्यान लगाना शुरू किया। पहले दिन, उसे अपनी मानसिक उथल-पुथल और विचारों को नियंत्रित करना बहुत कठिन लगा। लेकिन वह हार मानने वाला नहीं था। दूसरे दिन उसने थोड़ा और ध्यान किया, और तीसरे दिन, जैसे ही वह गहरी शांति में डूबा, उसे अपने भीतर एक अद्भुत अनुभव हुआ। उसे ऐसा महसूस हुआ जैसे उसकी आत्मा उसके शरीर से बाहर निकल गई हो और वह शांति और आत्म-ज्ञान के एक गहरे स्त्रोत से जुड़ गया हो।

उसके मन में गहरी समझ का अहसास हुआ, “मैं वही हूँ, जो सोचता हूँ। मेरा शरीर, मेरी विचारधारा, मेरी इच्छाएं — ये सभी मेरी असली पहचान नहीं हैं। मैं उस परमात्मा का अंश हूँ, जो सबमें है। मेरे भीतर वह अनंत शक्ति है, जो समस्त ब्रह्मांड में व्याप्त है।” अर्जुन को अब यह समझ में आया कि आत्मा केवल शरीर का हिस्सा नहीं है, बल्कि वह अनंत और सर्वव्यापी है। वह शांति का स्रोत है, और हर जीवित प्राणी के भीतर वही आत्मा है।

अर्जुन ने महसूस किया कि उसका असली स्वरूप वह शांति और ज्ञान था, जो भीतर से बाहर की दुनिया से कहीं अधिक महत्वपूर्ण था। उसकी आत्मा किसी बाहरी तत्व से प्रभावित नहीं होती, वह स्वाभाविक रूप से शुद्ध और निरंतर स्थिर रहती है। उसने अपने सारे भ्रमों को दूर किया और आत्म-साक्षात्कार की गहरी समझ प्राप्त की।

अर्जुन ने गुरु के पास वापस जाकर कहा, “गुरुजी, अब मुझे समझ में आ गया है। आत्मा वही है, जो अडिग और स्थिर रहती है, और यह कभी नष्ट नहीं होती। मेरी पहचान मेरे शरीर और मन से परे है। मैं उस परम सत्य का अंश हूँ, जो हर स्थान और हर समय में व्याप्त है। अब मैं जानता हूँ कि मेरी आत्मा को जानने का अर्थ है, जीवन की सच्चाई को जानना।”

गुरु ने मुस्कुराते हुए कहा, “अर्जुन, अब तुमने अपने भीतर के सत्य को पहचान लिया है। यह सच्चाई सभी के भीतर है, लेकिन हम इसे अपने विचारों, इच्छाओं, और बाहरी प्रभावों से ढँक लेते हैं। जब तुम अपने भीतर की चुप्पी और शांति को पहचान सको, तब तुम सत्य को जान पाते हो। आत्म-साक्षात्कार ही जीवन का सर्वोत्तम उद्देश्य है, क्योंकि यही तुम्हें अपनी असली पहचान से जोड़ता है।”

अर्जुन ने उस दिन से अपने जीवन में सच्चाई और आत्म-ज्ञान को सर्वोपरि रखा। वह पहले जैसा युवक नहीं रहा; अब वह अपने भीतर की शांति में स्थापित था और उसकी दुनिया में बदलाव आ गया था। अब वह दूसरों को भी आत्म-साक्षात्कार की राह पर चलने की प्रेरणा देने लगा, क्योंकि उसने महसूस किया था कि असली शांति और खुशी आत्मा के भीतर ही छिपी है, जिसे जानने के बाद जीवन का हर क्षण सार्थक हो जाता है।

पहेली का उत्तर : दीये की बत्ती
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प्रार्थना:
हे जग त्राता विश्व विधाता, 
हे सुख शांति निकेतन हे।

प्रेम के सिन्धु, दीन के बन्धु, 
दुःख दारिद्र विनाशन हे। 
हे जग त्राता विश्व विधाता, 
हे सुख शांति निकेतन हे।

नित्य अखंड अनंन्त अनादि, 
पूरण ब्रह्म सनातन हे। 
हे जग त्राता विश्व विधाता, 
हे सुख शांति निकेतन हे। 

