Incomplete Without You in Hindi Love Stories by Kaushik dave books and stories PDF | तेरे बिना अधूरा मैं

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तेरे बिना अधूरा मैं

तेरे बिना अधूरा मैं

लेखक: कौशिक दवे

शाम ढल रही थी। आसमान में नारंगी और भूरे रंग घुल चुके थे, जैसे किसी ने दर्द को रंगों में उकेर दिया हो। प्लेटफॉर्म नंबर तीन पर खड़ी वह लड़की, भीड़ में होते हुए भी अकेली थी। उसके हाथ में छोटा-सा बैग था और आंखों में ठहरा हुआ सैलाब। ट्रेन आने की आवाज़ दूर से ही दिल के तार हिला देती थी, क्योंकि हर ट्रेन उसे उसी मोड़ पर ले जाती थी—जहां से लौटना मना होता है।

आरव उसी प्लेटफॉर्म के दूसरे सिरे पर खड़ा था। पीठ झुकाए, नजरें ज़मीन पर गड़ी हुईं। वह जानता था कि आज अगर उसने पलटकर देख लिया, तो वह खुद को रोक नहीं पाएगा। और आज वह टूटना नहीं चाहता था। कुछ रिश्ते बचाने के लिए दूरी ज़रूरी होती है—यह उसने बहुत देर से सीखा था।

दोनों के बीच कुछ कदमों का फासला था, मगर उनके बीच बिछा अतीत किसी महासागर से कम नहीं था। पहली मुलाक़ात की मुस्कानें, आधी रात की बातें, और वो वादे—जो वक्त की बारिश में धुल चुके थे।

उसे याद आया—वह शाम, जब बारिश अचानक शुरू हुई थी। सारा शहर भीग रहा था और वे दोनों एक छोटे-से कैफे में बैठे थे। उसने कहा था, “अगर कभी हम बिछड़ गए, तो क्या तुम मुझे ढूंढोगे?”

वह हंसी थी, “तुम्हें ढूंढना नहीं पड़ेगा, मैं हमेशा यहीं रहूंगी।”

आज वही ‘यहीं’ सबसे दूर लग रहा था।

सीटी बजी। ट्रेन प्लेटफॉर्म पर आ चुकी थी। भीड़ में हलचल हुई। लोग चढ़ने-उतरने लगे। वह लड़की—जिसका नाम अनन्या था—एक कदम आगे बढ़ी। उसकी आंख से आंसू फिसलकर गाल पर रुक गया। उसने पोंछा नहीं। कुछ दर्द पोंछने से कम नहीं होते।

आरव ने अपनी मुट्ठी भींच ली। जेब में रखा वह छोटा-सा काग़ज़ उंगलियों में चुभने लगा। उस पर बस एक लाइन लिखी थी—“माफ़ करना, मैं हार गया।” वह यह चिट्ठी उसे देना चाहता था, पर हर बार साहस साथ छोड़ देता।

उसे लगा, अगर वह बोल पड़ा तो सब बिखर जाएगा। और अगर चुप रहा, तो वही अधूरापन उम्र भर साथ रहेगा।

अनन्या ने पीछे मुड़कर देखा। एक पल के लिए उनकी नज़रें टकराईं। उस पल में न शिकायत थी, न सवाल—बस थकान थी। जैसे दोनों ने बहुत लड़ लिया हो और अब हार स्वीकार कर ली हो।

“ख़याल रखना,” अनन्या ने होंठों ही होंठों में कहा। आवाज़ नहीं निकली, मगर आरव ने सुन लिया।

उसने जवाब नहीं दिया। सिर झुका लिया। कुछ जवाब समय पर न दिए जाएँ तो हमेशा के लिए खो जाते हैं।

ट्रेन के दरवाज़े बंद होने लगे। अनन्या अंदर चली गई। खिड़की से बाहर देखते हुए उसने आख़िरी बार प्लेटफॉर्म को देखा—और आरव को। वह वहीं खड़ा था, जड़-सा।

ट्रेन चल पड़ी।

आरव ने महसूस किया, जैसे कोई चीज़ उसके भीतर से निकल गई हो। वह बैठ गया। भीड़ छंट चुकी थी। प्लेटफॉर्म खाली हो रहा था, मगर उसके भीतर का शोर बढ़ता जा रहा था।

उसने जेब से चिट्ठी निकाली। पढ़ी। फिर धीरे-धीरे उसे मोड़कर रख लिया। शायद कुछ बातें काग़ज़ पर ही ठीक लगती हैं, ज़िंदगी में नहीं।

रात उतर आई। प्लेटफॉर्म की लाइटें जल उठीं। बारिश की हल्की बूंदें गिरने लगीं। हर बूंद के साथ एक याद ज़मीन पर गिरती और टूट जाती।

उसे समझ आ गया था—प्यार का मतलब साथ रहना ही नहीं होता। कभी-कभी किसी को आज़ाद छोड़ देना भी प्यार होता है।

आरव उठा। स्टेशन से बाहर की ओर चल पड़ा। कदम भारी थे, मगर दिल थोड़ा हल्का। वह जानता था कि आगे की राह आसान नहीं होगी। अनन्या के बिना वह अधूरा रहेगा, पर शायद इसी अधूरेपन में वह खुद को पूरा करना सीख जाएगा।

क्योंकि कुछ कहानियाँ मिलन पर खत्म नहीं होतीं— कुछ बिछड़कर भी ज़िंदा रहती हैं।

और उसकी कहानी का नाम था— तेरे बिना अधूरा मैं