Film Script:_ Haq in Hindi Film Reviews by Dr Sandip Awasthi books and stories PDF | फिल्म आलेख :_ हक

Featured Books
Categories
Share

फिल्म आलेख :_ हक

फिल्म आलेख :_ हक के लिए लड़ती अकेली मुस्लिम औरत 

-------------------------------------------

अकेली औरत ,तीन बच्चों के साथ घर से निकाल दी गई ,तीन तलाक़ देकर।क्योंकि शौहर ने दूसरी शादी कर ली ।गुजारा भत्ता मात्र चार सौ रूपये वह भी अस्सी के दशक में। फिर वह भी देना शौहर ने बंद कर दिया। वजह ? औरत के स्वाभिमान को तोड़ना,उसको नीचे गिराना। 

   ऊपर से इस्लाम के सभी काजी,मौलवी और समाज उसे हो दोष दें। तो फिर ऐसे में क्या करे अकेली औरत? जब शौहर खुद बड़ा वकील हो तब तो और भी मुश्किल। किस तरह शाजिया बानो , यह किरदार यामी गौतम धर ने क्या डूबकर निभाया है,बस पूछो मत। आप फिल्म में बानो के दर्द,अकेलेपन,बेबसी और तीनों बच्चों को अकेले पालने के कड़े संघर्ष को देखेंगे। कहीं भी, अकेली पड़ने के बाद भी उसने हार नहीं मानी।आत्महत्या की राह नहीं बल्कि आत्म रोशन की राह चुनी। हजारों लाखों मुस्लिम औरतों के लिए एक मिसाल प्रस्तुत की। और यह आज भी हिंदुस्तान की पहली मुस्लिम औरत की कहानी है जो अपने हक के लिए लड़ी।

 

कहानी और निर्देशन

------------------------- सुवर्ण वर्मा द्वारा निर्देशित हक फिल्म दरअसल पहली ऐसी फिल्म बन गई है जो खूबसूरती और समझदारी से संविधान द्वारा प्रदत्त समता के अधिकार के वास्तविक अर्थ को सामने लाती है। इस देश में सभी को, सवर्ण, दलित,अल्पसंख्यक,आदिवासी और औरतों को समान अधिकार प्राप्त होने चाहिए। धर्म विशेष को आजादी के वक्त शरीयत और मुस्लिम पर्सनल बोर्ड, वक्फ बोर्ड के अधिकार दिए गए।जिनका जमकर दुरुपयोग हुआ ।वह भी इस्लाम की आड़ में पुरुषों के फायदे के लिए और औरतों के शोषण के लिए। पुरुष अपनी मर्जी से जब चाहे स्त्री को तलाक़ दे देता।गुजारा भत्ता तो देने का सवाल ही नहीं। क्योंकि मेहर शादी के वक्त मुकर्रर हो जाती। साथ ही बीवी के रहते दूसरी, तीसरी बार निकाह भी कर लेता। मुस्लिम औरतों के पास कुछ भी,एक भी अधिकार नहीं थे।

इसी बात को पहली बार एक मुस्लिम औरत ने उठाया,सुप्रीम कोर्ट तक लड़ाई लड़ी। 

यह उसी औरत शाहबानो की जिंदगी पर बनी सच्ची कहानी है।

      फिल्म की खूबसूरती है इसका धीमा,प्यारा और खूबसूरत फ्लेवर।कहीं भी ओवर एक्टिंग,ओवर डायलॉग,कहीं भी अतिरेक नहीं हुआ है। सभी कुछ सच और कहानी को कहने के ढंग से ही दिखाया गया।

  कहानी प्रारंभ होती है बानो बेगम,यामी गौतम ने इस किरदार को खूब डूबकर निभाया है,की खुशनुमा जिंदगी से। उनके शौहर ,एडवोकेट असलम खान, इमरान हाशमी अपनी गृहस्थी और बेगम से बहुत प्यार करते हैं। दोनों के तीन बच्चे भी होते हैं।फिर आठ साल बाद अचानक से बिना पत्नी को बताए शौहर दूसरा निकाह कर लेता है। उसके मां झूठ कहती है कि फूफी की बेसहारा, तलाक़ शुदा लड़की है। सबाब का काम किया जो इससे निकाह किया। वर्ष है उन्नीस चोहतर का । फिर किस तरह आगे रहस्य खुलता है कि वह असलम मियां की पहली मोहब्बत थी, जिसे वह आज भी चाहते हैं।

दिल टूटने से ज्यादा विश्वास टूटने की धमक और अहसास को चेहरे और बॉडी लेंगुएज से क्या खूब यामी ने जिया है।यह पढ़ने से अधिक देखने का अनुभव है।

