Khoon ki Pyaas - 5 in Hindi Short Stories by Vivek Singh books and stories PDF | खून की प्यास: सुनसान सड़क का श्राप - 5

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खून की प्यास: सुनसान सड़क का श्राप - 5



भाग 5 – आख़िरी रात का खेल

हवा में एक अजीब सी ठंडक घुली हुई थी। हवेली की दीवारों पर पुराने तेल के दीये टिमटिमा रहे थे, जिनकी लौ हर थोड़ी देर में कांप जाती, मानो कोई अदृश्य साया पास से गुज़र गया हो। मयंक और राधिका के चेहरे पर डर साफ़ झलक रहा था, लेकिन अब पीछे मुड़ने का कोई रास्ता नहीं था।

"आज… आज सब खत्म कर देंगे," मयंक ने कांपती आवाज़ में कहा, "ये हवेली और इसके पीछे की सच्चाई, दोनों को।"

राधिका ने उसकी आंखों में देखा — वहां डर भी था और दृढ़ता भी।
"तुम्हें लगता है… हम बच पाएंगे?"
मयंक ने कोई जवाब नहीं दिया। जवाब के बजाय उसने अपना हाथ उसके हाथ पर रखा।


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भूतिया दस्तावेज़

उन्होंने हवेली के तहख़ाने में जाकर वो पुराना संदूक खोला, जिसमें चाबी पिछले भाग में मिली थी।
जैसे ही ताले में चाबी घुसी, एक कर्र… कर्र की आवाज़ गूंजी, और हवा अचानक बर्फ़ सी ठंडी हो गई। ताले के खुलते ही अंदर पुराने कागज़, पीली पड़ चुकी तस्वीरें, और एक लाल रंग की डायरी थी।

राधिका ने डायरी उठाई। कवर पर उभरे हुए अक्षरों में लिखा था —
"जिस्म बिना रूह"

उसके पन्ने खोलते ही सड़ी-गली बदबू का झोंका आया। अक्षर पुराने खून से लिखे गए लग रहे थे।

पहला पन्ना पढ़ते ही उनकी सांसें थम गईं —
"अगर तुम ये पढ़ रहे हो, तो समझ लो हवेली ने तुम्हें चुन लिया है। यहां जो भी आता है, उसकी रूह हवेली का हिस्सा बन जाती है… और उसका जिस्म हमेशा के लिए यहां कैद हो जाता है।"


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हवेली का सच

डायरी में आगे लिखा था कि 150 साल पहले इस हवेली में एक तांत्रिक ‘व्यास’ रहता था, जो अमरता पाना चाहता था। इसके लिए उसे सात पवित्र रूहों की बलि चाहिए थी। उसने आस-पास के गांव से लोगों को अगवा करना शुरू किया, लेकिन सातवीं रूह लाने से पहले गांव वालों ने उसे मार दिया।

लेकिन उसकी आत्मा नहीं मरी…
उसने हवेली को अपना ठिकाना बना लिया। अब जो भी यहां आता, उसकी रूह को हवेली में कैद कर देता, और उसका जिस्म एक खाली खोल की तरह भटकता रहता।

मयंक और राधिका को समझ आ गया कि उनकी हरकतें — हवेली में घुसना, ताला खोलना, डायरी पढ़ना — ये सब तांत्रिक की चाल थी, ताकि वो अपनी आखिरी रूह हासिल कर सके।


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आवाज़ें और साए

अचानक तहख़ाने में दीये बुझ गए।
चारों तरफ़ सन्नाटा छा गया… फिर एक धीमी सी फुसफुसाहट सुनाई दी —
"छोड़ो… भागो… देर हो जाएगी…"

ये आवाज़ न जाने कहां से आ रही थी।
राधिका ने कांपते हुए कहा, "ये… ये हमारी मदद करना चाह रही है?"
लेकिन तभी दूसरी, गहरी और डरावनी आवाज़ गूंजी —
"अब कोई बच नहीं सकता…"