जग आश्रय जग-पति जग-वन्दन, 
अनुपम अलख निरंजन हे।  
हे जग त्राता विश्व विधाता, 
हे सुख शांति निकेतन हे। 

प्राण सखा त्रिभुवन प्रति-पालक, 
जीवन के अवलंबन हे। 
हे जग त्राता विश्व विधाता, 
हे सुख शांति निकेतन हे।

मंत्र:
ॐ सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके। 
शरण्ये त्र्यंबके गौरी नारायणी नमोऽस्तुते।।

अर्थ: नारायणी तुम सब प्रकार का मंगल प्रदान करने वाली मंगलमयी हो, कल्याणदायिनी शिवा हो, सब पुरुषार्थो को सिद्ध करने वाली, शरणागतवत्सला, तीन नेत्रों वाली एवं गौरी हो। हे माँ दुर्गा आपके श्री चरणों में नमस्कार है।

गर्भ संवाद 
“चाँद की चाँदनी रात को कितनी शांति और सौम्यता देती है। जैसे चाँद अपनी चाँदनी से रात को रोशन करता है, वैसे ही तुम अपनी शांतिपूर्ण उपस्थिति से दुनिया को रोशन कर सकते हो। जब तुम शांत रहते हो, तो तुम्हारे शब्द और कार्य भी दूसरों के लिए प्रेरणा बनते हैं। मैं चाहती हूं कि तुम हमेशा चाँद की तरह शांत और प्रेरणादायक बनो, ताकि तुम्हारी उपस्थिति दूसरों को शांति और दिशा दे सके।”

पहेली:
एक नार कुँए में रहे, वाका नीर खेत में बहे। 
जो कोई वाके नीर को चाखे, फिर जीवन की आस न राखे।।

कहानी: सांप और किसान
बहुत समय पहले की बात है, एक छोटे से गाँव में एक किसान रहता था। उसका नाम राम था और वह बहुत मेहनती था। वह रोज सुबह-सुबह अपने खेतों में काम करने निकल जाता और शाम को घर लौटता। उसके पास कुछ गाय, बकरियाँ और अन्य छोटे जानवर थे। एक दिन जब राम खेत में हल चला रहा था, उसने एक सांप को देखा, जो उसकी ओर बढ़ रहा था। वह सांप बहुत बड़ा और खतरनाक था। राम ने सोचा कि अगर वह उसे नहीं हटाता, तो सांप खेत में आकर उसके जानवरों को नुकसान पहुँचा सकता है।

राम ने अपने पास पड़ी लकड़ी से सांप को मारने का फैसला किया। लेकिन जैसे ही वह सांप के पास गया, सांप ने उसकी तरफ फुफकारते हुए देखा। राम ने सोचा, “यह सांप मुझे जरा भी मौका नहीं देगा। मुझे इसे जल्दी से मार डालना चाहिए।” लेकिन तभी एक विचित्र बात हुई। सांप अचानक रुक गया और राम की आँखों में देखकर बोला, “कृपया मुझे मत मारो, किसान। मैं तुम्हारे खेत में कोई नुकसान नहीं करूँगा। अगर तुम मुझे छोड़ दोगे, तो मैं तुम्हारे खेत की रक्षा करूंगा और तुम्हारे खेतों को संकट से बचाऊँगा।”

राम चौंका। उसने कभी सोचा नहीं था कि एक सांप उससे बात करेगा। उसने थोड़ी देर तक सोचने के बाद, धीरे-धीरे अपनी लकड़ी को नीचे कर लिया और सांप से कहा, “तुम क्या कह रहे हो? तुम मुझे कैसे मदद करोगे?”

