Yaado ki Sahelgaah - 33 in Hindi Biography by Ramesh Desai books and stories PDF | यादो की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई (33)

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यादो की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई (33)

          

                  : : प्रकरण - 33 : :


        मैंने स्नेहा को मेरी हाथ के नीचे काम पर रखा था. उस के मेरा काम दूसरों के साथ कमला करती थी. वह बेवा थी. काफ़ी दुखी थी. इस स्थिति में वह किसी का अच्छा नहीं देख सकती थी. मैं स्नेहा का अच्छा ख्याल रखता था. वह बात उसे कांटो की तरह चुभती थी. उस की मजबूरी का फायदा उठाकर पैसों की लालच देखकर ज़ब चाहे तब उस का यौवन शोषण करता था.

       स्नेहा ने भी अपना पति खो दिया था तो वह सोचता था वह कमला की तरह उस का भी यौन शोषण कर सकता हैं और वैसे भी वह वेश्या थी. उस का कई बार शोषण किया था.

       लेकिन स्नेहा पुरी तरह से बदल गई थी. वह तिजोरी वाला को बिल्कुल सुनती नहीं थी. और मैं उस के साथ तो वह उस को उंगली भी लगाने की हिमत नहीं कर सकता था.

       तिजोरी वाला ने सब को उस के अतीत के बारे में अवगत किया था. तो हर कोई चोंच मारने की कोशिश करता था. उस ने मैनेजमेंट को बताया था. वह अभी बदल गई हैं. उस की शादी भी हो गई हैं. लेकिन दुर्भाग्य ने उस का पति एक हीं साल में छिन लिया हैं. अब वोह NGO में रहती हैं.

       उस को ओफिस की तरफ से भी सुरक्षा प्राप्त थी. 

        किसी की भी आँख उठाकर उसे देखने की हिमत नहीं थी.

        और तिजोरी वाला कुछ भी नहीं कर सकता था. 

         '  माधुरी एक्सपोर्ट्स' में कुछ निकम्मे लोग भी जमा हो गये थे. उन्होंने ओफिस को बड़ी लालच देखकर यूनियन में शामिल कर दिया था. सब को तगड़े  वादे किये थे. और लोग उन के झांसे में आ गये थे. स्नेहा भी उन की बातों में आई थी.

         यह सुनकर मैं उस पर भड़क गया था. मैंने उसे बहुत डांटा था. मेरे कहने पर उस ने अपना नाम वापस ले लिया था. बाद में कंपनी ने बड़ा फेंसला किया था. यूनियन बनाने वाले लोगो को कंपनी से निकाल दिया था.

         मैंने स्नेहा के बारे में दखल अंदाजी की थी तो वह लोग मुझे उन का दुश्मन मानने लगे थे. मुझे उस से कोई प्रोब्लेम नहीं था. कंपनी का मुझे पूरा साथ था.

         ' माधुरी एक्सपोर्ट्स में वॉल्यून्टेरी निवृति योजना दाखिल थी जो फायदे मंद थी . मैंने उस योजना का लाभ उठाया था, मेरी साथ स्नेहा ने भी उस का फायदा उठाया था.

        गरिमा ने उसे अपने NGO के कुछ काम सौंप दिये थे. बदले में उसे माधुरी से भी अच्छा वेतन मिलता था. हमारे साथ तिजोरी वाला ने उस योजना का लाभ उठाया था. उस ने भी माधुरी को छोड़ दिया था.

        मैंने जोब छोड़ते समय कुमार भाई का आभारमाना था. उन्ही की वजह से मैं बहुत कुछ सिखा था.  उन्होंने मुझे नये डिपार्टमेंट की जिम्मेदारी  सोंपी थी जिस के कारण मैं काफ़ी सफल हुआ था.

       तब उन्होंने ने मुझे कहां था.

       " मैंने इस में कुछ नहीं किया, यह आप की मेहनत और काम के प्रति की निष्ठा का प्रताप हैं. "

        उस समय एक और वरिष्ठ अधिकारी हमारे साथ था. उन्होंने में मुझे एक बड़ी बात सिखाई थी.

