नयी राह
Hindi Kahani • लगभग 1500 शब्द
लेखक – Vijay Sharma Erry
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शाम का सूरज गाँव धनपुरा की पगडंडी पर अपने सुनहरे रंग बिखेर रहा था। हवा में सरसों के फूलों की महक घुली हुई थी। इसी पगडंडी पर तेज़-तेज़ कदमों से चल रही थी सोनाली, बी.ए. फाइनल ईयर की छात्रा—पर उससे कहीं ज़्यादा, सपनों से भरी एक लड़की।
सोनाली का परिवार बहुत साधारण था—पिता हरबंस लाल गाँव की छोटी-सी किराना दुकान चलते थे, और माँ सीता देवी एक गृहिणी। दोनों चाहते थे कि सोनाली पढ़-लिखकर अपनी दुनिया बनाए, पर गाँव की पुरानी सोच अक्सर उनके सपनों पर पहरे बैठा देती थी।
आज कॉलेज से लौटते वक्त सोनाली परेशान थी। उसकी प्रोफेसर ने अचानक कहा था—
“सोनाली, तुम बहुत अच्छी लिखती हो। तुम्हें पत्रकारिता में जाना चाहिए। तुम्हारे अंदर एक नई सोच है, एक नई राह चुनने का साहस है।”
ये बात सोनाली के दिल में उतर गई। पर उसे पता था कि उसके पिता लड़की को दूसरे शहर भेजने के पक्ष में शायद न हों।
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घर का सच
रात को खाना खाते समय सोनाली बड़े संकोच से बोली—
“पापा... मैं आपसे एक बात पूछूँ?”
हरबंस लाल ने मुस्कुराते हुए कहा—
“हाँ बेटा, बोलो। तुम इतनी घबराई क्यों हो?”
सोनाली धीरे से बोली—
“पापा, मैं आगे पढ़ाई करना चाहती हूँ… पत्रकारिता में। शहर जाकर। मैंने कॉलेज में फॉर्म भी देखा है…”
क्षण भर को घर में सन्नाटा छा गया।
माँ ने चूल्हे से नज़रें हटाकर सोनाली की ओर देखा।
पिता की आँखें गहरी सोच में गुम हो गईं।
कुछ पल बाद पिता बोले—
“बेटा, तुम जानती हो हमारे हालात... और लड़की को शहर भेजना आसान नहीं होता।”
सोनाली के सपनों पर जैसे बरसात पड़ गई। उसने कुछ नहीं कहा, बस चुपचाप कमरे में चली गई।
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माँ की ममता और समझ
रात को माँ धीरे से उसके पास आईं।
“सोनाली, तू रो रही है?”
“नहीं माँ… बस ऐसे ही।” – वह बोली, पर उसकी आँखों की नमी सब कह चुकी थी।
माँ ने उसके सिर पर हाथ फेरा—
“बेटा, सपने दिल में दबाए रखने से दर्द और बढ़ता है। तू कल अपने पापा से फिर बात करना। मैं भी उनसे समझाऊँगी।”
सोनाली को माँ की बात में उम्मीद की झलक मिली।
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पिता का संघर्ष
अगले दिन सुबह हरबंस लाल दुकान खोलने से पहले बहुत देर तक सोचते बैठे रहे।
“लड़की को शहर भेजना?”
“अगर कोई परेशानी हो गई तो?”
“पर बेटी की आँखों में जो चमक है, क्या मैं बुझा दूँ?”
