Kaali Kitaab - 6 in Hindi Horror Stories by Mister Rakesh books and stories PDF | काली किताब - 6

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काली किताब - 6

वरुण के शरीर में अब एक अजीब ऊर्जा बह रही थी। उसका दिमाग साफ महसूस कर सकता था कि आसपास की हवा में हलचल हो रही है, पेड़ों की फुसफुसाहट अब सिर्फ हवा की सरसराहट नहीं थी—मानो वे उससे कुछ कह रहे हों। यह सब एक नया अहसास था, लेकिन इसके साथ ही एक अजीब सा डर भी था।  

वह धीरे-धीरे उठा और मंदिर के चारों ओर देखा। अब उसे हर चीज़ पहले से अलग लग रही थी—जैसे वह दुनिया को किसी और नजरिए से देख रहा हो। उसकी आँखें अपने आप उन प्रतीकों को समझने लगीं, जो पहले सिर्फ रहस्यमयी चिह्न लगते थे।  

**"तू इस शक्ति का उत्तराधिकारी है..."**  

यह शब्द अब भी उसके कानों में गूंज रहे थे। लेकिन इस शक्ति का मतलब क्या था? क्या अब वह भी उसी श्राप का हिस्सा बन चुका था, जिससे उसने आत्मा को मुक्त किया था?  

उसने अपने हाथ की हथेली पर नजर डाली। वहाँ हल्की नीली चमक थी, जो धीरे-धीरे उसके स्पर्श से गायब हो गई।  

### **गाँव में हलचल**  

वरुण किसी तरह खुद को संभालते हुए वापस गाँव लौटा। लेकिन वहाँ पहुँचते ही उसे महसूस हुआ कि कुछ गड़बड़ थी। गाँव में लोग इकट्ठे हो रखे थे, और सबकी नज़रें हवेली की ओर थीं।  

वहाँ अजीब सा धुआँ उठ रहा था, और लोगों के चेहरे पर डर था।  

"**फिर से कुछ अजीब हो रहा है... हवेली फिर जाग गई है...**" किसी ने कहा।  

वरुण ने घड़ी देखी—रात के दो बजे थे। हवेली की खिड़कियाँ अपने आप खुल और बंद हो रही थीं। कुछ लोग कह रहे थे कि उन्होंने किसी परछाईं को वहाँ चलते हुए देखा है।  

बाबा रुद्रनाथ भी वहीं थे। उन्होंने वरुण को देखते ही गहरी नजरों से देखा, मानो सब कुछ समझ गए हों।  

"**काली किताब की शक्ति खत्म नहीं हुई, वरुण... अब वह तुझमें समा गई है, और हवेली तुझे बुला रही है।**"  

वरुण को यह सुनकर झटका लगा। क्या वह शक्ति अब भी हवेली से जुड़ी थी?  

### **हवेली की पुकार**  

वरुण ने हिम्मत जुटाई और अकेले हवेली की ओर बढ़ने लगा। लोगों ने उसे रोकने की कोशिश की, लेकिन उसने किसी की नहीं सुनी।  

जैसे ही वह हवेली के गेट पर पहुँचा, दरवाजे अपने आप चरमराते हुए खुल गए। अंदर घुसते ही उसे वही जानी-पहचानी ठंडक महसूस हुई।  

**और तभी, उसकी आँखों के सामने कुछ ऐसा हुआ, जिसने उसे सन्न कर दिया।**  

**सीढ़ियों के ऊपर, हल्की नीली रोशनी में लिपटी हुई वही आत्मा खड़ी थी, जिसे उसने मुक्त किया था।**  

लेकिन इस बार, वह शांत नहीं थी। उसकी आँखों में हल्की क्रूरता थी।  

"**तूने मुझे मुक्त किया, लेकिन खुद को इस श्राप से नहीं बचा पाया, वरुण।**"  

वरुण का दिल तेज़ी से धड़कने लगा। इसका मतलब था कि उसकी मुक्ति अधूरी थी... और अब उसे इस रहस्य का आखिरी सिरा भी ढूँढना था।  