सांप ने धीरे-धीरे कहा, “तुम्हें याद होगा कि पिछले महीने तुम्हारे खेत में बहुत सारे टिड्डियाँ आकर फसल को नुकसान पहुँचा रही थीं। मैं उन टिड्डियों से तुम्हारी मदद कर सकता हूँ। मैं उनके पास जाऊँगा और उन्हें खत्म कर दूँगा। इसके बदले में तुम मुझे अपनी जान बचाने का एक मौका दो।”

राम ने सांप की बातों को ध्यान से सुना और फिर निर्णय लिया। उसने सांप को मारने का विचार छोड़ दिया और कहा, “ठीक है, मैं तुम्हें जाने दूँगा लेकिन याद रखना, तुम्हारी मदद के बाद मुझे विश्वास होगा कि तुम सच में मेरी मदद कर रहे हो।”

सांप ने खुशी से सिर हिलाया और राम के खेत के एक कोने में जाकर छिप गया। कुछ ही दिनों में, टिड्डियाँ फिर से राम के खेतों में आईं, लेकिन सांप ने अपने पूरे प्रयास से उन्हें खत्म कर दिया। राम को अपनी फसल को बचाने में मदद मिली और उसने उस सांप का आभार व्यक्त किया। वह समझ गया कि कभी-कभी जो दिखता है वह जरूरी नहीं होता और हमें सच्चाई को समझने के लिए किसी को मदद का अवसर देना चाहिए।

शिक्षा
इस कहानी से यह शिक्षा मिलती है कि हमें किसी भी स्थिति में तुरंत निर्णय नहीं लेना चाहिए। कभी-कभी, जो दिखता है वह जरूरी नहीं होता कि सच हो और हमें किसी के द्वारा दी गई मदद का मूल्य समझना चाहिए। दया और समझदारी से हम न केवल अपनी समस्याओं का समाधान पा सकते हैं, बल्कि दूसरों की मदद करने के लिए भी एक रास्ता खोल सकते हैं।

पहेली का उत्तर: तलवार
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प्रार्थना:
हम उस त्रिनेत्रधारी भगवान शिव की आराधना करते है जो अपनी शक्ति से इस संसार का पालन-पोषण करते है उनसे हम प्रार्थना करते है कि वे हमें इस जन्म-मृत्यु के बंधन से मुक्त कर दे और हमें मोक्ष प्रदान करें। जिस प्रकार से एक ककड़ी अपनी बेल से पक जाने के पश्चात् स्वतः की आज़ाद होकर जमीन पर गिर जाती है उसी प्रकार हमें भी इस बेल रुपी सांसारिक जीवन से जन्म-मृत्यु के सभी बन्धनों से मुक्ति प्रदान कर मोक्ष प्रदान करें।

मंत्र:
न पुण्यं न पापं न सौख्यं न दुःखम्
न मन्त्रो न तीर्थं न वेदा न यज्ञाः।
अहं भोजनं नैव भोज्यं न भोक्ता
चिदानन्द रूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम्॥

अर्थात: मै न तो पुण्यों से बंधा हूं न ही पाप से बंधा हूँ और न ही मैं संसार के सुख और दुख में बंधा हूँ।
न ही मैं मंत्रों से बंधा हूँ न ही मैं पवित्र स्थानों से बंधा हूँ, न ही मैं पवित्र ग्रंथों से बंधा हूँ और न ही यज्ञ से बंधा हूँ।
न मै भोजन हूँ न मै भोजन से उत्पन्न आनंद हूँ और ना ही मैं भोज्य अर्थात ग्रहण करने वाला भी नहीं हूं। 
मैं चिद् स्वरूप आनंद हूँ मै शिव हूँ मै शिव हूँ।

गर्भ संवाद 
— मेरे प्यारे शिशु, मेरे राज दुलार, मैं तुम्हारी माँ हूँ.......माँ !

— मैं हमेशा तुम्हारे साथ हूँ, तुम मेरे गर्भ में पूर्ण रूप से सुरक्षित हो, तुम हर क्षण पूर्ण रूप से विकसित हो रहे हो।

— तुम मेरे हर भाव को समझ सकते हो क्योंकि तुम पूर्ण आत्मा हो।

— तुम परमात्मा की तरफ से मेरे लिए एक सुन्दरतम तोहफा हो, तुम शुभ संस्कारी आत्मा हो, तुम्हारे रूप में मुझे परमात्मा की दिव्य संतान प्राप्त हो रही है, परमात्मा ने तुम्हें सभी विलक्षण गुणों से परिपूर्ण करके ही भेजा है, परमात्मा की दिव्य संतान के रूप में तुम दिव्य कार्य करने के लिए ही आए हो। मेरे बच्चे! तुम
ईश्वर का परम प्रकाश रूप हो, परमात्मा की अनंत शक्ति तुम्हारे अंदर विद्यमान है, ईश्वर का तेज तुम्हारे माथे पर चमक रहा है, परमात्मा के प्रेम की चमक तुम्हारी आँखों में दिखाई देती है, तुम ईश्वर के प्रेम का साक्षात भण्डार हो, तुम परमात्मा के एक महान उद्देश्य को लेकर इस संसार में आ रहे हो, परमात्मा ने तुम्हें इंसान रूप में इंसानियत के सभी गुणों से भरपूर किया है।