बहुत सोचने के बाद उन्होंने निर्णय लिया कि शाम को सोनाली से दोबारा बात करेंगे।
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समाज की आवाज़ और दोस्ती की ताकत
कॉलेज में सोनाली की सबसे अच्छी दोस्त थी रिनी—आधुनिक सोच वाली, आत्मविश्वासी लड़की।
रिनी ने सोनाली की उदासी देखी और बोली—
“तू तो यार बहुत टैलेंटेड है। डर क्यों रही है? तू अपने पापा को समझा सकती है। यह तेरी जिंदगी है, तेरी राह है।”
सोनाली ने एक लंबी साँस ली—
“समझ तो आती है… पर हमारी दुनिया अलग है रिनी। तुम्हारे घर में आज़ादी है, पर हमारे यहाँ…”
रिनी ने उसका हाथ थाम लिया—
“एक नयी राह किसी एक के साहस से ही बनती है, सोनाली।”
ये शब्द सोनाली को हिम्मत दे गए।
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शाम का निर्णायक पल
शाम को पिता दुकान से लौटे तो सोनाली ने हिम्मत जुटाई—
“पापा, मैं फिर से वही बात कहना चाहती हूँ… अगर आप इजाज़त दें तो मैं पत्रकारिता पढ़ना चाहती हूँ।”
पिता ने उसकी आँखों में उम्मीद की चमक देखी।
फिर गहरी आवाज़ में बोले—
“सोनाली, मैं डरता हूँ… पर तेरी माँ ने कहा है कि तू कुछ बड़ा कर सकती है। और सच कहूँ तो… मुझे भी लगता है कि तेरे सपनों को रास्ता मिलना चाहिए।”
सोनाली की आँखों में चमक आ गई।
“मतलब… आप मुझे जाने देंगे?”
पिता ने मुस्कुराकर सिर हिलाया—
“हाँ, एक शर्त पर। तू वादा करे कि हमेशा खुद का और अपने परिवार का ख्याल रखेगी।”
सोनाली की आँखे भर आईं—
“मैं वादा करती हूँ, पापा!”
माँ ने दोनों को गले लगा लिया—घर में खुशियों की बयार दौड़ गई।
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नई शुरुआत
एक महीने बाद सोनाली शहर के प्रतिष्ठित पत्रकारिता कॉलेज में पहुँच चुकी थी।
पहले दिन वह घबराई भी, उत्साहित भी।
पर उसके कदम मजबूत थे—क्योंकि यह राह उसने खुद चुनी थी।
लाइब्रेरी में बैठकर उसने अपनी डायरी में लिखा—
“इंसान की सबसे बड़ी ताकत उसका सपना है। और सबसे बड़ा सहारा—उसका परिवार।”
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पहली उपलब्धि
कुछ महीनों बाद कॉलेज ने राज्यस्तरीय लेखन प्रतियोगिता रखी।
सोनाली ने “गाँव की बेटी – नया भारत” पर लेख लिखा।
नतीजे वाले दिन मंच से आवाज़ आई—
“विजेता हैं… सोनाली हरबंस लाल, धनपुरा!”
पूरा हॉल तालियों से गूंज उठा।
सोनाली की आँखें चमक उठीं।
उसने ट्रॉफी को ऐसे थामा जैसे यह उसके सपनों का पहला ईंट था।
घर फोन किया—
“पापा… मैंने जीत लिया!”
पिता की आवाज़ भर आई—
“मुझे पता था बेटा, तू कर सकती है।”
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अपनी राह बनाने वाली लड़की
धीरे–धीरे सोनाली का नाम कॉलेज में चमकने लगा।
उसके लेख स्थानीय अखबारों में छपने लगे।
एक दिन एक बड़े न्यूज़ चैनल ने उसे इंटर्नशिप का ऑफर दिया।
सोनाली ने फोन पर पापा को बताया।
हरबंस लाल बोले—
“सोनाली, तुमने साबित कर दिया कि बेटी बेटे से कम नहीं होती। चलो, अब आगे बढ़ो… यह राह तूने खुद बनाई है।”
सोनाली ने भावुक होकर कहा—
“पापा, यह राह मेरी है, पर हिम्मत आपने दी है।”
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कहानी का संदेश
एक साल बाद जब सोनाली गाँव आई, तो बहुत-सी लड़कियाँ उसके पास आईं—
“दीदी, हम भी आगे पढ़ना चाहती हैं।”
सोनाली ने मुस्कुराकर कहा—
“डर कर नहीं, सपनों पर भरोसा करके चलो… एक नयी राह हमेशा तुम्हारे कदमों का इंतज़ार करती है।”
उसकी ये बात सुनकर हर घर में नई सोच, नई उम्मीद जगने लगी।
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समाप्ति
एक साधारण-सी लड़की का साहस,
एक पिता का भरोसा,
एक माँ का आशीर्वाद,
और एक दोस्त का समर्थन…
सब मिलकर एक नयी राह बनाते हैं—
जो सिर्फ मंज़िल तक ही नहीं पहुँचाती,
बल्कि जीवन को नयी दिशा भी देती है।
— लेखक: Vijay Sharma Erry
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