        " कभी ऐसा मत कहो. मुझे सब मालूम हैं. इस दुनिया में सिखने के लिये बहुत सारी चीज हैं जिस के लिये यह जिंदगी छोटी पड़ जाती हैं.. "

         एक तरफ यह अधिकारी था, जिस ने मुझे बढ़ते ही रहने का सबक सिखाया था और दूसरी तरफ तिजोरीवाला हमेशा मेरी टांगे खींचता रहता था.

         उस के व्यवहार ने हीं मुझे यह कहने को उकसाया था.

          " मुझे नाहक में परेशान मत करो. मेरी बर्दास्त का इम्तिहान ना लो.. नहीं तो मैं कल ओफिस आकर बडे साब से तुम्हारी शिकायत कर दूंगा. "

           वह मुझ से सरकारी काम करवाता था. उस के लिये कंपनी से पैसे भी उठाता था. वह 100 रूपये ओफिस से लेता था और 25 रूपये भी कर्मचारी को देता नहीं था. इस वजह से समय पर काम नहीं होता था उस के लिये मुझे जिम्मेदार ठहराता था. मुझे दोष देता था.

         एक बार तीन बजे उस ने मुझे सरकारी कार्यालय में ड्यूटी ड्रॉ बैक के चेक के लिये भेजा था. मैंने चेक निकालने के लिये पुरी कोशिश थी. अकाउंट अफसर ने मुझे दूसरे दिन सुबह चेक देने का वादा किया था. उस में कुछ फर्क पड़ने वाला नहीं था. मेरी सारी कोशिशे नाकाम हुई आखिर तिजोरीवाला को रिपोर्ट किया था.

       सुनकर वह मुझ पर भड़क गया था. मुझे सवाल किया था.

        " यह बताने के लिये तुम्हे इतना समय लग गया?"

        उस से मुझे गुस्सा आया था. मैं उस वक़्त टेलिफ़ोन पर था. मैंने उस की क्लास लेते हुए सवाल किया था. "

         " पहले  मैं काम निपटाने की कोशिश करुं के तुम्हे फोन करने को दौडू.? "

         उस को अपनी काबिलियत सिद्ध करने लिये काम होने के पहले मैनेजमेंट को बताने की आदत थी.

         उस ने मैनेजिंग डायरेक्टर को बता दिया था.

         " आज चेक मिल जायेगा. "

         मैंने खुले शब्दों मैं धमकी दी थी!

         " मुझे नाहक मैं तंग मत करो.. मैं कल आकर बडे साब से तुम्हारी शिकायत करूँगा. "

        यह सुनकर उस की बोलती बंद हो गई थी.

        दूसरे  दिन वह मेरे साथ सरकारी कार्यालय में आया था. पुरे दिन हम साथ थे. उस में मुझे पूछने की हिमत नहीं थी.

        " मुझे क्यों ऐसी धमकी दी? "

        उस ने मुझे होटल में ले जाकर खाना भी खिलाया था..

        ओफिस में सब को खबर हो गई थी.

        हमारे बीच क्या हुआ था?

       ओफिस में सब लोग़ तिजोरी वाला से डरता था. कोई उस के साथ भिड़ने की हिम्मत नहीं करता था. केवल मैं ही था जिस का उस को डर लगता था.

       उसी की वजह से कंपनी को बड़ा नुकसान होने वाला था. वह पैसे मैंने अपनी मेहनत और कोशिश से वापस दिलाये थे. मैं तिजोरी वाला जैसा काम करता था लेकिन मेरा वेतन बहुत कम था. इस लिये मैंने बढ़ावा मांगा था तो कंपनी ने मना कर दिया था. मुझे  तिजोरी वाला के डिपार्टमेंट में भेज देने की बात की थी तो मैंने साफ कर दिया था.

     " अगर ऐसा कुछ हुआ तो मैं जोब छोड़ दूंगा.. "

     मेरी बात सुनकर वह चकित ऱह गये थे और कुछ दिनों में मेरा वेतन बढ़ गया था.

      उस वक़्त दो लडके तिजोरी वाला के साथ काम करते थे,  जो उस के पुतले थे, चमचे थे. उन को जलन हुई थी.

                     00000000000 ( क्रमशः)

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