— तुम हर इंसान को परमात्मा का रूप समझते हो, और सभी के साथ प्रेम का व्यवहार करते हो, तुम जानते हो अपने जीवन के महानतम लक्ष्य को, तुम्हें इस संसार की सेवा करनी है, सभी से प्रेम करना है, सभी की सहायता करनी है, और परमात्मा ने जो विशेष लक्ष्य तुम्हें दिया है, वह तुम्हें अच्छे से याद रहेगा।

— परमात्मा की भक्ति में तुम्हारा मन बहुत लगता है, तुम प्रभु के गुणों का गायन करके बहुत खुश होते हो, तुम्हारे रोम-रोम में प्रभु का प्रेम बसा हुआ है। स्त्रियों के प्रति तुम विशेष रूप से आदर का भाव अनुभव करते हो, सभी स्त्रियों को सम्मान की दृष्टि से देखते हो।

— तुम्हारा उद्देश्य संसार में सबको खुशियाँ बाँटना है, सब तरह से आजाद रहते हुए तुम सबको कल्याण का मार्ग दिखाने आ रहे हो, परमात्मा से प्राप्त जीवन से तुम पूर्ण रूप से संतुष्ट हो, तुम सदैव परमात्मा के साये में सुरक्षित हो।

— मानव जीवन के संघर्षो को जीतना तम्हें खूब अच्छी तरह से आता है, जीवन के प्रत्येक कार्य को करने का तुम्हारा तरीका बहुत प्यारा है, जीवन की हर परेशानी का हल ढूँढने में तुम सक्षम हो, तुम हमेशा अपने जीवन के परम लक्ष्य की ओर निरंतर आगे बढ़ते रहोगे।

— मेरी तरह तुम्हारे पिता भी तुम्हें देखने के लिए आतुर हैं, मेरा और तुम्हारे पिता का आशीष सदैव तुम्हारे साथ है।

— यह पृथ्वी हमेशा से प्रेम करने वाले अच्छे लोगों से भरी हुई है, यह सृष्टि परमात्मा की अनंत सुंदरता से भरी हुई है, यहाँ के सभी सुख तुम्हारा इंतजार कर रहे हैं, गर्भावस्था का यह सफर तुम्हें परमात्मा के सभी दैविक संस्कारों से परिपूर्ण कर देगा।

—घर के सभी सदस्यों का आशीर्वाद सदा तुम्हारे साथ है।

गर्भ संवाद
“मेरे प्यारे बच्चे, भगवान का प्रेम सभी दुखों और परेशानियों से परे होता है। जब भी तुम परेशान होते हो या जीवन की कठिनाइयों का सामना करते हो, तो भगवान का नाम सच्चे दिल से लो और तुम्हें शांति का अनुभव होगा। भगवान हमेशा तुम्हारे साथ होते हैं और उनका प्रेम तुम्हें किसी भी संकट से उबार सकता है। जब तुम ईश्वर के प्रेम से भरे होते हो, तो तुम्हें कोई भी दुख बड़ा नहीं लगता। यही प्रेम तुम्हारे जीवन को दिशा और शांति देता है।”

पहेली:
एक जानवर रंग रंगीला, बिना मारे वह रोवे। 
उस के सिर पर तीन तिलाके, बिन बताए सोवे।।

कहानी: गाय और कौवे का साहस। 
एक समय की बात है, एक हरे-भरे घास के मैदान में एक गाय चर रही थी। गाय का नाम गोमती था, और वह बहुत मजबूत और स्वस्थ थी। एक दिन, जब वह घास खा रही थी, अचानक आसमान में एक कौवा उड़ता हुआ आया। कौवे का नाम ‘काका’ था, और वह बहुत चतुर था। काका ने देखा कि गोमती आराम से घास चर रही थी, लेकिन वह जानता था कि किसी भी समय कोई शिकारी आ सकता है जो गाय को पकड़कर उसका शिकार कर सकता है।