        यहां से फिल्म ,जो एक सच्ची कथा,शाहबानो पर केंद्रित है,नया मोड़ लेती है। उसके सवालों से तंग आकर वकील शौहर तीन बच्चों सहित उसे घर से निकाल देता है। एक खुदाबंद मौलवी की स्वाभिमानी बेटी,जिसे नमाज, कुरान की आयतें और उनके सही अर्थ सब याद हैं, वह आवाज उठाती है अपने हक के लिए। क्यों मुस्लिम महिला की कहीं सुनवाई नहीं होती? उन्हें चुपचाप हर जुल्म सहने के लिए उन्हीं की सास,बुआ,फूफी तैयार करती हैं। शरीयत का सही अर्थ भी यह फिल्म बेहद सलीके से बताती है। 

पूरी फिल्म में बिला वजह का शोरगुल,हंगामा नहीं है। एक स्त्री की पूरे धर्म और उसके कट्टर लोगों के खिलाफ अकेले लड़ने की सच्चाई बताई है।

 

 

अकेले कैसे होगा,की सोच बदलती स्त्री 

------------------------------------------

 सोचें,प्रारंभ में कोई वकील केस ही नहीं लेता।फिर एक महिला वकील और उसका साथी खुद आगे आते हैं एक स्त्री के हक के लिए। फिर लोअर कोर्ट कह देती की आपके मुस्लिम लॉ बोर्ड है,वक्फ है,वहां जाएं कोर्ट क्यों आई? तब वह कहती हैं,"हिंदुस्तान का संविधान मुझे यह हक देता है कि सभी स्त्री पुरुष बराबर हैं।उनके अधिकार और आजादी बराबर है। फिर हमें क्यों छोड़ दिया जाता है?"

बताना उचित होगा कि इस केस से पहले मुस्लिम स्त्रियों की कोई आवाज,सुनवाई नहीं थी। मजहब के नाम पर मौलवी आदि के बनाए मुस्लिम बोर्ड पुरुषों के पक्ष में फैसला देते थे। 

 पहली स्त्री जब आगे आई,पिता के साथ बोर्ड में गई तो वहां के सदर ने उनके पिता से कहा,"अफसोस आपने अपनी बेटी को चुप रहना नहीं सिखाया? यह बदतमीजी से हमारे सामने बोल रही है।"

पिता का जवाब हर लड़की,स्त्री का सिर फक्र से ऊंचा करता है,जब वह कहते हैं,"माफ करें मेरी बेटी का नाम बानो है ।और वह सही बात कह रही है। मैं मौलवी होकर जानता हूं वह सही बात कह रही है। आपसे हमें इंसाफ नहीं मिला तो हम कोर्ट जाएंगे।" 

इंसाफ भी क्या भरण पोषण के चार सौ रूपये माह,वह भी वकील शौहर ने बंद कर दिए थे,दुबारा मिले बस।

     पति से मिलने फिर जाते हैं तो वह इस बार चालाकी से तीन तलाक दे देता है। अब बानो सन्न रह जाती है।

कोर्ट सुनती है, दलीलों को और अंत में न्याय करती है कि बानो और तीन बच्चों के भरण पोषण के लिए बाइस रुपए हर माह शौहर देगा।

इस क्रूर फैसले के खिलाफ हाइकोर्ट और जब वहां भी राहत नहीं मिलती तो उच्चतम न्यायालय का दरवाजा खटखटाया जाता है।

  फिल्म दिखाती है कि इन दस वर्षों की कोर्ट की लड़ाई में अपनी हिम्मत,सिलाई करके बच्चों को पालना,पिता का देहांत के बाद भी वह हिम्मत नहीं हारती। दो तीन अच्छे और सच्चे लोग मदद करते हैं। तो उधर पूरा मुस्लिम समुदाय उसके खिलाफ हो जाता है।क्योंकि यह उनकी सत्ता और पुरुषों के अधिकार पर सीधी चोट थी। आप और रोमांचित हो जाएंगे कि यह सारा सच्ची घटना पर आधारित है वास्तव में शाहबानो ने यह लड़ाई पंद्रह साल लड़ी।अपने ही मोहल्ले में बहिष्कार,हुक्का पानी बंद, सब झेला पर हिम्मत नहीं हारी ।

विडंबना यह है कि हाई कोर्ट में अपील की खर्चा दिया जाए बढ़ाकर। वहां पर मासिक खर्चा तीन बच्चों और तलाकशुदा बानो के लिए दुबारा तय हुआ भी। सच्चाई दिखाती यह आत्मकथा बताती है कि वह खर्चा अब बाइस रुपए अस्सी पैसे प्रतिमाह हुआ...जी हां!!