**वरुण नहीं जानता था कि यह यात्रा उसे कहाँ ले जाएगी, लेकिन इतना साफ था कि यह सब अभी खत्म नहीं हुआ था... बल्कि असली खेल तो अब शुरू हुआ था।**

वरुण के दिल की धड़कन तेज़ हो गई। हवेली के ठंडे और अंधेरे गलियारों में खड़ा होकर उसने आत्मा की आँखों में देखा—इस बार वहाँ शांति नहीं, बल्कि एक अजीब सा आक्रोश था।  

"**तूने मुझे मुक्त किया, लेकिन यह मुक्ति अधूरी है... मैं अब भी बंधन में हूँ!**" आत्मा की आवाज़ गूंज उठी, जिससे हवेली की दीवारें भी हिलने लगीं।  

"**कैसे?**" वरुण ने काँपती आवाज़ में पूछा।  

आत्मा ने अपनी उँगली से हवेली की पुरानी दीवार पर बने एक जटिल चिह्न की ओर इशारा किया। वरुण ने गौर किया, यह वही निशान था, जिसे उसने पहले कभी देखा था लेकिन समझ नहीं पाया था।  

"**यह बंधन तुझ पर भी लगा है, वरुण... अब तेरा भाग्य इस हवेली से जुड़ गया है। यदि तूने इस रहस्य को पूरी तरह नहीं सुलझाया, तो यह श्राप तुझे भी जकड़ लेगा।**"  

### **गुप्त सुरंग का रहस्य**  

वरुण ने दीवार के चिह्न को ध्यान से देखा और जैसे ही उसने उस पर हाथ रखा, हवेली की ज़मीन हिल उठी। वहाँ एक पत्थर खिसकने लगा और अचानक, नीचे की ज़मीन खुल गई—एक गहरी सुरंग प्रकट हो गई।  

आत्मा धीरे से मुस्कुराई, उसकी आँखों में एक नई चमक थी। "अब तेरे पास दो रास्ते हैं, वरुण। या तो तू इस सुरंग में जाएगा और सच तक पहुँचेगा... या फिर यह हवेली तुझे कभी जाने नहीं देगी।"  

वरुण के पास अब कोई विकल्प नहीं था। उसने एक गहरी सांस ली और सुरंग में उतर गया।  

### **सुरंग के अंदर**  

सुरंग के अंदर घुप अंधेरा था, लेकिन हवा में एक रहस्यमयी ऊर्जा थी। दीवारों पर पुराने चित्र उकेरे गए थे, जिनमें किसी गुप्त अनुष्ठान का वर्णन था।  

जैसे-जैसे वह आगे बढ़ा, उसके कानों में अजीब फुसफुसाहट गूँजने लगीं। कुछ आवाजें जानी-पहचानी थीं, कुछ बिल्कुल नई।  

अचानक, उसे सामने एक पत्थर की वेदी दिखाई दी, जिस पर वही काली किताब रखी थी। लेकिन इस बार, किताब हवा में तैर रही थी, और उसके चारों ओर नीली लौ जल रही थी।  

जैसे ही वरुण ने किताब को छूने की कोशिश की, एक ज़ोरदार चीख गूँजी और पूरा वातावरण हिलने लगा।  

"**तेरा समय समाप्त हो रहा है, वरुण... अगर तूने सही निर्णय नहीं लिया, तो यह हवेली तुझे कभी जाने नहीं देगी!**" आत्मा की आवाज़ गूँज उठी।  

वरुण को अब समझ में आ चुका था कि उसे क्या करना है। उसे वह आखिरी अनुष्ठान पूरा करना होगा, जिससे न केवल आत्मा को बल्कि खुद को भी इस श्राप से मुक्त कर सके।  

**लेकिन क्या वह समय रहते यह कर पाएगा, या हवेली हमेशा के लिए उसे अपना हिस्सा बना लेगी?**