तहख़ाने का दरवाज़ा अपने आप बंद हो गया। साये दीवारों पर रेंगने लगे, और एक धुंधली सी आकृति उभर आई — तांत्रिक व्यास की। उसका चेहरा आधा जला हुआ, आंखें अंगारों जैसी लाल, और हाथ में एक लोहे का त्रिशूल।


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आखिरी कोशिश

मयंक ने कांपते हाथों से अपनी जेब से वो ताबीज़ निकाला, जो हवेली के बाहर बैठे बूढ़े बाबा ने दिया था, और कहा था —
"जब मौत सामने हो, इसे खोलना।"

ताबीज़ खुलते ही उसमें से सफ़ेद धुंआ निकला, जो तांत्रिक के चारों ओर घूमने लगा।
तांत्रिक चीखा —
"ये… ये मंत्र…! ये तो मेरी मौत है…!"

लेकिन धुंआ उसके ऊपर पूरी तरह फैलने से पहले, राधिका के पैरों के नीचे की ज़मीन फट गई और वो काले गड्ढे में गिरने लगी।
"राधिका…!" मयंक ने उसका हाथ पकड़ लिया, लेकिन नीचे से बर्फ़ जैसी ठंडी पकड़ ने राधिका को खींचना शुरू कर दिया।


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चौंकाने वाला मोड़

मयंक पूरी ताक़त से खींच रहा था, तभी उसे एहसास हुआ… राधिका की आंखें अब काली हो चुकी थीं, और होंठों पर एक डरावनी मुस्कान थी।
"तुम सोचते हो, मैं तुम्हारी राधिका हूं?"
उसकी आवाज़ दोहरी हो गई थी — आधी राधिका की, आधी तांत्रिक की।

मयंक के होश उड़ गए।
असल में, राधिका की रूह तो पहले ही हवेली में कैद हो चुकी थी। जो उसके सामने था, वो सिर्फ़ तांत्रिक का क़ब्ज़ा किया हुआ जिस्म था।


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हवेली की नई रूह

ताबीज़ का धुंआ धीरे-धीरे ख़त्म हो रहा था। तांत्रिक की हंसी गूंज रही थी।
"अब तुम… मेरे आखिरी शिकार हो…"

अगले ही पल तहख़ाने में एक तेज़ धमाका हुआ, और दरवाज़ा खुल गया।
बाहर खड़ा वही बूढ़ा बाबा मंत्र पढ़ते हुए अंदर आया, और ताबीज़ को मयंक के हाथ से छीनकर राधिका के माथे पर रख दिया।
एक कानफाड़ू चीख़ के साथ तांत्रिक का साया बाहर निकल गया, लेकिन… साथ में राधिका का जिस्म भी ज़मीन पर निढाल गिर पड़ा।

उसकी आंखें बंद थीं। सांसें थम चुकी थीं।
बाबा ने गंभीर स्वर में कहा —
"रूह को बचा लिया… लेकिन जिस्म अब खाली खोल है।"


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अंत… या शुरुआत?

मयंक की आंखों में आंसू थे। वो राधिका का हाथ पकड़कर बैठा रहा, जबकि हवेली फिर से सन्नाटे में डूब गई।
बाबा ने कहा —
"ये हवेली कभी शांत नहीं होगी… जब तक सातवीं रूह पूरी तरह आज़ाद न हो।"

मयंक ने बाबा की तरफ़ देखा, उसकी आंखों में अब डर नहीं… सिर्फ़ आग थी।
"तो फिर… मैं इसे खत्म करूंगा।"

बाहर आसमान में काले बादल गरजने लगे, हवेली की टूटी खिड़कियों से ठंडी हवा चली, और कहीं गहराई में एक धीमी सी हंसी गूंजी —
"आओ… इंतज़ार रहेगा…"


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