बाइस रूपए अस्सी पैसे।

   क्या करती लाचार,तलाकशुदा बानो? सिलाई करके, कुछ उर्दू पढ़ाकर पेट पालती हुए भी उसने हिम्मत नहीं हारी। कहते हैं न जब आप का कोई सहारा नहीं होता तब ऊपर वाला हाथ बढ़ाता है। वकील को शौहर ने अपनी तरफ मिलाना चाहा। बानो का मामला अब सारे मुस्लिम समुदाय का बन गया।

सोचकर ही रोमांच और सिहरन होती है कि मुस्लिम बोर्ड,वक्फ और बड़े मौलवी,वकील सुप्रीम कोर्ट में और दूसरी तरफ अकेली एक कम पढ़ी लिखी परन्तु अपने साथ हुए अन्याय के खिलाफ जागरूक मुस्लिम महिला।

उसकी वकील श्रीमती इंदु जैन ,जो प्रारंभ से ही उसके साथ थी, केस की पैरवी करती हैं। मुस्लिम बोर्ड बहुत धमकाता, डर दिखाता है कि हमारे अपने शरीयत के नियम लागू होते हैं।लिहाजा कोर्ट दखल न दें।कई नई बातें और ढोंग बेनकाब होते हैं। अंत में संविधान के अनुसार और भारतीय कानून पूरे देश पर लागू होता है के तहत शाहबानो केस का ऐतिहासिक फैसला आता है कि शौहर को गुजारा भत्ता,अपनी तलाकशुदा पत्नी को आज के हिसाब से देना होगा।वर्ष था उन्नीस सौ पिचयासी, पर फैसला सीमित भी था जिसमें यह अधिकार तीन तलाक देने का अभी भी कायम था।शरीयत के पास था। 

फिर भी जीत हुई।

      संतुलित और बेहतरीन संवाद के साथ संयमित अदाकारी सभी पात्रों ने की है फिल्म में। निर्देशक सुवर्ण वर्मा प्रभावित करते हैं। फिल्म कहीं भी बोझिल नहीं होती बल्कि रोचकता बनी रहती है। एक उल्लेखनीय पहलू है लखनऊ,कानपुर शहरों के गलियों कूचों और बाजारों का जीवंत चित्रण। कई ऐतिहासिक स्थलों पर भी फिल्मांक किया गया है।

फिल्म उस स्त्री के लिए जरूर देखनी चाहिए जिसने हर मुमकिन कोशिश की अपने रिश्ते को बचाने की। जो चार सौ रूपये महीने में भी तीन बच्चों को पाल रही थी। वह भी उसका बंद कर दिया कि मेहर लो और बात खत्म। फिल्म देखनी है किस तरह दुनिया के तानो के बाद भी एक मौलवी बाप,जिसने शरीयत,कुरान सब अच्छे से पढ़े हैं,उन्हीं के आधार पर अपनी बेटी के साथ हमेशा खड़ा रहकर उसे हिम्मत और ताकत देता है। वह चाहता तो ,जैसे असंख्य माता पिता,आप लोग भी करते हैं, बेटी को ही समझा बुझाकर उसे ही सहन करने,बदलने की राह दिखाता पर उसने गलत का साथ नहीं दिया। फिल्म देखी जानी चाहिए उस स्त्री शाहबानो के लिए जो लड़ी और लाखों मुस्लिम औरतों का भला कर गई। वास्तविक स्त्री कुछ वर्ष पूर्व दिवंगत होकर भी एक मिसाल बन गई भारतीय मुस्लिम स्त्रियों को रूढ़ियों से मुक्त करने के लिए।

     बाद में जब जनता और कोम ने बहुमत दिया और मोदी सरकार आई तो तीन तलाक को, बिल लाकर कानूनन अवैध,गलत घोषित किया,जिससे हर मुस्लिम स्त्री,बेटी को राहत दी। 

अब तो कई महिलाएं इसके खिलाफ कोर्ट जाती हैं और जीतती भी हैं। एक देश एक कानून, जो हमारे संविधान से ही चलेगा, के उजाले में आज स्त्रियां चैन की सांस ले पा रहीं हैं। कट्टरपंथी , रूढ़ियां अभी भी हैं।  

आज ईरान,कुवैत,इराक जैसे सौ प्रतिशत मुस्लिम देशों की लड़कियां,औरते हिजाब,बुर्का जलाकर ,हटाकर विरोध दर्ज कर रहीं,प्रदर्शन कर रहीं और उन्हें इससे राहत भी मिल रही। उम्मीद है,भारत में भी इससे सीख मिलेगी और खुली हवा का हक इन्हें भी मिलेगा।

यह दिलचस्प फिल्म नेटफ्लिक्स पर देखी जा सकती है।

अनामिका चक्रवर्ती की पंक्तियां हैं, "सागर है ,आकाश है मध्य उनके मैं हूं 

 जो कुछ साबुत सा था 

 सब मिट्टी हो गया 

शायद 

 यही जीवन है।"

           ------------------

 

__डॉ. संदीप अवस्थी ,जाने माने

कथाकार,आलोचक और फिल्म लेखक हैं।

मो 7737407061