Trisha - 24 in Hindi Women Focused by vrinda books and stories PDF | त्रिशा... - 24

The Author
Featured Books
Categories
Share

त्रिशा... - 24

राजन के परिवार वालों की तरफ से तय किए चार माह के समय के अंदर ही त्रिशा के परिवार वालों ने उसकी शादी की तैयारी शुरु कर दी थी। 


शादी की तारीख निश्चित होने के बाद त्रिशा के परिवार के पास लगभग चार माह का समय था जिसमें उसके परिवार के सभी लोगों ने एक साथ मिलकर इंतजाम करने को कोशिश की।  शादी के कामों में हाथ बटाने  के लिए सुदेश ने अपने बाकी दोनों बेटों(चेतन और मान) को भी बुला लिया था। 

चेतन त्रिशा से उम्र में एक साल  छोटा था और इस समय दिल्ली में अपनी पढ़ाई पूरी कर रहा था और अपनी परीक्षाएं पूरी होते ही वह अपनी बहन की शादी के लिए आ गया था। वहीं मान और तन्मय जुडवां भाई है तो मान भी तन्मय की तरह इस समय दसवीं में है और फिलहाल अपनी नानी के यहां  रहता है और वहीं  पढ़ता है पर इस साल उसका एडमीशन तन्मय के साथ उसी के स्कूल में कराने का सुदेश ने इंतजाम करा लिया है जो पहले किसी कारण से रह गया था।

सबसे पहले कल्पेश और कल्पना  ने अपनी एफडी तुड़वाकर और बैंक में रखी अपनी सेविंग्स के जरिए त्रिशा  के लिए एक जोड़ी चांदी की  पायल, दो सोने की अंगूठी, एक जोड़ी सोने की कान की झुमकी और  एक चैन बनवाई वहीं राजन के लिए भी दो सोने की अंगूठियां और एक सोने की चैन बनवाई‌। जिसमें उसके मामा मामी ने भी अपना थोड़ा सा योगदान दिया। 

ज्वैलरी का इंतजाम होने के बाद लेन देन के कपड़ों का इंतजाम करना तो उनके लिए बिल्कुल भी मुश्किल ना था क्योंकि कल्पेश का स्वयं साड़ियों और सूट का शोरुम था। इसलिए लेन देन के लिए सभी महिला परिधान की व्यवस्था वहीं से हुई और कल्पेश सिंह ने भी अपनी बेटी के लिए और लेन देन के लिए एकदम बढ़िया, मंहगी और  सबसे अलग तरह के कपड़ों की व्यवस्था कि। यहीं नहीं अपने व्यापारी मित्र की दुकान से सभी पुरष परिधान खरीदे गए। 

ज्वैलरी और कपड़ो की टेंशन से निबटने के बाद शादी के लिए मैरिज होम और गेस्ट हाऊस में से किसी एक का इंतजाम  किया त्रिशा के भाई मानस ने। जिसने अपने दोस्त की मदद से जान पहचान के कारण अच्छे खासे डिस्काउंट पर मैरिज होम की बुकिंग करवा दी।

मानस ने कल्पेश के दिए मैरिज  होम के काम को तो कर लिया था अब बस एक बढ़िया हलवाई को ढूंढना बाकि थी जिसके खाने में स्वाद हों क्योंकि शादियों में अक्सर ताना खाने का ही मिलता है। इसी कारण से मानस ने बहुत से हलवाईयों से मिलकर, उनके खाने को चख कर, परख  कर शादी से एक महीने पहले एक हलवाई पक्का किया। 

इस हलवाई को बुक करने में मानस को बहुत मशक्कत करनी पड़ी क्योंकि जितना बढ़िया उसका खाना था उतना ही बढ़िया उसका दाम भी था। जिसकी वजह से इनका सारा बजट ही गड़बड़ हो रहा था। मानस  ने बहुत कोशिश की मोलभाव कर सही रेट लगाने कि लेकिन मोल भाव करते करते भी दाम उनके बजट से बाहर हो ही गया। लेकिन कल्पेश ने उससे कहा था कि चाहे जो हो जितना खर्च हो लेकिन शादी में कमी कोई नहीं होनी चाहिए।   

कल्पेश, सुदेश और मानस ने तो अपने अपने हिस्सा का काम किया ही। पर इनके अलावा जो त्रिशा के सामन की खरीददारी का जिम्मा था वह महक और मोनिका को दिया गया था। क्योंकि कल्पना का कहना था कि उसकी और उसकी मामी की शादी को तो सालों हुए अब आजकल क्या और किस चीज की जरुरत होती है यह तो मोनिका बेहतर बता सकती है क्योंकि उसकी शादी अभी हाल में ही हुई है पिछले साल। और महक बचपन से अकेले बाजार से खरीददारी  करती आई है तो वह मोल भाव अच्छे से कर लेती है और उसे सारी दुकानों और रास्तों  के बारे में भी अच्छे से  पता है। 

तीसरे माह के खत्म होते होते, ज्वैलरी, कपड़े, हलवाई और मैरिज होम का इंतजाम वह लोग कर चुके थे और शादी के कार्ड भी छपवाने का आर्डर दिया जा चुका था। महक और मोनिका के सलाह के बाद त्रिशा के लिए ब्यूटी पार्लर का भी इंतजाम किया जा चुका था।  

कुल मिला कर सारे बड़े बड़े काम किए जा चुके थे और बाकी का काम अभी भी जारी था। तय समय पर शादी के कार्ड आ जाने के बाद उन्हें बांटने का जिम्मा मानस, चेतन,  तन्मय  और मान  को दिया गया था। 

कल्पेश और सुदेश ने चारों भाईयों को दो दो के समूह में भेजा जहां चेतन और तन्मय कानपुर के रिश्तेदारों के कार्ड देने गए वहीं मानस और मान शहर के बाहर आस पास के रहने वाले रिश्तेदारों के यहां गए। 

जो रिश्तेदार बहुत दूर थे उनके लिए कल्पेश और सुदेश ने शादी का कार्ड कोरियर द्वारा भिजवा दिया। किंतु कुल मिलाकर सभी रिश्तेदारों तक समय रहते निमंत्रण पहुंचा दिया गया‌। 

और आखिकार इतनी मेहनत, दौड़ धूप के बाद वह दिन आ ही गया जिसका अरमान कल्पेश और कल्पना ने ना जाने कबसे सजा रखा था। उनकी एकलौती बेटी की  शादी का दिन।