काका ने सोचा कि उसे गोमती की मदद करनी चाहिए, ताकि वह सुरक्षित रहे। वह उसके पास उड़ते हुए आया और गोमती से कहा, “गोमती, तुम्हें अपनी सुरक्षा के लिए ध्यान रखना चाहिए। तुम अकेले हो और तुम्हारे पास कोई रक्षा करने वाला नहीं है। शिकारी तुम्हें जल्दी पकड़ सकते हैं। मैं तुम्हारी मदद कर सकता हू।”

गोमती ने कौवे की बातों को सुना और बोली, “तुम तो केवल एक छोटे से पक्षी हो, तुम मेरी मदद कैसे कर सकते हो?”

काका मुस्कराया और कहा, “मैं भले ही छोटा हूँ, लेकिन मुझे अपनी चतुराई पर विश्वास है। अगर तुम मेरी बात मानो, तो हम दोनों एक दूसरे को खतरे से बचा सकते हैं। मैं हर समय आकाश में उड़ता रहूँगा और तुम्हारी सुरक्षा के लिए निगरानी रखूँगा। अगर मुझे कुछ संदेह होगा, तो मैं तुम्हें तुरंत चेतावनी दूँगा।”

गोमती ने कौवे की बातों पर विचार किया। उसने देखा कि काका एक चतुर पक्षी है और उसने उसकी बात मानने का निर्णय लिया। काका ने पूरी तरह से निगरानी रखना शुरू कर दिया। वह दिन-रात आसमान में उड़ता और गोमती की सुरक्षा करता। जब भी काका को कोई संदिग्ध व्यक्ति या शिकारी दिखाई देता, वह तुरंत गोमती को चेतावनी देता, और वह अपने स्थान से दूर हो जाती।

एक दिन एक शिकारी खेतों में आया, और काका ने उसे देख लिया। उसने तुरन्त गोमती को चेतावनी दी और गोमती तुरंत अपनी जान बचाने के लिए वहाँ से भाग गई। शिकारी ने गोमती को पकड़ने की बहुत कोशिश की, लेकिन वह सफल नहीं हो सका क्योंकि गोमती पहले ही सुरक्षित स्थान पर पहुँच चुकी थी।

काका की बहादुरी और गोमती की समझदारी ने दोनों को बचाया। गोमती ने काका का आभार व्यक्त किया और कहा, “तुमने मुझे बचाया, तुम सच में मेरे सबसे अच्छे मित्र हो। तुमने जो साहस दिखाया, वह मै कभी भूलने नहीं दूँगी।”

काका मुस्कराया और कहा, “साहस कभी आकार या शक्ति पर निर्भर नहीं करता, बल्कि यह दिल और मानसिक दृढ़ता पर आधारित होता है।”

शिक्षा
इस कहानी से यह शिक्षा मिलती है कि साहस और समझदारी केवल शारीरिक शक्ति में नहीं, बल्कि मनोबल और चतुराई में होती हैं। हर जीव चाहे वह कितना भी छोटा क्यों न हो, उसके पास अपनी क्षमता और ताकत होती है। हमें अपनी सीमाओं को पहचानकर अपनी पूरी शक्ति से किसी भी समस्या का सामना करना चाहिए।

पहेली का उत्तर : मोर
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गीता सार: 
आप चिन्ता करते हो तो व्यर्थ है।
मौत से जो डरते हो तो व्यर्थ है।।
आत्मा तो चिर अमर है जान लो।
तथ्य यह जीवन का सच्चा अर्थ है।।

भूतकाल जो गया अच्छा गया। 
वर्तमान देख लो चलता भया।। 
भविष्य की चिन्ता सताती है तुम्हें? 
है विधाता सारी रचना रच गया।।

नयन गीले हैं तुम्हारा क्या गया? 
साथ क्या लाये जो तुमने खो दिया? 
किस लिए पछता रहे हो तुम कहो?
जो लिया तुमने यहीं से है लिया।।

नंगे तन पैदा हुए थे खाली हाथ।
कर्म रहता है सदा मानव के साथ।। 
सम्पन्नता पर मग्न तुम होते रहो।
एक दिन तुम भी चलोगे खाली हाथ।।

धारणा मन में बसा लो बस यही। 
छोटा-बड़ा, अपना-पराया है नहीं।। 
देख लेना मन की आँखों से जरा। 
भूमि-धन-परिवार संग जाता नहीं।।

तन का क्या अभिमान करना बावरे। 
कब निकल जाये यह तेरा प्राण रे।। 
पाँच तत्वों से बना यह तन तेरा। 
होगा निश्चय यह यहाँ निष्प्राण रे।।

स्वयं को भगवान के अर्पण करो। 
निज को अच्छे कर्म से तर्पण करो।। 
शोक से, भय से रहोगे मुक्त तुम।
सर्वस्व ‘रत्नम्’ ईश को समपर्ण करो।

मंत्र:
जपाकुसुमसङ्काशं काश्यपेयं महाद्युतिम् । 
तमोऽरिं सर्वपापघ्नं प्रणतोऽस्मि दिवाकरम् ॥

अर्थः हे भगवान सूर्य! आप जपाकुसुम के समान तेजस्वी हैं। आप हमें अज्ञान के अंधकार से मुक्त करें।

गर्भ संवाद:
मेरे प्यारे शिशु, मेरे बच्चे, मैं तुम्हारी माँ हूँ …… माँ!

— आज मैं तुम्हे तुम्हारे कुछ महानतम गुणों की याद दिला रही हूँ जो तुम्हें परमात्मा का अनमोल उपहार हैं।

— प्रेम स्वरूप परमात्मा का अंश होने के कारण तुम्हारा हृदय भी प्रेम से भरपूर है, तुम्हारी हर अदा में परमात्मा का प्रेम झलकता है।

— तुम्हारे हृदय में सम्पूर्ण मानवमात्र के प्रति समभाव है।

— तुम्हारा हृदय सबके लिए दया और करुणा से भरपूर रहता है।

— क्षमाशीलता के गुण के कारण सभी तुम्हारा सम्मान करते हैं, जिससे तुम्हारा स्वभाव और विनम्र हो जाता है।

— नम्रता तुम्हारा विशेष गुण है।

— मेरे बच्चे। तुम्हारा प्रत्येक कार्य सेवा-भाव से परिपूर्ण होता है।

— सहनशीलता तुम्हारा स्वाभाविक गुण है।

— धैर्यपूर्वक प्रत्येक कार्य को करना तुम्हारी महानता है।

— तुम्हारा मन आंतरिक रूप से स्थिर और शांत है।

— मेरे बच्चे! तुम बल और साहस के स्वामी हो।

— तुम अनुशासन प्रिय हो।

— कृतज्ञता का गुण तुम्हारे व्यवहार की शोभा बढ़ाता है।

— तुम अपनो से बड़ों को सम्मान और छोटों को प्रेम देते हो।

— तुम भाव से बहुत भोले हो लेकिन जरूरत पड़ने पर अपनी कठोरता भी दिखाते हो।

— तुम अपनो से छोटों के लिए प्रेरणा के स्त्रोत हो।

— तुम सत् और असत के पारखी हो।

— तुम्हारा व्यवहार चन्द्रमा के समान शीतल है।

— तुम सबसे इतना मीठा बोलते हो कि सभी तुम पर मोहित हो जाते हैं।

— तुम्हारा व्यक्तित्व परम प्रभावशाली है।

— तुम हमेशा सत्य बोलना ही पसंद करते हो।

— तुम हाजिर जवाबी हो।

— तुम्हारे मुख से निकला एक-एक शब्द मधुर और आकर्षक होता है।

— तुम मन, वचन और कर्म से पवित्र हो।

— घर के सभी सदस्यों का आशीर्वाद सदा तुम्हारे साथ है। तुम्हारे रूप में मुझे जैसे दिव्य संतान प्राप्त हो रही है, तुम्हे पाकर मैं बहुत प्रसन्न हूँ। जल्द ही इस सुन्दर संसार में तुम्हारा आगमन होगा। तुम्हारा स्वागत करने के लिए सभी बेचैन हैं।

पहेली:
काली है पर काग नहीं, लम्बी है पर नाग नहीं । 
बल खाती है ढोर नहीं, बांधते है पर डोर नहीं

कहानी: परिवार की परंपरा
एक छोटे से गाँव में एक परिवार रहता था, जिसमें चार सदस्य थे पिता, माता, एक बेटा और एक बेटी। इस परिवार की परंपरा थी कि वे हर साल गाँव के मंदिर में एक विशेष पूजा करते थे। यह पूजा उनके पूर्वजों द्वारा शुरू की गई थी और इस परंपरा को बहुत सम्मान से निभाया जाता था। परिवार के हर सदस्य को इस पूजा का हिस्सा बनना पड़ता था, चाहे वह कितना भी व्यस्त क्यों न हो।

इस परिवार के मुखिया श्रीराम जी, एक सच्चे धर्मनिष्ठ और ईमानदार व्यक्ति थे। वह हमेशा अपने परिवार को यह समझाते रहते थे कि परंपराएँ केवल रिवाज नहीं होतीं, बल्कि वे हमारे पूर्वजों के विचार और उनकी जीवनशैली को आगे बढ़ाने का एक तरीका हैं। हर साल, पूजा के दिन, श्रीराम जी अपने परिवार के सभी सदस्यों को एक साथ इकट्ठा करते थे और सब मिलकर पूजा की तैयारी करते थे।

एक वर्ष, श्रीराम जी का बेटा अर्जुन कुछ दिनों से तनाव में था। उसका कॉलेज का पेपर बहुत पास था और उसे अपनी पढ़ाई में ध्यान केंद्रित करने का समय नहीं मिल रहा था। अर्जुन के मन में यह विचार आया कि इस बार पूजा में न जाने से वह अपनी पढ़ाई पर अधिक ध्यान दे सकेगा।

जब वह इस बारे में अपने पिता से बात करने गया, तो श्रीराम जी ने बहुत धैर्य और समझदारी से समझाया। “बिलकुल बेटा, तुम्हारे पेपर महत्वपूर्ण हैं, लेकिन यह पूजा भी हमारी परंपरा का हिस्सा है। हमारे पूर्वजों ने इसे शुरू किया था ताकि हम अपनी संस्कृति और धरोहर को याद रखें। यह हमें एकजुट करता है और हमें हमारी जिम्मेदारी का अहसास दिलाता है। हम इस पूजा के माध्यम से अपने पारिवारिक बंधनों को और मजबूत करते हैं।”

अर्जुन थोड़ी देर तक चुप रहा और फिर उसने सोचा, “यह तो सच है। मेरे लिए यह पूजा केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि एक अवसर है अपने परिवार के साथ समय बिताने का और उन मूल्यों को समझने का, जो मेरे पिता और मेरे पूर्वजों ने मुझे सिखाए हैं।”

अर्जुन ने तय किया कि वह इस बार भी पूजा में हिस्सा लेगा और साथ ही अपनी पढ़ाई भी अच्छी तरह से करेगा। उसने अपनी पढ़ाई के समय को सही तरीके से व्यवस्थित किया और पूजा के बाद अपनी किताबों में मन लगाया।

पूजा के दिन, अर्जुन ने अपने माता-पिता और बहन के साथ मिलकर पूजा की और इस परंपरा को निभाया। वह न केवल पूजा में शामिल हुआ, बल्कि उसने यह भी समझा कि परिवार की परंपराएँ सिर्फ धार्मिक नहीं, बल्कि सामाजिक और मानसिक संतुलन को बनाए रखने का एक तरीका हैं।

शिक्षा
इस कहानी से यह शिक्षा मिलती है कि परिवार की परंपराएँ हमें हमारे मूल्यों और संस्कृतियों से जोड़ती हैं। ये परंपराएँ न केवल धार्मिक होती हैं, बल्कि पारिवारिक और सामाजिक बंधन को भी मजबूत करती हैं। हमें अपनी जिम्मेदारियों को समझकर, समय का सदुपयोग करते हुए अपनी परंपराओं को निभाना चाहिए, क्योंकि यही परंपराएँ हमारे जीवन में संतुलन और शांति लाती हैं।

पहेली का उत्तर : चोटी
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